बुधवार, 18 मार्च 2026

अनिल गौड़ का ग़ज़ल संग्रह 'रौशनी के नाम'

 हिंदी ग़ज़ल की सार्थक आवाज़: अनिल गौड़

हिंदी ग़ज़ल के परिदृश्य पर ​अनिल गौड़ एक ऐसी आवाज़ हैं जिनकी रचनात्मकता गहरी संवेदना और प्रभावशाली अभिव्यक्ति से समृद्ध है। उनका ग़ज़ल संग्रह 'रौशनी के नाम' स्वयं इस बात का प्रमाण है कि वे केवल शेर नहीं कहते, बल्कि समय और समाज से एक सार्थक संवाद स्थापित करते हैं। आम बोल चाल की भाषा में लिखी गईं ये सीधी, सादी ग़ज़लें पाठक और श्रोता के मन में जगह बनाने में सक्षम हैं। उनका यह शेर देखिए-

​अपना दर्द छुपाए हम तो गाते हैं आंसू, आंसू

हमको कवि शायर मत कहना, हम रोते बंजारे हैं

​यह शेर उनकी सोच और सरोकार का आईना है। यह एक ऐसे कवि की आवाज़ है जो अपनी रचना को महज कला नहीं, बल्कि अपने जीवन के दर्द की अभिव्यक्ति मानता है। सृजन का यही समर्पण उनकी ग़ज़लों को विशिष्ट बनाता है।


अनिल गौड़ की ग़ज़लों में सामाजिक पीड़ा और जीवन के विविध संदर्भ बड़ी मार्मिकता के साथ उभरते हैं। वे केवल व्यक्तिगत अनुभूतियों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि जन भावनाओं और सामाजिक सरोकारों के प्रति समर्पित दिखाई देते हैं। उनके लेखन में यथार्थ की कठोरता को संवेदना की आंच पर पकाया जाता है-

​इंसान की मजबूरियों का नाम है रोज़ी

वह बर्फ़ बेचता है लपट में खड़ा हुआ

​यह शेर एक ऐसा चित्र प्रस्तुत करता है, जहाँ विपरीत परिस्थितियों में जीवनयापन की जद्दोजहद है। 'बर्फ़' और 'लपट' का विरोधाभास सामाजिक विसंगतियों को बड़े सलीक़े के साथ रेखांकित करता है। अनिल गौड़ की ग़ज़लें समय के साथ चलती हैं। वे चुनौतियों को स्वीकार करते हैं और विसंगतियों पर निर्भीक होकर टिप्पणी करते हैं। उनकी ग़ज़लें अपने समय से मुख़ातिब हैं-

​सच्चाई को कब तक पत्थर मारा जाएगा

आज नहीं तो कल उसको स्वीकार जाएगा

​यह शेर आशावाद और सत्य की अनिवार्यता को बख़ूबी दर्शाता है। उनका एक और शेर देखिए जो समाज के नैतिक पतन पर तीखा व्यंग्य है-

​जिसे भी देखो, वह हंसकर चपत लगाता है

वतन को हमने, यतीमों का गाल कर डाला

​यहाँ 'यतीमों का गाल' जैसी नई और मौलिक उपमा सामाजिक पतन और देश की दुर्दशा को एक झटके में सामने ला देती है। कभी-कभी वे हमारे सामने कोई ऐसा मोहक चित्र प्रस्तुत कर देते हैं जिससे मन प्रसन्न हो जाता है। ऐसा ही एक दृश्य यशोदा और कृष्ण के प्यार भरे रिश्ते को दिखाता है जहाँ माँ डाँटती भी है, लेकिन उस डाँट में अपार स्नेह भरा होता है-

 यशुमति ने पंखुड़ियों जैसे कान उमेठ दिए

​बोल कि ग्वालिन के घर तू दोबारा जाएगा

इस शेर की सबसे बड़ी ख़ूबी 'पंखुड़ियों जैसे कान' की उपमा है। यह उपमा बालक कृष्ण की मासूमियत और सुकोमलता को दर्शाती है। आमतौर पर कान उमेठना एक दंड होता है, लेकिन पंखुड़ियों जैसे कान उमेठने का वर्णन यह दर्शाता है कि यह दंड भी प्रेम और लाड़ से भरा हुआ है। यह उपमा दृश्य को कोमल बना देती है। इस शेर में कृष्ण की बाल लीला को एक नए, सुंदर और मौलिक कोण से प्रस्तुत किया गया है।

अनिल गौड़ की ग़ज़लों में कभी-कभी दाम्पत्य जीवन के ऐसे चित्र भी नज़र आते हैं जहां प्रेम का माधुर्य है। उनकी एक लोकप्रिय ग़ज़ल का मतला है-

​बांह डाल दी तुमने, हँस के मेरी गर्दन में

​मैंने तो ये पूछा था,क्या बना है भोजन में

यह शेर रोज़मर्रा के जीवन के एक सीधे-सादे संवाद को अचानक प्रेम के मोड़ पर लाकर खड़ा कर देता है। यह दर्शाता है कि दाम्पत्य जीवन में छोटी-छोटी व्यावहारिक बातों के बीच भी प्रेम और स्नेह का प्रदर्शन कितना सहज और आकस्मिक हो सकता है।

अनिल गौड़ की रचनात्मकता में प्रेम और अध्यात्म के संदर्भ भी गहरे अर्थों के साथ आते हैं। कृष्ण से संबंधित उनका यह शेर जीवन के शाश्वत मूल्यों और दर्शन को नई ऊँचाई देता है-

​कृष्ण का बड़ा क़द है, आदमी से ईश्वर तक

क्यों कि वे अकेले हैं, प्रेम के समर्थन में

उनके आध्यात्मिक चिंतन को रेखांकित करने वाला एक और शेर देखिए जो एक अंतिम आशा और गहरी आस्था की ओर इशारा करता है-

​स्वयं दीप हो जाना ही है, एक मात्र अंतिम आशा

देह दीप है, प्रतिभा बाती, और आत्मा ही लौ है

यह शेर “अप्प दीपो भव” यानी आत्म-दीप्ति के दर्शन को एक सुंदर रूपक में प्रस्तुत करता है। यह कवि की गहन रचनात्मकता का प्रमाण है।


अनिल गौड़ की ग़ज़लें लयबद्धता, संप्रेषणीयता, सामाजिक प्रतिबद्धता और दार्शनिक गहराई का एक सुंदर संगम हैं। वे हिंदी ग़ज़ल की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उसे समकालीन चुनौतियों से जोड़ते हैं। समसामयिक और महत्वपूर्ण विषयवस्तु वाली उनकी ग़ज़लों में जनमानस से सीधे जुड़ने की क्षमता है। मुझे उम्मीद है कि अनिल गौड़ की ये ग़ज़लें हिंदी ग़ज़ल के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेंगी। आने वाले समय में वे हिंदी ग़ज़ल को एक विशिष्ट 'रौशनी' प्रदान करते रहें, यही मेरी शुभकामना है।

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आपका : देवमणि पांडेय

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फ़िल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210 82126

नरोत्तम शर्मा का ग़ज़ल संग्रह एहसासात



एहसासात : नरोत्तम शर्मा का ग़ज़ल संग्रह

नरोत्तम शर्मा की ग़ज़लें केवल शब्दों का जाल नहीं हैं, बल्कि वे जीवन के अनुभवों की एक जीती-जाती तस्वीर हैं। उनके ग़ज़ल संग्रह ‘एहसासात’ में ज़िंदगी के वे तमाम रंग मौजूद हैं जिन्हें हम अक्सर भागदौड़ में अनदेखा कर देते हैं। ​शर्मा जी के लिए ग़ज़ल सिर्फ एक विधा नहीं, बल्कि एक 'एहसास' है। वे ग़ज़ल के सौंदर्य को प्रकृति और प्रेम के साथ जोड़कर देखते हैं-

​सर्दियों में धूप का एहसास होती है ग़ज़ल

प्रेमियों के हृदय का मधुमास होती है ग़ज़ल

​नरोत्तम शर्मा की ग़ज़लें पढ़ते समय ऐसा लगता है मानो कोई अपना हमारे पास बैठकर ज़िंदगी के फ़लसफ़े सुना रहा हो। उन्होंने मुहब्बत की दहलीज़ लांघ कर ग़ज़ल को आम आदमी की दहलीज़ तक पहुँचाया है। ​उनके अनुसार, सृजन की प्रक्रिया पीड़ादायक है, लेकिन उसका परिणाम मधुर होता है। वे कविता रचने के उस 'मधुर संत्रास'  को बख़ूबी समझते हैं-

जब तलक न शक्ल ले बेचैन रहता है हृदय 

सृजन की पीड़ा, मधुर संत्रास होती है ग़ज़ल

​आज के दौर में इंसान जो दिखता है, वह होता नहीं। नरोत्तम शर्मा ने समाज में व्याप्त पाखंड और 'मुखौटों' पर गहरा प्रहार किया है। वे आगाह करते हैं कि बाहरी चमक-धमक और माथे के चंदन पर भरोसा न करें, क्योंकि उसके पीछे 'विष' छुपा हो सकता है-

चिकनी चुपड़ी बातों, कपड़ों पर मत जाना 

विष भी हो सकता है माथे के चन्दन में

वे कपड़ों और चिकनी-चुपड़ी बातों के पीछे छिपी क्रूरता को बेनक़ाब करते हैं और सत्य की परख का संकेत देते हैं - 

चेहरा जो किसी शख्स का दिखता है सभी को, 

अक्सर वो उसी शख्स का चेहरा नहीं होता।

​शायर को इस बात का गहरा मलाल है कि समाज से 'शर्म' और 'ईमानदारी' लुप्त होती जा रही है। जहाँ चारों ओर झूठ और दगा हो, वहाँ सादगी से जीना भी किसी जंग से कम नहीं है-

​हर तरफ झूठ, दगा, और बेवफ़ाई है

आज के दौर में जीना भी इक लड़ाई है

​नरोत्तम शर्मा की ग़ज़लों में एक आम आदमी की बेबसी और उसकी ज़मीन से जुड़ी संवेदनाएँ भी हैं। वे घर न बना पाने के दर्द को स्वीकारते हैं, लेकिन 'घर' होने के अहसास को जीवित रखते हैं। वहीं, 'आँगन के चूजों का सूप बन जाना' उस सामाजिक निष्ठुरता को दर्शाता है जहाँ मासूमियत को सत्ता या स्वार्थ निगल जाता है-

गो बना पाया नहीं आज तलक मैं कोई घर 

एक एहसास तो होता है कि घर होता है


कोई बना के उनका सूप पी गया होगा 

वो चूजे, जो मेरे आँगन में आ के खेलते थे


तल्ख़ियों के बावजूद, नरोत्तम जी के यहाँ निराशा नहीं है। वे व्यक्ति को कर्मशील होने की प्रेरणा देते हैं। उनका मानना है कि ज्ञान की रोशनी तभी काम आती है जब आप स्वयं प्रयास का 'दीया' जलाएँ-

इल्म से रोशनी तो मिलती है 

पर दिया ख़ुद जलाना पड़ता है

वे सिखाते हैं कि अगर इरादों में जोश हो, तो एक 'क़तरा' भी समंदर जैसा तूफ़ान पैदा कर सकता है-

जोश जिसमें न अगर हो तो समंदर क्या है 

हो तो क़तरे में भी तूफाँ का असर होता है 

​नरोत्तम शर्मा का यह संग्रह संवेदनशीलता और साहस का अद्भुत मिश्रण है। उनकी भाषा सरल है लेकिन मारक है। वे जहाँ प्रेम की मधुरता बिखेरते हैं, वहीं समाज की विसंगतियों पर कड़ा प्रहार करने से भी नहीं चूकते। यह ग़ज़ल संग्रह आज के समय और समाज का एक आईना है-

किसी की आँख में अब शर्म का पानी नहीं है 

यही है ज़िंदगी तो फिर कोई मानी नहीं है

नरोत्तम शर्मा की ग़ज़लों में मुहब्बत का गुलशन है मगर उन्होंने ग़ज़ल को आम आदमी के चूल्हे-चौके, आँगन की धूप और समाज के कड़वे सच से जोड़ने का नेक काम भी किया है। उनका यह ग़ज़ल संग्रह मात्र ग़ज़लों का गुलदस्ता नहीं, बल्कि आज के दौर का एक दस्तावेज़ भी है। इसमें जहाँ एक ओर प्रेम की कोमलता है, वहीं दूसरी ओर मुखौटों के पीछे छिपे चेहरों को बेनक़ाब करने का साहस भी है। नरोत्तम शर्मा की आवाज़ उस आम आदमी की आवाज़ है जो झूठ और फ़रेब के बाज़ार में अपनी मासूमियत बचाने की जद्दोजहद कर रहा है।

​अगर आप ऐसी ग़ज़लों की तलाश में हैं जो रूह को छुएँ और ज़हन को झकझोर दें, तो यह संग्रह आपके लिए है। सर्दियों की गुनगुनी धूप जैसी ये ग़ज़लें आपको ज़िंदगी को एक नए नज़रिए से देखना सिखाएंगी। आस्था प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित इस किताब का मूल्य है 275 रूपये। 

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आपका : देवमणि पांडेय 98210 82126

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति बिल्डिंग, कन्या पाडा, फ़िल्मसिटी रोड, गोकुलधाम, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063 

डॉ शोभा दीक्षित भावना का ग़ज़ल संग्रह ​

 

"फिर भी तुम हो" शोभा दीक्षित 'भावना' का ग़ज़ल संग्रह ​

डॉ शोभा दीक्षित 'भावना' का ग़ज़ल संग्रह "फिर भी तुम हो" समकालीन ग़ज़ल की दुनिया में ताज़ा हवा के झोंके की तरह है। उनकी ग़ज़लों से गुज़रते हुए प्रेम, प्रकृति, पर्यावरण जैसे विविधरंगी दृश्यों से समृद्ध होना है। देखने में उनकी ग़ज़लें निहायत सीधी सादी हैं लेकिन उनके अंदर भावनाओं का विशाल भंडार छुपा हुआ है। 

​आमतौर पर 'इश्क़' और 'मुहब्बत' जैसे विषयों पर लिखना और कुछ नया दे पाना चुनौती भरा काम होता है। लेकिन शोभा जी ने यहाँ अपनी मौलिकता सिद्ध की है। उनके पास बिम्बों की एक नई दुनिया है। जब वे कहती हैं-

​साँस की जलतरंग बजती है,

इश्क को गा रहा है फिर कोई।

​तो यहाँ 'साँस' और 'जलतरंग' का सामंजस्य पाठक के भीतर एक संगीतमय अनुभूति पैदा कर देता है। यही सादगी और गहराई ही उनकी लेखनी की विशेषता है।

​शोभा जी की ग़ज़लों में प्रेम का सफ़र रूहानी इबादत की ओर जाता है। उनके शेरों में 'सज़दा', 'इनायत' और 'गुलदान' जैसे शब्द प्रेम को एक गरिमा प्रदान करते हैं-

ये दिल मसरूफ है सज़दे में तेरे, 

तेरी मुझ पे इनायत हो गई है।


दिल मेरा तेरी उल्फ़त का गुलदान है, 

तेरी यादों को जिसमें बसाया गया।

शोभा जी के कई शेर प्रेम की मर्यादा और उदात्त सोच के परिचायक हैं। वे जिस सलीक़े के साथ अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करती हैं वह दिलों के तार झंकृत कर देता है-

​उंगली मुझ पर उठी बहुत सी तुम पर ये इल्ज़ाम न आये,

लफ़्ज़-लफ़्ज़ में तुम हो लेकिन कहीं तुम्हारा नाम न आये।

​यह 'बिना नाम लिए सब कुछ कह देना' ही एक कुशल ग़ज़लकार की असली पहचान है। यह भी ग़ौरतलब है कि ​एक संवेदनशील रचनाकार केवल कुछ विषयों तक ही सीमित नहीं हो सकता। उसे समाज की हलचलें भी बेचैन करती हैं। शोभा जी ने ग्रामीण अंचल की विसंगतियों और राजनीति की भेंट चढ़ते रिश्तों को बड़ी बेबाक़ी से पकड़ा है-

बाप ने अपना ख़ून सुखाकर जमा किया था जो, 

बेटा इतना औघड़ दानी कुछ भी नहीं बचा।


​खेत बेंचकर दारू बाँटी फिर भी हार गए,

सबकुछ तो ले गयी प्रधानी, कुछ भी नहीं बचा।

​चुनाव की भेंट चढ़ते किसान और पिता की मेहनत को लुटाते बेटे का यह चित्र समाज के युगीन यथार्थ को आईना दिखाता है। ​​पर्यावरण और मासूमियत के प्रति कवयित्री की चिंता हृदयस्पर्शी है। कटते हुए पेड़ों के बीच बिजली के तारों पर बैठी कोयल का बिम्ब विकास की अंधी दौड़ पर एक करारा प्रहार है। वहीं, स्कूल जाती 'नाज़ुक कली' के बहाने वे स्त्री सुरक्षा और शिक्षा की दुआ भी मांगती हैं-

इसे महफूज़ रखना रहम करना या मेरे मालिक, 

ये नाजुक़ सी कली जो गाँव से स्कूल जाती है।


शजर सब कट गये, बैठी हुई बिजली के तारों पर, 

बहुत तकलीफ़ में है फिर भी कोयल गुनगुनाती 

"फिर भी तुम हो" ग़ज़ल ​संग्रह में जहाँ दिल की कोमल भावनाओं के लिए जगह है, वहीं देश की मिट्टी के प्रति अगाध प्रेम भी झलकता है। कश्मीर को दुनिया का इकलौता तोहफ़ा बताना कवयित्री के भारतीय गौरव को दर्शाता है-

हमारे हिन्द को ही सिर्फ़ मालिक ने दिया तोहफ़ा 

कहीं देखा है तुमने दूसरा कश्मीर दुनिया में 

​"फिर भी तुम हो" ग़ज़ल संग्रह डॉ. शोभा दीक्षित 'भावना' के अनुभवों, भावनाओं, सोच और सरोकार का दस्तावेज़ है। उनकी भाषा में रवानी है, ख़्यालों में ताज़गी है और बयान में ईमानदारी है। वे जिस तरह से व्यक्तिगत वेदना को सामाजिक चेतना से जोड़ती हैं, वह अभिव्यक्ति कौशल उन्हें ग़ज़ल की एक समर्थ आवाज़ बनाता है। मेरी शुभकामना है कि वे निरंतर प्रगति पथ पर अग्रसर रहें और ग़ज़ल के कैनवास पर नये नये चित्र बनाती रहें। 

देवमणि पांडेय : 98210 82126

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फ़िल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210 82126


सोमवार, 16 मार्च 2026

गोपाल दास नीरज पर केंद्रित वाङमय पत्रिका

 

वाङमय पत्रिका गोपाल दास नीरज पर केंद्रित 

अलीगढ़ की त्रैमासिक पत्रिका 'वाङमय' ने शताब्दी स्मरण करते हुए गोपाल दास नीरज पर केंद्रित अंक प्रकाशित किया है। इस विशेषांक की अतिथि संपादक हैं डॉ शगुफ्ता नियाज़ और संपादक हैं डॉ एम फ़ीरोज़ अहमद। कालजयी कवि नीरज की रचनात्मकता को जानने समझने, काव्य मंचों पर उनके योगदान और सिने गीतकार के रूप में उनकी उपलब्धियों के आकलन के लिहाज से 392 पेज़ की यह एक बेहद महत्वपूर्ण कृति है।

हिंदी काव्य साहित्य के सबसे लोकप्रिय कवि गोपालदास सक्सेना नीरज का जन्म 4 जनवरी 1925 को हुआ था। अतिथि सम्पादक के अनुसार- "पद्मभूषण गोपालदास 'नीरज' जी की जन्मशती का यह पावन अवसर केवल एक तिथि का स्मरण नहीं, बल्कि शब्द और स्वर के उस महाकुंभ का उत्सव है जिसने आधी सदी से भी अधिक समय तक हिंदी काव्य-चेतना को आलोकित किया। 'वाङमय' का यह विशेषांक उनके विराट व्यक्तित्व, कालजयी कृतित्त्व और उन अनछुए ऐतिहासिक प्रसंगों को समर्पित है, जो अब तक साहित्य की मुख्यधारा की चर्चाओं से ओझल रहे थे।"


'वाङमय' के इस विशेषांक में नीरज पर मेरा भी एक लेख शामिल है-" ए भाइ ज़रा देखके चलो"। उसकी कुछ पंक्तियां मैं आपके लिए यहां पेश कर रहा हूं। .......... बच्चन की परंपरा में नीरज एकमात्र ऐसे कवि हैं जिसमें साहित्यिक गुणवत्ता और मंचीय कौशल एक साथ मौजूद हैं। लगातार सात दशकों तक हिंदी काव्य मंच पर कामयाब पारी खेलने का कीर्तिमान सिर्फ़ नीरज के पास है। नीरज ने कहा था- "नासमझ आदमी की ताली कविता को बरबाद कर देती है।" हिंदी काव्य मंच के साथ भी यही हुआ। कवि सम्मेलन घटियापन के शिकार हो गए। अपने चाहने वालों के लिए नीरज को घटिया मंचों पर भी जाना पड़ा। मगर कभी उन्होंने घटियापन का साथ नहीं दिया। उन्होंने हमेशा अपना स्तर बनाए रखा।

यह सच है कि कवि सम्मेलनों का कवि प्रसाद और निराला नहीं बन सकता। यह भी सच है कि कवि सम्मेलनों में ‘कामायनी’ नहीं 'मधुशाला' पढ़ी जाती है। फिर भी, जिस तरह साहिर और शैलेंद्र के योगदान को महज़ फ़िल्मी गीत कहकर नकारा नहीं जा सकता, ठीक उसी तरह नीरज की मंचीय प्रस्तुति के बावजूद उनके साहित्यिक पक्ष को अनदेखा नहीं किया जा सकता। नीरज के साहित्य में मीरा का दर्द है, सूर की प्यास है, तुलसी की विन्रमता है और इसी के साथ कबीर का फक्कड़न भी है। नीरज ने बौद्धिकता का मायाजाल रचने के बजाय भावनाओं की ऐसी उदात्त धारा प्रवाहित की जिसने हमारे मन-प्राणों को पवित्रता, शीतलता और ताज़गी से भर दिया।

नीरज को जानने और समझने के लिए आपको 'वाङमय' का यह विशेषांक पढ़ना चाहिए। इसमें कुछ ऐसे अनछुए पहलुओं को भी उद्घाटित किया गया है जो शोधार्थियों के लिए बेहद उपयोगी हैं।


नीरज ने स्वीकार किया था-"अपनी कविता द्वारा मनुष्य बनकर मनुष्य तक पहुँचना चाहता हूँ। रास्ते पर कहीं मेरी कविता भटक न जाए, इसलिए उसके हाथ में मैंने प्रेम का दीपक दे दिया है। प्रेम एक ऐसी हृदय-साधना है जो निरंतर हमारी विकृतियों का शमन करती हुई हमें मनुष्यता के निकट ले जाती है।"

नीरज से बढ़के और धनी कौन है यहाँ
उसके हृदय में पीर है सारे जहान की

इस बेमिसाल अंक के लिए संपादकीय टीम को मैं दिल से बधाई देता हूँ। आशा है यह विशेषांक के सभी काव्य प्रेमियों को पसंद आएगा।
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आपका : #देवमणि_पांडेय

सम्पादकीय सम्पर्क : 205- फेज-1, ओहद रेजीडेंसी, नियर पान वाली कोठी, दोदपुर रोड, सिविल लाइन, अलीगढ़-202002 मोबा : 7007606806
E-mail: vangmaya@gmail.com

इस अंक का मूल्य : 300/- रूपये
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शनिवार, 14 मार्च 2026

हिंदी ग़ज़ल के पचास वर्ष : ज्ञान प्रकाश विवेक


हिन्दी ग़ज़ल के पचास वर्ष : ज्ञान प्रकाश विवेक  

​दुष्यंत कुमार के बनाए राजमार्ग पर चलते हुए हिन्दी ग़ज़ल ने पचास साल का सफ़र तय कर लिया है। हिन्दी ग़ज़ल में हिंदुस्तानियत की ख़ुशबू है। यहाँ के रीति-रिवाज, परंपरा, समाज, सियासत और संस्कृति से जुड़ाव हिंदी ग़ज़ल की ख़ासियत है।

​पिछली सदी के बहुत सारे ग़ज़लकार 'आकाश में सूराख़' करने के लिए प्रतिबद्ध दिखाई पड़ते थे। इक्कीसवीं सदी की हिन्दी ग़ज़ल में विविधता और नयापन आया है। पहाड़ के दुर्गम रास्तों से निकलकर हिन्दी ग़ज़ल अब मैदानी इलाक़ों में आ गई है। हिंदी काव्य-परंपरा के किनारों को स्पर्श करते हुए वह अपनी धुन में आगे बढ़ रही है। इसलिए आज उसके प्रवाह में शोर-शराबे के बजाय कल-कल का संगीत सुनाई पड़ रहा है। वह नारों और झंडों को पीछे छोड़ चुकी है।

​ज्ञान प्रकाश विवेक के संपादन में 'श्वेतवर्णा प्रकाशन' (नोएडा) से प्रकाशित 'हिंदी गज़ल के पचास वर्ष' पुस्तक हिन्दी ग़ज़लों का एक ख़ूबसूरत गुलदस्ता है। यह ख़ुद में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है। या यूँ कहें कि यह ख़ुद में एक समृद्ध हिन्दी ग़ज़लकोश है। इसमें 238 ऐसे हिन्दी ग़ज़लकार हैं शामिल हैं जिन्होंने दुष्यंत कुमार के बाद हिंदी ग़ज़ल को संवारने और निखारने में योगदान किया है। इस सूची में वरिष्ठ ग़ज़लकारों से लेकर कई युवा ग़ज़लकार भी शामिल हैं। 


अपनी महत्वपूर्ण भूमिका में ज्ञान जी ने हिन्दी ग़ज़ल की विकास यात्रा का बहुत सुन्दर आकलन पेश किया है। उनके अनुसार- "हिन्दी ग़ज़ल का व्यापक होता परिसर, इस बात की तस्दीक है कि हिन्दी ग़ज़ल लेखकों ने, गज़ल विधा में नया रचने का हर संभव प्रयास किया है। इस दौर में बहुत सशक्त, प्रयोगधर्मी और आकर्षण पैदा करती ग़ज़लें लिखी गई हैं। पचास वर्ष के सफ़र में ग़ज़ल ने विधा के रूप में अपना स्थान अर्जित किया है तो बात स्पष्ट है कि अच्छी ग़ज़लें अधिक लिखी गई हैं।" 

​एक दृष्टि सम्पन्न आलोचक होने के साथ ही ज्ञान प्रकाश विवेक बेहतरीन ग़ज़लकार भी हैं। बिना किसी भेदभाव के उन्होंने इस संकलन में ऐसे ग़ज़लकारों को भी शामिल किया है जो प्यार-मोहब्बत जैसे विषयों को भी अपनी ग़ज़ल में बख़ूबी अभिव्यक्त कर रहे हैं। कुल मिलाकर यह पुस्तक ग़ज़ल प्रेमियों और शोधार्थियों के लिए बेहद उपयोगी किताब है। इस नेक काम को अंजाम तक पहुँचाने के लिए संपादक ज्ञान प्रकाश विवेक और श्वेतवर्णा प्रकाशन को हार्दिक बधाई। 519 पेज़ की इस किताब का मूल्य 799 रूपये है। 

 

आपका : देवमणि पांडेय 98210 82126 

सम्पर्क : Shwetwarna Prakashan

212 A, Express View Apartment Super MIG, Sector 93, Noida-201304, INDIA

Mobile: +91 8447540078

Email: shwetwarna@gmail.com

Website: www.shwetwarna.com


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अनामिका सिंह का ग़ज़ल संग्रह

 

'राहतों के नाम पर बेचैनियाँ' अनामिका सिंह का ग़ज़ल संग्रह

ग़ज़ल के सुपरिचित तौर तरीक़ों से बाहर निकल कर अपनी भाषा में, अपने अंदाज में, अपनी ग़ज़ल कहना बड़े हुनर का काम है और यह काम ग़ज़लकार अनामिका सिंह बख़ूबी कर रही हैं। श्वेतवर्णा प्रकाशन (नोएडा) से अनामिका सिंह का ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित हुआ है- 'राहतों के नाम पर बेचैनियाँ'। यह संग्रह साबित करता है कि अनामिका के पास वह अभिव्यक्ति कौशल है जो उन्हें एक विशिष्ट पहचान देता है। 

आसपास के जो मंज़र दिल को प्रभावित करते हैं, जो दृश्य आँखों में उतर आते हैं, जो अनुभव मन को विचलित कर देते हैं, उन्हें वे बड़े सलीक़े से अपनी रचनात्मकता का हिस्सा बनाती हैं। सृजन की इस यात्रा में उनके यहाँ कुछ विलक्षण मुक़ाम आते हैं। अचानक वे कुछ ऐसे चित्र और चरित्र हमारे सामने पेश कर देती हैं जो ग़ज़ल की दुनिया में सर्वथा नए हैं। ये किरदार अपने सुख-दुख और अपनी जिजीविषा के साथ हमारे सामने आते हैं और हमेशा के लिए हमारी स्मृति का हिस्सा बन जाते हैं-

सैलून में खड़ीं जो सुबह शाम लड़कियां

दिन भर में कितने करती हैं वो काम लड़कियां


हर कस्टमर को डील करे हैं वो जूझकर

पाती नहीं है दो घड़ी आराम लड़कियां 

अनामिका सिंह का ग़ज़ल संग्रह साहित्य के दरवाज़े पर एक ताज़ा दस्तक है। अनामिका के पास दूसरों के दुख को महसूस करने की शक्ति है तथा उससे उबरने की कोशिश भी है। वे हौसले को बचाए रखने का हुनर जानती हैं। उनका यह शेर उम्मीदों की नई कोपलें फूटने का आश्वासन देता है-

​डाली ने हौसला दिया पतझड़ में पेड़ को

मत हो उदास आएंगे ख़ुशियों के पात और


अनामिका की ग़ज़लों के कथ्य में विविधता है। वे समय के सवाल और समाज की समस्याओं से जुड़ी हैं। उनकी सोच और सरोकार के दायरे में वे लोग शामिल हैं जो ज़िन्दगी की दौड़ में पीछे छूट गए हैं। वे ऐसे लोगों के दुख-दर्द और पीड़ा को शब्द देती हैं। एक माँ की बेबसी और व्यवस्था की नाकामी को वे इस तरह रेखांकित करती हैं कि पाठक उनके मर्म को महसूस कर सके-

​ख़ाली पतीली देख तब आंसू ढुलक पड़े

बच्चों ने मां से बोला परस थोड़े भात और

​देश के मौजूदा हालात और राजनीति की विसंगतियों पर कई जगह अनामिका का तंज बेहद नुकीला है। वे विडंबनाओं को उजागर करने के लिए देशज मुहावरों का इस्तेमाल एक हथियार की तरह करती हैं-

बूढ़ा बरगद, चलती आरी, देख परिन्दे हैरां हैं 

सदमे से काँपी है डाली, क्या कहना है सब चंगा 

​जब घर बँटता है तो सिर्फ़ दीवारें नहीं खड़ी होतीं, स्मृतियाँ और रिश्ते भी लहूलुहान होते हैं। अनामिका इस दर्द को बड़ी ही सादगी से बयां करती हैं-

​घर ईंट-ईट बँट गया, दालान बँट गया

लो माँ के साथ-साथ ये सामान बँट गया

कट बँट गये दरख़्त कभी छाँव थे किये 

तुलसी बँटी औ' काँच का गुलदान बँट गया

​तुलसी का बँटना और काँच के गुलदान का बँटना उस परम्परा, संस्कृति और पारिवारिक मूल्यों की ओर संकेत करता है जिसे आधुनिकता की दौड़ में हम खोते जा रहे हैं।

​बेरोज़गारी का क़हर हो या सड़क पर दम तोड़ती इंसानियत, उनकी क़लम हर मुद्दे पर मुखर है। वे समय की रफ़्तार पर सवाल उठाती हैं कि सीढ़ियाँ तो चढ़ी-उतरी जा रही हैं, पर बदलाव की सुबह कहाँ है?

​सड़क पर हादसे कितने, मगर है फ़र्क भी किसको

किसी की जान को कोई बचाने कब उतरता है

​अनामिका सिंह की ग़ज़लों में सादा ज़बान, अभिव्यक्ति का कौशल और वह ताज़गी है जिसकी आज के समय को दरकार है। वे अपनी ग़ज़लों के ज़रिए अन्याय, शोषण और संवेदनहीनता के ख़िलाफ़ प्रतिरोध दर्ज करती हैं। यह संग्रह हिंदी ग़ज़ल के भविष्य के लिए एक बेहतर संभावना का संकेत देता है।

काव्य भाषा और कथ्य के स्तर पर अनामिका के यहाँ बेहद ताज़गी और नयापन है। वस्तुतः यही उनकी रचनात्मकता की उपलब्धि है। वे समय के साथ चलते हुए समाज को देखती हैं। आसपास जो स्याह रंग हैं, दुख, अभाव और संत्रास है, वे सभी उनकी ग़ज़लों का कथ्य बन जाते हैं। अभिव्यक्ति की इस प्रक्रिया में वे कभी-कभी नुकीले और अनगढ़ शब्दों से भी काम लेती हैं। उन्हें इस बात पर ध्यान देना चाहिए ग़ज़ल ऐसी नाजुक़ काव्य विधा है जो हर लफ़्ज़ का बोझ नहीं उठा सकती। कुल मिलाकर अनामिका ने अपने इस संकलन के ज़रिए ग़ज़ल की विकास यात्रा में बेहतर योगदान दिया है। मैं उन्हें दिल से बधाई देता हूँ। 

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आपका : 

देवमणि पांडेय : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063 

मो : 98210 82126


सम्पर्क : Shwetwarna Prakashan
212 A, Express View Apartment Super MIG, Sector 93, Noida-201304, INDIA

Mobile: +91 8447540078
Email: shwetwarna@gmail.com
Website: www.shwetwarna.com
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उर्दू अदीबों की दुनिया में कमलेश भट्ट कमल

उर्दू अदीबों की दुनिया में कमलेश भट्ट कमल 

सुपरिचित हिंदी ग़ज़लकार और आलोचक कमलेश भट्ट कमल एक नायाब पुस्तक लेकर आपके सामने आए हैं जिसका नाम है-'उर्दू अदीबों की दुनिया में'। इसमें वली, चकबस्त, सुरूर, फ़ैज़ और फ़िराक़ से लेकर राही मासूम रज़ा, नक़्श लायलपुरी, जानकी प्रसाद शर्मा और वसीम बरेलवी जैसे पंद्रह प्रतिष्ठित शायरों की मौजूदगी इसे महत्वपूर्ण बनाती है। इन शायरों के बारे में विस्तृत जानकारी उपलब्ध कराने के साथ ही इस पुस्तक में अदब के बारे में इनके नज़रिए को सामने लाने की सराहनीय कोशिश की गई है। इस संग्रह में कमाल अमरोही एवं जॉन एलिया से संबंधित संस्मरण भी है जो अमरोहा के एक ऐसे मकान की यात्रा से जुड़ा हुआ है जो दोनों शायरों का पैतृक मकान रहा है।

पुस्तक के पंद्रह में से सात अदीबों से लेखक की मुलाक़ातें हुई हैं। हिंदी-उर्दू दोनों साहित्य में आवाजाही करने वाले डॉ जानकी प्रसाद शर्मा एक मात्र ऐसे आलोचक हैं जो हिंदी ग़ज़ल के साथ लगातार खड़े रहे हैं। सन् 1977 में जब हिंदी ग़ज़ल की एक विधा के रूप में चर्चा शुरू ही हुई थी तब अपने एक लेख "हिंदी ग़ज़ल की प्रकृति" में डॉ जानकी प्रसाद शर्मा खुले तौर पर हिंदी ग़ज़ल को एक स्वतंत्र और समर्थ रचना विधा के रूप में न केवल मान्यता देते हैं और रेखांकित करते हैं बल्कि वह ऐसे लोगों को खड़ा जवाब भी देते हैं जो यह कहते हैं कि ग़ज़ल उर्दू के मूल व्यक्तित्व के साथ हिंदी में परिग्रहीत हुई है।


इस पुस्तक को तैयार करने में कमलेश भट्ट कमल ने भरपूर मेहनत की है। शायर सिने गीतकार नक़्श लायलपुरी से यूं तो उनकी मुलाक़ात हो चुकी थी लेकिन उसे अद्यतन करने के लिए उन्होंने मुझसे फ़ोन पर कई बार चर्चा की। इस सिलसिले में नक़्श लायलपुरी पर लिखी मेरी एक फेसबुक पोस्ट का उन्होंने बहुत सुंदर उपयोग किया है। इसी सिलसिले में उन्होंने ऐसे 19 रचनाकार मित्रों को भी धन्यवाद दिया है जिनसे इस किताब को सामने लाने में कुछ न कुछ सहायता मिली है। पुस्तक की अनुशंसा एवं भूमिका के लिए उन्होंने उर्दू के सुप्रसिद्ध साहित्यकार पद्मश्री शीन काफ़ निज़ाम और राष्ट्रीय सहारा (उर्दू) के पूर्व संपादक डॉ असद रज़ा का आभार व्यक्त किया है।

स्वयं लेखक के अनुसार 'उर्दू अदीबों की दुनिया में' पुस्तक को पढ़कर आप इन अदीबों की दुनिया से अच्छी तरह तो परिचित होंगे ही, यह भी जान सकेंगे कि इन रचनाकारों की दुनिया कितने संघर्षों, कितनी रचनात्मकताओं, कितने जोश और जज़्बे से भरी हुई रही है।

ग़ज़ल और ग़ज़ल से संबंधित गद्य पुस्तकों के प्रकाशन में जिस तरह से "श्वेतवर्णा प्रकाशन" ने योगदान किया है वह बेहद क़ाबिले तारीफ़ है। इस पुस्तक को सामने लाने के लिए कमलेश भट्ट कमल ने श्वेतवर्णा प्रकाशन के राहुल शिवाय और शारदा सुमन के सहयोग को रेखांकित किया है।

इस महत्वपूर्ण पुस्तक के लिए मैं लेखक मित्र कमलेश भट्ट कमल को हार्दिक बधाई देता हूँ। 223 पेज की इस पेपर बैक पुस्तक का मूल्य 499 रूपये है।

आपका : #देवमणि_पांडेय

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सोमवार, 9 मार्च 2026

चित्रनगरी संवाद मंच में कथाकार सूर्यबाला

चित्रनगरी संवाद मंच में कथाकार-व्यंग्यकार सूर्यबाला

अतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर मुम्बई की महिला रचनाकारों के सवालों का जवाब देते हुए प्रख्यात साहित्यकार सूर्यबाला जी ने कहा-

▪️लेखन तो बेख़ुदी में होता है, संवेदना और भावना स्वतः शामिल हो जाती हैं।

▪️लेखन काग़ज़ पर वैसा नहीं उतर पाता जैसा एहसास में होता है।

▪️एक लेखक के भीतर हमेशा सच्चाई मौजूद रहती है, तभी वह लिख पाता है।

▪️कहानी लिखना एक प्रतिक्रिया है। हमारे भीतर जो चीज़ें घुमड़ती रहती हैं, वही कहानी के रूप में जन्म लेती हैं।

▪️'वेणु की डायरी' के वेणु और 'मेरे संधि पत्र' के रत्नेश मेरे प्रिय चरित्र हैं।

▪️लेखन मनुष्य के अंदर की शाश्वत अनुभूतियों पर आधारित होता है। मैं भी अपने अंदर की दुनिया पर लिखती हूँ।

▪️किसी के लिए पैसा आत्मविश्वास होता है। मेरे लिए मेरे चरित्र ही विश्वास और प्रेम का संबल रहे।

▪️ऊहापोह के बीच लेखन होता है, समय और सुविधा के अनुसार नहीं।

▪️लिखना जीवन के साथ न्याय करना है, दूसरों के साथ अन्याय करना नहीं।

▪️मेरी कहानियों में कहीं भी खलनायक या खलनायिका नहीं हैं।

​▪️ख़ुद झुककर सामने वाले को जीतना चाहिए। कब झुकना है, यह समझ ज़रूरी है। तनकर खड़ा होने से आदमी टूट सकता है।

▪️हर लेखक की समस्या अलग होती है। विवाद में ख़ामोशी बड़ी ताक़त है। आदमी के भीतर धैर्य होना चाहिए।

▪️हम वस्तु नहीं हैं कि ख़ुद को प्लेट में परोसकर पेश करें।

कार्यक्रम के बाद श्रोताओं ने सूर्यबाला जी को अद्भुत वक्ता बताते हुए उनकी शालीनता और विनम्रता की मुक्त कंठ से तारीफ़ की। ख़ास बात यह थी कि जिस सलीक़े से सूर्यबाला जी ने दस महिलाओं के सवालों का संतुलित जवाब देते हुए उन्हें संतुष्ट किया वह अपने आप में बेमिसाल था। प्रतिष्ठित कथाकार-व्यंग्यकार सूर्यबाला से सृजन संवाद के अंतर्गत मुम्बई की दस रचनाकार महिलाओं ने सवाल पूछे। इनके नाम हैं-

1.रचना शंकर,  2.पारमिता षड़ंगी, 3.उषा साहू, 4.सोनाली बोस, 5.प्रज्ञा मिश्र 6.प्रतिमा सिन्हा, 7.अर्चना जौहरी, 8.लता हया, 9.सविता मनचंदा,   10.मधुबाला शुक्ल।

सूर्यबाला जी को यह बात बहुत अच्छी लगी कि श्रोताओं ने 'धर्मयुग' में धारावाहिक प्रकाशित उनके पहले उपन्यास 'मेरे सन्धिपत्र' से लेकर नवीनतम उपन्यास "कौन देस को वासी...वेणु की डायरी" से सम्बन्धित सवाल पूछे।


चित्रनगरी संवाद मंच मुम्बई की ओर से रविवार 8 मार्च 2026 को केशव गोरे स्मारक ट्रस्ट गोरेगांव के मृणालताई हाल में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस समारोह आयोजित किया गया। शुरुआत में सूर्यबाला जी ने अपना आत्मकथ्य प्रस्तुत करते हुए कहा कि मैं जो लिखना चाहती थी मैंने वही लिखा और आप लोगों को भी अपने मन का ही लेखन करना चाहिए।

बचपन में पिताजी जल्दी गुज़र गए थे। सूर्यबाला जी ने बताया कि उनका बचपन बहुत दुखद रहा। लेखनी उनके लिए दुखों की शरणस्थली थी। चरित्रों के दुख से पहले वे ख़ुद उस दुख से गुज़रती थीं। 'सारिका' के संपादक कमलेश्वर के सुझाव पर उन्होंने पहली कहानी 'जीजी' लिखी जो सारिका में प्रकाशित हुई।

चित्रनगरी सम्वाद मंच के संचालक देवमणि पांडेय के अनुरोध पर सूर्यबाला जी ने एक व्यंग्य रचना का पाठ किया- 'महिला दिवस और फ्रेंच टोस्ट' जिस पर तालियां बजीं और ठहाके भी लगे। अंत में कथाकार सूरज प्रकाश ने सूर्यबाला जी के लेखन की कुछ महत्वपूर्ण बातों का ज़िक्र करते हुए सभी को महिला दिवस की शुभकामनाएं दीं।

'इतनी सी बात' नाट्य प्रस्तुति 

​चित्रनगरी संवाद मंच में लता हया और अर्चना जौहरी के लघु नाटक 'इतनी सी बात' की प्रस्तुति शानदार रही। राजस्थानी जेठानी और उत्तर प्रदेश की देवरानी की नोंक-झोंक का लोगों ने भरपूर लुत्फ़ उठाया। देवरानी-जेठानी के आपसी प्रेम और सौहार्द ने लोगों को भाव-विभोर कर दिया। ढोलक की ताल पर झूमते हुए श्रोता ख़ुद भी लोकगीत की लय में शामिल हो गए थे। 

लता हया और अर्चना जौहरी के दमदार अभिनय से यह मालूम ही नहीं पड़ा कि यह नाटक की पहली प्रस्तुति थी। जाने माने अभिनेता राजेंद्र गुप्ता ने दोनों अभिनेत्रियों के सहज अभिनय की तारीफ़ करते हुए उन्हें बधाई दी और कहा कि दोनों ने शुरू से अंत तक सबको बांधे रखा। कथाकार सूर्यबाला ने अभिनय के साथ ही नाटक के बढ़िया संवादों की भी तारीफ़ की और दोनों अभिनेत्रियों को शुभकामनाएं दीं। मधुबाला शुक्ल ने नाटक की प्रस्तावना पेश की।


आपका : देवमणि पांडेय, मो: 98210 82126 

गुरुवार, 5 मार्च 2026

आधुनिकता के बीच बनारस का स्वभाव

आधुनिकता के बीच बनारस का स्वभाव और संस्कृति

लखनऊ और सुलतानपुर की तरह वाराणसी यात्रा की भी स्मृतियां काफ़ी सुखद रहीं। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. वशिष्ठ अनूप स्वयं प्रतिष्ठित ग़ज़लकार हैं। उनके संयोजन में बीएचयू के एम्फी पांडाल में आयोजित छात्र कल्याण केंद्र का कवि सम्मेलन मुशायरा किसी विराट उत्सव से कम नहीं था। रचनात्मकता का यह उत्सव शानदार और यादगार रहा। रूमानी शायरी के साथ यहाँ संजीदा गीत और गज़लों को विद्यार्थी समुदाय ने जिस जोश और उमंग के साथ सुना, वह बेहद क़ाबिले-तारीफ़ है। 


बाबा विश्वनाथ का स्पर्श दर्शन इस यात्रा की विशेष उपलब्धि रही। उसके बाद युवा शायर अंश प्रताप सिंह 'ग़ाफ़िल' के साथ नए भव्य कॉरिडोर से होते हुए जब हमने गंगा जी के दर्शन किए तो मन ख़ुशी से भर उठा। बनारस की गलियों में क़दम रखते ही लगा जैसे वक़्त ठहर गया है। काशी विश्वनाथ मंदिर के आसपास की गलियाँ आज भी वैसी ही हैं जैसी चालीस साल पहले थीं। हमने कचौड़ी गली की संकरी गली में जाकर स्वादिष्ट कचौड़ी का लुत्फ़ उठाया। गौरी केदारेश्वर मंदिर की पतली गली में इतनी भीड़ थी कि बड़ी मुश्किल से बाइक खड़ी करने की जगह मिली।


कुल मिलाकर आधुनिकता के राजमार्ग पर चलते हुए बनारस का स्वभाव और संस्कृति वही है। माहौल में वही मस्ती और फक्कड़पन है। हाँ, कॉरीडोर बनने के बाद से श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ गई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रतिदिन एक लाख से अधिक श्रद्धालु बाबा विश्वनाथ के दर्शन कर रहे हैं। 


वाराणसी के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी विद्या भूषण मिश्र इतने सरल और सहज हैं कि लगा ही नहीं कि हमारी पहली मुलाक़ात है। बतौर कवि लेखक उनकी पाँच पुस्तकें प्रकाशित हैं। उनके आवास पर बढ़िया गपशप हुई। मैंने, अंश प्रताप सिंह 'ग़ाफ़िल' और ख़ुद मिश्र जी ने ग़ज़लें सुनाईं। मिश्र जी ने हमें सनातन सम्वाद कथाएं  पुस्तक भेंट की। मशहूर फोटोग्राफर राजेश कुमार सिंह इस अवसर पर विशेष रूप से मौजूद थे। उन्होंने बड़ा ख़ूबसूरत टेबल कलेंडर भेंट जिसमें रामलला की अद्भुत तस्वीरें हैं। 


कुल मिलाकर वाराणसी की इस अनुपम यात्रा के दौरान कई सुखद और रोमांचक अनुभव हुए। हमारी स्मृतियों के ख़ज़ाने में ये सुनहरी यादें हमेशा सुरक्षित रहेंगी।

आपका : देवमणि पांडेय 98210 82126 

सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

लखनऊ में तुलसी परिवार का सम्मान समारोह

तुलसी परिवार का सम्मान समारोह एवं काव्य संध्या

लखनऊ की तहज़ीब से महकती विविधरंगी कविताओं की यह एक शानदार और यादगार शाम थी। श्रोताओं में अधिकांश ख़ुद भी रचनाकार थे। इस लिए सभी कवियों को भरपूर तवज्जो के साथ सुना गया। सभी की काव्य प्रस्तुति सराहनीय रही। सभी को करतल ध्वनि के साथ लोगों ने झूम झूमकर सुना। 


मुम्बई से पधारे शायर-सिने गीतकार देवमणि पांडेय के सम्मान में तुलसी परिवार की ओर से आयोजित इस काव्य संध्या की अध्यक्षता लखनऊ के जाने-माने शायर भूपेन्द्र सिंह 'होश' ने की। वरिष्ठ कवयित्री संध्या सिंह, प्रतिष्ठित दोहाकार दिनेश कुमार अवस्थी, श्रेष्ठ ग़ज़लकार चंद्रशेखर वर्मा, सनातन साहित्य के प्रखर क़लमकार अवधी हरि और तुलसी परिवार के अध्यक्ष एवं मानस मर्मज्ञ ओम मिश्र ने बतौर विशेष अतिथि आयोजन की गरिमा बढ़ाई। स्वस्ति वाचन के साथ अंगवस्त्र और स्मृति चिन्ह भेंट कर मुख्य अतिथि देवमणि पांडेय को सम्मानित किया गया। 


रविवार 22 फरवरी को शान्ति कुटी, लक्ष्मणपुरी, लखनऊ में आयोजित तुलसी परिवार की इस काव्य संध्या में 25 कवियों ने कविता पाठ किया। इनमें रश्मि शरद, सुरभि सिंह, वर्षा श्रीवास्तव, नीतू सिंह, प्रिया सिंह, अनुज अब्र, बलवंत सिंह, श्रीवास्तव बाहम, कुलदीप शुक्ला, नरेंद्र सिंह, निलेश ज्वाला, सत्यदेव सिंह, निर्भय निश्चल, गौरव गौरवान्वित, दीपक शर्मा सार्थक, अनुराग मिश्र, लोकेश त्रिपाठी और सुभाष चंद्र मिश्र का समावेश था। 


ख़ास बात यह रही कि इस आयोजन में गीत, ग़ज़ल, दोहा, मुक्तक, माहिया, सवैया, घनाक्षरी आदि कई काव्य विधाओं का जलवा देखने को मिला। कार्यक्रम के संयोजक, लोकप्रिय कवि योगी योगेश शुक्ला ने जहां अपने भावप्रवण गीत से दिलों के तार झंकृत किए वहीं अपने रोचक संचालन से कार्यक्रम को कामयाबी की मंज़िल तक पहुंचा दिया। 


कुल मिलाकर शब्द और सम्वेदना से लोगों के ज़हन को महकाती हुई इस काव्य संध्या ने कामयाबी का एक नया अध्याय लिख दिया। यह शानदार और जानदार आयोजन हमारी मधुर यादों में हमेशा मौजूद रहेगा। सभी सहभागियों को ढेर सारी बधाईयाँ और शुभकामनाएं। 


(लखनऊ 22 फरवरी, 2026) 

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2026

डॉ रामजी तिवारी के साथ साहित्य चर्चा

सुलतानपुर में डॉ रामजी तिवारी के साथ साहित्य चर्चा

इश्क़ को दिल में दे जगह 'अकबर'
इल्म से शा'इरी नहीं आती

शाम सुलतानपुर में हमारी गपशप के दौरान डॉ रामजी तिवारी ने अकबर इलाहाबादी के इस शेर की याद दिलाई। सुलतानपुर के प्रतिष्ठित शायर हबीब अजमली, युवा शायर अलिफ़ सीन क़ादरी और डॉ तिवारी के सुपुत्र राहुल तिवारी ने मेरे साथ इस साहित्यक सत्संग का आनंद उठाया। डॉ रामजी तिवारी ज्ञान के अतुलनीय भंडार हैं। उन्होंने हिंदी, अंग्रेजी और संस्कृत साहित्य के तुलनात्मक अध्ययन पर पीएचडी की है। कल भी उन्होंने तीनों भाषाओं के काव्य सौंदर्य की चर्चा करके हम लोगों को उपकृत किया। प्रसाद, पंत, निराला से होते हुए यह चर्चा अज्ञेय के 'तार सप्तक' तक पहुंच गई। डॉ रामजी तिवारी ने अज्ञेय की चर्चित कविता 'सांप' की आधुनिक संदर्भ में अद्भुत व्याख्या की-

साँप !
तुम सभ्य तो हुए नहीं
नगर में बसना
भी तुम्हें नहीं आया।
एक बात पूछूँ- (उत्तर दोगे?)
तब कैसे सीखा डँसना-
विष कहाँ पाया?

डॉ रामजी तिवारी ने संस्कृत के प्रकांड विद्वान आनंदवर्धन के हवाले से बताया कि भारतीय काव्यशास्त्र में काव्य-सृजन के लिए तीन मुख्य हेतु माने गए हैं- प्रतिभा, प्रत्युत्पन्नमति और अभ्यास।  

प्रतिभा (जन्मजात शक्ति), व्युत्पत्ति (शास्त्र ज्ञान) और अभ्यास (निरंतर प्रयास) के मेल से उत्पन्न जो सौंदर्यमयी रचना रसानुभूति कराती है उसे काव्य कहा जाता है। प्रतिभा नए विचारों को जन्म देती है, व्युत्पत्ति उसे निखारती है और अभ्यास उसे परिष्कृत करता है जिससे कविता में प्रभावोत्पादकता (प्रत्युत्पन्नमति) और भावों की मार्मिक अभिव्यक्ति आती है।

मैंने डॉ तिवारी से आचार्य मम्मट का ज़िक्र किया। उन्होंने बताया कि आचार्य मम्मट ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ 'काव्यप्रकाश' में काव्य के छः प्रयोजन बताए हैं- यश प्राप्ति, धन लाभ, व्यावहारिक ज्ञान, अमंगल का नाश, अलौकिक आनंद और कान्ता सम्मित मधुर उपदेश। 

"काव्यं यशसेऽर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये।
सद्यः परनिर्वृत्तये कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे।"

हमारी गपशप के दौरान अकबर के नवरत्नों का भी ज़िक्र हुआ। डॉ तिवारी ने वह कथा सुनाई कि कैसे कवि गंग को हाथी के पैरों तले कुचलकर मौत की सज़ा दी गई थी। उन्होंने माफ़ी नहीं मांगी। अपने जीवन का आख़िरी कवित्त सुना कर विदा हुए-

चाह भई परमेश्वर को कवि गंग को लेन गणेश पठायो

कवि गंग के अच्छे मित्र थे रहीम। वे जरूरतमंदों को दान देते समय आँखें झुका लेते थे। कवि गंग ने रहीम से पूछा-

ऐसी देनी देन जू, कित सीखे हो सैन।
ज्यों-ज्यों कर ऊँचो करो, त्यों-त्यों नीचे नैन॥

इसका उत्तर रहीम ने अत्यंत विनम्रता से दिया-

देनहार कोई और है, देवत है दिन रैन।
लोग भरम हम पर करें, याते नीचे नैन॥ 



हिंदी और संस्कृत के अलावा डॉ रामजी तिवारी ने अंग्रेजी कवि वर्ड्सवर्थ, कॉलरीज और इलियट के भी रोचक प्रसंग सुनाए। अपनी सृजनात्मकता से इस गपशप ने हमारी सोच और सरोकार को कितना समृद्ध किया यह वर्णनातीत है। सुलतानपुर में डॉ रामजी तिवारी मेरे मोहल्ले शास्त्री नगर में मेरे पड़ोसी हैं। इसलिए हमारी गपशप का यह सिलसिला लगातार जारी रहता है। पिछली गपशप में डॉ धर्मपाल सिंह और प्रो कमलनयन पांडेय जी शामिल थे। आप भी पधारिए और सत्संग का फ़ायदा उठाइए।

आपका : देवमणि पांडेय मो : 98210 82126
(सुलतानपुर 16 फरवरी 2026) 

मंगलवार, 13 जनवरी 2026

'कहाँ मंज़िलें कहाँ ठिकाना' : आकलन : गरिमा सक्सेना





'कहाँ मंज़िलें कहाँ ठिकाना' : देवमणि पांडेय का ग़ज़ल संग्रह

आकलन : गरिमा सक्सेना

देवमणि पाण्डेय जी का ग़ज़ल-संग्रह 'कहाँ मंज़िलें कहाँ ठिकाना' एक प्रश्नानुभूति के साथ मेरे सामने है। एक तरफ़ ऐसा प्रतीत होता है कि यह शीर्षक अनभिज्ञता से जुड़ा हुआ है वहीं दूसरी तरफ जब हम इसके भीतर प्रवेश करते हैं तो पाते हैं कि यह जीवन रूपी निरंतर यात्रा के अनिश्चित पड़ावों की ओर भले ही संकेत कर रहा हो लेकिन ठहराव की बात नहीं करता है। ऐसा मैं इसलिए कह रही हूँ क्योंकि जब मैं इस संग्रह से गुज़री तो मेरा सामना ऐसे अनेक एहसासों से हुआ जो साधारण भाषा शैली और कथ्य के साथ संवेदनशील हृदय को उद्वेलित करने वाले थे।


इस संग्रह की सबसे बड़ी शक्ति इसका सकारात्मक दृष्टिकोण और संघर्ष करने का जज़्बा है। आज के दौर में जब हताशा बहुत जल्दी युवाओं और समाज को घेर लेती है, पांडेय जी की ग़ज़लें एक उम्मीद की किरण बनकर आती है। वे आकाश में उड़ने की बात करते हैं, लेकिन ज़मीन से जुड़े रहकर। संग्रह के आरंभ में ही वे घोषणा करतें हैं कि

परवाज़ की तलब है अगर आसमान में,

ख़्वाबों को साथ लीजिए अपनी उड़ान में।

यह सफलता का मूल मंत्र है, जो कहता है कि बिना सपनों के ऊँची उड़ान संभव नहीं है। उनका मानना है कि महत्वाकांक्षा रखना गलत नहीं है, लेकिन उस महत्वाकांक्षा के साथ सपनों का होना अनिवार्य है। यह शेर पाठकों को प्रेरित करता है कि वे अपनी सीमाओं को लांघकर असीम संभावनाओं की ओर देखें। आत्मविश्वास इस संग्रह का एक और प्रमुख स्वर है। जब वे कहते हैं


मेरा यक़ीन हौसला किरदार देखकर

मंजिल क़रीब आ गई रफ़्तार देखकर

तो स्पष्ट हो जाता है कि सफलता बाहरी साधनों से नहीं, बल्कि आंतरिक चरित्र और आत्मविश्वास से मिलती है। यहाँ रफ़्तार केवल गति नहीं है, बल्कि जीवन जीने का उत्साह है। जब आपका किरदार मज़बूत होता है, तो मंज़िलें स्वयं आपके पास चलकर आती हैं।


लेकिन यह भी सच है कि असफलता और गिरना जीवन का हिस्सा है, लेकिन गिरकर सँभलना ही वास्तविक जीवन है। पाण्डेय जी कहते हैं-

हम जब गिरे तो हमको सँभलना सिखा दिया,

कुछ ठोकरों ने राह पर चलना सिखा दिया।

ठोकर को गुरु की भूमिका में लाने वाला यह शेर हमें बताता है कि कठिनाइयाँ हमारे रास्ते का पत्थर नहीं, बल्कि सीढ़ियाँ हैं। इसी क्रम में वे आगे कहते हैं-

ख़्वाबों के कुछ परिंदों ने आकाश छू लिया

और ज़िंदगी ने दुख में बहलना सिखा दिया

यही तो जीवन का द्वंद्व है। एक तरफ आकाश छूने की ललक है, तो दूसरी तरफ दुख के साथ समझौता करने की कला। यही संतुलन एक सफल जीवन का आधार है।

पाण्डेय जी का आशावाद कल्पनाओं पर आधारित नहीं है। वह यथार्थ की भट्ठी में तपकर निकला है।

आशावाद के पंख लगाकर उड़ती देवमणि पांडेय जी की ग़ज़लों की आत्मा उनके गाँव में बसती है। जैसे-जैसे हम आधुनिकता की ओर बढ़ रहे हैं, हमारे भीतर का गाँव मरता जा रहा है। इस संग्रह में गाँव के प्रति पाण्डेय जी का जो मोह है, वह केवल भावुकता नहीं है, बल्कि एक सांस्कृतिक चेतावनी है। जब वे कहते हैं-


काग़ज़ों में है सलामत अब भी नक़्शा गाँव का,

पर नजर आता नहीं पीपल पुराना गाँव का।


तो वे विकास के नाम पर हो रहे विनाश को रेखांकित करते हैं। नक्शे में गाँव तो है, यानी भूगोल जीवित है, लेकिन पुराना पीपल जो गाँव की संस्कृति, छाँव और साझा जीवन का प्रतीक था, वह ग़ायब हो चुका है। यह शहरीकरण की अंधी दौड़ पर एक करारा व्यंग्य है। गाँव का बदलना केवल भौतिक बदलाव नहीं है, बल्कि भावनात्मक भी है। "


बूढ़ीं आँखें मुंतज़िर हैं पर वो आख़िर क्या करें,

नौजवां तो भूल ही बैठे हैं रस्ता गाँव का।


कहकर पाण्डेय जी पलायन की उस त्रासदी को बयां करते हैं, जिसने भारत के गाँवों को वृद्धाश्रमों में बदल दिया है। युवा शहर जाकर वापस नहीं लौटना चाहते और गाँव अपनी संतानों की राह देखते-देखते बूढ़ा हो रहा है।


पहले कितने ही परिंदे आते थे परदेस से,

अब नहीं भाता किसी को आशियाना गाँव का।


यह शेर ऊपर कहे गये शेर का ही विस्तार है। जो परिदों का रूपक गढ़कर उन प्रवासियों के लिए अपनी बात कह रहा है, जो पहले त्यौहारों पर लौटते थे, लेकिन अब शहरों की चकाचौंध में अपनी जड़ों से कटते जा रहे हैं। पाण्डेय जी ने गाँव के उजड़ने का जो चित्र खींचा है, वह अत्यंत मार्मिक है।


सावन की पुरवइया ग़ायब,

पोखर, ताल-तलइया ग़ायब


कट गए सारे पेड़ गाँव के,

कोयल औ' गोरइया ग़ायब।


यह केवल गाँव का बदलना नहीं है, बल्कि पर्यावरण का विनाश भी है। गौरैया और कोयल का ग़ायब होना एक पारिस्थितिकीय संकट की ओर भी इशारा करता है। पाण्डेय जी उन लोक-परंपराओं को भी याद करते हैं जो अब विलुप्त हो रही हैं-


सोहर, कजरी, फगुआ भूले,

बिरहा, नाच-नचइया ग़ायब।


यह सांस्कृतिक विस्मृति केवल चीज़ों को भूलने का बोध पैदा नहीं कर रही बल्कि वैश्वीकरण के दौर में हमारी पहचान को मिटा रही है। आधुनिकता ने गाँव के अर्थशास्त्र और सामाजिक ताने-बाने को कैसे बदला है, इसे भी पाण्डेय जी ने बड़ी बारीकी से पकड़ा है-


नोट निकलते ए टी एम से,

पैसा, आना, पइया ग़ायब


और


दरवाजे पर कार खड़ी है,

बैल-भैंस और गइया ग़ायब।


गाँव की यह पीड़ा तब और गहरी हो जाती है जब पाण्डेय जी कहते हैं-

वक़्त ने क्या दिन दिखाए चंद पैसों के लिए,

बन गया मज़दूर इक छोटा-सा बच्चा गाँव का।


बाल मजदूरी और ग़रीबी की यह तस्वीर दिल को झकझोर देती है।


ग़ज़लों में समय की तस्वीर उतारने वाले देवमणि पाण्डेय

सामाजिक विसंगतियों और राजनीतिक पाखंड पर भी तीखे प्रहार किये हैं। देवमणि पांडेय एक सजग रचनाकार हैं जो अपने समय की नब्ज़ पहचानते हैं।


शिक्षा और रोज़गार के बीच के द्वंद्व को पाण्डेय जी ने बहुत ही व्यंग्यात्मक ढंग से प्रस्तुत किया है-


पढ़-लिखकर क्या करेंगे आख़िर राम, श्याम, रहमान वग़ैरह, ये भी इक दिन बन जाएँगे चपरासी, दरबान वग़ैरह।


यह शेर भारत की शिक्षा व्यवस्था और बेरोज़गारी की समस्या पर एक कड़वा सच है। डिग्री लेने के बाद भी युवाओं का चपरासी या दरबान बनने को मजबूर होना एक राष्ट्रीय त्रासदी है। वहीं अगले शेर में वे कहते हैं-


रोजी-रोटी के चक्कर में हमने ख़ुद को गँवा दिया है,

कहाँ गया अपना वो तेवर, खुद्दारी, पहचान वग़ैरह


यह उस मध्यवर्गीय आदमी की व्यथा है जो आजीविका कमाने की दौड़ में अपने स्वाभिमान और मूल स्वभाव से समझौता कर लेता है।


राजनीति पर कटाक्ष करते हुए देवमणि पाण्डेय जी कहते हैं-


दूर-दूर तक आदर्शों से रिश्ता नहीं सियासत का जब,

इनमें कहाँ नज़र आएँगे सच्चाई, ईमान वग़ैरह।


सांप्रदायिकता और दंगे भड़काने वाली राजनीति पर भी पाण्डेय अपनी बात कहने से नहीं कतराते हैं। वे स्पष्ट रूप से देख रहे हैं कि सत्ता के लिए किस तरह समाज को बांटा जाता है-


ख़ुद को कहते हैं वो मुल्क का रहनुमा,

रोटियाँ सेंकते हैं फ़सादात पर।


किसानों की दुर्दशा भी उनकी आँखों से छिपी नहीं है। गाँवों से उनका जुड़ाव उन्हें किसानों की यथास्थिति के और क़रीब ले जाता है-


मौसम ने क़हर ढाया दहशत है किसानों में,

दम तोड़ती हैं फ़सलें खेतों खलिहानों में


और


धरती की गुज़ारिश पर बरसे ही नहीं बादल,

तब्दील हुई मिट्टी खेतों की चटानों में।


यह सूखा और प्राकृतिक आपदा की मार झेलते अन्नदाता का दर्द है। लेकिन इससे भी बड़ा दर्द है सत्ता की संवेदनहीनता का-


क्यूँ कैसे मरा कोई क्या फ़िक्र सियासत को,

पत्थर की तरह नेता बैठे हैं मकानों में।


पाण्डेय जी की ग़ज़लों में आधुनिकता, रिश्तों की ऊष्मा और उनकी टूटती कड़ियाँ पर भी कई शेर मिलते हैं। परिवार, जो भारतीय समाज की रीढ़ रहा है, अब कैसे बिखर रहा है, इसे पांडेय जी ने बहुत गहराई से महसूस किया है-


अपने ही जब ग़ैर हुए तो वो वृद्धाश्रम चले गए,

ख़ुश है बेटा, बहू के सर पे अब कोई जंजाल नहीं।


आधुनिक समाज के मुँह पर व्यंग्य का तमाचा मारता हुआ यह शेर कितना मर्मस्पर्शी है। माता-पिता को जंजाल समझना और उन्हें वृद्धाश्रम भेजना उस नैतिक पतन की पराकाष्ठा है, जिसकी ओर हम बढ़ रहे हैं। पाण्डेय जी इंतज़ार और अकेलेपन के उस दर्द को भी शब्दायित कर रहे हैं जो दीवारों के भीतर घुटता रहता है। एक तरफ बुज़ुर्गों की उपेक्षा है, तो दूसरी तरफ़ बच्चों का खोता बचपन। कुछ भी उनकी आँखों से अछूता नहीं है-

क्या-क्या नहीं दिया बचपन को इंटरनेट की दुनिया ने,

बच्चों के अफ़सानों में क्यूँ वो बूढ़ा बेताल नहीं।


इंटरनेट और मोबाइल ने बच्चों से उनकी कल्पनाशीलता, उनकी परियों और बेताल की कहानियाँ छीन ली हैं। वह मासूमियत, वह काग़ज़ की नाव, वह बारिश का आनंद - सब डिजिटल स्क्रीन के पीछे खो गया है-


बच्चों के हाथों में जब से ये मोबाइल आया है,

बहते पानी में काग़ज़ की नाव चलाना भूल गए।


ऐसा नहीं है कि उन्होंने सारा दोष मोबाइल या उत्तर आधुनिकता को देकर पल्ला झाड़ लिया है। वे शिक्षा के भारी बस्ते के द्वारा बच्चों के बचपन का कुचला जाना भी महसूस कर रहे हैं-


बचपन की पीठ पर है किताबों का एक बोझ,

बच्चों को खेलकूद की मोहलत नहीं रही।


संयुक्त परिवारों के विघटन को पाण्डेय जी ने एक ही शेर में समेट दिया है-


जब फ़ासले हुए हैं तो रोई है माँ बहुत,

बेटों के दिल के दरमियां दीवार देखकर।


घर का बँटवारा केवल दीवारों का बँटवारा नहीं होता, वह माँ के दिल का बँटवारा होता है। इसी तरह, आधुनिक दांपत्य जीवन की विडंबना देखिए-


एक ही कमरे में दोनों रह रहे हैं साथ-साथ,

फिर भी उनके दिल जुदा हैं राब्ता कोई नहीं।


शारीरिक निकटता के बावजूद भावनात्मक दूरी आज के रिश्तों की सच्चाई है। जिसे पाण्डेय जी ने बहुत ख़ूबसूरती के साथ अभिव्यक्त किया है।


जीवन की विडंबनाओं, सामयिक विसंगतियों और विद्रूपताओं को शब्दायित करते हुए भी पाण्डेय जी ग़ज़ल के पारम्परिक परिपाटी को अर्थात् प्रेम को अभिव्यक्त करना नहीं भूले हैं। उन्होंने इस परंपरा को भी बखूबी निभाया है। उनके प्रेमिल शेरों में एक शालीनता है, एक ठहराव है। यथा-


जी ये चाहे उम्र भर मैं उसको ही पढ़ता रहूँ,

याद की खिड़की पे बैठी इक कहानी मिल गई।


इस शेर में प्रेमिका ग़ज़लकार के लिए एक 'कहानी' बन गयी है, जिसे वह बार-बार पढ़ना चाहता है।


इतना ही नहीं वे प्रेम में एक ऐसी अनुभूति की बात करते हैं, जहाँ प्रेमी और ईश्वर का स्थान एक जैसा प्रतित होता है-


कहीं भी ढूँढ़ो कहाँ नहीं है,

कोई भी उसके सिवा नहीं है


वो बादलों में, वो बिजलियों में

निहां है फूलों में उसकी खुशबू।


पाण्डेय जी की ग़ज़लों में विरह के क्षणों का चित्रण भी अद्भुत है। वे बिम्बों में विरह का चित्र गढ़ रहे हैं-


सुलगती है कहीं कैसे कोई भीगी हुई लकड़ी

दिखाई देगा ये मंज़र किसी विरहन की आंखों में


रिश्ता भी ख़ुद में होता है स्वेटर ही की तरह,

उधड़ा जो एक बार, उधड़ता चला गया।


यह उपमा कितनी बेमिसाल है। रिश्तों का उधड़ना और उन्हें फिर से न जोड़ पाना; यह एक ऐसी टीस है, जिसे हर वो व्यक्ति समझ सकता है जिसने कभी किसी को खोया है।


अबके कभी वो आया तो आएगा ख़्वाब में,

आँखों के सामने से तो कब का चला गया।


प्रेम में शिकायतें भी हैं और समर्पण भी-


जो हमसफ़र थे आपसे आगे निकल गए,

धीमी बहुत है आपकी रफ़्तार क्या करें।


प्रेम की बात करते हुए पाण्डेय जी का कहन एक अलग तरह की ख़ूबसूरती और सहजता को जीने लगता है। ऐसे तो उनके अन्य शेरों का भी अंदाज़ अलग सा है पर प्रेम की तो बात ही कुछ और है। शेर देखें-


चेहरे से आपके भी झलकने लगा है इश्क़,

जी खुश हुआ है आपको बीमार देखकर।


यहाँ बीमार होना एक व्यंग्य नहीं, बल्कि प्रेम में पड़ने का सुखद संकेत है।


देवमणि पांडेय जी की ग़ज़लों में एक अंतर्धारा आध्यात्मिकता की भी बहती है। वे ईश्वर को मंदिर-मस्जिद में नहीं, बल्कि कण-कण में देखते हैं-


नफ़स-नफ़स में है उसकी आहट,

उसी से क़ायम है दिल की धड़कन।


या

दीन-धरम बस यही है अपना साथ इसी के जीना है,

प्यार छुपा है जिस दिल में वो काशी और मदीना है।


देवमणि पांडेय जी की ग़ज़लों की भाषाई विविधता और शिल्प की बात करें तो वे सरल, सहज और आम-समझ की ग़ज़लें लिखने वाले ग़ज़लकार हैं, जिसमें उर्दू मिश्रित आम बोलचाल की हिन्दुस्तानी भाषा का प्रयोग किया गया है। लेकिन उनका कथ्य बिल्कुल सपाट नहीं है। उनके बिंब और प्रतीक बहुत ही ताज़ा और मौलिक हैं। उनके पास ऐसे उपमान हैं, जो हमारी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी से उठाये गये हैं। उन्होंने ग़ज़ल के पारंपरिक रूप को बनाए रखते हुए उसमें आधुनिक संवेदनाओं को पिरोया है। उनके पास कहने को बहुत कुछ है। ऐसा लगता है जैसे एक ग़ज़ल कहते हुए वे विभिन्न भावों को गीत की तरह बांधते चले जाते हैं। उनका यह प्रवाह जितना व्यापक है उतना ही हक़ीक़त से जुड़ा हुआ। वे कहते भी हैं-


सपनों को पालने की रिवायत न तोड़िए,

लेकिन जनाब! इनको हक़ीक़त से जोड़िए।


यही इस पुस्तक का सार है और यही जीवन का सत्य भी।

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