रविवार, 17 अप्रैल 2022

गीतकार पं. किरण मिश्र : स्मृति को सादर नमन

 
गीतकार पं. किरण मिश्र : स्मृति को सादर नमन 

भक्ति गीतों और नवगीतों के लिए मशहूर गीतकार पं. किरण मिश्र का 16 अप्रैल 2021 को कोरोना से संक्रमित होने के कारण मुम्बई में निधन हो गया था। अपने नवगीतों के लिए साहित्य क्षेत्र में कई पुरस्कार और सम्मान से अलंकृत पं. किरण मिश्र ने कई धारावाहिकों और फ़िल्मों के लिए गीत लिखे थे। बी आर चोपड़ा के धारावाहिक महाभारत का समापन गीत उन्होंने ही लिखा था। संपूर्ण रामायण का 20 खंडों में उन्होंने संकलन किया था। इसके लिए पूर्व राष्ट्रपति डॉ शंकर दयाल शर्मा के कर कमलों से उन्हें सम्मानित किया गया था। 

5 जुलाई 1953 को अयोध्या में जन्मे पं. किरण मिश्र ने सिनेमा, सीरियल और संगीत के विविध अलबमों के लिए 250 से अधिक गीत लिखे। उनके गीतों को लता मंगेशकर, आशा भोंसले, ऊषा मंगेशकर, जगजीत सिंह, अनूप जलोटा, हरिओम शरण, उदित नारायण, सुरेश वाडेकर, सोनू निगम, आदि प्रतिष्ठित गायकों ने अपनी आवाज़ दी। उनको देश विदेश की अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं ने पुरस्कृत एवं सम्मानित किया। गीत विधा में विशिष्ट योगदान के लिए सन् 2020 में उन्हें थाईलैंड में सम्मानित किया गया था। 

पं. किरण मिश्र के छ: काव्य संग्रह प्रकाशित हुए- (1) चुंबक है आदमी, (2) मजीरा, (3) चंद्रबिम्ब, (4) कम्पन धरती, (5) अवधी बयार (6) पंछी भयभीत हैं। नवगीत संग्रह 'कंपन करती धरती' के लिए महाराष्ट्र हिंदी साहित्य अकादमी ने उनको संत नामदेव पुरस्कार प्रदान किया। नवगीत संग्रह 'चुंबक है आदमी 'के लिए पं. किरण मिश्र को घनश्यामदास सराफ साहित्य पुरस्कार प्राप्त हुआ। अवधी साहित्य संस्थान फैज़ाबाद से सम्मान के अलावा अवधी विकास संस्थान लखनऊ ने 'अवधी बयार' काव्य संग्रह के लिए उन्हें अवधी गौरव सम्मान से सम्मानित किया। 

पं. किरण मिश्र के पिता पं. दिनेश मिश्र लोकप्रिय कवि और कनक भवन अयोध्या के आचार्य थे। कवि दिनेश जी की कई भक्ति रचनाएं अनूप जलोटा के अलबम में शामिल हैं। मुंबई आने से पहले पं. किरण मिश्र गोरखपुर विश्वविद्यालय के ललित कला विभाग में प्रवक्ता थे। मुंबई में भी कई बार उनके चित्रों की प्रदर्शनी आयोजित हुई। उनसे चित्रकला सीखने वाले शिष्यों की संख्या भी काफ़ी है। उनके एक लोकगीत से हास्य कवि शैल चतुर्वेदी इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उस पर सरयू तीरे नाम से अवधी फ़िल्म बनाई। 

पं. किरण मिश्र के गीत तो अच्छे थे ही उनका तरन्नुम भी आकर्षक और दमदार था। सन् 1984 में मुंबई आने पर मैंने पहली बार उन्हें खालसा कालेज के हिंदी कवि सम्मेलन में सुना था। कवि सम्मेलन की समाप्ति पर मैंने उन्हें बधाई दी। उन्होंने मुझे अपना विजिटिंग कार्ड दिया और घर बुलाया। उनके इस स्नेह निमंत्रण पर मैं उनके घर गया। तब से लगातार उनसे मेरी दोस्ती क़ायम रही। वे अजातशत्रु थे। उनका कोई दुश्मन नहीं था। उनकी जीवन संगिनी स्व. उषा मिश्र भी बेहद विनम्र और स्नेही महिला थीं। लैंड लाइन के ज़माने में कई संघर्षरत कलाकार, संगीतकार और गायक बिना फ़ोन किए उनके यहां अचानक आ जाते थे। पति-पत्नी उनकी भरपूर ख़ातिर करते थे। पत्नी के स्वर्गवास के बाद सुपुत्र स्वदेश मिश्र और सुपुत्री स्मिता मिश्रा ने उनका भरपूर ख़याल रखा। अपने इस भरे पूरे परिवार के कारण उन्होंने कभी ख़ुद को अकेला महसूस नहीं किया। मिलनसार स्वभाव के कारण पं. किरण मिश्र अपने गोकुलधाम मोहल्ले में भी बहुत लोकप्रिय थे। यहां के लोग उनका बहुत सम्मान करते थे। अपने पीछे पं. किरण मिश्र गीतों की जो खुशबू छोड़ गए हैं उसकी सुगंध हमेशा महसूस की जाती रहेगी। उनकी पावन स्थिति को सादर नमन। 


आपका- 

देवमणि पांडेय

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, 

कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड, 

गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210 82126

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2022

अपराजिता गार्गी: निरूपमा श्रीवास्तव का महाकाव्य

 


अपराजिता गार्गी: निरूपमा श्रीवास्तव का महाकाव्य

वैदिक काल में हमारे देश में ऐसी प्रतिभासम्पन्न विदुषी नारियां हुई हैं जिनके ज्ञान के आलोक से आज भी हमारे समाज और संस्कृति का अंतर्मन आलोकित हो रहा है।  ऐ्सी ही  एक परम विदुषी और अध्यात्मवेत्ता नारी का नाम है गार्गी। महर्षि वच्कनु की सुपुत्री वाच्कन्वी का जन्म गर्ग गोत्र में हुआ था। इसलिए वे गार्गी के नाम से प्रसिद्ध हुईं। गार्गी वाच्कन्वी का जन्मकाल ईसा से लगभग 700 वर्ष पूर्व माना जाता है। गार्गी वैदिक साहित्य में निष्णात एक महान दार्शनिक और वेदों की व्याख्याता थीं। ब्रह्मविद्या की ज्ञाता होने के नाते उन्हें ब्रह्मवादिनी के नाम से भी जाना जाता है। युवावस्था से ही गार्गी को वैदिक ग्रंथों और दर्शन में गहरी रूचि थी। 

बृहदारण्यक में यह जानकारी मिलती है कि गार्गी ने मिथिला के महाराज आदि जनक द्वारा आयोजित एक उच्च कोटि के शास्त्रार्थ में भाग लिया था। सैकड़ों विद्वानों की उपस्थिति में उन्होंने आत्मा और ब्रह्म के विषय पर ऋषि याज्ञवल्क्य से कई अदभुत प्रश्न पूछे थे। इस शास्त्रार्थ से गार्गी के विद्वता की चारों दिशाओं में चर्चा हुई। गार्गी के पिता के अनुरोध पर ऋषि याज्ञवल्क्य ने तीसरी पत्नी के रूप में उनका वरण किया। ऋषि की पहली पत्नी कात्यायनी और दूसरी पत्नी विदुषी मैत्रेयी थीं। कहा जाता है कि गार्गी आजन्म ब्रह्मचारिणी रहीं। उन्होंने ऐसे गुरुकुलों की स्थापना की जिसमें कन्याओं को शिक्षा दी जाती थी। एक प्रकार से वे भारतीय समाज में कन्या शिक्षा की प्रणेता हैं।

विद्वता से परिपूर्ण गार्गी के विराट व्यक्तित्व पर प्रतिष्ठित कवयित्री निरूपमा श्रीवास्तव ने महाकाव्य का सृजन किया है। इस महाकाव्य को उन्होंने दस अध्याय में प्रस्तुत करके गार्गी के प्रखर व्यक्तित्व को रोचक तरीके से सामने रखा है। महाकाव्य की शुरुआत में ही वे नारी शक्ति का जयघोष कर देती हैं-

युग युगांतरों से नारी ने जग का अप्रतिम  रूप सँवारा

जननी,भार्या,बेटी,बहना, बनकर करती है उजियारा

 

सृष्टि न होती सत्य सुन्दरम् अमृत सम नारी न होती 

पीड़ा सह कर सृजनशिल्प कर तन मन धन वारी न होती

गर्ग वंश के ऋषि वच्कनु ने बचपन से ही सुपुत्री गार्गी को ललित कला, संगीत, वेद और उपनिषद की शिक्षा देनी शुरू कर दी थी। इन सभी के योग से गार्गी का उज्जवल दैदीप्यमान व्यक्तित्व निर्मित हुआ। निरूपमा ने इस व्यक्तित्व का बड़ा सुंदर वर्णन किया है-

तन्वंगी गार्गी अति कोमल लतिका सी थी  तरुणाई

चंद्ररश्मि सी शीतल पावन ज्योतिर्मय काया पाई

 

कटिचुम्बित थे केश मेघ से रवि प्रकाश सी दीप्त अजा

श्वेत कमल से नयन निष्कलुष वाणी ज्यों संगीत बजा

ऋषि और दार्शनिक याज्ञवल्क्य वैदिक साहित्य में शुक्ल यजुर्वेद की वाजसेनीय शाखा के दृष्टा थे। आचार्य उद्दालक आरुणि के शिष्य याज्ञवल्क्य शतपथ ब्राह्मण की रचना के लिए जाने जाते हैं। ब्रह्मतत्व सर्वोपरि है, यह उनकी स्थापना है। वे अपने समय के सर्वोच्च वैदिक ज्ञानी थे। यही कारण है कि आदि जनक के आमंत्रण पर ऋषि याज्ञवल्क्य जब शास्त्रार्थ के लिए पधारे तो उनका सामना करने का किसी को साहस नहीं हुआ। 

 ज्ञान की आभा से दीप्त याज्ञवल्क्य से जब कोई शास्त्रार्थ के लिए तैयार नहीं हुआ तब अंत में गार्गी ने उनसे ब्रह्म और आत्मा के बारे में लगातार कई सवाल पूछे। कहा जाता है कि गार्गी के सवालों से परेशान याज्ञवल्क्य ने यहां तक कह दिया था कि गार्गी अगर तुमने अगला सवाल पूछा तो तुम्हारा मस्तक फट जाएगा। इस शास्त्रार्थ का कवयित्री निरूपमा ने अपने इस महाकाव्य में बड़ा जीवंत वर्णन किया है-

गार्गी ने पूछा- स्वर्ग लोक से भी परे कुछ और है

पृथ्वी के तल में कुछ तो है और मध्य में क्या छोर है

 

और जो हुआ जो होना है वह ओतप्रोत हुआ कहाँ

ब्रह्मलोक किसके है अधीन यह प्रश्न बतलाए जहाँ

 

 ऋषि बोले -

उसका ही अनुशासन प्रशासन कर रहा जग प्राप्त है

सम्पूर्ण जग में है सकल उसके ही  अंदर व्याप्त है

 

गार्गी हुई संतुष्ट सुन  ब्रह्मांड है जिसके अधीन

ऋषिवर ने था उत्तर दिया हर प्रश्न का ही समाचीन

अंत में ऋषि याज्ञवल्क्य ने उन्हें वेदांत तत्व का ज्ञान दिया तो गार्गी संतुष्ट हुई। उपस्थित जनसमूह गार्गी के विशद ज्ञान से अभिभूत हो गया। चारों ओर उनकी जयजयकार होने लगी।

इस महाकाव्य में निरूपमा ने ऋषि याज्ञवल्क्य की पत्नियों कात्यायनी और मैत्रेयी के आदर्श चरित्र का भी कुशलता से निरूपण किया है। यह महाकाव्य प्राचीन भारत में नारियों की विद्वता और अस्मिता की गौरवपूर्ण झांकी प्रस्तुत करता है। अपने उदात्त विषय, सरल छंद, सहज प्रवाह और सरस भाषा के साथ पाठकों को एक आत्मीय धागे में बांध लेता है। यह महाकाव्य धर्म और संस्कृति की निर्मल ज्योति से आज के समाज को प्रकाशित करने की सामर्थ्य रखता है। 

कवयित्री निरूपमा श्रीवास्तव के अध्ययन, चिंतन और शोध पर आधारित यह महाकाव्य अपनी सृजनात्मक आभा से हमारे अंतर्मन को समृद्ध करता है। आशा है कि गार्गी के तेजस्वी व्यक्तित्व पर केंद्रित यह महाकाव्य जन जन तक पहुंचेगा और घर घर को प्रकाशित करेगा। सांस्कृतिक बिखराव के इस युग में हमारे समाज को धर्म, अध्यात्म और संस्कृति से जुड़े ऐसे महाकाव्यों की बहुत आवश्यकता है। निरूपमा जी ने इस दिशा में बहुत सराहनीय कार्य किया है। इस नेक और समाजोपयोगी कार्य के लिए मैं निरूपमा को बधाई देता हूं। निरंतर प्रगति की शुभकामनाएं।

आपका- 

देवमणि पांडेय 

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063 , 98210 82126

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सोमवार, 28 मार्च 2022

जीवन के इंद्रधनुष : कुसुम तिवारी का काव्य संग्रह

 

जीवन के इंद्रधनुष : कुसुम तिवारी का काव्य संग्रह

कविता हृदय की भावनाओं का सहज उद्गार है। इसकी अभिव्यक्ति का दायरा विस्तृत होता है। इसमें इंसान के सुख-दुख, स्वप्न, संघर्ष, समय और समाज भी शामिल होता है। इस लिए भावनाओं की नमी के साथ ही कविता में इंसानी सोच की उष्णता भी महसूस होती है। 


कुसुम तिवारी के प्रकाशित काव्य संग्रह का नाम है 'जीवन के इंद्रधनुष'। नाम के अनुरूप उन्होंने इन कविताओं में जीवन के विविध रंगों को साकार करने का सराहनीय प्रयास किया है। कुछ कविताओं में जीवन दर्शन की अभिव्यक्ति इस तरह हुई है कि वे प्रेरक सूक्तियों की तरह नज़र आती हैं-


मौत का उत्सव मनाना 

ज़िंदगी का धर्म है 

मृत्यु कहते हैं जिसे 

मुक्ति है सत्कर्म है


कुसुम तिवारी के यहां कथ्य के अनुरूप जीवंत भाषा है उनकी कुछ काव्य अभिव्यक्तियां छायावादी साहित्य की समृद्धि परंपरा की याद दिलाती हैं-


मैं मुखर रही तुम मौन हुए 

मैं शब्द बनी तुम भाव हुए 

मैं प्रेम का कल-कल झरना थी 

तुम खड़े तपस्वी भाव लिए 


मैं काया हूँ परछाई तुम 

मैं पगडंडी, हो मंज़िल तुम 

बीते या काल समय गुज़रे 

मैं नश्वर हूं पर शाश्वत तुम


कुसुम की कविताओं के केंद्र में एक स्त्री है। इस स्त्री के अनुभव और सोच उस स्त्री के प्रतिबिंब हैं जो घर की दहलीज़ के अंदर सक्रिय है। इस स्त्री के प्रेम, मिलन, बिछोह, त्याग, संघर्ष, मर्यादा और स्वाभिमान को रेखांकित करने वाली कई कविताएं इस संग्रह में शामिल हैं। बिना किसी लाग लपेट के कवयित्री इस गृहिणी की ख़्वाहिशों और अरमानों को कविता में ढाल देती है-


लिखूंगी एक कविता 

काग़ज़ पर नहीं 

जिस्म पर तुम्हारे 

पलकों को बनाऊंगी लेखनी 

स्याही होगी काजल की 

आंखों के बंद कोटरों में 

छिपा लूंगी तुम्हें 

जिस्म की हर इबारत में 

सिर्फ़ तुम नज़र आओगे 

तब लिखूंगी मैं एक कविता 

काग़ज़ पर नहीं 

जिस्म पर तुम्हारे


इस संग्रह की कविताओं में शिल्पगत ख़ामियां हो सकती हैं मगर ये कविताएं घरेलू स्त्री की मनोकामना का जयघोष हैं। ये कविताएं उस स्त्री की गाथा हैं जो अपने भय और आशंका की चारदीवारी से बाहर आकर निडरता के साथ बात करती है। जो लोग स्त्री के अंतस् में झांकना चाहते हैं, उसके मर्म, चेतना, चिंता और स्वाभिमान को समझना चाहते हैं, उन्हें ये कविताएं पसंद आएंगी।


कुसुम तिवारी मधुर गीतकार हैं। वे मनभावन लोकगीत भी रचती हैं। एक संवेदनशील कवयित्री के तौर पर उन्होंने 'जीवन के इंद्रधनुष' के रूप में काव्य प्रेमियों को एक ख़ूबसूरत तोहफ़ा दिया है। उम्मीद है कि रचनाकार जगत में इस किताब का भरपूर स्वागत होगा। इस रचनात्मक उपलब्धि के लिए कुसुम तिवारी को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं।


आपका-

देवमणि पांडेय

 

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फ़िल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063 , 98210 82126

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शेर के साथ सेल्फ़ी : आबिद सुरती की किताब

 

शेर के साथ सेल्फ़ी : आबिद सुरती की किताब

कथाकार पत्रकार सुदीप जब सांध्य दैनिक महानगर के संपादक थे तब मैंने उनके लिए साहित्य पर आधारित साप्ताहिक स्तंभ 'शाब्दिकी' लिखा था। हर सप्ताह उनसे मिलकर मैं उनके हाथ में मैटर देता था। यह सिलसिला साल भर तक चला। सुदीप उसूलों के इतने पक्के थे कि उन्होंने कभी मेरे कॉलम के एक शब्द में भी फेरबदल नहीं किया। मुझे असंपादित रूप में छापा। ग़ुस्सा उनकी नाक पर सवार रहता था। झूठ वे बर्दाश्त नहीं कर सकते थे। स्वाभिमानी इतने थे कि एक फ़िल्म पाक्षिक के संपादक पद से उन्होंने सिर्फ़ नौ दिन में इस्तीफ़ा दे दिया था।


ऐसे विलक्षण इंसान से आबिद सुरती की अंतरंग दोस्ती लंबे समय तक कैसे टिकी रही यह एक दिलचस्प दास्तान है। सुदीप के इंतक़ाल के बाद आबिद सुरती ने उन पर एक संस्मरण लिखा- 'शेर के साथ सेल्फ़ी'। रचनात्मकता के इस अप्रतिम आलेख को आप ख़ाका या रेखाचित्र भी कह सकते हैं। इस संस्मरण में सुदीप के बार-बार टूटने, बिखरने और जुड़ने की मर्मस्पर्शी दास्तान है। उनके शातिर दोस्तों ने किस तरह उनका इस्तेमाल किया उसके क़िस्से हैं। सुदीप के व्यक्तित्व, व्यवहार, सोच और सरोकार को आबिद जी ने जिस तरह साकार किया है वह बेमिसाल है।


आबिद जी के लेखन में कहानी जैसे सरसता और प्रवाह है। विवरण और संवादों में व्यंग्य की धार है। अंदाज़ ए बयां में ढब्बू जी वाली रोचकता है। वे किसी भी घटना को लंबा नहीं करते। छोटे-छोटे दृश्यों के माध्यम से तत्कालीन समय और समाज को जीवंत कर देते हैं। कुल मिलाकर यही चीज़ें उनके लेखन को अविस्मरणीय बना देती हैं। 



अद्विक पब्लिकेशन दिल्ली से प्रकाशित आबिद सुरती की इस किताब का नाम भी यही है, यानी- 'शेर के साथ सेल्फ़ी'। इसमें कालखंड के अनुसार पांच रचनाएं शामिल की गई हैं- कैनाल (1968), हरि के नाम का व्यापारी (1992), रामदास : एक जननायक की हत्या (1994), कोटा रेड (1995) और शेर के साथ सेल्फ़ी (2020) 


कैनाल एक प्रयोगात्मक कहानी है। 'सारिका' में प्रकाशित इस कहानी को हिंदी की श्रेष्ठ कहानियों में शामिल किया गया। आबिद सुरती की इन रचनाओं में मुंबई का समय, समाज और इतिहास दस्तावेज़ की तरह दर्ज किया गया है। मसलन 'हरि के नाम का व्यापारी' रचना को पढ़ेंगे तो आपके सामने वह कालखंड साकार हो जाएगा जब बाबरी ढांचा ध्वस्त हुआ था। उसके बाद मुंबई में भयावह दंगे कैसे हुए, आम आदमी की यंत्रणा, आगज़नी और क़त्ल से लेकर सियासी पार्टियों के दांव पेंच … सभी को आबिद जी ने विश्वसनीय आंकड़ों के साथ इतिहास की तरह दर्ज किया है। दूसरों के दुख दर्द के साथ आबिद जी ने बहुत सलीक़े से अपने निजी दुख, तनाव और यातना को भी शामिल किया है।


कुल मिलाकर यह किताब रचनात्मकता का एक जीवंत दस्तावेज़ है। मुंबई महानगर यहां एक चरित्र की तरह मौजूद है। समय और समाज की पिछले पचास साल की उथल पुथल को कथा सूत्र की रोचकता में समेटकर आबिद जी ने जिस हुनर के साथ पेश किया है वह बेजोड़ और बेमिसाल है। अगर आप मुंबई के इतिहास में समय का चेहरा देखना चाहते हैं तो आपको यह किताब पढ़नी चाहिए।


आपका-

देवमणि पांडेय

 

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फ़िल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063 , 98210 82126

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प्रकाशक का पता: 

अद्विक पब्लिकेशन, 41 हसनपुर, आईपी एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली- 110092, 

फ़ोन: 011-4351 0732/ 95603 97075

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सोमवार, 7 मार्च 2022

सुधीर त्रिपाठी 'असर' का ग़ज़ल संग्रह बस यूं ही


 उदासियों के शहर में मुस्कुराती ग़ज़लें

शायर का नाम है सुधीर त्रिपाठी 'असर'। नाम के अनुरूप उनका ग़ज़ल संग्रह असरदार है। आकर्षक साज-सज्जा है। बेहतरीन छपाई है। दिल के दरवाज़े पर दस्तक देने वाली ख़ूबसूरत ग़ज़लें हैं। सीमाब अकबराबादी का शेर है- 


कहानी मेरी रूदाद ए जहां मालूम होती है 

जो सुनता है उसी की दास्तां मालूम होती है


असर की ग़ज़लें इसी नर्म ओ नाज़ुक एहसास के साथ मंज़र ए आम पर आई हैं। उन्होंने अपनी आपबीती को इस तरह बयान किया है कि वह सबको अपनी दास्तान लगती है। दूसरों की दास्तान को अपनी दास्तान बनाकर पेश करने का हुनर भी असर में है। इसलिए असर की ग़ज़लें सबके सुख दुख की साथी बन जाती हैं। 


सफ़र है ज़िन्दगी गर तो सफ़र होना ज़रूरी है

सफ़र सांसों का लेकिन मुख्त़सर होना ज़रूरी है

बहुत रिश्तों का जीवन में ज़रूरी है नहीं होना

मगर रिश्तों में जीवन का 'असर' होना ज़रूरी है


सुधीर त्रिपाठी असर के ग़ज़ल संग्रह का नाम है 'बस यूं ही'। उन्होंने बड़े सलीक़े से अपनी ग़ज़ल में यूं ही को पिरोया है-


उम्र भर ठोकरें मिलीं हमको 

हम उठे यूं ही और गिरे यूं ही 

इनमें यादों के फूल आएंगे 

ज़ख़्म रखना हरे भरे यूं ही


गेयता ग़ज़ल की ताक़त है। असर की हर ग़ज़ल गुनगुनाई जा सकती है। उनकी ग़ज़लों में दिल की विस्तृत दुनिया है। ख़्वाब और उम्मीदें हैं। मिलन और बिछोह है। रंजो ग़म और ख़ुशी है। दर्द का दरिया पार करके साहिल तक पहुंचने का हौसला भी है। 


याद मुझको वो इस क़दर आया 

हर तरफ़ वो ही वो नज़र आया 

मैं हूं सूरज मुझे लगा तब ये 

शाम को लौट के जो घर आया


असर उस परंपरा के शायर हैं जहां हिज्र भी   है और विसाल भी। क़त्ल भी है और क़ातिल भी। जाम, मीना और साक़ी है। ग़ज़ल की यह परंपरा बहुत दिलकश और दिलचस्प है। 


पते की बात कहता हूं कि तू क़ातिल नहीं होता 

तेरे रुख़सार पर गर क़ातिलाना तिल नहीं होता


हज़ारों लोग आए थे विदा करने वहां मुझको

हरज़ क्या था जो चलते वक़्त हरजाई भी आ जाती


असर के पास अंदाज़े बयां का असरदार फ़न है जो उनके अशआर को लोकप्रिय बनाने की क्षमता रखता है।


दैर झूठे, हरम भी झूठे हैं 

पत्थरों के सनम भी झूठे हैं 

जाम झूठा है, झूठी मीना भी 

साक़ियों के करम भी झूठे हैं


दरअसल ग़ज़ल ज़िंदगी से गुफ्त़गू का एक रचनात्मक सलीक़ा है। असर जहां जहां भी ज़िंदगी से गुफ्त़गू करते हैं वहां वहां उनका फ़न बोलता और रस घोलता दिखाई देता है।


इक तरफ़ है नदी एक तरफ़ प्यास है 

ज़िंदगी!  तू भी क्या ख़ूब एहसास है 


है अजब ज़िंदगी का सफ़र भी 

साथ देती नहीं रहगुज़र भी


असर के पास अनुभव और एहसास की समृद्ध पूंजी है। उनकी ग़ज़लों में ज़िन्दगी की मुस्कराती तस्वीर है। ज़िन्दगी का दर्शन है। ज़िन्दगी के सुख-दुख हैं। ज़िन्दगी की अदाएं हैं और ज़िन्दगी की दुआएं हैं। बचपन है, जवानी है और बुढ़ापा है। उनकी मंज़िल का रास्ता कठिन है मगर वे दूसरों के लिए कांटे हटाते हुए चलते हैं। वे एक ऐसा रास्ता बनाते हैं जिस पर उनके पीछे आने वाले लोग सुकून के साथ अपना सफ़र तय कर सकें। बस यही वजह है कि उनकी ग़ज़लें दिल के बहुत क़रीब लगती हैं। उनमें ऐसी कशिश है कि जो भी इन्हें पढ़ेगा इनमें उसको अपना अक्स दिखाई देगा। मैं असर को शुभकामनाएं देता हूं कि वे इसी तरह ग़ज़ल के फूल खिलाते रहें और कामयाबी का परचम लहराते रहें।


प्रकाशक: अमृत प्रकाशन शाहदरा दिल्ली-32 

मूल्य 300 रूपये। संपर्क - 99680-60733 सुधीर त्रिपाठी असर : 73553-79801

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आपका-

देवमणि पांडेय

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फ़िल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063 , 98210 82126


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शनिवार, 5 मार्च 2022

वीथियों के बीच : अभिषेक सिंह का ग़ज़ल संग्रह



भेल में वरिष्ठ अभियंता के रूप में कार्यरत बिहार के युवा ग़ज़लकार अभिषेक कुमार सिंह के ग़ज़ल संग्रह का नाम है 'वीथियों के बीच'। अभिषेक हिंदी ग़ज़ल की उस परंपरा के हमराही हैं जो हमें सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, शमशेर बहादुर सिंह, और महाकवि निराला से हासिल हुई है। हिंदी ग़ज़ल की इस शाहराह पर दुष्यंत कुमार मील के पत्थर हैं। दुष्यंत ने हमें भाषा, कथ्य, और अभिव्यक्ति का नया मुहावरा दिया। उनके यहां प्रतिरोध की एक बुलंद आवाज़ है। ग़ज़ल के इस रचनात्मक सफ़र से अभिषेक अपना रिश्ता इस तरह जोड़ लेते हैं- 


लोग जो उतरे अभी हैं चमचमाती कार से

भूख पर चर्चा करेंगे बैठकर विस्तार से


सांस लेने की नई शर्तें हैं लागू अब यहां

धड़कनें भी लिंक होंगी आपके आधार से


जन समर्थित चेतना को रौंदा डाला जाएगा 

आपकी संवेदना को रौंद डाला जाएगा 


बाढ़ से पहले बनेंगे काग़ज़ों पर पुल नए 

और ज़मीं पर योजना को रौंद डाला जाएगा


अपने वक़्त के यथार्थ के साथ-साथ चलते हुए अभिषेक अपनी अभिव्यक्ति को आधुनिक सोच और शब्दावली की ऐसी पोशाक पहना देते हैं कि पढ़ने सुनने वाले आश्चर्यचकित हो जाते हैं। उनके ऐसे ही चार मिसरे मैं अक्सर उद्धरित करता हूं-


ओला न मिल सके तो उबर से निकल चलें

आओ उदासियों के शहर से निकल चलें


ख़तरों की बारिशों का तो मौसम ही तय नहीं

हिम्मत का रेनकोट लें घर से निकल चलें


अभिषेक का ये कहना सच है कि "इंग्लिश भी शामिल है अपनी हिंदी में, हिंदी भी अब इंग्लिश का इक हिस्सा है।" वे अपनी ग़ज़लों में अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल धड़ल्ले से करते हैं। मगर उनकी अभिव्यक्ति में सहजता है। कहीं भी उनका ऐसे प्रयोग अटपटे नहीं लगते- 


टीआरपी की झाड़ से आती है उतर कर 

सो न्यूज़ भी अख़बार पर पूरी नहीं उतरी


चीख़ सिसकी बढ़ गई है शोषितों के हाय की

वेंटिलेटर पर पड़ी है लाश बेबस न्याय की


अभिषेक के पास चीज़ों को महसूस करने का हुनर और देखने का नज़रिया है। वे अपने आसपास की दुनिया को अपनी तरह से देखते हैं। जो मंज़र सामने है उसे वे ग़ज़ल के फ्रेम में तस्वीर की तरह जड़ देते हैं। ये तस्वीरें कभी-कभी देखने वाले को सुकून पहुंचाती हैं और कभी कभी विचलित कर देती हैं। क़ाफ़ियों के बढ़िया इस्तेमाल से वे अपने कथ्य में जादुई असर पैदा करते हैं-


कितनी धोती होगी गांधी को मयस्सर 

फ़ैसला इस देश में नाथू करेंगे 


कितने भोलाराम के हैं जीव अटके 

जाने इनको मुक्त कब बाबू करेंगे


गिरने को तो पल भर में गिर जाते हैं

बरसों लगते हैं किरदार उठाने में


अभिषेक के पास हिंदी की विपुल शब्द संपदा है। वे तत्सम शब्दों के इस्तेमाल से अपनी अभिव्यक्ति को आकर्षक बना देते हैं। ख़ास बात यह भी है कि ऐसे प्रयोगों से कहीं भी ग़ज़ल की लय बाधित नहीं होती है। इस तरह उन्होंने जाने अनजाने हिंदी ग़ज़ल की परम्परा को समृद्ध करने का सराहनीय कार्य किया है।


इस ग़ज़ल संग्रह में 110 ग़ज़लें शामिल हैं। अधिकतर ग़ज़लों में वर्तमान समय और समाज के ज्वलंत सवाल हैं। व्यवस्था का मुखर विरोध है। निजी सुख दुख और विविधरंगी भावनाओं की अभिव्यक्ति कम है। जन समाज के प्रति प्रतिबद्धता अपनी जगह है लेकिन अभिषेक को उन भावनाओं की तरफ़ भी ध्यान देना चाहिए जो हमारी ज़िन्दगी को ख़ूबसूरत बनाते हैं। मुझे लगता है कि ग़ज़ल में वर्तमान समय के खुरदरे यथार्थ के चित्रण के साथ ही गुज़रे जमाने की मधुर-तिक्त स्मृतियां और भविष्य के सपनों की अनुगूंज भी शामिल होनी चाहिए।


कुल मिलाकर अभिषेक ने जो लिखा है बहुत अच्छा लिखा है। उनका यह ग़ज़ल संग्रह वर्तमान परिदृश्य में नई संभावनाओं का संकेत देता है। मेरी हार्दिक कामना है कि वे इसी तरह अपनी रचनात्मकता का सफ़र तय करते रहें। मुझे उम्मीद है कि ग़ज़ल की दुनिया में उनके इस नए संग्रह का भरपूर स्वागत होगा। 


लिटिल वर्ल्ड पब्लिकेशंस नई दिल्ली से प्रकाशित गजल संग्रह का मूल्य 250 रूपये है।


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आपका-

देवमणि पांडेय 

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फ़िल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063 , 98210 82126

रविवार, 13 फ़रवरी 2022

यादों की कतरन : अर्चना जौहरी का काव्य संग्रह

 

चेहरा तो दिल का हाल छुपाता नहीं कभी

कविता निजी भावनाओं की सार्वजनिक अभिव्यक्ति है। किसी रचनाकार के काव्य सृजन से जब पाठकगण अपनी भावनाओं का धागा जोड़ लेते हैं तो उस सृजन का दायरा व्यापक हो जाता है। अर्चना गुप्ता की ग़ज़लें निजी डायरी की तरह सामने आती हैं। मगर उनमें एहसास की ऐसी शिद्दत है कि उनसे गुज़रने वाला इंसान इस एहसास की नमी में तरबतर हो जाता है और ये ग़ज़लें उसके एहसास का हिस्सा बन जाती हैं।


मैं अपनी राह चलती हूं, मैं अपनी राह पे चल के 

करूंगी तय सफ़र अपना, सफ़र की आग में जल के 

ये माना है डगर मुश्किल मगर मैं क्यों भला ठहरूं 

महकते फूल भी कितने यहां कांटों में ही पल के 


अर्चना जौहरी के काव्य संग्रह का नाम है- 'यादों की कतरन'। संग्रह की कई ग़ज़लों में यादों का सैलाब नज़र आता है। इस सैलाब में किसी से बिछड़ जाने की कसक, दर्द, चुभन और आंसू शामिल हैं। यही चीज़ें अर्चना की ग़ज़लों को निजता से ऊपर उठा कर दूसरों के दुख दर्द से जोड़ देती हैं। वस्तुतः यही उनकी रचनात्मकता की उपलब्धि है।


कैसे कहूं कि याद वो आता नहीं कभी 

सच तो यही है ज़ह्न से ज्यादा नहीं कभी 

क्यूं पूछते हो हाल मुझे देखने के बाद 

चेहरा तो दिल का हाल छुपाता नहीं कभी



मुझे यकीन है कि इन ग़ज़लों का रंग और ख़ुशबू संवेदनशील पाठकों को पसंद आएगी। अर्चना की भाषा आम फ़हम है। अंदाज़ में रवानी है। अभिव्यक्ति में सहजता है। यही कारण है कि उनकी ग़ज़लें दिल से निकलती हैं और दिल तक पहुंच जाती हैं। 


मुझे हालात ने रौंदा बहुत है 

पर मैंने उनसे हां सीखा बहुत है 

उसी से सबसे ज़्यादा है शिकायत 

उसी को मैंने पर चाहा बहुत है


संग्रह में कुछ नज्में भी हैं जिनमें रिश्ते नाते, समय और समाज शामिल हैं। इस ख़ूबसूरत काव्य संग्रह के लिए मैं कवयित्री अर्चना जौहरी को बधाई देता हूं। प्रलेक प्रकाशन मुम्बई से प्रकाशित इस काव्य संग्रह का मूल्य 249/- रूपए है। मुझे पूरी उम्मीद है कि काव्य जगत में इस काव्य संग्रह का भरपूर स्वागत होगा। 



आपका-

देवमणि पांडेय 

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फ़िल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063 , 98210 82126

शनिवार, 22 जनवरी 2022

अभिनेता अरुण वर्मा का इंतक़ाल

 

एक कुंवारे अभिनेता का दुखद अंत


अभिनेता अरुण वर्मा की जाने की उम्र नहीं थी मगर 20 जनवरी 2022 की सुबह वे चले गए। उनके गृहनगर भोपाल में उन्होंने अंतिम सांस ली। यहां के रंग मंडल में बतौर रंगकर्मी उन्होंने काफ़ी योगदान किया था। बा. व. कारंत के साथ कई नाटकों में वे अभिनय का इतिहास रच चुके थे।

'मुझसे शादी करोगी' फ़िल्म में आपने अभिनेता अरुण वर्मा को जादूगर के रूप में देखा। 'हीरोपंती' में टाइगर के जीजा के रूप में उन्हें आप देख चुके हैं। फ़िल्म 'किक' में वे एक ऐसे चौकीदार की भूमिका में थे जिसे घर से दस लाख की नकदी निकलती है। हिना, प्रेम ग्रंथ, खलनायक, डकैत आदि बड़े बैनर की कई फ़िल्मों में वे एक अच्छे अभिनेता के रूप में सराहनीय भागीदारी कर चुके हैं।


कोरोना की दूसरी लहर के बाद अरुण वर्मा मुम्बई लौटे। एक मेगा सीरियल में उनकी रात्रिकालीन शूटिंग शुरू हो गई। कुछ दिन बाद भोपाल से उनका फ़ोन आया कि रात में शूटिंग और दिन में स्क्रीन टेस्ट दे दे कर उनको पर्याप्त नींद नहीं मिली और तबीयत ख़राब हो गई। फिर भी वे इस बात से ख़ुश थे कि उन्हें अपने बुज़ुर्ग पिता की सेवा करने का अवसर मिल रहा है।

बज़्मे इंशाद दिल्ली जाने से पहले 17 दिसंबर 2021 को मैंने अरुण को फ़ोन किया। मैंने उनसे मशवरा मांगा कि दिल्ली के मुशायरे में क्या मैं काली शर्ट और काले पैंट के ऊपर सफ़ेद कोट पहन सकता हूं। वे झट से बोले- हां पहनिए और कंधे पर एक काला दुपट्टा लटका लीजिए। मैंने उनकी सलाह पर अमल किया। दिल्ली से लौटकर मैंने उन्हें फ़ोन किया तो उन्होंने फ़ोन नहीं उठाया। वे पहले से ज़्यादा अस्वस्थ हो गए थे। नया साल मुबारक बोलने के लिए भी मैंने फ़ोन किया था मगर उन्होंने नहीं उठाया।


अरुण वर्मा मुझसे कविता सुनाकर मशवरा मानते थे और मैं उनसे पोशाक के बारे में। उनके मशवरे पर ही मैंने लिनेन का सफ़ेद कोट बनवाया था। लोखंडवाला मार्केट में घूमते हुए उनकी नज़र एक जींस जैकेट पर पड़ी। बोले इसे ख़रीद लीजिए। मैंने ख़रीद लिया और पूछा- इसे कब पहनूं। वे बोले- जब आप हवाई यात्रा करते हैं तो आते जाते समय जींस के पैंट पर जींस की जैकेट पहनिए। इसी तरह एक बार उनकी नज़र एक लाल ब्लेज़र पर गई। उनके सुझाव पर मैंने उसे ख़रीद लिया। उनके कहने से मैंने लाल जैकेट भी ख़रीदी। उनका कहना था कि जब आप मंच पर जाते हैं तब हर बार आपका नया लुक दिखाई पड़ना चाहिए। इस तरह लिबास के बारे में मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा। वे कहते थे- जूतों पर ख़ास निगाह रखो। आप स्टेज पर जाते हैं तो सबसे पहले लोग आप का जूता देखते हैं। मैंने हमेशा उनके मशवरे का पालन किया।

लगभग 90 फिल्में करने के बावजूद अरुण वर्मा मुंबई में अपना मकान नहीं बना पाए। वे हमेशा पैसे की तंगी में रहे। मैंने उन्हें सुझाव दिया कि वे मेरे साथ कवि सम्मेलन में कविता पाठ करें ताकि कुछ आमदनी तो हो। मेरा सुझाव मानकर अभिनेता अरुण वर्मा ने कुछ कवि सम्मेलनों में भागीदारी की। उन्हें मानदेय भी प्राप्त हुआ। एक बार मैंने उन्हें मालाड के एक गर्ल्स कॉलेज में कविता पाठ के लिए आमंत्रित किया। मानदेय की समुचित व्यवस्था थी। मगर अरुण वर्मा ने हाथ जोड़ लिए। बोले देवमणि जी, मुझे माफ़ कर दीजिए। मैं बहुत बड़ी ग़लती करने जा रहा था। मैं तो एक अभिनेता हूं। मुझे कवि सम्मेलन में कवि के रूप में कविता पाठ नहीं करना चाहिए। कविता पाठ मेरी शख्स़ियत के लिए हानिकारक है। आपसे अनुरोध है कि आगे जब कभी आप मुझे बुलाएं तो बतौर अभिनेता बुलाएं। दक्षिण मुंबई के बिरला मातुश्री सभागार में राजस्थानी महिला मंडल का कार्यक्रम था। मैंने अभिनेता अरुण वर्मा को मुख्य अतिथि के रूप में बुलाया।


अरुण वर्मा की शादी नहीं हुई। उन्होंने मान लिया था कि अब उनकी शादी नहीं होगी। अब वे 62 साल के हो चुके थे। एक दिन मेरे कुरेदने पर उन्होंने बताया कि लड़कियां मुंबई में उन्हीं लड़कों से शादियां करना चाहती है जिनके पास अपना मकान हो। मैंने कहा आपको ऐसी लड़की तलाश करनी चाहिए जिसके पास अपना मकान हो। उन्होंने कहा कि दो बार ऐसी लड़कियां मिली थीं मगर बात जमी नहीं। पहली लड़की ने उनसे कहा था कि आपको घर ख़र्च के लिए हर महीने मेरे खाते में 25 हज़ार जमा करने होंगे। दूसरी लड़की ने प्रस्ताव रखा था कि अगर वे उसके छोटे भाई की शिक्षा का सारा खर्च उठाएं तो वह शादी के लिए तैयार है। उन्होंने दोनों की शर्ते नहीं मानीं और कुंवारे रह गए।

अरुण के आग्रह पर कभी-कभी मैं चाय पीने उनके रूम पर चला जाता था। वहां वे कभी मुगले आज़म के संवाद सुनाते और कभी फ़िल्म यहूदी के। वे ठेठ भोपाली भाषा का भी नमूना पेश करते। साथ ही मारवाड़ी, सिंधी, पंजाबी आदि व्यापारियों के अंदाज़ ए बयां को भी सामने लाते। वे बेहद प्रतिभाशाली अभिनेता थे मगर उनको प्रतिभा के अनुसार काम नहीं मिला। फ़िल्म लेखक निर्देशक रूमी जाफ़री उनके ख़ास मित्रों में हैं लेकिन अपने बारे में कुछ बात करने में उन्हें बहुत संकोच होता था।

अरुण वर्मा एक अच्छे चित्रकार भी थे। ख़ासतौर से वे स्केच बहुत अच्छा बनाते थे। कोरोना के पहले लॉकडाउन में वे प्रतिदिन एक स्केच बनाते थे। अभिनय भी एक नशा है। एक बार इंसान इसमें डूब जाए तो बाहर नहीं निकल पाता। अरुण वर्मा को भी लगता था कि आने वाले कल में कुछ बहुत अच्छा होने वाला है। पिछली मुलाक़ात में उन्होंने कहा था- तीन चार फ़िल्मों में अच्छी भूमिका की बात चल रही है। इस बार पैसा मिलेगा तो मीरा रोड में एक छोटा सा फ्लैट खरीद लूंगा। मगर ऐसा नहीं हो पाया। अपने साथ अपना यह अधूरा ख़्वाब लेकर वे इस दुनिया से हमेशा के लिए विदा हो गए।

अलविदा अरुण वर्मा!

आपका-
देवमणि पांडेय
सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फ़िल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063 , 98210 82126

शायर सिने गीतकार इब्राहीम अश्क का जाना


शायर सिने गीतकार इब्राहीम अश्क का जाना 


तेरी ज़मी  से  उठेंगे   तो  आसमां होंगे

हम ऐसे लोग ज़माने में फिर कहाँ होंगे

चले  गए  तो  पुकारेगी हर सदा हम को,

न जाने कितनी ज़बानों से हम बयाँ होंगे।

इब्राहीम अश्क 


शायर सिने गीतकार इब्राहिम अश्क मुंबई की हलचल थे। वे किसी पत्रिका में कुछ ऐसा लिख देते या कुछ ऐसा बोल देते कि महीनों तक उसकी गूंज सुनाई पड़ती। कोई ऐतराज़ करता तो बहस में उसे धराशाई कर देते। रचनाकार मित्र ऐसे सरस प्रकरण को दोहराते, मज़ा लेते। अश्क से मेरी आख़िरी मुलाकात 21 दिसंबर 2021 को हुई। 


हम सब संत मुरारी बापू के सानिध्य में कविता पाठ करने मुंबई के वॉलकेश्वर इलाके़ में आए थे। अभी तक मोबाइल से अश्क की दोस्ती नहीं हो पाई थी। शायरा दीप्ति मिश्र ग्रुप में बार-बार मैसेज डालती थीं- अश्क जी, कुछ तो जवाब दीजिए। अश्क के बदले शायर शमीम अब्बास का संदेश आता- अश्क जी के बेटे से मेरी बात हो गई है। वे आ रहे हैं। अंततः अश्क जी अच्छे मूड में पधारे। सबसे दिल खोलकर मिले। काव्य संध्या में बड़ी आत्मीयता से कविता पाठ किया। श्रोताओं का भरपूर प्रतिसाद मिला। अपनी एक नज़्म में उन्होंने भाव विभोर होकर उज्जैन के पास बड़नगर क़स्बे में अपने पैतृक घर को याद किया जिसे कई साल पहले वे पीछे छोड़ आए थे। 


इब्राहिम अश्क की ग़ज़लों और नज़्मों में उनका दिल शामिल था। मगर जब वे तनक़ीदी गद्य लिखने के लिए कमर कसते तो बौद्धिकता के बीहड़ में बंदूक लेकर उतर पड़ते थे। वे फायर पर फायर करते चले जाते और किसी के धराशायी होने की परवाह नहीं करते थे। उन्होंने अपने एक लेख में शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की प्रगतिशीलता को कटघरे में खड़ा कर दिया। दूसरे लेख में शायर निदा फ़ाज़ली की जदीदियत पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया। तीसरे लेख में रेखांकित किया कि शायरा परवीन शाकिर की शायरी में सामाजिक सरोकार ही नहीं है और उसने कभी कोई बड़ा शेर नहीं कहा। 


इस तरह उन्होंने और भी कई लेख लिखे और कई लोगों को नाराज़ होने का मौक़ा दिया। एक बार उन्होंने 'शबख़ून' पत्रिका में पत्र लिखकर उसके संपादक जाने-माने समालोचक शमसुर्रहमान फ़ारूक़ी पर ज़बरदस्त प्रहार किया। गुलज़ार और जावेद अख़्तर से भी वे ख़ुश नहीं थे। शायर बशीर बद्र से ख़फ़ा होकर उन्होंने उन पर एक ऐसी ग़ज़ल कही जिसमें कई रोचक गालियों का इस्तेमाल किया गया था। 


सिने जगत में गीतकार बनने के लिए क्या संघर्ष करना पड़ता है, कैसे-कैसे पापड़ बेलने पड़ते हैं... इब्राहिम अश्क का जीवन ख़ुद में इसकी एक मिसाल है। अस्सी के दशक की शुरुआत में वे एक दिन दिल्ली प्रेस में अपनी पत्रकारिता की नौकरी छोड़कर सिने गीतकार बनने का ख़्वाब पूरा करने के लिए मुंबई पहुंच गए। 


वे दूरदराज मुंब्रा उपनगर से ट्रेन पकड़ कर दादर होते हुए बांद्रा पहुंचते थे। फिर खार, सांताक्रुज, जहू, अंधेरी आदि उनकी संघर्ष यात्रा में शामिल हो जाते। कवि चित्रकार कमल शुक्ल के बांद्रा कार्यालय में अश्क से मेरी पहली मुलाक़ात सन् 1990 में हुई थी। मुंब्रा से बांद्रा के इस सफ़र का सिलसिला तब तक चला जब तक वे मिल्लत नगर, अंधेरी में अपने मकान में नहीं आ गए। जब फ़िल्म "कहो ना प्यार है" में उनके गीतों ने कामयाबी का परचम लहराया तो अंधेरी में बसने का उनका सपना साकार हुआ। 


एक दिन उन्होंने अपने नए मकान में मुझे चाय पीने के लिए बुलाया। मैंने उनसे पूछा- ऋतिक रोशन की इस फ़िल्म में काम पाने के लिए उन्हें कितना संघर्ष करना पड़ा है। वे मुस्कुराए, बोले- मैं एक साल तक लगातार सांताक्रुज में संगीतकार राजेश रोशन के म्यूजिक रूम का चक्कर लगाता रहा। हाज़िरी देता रहा। आख़िर एक साल बाद उन्होंने "कहो ना प्यार है" फ़िल्म में गीत लिखने का मौक़ा दिया। इससे आप समझ सकते हैं कि सिने गीतकार बनने के लिए इंसान में कितना धीरज चाहिए। 


सिने जगत में एक दौर ऐसा आया जब गीतकारों, संगीतकारों की एक नई पीढ़ी सक्रिय हो गई। पुराने संगीतकार और गीतकारों में निर्माताओं की दिलचस्पी कम हो गई। वे सिने परिदृश्य से ग़ायब होने लगे।  इस चुनौती का सामना इब्राहिम अश्क ने यूं किया कि अंधेरी का अपना मकान बेचकर वे सपरिवार मीरा रोड में बस गए। रविवार 16 जनवरी 2022 की शाम को चार बजे उनका इंतक़ाल हुआ। कोविड 19 वायरस से संक्रमित होने के कारण वे स्वास्थ्य की चुनौतियों का सामना कर रहे थे। 


20 जुलाई 1951 को मध्य प्रदेश के उज्जैन ज़िले में जन्मे शायर इब्राहीम अश्क ने ‘इन्दौर समाचार’, ‘शमा’, ‘सुषमा’ और ‘सरिता’ आदि पत्र-पत्रिकाओं के लिए पत्रकारिता की। मुंबई आने पर उन्होंने ‘कहो न प्यार है’, ‘कोई मिल गया’, ‘ऐतबार’, ‘कोई मेरे दिल से पूछे’, ‘आप मुझे अच्छे लगने लगे’, ‘ये तेरा घर ये मेरा घर’ आदि कई फ़िल्मों को अपने गीतों से सजाया। कई मशहूर ग़ज़ल गायकों के अलबम में उनके गीत ग़ज़ल शामिल हैं। उनकी  ‘इलहाम, आगही’, ‘कर्बला’, ‘अलाव’, ‘अंदाज़े बयां’, ‘तनक़ीदी शऊर’ आदि 18 किताबें प्रकाशित हुईं। उनकी शायरी पर पांच लोगों ने पीएचडी हासिल की है। 


आपका :

देवमणि पांडेय : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063 , 98210 82126