शुक्रवार, 15 मई 2026

अनुज अब्र की ग़ज़लों में सोच की परवाज़


सोच की परवाज़ : अनुज अब्र की ग़ज़लें 

अनुज पांडेय अब्र लखनऊ महानगर में रहते हैं मगर उनकी निगाह हमेशा ऐसे किरदारों पर रहती है जो अपने श्रम और संघर्ष से ज़िंदगी की चुनौतियों का सामना करते हैं। वे अपनी ग़ज़लों में ऐसे चरित्रों को दर्ज करते हैं जो वक़्त बदलने के साथ बदलाव का शिकार हो जाते हैं। आज के हामिद अपनी दादी के लिए चिमटा नहीं लाते। वे शहर जाते हैं तो वापस ही नहीं लौटते। अब्र के पास अपनी बात कहने का कौशल है। वे अपने आसपास देखते हैं तो पाते हैं कि अमीर अभी भी ग़रीबों का लहू चूस रहे हैं। वे ऐसे यथार्थ को आम फ़हम भाषा में एक नए अंदाज़ में दर्ज करते हैं। यही कारण है कि उनकी अभिव्यक्ति में नएपन का अक्स नज़र आता है। 

अब्र अपनी संस्कृति और परंपरा से गहराई से जुड़े हैं। उनके यहां तुलसी दल भी नज़र आता है और तुलसी का मानस भी। उन्हें मालूम है कि ऐसे प्रतीक हमारे मूल्यों के सबल वाहक हैं और समाज को इनकी ज़रूरत है। इस तरह अपनी ग़ज़लों के ज़रिए वे सामाजिक दायित्व का निर्वाह करते हैं। अब्र की ग़ज़लों में वे मिथकीय चरित्र भी नज़र आते हैं जो आम जन की बातचीत में शामिल हैं। उन्होंने महाभारत के चरित्रों के हवाले से कई महत्वपूर्ण शेर कहे हैं। 


अब्र के यहां सोच की परवाज़ भी है और अभिव्यंजना का कौशल भी। वे झूठ के खिलाफ़ सच के पक्षधर हैं। उनकी ग़ज़लों में लोक व्यवहार और मानवीय भावनाओं की भी सशक्त अभिव्यक्ति दिखाई देती है। कभी-कभी वे सियासत को भी चुनौती देते हैं कि अगर आप ग़रीबों का सपना साकार नहीं कर सकते तो सत्ताधीश होने का मतलब क्या है। उनकी ग़ज़लों में समाज के वे सभी अहम मुद्दे मौजूद हैं जिनका ज़िक्र बेहद ज़रूरी है। कुल मिलाकर अनुज अब्र की ग़ज़लें अपने समय में सार्थक हस्तक्षेप करती हैं।

 

▪️देवमणि पांडेय : 98210 82126 


अनुज अब्र की दस ग़ज़लें 

(1) 

मेरी लकीर से लम्बी लकीर खींच चुके

नई फ़सील तो ये राजगीर खींच चुके


लहू शरीर से खिंचने न देंगे अब ये ग़रीब

कि खींच सकते थे जितना अमीर खींच चुके


कोई उड़ाए परिंदों को पेड़ से जब तक 

शिकारी डोर पे तब तक थे तीर खींच चुके


तुम्हें पता ही नहीं  धान - बाजरे का भाव 

तुम इन ग़रीब के हिस्से की पीर खींच चुके


नया कहाँ से तुम इन काग़ज़ों पे खींचोगे 

सब 'अब्र' पहले ही तुलसी - कबीर खींच चुके


(2)

हमारा कल मिलेगा आप को तुलसी के मानस में 

सुनहरा पल मिलेगा आपको तुलसी के मानस में 


अगर दुविधा है कोई,, आपके जीवन में तो पढ़िये

सभी का हल मिलेगा आपको तुलसी के मानस में


भिगो कर आपकी जो आत्मा को शुद्ध कर डाले 

वो गंगा जल मिलेगा आपको तुलसी के मानस में


पराजित सत्य जब होता नज़र आए तो पढ़ियेगा 

बहुत सम्बल मिलेगा आपको तुलसी के मानस में


जिसे हम देखते ही अपने माथे पर लगाते हैं 

वो तुलसी दल मिलेगा आपको तुलसी के मानस में


(3)

जिस तरह उस द्रोपदी की थी सुनी फ़रियाद कृष्ण 

ठीक वैसे ही करो मेरी भी तुम इमदाद कृष्ण 


बात जब अर्जुन पे आई तो उठाया शस्त्र भी 

तोड़ दी ख़ुद की प्रतिज्ञा ऐसे थे अपवाद कृष्ण


मित्रता का  मोल अब कोई  चुकाता हैं कहाँ

अब सुदामा को कहाँ करता है कोई याद कृष्ण


जानते थे वो कोई प्रस्ताव मानेगा नहीं 

फिर भी दुर्योधन से करने को गए संवाद कृष्ण


जाने क्या जादू हरे कृष्णा में आख़िर 'अब्र' है 

नाम लेते ही तुम्हारा मिट गया अवसाद कृष्ण


(4)

अगर ख़फ़ा हो तो सब कुछ उजाड़ देती है 

नदी पहाड़ का सीना भी फाड़ देती है


हवा को कम न समझना ख़िलाफ़ होने पर 

बड़े शजर को भी जड़ से उखाड़ देती है


तुझे पता है न बेटे कि इक भली कोशिश

मुसीबतों को हमेशा पछाड़ देती है


ये बात कहने में तकलीफ़ दे रही है पर 

कमीनी भूख बदन भी उघाड़ देती है


बहुत कम उम्र में हासिल हुई सफलता भी 

बड़े बड़ों का तवाज़ुन बिगाड़ देती है


मैं सच बताऊँ मेरी आठ साल की बिटिया 

ग़लत करूँ तो मुझे भी लताड़ देती है


अगर निगाह में क़ायम है "अब्र"  शर्मो हया

तो एक दूब की पत्ती भी आड़ देती है


(5)

मुझे मालूम है किसको सुनाने बैठ जाते हो 

जो हर इक शाम छत पर गीत गाने बैठ जाते हो


कहीं भी प्यार के दो बोल तुमसे बोल दे कोई 

वहीं उस शख़्स से रिश्ता बनाने बैठ जाते हो


मियाँ अपने गिरेबाँ में भी देखो झाँक कर इक दिन 

ये क्या हर शख़्स की कमियां गिनाने बैठ जाते हो


कहीं ऐसा न हो इक दिन अकेले ही नज़र आओ

ये जो हर आदमी को आज़माने बैठ जाते हो


नज़र आ जाये बस तुमको कोई ग़मगीन सा चेहरा 

उसी पल "अब्र" ग़म उसका मिटाने बैठ जाते हो


(6)

मान भी लीजिए सरकार! नहीं कर सकते 

आप हर बार चमत्कार नहीं कर सकते 


आपके झूठ के जादू का असर ख़त्म हुआ 

आप इस बात से इन्कार नहीं कर सकते


आपने कर के दिखाया है जो इस दुनिया को 

सारी दुनिया के अदाकार नहीं कर सकते


आप के सर पे रखे ताज का मतलब क्या है 

स्वप्न निर्धन के जो साकार नहीं कर सकते


आज के दौर में इल्ज़ाम लगा है हम पर 

वार शब्दों से कलमकार नहीं कर सकते


(7)

झूठा कोई ख़्वाब दिखाया जाएगा

जुगनू को सूरज बतलाया जाएगा


मंदिर मस्जिद को लड़वाया जाएगा 

मुद्दे से हमको भटकाया जाएगा


पैरों में डाली जाएँगी ज़ंजीरें

हाथों से रस्ता नपवाया जाएगा


काट लिए जाएँगे पर मासूमों के 

फिर उनको आकाश दिखाया जाएगा


भेद खुलेगा ठाकुर की तब रहमत का 

जब बुधुवा से खेत लिखाया जाएगा


बीन बजाई जाएगी इस कोने पर

उस कोने पर साँप दिखाया जाएगा


अब्र तुम्हारी बातें देश विरोधी हैं 

मुझ पर ये इल्ज़ाम लगाया जाएगा


(8)

न पूछो कैसे मेरी ज़िन्दगी की रेल चलती है 

अजब सा खौफ़ होता है ये जब पटरी बदलती है


भला कैसे हम अपनी फ़ेमिली को मॉल ले जायें

यहाँ तो फ़ीस ही बच्चों की मुश्किल से निकलती है


कई हामिद पलट कर शहर से वापस नहीं लौटे 

कई माँओं की उँगली आज भी चूल्हे से जलती है


हम अपनी मुट्ठियों को जितना कस के बन्द करते हैं

हमारी मुट्ठियों से उतनी ही क़िस्मत फिसलती है


ज़मीनों में उगा करता है सोना 'अब्र' तुमसे ही 

तुम्हारे वक़्त पर आने से इक उम्मीद पलती है


(9)

हैरत कि मेरी बात को टाला नहीं गया 

यानी कि मुझको दिल से निकाला नहीं गया


देने लगे हैं सीख समुंदर को इन दिनों 

जिनसे नदी में पाँव भी डाला नहीं गया


बेटे तो चार  पाल  लिए बाप ने  मगर

बेटों से एक बाप को पाला नहीं गया


तब तक वो दर्द दर्द रहा एक शख़्स का

जब तक वो दर्द गीत में ढाला नहीं गया


तुमने भी 'अब्र' सीख लिया शायरी का फ़न

तुमसे भी दिल का दर्द सँभाला नहीं गया


(10)

इसी उसूल पे उसका निज़ाम चलता है 

कि कांटा पांव का कांटे से ही निकलता है 


हम उस चराग को अपना लहू भी दे देंगे 

वो जो ख़िलाफ़ अंधेरे के रोज जलता है 


जमीं तवाफ़ किये जा रही है इसका और

समझते हम हैं कि ये आफ़ताब चलता है 


मेरी ये बात हमेशा दिमाग में रखना 

हज़ार वक्त बुरा हो मगर बदलता है 


ये कौन बात अकेले में करता है मुझ से 

ये कौन छत पे मेरे साथ साथ चलता है 


गए हो आग लगा कर न जाने ये कैसी 

कि दिल में आज तलक इक अलाव जलता है 


अनुज यक़ीन कभी उस पे तुम नहीं करना 

हर एक बार जो अपना कहा बदलता है


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अनुज पाण्डेय 

सेक्टर 12/149, इंदिरा नगर 

लखनऊ - 226016

मोबाइल : 9532521100

शनिवार, 9 मई 2026

कथाकार मनहर चौहान का रचना संसार

 

कथाकार मनहर चौहान के साथ गपशप का आनंद

कथाकार मनहर चौहान बिल्कुल स्वस्थ और प्रसन्न हैं। पत्रकार रेणु शर्मा ने उनका ज़िक्र किया और शनिवार 9 मई 2026 को हमने उनसे मिलने का प्लान बना लिया। कथा पत्रिका 'सारिका' के सुनहरे दौर में चर्चित हुए 86 वर्ष के मनहर चौहान ने कुछ दिलचस्प अनुभव हमारे साथ साझा किये और हमारे साथ कई बार ज़ोरदार ठहाके भी लगाए।

तस्वीरें देखकर आप ख़ुद अंदाज़ा लगा सकते हैं कि मनहर चौहान कितने स्वस्थ और प्रसन्न नज़र आ रहे हैं। मनहर जी ने हमारे साथ दही बड़ा, मिठाई, कचोरी और नमकीन खाने में कोई कोताही नहीं की। उनकी पत्नी लक्ष्मी चौहान एवं बेटी वंदना चौहान ने भी इस रोचक चर्चा का भरपूर लुत्फ़ उठाया।

दो साल पहले मनहर चौहान ने चित्रनगरी संवाद मंच में बिना काग़ज़ देखे कहानी पाठ किया था। उनकी कहानी #चैतू_और_चमेली चरित्र प्रधान कहानी थी। पुराने ज़माने में ठेकेदार मज़दूरों को कैसे ट्रेन के डिब्बे में भेड़ बकरियों की तरह ले जाते थे यह दृश्य विचलित कर देने वाला था। मनहर जी ने उस कार्यक्रम का ज़िक्र किया। मैंने कहा- आप अपनी एक कहानी दे दीजिए रेणु शर्मा उसका पाठ करेंगी। उन्होंने कहा- ए आई से लिखवा कर भेज दूंगा और फिर ठहाका लगाया।

लेखक, पत्रकार और कथाकार मनहर चौहान विशेष रूप से सामाजिक सरोकारों, मानवीय संवेदनाओं और मध्यम वर्ग के जीवन के इर्द-गिर्द बुनी गई कहानियों के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने उपन्यास, कहानी और बाल साहित्य जैसी विभिन्न विधाओं में लेखन किया है। उनकी कहानियों में आम आदमी के संघर्ष और रिश्तों की जटिलताओं का बारीक चित्रण मिलता है।

मनहर चौहान साहित्य सृजन के साथ-साथ संपादन और पत्रकारीय गतिविधियों से भी जुड़े रहे हैं। 'दमख़म' पत्रिका के ज़रिए उन्होंने कई लेखकों को पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे 'दमख़म' में मेरे फोटो के साथ मेरी ग़ज़ल प्रकाशित करना चाहते थे। उन्हें मेरा कोई फोटो पसंद नहीं आया। वे बोले- आप हमेशा कैमरे में क्यों झांकते हैं? मैं एक स्टूडियो में गया। उनके निर्देशानुसार फोटो खिंचाया तब उन्होंने ग़ज़ल छापी।

दो साल पहले मनहर चौहान ने मुझे अपना नया उपन्यास 'वध' भेंट किया था। रहस्य रोमांच से भरपूर इस उपन्यास के ज़रिए मनहर जी ने यह साबित किया है कि एक सामान्य इंसान के भीतर भी हिंसक और जटिल विचार जन्म ले सकते हैं। 'वध' की भाषा बहुत कसी हुई और प्रभावशाली है।


सत्तर के दशक में श्रीपत राय के सम्पादन में प्रकाशित होने वाली पत्रिका 'कहानी' ने अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता का आयोजन किया था। मनहर चौहान की कहानी #घरघुसरा को उसमें प्रथम पुरस्कार मिला था। 'घरघुसरा' कहानी मध्यमवर्गीय समाज के उन किरदारों पर केंद्रित है जिन्हें अक्सर समाज 'अंतर्मुखी' या घरघुसरा कहकर पुकारता है। समाज किसी व्यक्ति की निजता और उसके स्वभाव को किस तरह परिभाषित करता है इस द्वंद्व को यह कहानी बहुत ख़ूबसूरती से उभारती है।

​मनहर चौहान का मशहूर उपन्यास #अरे_ओमप्रकाश व्यवस्था, भ्रष्टाचार और आम आदमी की बेबसी पर चोट करता है। इसमें समाज की विसंगतियों और व्यवस्था के भीतर फंसे एक आम इंसान 'ओमप्रकाश' की छटपटाहट को दिखाया गया है। इसकी शैली में व्यंग्य और यथार्थ का गहरा पुट है।

मनहर चौहान ने प्रचुर मात्रा में #बाल_साहित्य का भी सृजन किया है। उनकी सबसे बड़ी ख़ूबी यह है कि वे मनोवैज्ञानिक गहराई के साथ-साथ बोलचाल की सरल भाषा का प्रयोग करते हैं जिससे पाठक किरदारों के साथ सीधा जुड़ाव महसूस करता है।


मनहर चौहान हमेशा कलमजीवी साहित्यकार रहे। कई सालों तक उन्होंने मुम्बई के दहिसर स्टेशन के पास अपना लेखन कार्यालय बनाया था। एक दौर में उन्होंने कई #जासूसी_उपन्यास भी लिखे जो काफी पसंद किये गए। उन्होंने गुजराती और मराठी कृतियों का अनुवाद भी किया। मराठी से हिन्दी में अनूदित उपन्यास 'अघोरियों के बीच' जनसत्ता सबरंग में धारावाहिक प्रकाशित होकर बहुचर्चित हुआ।

मनहर जी से गपशप में आनंद आया। उनसे मिलकर अच्छा लगा। हमारी दुआ है कि वे इसी तरह स्वस्थ और प्रसन्न रहें। हँसते मुस्कराते रहें और ठहाके लगाते रहें।

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आपका : 
देवमणि पांडेय 98210 82126 

बुधवार, 25 मार्च 2026

कवि विनोद का प्रबंध काव्य 'बरवै_विनोद'

 

कवि विनोद शंकर शुक्ल को अमीर ख़ुसरो पुरस्कार

​लखनऊ के प्रतिष्ठित कवि विनोद शंकर शुक्ल 'विनोद' को उनके प्रबंध काव्य 'बरवै_विनोद' के लिए 22 मार्च 2026 को राज्य कर्मचारी साहित्य संस्थान उत्तर प्रदेश की ओर से एक लाख रूपये के अमीर ख़ुसरो पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इस रचनात्मक उपलब्धि के लिए विनोद जी को हार्दिक बधाई! 

वन विभाग, उत्तर प्रदेश में डी.एफ.ओ. के पद से वर्ष 2017 में सेवानिवृत्त होने के बाद विनोद जी पूर्णरूपेण साहित्य साधना में रत हैं। लखनऊ यात्रा के दौरान उनसे साहित्य-चर्चा में बहुत आनंद आया। विनोद जी ने मुझे अपनी तीन पुस्तकें भेंट कीं-'बरवै-विनोद', 'विश्वामित्र-मेनका' और 'कुरुवंशी महान'।

​पुरातन काव्य-परंपरा में विनोद जी की गहरी रुचि है। बरवै छंदों में उन्होंने 'बरवै-विनोद' का सृजन किया है। कहा जाता है कि बारह-सात मात्राओं वाले इस 'बरवै' छंद का नामकरण अब्दुल रहीम ख़ान-ए-ख़ाना ने किया था। इस छंद में रहीम की चर्चित पुस्तक है- 'बरवै नायिका भेद'। इसी छंद में महाकवि तुलसीदास ने भी 'बरवै रामायण' की रचना की। 

रहीम और तुलसीदास के बरवै अवधी भाषा में हैं। विनोद जी ने खड़ी बोली हिंदी में इस छंद को ढालकर 'बरवै-विनोद' का सृजन किया है। इस पुस्तक में सात सौ इक्कीस बरवै छंदों को छ: शीर्षकों में समाहित किया गया है- सौंदर्य, वियोग, संयोग, वात्सल्य, दायित्व और ज्ञान-भक्ति। सरस भाषा, रोचक शैली और मनमोहक भावनाओं से समृद्ध यह एक उत्कृष्ट कृति है।

​'कुरुवंशी महान' प्रबंध काव्य है। इसकी कथावस्तु महाभारत पर आधारित है। यह तेरह सर्गों में विभक्त है। इसका प्रत्येक सर्ग एक पृथक छंद में रचित है। 'विश्वामित्र-मेनका' खंडकाव्य में इन दो पात्रों के माध्यम से वैदिक कालीन आर्य संस्कृति की एक यशोगाथा प्रस्तुत की गई है। इसका अंतिम सर्ग 'हर्ष सर्ग' है जिसमें दुष्यंत की अपने पुत्र भरत एवं पत्नी शकुंतला से भेंट होती है। दुष्यंत उन्हें साथ लेकर अपनी राजधानी हस्तिनापुर वापस चले जाते हैं।सहज प्रवाह लिए हुए यह खंडकाव्य काफ़ी सरस है। 

​विनोद जी की लेखनी से निकली तीनों अनमोल कृतियाँ हिन्दी साहित्य जगत के लिए एक बहुमूल्य उपहार हैं और उनकी सृजनशीलता की महत्ता को प्रमाणित करती हैं। अवधी के पारंपरिक 'बरवै' छंद को खड़ी बोली की सरसता में पिरोकर विनोद जी ने आधुनिक हिंदी साहित्य में एक नया अध्याय जोड़ा है।

​'कुरुवंशी महान' में महाभारत की महानता और 'विश्वामित्र-मेनका' में वैदिक कालीन संस्कृति का उदात्त चित्रण विनोद जी की गहरी शोधपरक दृष्टि और सांस्कृतिक निष्ठा को दर्शाता है। इन उत्कृष्ट रचनाओं के लिए आपको हार्दिक बधाई। हम सबकी मंगल कामना है कि आपकी लेखनी इसी प्रकार माँ भारती की सेवा में निरंतर गतिशील रहे।

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आपका : देवमणि पांडेय 98210 82126 

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