सोमवार, 11 जुलाई 2022

क्या है जो मेरा है : राजेश का काव्य संग्रह


 क्या है जो मेरा है : राजेश का काव्य संग्रह


कवि राजेश ऋतुपर्ण के काव्य संग्रह का नाम है - 'क्या है जो मेरा है'। संग्रह की पहली कविता में ही राजेश ने अपने सृजन सरोकार को अभिव्यक्त कर दिया है- जो अच्छा है, श्रेष्ठ है, उसे किसी के नाम कर दिया जाए और ख़ालीपन को अपने पास रख लिया जाए। 

इंसान का अंतर्मन जब अनुभव, अध्ययन और अवलोकन की पूंजी से आच्छादित होता है तो वह काव्यात्मक अभिव्यक्ति के माध्यम से छलक पड़ता है। रचनात्मकता के इस उत्स को इंसान अपनी दृष्टि से समृद्ध करता है। राजेश ने अपने अनुभव के आकाश को और अपने पैरों तले ज़मीन के एहसास को अपनी रचनात्मकता का आधार बनाया है। उनकी अभिव्यक्ति में वह विकलता मौजूद है जो सृजनात्मकता के लिए ज़रूरी है। 'पोशाक' कविता की कुछ पंक्तियां देखिए- 

काश! बिना टूटे- बिना गांठ पड़े 
ये धागे अपनी तकली पर फिर से चढ़ जाएं 
ताकि फिर से कुछ नया बुनें 
हम और तुम… 

मौजूदा समय के कुछ महत्वपूर्ण यथार्थ होते हैं। एक कवि के लिए यह चुनौती होती है कि वह ऐसे यथार्थ को अपनी रचनात्मकता के दायरे में कैसे लाए। हमारे समय का एक महत्वपूर्ण यथार्थ है 'कटना'। जंगल से लेकर जानवर तक कट रहे हैं। इस यथार्थ को अभिव्यक्त करते हुए कवि अपने समय से ख़ुद को जोड़ता है। इस कविता की कुछ पंक्तियां देखिए - 

इंसान सब कुछ खा पचा जाता है 
फिर काटता है समय …
फिर भी समय नहीं कटता 
हां इस बीच कट चुके होते हैं 
कई पेड़, कई पौधे 
कई फल, कई फूल 
बहुत सारे जानवर 
और थोड़े थोड़े हम

किसी घटना पर तात्कालिक टिप्पणी से बचते हुए अपने समय के किसी ज्वलंत सवाल को काव्यात्मक संवेदना के साथ जोड़कर अभिव्यक्त करना बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी और कौशल का काम होता है। राजेश कहीं-कहीं यह जोख़िम उठाते हैं। लॉकडाउन में मज़दूरों की पैदल घर वापसी एक ज्वलंत सवाल था। राजेश की 'लॉकडाउन' कविता में 'एक कवि का शर्मनामा' देखिए-

मैं चुपचाप देखता हूं 
टेलीविज़न पर आ रही पलायन की ख़बरों को
मैं चुपचाप गणना करता हूं कि 
सड़क पर चलता हुआ मज़दूर 
अब तक कितनी दूर चल चुका होगा 
क्या वो अपने घर पहुंचेगा 
सोचते-सोचते 
मैं क़लम का सिपाही 
थक कर सो जाता हूं 
उठता हूं तो मुझे शर्म आती है 
मुझे मज़दूरों पर कविता लिखने में 
शर्म आती है … 

राजेश ऋतुपर्ण के पास सोच और सरोकार है। ज़िंदगी और समाज के प्रति एक स्वस्थ नज़रिया है। इसलिए जब वे अपने आसपास की दुनिया के कथ्य को अपनी संवेदना के साथ पेश करते हैं तो एक सुंदर कविता बन जाती है। राजेश के पास अभिव्यक्ति के लिए जीवंत भाषा है। ख़ूबसूरत अंदाज़ है। इसलिए उनकी कविताएं पाठकों के साथ एक आत्मीय रिश्ता क़ायम कर लेती हैं। 'क्या है जो मेरा है' राजेश का पहला काव्य संकलन है। मुझे उम्मीद है कि रचनाकार जगत में और काव्य प्रेमियों के बीच में इसका भरपूर स्वागत होगा। इस रचनात्मक उपलब्धि के लिए राजेश ऋतुपर्ण को हार्दिक बधाई और अनंत शुभकामनाएं।

 आपका-
देवमणि पांडेय 

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063 , 98210 82126

मंगलवार, 5 जुलाई 2022

जुबां आतिश उगलती है : मंज़र लखनवी

जुबां आतिश उगलती है : मंज़र लखनवी

मंज़र लखनवी की ग़ज़लों में म'आनी है, रवानी है और ज़िन्दगी की कहानी है। मंज़र ने अपने पैरों तले की ज़मीन और सर पर फैले आसमां को अपनी रचनात्मकता का हमसफ़र बनाया है। अपने अनुभव, एहसास और फ़िक्र से अपनी ग़ज़लों को सजाया है। उनकी ग़ज़लों में आज के समाज का माहौल है, मौजूदा वक़्त की आवाज़ है और मुहब्बत की दास्तान है। 


दीवाने को सभी पहचान लेंगे, 

लबों पर है हसीं आँखों में पानी।


किसी को जान से ज़्यादा जो चाहो, 

पड़ेगी जान की क़ीमत चुकानी।


ग़ज़ल कम शब्दों में ज़्यादा बात कहने की एक ख़ूबसूरत काव्य विधा है। मंज़र लखनवी ने अपने अभिव्यक्ति कौशल से इसे साबित कर दिखाया है। उनकी ग़ज़लें अपनी सोच और संवेदना के साथ पाठकों तक पहुंचती हैं और उनसे एक संवाद स्थापित कर लेती हैं। 


सितारे जब भी हों, गर्दिश में मेरे, 

बदल जाते हैं वो, अपने बयाँ से।


मुझे मंज़ूर होगी हर सज़ा अब, 

सुनाएँ गर वो अपनी ही ज़बाँ से।


ग़ज़ल एक नाज़ुक काव्य विधा है। उसे सुकोमल शब्दावली की ज़रूरत पड़ती है। मंज़र लखनवी को इस बात का इल्म है। इसलिए उनकी ग़ज़लों में ऐसे जटिल या भारी-भरकम अल्फ़ाज़ नहीं दिखाई पड़ते हैं जो उनके बयान में अवरोधक का काम करें। उन्होंने सीधी सादी ज़बान और सरल शब्दों में सहजता से अपनी बात को ग़ज़लों में ढाल दिया है। 


बेतहाशा है कमाई आसमाँ छूते मक़ान, 

हो गए हैं क़द मक़ीनों के ही बौने आजकल।


गोद में पिल्ला लिए हैं नस्ल है पामेरियन

क्रेच में पलते हैं नन्हे मुन्ने छौने आजकल।


मंज़र लखनवी को आसान लफ़्जों में दिल को छू लेने वाली बात करने का हुनर आता है। इसलिए उन्हें काव्य मंचों पर भी बहुत मुहब्बत से सुना जाता है। पसंद किया जाता है। मंज़र की ग़ज़लें एहसास की कश्ती पर सवार होकर दिलों की झील तक बड़ी आसानी से पहुंच जाती हैं और पाठकों से अपना एक आत्मीय रिश्ता क़ायम कर लेती हैं। 


कोई जीते कोई हारे हमें क्या फ़र्क़ पड़ता है, 

हमारा दिन निकल जाता है दो रोटी कमाने में।


जो हमसे कर रहे वादे पे वादा छह महीनों से, 

उन्हें दो दिन लगेंगे जीत कर वादा भुलाने से


नए ग़ज़ल संकलन 'जुबां आतिश उगलती है' के लिए मंज़र लखनवी को बहुत-बहुत शुभकामनाएं। मुझे पूरी उम्मीद है उनकी ग़ज़लें अदब की दुनिया में अपनी ख़ास पहचान बनाएंगी। 


देवमणि पांडेय 

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फ़िल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063 , 98210 82126 


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हम हैं सूरजमुखी रात के : ग़ज़ल संग्रह

हम हैं सूरजमुखी रात के : ग़ज़ल संग्रह 

रत्नदीप खरे के ग़ज़ल संग्रह का नाम है- हम हैं सूरजमुखी रात के। रत्नदीप की ग़ज़लों में गांव का मौसम है, गांव की मिट्टी, पानी, हवा है। ऐसे देशज माहौल में उनके एहसास फूलों की तरह खिलते हैं और महकते हैं। रत्नदीप के पास हिंदी के तत्सम शब्दों की समृद्ध संपदा है। वे इस पूंजी से ग़ज़लों का गुलदस्ता सजाते हैं। इन ग़ज़लों में एक तरफ़ वक़्त की परवाज़ है और दूसरी तरफ़ रिश्तो के टूटने, बिखरने और जुड़ने की आवाज़ है- 


अभी भी माँ हिचकती ही नहीं है काम करने से 

भले ही हाथ से गिरकर कटोरा टूट जाता है


मेरी मां हो गई बूढ़ी, बना पाती न ख़ुद खाना

मगर कितना कहां लगता मसाला याद रहता है 


जिस दिन से जायदाद में हिस्सा नहीं रहा 

बेटा भी अपने बाप का बेटा नहीं रहा 


घर के बर्तन चुका रहे हैं कर्ज़ महाजन का कुछ ऐसे 

पहले लोटा निकला घर से, पीछे पीछे थाली निकली 


रत्नदीप का अपने माहौल से गहरा रिश्ता है। आसपास जो कुछ घटित हो रहा है उस पर उनकी निगाह है। ऐसे दृश्य, ऐसी घटनाएं बड़ी सहजता से उनकी रचनात्मकता के दायरे में आ जाती हैं- 


कोई जब पेड़ मरता है अकेले ही नहीं मरता

बहुत सारे परिंदों का बसेरा टूट जाता है


रियासत और मज़हब वो किराने की दुकानें हैं

जहां का माल भी महंगा, वज़न भी कम निकलता है

 

नहीं फ़ितरत बदलती है सियासत हो कि जंगल हो 

जो आदमख़ोर होता है वो आदमख़ोर होता है


रत्नदीप के यहां बाहर की दुनिया ज़्यादा है और दिल की दुनिया कम है। मगर जब भी वे दिल की गलियों में नज़र आते हैं और मुहब्बत पर कुछ कहने की पहल करते हैं तो वहां भी नया अंदाज़, नया तेवर दिखाई देता है-


महज इस बात पर दुनिया ने मुझको छोड़ रक्खा है 

कि मैंने छोड़ दी दुनिया तुम्हारे प्यार के आगे


दिशा निश्चित नहीं होती कभी फूलों की ख़ुशबू की 

ये चर्चा है मुहब्बत का ये चारों ओर होता है


रत्नदीप खरे की रचनात्मकता का कैनवास व्यापक है। उनकी ग़ज़लों में मज़हब और सियासत है तो देश और समाज के सवालात भी हैं। घर-परिवार, रिश्ते-नाते हैं तो खेत, खलिहान, प्रकृति और परिंदे भी हैं। अपनी जीवंत भाषा के दम पर वे अपनी सोच को नया लिबास पहनाने में कामयाब होते हैं। नए रंग-रूप में ढली उनकी ग़ज़लें नयापन और ताज़गी के साथ सामने आती हैं। वस्तुतः यही उनकी उपलब्धि है। इस नए ग़ज़ल संग्रह के लिए मैं रत्नदीप खरे को बधाई देता हूं। मुझे उम्मीद है कि रत्नदीप की ये किताब ग़ज़ल प्रेमियों तक पहुंचेगी और पसंद की जाएगी। 


बोधि प्रकाशन जयपुर से प्रकाशित इस ग़ज़ल संग्रह का मूल्य ₹250 है। बोधि प्रकाशन का सम्पर्क नंबर 98290 18087 है। इंदौर के मूल निवासी रत्नदीप खरे से आप 98260 43425 नम्बर पर संपर्क कर सकते हैं। 


आपका-

देवमणि पांडेय 


सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063 , 98210 82126


शुक्रवार, 17 जून 2022

सिने गीतों में देशभक्ति की भावना

 सिने गीतों में देशभक्ति की भावना 


हर इंसान के दिल में देशभक्ति का जज़्बा होता है। समय समय पर वह अपनी इन भावनाओं का इज़हार करता है। हिंदी सिनेमा में आज़ादी से पहले ऐसे कई गीत सामने आए जिन्होंने लोगों में आज़ादी के आंदोलन में शामिल होने का जोश और जज़्बा पैदा किया। ऐसे गीत सुनकर लोग जान की परवाह न करते हुए आज़ादी के आंदोलन में शरीक हो जाते थे। आज़ादी हासिल होने के बाद जब हम अमन और चैन की राह पर चल रहे थे उसी समय सन् 1962 में चीन ने हमारे देश पर आक्रमण किया। इस घटना के बाद युद्ध पर आधारित पर कई फ़िल्में बनीं। इन फ़िल्मों में देशभक्ति के ऐसे कई गीत सामने आए जिनको गाकर गुनगुना कर जनमानस आज भी अपनी देशभक्त की भावनाओं का इज़हार करता है। 


दादा साहब फाल्के ने सन् 1913 में पहली मूक फ़िल्म बनाई थी 'राजा हरिश्चंद्र'। धार्मिक और पौराणिक कथाओं से शुरुआत करनेवाला भारतीय सिनेमा तीसरे दशक में बोलती फ़िल्मों के साथ समय और समाज से जुड़ गया। 'अछूत कन्या' और 'दुनिया ना माने' जैसी सामाजिक मुद्दों पर आधारित प्रगतिशील फ़िल्मों का निर्माण हुआ। 


बीसवीं सदी के तीसरे दशक में पूरे देश में आज़ादी के आंदोलनों की लहर फैल गई थी। इन आंदोलनों के सबसे बड़े नायक थे महात्मा गांधी। अंग्रेजों के दमन चक्र को देखते हुए यह तय था कि अगर उनके ख़िलाफ़ कोई फ़िल्म बनाई जाती तो उस पर प्रतिबंध लग जाता। फिर भी हिंदी सिनेमा में देश भक्ति के बोल उस समय सुनाई पड़ने लगे जब गीतकार पं. प्रदीप का सिने जगत में पदार्पण हुआ। जहां कहीं मौक़ा मिलता था प्रदीप जी गीत के शब्दों में देशभक्ति की ख़ुशबू पिरो देते थे। 


गीतकार पं. प्रदीप ने एक बातचीत में मुझसे कहा था- "अगर मैं पांच साल पहले आता या पांच साल बाद आता तो बतौर गीतकार सिने जगत में कामयाब नहीं होता। मैं अपने साथ देश भक्ति की ख़ुशबू लेकर आया था। मेरे लिए यही सही वक़्त था कि गीतों के ज़रिए इस ख़ुशबू को जन-जन तक पहुंचाया जाए।" सिने जगत में पं. प्रदीप का आगमन सन् 1939 में हुआ। उस समय पूरे देश में सभी के दिल में यह संकल्प जाग गया था कि आज़ादी हासिल करनी है। इस माहौल को देखते हुए पं. प्रदीप ने फ़िल्म 'बंधन' (1940) में एक गीत लिखा- "चल चल रे नौजवान"। यह गीत उस समय आज़ादी के जुलूसों में और प्रभात फेरियों में गाया जाता था- 


दूर तेरा गाँव

और थके पाँव

फिर भी तू हरदम

आगे बढ़ा क़दम

रुकना तेरा काम नहीं

चलना तेरी शान

चल-चल रे नौजवान

चल-चल रे नौजवान 


सन् 1942 में महात्मा गांधी ने 'करो या मरो' का नारा दिया। इस भावना को सामने लाने के लिए पं. प्रदीप ने अपने निर्माता को समझा-बुझाकर राज़ी किया और फ़िल्म 'क़िस्मत' (1943) में एक ऐसा गीत लिखा जो आज़ादी के आंदोलन का हिस्सा बन गया- 


आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है

दूर हटो ऐ दुनिया वालो हिंदुस्तान हमारा है 


दक्षिण मुंबई के एक सिनेमा हॉल में यह फ़िल्म प्रदर्शित हुई। पर्दे पर यह गीत देखते ही सब खड़े हो गए। जोशीले नारे लगने लगे। वंस मोर की आवाज़ें बुलंद हुईं। फ़िल्म को रोक कर इस गीत को दुबारा दिखाना पड़ा। पूरे देश में इस गीत ने जनमानस में आज़ादी के प्रति अद्भुत चेतना का संचार किया। उस समय तक ऐसी बहुत सी रचनाओं पर अंग्रेजों ने प्रतिबंध लगा दिया था जिनमें विद्रोह की भावना नज़र आती थी। मगर इस गीत की भावनाओं को प्रदीप जी ने तीसरे विश्व युद्ध से जोड़ दिया इसलिए इस गीत पर प्रतिबंध नहीं लगा- 


शुरू हुआ है जंग तुम्हारा जाग उठो हिन्दुस्तानी

तुम न किसी के आगे झुकना जर्मन हो या जापानी

आज सभी के लिये हमारा ये ही क़ौमी नारा है

दूर हटो ऐ दुनिया वालो हिंदुस्तान हमारा है 


आज़ादी हासिल होने के सात साल बाद फ़िल्म 'जागृति' (1954) प्रदर्शित हुई। इस फ़िल्म में प्रदीप जी ने एक ऐसा गीत लिखा जो बच्चों के साथ ही बड़ों को भी अपने अतीत के गौरव और देश के सपूतों की बलिदान गाथा से अवगत कराता है। हमारे मन में स्वाभिमान जगाता है-


आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं झांकी हिंदुस्तान की

इस मिट्टी से तिलक करो यह धरती है बलिदान की 


ग़ौरतलब बात यह है इस गीत में महाराणा प्रताप हैं, शिवाजी हैं, सुभाष चंद्र बोस हैं और जालियांवाला बाग़ भी है- 


जलियाँवाला बाग़ ये देखो, यहीं चली थी गोलियाँ

ये मत पूछो किसने खेली यहाँ ख़ून की होलियाँ

एक तरफ़ बंदूकें दन-दन, एक तरफ़ थी टोलियाँ

मरने वाले बोल रहे थे इंक़लाब की बोलियाँ

यहाँ लगा दी बहनों ने भी बाज़ी अपनी जान की

इस मिट्टी से तिलक करो... 


फ़िल्म 'जागृति' (1954) में पं. प्रदीप का एक और उल्लेखनीय गीत गांधी जी पर है- 


दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल 

आँधी में भी जलती रही गाँधी तेरी मशाल

साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल ... 


इस गीत में निहित भावनाएं भारत की जनता में देशभक्ति की भावना जगाती हैं। महात्मा गांधी के नेतृत्व में लड़े गए आज़ादी के आंदोलन की झांकी दिखाती हैं- 


जब जब तेरा बिगुल बजा जवान चल पड़े मज़दूर चल पड़े थे और किसान चल पड़े 

हिंदू और मुसलमान, सिख, पठान चल पड़े कदमों में तेरी कोटि कोटि प्राण चल पड़े 

फूलों की सेज छोड़ के दौड़े जवाहरलाल साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल ... 


'जागृति' फ़िल्म के गीतों ने तत्कालीन माहौल में देशभक्ति का संचार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस फ़िल्म का एक और गीत आज भी लोगों के लिए प्रेरणा स्रोत बना हुआ है- 


हम लाए हैं तूफ़ान से कश्ती निकाल के

इस देश को रखना मेरे बच्चों सम्भाल के 


देखो कहीं बरबाद ना होए ये बगीचा

इसको हृदय के ख़ून से बापू ने है सींचा

रक्खा है ये चिराग़ शहीदों ने बाल के

इस देश को रखना मेरे बच्चों सम्भाल के ... 


सन् 1962 के भारत चीन युद्ध के बाद देश के अमर शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए दिल्ली में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया। पं. प्रदीप ने इस कार्यक्रम के लिए एक हृदयस्पर्शी गीत लिखा- 


ऐ मेरे वतन के लोगो ज़रा आंख में भर लो पानी

जो शहीद हुए हैं उनकी ज़रा याद करो क़ुर्बानी 


यह गीत सी. रामचंद्र ने संगीतबद्ध किया। चीनी युद्ध में मारे गए शहीदों की स्मृति में दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में जब लता मंगेशकर ने यह गीत गाया तो तत्कालीन प्रधान मंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू की आंखें छलक पड़ी थीं। यह मार्मिक गीत अमर शहीदों के प्रति हमारी हार्दिक श्रद्धांजलि है। हिंद की सेना की गौरव गाथा है। यह गीत हमारे मन में सैनिकों के प्रति आदर और सम्मान जगाता है। 


सन् 1962 के भारत चीन युद्ध के बाद देशभक्ति से परिपूर्ण कई ऐसी फ़िल्में बनीं जिनमें भारतीय सैनिकों की शौर्य गाथा को प्रस्तुत किया गया। फ़िल्म 'हक़ीकत' (1964) में कैफ़ी आज़मी का गीत "कर चले हम फ़िदा जान-ओ-तन साथियो" बेहद लोकप्रिय हुआ। कैफ़ी आज़मी के शब्द, मुहम्मद रफ़ी की आवाज़ और मदन मोहन के दिलकश संगीत से सजे इस गीत को सुनकर आज भी हम देशभक्ति के जज़्बे से लबरेज़ हो जाते हैं। 


 कर चले हम फ़िदा जान-ओ-तन साथियो

अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों 

 

साँस थमती गई नब्ज़ जमती गई 

फिर भी बढ़ते कदम को न रुकने दिया 

कट गये सर हमारे तो कुछ ग़म नहीं 

सर हिमालय का हमने न झुकने दिया 

मरते मरते रहा बाँकपन साथियों 


इस प्रसंग में एक और गीत का है ज़िक्र ज़रूरी है। "वतन की आबरू ख़तरे में है" ... यह गीत साहिर लुधियानवी ने सन् 1962 में भारत चीन युद्ध के दौरान लिखा था। यह किसी फ़िल्म में शामिल नहीं है। संगीतकार ख़य्याम ने इसे संगीतबद्ध किया। मोहम्मद रफ़ी ने गाया। इसे दिलीप कुमार, राजेंद्र कुमार, राज कुमार और उनके साथियों पर फ़िल्माया गया। फ़िल्म डिवीज़न की ओर से जनता को जागरूक करने के लिए इसे हिंदुस्तान के ग्रामीण इलाक़ों में प्रमुखता से दिखाया गया। यह गीत बहुत लोकप्रिय हुआ- 


वतन की आबरू खतरे में है, हुशियार हो जाओ

हमारे इम्तहां का वक़्त है, तैयार हो जाओ 


हमारी सरहदों पर ख़ून बहता हैं जवानों का

हुआ जाता है दिल छलनी हिमाला की चट्टानों का

उठो रुख़ फेर दो दुश्मन की तोपों के दहानों का

वतन की सरहदों पर आहनी दीवार हो जाओ

वतन की आबरू खतरे में है, हुशियार हो जाओ 


फ़िल्म 'नया दौर' (1957) यूं तो युद्ध पर आधारित फ़िल्म नहीं है मगर इसमें साहिर का लिखा हुआ एक गीत लोगों में उमंग और जोश का संचार कर देता है- 


ये देश है वीर जवानों का

अलबेलों का मस्तानों का

इस देश का यारो क्या कहना

ये देश है दुनिया का गहना ... 


दिलबर के लिए दिलदार हैं हम

दुश्मन के लिए तलवार हैं हम

मैदां में अगर हम डट जाएं

मुश्किल है के पीछे हट जाएं ... 


अभिनेता मनोज कुमार ने उस दौर में देशभक्ति पर आधारित ऐसी फ़िल्में बनाईं कि उनको भारत कुमार कहा जाने लगा। मनोज कुमार ने आज़ादी के आंदोलन में क्रांतिकारी भूमिका निभाने वाले सेनानियों और शहीदों की गौरव गाथा को इस तरह गीतों में शामिल किया कि वे जन भावनाओं से जुड़ गए। आज भी लोग गीतकार गुलशन बावरा ने फ़िल्म 'उपकार' (1967) के लिए देशप्रेम का एक अद्भुत गीत लिखा। आज भी लोग यह गीत झूम झूम कर गाते हैं- 


मेरे देश की धरती सोना उगले,

उगले हीरे मोती,

मेरे देश की धरती । 


ये बाग़ हैं गौतम नानक का,

खिलते हैं अमन के फूल यहाँ,

गांधी सुभाष टैगोर तिलक,

ऐसे हैं चमन के फूल यहाँ ।

रंग हरा हरिसिंह नलवे से,

रंग लाल है लाल बहादुर से,

रंग बना बसंती भगतसिंह,

रंग अमन का वीर जवाहर से । 


मेरे देश की धरती सोना उगले,

उगले हीरे मोती,

मेरे देश की धरती । 


स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त और गणतंत्र दिवस 26 जनवरी ये वो शुभ दिन हैं जब देश के कोने कोने में देशभक्ति के तराने गूंजने लगते हैं। इन गीतों के ज़रिए हमारा देश अपने देशवासियों की धडकनों के साथ जुड़ जाता है। पेश हैं कुछ और सिने गीत जो देशभक्ति की सूची में प्रमुखता से शामिल किए जाते हैं- 


ऐ मेरे प्यारे वतन- फ़िल्म 'काबुलीवाला' (1961) 


छोड़ो कल की बातें- फ़िल्म 'हम हिंदुस्तानी' (1961) 


मेरा रंग दे बसंती चोला : फ़िल्म 'शहीद' (1965) 


है प्रीत जहां की रीत सदा- फ़िल्म 'पूरब और पश्चिम' (1970) 


दिल दिया है जां भी देंगे- फ़िल्म 'कर्मा' (1986) 


ये जो देश है मेरा- फ़िल्म 'स्वदेश' (2004) 


सिनेमा अपने समय और समाज के साथ क़दम मिलाते हुए आगे बढ़ता है। देशभक्ति ऐसा जज़्बा है जो हमेशा क़ायम रहता है। इसलिए इतिहास की किताबों से कोई चरित्र उठाकर जब उसकी शौर्य गाथा को फ़िल्म के रूप में ढाल दिया जाता है तो जनता ऐसी फ़िल्मों को पसंद करती है। ऐसी फ़िल्मों में फिर कोई देशभक्ति का ऐसा गीत आ जाता है जो जन भावनाओं का प्रतिनिधित्व करने लगता है। फ़िल्म 'केसरी' (2019) में ऐसा ही एक गीत है- "तेरी मिट्टी में मिल जावां।" इस गीत ने देश विदेश में लोकप्रियता का नया कीर्तिमान स्थापित किया। 


सिने गीतों में देशभक्ति का यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा। देशभक्ति की भावना हर दौर में हर पीढ़ी में मौजूद रहती है। हर इंसान अपने देश की मिट्टी, हवा, पानी और अतीत की गौरव गाथा से प्रेम करता है। देश भक्ति के कई ग़ैर फ़िल्मी तराने भी जनता के बीच लोकप्रिय हैं मगर सिने गीतों ने हर दौर में लोकप्रियता का इतिहास रचा है। शब्द के साथ जब अच्छा संगीत, अच्छी धुन और अच्छी गायकी शामिल हो जाती है तो गीत की ताक़त कई गुना बढ़ जाती है। ऐसे गीत हमेशा के लिए हमारे एहसास और जज़्बात का हिस्सा बन जाते हैं। हमें ऐसे क़लमकारों का आभार व्यक्त करना चाहिए जिनके शब्द महानगरों से लेकर गांव तक गूंज रहे हैं और जनमानस में देशभक्ति का संचार कर रहे हैं। 


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देवमणि पांडेय :

बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, M: 98210 82126