शुक्रवार, 17 जून 2022

सिने गीतों में देशभक्ति की भावना

 सिने गीतों में देशभक्ति की भावना 


हर इंसान के दिल में देशभक्ति का जज़्बा होता है। समय समय पर वह अपनी इन भावनाओं का इज़हार करता है। हिंदी सिनेमा में आज़ादी से पहले ऐसे कई गीत सामने आए जिन्होंने लोगों में आज़ादी के आंदोलन में शामिल होने का जोश और जज़्बा पैदा किया। ऐसे गीत सुनकर लोग जान की परवाह न करते हुए आज़ादी के आंदोलन में शरीक हो जाते थे। आज़ादी हासिल होने के बाद जब हम अमन और चैन की राह पर चल रहे थे उसी समय सन् 1962 में चीन ने हमारे देश पर आक्रमण किया। इस घटना के बाद युद्ध पर आधारित पर कई फ़िल्में बनीं। इन फ़िल्मों में देशभक्ति के ऐसे कई गीत सामने आए जिनको गाकर गुनगुना कर जनमानस आज भी अपनी देशभक्त की भावनाओं का इज़हार करता है। 


दादा साहब फाल्के ने सन् 1913 में पहली मूक फ़िल्म बनाई थी 'राजा हरिश्चंद्र'। धार्मिक और पौराणिक कथाओं से शुरुआत करनेवाला भारतीय सिनेमा तीसरे दशक में बोलती फ़िल्मों के साथ समय और समाज से जुड़ गया। 'अछूत कन्या' और 'दुनिया ना माने' जैसी सामाजिक मुद्दों पर आधारित प्रगतिशील फ़िल्मों का निर्माण हुआ। 


बीसवीं सदी के तीसरे दशक में पूरे देश में आज़ादी के आंदोलनों की लहर फैल गई थी। इन आंदोलनों के सबसे बड़े नायक थे महात्मा गांधी। अंग्रेजों के दमन चक्र को देखते हुए यह तय था कि अगर उनके ख़िलाफ़ कोई फ़िल्म बनाई जाती तो उस पर प्रतिबंध लग जाता। फिर भी हिंदी सिनेमा में देश भक्ति के बोल उस समय सुनाई पड़ने लगे जब गीतकार पं. प्रदीप का सिने जगत में पदार्पण हुआ। जहां कहीं मौक़ा मिलता था प्रदीप जी गीत के शब्दों में देशभक्ति की ख़ुशबू पिरो देते थे। 


गीतकार पं. प्रदीप ने एक बातचीत में मुझसे कहा था- "अगर मैं पांच साल पहले आता या पांच साल बाद आता तो बतौर गीतकार सिने जगत में कामयाब नहीं होता। मैं अपने साथ देश भक्ति की ख़ुशबू लेकर आया था। मेरे लिए यही सही वक़्त था कि गीतों के ज़रिए इस ख़ुशबू को जन-जन तक पहुंचाया जाए।" सिने जगत में पं. प्रदीप का आगमन सन् 1939 में हुआ। उस समय पूरे देश में सभी के दिल में यह संकल्प जाग गया था कि आज़ादी हासिल करनी है। इस माहौल को देखते हुए पं. प्रदीप ने फ़िल्म 'बंधन' (1940) में एक गीत लिखा- "चल चल रे नौजवान"। यह गीत उस समय आज़ादी के जुलूसों में और प्रभात फेरियों में गाया जाता था- 


दूर तेरा गाँव

और थके पाँव

फिर भी तू हरदम

आगे बढ़ा क़दम

रुकना तेरा काम नहीं

चलना तेरी शान

चल-चल रे नौजवान

चल-चल रे नौजवान 


सन् 1942 में महात्मा गांधी ने 'करो या मरो' का नारा दिया। इस भावना को सामने लाने के लिए पं. प्रदीप ने अपने निर्माता को समझा-बुझाकर राज़ी किया और फ़िल्म 'क़िस्मत' (1943) में एक ऐसा गीत लिखा जो आज़ादी के आंदोलन का हिस्सा बन गया- 


आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है

दूर हटो ऐ दुनिया वालो हिंदुस्तान हमारा है 


दक्षिण मुंबई के एक सिनेमा हॉल में यह फ़िल्म प्रदर्शित हुई। पर्दे पर यह गीत देखते ही सब खड़े हो गए। जोशीले नारे लगने लगे। वंस मोर की आवाज़ें बुलंद हुईं। फ़िल्म को रोक कर इस गीत को दुबारा दिखाना पड़ा। पूरे देश में इस गीत ने जनमानस में आज़ादी के प्रति अद्भुत चेतना का संचार किया। उस समय तक ऐसी बहुत सी रचनाओं पर अंग्रेजों ने प्रतिबंध लगा दिया था जिनमें विद्रोह की भावना नज़र आती थी। मगर इस गीत की भावनाओं को प्रदीप जी ने तीसरे विश्व युद्ध से जोड़ दिया इसलिए इस गीत पर प्रतिबंध नहीं लगा- 


शुरू हुआ है जंग तुम्हारा जाग उठो हिन्दुस्तानी

तुम न किसी के आगे झुकना जर्मन हो या जापानी

आज सभी के लिये हमारा ये ही क़ौमी नारा है

दूर हटो ऐ दुनिया वालो हिंदुस्तान हमारा है 


आज़ादी हासिल होने के सात साल बाद फ़िल्म 'जागृति' (1954) प्रदर्शित हुई। इस फ़िल्म में प्रदीप जी ने एक ऐसा गीत लिखा जो बच्चों के साथ ही बड़ों को भी अपने अतीत के गौरव और देश के सपूतों की बलिदान गाथा से अवगत कराता है। हमारे मन में स्वाभिमान जगाता है-


आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं झांकी हिंदुस्तान की

इस मिट्टी से तिलक करो यह धरती है बलिदान की 


ग़ौरतलब बात यह है इस गीत में महाराणा प्रताप हैं, शिवाजी हैं, सुभाष चंद्र बोस हैं और जालियांवाला बाग़ भी है- 


जलियाँवाला बाग़ ये देखो, यहीं चली थी गोलियाँ

ये मत पूछो किसने खेली यहाँ ख़ून की होलियाँ

एक तरफ़ बंदूकें दन-दन, एक तरफ़ थी टोलियाँ

मरने वाले बोल रहे थे इंक़लाब की बोलियाँ

यहाँ लगा दी बहनों ने भी बाज़ी अपनी जान की

इस मिट्टी से तिलक करो... 


फ़िल्म 'जागृति' (1954) में पं. प्रदीप का एक और उल्लेखनीय गीत गांधी जी पर है- 


दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल 

आँधी में भी जलती रही गाँधी तेरी मशाल

साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल ... 


इस गीत में निहित भावनाएं भारत की जनता में देशभक्ति की भावना जगाती हैं। महात्मा गांधी के नेतृत्व में लड़े गए आज़ादी के आंदोलन की झांकी दिखाती हैं- 


जब जब तेरा बिगुल बजा जवान चल पड़े मज़दूर चल पड़े थे और किसान चल पड़े 

हिंदू और मुसलमान, सिख, पठान चल पड़े कदमों में तेरी कोटि कोटि प्राण चल पड़े 

फूलों की सेज छोड़ के दौड़े जवाहरलाल साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल ... 


'जागृति' फ़िल्म के गीतों ने तत्कालीन माहौल में देशभक्ति का संचार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस फ़िल्म का एक और गीत आज भी लोगों के लिए प्रेरणा स्रोत बना हुआ है- 


हम लाए हैं तूफ़ान से कश्ती निकाल के

इस देश को रखना मेरे बच्चों सम्भाल के 


देखो कहीं बरबाद ना होए ये बगीचा

इसको हृदय के ख़ून से बापू ने है सींचा

रक्खा है ये चिराग़ शहीदों ने बाल के

इस देश को रखना मेरे बच्चों सम्भाल के ... 


सन् 1962 के भारत चीन युद्ध के बाद देश के अमर शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए दिल्ली में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया। पं. प्रदीप ने इस कार्यक्रम के लिए एक हृदयस्पर्शी गीत लिखा- 


ऐ मेरे वतन के लोगो ज़रा आंख में भर लो पानी

जो शहीद हुए हैं उनकी ज़रा याद करो क़ुर्बानी 


यह गीत सी. रामचंद्र ने संगीतबद्ध किया। चीनी युद्ध में मारे गए शहीदों की स्मृति में दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में जब लता मंगेशकर ने यह गीत गाया तो तत्कालीन प्रधान मंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू की आंखें छलक पड़ी थीं। यह मार्मिक गीत अमर शहीदों के प्रति हमारी हार्दिक श्रद्धांजलि है। हिंद की सेना की गौरव गाथा है। यह गीत हमारे मन में सैनिकों के प्रति आदर और सम्मान जगाता है। 


सन् 1962 के भारत चीन युद्ध के बाद देशभक्ति से परिपूर्ण कई ऐसी फ़िल्में बनीं जिनमें भारतीय सैनिकों की शौर्य गाथा को प्रस्तुत किया गया। फ़िल्म 'हक़ीकत' (1964) में कैफ़ी आज़मी का गीत "कर चले हम फ़िदा जान-ओ-तन साथियो" बेहद लोकप्रिय हुआ। कैफ़ी आज़मी के शब्द, मुहम्मद रफ़ी की आवाज़ और मदन मोहन के दिलकश संगीत से सजे इस गीत को सुनकर आज भी हम देशभक्ति के जज़्बे से लबरेज़ हो जाते हैं। 


 कर चले हम फ़िदा जान-ओ-तन साथियो

अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों 

 

साँस थमती गई नब्ज़ जमती गई 

फिर भी बढ़ते कदम को न रुकने दिया 

कट गये सर हमारे तो कुछ ग़म नहीं 

सर हिमालय का हमने न झुकने दिया 

मरते मरते रहा बाँकपन साथियों 


इस प्रसंग में एक और गीत का है ज़िक्र ज़रूरी है। "वतन की आबरू ख़तरे में है" ... यह गीत साहिर लुधियानवी ने सन् 1962 में भारत चीन युद्ध के दौरान लिखा था। यह किसी फ़िल्म में शामिल नहीं है। संगीतकार ख़य्याम ने इसे संगीतबद्ध किया। मोहम्मद रफ़ी ने गाया। इसे दिलीप कुमार, राजेंद्र कुमार, राज कुमार और उनके साथियों पर फ़िल्माया गया। फ़िल्म डिवीज़न की ओर से जनता को जागरूक करने के लिए इसे हिंदुस्तान के ग्रामीण इलाक़ों में प्रमुखता से दिखाया गया। यह गीत बहुत लोकप्रिय हुआ- 


वतन की आबरू खतरे में है, हुशियार हो जाओ

हमारे इम्तहां का वक़्त है, तैयार हो जाओ 


हमारी सरहदों पर ख़ून बहता हैं जवानों का

हुआ जाता है दिल छलनी हिमाला की चट्टानों का

उठो रुख़ फेर दो दुश्मन की तोपों के दहानों का

वतन की सरहदों पर आहनी दीवार हो जाओ

वतन की आबरू खतरे में है, हुशियार हो जाओ 


फ़िल्म 'नया दौर' (1957) यूं तो युद्ध पर आधारित फ़िल्म नहीं है मगर इसमें साहिर का लिखा हुआ एक गीत लोगों में उमंग और जोश का संचार कर देता है- 


ये देश है वीर जवानों का

अलबेलों का मस्तानों का

इस देश का यारो क्या कहना

ये देश है दुनिया का गहना ... 


दिलबर के लिए दिलदार हैं हम

दुश्मन के लिए तलवार हैं हम

मैदां में अगर हम डट जाएं

मुश्किल है के पीछे हट जाएं ... 


अभिनेता मनोज कुमार ने उस दौर में देशभक्ति पर आधारित ऐसी फ़िल्में बनाईं कि उनको भारत कुमार कहा जाने लगा। मनोज कुमार ने आज़ादी के आंदोलन में क्रांतिकारी भूमिका निभाने वाले सेनानियों और शहीदों की गौरव गाथा को इस तरह गीतों में शामिल किया कि वे जन भावनाओं से जुड़ गए। आज भी लोग गीतकार गुलशन बावरा ने फ़िल्म 'उपकार' (1967) के लिए देशप्रेम का एक अद्भुत गीत लिखा। आज भी लोग यह गीत झूम झूम कर गाते हैं- 


मेरे देश की धरती सोना उगले,

उगले हीरे मोती,

मेरे देश की धरती । 


ये बाग़ हैं गौतम नानक का,

खिलते हैं अमन के फूल यहाँ,

गांधी सुभाष टैगोर तिलक,

ऐसे हैं चमन के फूल यहाँ ।

रंग हरा हरिसिंह नलवे से,

रंग लाल है लाल बहादुर से,

रंग बना बसंती भगतसिंह,

रंग अमन का वीर जवाहर से । 


मेरे देश की धरती सोना उगले,

उगले हीरे मोती,

मेरे देश की धरती । 


स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त और गणतंत्र दिवस 26 जनवरी ये वो शुभ दिन हैं जब देश के कोने कोने में देशभक्ति के तराने गूंजने लगते हैं। इन गीतों के ज़रिए हमारा देश अपने देशवासियों की धडकनों के साथ जुड़ जाता है। पेश हैं कुछ और सिने गीत जो देशभक्ति की सूची में प्रमुखता से शामिल किए जाते हैं- 


ऐ मेरे प्यारे वतन- फ़िल्म 'काबुलीवाला' (1961) 


छोड़ो कल की बातें- फ़िल्म 'हम हिंदुस्तानी' (1961) 


मेरा रंग दे बसंती चोला : फ़िल्म 'शहीद' (1965) 


है प्रीत जहां की रीत सदा- फ़िल्म 'पूरब और पश्चिम' (1970) 


दिल दिया है जां भी देंगे- फ़िल्म 'कर्मा' (1986) 


ये जो देश है मेरा- फ़िल्म 'स्वदेश' (2004) 


सिनेमा अपने समय और समाज के साथ क़दम मिलाते हुए आगे बढ़ता है। देशभक्ति ऐसा जज़्बा है जो हमेशा क़ायम रहता है। इसलिए इतिहास की किताबों से कोई चरित्र उठाकर जब उसकी शौर्य गाथा को फ़िल्म के रूप में ढाल दिया जाता है तो जनता ऐसी फ़िल्मों को पसंद करती है। ऐसी फ़िल्मों में फिर कोई देशभक्ति का ऐसा गीत आ जाता है जो जन भावनाओं का प्रतिनिधित्व करने लगता है। फ़िल्म 'केसरी' (2019) में ऐसा ही एक गीत है- "तेरी मिट्टी में मिल जावां।" इस गीत ने देश विदेश में लोकप्रियता का नया कीर्तिमान स्थापित किया। 


सिने गीतों में देशभक्ति का यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा। देशभक्ति की भावना हर दौर में हर पीढ़ी में मौजूद रहती है। हर इंसान अपने देश की मिट्टी, हवा, पानी और अतीत की गौरव गाथा से प्रेम करता है। देश भक्ति के कई ग़ैर फ़िल्मी तराने भी जनता के बीच लोकप्रिय हैं मगर सिने गीतों ने हर दौर में लोकप्रियता का इतिहास रचा है। शब्द के साथ जब अच्छा संगीत, अच्छी धुन और अच्छी गायकी शामिल हो जाती है तो गीत की ताक़त कई गुना बढ़ जाती है। ऐसे गीत हमेशा के लिए हमारे एहसास और जज़्बात का हिस्सा बन जाते हैं। हमें ऐसे क़लमकारों का आभार व्यक्त करना चाहिए जिनके शब्द महानगरों से लेकर गांव तक गूंज रहे हैं और जनमानस में देशभक्ति का संचार कर रहे हैं। 


▪️▪️▪️ 


देवमणि पांडेय :

बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, M: 98210 82126


रविवार, 17 अप्रैल 2022

गीतकार पं. किरण मिश्र : स्मृति को सादर नमन

 
गीतकार पं. किरण मिश्र : स्मृति को सादर नमन 

भक्ति गीतों और नवगीतों के लिए मशहूर गीतकार पं. किरण मिश्र का 16 अप्रैल 2021 को कोरोना से संक्रमित होने के कारण मुम्बई में निधन हो गया था। अपने नवगीतों के लिए साहित्य क्षेत्र में कई पुरस्कार और सम्मान से अलंकृत पं. किरण मिश्र ने कई धारावाहिकों और फ़िल्मों के लिए गीत लिखे थे। बी आर चोपड़ा के धारावाहिक महाभारत का समापन गीत उन्होंने ही लिखा था। संपूर्ण रामायण का 20 खंडों में उन्होंने संकलन किया था। इसके लिए पूर्व राष्ट्रपति डॉ शंकर दयाल शर्मा के कर कमलों से उन्हें सम्मानित किया गया था। 

5 जुलाई 1953 को अयोध्या में जन्मे पं. किरण मिश्र ने सिनेमा, सीरियल और संगीत के विविध अलबमों के लिए 250 से अधिक गीत लिखे। उनके गीतों को लता मंगेशकर, आशा भोंसले, ऊषा मंगेशकर, जगजीत सिंह, अनूप जलोटा, हरिओम शरण, उदित नारायण, सुरेश वाडेकर, सोनू निगम, आदि प्रतिष्ठित गायकों ने अपनी आवाज़ दी। उनको देश विदेश की अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं ने पुरस्कृत एवं सम्मानित किया। गीत विधा में विशिष्ट योगदान के लिए सन् 2020 में उन्हें थाईलैंड में सम्मानित किया गया था। 

पं. किरण मिश्र के छ: काव्य संग्रह प्रकाशित हुए- (1) चुंबक है आदमी, (2) मजीरा, (3) चंद्रबिम्ब, (4) कम्पन धरती, (5) अवधी बयार (6) पंछी भयभीत हैं। नवगीत संग्रह 'कंपन करती धरती' के लिए महाराष्ट्र हिंदी साहित्य अकादमी ने उनको संत नामदेव पुरस्कार प्रदान किया। नवगीत संग्रह 'चुंबक है आदमी 'के लिए पं. किरण मिश्र को घनश्यामदास सराफ साहित्य पुरस्कार प्राप्त हुआ। अवधी साहित्य संस्थान फैज़ाबाद से सम्मान के अलावा अवधी विकास संस्थान लखनऊ ने 'अवधी बयार' काव्य संग्रह के लिए उन्हें अवधी गौरव सम्मान से सम्मानित किया। 

पं. किरण मिश्र के पिता पं. दिनेश मिश्र लोकप्रिय कवि और कनक भवन अयोध्या के आचार्य थे। कवि दिनेश जी की कई भक्ति रचनाएं अनूप जलोटा के अलबम में शामिल हैं। मुंबई आने से पहले पं. किरण मिश्र गोरखपुर विश्वविद्यालय के ललित कला विभाग में प्रवक्ता थे। मुंबई में भी कई बार उनके चित्रों की प्रदर्शनी आयोजित हुई। उनसे चित्रकला सीखने वाले शिष्यों की संख्या भी काफ़ी है। उनके एक लोकगीत से हास्य कवि शैल चतुर्वेदी इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उस पर सरयू तीरे नाम से अवधी फ़िल्म बनाई। 

पं. किरण मिश्र के गीत तो अच्छे थे ही उनका तरन्नुम भी आकर्षक और दमदार था। सन् 1984 में मुंबई आने पर मैंने पहली बार उन्हें खालसा कालेज के हिंदी कवि सम्मेलन में सुना था। कवि सम्मेलन की समाप्ति पर मैंने उन्हें बधाई दी। उन्होंने मुझे अपना विजिटिंग कार्ड दिया और घर बुलाया। उनके इस स्नेह निमंत्रण पर मैं उनके घर गया। तब से लगातार उनसे मेरी दोस्ती क़ायम रही। वे अजातशत्रु थे। उनका कोई दुश्मन नहीं था। उनकी जीवन संगिनी स्व. उषा मिश्र भी बेहद विनम्र और स्नेही महिला थीं। लैंड लाइन के ज़माने में कई संघर्षरत कलाकार, संगीतकार और गायक बिना फ़ोन किए उनके यहां अचानक आ जाते थे। पति-पत्नी उनकी भरपूर ख़ातिर करते थे। पत्नी के स्वर्गवास के बाद सुपुत्र स्वदेश मिश्र और सुपुत्री स्मिता मिश्रा ने उनका भरपूर ख़याल रखा। अपने इस भरे पूरे परिवार के कारण उन्होंने कभी ख़ुद को अकेला महसूस नहीं किया। मिलनसार स्वभाव के कारण पं. किरण मिश्र अपने गोकुलधाम मोहल्ले में भी बहुत लोकप्रिय थे। यहां के लोग उनका बहुत सम्मान करते थे। अपने पीछे पं. किरण मिश्र गीतों की जो खुशबू छोड़ गए हैं उसकी सुगंध हमेशा महसूस की जाती रहेगी। उनकी पावन स्थिति को सादर नमन। 


आपका- 

देवमणि पांडेय

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, 

कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड, 

गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210 82126

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2022

अपराजिता गार्गी: निरूपमा श्रीवास्तव का महाकाव्य

 


अपराजिता गार्गी: निरूपमा श्रीवास्तव का महाकाव्य

वैदिक काल में हमारे देश में ऐसी प्रतिभासम्पन्न विदुषी नारियां हुई हैं जिनके ज्ञान के आलोक से आज भी हमारे समाज और संस्कृति का अंतर्मन आलोकित हो रहा है।  ऐ्सी ही  एक परम विदुषी और अध्यात्मवेत्ता नारी का नाम है गार्गी। महर्षि वच्कनु की सुपुत्री वाच्कन्वी का जन्म गर्ग गोत्र में हुआ था। इसलिए वे गार्गी के नाम से प्रसिद्ध हुईं। गार्गी वाच्कन्वी का जन्मकाल ईसा से लगभग 700 वर्ष पूर्व माना जाता है। गार्गी वैदिक साहित्य में निष्णात एक महान दार्शनिक और वेदों की व्याख्याता थीं। ब्रह्मविद्या की ज्ञाता होने के नाते उन्हें ब्रह्मवादिनी के नाम से भी जाना जाता है। युवावस्था से ही गार्गी को वैदिक ग्रंथों और दर्शन में गहरी रूचि थी। 

बृहदारण्यक में यह जानकारी मिलती है कि गार्गी ने मिथिला के महाराज आदि जनक द्वारा आयोजित एक उच्च कोटि के शास्त्रार्थ में भाग लिया था। सैकड़ों विद्वानों की उपस्थिति में उन्होंने आत्मा और ब्रह्म के विषय पर ऋषि याज्ञवल्क्य से कई अदभुत प्रश्न पूछे थे। इस शास्त्रार्थ से गार्गी के विद्वता की चारों दिशाओं में चर्चा हुई। गार्गी के पिता के अनुरोध पर ऋषि याज्ञवल्क्य ने तीसरी पत्नी के रूप में उनका वरण किया। ऋषि की पहली पत्नी कात्यायनी और दूसरी पत्नी विदुषी मैत्रेयी थीं। कहा जाता है कि गार्गी आजन्म ब्रह्मचारिणी रहीं। उन्होंने ऐसे गुरुकुलों की स्थापना की जिसमें कन्याओं को शिक्षा दी जाती थी। एक प्रकार से वे भारतीय समाज में कन्या शिक्षा की प्रणेता हैं।

विद्वता से परिपूर्ण गार्गी के विराट व्यक्तित्व पर प्रतिष्ठित कवयित्री निरूपमा श्रीवास्तव ने महाकाव्य का सृजन किया है। इस महाकाव्य को उन्होंने दस अध्याय में प्रस्तुत करके गार्गी के प्रखर व्यक्तित्व को रोचक तरीके से सामने रखा है। महाकाव्य की शुरुआत में ही वे नारी शक्ति का जयघोष कर देती हैं-

युग युगांतरों से नारी ने जग का अप्रतिम  रूप सँवारा

जननी,भार्या,बेटी,बहना, बनकर करती है उजियारा

 

सृष्टि न होती सत्य सुन्दरम् अमृत सम नारी न होती 

पीड़ा सह कर सृजनशिल्प कर तन मन धन वारी न होती

गर्ग वंश के ऋषि वच्कनु ने बचपन से ही सुपुत्री गार्गी को ललित कला, संगीत, वेद और उपनिषद की शिक्षा देनी शुरू कर दी थी। इन सभी के योग से गार्गी का उज्जवल दैदीप्यमान व्यक्तित्व निर्मित हुआ। निरूपमा ने इस व्यक्तित्व का बड़ा सुंदर वर्णन किया है-

तन्वंगी गार्गी अति कोमल लतिका सी थी  तरुणाई

चंद्ररश्मि सी शीतल पावन ज्योतिर्मय काया पाई

 

कटिचुम्बित थे केश मेघ से रवि प्रकाश सी दीप्त अजा

श्वेत कमल से नयन निष्कलुष वाणी ज्यों संगीत बजा

ऋषि और दार्शनिक याज्ञवल्क्य वैदिक साहित्य में शुक्ल यजुर्वेद की वाजसेनीय शाखा के दृष्टा थे। आचार्य उद्दालक आरुणि के शिष्य याज्ञवल्क्य शतपथ ब्राह्मण की रचना के लिए जाने जाते हैं। ब्रह्मतत्व सर्वोपरि है, यह उनकी स्थापना है। वे अपने समय के सर्वोच्च वैदिक ज्ञानी थे। यही कारण है कि आदि जनक के आमंत्रण पर ऋषि याज्ञवल्क्य जब शास्त्रार्थ के लिए पधारे तो उनका सामना करने का किसी को साहस नहीं हुआ। 

 ज्ञान की आभा से दीप्त याज्ञवल्क्य से जब कोई शास्त्रार्थ के लिए तैयार नहीं हुआ तब अंत में गार्गी ने उनसे ब्रह्म और आत्मा के बारे में लगातार कई सवाल पूछे। कहा जाता है कि गार्गी के सवालों से परेशान याज्ञवल्क्य ने यहां तक कह दिया था कि गार्गी अगर तुमने अगला सवाल पूछा तो तुम्हारा मस्तक फट जाएगा। इस शास्त्रार्थ का कवयित्री निरूपमा ने अपने इस महाकाव्य में बड़ा जीवंत वर्णन किया है-

गार्गी ने पूछा- स्वर्ग लोक से भी परे कुछ और है

पृथ्वी के तल में कुछ तो है और मध्य में क्या छोर है

 

और जो हुआ जो होना है वह ओतप्रोत हुआ कहाँ

ब्रह्मलोक किसके है अधीन यह प्रश्न बतलाए जहाँ

 

 ऋषि बोले -

उसका ही अनुशासन प्रशासन कर रहा जग प्राप्त है

सम्पूर्ण जग में है सकल उसके ही  अंदर व्याप्त है

 

गार्गी हुई संतुष्ट सुन  ब्रह्मांड है जिसके अधीन

ऋषिवर ने था उत्तर दिया हर प्रश्न का ही समाचीन

अंत में ऋषि याज्ञवल्क्य ने उन्हें वेदांत तत्व का ज्ञान दिया तो गार्गी संतुष्ट हुई। उपस्थित जनसमूह गार्गी के विशद ज्ञान से अभिभूत हो गया। चारों ओर उनकी जयजयकार होने लगी।

इस महाकाव्य में निरूपमा ने ऋषि याज्ञवल्क्य की पत्नियों कात्यायनी और मैत्रेयी के आदर्श चरित्र का भी कुशलता से निरूपण किया है। यह महाकाव्य प्राचीन भारत में नारियों की विद्वता और अस्मिता की गौरवपूर्ण झांकी प्रस्तुत करता है। अपने उदात्त विषय, सरल छंद, सहज प्रवाह और सरस भाषा के साथ पाठकों को एक आत्मीय धागे में बांध लेता है। यह महाकाव्य धर्म और संस्कृति की निर्मल ज्योति से आज के समाज को प्रकाशित करने की सामर्थ्य रखता है। 

कवयित्री निरूपमा श्रीवास्तव के अध्ययन, चिंतन और शोध पर आधारित यह महाकाव्य अपनी सृजनात्मक आभा से हमारे अंतर्मन को समृद्ध करता है। आशा है कि गार्गी के तेजस्वी व्यक्तित्व पर केंद्रित यह महाकाव्य जन जन तक पहुंचेगा और घर घर को प्रकाशित करेगा। सांस्कृतिक बिखराव के इस युग में हमारे समाज को धर्म, अध्यात्म और संस्कृति से जुड़े ऐसे महाकाव्यों की बहुत आवश्यकता है। निरूपमा जी ने इस दिशा में बहुत सराहनीय कार्य किया है। इस नेक और समाजोपयोगी कार्य के लिए मैं निरूपमा को बधाई देता हूं। निरंतर प्रगति की शुभकामनाएं।

आपका- 

देवमणि पांडेय 

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063 , 98210 82126

-------------- -------------