बुधवार, 11 जनवरी 2023

मुंबई के अतीत का आईना : आमची मुम्बई



मुंबई के अतीत का आईना : आमची मुम्बई 


लेखक पत्रकार राजेश विक्रांत की किताब 'आमची मुंबई' ख़ुद में एक जीवंत दस्तावेज़ है। उन्होंने जिस लगन और निष्ठा से मुंबई के रोचक इतिहास को साकार किया है वह बेमिसाल है। जो लोग मुंबई के अद्भुत अतीत को और सामाजिक सांस्कृतिक परिदृश्य को जानना समझना चाहते हैं उनके लिए यह बहुत उपयोगी किताब है। इस किताब में सिनेमा का उद्भव है और वास्तुकला का वैभव भी है। मुंबई की पहली ट्रेन की कथा है तो ट्राम, बस और लोकल ट्रेन के विकास की गाथा भी है। मुंबई को संवारने और निखारने में जिन्होंने योगदान किया उनका ज़िक्र भी है। कुल मिलाकर यह किताब मुंबई के गुज़रे हुए कल का एक ख़ूबसूरत आईना है। मुझे आशा है कि यह किताब नई पीढ़ी को भी पसंद आएगी और वे मुंबई की ऐतिहासिक जानकारी से ख़ुश होंगे। इस महत्वपूर्ण रचनात्मक उपलब्धि के लिए राजेश विक्रांत को बधाई हार्दिक शुभकामनाएं।

आपका- 
देवमणि पांडेय :  98210 82126
devmanipandey@gmail.com 

मंगलवार, 20 दिसंबर 2022

नवीन चतुर्वेदी का ग़ज़ल संग्रह धानी चुनर

 


नवीन चतुर्वेदी का हिन्दी ग़ज़ल संग्रह धानी चुनर

नवीन चतुर्वेदी के नए ग़ज़ल संग्रह का नाम है धानी चुनर। इससे पहले ब्रज ग़ज़लों के उनके दो संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। इस संग्रह में 87 रसीली एवं व्यंजनात्मक हिंदी ग़ज़लें शामिल हैं। संग्रह की पहली ग़ज़ल में उन्होंने हिंदी ग़ज़ल के प्रति अपनी आस्था का उद्घोष किया है- 


ओढ़कर धानी चुनर हिंदी ग़ज़ल 

बढ़ रही सन्मार्ग पर हिंदी ग़ज़ल 

देवभाषा की सलोनी संगिनी 

मूल स्वर में है प्रवर हिंदी ग़ज़ल 


हिंदी भाषा के पास संस्कृत की परंपरा से प्राप्त विपुल शब्द संपदा है। नवीन जी ने इस शब्द संपदा का सराहनीय उपयोग किया है। ऐसे बहुत से शब्द हैं जो हमारी बोलचाल से बाहर होकर हमारी स्मृति या शब्दकोश तक सीमित हो गए हैं। नवीन जी ने इनको ग़ज़लों में पिरो कर संरक्षित करने का नेक काम किया है। तदोपरांत और अंततोगत्वा ऐसे ही शब्द हैं। ग़ज़ल में इनकी शोभा देखिए-

 

हृदय को सर्वप्रथम निर्विकार करना था

तदोपरांत विषय पर विचार करना था


अंततोगत्वा दशानन हारता है राम से 

शांतिहंता शांति दूतों को हरा सकते नहीं 


फ़िराक़ गोरखपुरी ने एक बातचीत में कहा था कि हिंदुस्तान में ग़ज़ल को आए हुए अरसा हो गया। अब तक उसमें यहां की नदियां, पर्वत, लोक जीवन, राम और कृष्ण क्यों शामिल नहीं हैं? कवि नवीन चतुर्वेदी ने अपने हिंदी ग़ज़ल संग्रह 'धानी चुनर' में फ़िराक़ साहब के मशवरे पर भरपूर अमल किया है। उनकी हिंदी ग़ज़लों में हमारी सांस्कृतिक विरासत के साथ-साथ हमारे पौराणिक चरित्र राम सीता, कृष्ण राधा, शिव पार्वती आदि अपने मूल स्वभाव के साथ शामिल हैं। हमारी आस्था के केंद्र में रहने वाले ये पात्र अपनी विशेषताओं के साथ बार-बार नवीन जी की ग़ज़लों में आते हैं और हमारी सोच एवं सरोकार का हिस्सा बन जाते हैं- 


अगर अमृत गटकना हो तो कतराते हैं माहेश्वर

मगर विषपान करना हो तो आ जाते हैं माहेश्वर 


निरंतर सद्गुणों का उन्नयन करते हुए रघुवर

यती बनकर जिए पल पल जतन करते हुए रघुवर 


किसी भी रचनाकार का एक दायित्व यह भी होता है कि वह समाज के कुछ विशिष्ट मुद्दों को रेखांकित करे ताकि दूसरों के मन में भी सकारात्मक सोच का उदय हो। इसी सामाजिक सरोकार के तहत नवीन चतुर्वेदी ने कई ग़ज़लों में स्त्री अस्मिता को रेखांकित करने की अच्छी कोशिश की है- 


हे शुभांगी कोमलांगों का प्रदर्शन मत करो

ये ही सब करना है तो संस्कार वाचन मत करो


सृष्टि के आरंभ से ही तुम सहज स्वाधीन थीं

क्यों हुई परवश विचारो, मात्र रोदन मत करो


सामाजिक सरोकार के इसी क्रम में नवीन जी ने पुरुषों की मानसिकता को भी उद्घाटित किया है- 


व्यर्थ साधो बन रहे हो, कामना तो कर चुके हो

उर्वशी से प्रेम की तुम, याचना तो कर चुके हो


जैसे नटनागर ने स्पर्श किया राधा का मन

उसका अंतस वैसी ही शुचिता से छूना था


इन गज़लों में नयापन है, ताज़गी है और कथ्य की विशिष्टता है। ये ग़ज़लें उस मोड़ का पता देती हैं जहां से हिंदी ग़ज़ल का एक नया कारवां शुरू होगा-


दुखों की दिव्यता प्रत्येक मस्तक पर सुशोभित है 

समस्या को सदा संवेदना की दृष्टि से देखें


वो जो दो पंक्तियों के मध्य का विवरण न पढ़ पाए 

उसे पाठक तो कह सकते हैं संपादक कहें कैसे


नवीन चतुर्वेदी की हिंदी ग़ज़लें प्रथम दृष्टि में शास्त्रीय संगीत की तरह दुरूह लगती हैं। मगर जब आप इन के समीप जाते हैं, इन्हें महसूस करते हैं तो इनमें निहित विचारों और भावनाओं की ख़ुशबू से आपका मन महकने लगता है। ये कहना उचित होगा कि नवीन चतुर्वेदी की हिंदी ग़ज़लें किसी संत के सरस प्रवचन की तरह हैं जो हमारे अंतस को आलोकित करती हैं और मन को भी आह्लादित करती हैं। इस रचनात्मक उपलब्धि के लिए मैं Navin C. Chaturvedi को बहुत-बहुत बधाई देता हूं। 


इस किताब के प्रकाशक हैं आर. के. पब्लिकेशन मुंबई। उनका संपर्क नंबर है- 90225-21190, 98212-51190


आपका-

देवमणि पांडेय 


सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063 , 98210 82126

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सोमवार, 19 दिसंबर 2022

गाता रहे वायलिन : पद्मश्री पं डी के दातार

 

गाता रहे वायलिन : पं डी के दातार की जीवनी

एक वायलिन वादक के रूप में पं डी के दातार (दामोदर केशव दातार) ने देश विदेश में जो प्रतिष्ठा अर्जित की वह बेमिसाल है। 10 अक्टूबर सन् 2018 को पद्मश्री डी के दातार का निधन हुआ। सन् 2022 में 'गाता रहे वायलिन' नाम से उनकी जीवनी हिंदी में प्रकाशित हुई। जीवनी की लेखिका हैं पं डी के दातार की पुत्रवधू डॉ स्मिता निखिल दातार। इसे पढ़ते हुए महसूस होता है कि स्मिता जी को संगीत की गहरी समझ है। वे ख़ुद एक प्रतिष्ठित चिकित्सक और लेखिका हैं। मराठी में उनके कहानी संग्रह और उपन्यास प्रकाशित हुए हैं। यही कारण है कि इस जीवनी में भाषा की समृद्धि है, रोचक शैली है और ज़बरदस्त पठनीयता है। उन्होंने पं डी के दातार को जैसा देखा वैसा ही उनका स्वाभाविक चित्रण किया है। दातार जी के बचपन, घरेलू जीवन, विवाह, बच्चों और मित्रों के साथ उनके आत्मीय संबंधों को स्मिता जी ने एक रोचक दास्तान की तरह पेश किया है। 


दिल्ली के गंधर्व महाविद्यालय में सिर्फ़ तेईस वर्ष की उम्र में पं डी के दातार ने वायलिन की एकल प्रस्तुति दी थी। उस ज़माने में सोलो प्रस्तुति को बहुत बड़ी उपलब्धि माना जाता था। इस प्रथम सार्वजनिक कार्यक्रम में संगीत की महान हस्ती पं डी वी पलुस्कर ने दातार जी की पीठ थपथपाई। जाने माने सितार वादक रविशंकर ने उन्हें आशीर्वाद देते हुए कहा- बेटा तुम्हारा भविष्य उज्जवल है। उसी दौरान एक और अद्भुत घटना हुई। मुंबई की अत्यंत प्रतिष्ठित संस्था 'सुर सिंगार संसद' में एक वरिष्ठ कलाकार के वायलिन वादन का सोलो कार्यक्रम था। उन्होंने आने में असमर्थता सूचित की। तब उस्ताद आमीर ख़ांं साहब ने आयोजक बृजनारायण जी से कहा- हमारा लड़का दातार बड़ा ही सुरीला है। उसको बुलाओ। बड़े कलाकार द्वारा एक उभरते कलाकार को दिया गया यह बहुत बड़ा प्रशस्ति पत्र था। सुर सिंगार संसद के इस कार्यक्रम में अपने शानदार एकल वादन से डी के दातार ने इतिहास रच दिया। 


वायलिन को एक जीवंत पात्र के रूप में चित्रित करके उसी के नज़रिए से लिखी गई इस जीवनी की ख़ास बात यह है कि यह उस समय के शास्त्रीय संगीत के परिदृश्य को बड़ी ख़ूबसूरती से सामने लाती है। पं डी के दातार के आसपास पं डी वी पलुस्कर, पं रवि शंकर, पं कुमार गंधर्व, पं भीमसेन जोशी, बड़े गुलाम अली ख़ां, पं जसराज, पं हरि प्रसाद चौरसिया जैसे संगीत के कई दिग्गज कलाकारों की मौजूदगी इस जीवनी को गरिमामय और अविस्मरणीय बना देती है। इसमें कई ऐसे महत्वपूर्ण और रोचक प्रसंगों का ज़िक्र है जो इस जीवनी की आभा में वृद्धि करते हैं। दादर के छबीलदास सभागृह में उस्ताद आमीर ख़ां 'राग मारवा' पेश कर रहे थे। तालियों की गड़गड़ाहट हुई। आमीर ख़ां ने कहा- "श्रोताओं! तालियां मत बजाइए। मेरी समाधि भंग हो जाती है। जब मैं गाता हूं तब मेरी ईश्वर से बातचीत होती रहती है। वही मेरी समाधि अवस्था होती है। तालियों के कारण मेरी समाधि भंग हो जाती है।" एक और रोचक प्रसंग देखिए- मराठी फ़िल्म 'पतिव्रता' के गाने की रिकॉर्डिंग थी। पं भीमसेन जोशी माइक पर थे। डी के ने वायलिन का एक अत्यंत सुंदर टुकड़ा बजाया। पं भीमसेन जोशी ने अपना गायन बंद करके दाद दी- वाह वाह, बहुत ख़ूब। रिकॉर्डिंग रुक जाने से डीके बेचैन हो गए। भीमसेन जी ने उन्हें इशारे से शांत किया और फिर रिकॉर्डिंग हुई।


संगीत के ऐसे कई प्रसंग हैं जो इस किताब को महत्वपूर्ण बनाते हैं। यह किताब सिर्फ़ एक जीवनी न होकर संगीत का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है। पं डी के दातार के वायलिन में ऐसी कशिश थी कि लगता था वहां से शब्द निकल रहे हैं। पु. ल. देशपांडे कहते थे - गाने वाला वायलिन है तो केवल दातार जी का। स्मिता जी ने लिखा है- "डी के अपने वादन के ज़रिए धीरे से सुरों के पैरों में शब्दों की पाज़ेब पहना कर श्रोताओं के मन में उन शब्दों का नाद उत्पन्न करते थे। श्रोताओं को लगता था कि उन्होंने शब्दयुक्त गीत ही सुने हैं।" पं डी के दातार का एक ही लक्ष्य था- "वायलिन की यह शब्द प्रधान गायकी भारत भर में नहीं दुनिया भर में पहुंचनी चाहिए और तीनों लोकों में यह जानकारी होनी चाहिए कि पश्चिमी वाद्य से हिंदुस्तानी संगीत के बोल भी किस तरह सुरों के साथ निकलते हैं।" अपने इस मिशन में पं डी के दातार पूरी तरह कामयाब हुए।


पं डी के दातार की यह जीवनी पहले मराठी में "द वायोलिन सिंग्ज" नाम से प्रकाशित हुई। डॉ स्मिता दात्ये ने इसका हिंदी में अनुवाद किया। डॉ स्मिता दात्ये ख़ुद एक अच्छी रचनाकार हैं। उनके उपन्यास, कहानी संग्रह और कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। वे पुणे के विविध महाविद्यालयों में हिंदी साहित्य पढ़ा चुकी हैं। उनकी हिंदी बहुत अच्छी है। यही कारण है कि इस पुस्तक की भाषा बहुत सरल, सहज और प्रवाहयुक्त है। जो लोग शास्त्रीय संगीत में दिलचस्पी रखते हैं उनके लिए यह एक संग्रहणीय पुस्तक है। इस सुंदर कृति को संगीत प्रेमियों तक पहुंचाने के लिए डॉ स्मिता निखिल दातार और डॉ स्मिता दात्ये को बहुत-बहुत बधाई। 


इस किताब की साज सज्जा और प्रिंटिंग बहुत अच्छी है। इस किताब के प्रकाशक हैं- आर. के. पब्लिकेशन मुंबई। सम्पर्क नंबर हैं - 9022 52 11 90 / 9821 25 1190, इस किताब का मूल्य 550/- रूपए है।


आपका :

देवमणि पांडेय 

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210 82126