रविवार, 17 अप्रैल 2022

गीतकार पं. किरण मिश्र : स्मृति को सादर नमन

 
गीतकार पं. किरण मिश्र : स्मृति को सादर नमन 

भक्ति गीतों और नवगीतों के लिए मशहूर गीतकार पं. किरण मिश्र का 16 अप्रैल 2021 को कोरोना से संक्रमित होने के कारण मुम्बई में निधन हो गया था। अपने नवगीतों के लिए साहित्य क्षेत्र में कई पुरस्कार और सम्मान से अलंकृत पं. किरण मिश्र ने कई धारावाहिकों और फ़िल्मों के लिए गीत लिखे थे। बी आर चोपड़ा के धारावाहिक महाभारत का समापन गीत उन्होंने ही लिखा था। संपूर्ण रामायण का 20 खंडों में उन्होंने संकलन किया था। इसके लिए पूर्व राष्ट्रपति डॉ शंकर दयाल शर्मा के कर कमलों से उन्हें सम्मानित किया गया था। 

5 जुलाई 1953 को अयोध्या में जन्मे पं. किरण मिश्र ने सिनेमा, सीरियल और संगीत के विविध अलबमों के लिए 250 से अधिक गीत लिखे। उनके गीतों को लता मंगेशकर, आशा भोंसले, ऊषा मंगेशकर, जगजीत सिंह, अनूप जलोटा, हरिओम शरण, उदित नारायण, सुरेश वाडेकर, सोनू निगम, आदि प्रतिष्ठित गायकों ने अपनी आवाज़ दी। उनको देश विदेश की अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं ने पुरस्कृत एवं सम्मानित किया। गीत विधा में विशिष्ट योगदान के लिए सन् 2020 में उन्हें थाईलैंड में सम्मानित किया गया था। 

पं. किरण मिश्र के छ: काव्य संग्रह प्रकाशित हुए- (1) चुंबक है आदमी, (2) मजीरा, (3) चंद्रबिम्ब, (4) कम्पन धरती, (5) अवधी बयार (6) पंछी भयभीत हैं। नवगीत संग्रह 'कंपन करती धरती' के लिए महाराष्ट्र हिंदी साहित्य अकादमी ने उनको संत नामदेव पुरस्कार प्रदान किया। नवगीत संग्रह 'चुंबक है आदमी 'के लिए पं. किरण मिश्र को घनश्यामदास सराफ साहित्य पुरस्कार प्राप्त हुआ। अवधी साहित्य संस्थान फैज़ाबाद से सम्मान के अलावा अवधी विकास संस्थान लखनऊ ने 'अवधी बयार' काव्य संग्रह के लिए उन्हें अवधी गौरव सम्मान से सम्मानित किया। 

पं. किरण मिश्र के पिता पं. दिनेश मिश्र लोकप्रिय कवि और कनक भवन अयोध्या के आचार्य थे। कवि दिनेश जी की कई भक्ति रचनाएं अनूप जलोटा के अलबम में शामिल हैं। मुंबई आने से पहले पं. किरण मिश्र गोरखपुर विश्वविद्यालय के ललित कला विभाग में प्रवक्ता थे। मुंबई में भी कई बार उनके चित्रों की प्रदर्शनी आयोजित हुई। उनसे चित्रकला सीखने वाले शिष्यों की संख्या भी काफ़ी है। उनके एक लोकगीत से हास्य कवि शैल चतुर्वेदी इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उस पर सरयू तीरे नाम से अवधी फ़िल्म बनाई। 

पं. किरण मिश्र के गीत तो अच्छे थे ही उनका तरन्नुम भी आकर्षक और दमदार था। सन् 1984 में मुंबई आने पर मैंने पहली बार उन्हें खालसा कालेज के हिंदी कवि सम्मेलन में सुना था। कवि सम्मेलन की समाप्ति पर मैंने उन्हें बधाई दी। उन्होंने मुझे अपना विजिटिंग कार्ड दिया और घर बुलाया। उनके इस स्नेह निमंत्रण पर मैं उनके घर गया। तब से लगातार उनसे मेरी दोस्ती क़ायम रही। वे अजातशत्रु थे। उनका कोई दुश्मन नहीं था। उनकी जीवन संगिनी स्व. उषा मिश्र भी बेहद विनम्र और स्नेही महिला थीं। लैंड लाइन के ज़माने में कई संघर्षरत कलाकार, संगीतकार और गायक बिना फ़ोन किए उनके यहां अचानक आ जाते थे। पति-पत्नी उनकी भरपूर ख़ातिर करते थे। पत्नी के स्वर्गवास के बाद सुपुत्र स्वदेश मिश्र और सुपुत्री स्मिता मिश्रा ने उनका भरपूर ख़याल रखा। अपने इस भरे पूरे परिवार के कारण उन्होंने कभी ख़ुद को अकेला महसूस नहीं किया। मिलनसार स्वभाव के कारण पं. किरण मिश्र अपने गोकुलधाम मोहल्ले में भी बहुत लोकप्रिय थे। यहां के लोग उनका बहुत सम्मान करते थे। अपने पीछे पं. किरण मिश्र गीतों की जो खुशबू छोड़ गए हैं उसकी सुगंध हमेशा महसूस की जाती रहेगी। उनकी पावन स्थिति को सादर नमन। 


आपका- 

देवमणि पांडेय

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, 

कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड, 

गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210 82126

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2022

अपराजिता गार्गी: निरूपमा श्रीवास्तव का महाकाव्य

 


अपराजिता गार्गी: निरूपमा श्रीवास्तव का महाकाव्य

वैदिक काल में हमारे देश में ऐसी प्रतिभासम्पन्न विदुषी नारियां हुई हैं जिनके ज्ञान के आलोक से आज भी हमारे समाज और संस्कृति का अंतर्मन आलोकित हो रहा है।  ऐ्सी ही  एक परम विदुषी और अध्यात्मवेत्ता नारी का नाम है गार्गी। महर्षि वच्कनु की सुपुत्री वाच्कन्वी का जन्म गर्ग गोत्र में हुआ था। इसलिए वे गार्गी के नाम से प्रसिद्ध हुईं। गार्गी वाच्कन्वी का जन्मकाल ईसा से लगभग 700 वर्ष पूर्व माना जाता है। गार्गी वैदिक साहित्य में निष्णात एक महान दार्शनिक और वेदों की व्याख्याता थीं। ब्रह्मविद्या की ज्ञाता होने के नाते उन्हें ब्रह्मवादिनी के नाम से भी जाना जाता है। युवावस्था से ही गार्गी को वैदिक ग्रंथों और दर्शन में गहरी रूचि थी। 

बृहदारण्यक में यह जानकारी मिलती है कि गार्गी ने मिथिला के महाराज आदि जनक द्वारा आयोजित एक उच्च कोटि के शास्त्रार्थ में भाग लिया था। सैकड़ों विद्वानों की उपस्थिति में उन्होंने आत्मा और ब्रह्म के विषय पर ऋषि याज्ञवल्क्य से कई अदभुत प्रश्न पूछे थे। इस शास्त्रार्थ से गार्गी के विद्वता की चारों दिशाओं में चर्चा हुई। गार्गी के पिता के अनुरोध पर ऋषि याज्ञवल्क्य ने तीसरी पत्नी के रूप में उनका वरण किया। ऋषि की पहली पत्नी कात्यायनी और दूसरी पत्नी विदुषी मैत्रेयी थीं। कहा जाता है कि गार्गी आजन्म ब्रह्मचारिणी रहीं। उन्होंने ऐसे गुरुकुलों की स्थापना की जिसमें कन्याओं को शिक्षा दी जाती थी। एक प्रकार से वे भारतीय समाज में कन्या शिक्षा की प्रणेता हैं।

विद्वता से परिपूर्ण गार्गी के विराट व्यक्तित्व पर प्रतिष्ठित कवयित्री निरूपमा श्रीवास्तव ने महाकाव्य का सृजन किया है। इस महाकाव्य को उन्होंने दस अध्याय में प्रस्तुत करके गार्गी के प्रखर व्यक्तित्व को रोचक तरीके से सामने रखा है। महाकाव्य की शुरुआत में ही वे नारी शक्ति का जयघोष कर देती हैं-

युग युगांतरों से नारी ने जग का अप्रतिम  रूप सँवारा

जननी,भार्या,बेटी,बहना, बनकर करती है उजियारा

 

सृष्टि न होती सत्य सुन्दरम् अमृत सम नारी न होती 

पीड़ा सह कर सृजनशिल्प कर तन मन धन वारी न होती

गर्ग वंश के ऋषि वच्कनु ने बचपन से ही सुपुत्री गार्गी को ललित कला, संगीत, वेद और उपनिषद की शिक्षा देनी शुरू कर दी थी। इन सभी के योग से गार्गी का उज्जवल दैदीप्यमान व्यक्तित्व निर्मित हुआ। निरूपमा ने इस व्यक्तित्व का बड़ा सुंदर वर्णन किया है-

तन्वंगी गार्गी अति कोमल लतिका सी थी  तरुणाई

चंद्ररश्मि सी शीतल पावन ज्योतिर्मय काया पाई

 

कटिचुम्बित थे केश मेघ से रवि प्रकाश सी दीप्त अजा

श्वेत कमल से नयन निष्कलुष वाणी ज्यों संगीत बजा

ऋषि और दार्शनिक याज्ञवल्क्य वैदिक साहित्य में शुक्ल यजुर्वेद की वाजसेनीय शाखा के दृष्टा थे। आचार्य उद्दालक आरुणि के शिष्य याज्ञवल्क्य शतपथ ब्राह्मण की रचना के लिए जाने जाते हैं। ब्रह्मतत्व सर्वोपरि है, यह उनकी स्थापना है। वे अपने समय के सर्वोच्च वैदिक ज्ञानी थे। यही कारण है कि आदि जनक के आमंत्रण पर ऋषि याज्ञवल्क्य जब शास्त्रार्थ के लिए पधारे तो उनका सामना करने का किसी को साहस नहीं हुआ। 

 ज्ञान की आभा से दीप्त याज्ञवल्क्य से जब कोई शास्त्रार्थ के लिए तैयार नहीं हुआ तब अंत में गार्गी ने उनसे ब्रह्म और आत्मा के बारे में लगातार कई सवाल पूछे। कहा जाता है कि गार्गी के सवालों से परेशान याज्ञवल्क्य ने यहां तक कह दिया था कि गार्गी अगर तुमने अगला सवाल पूछा तो तुम्हारा मस्तक फट जाएगा। इस शास्त्रार्थ का कवयित्री निरूपमा ने अपने इस महाकाव्य में बड़ा जीवंत वर्णन किया है-

गार्गी ने पूछा- स्वर्ग लोक से भी परे कुछ और है

पृथ्वी के तल में कुछ तो है और मध्य में क्या छोर है

 

और जो हुआ जो होना है वह ओतप्रोत हुआ कहाँ

ब्रह्मलोक किसके है अधीन यह प्रश्न बतलाए जहाँ

 

 ऋषि बोले -

उसका ही अनुशासन प्रशासन कर रहा जग प्राप्त है

सम्पूर्ण जग में है सकल उसके ही  अंदर व्याप्त है

 

गार्गी हुई संतुष्ट सुन  ब्रह्मांड है जिसके अधीन

ऋषिवर ने था उत्तर दिया हर प्रश्न का ही समाचीन

अंत में ऋषि याज्ञवल्क्य ने उन्हें वेदांत तत्व का ज्ञान दिया तो गार्गी संतुष्ट हुई। उपस्थित जनसमूह गार्गी के विशद ज्ञान से अभिभूत हो गया। चारों ओर उनकी जयजयकार होने लगी।

इस महाकाव्य में निरूपमा ने ऋषि याज्ञवल्क्य की पत्नियों कात्यायनी और मैत्रेयी के आदर्श चरित्र का भी कुशलता से निरूपण किया है। यह महाकाव्य प्राचीन भारत में नारियों की विद्वता और अस्मिता की गौरवपूर्ण झांकी प्रस्तुत करता है। अपने उदात्त विषय, सरल छंद, सहज प्रवाह और सरस भाषा के साथ पाठकों को एक आत्मीय धागे में बांध लेता है। यह महाकाव्य धर्म और संस्कृति की निर्मल ज्योति से आज के समाज को प्रकाशित करने की सामर्थ्य रखता है। 

कवयित्री निरूपमा श्रीवास्तव के अध्ययन, चिंतन और शोध पर आधारित यह महाकाव्य अपनी सृजनात्मक आभा से हमारे अंतर्मन को समृद्ध करता है। आशा है कि गार्गी के तेजस्वी व्यक्तित्व पर केंद्रित यह महाकाव्य जन जन तक पहुंचेगा और घर घर को प्रकाशित करेगा। सांस्कृतिक बिखराव के इस युग में हमारे समाज को धर्म, अध्यात्म और संस्कृति से जुड़े ऐसे महाकाव्यों की बहुत आवश्यकता है। निरूपमा जी ने इस दिशा में बहुत सराहनीय कार्य किया है। इस नेक और समाजोपयोगी कार्य के लिए मैं निरूपमा को बधाई देता हूं। निरंतर प्रगति की शुभकामनाएं।

आपका- 

देवमणि पांडेय 

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063 , 98210 82126

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सोमवार, 28 मार्च 2022

जीवन के इंद्रधनुष : कुसुम तिवारी का काव्य संग्रह

 

जीवन के इंद्रधनुष : कुसुम तिवारी का काव्य संग्रह

कविता हृदय की भावनाओं का सहज उद्गार है। इसकी अभिव्यक्ति का दायरा विस्तृत होता है। इसमें इंसान के सुख-दुख, स्वप्न, संघर्ष, समय और समाज भी शामिल होता है। इस लिए भावनाओं की नमी के साथ ही कविता में इंसानी सोच की उष्णता भी महसूस होती है। 


कुसुम तिवारी के प्रकाशित काव्य संग्रह का नाम है 'जीवन के इंद्रधनुष'। नाम के अनुरूप उन्होंने इन कविताओं में जीवन के विविध रंगों को साकार करने का सराहनीय प्रयास किया है। कुछ कविताओं में जीवन दर्शन की अभिव्यक्ति इस तरह हुई है कि वे प्रेरक सूक्तियों की तरह नज़र आती हैं-


मौत का उत्सव मनाना 

ज़िंदगी का धर्म है 

मृत्यु कहते हैं जिसे 

मुक्ति है सत्कर्म है


कुसुम तिवारी के यहां कथ्य के अनुरूप जीवंत भाषा है उनकी कुछ काव्य अभिव्यक्तियां छायावादी साहित्य की समृद्धि परंपरा की याद दिलाती हैं-


मैं मुखर रही तुम मौन हुए 

मैं शब्द बनी तुम भाव हुए 

मैं प्रेम का कल-कल झरना थी 

तुम खड़े तपस्वी भाव लिए 


मैं काया हूँ परछाई तुम 

मैं पगडंडी, हो मंज़िल तुम 

बीते या काल समय गुज़रे 

मैं नश्वर हूं पर शाश्वत तुम


कुसुम की कविताओं के केंद्र में एक स्त्री है। इस स्त्री के अनुभव और सोच उस स्त्री के प्रतिबिंब हैं जो घर की दहलीज़ के अंदर सक्रिय है। इस स्त्री के प्रेम, मिलन, बिछोह, त्याग, संघर्ष, मर्यादा और स्वाभिमान को रेखांकित करने वाली कई कविताएं इस संग्रह में शामिल हैं। बिना किसी लाग लपेट के कवयित्री इस गृहिणी की ख़्वाहिशों और अरमानों को कविता में ढाल देती है-


लिखूंगी एक कविता 

काग़ज़ पर नहीं 

जिस्म पर तुम्हारे 

पलकों को बनाऊंगी लेखनी 

स्याही होगी काजल की 

आंखों के बंद कोटरों में 

छिपा लूंगी तुम्हें 

जिस्म की हर इबारत में 

सिर्फ़ तुम नज़र आओगे 

तब लिखूंगी मैं एक कविता 

काग़ज़ पर नहीं 

जिस्म पर तुम्हारे


इस संग्रह की कविताओं में शिल्पगत ख़ामियां हो सकती हैं मगर ये कविताएं घरेलू स्त्री की मनोकामना का जयघोष हैं। ये कविताएं उस स्त्री की गाथा हैं जो अपने भय और आशंका की चारदीवारी से बाहर आकर निडरता के साथ बात करती है। जो लोग स्त्री के अंतस् में झांकना चाहते हैं, उसके मर्म, चेतना, चिंता और स्वाभिमान को समझना चाहते हैं, उन्हें ये कविताएं पसंद आएंगी।


कुसुम तिवारी मधुर गीतकार हैं। वे मनभावन लोकगीत भी रचती हैं। एक संवेदनशील कवयित्री के तौर पर उन्होंने 'जीवन के इंद्रधनुष' के रूप में काव्य प्रेमियों को एक ख़ूबसूरत तोहफ़ा दिया है। उम्मीद है कि रचनाकार जगत में इस किताब का भरपूर स्वागत होगा। इस रचनात्मक उपलब्धि के लिए कुसुम तिवारी को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं।


आपका-

देवमणि पांडेय

 

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फ़िल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063 , 98210 82126

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शेर के साथ सेल्फ़ी : आबिद सुरती की किताब

 

शेर के साथ सेल्फ़ी : आबिद सुरती की किताब

कथाकार पत्रकार सुदीप जब सांध्य दैनिक महानगर के संपादक थे तब मैंने उनके लिए साहित्य पर आधारित साप्ताहिक स्तंभ 'शाब्दिकी' लिखा था। हर सप्ताह उनसे मिलकर मैं उनके हाथ में मैटर देता था। यह सिलसिला साल भर तक चला। सुदीप उसूलों के इतने पक्के थे कि उन्होंने कभी मेरे कॉलम के एक शब्द में भी फेरबदल नहीं किया। मुझे असंपादित रूप में छापा। ग़ुस्सा उनकी नाक पर सवार रहता था। झूठ वे बर्दाश्त नहीं कर सकते थे। स्वाभिमानी इतने थे कि एक फ़िल्म पाक्षिक के संपादक पद से उन्होंने सिर्फ़ नौ दिन में इस्तीफ़ा दे दिया था।


ऐसे विलक्षण इंसान से आबिद सुरती की अंतरंग दोस्ती लंबे समय तक कैसे टिकी रही यह एक दिलचस्प दास्तान है। सुदीप के इंतक़ाल के बाद आबिद सुरती ने उन पर एक संस्मरण लिखा- 'शेर के साथ सेल्फ़ी'। रचनात्मकता के इस अप्रतिम आलेख को आप ख़ाका या रेखाचित्र भी कह सकते हैं। इस संस्मरण में सुदीप के बार-बार टूटने, बिखरने और जुड़ने की मर्मस्पर्शी दास्तान है। उनके शातिर दोस्तों ने किस तरह उनका इस्तेमाल किया उसके क़िस्से हैं। सुदीप के व्यक्तित्व, व्यवहार, सोच और सरोकार को आबिद जी ने जिस तरह साकार किया है वह बेमिसाल है।


आबिद जी के लेखन में कहानी जैसे सरसता और प्रवाह है। विवरण और संवादों में व्यंग्य की धार है। अंदाज़ ए बयां में ढब्बू जी वाली रोचकता है। वे किसी भी घटना को लंबा नहीं करते। छोटे-छोटे दृश्यों के माध्यम से तत्कालीन समय और समाज को जीवंत कर देते हैं। कुल मिलाकर यही चीज़ें उनके लेखन को अविस्मरणीय बना देती हैं। 



अद्विक पब्लिकेशन दिल्ली से प्रकाशित आबिद सुरती की इस किताब का नाम भी यही है, यानी- 'शेर के साथ सेल्फ़ी'। इसमें कालखंड के अनुसार पांच रचनाएं शामिल की गई हैं- कैनाल (1968), हरि के नाम का व्यापारी (1992), रामदास : एक जननायक की हत्या (1994), कोटा रेड (1995) और शेर के साथ सेल्फ़ी (2020) 


कैनाल एक प्रयोगात्मक कहानी है। 'सारिका' में प्रकाशित इस कहानी को हिंदी की श्रेष्ठ कहानियों में शामिल किया गया। आबिद सुरती की इन रचनाओं में मुंबई का समय, समाज और इतिहास दस्तावेज़ की तरह दर्ज किया गया है। मसलन 'हरि के नाम का व्यापारी' रचना को पढ़ेंगे तो आपके सामने वह कालखंड साकार हो जाएगा जब बाबरी ढांचा ध्वस्त हुआ था। उसके बाद मुंबई में भयावह दंगे कैसे हुए, आम आदमी की यंत्रणा, आगज़नी और क़त्ल से लेकर सियासी पार्टियों के दांव पेंच … सभी को आबिद जी ने विश्वसनीय आंकड़ों के साथ इतिहास की तरह दर्ज किया है। दूसरों के दुख दर्द के साथ आबिद जी ने बहुत सलीक़े से अपने निजी दुख, तनाव और यातना को भी शामिल किया है।


कुल मिलाकर यह किताब रचनात्मकता का एक जीवंत दस्तावेज़ है। मुंबई महानगर यहां एक चरित्र की तरह मौजूद है। समय और समाज की पिछले पचास साल की उथल पुथल को कथा सूत्र की रोचकता में समेटकर आबिद जी ने जिस हुनर के साथ पेश किया है वह बेजोड़ और बेमिसाल है। अगर आप मुंबई के इतिहास में समय का चेहरा देखना चाहते हैं तो आपको यह किताब पढ़नी चाहिए।


आपका-

देवमणि पांडेय

 

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फ़िल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063 , 98210 82126

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प्रकाशक का पता: 

अद्विक पब्लिकेशन, 41 हसनपुर, आईपी एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली- 110092, 

फ़ोन: 011-4351 0732/ 95603 97075

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