बुधवार, 18 मार्च 2026

अनिल गौड़ का ग़ज़ल संग्रह 'रौशनी के नाम'

 हिंदी ग़ज़ल की सार्थक आवाज़: अनिल गौड़

हिंदी ग़ज़ल के परिदृश्य पर ​अनिल गौड़ एक ऐसी आवाज़ हैं जिनकी रचनात्मकता गहरी संवेदना और प्रभावशाली अभिव्यक्ति से समृद्ध है। उनका ग़ज़ल संग्रह 'रौशनी के नाम' स्वयं इस बात का प्रमाण है कि वे केवल शेर नहीं कहते, बल्कि समय और समाज से एक सार्थक संवाद स्थापित करते हैं। आम बोल चाल की भाषा में लिखी गईं ये सीधी, सादी ग़ज़लें पाठक और श्रोता के मन में जगह बनाने में सक्षम हैं। उनका यह शेर देखिए-

​अपना दर्द छुपाए हम तो गाते हैं आंसू, आंसू

हमको कवि शायर मत कहना, हम रोते बंजारे हैं

​यह शेर उनकी सोच और सरोकार का आईना है। यह एक ऐसे कवि की आवाज़ है जो अपनी रचना को महज कला नहीं, बल्कि अपने जीवन के दर्द की अभिव्यक्ति मानता है। सृजन का यही समर्पण उनकी ग़ज़लों को विशिष्ट बनाता है।


अनिल गौड़ की ग़ज़लों में सामाजिक पीड़ा और जीवन के विविध संदर्भ बड़ी मार्मिकता के साथ उभरते हैं। वे केवल व्यक्तिगत अनुभूतियों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि जन भावनाओं और सामाजिक सरोकारों के प्रति समर्पित दिखाई देते हैं। उनके लेखन में यथार्थ की कठोरता को संवेदना की आंच पर पकाया जाता है-

​इंसान की मजबूरियों का नाम है रोज़ी

वह बर्फ़ बेचता है लपट में खड़ा हुआ

​यह शेर एक ऐसा चित्र प्रस्तुत करता है, जहाँ विपरीत परिस्थितियों में जीवनयापन की जद्दोजहद है। 'बर्फ़' और 'लपट' का विरोधाभास सामाजिक विसंगतियों को बड़े सलीक़े के साथ रेखांकित करता है। अनिल गौड़ की ग़ज़लें समय के साथ चलती हैं। वे चुनौतियों को स्वीकार करते हैं और विसंगतियों पर निर्भीक होकर टिप्पणी करते हैं। उनकी ग़ज़लें अपने समय से मुख़ातिब हैं-

​सच्चाई को कब तक पत्थर मारा जाएगा

आज नहीं तो कल उसको स्वीकार जाएगा

​यह शेर आशावाद और सत्य की अनिवार्यता को बख़ूबी दर्शाता है। उनका एक और शेर देखिए जो समाज के नैतिक पतन पर तीखा व्यंग्य है-

​जिसे भी देखो, वह हंसकर चपत लगाता है

वतन को हमने, यतीमों का गाल कर डाला

​यहाँ 'यतीमों का गाल' जैसी नई और मौलिक उपमा सामाजिक पतन और देश की दुर्दशा को एक झटके में सामने ला देती है। कभी-कभी वे हमारे सामने कोई ऐसा मोहक चित्र प्रस्तुत कर देते हैं जिससे मन प्रसन्न हो जाता है। ऐसा ही एक दृश्य यशोदा और कृष्ण के प्यार भरे रिश्ते को दिखाता है जहाँ माँ डाँटती भी है, लेकिन उस डाँट में अपार स्नेह भरा होता है-

 यशुमति ने पंखुड़ियों जैसे कान उमेठ दिए

​बोल कि ग्वालिन के घर तू दोबारा जाएगा

इस शेर की सबसे बड़ी ख़ूबी 'पंखुड़ियों जैसे कान' की उपमा है। यह उपमा बालक कृष्ण की मासूमियत और सुकोमलता को दर्शाती है। आमतौर पर कान उमेठना एक दंड होता है, लेकिन पंखुड़ियों जैसे कान उमेठने का वर्णन यह दर्शाता है कि यह दंड भी प्रेम और लाड़ से भरा हुआ है। यह उपमा दृश्य को कोमल बना देती है। इस शेर में कृष्ण की बाल लीला को एक नए, सुंदर और मौलिक कोण से प्रस्तुत किया गया है।

अनिल गौड़ की ग़ज़लों में कभी-कभी दाम्पत्य जीवन के ऐसे चित्र भी नज़र आते हैं जहां प्रेम का माधुर्य है। उनकी एक लोकप्रिय ग़ज़ल का मतला है-

​बांह डाल दी तुमने, हँस के मेरी गर्दन में

​मैंने तो ये पूछा था,क्या बना है भोजन में

यह शेर रोज़मर्रा के जीवन के एक सीधे-सादे संवाद को अचानक प्रेम के मोड़ पर लाकर खड़ा कर देता है। यह दर्शाता है कि दाम्पत्य जीवन में छोटी-छोटी व्यावहारिक बातों के बीच भी प्रेम और स्नेह का प्रदर्शन कितना सहज और आकस्मिक हो सकता है।

अनिल गौड़ की रचनात्मकता में प्रेम और अध्यात्म के संदर्भ भी गहरे अर्थों के साथ आते हैं। कृष्ण से संबंधित उनका यह शेर जीवन के शाश्वत मूल्यों और दर्शन को नई ऊँचाई देता है-

​कृष्ण का बड़ा क़द है, आदमी से ईश्वर तक

क्यों कि वे अकेले हैं, प्रेम के समर्थन में

उनके आध्यात्मिक चिंतन को रेखांकित करने वाला एक और शेर देखिए जो एक अंतिम आशा और गहरी आस्था की ओर इशारा करता है-

​स्वयं दीप हो जाना ही है, एक मात्र अंतिम आशा

देह दीप है, प्रतिभा बाती, और आत्मा ही लौ है

यह शेर “अप्प दीपो भव” यानी आत्म-दीप्ति के दर्शन को एक सुंदर रूपक में प्रस्तुत करता है। यह कवि की गहन रचनात्मकता का प्रमाण है।


अनिल गौड़ की ग़ज़लें लयबद्धता, संप्रेषणीयता, सामाजिक प्रतिबद्धता और दार्शनिक गहराई का एक सुंदर संगम हैं। वे हिंदी ग़ज़ल की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उसे समकालीन चुनौतियों से जोड़ते हैं। समसामयिक और महत्वपूर्ण विषयवस्तु वाली उनकी ग़ज़लों में जनमानस से सीधे जुड़ने की क्षमता है। मुझे उम्मीद है कि अनिल गौड़ की ये ग़ज़लें हिंदी ग़ज़ल के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेंगी। आने वाले समय में वे हिंदी ग़ज़ल को एक विशिष्ट 'रौशनी' प्रदान करते रहें, यही मेरी शुभकामना है।

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आपका : देवमणि पांडेय

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फ़िल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210 82126

नरोत्तम शर्मा का ग़ज़ल संग्रह एहसासात



एहसासात : नरोत्तम शर्मा का ग़ज़ल संग्रह

नरोत्तम शर्मा की ग़ज़लें केवल शब्दों का जाल नहीं हैं, बल्कि वे जीवन के अनुभवों की एक जीती-जाती तस्वीर हैं। उनके ग़ज़ल संग्रह ‘एहसासात’ में ज़िंदगी के वे तमाम रंग मौजूद हैं जिन्हें हम अक्सर भागदौड़ में अनदेखा कर देते हैं। ​शर्मा जी के लिए ग़ज़ल सिर्फ एक विधा नहीं, बल्कि एक 'एहसास' है। वे ग़ज़ल के सौंदर्य को प्रकृति और प्रेम के साथ जोड़कर देखते हैं-

​सर्दियों में धूप का एहसास होती है ग़ज़ल

प्रेमियों के हृदय का मधुमास होती है ग़ज़ल

​नरोत्तम शर्मा की ग़ज़लें पढ़ते समय ऐसा लगता है मानो कोई अपना हमारे पास बैठकर ज़िंदगी के फ़लसफ़े सुना रहा हो। उन्होंने मुहब्बत की दहलीज़ लांघ कर ग़ज़ल को आम आदमी की दहलीज़ तक पहुँचाया है। ​उनके अनुसार, सृजन की प्रक्रिया पीड़ादायक है, लेकिन उसका परिणाम मधुर होता है। वे कविता रचने के उस 'मधुर संत्रास'  को बख़ूबी समझते हैं-

जब तलक न शक्ल ले बेचैन रहता है हृदय 

सृजन की पीड़ा, मधुर संत्रास होती है ग़ज़ल

​आज के दौर में इंसान जो दिखता है, वह होता नहीं। नरोत्तम शर्मा ने समाज में व्याप्त पाखंड और 'मुखौटों' पर गहरा प्रहार किया है। वे आगाह करते हैं कि बाहरी चमक-धमक और माथे के चंदन पर भरोसा न करें, क्योंकि उसके पीछे 'विष' छुपा हो सकता है-

चिकनी चुपड़ी बातों, कपड़ों पर मत जाना 

विष भी हो सकता है माथे के चन्दन में

वे कपड़ों और चिकनी-चुपड़ी बातों के पीछे छिपी क्रूरता को बेनक़ाब करते हैं और सत्य की परख का संकेत देते हैं - 

चेहरा जो किसी शख्स का दिखता है सभी को, 

अक्सर वो उसी शख्स का चेहरा नहीं होता।

​शायर को इस बात का गहरा मलाल है कि समाज से 'शर्म' और 'ईमानदारी' लुप्त होती जा रही है। जहाँ चारों ओर झूठ और दगा हो, वहाँ सादगी से जीना भी किसी जंग से कम नहीं है-

​हर तरफ झूठ, दगा, और बेवफ़ाई है

आज के दौर में जीना भी इक लड़ाई है

​नरोत्तम शर्मा की ग़ज़लों में एक आम आदमी की बेबसी और उसकी ज़मीन से जुड़ी संवेदनाएँ भी हैं। वे घर न बना पाने के दर्द को स्वीकारते हैं, लेकिन 'घर' होने के अहसास को जीवित रखते हैं। वहीं, 'आँगन के चूजों का सूप बन जाना' उस सामाजिक निष्ठुरता को दर्शाता है जहाँ मासूमियत को सत्ता या स्वार्थ निगल जाता है-

गो बना पाया नहीं आज तलक मैं कोई घर 

एक एहसास तो होता है कि घर होता है


कोई बना के उनका सूप पी गया होगा 

वो चूजे, जो मेरे आँगन में आ के खेलते थे


तल्ख़ियों के बावजूद, नरोत्तम जी के यहाँ निराशा नहीं है। वे व्यक्ति को कर्मशील होने की प्रेरणा देते हैं। उनका मानना है कि ज्ञान की रोशनी तभी काम आती है जब आप स्वयं प्रयास का 'दीया' जलाएँ-

इल्म से रोशनी तो मिलती है 

पर दिया ख़ुद जलाना पड़ता है

वे सिखाते हैं कि अगर इरादों में जोश हो, तो एक 'क़तरा' भी समंदर जैसा तूफ़ान पैदा कर सकता है-

जोश जिसमें न अगर हो तो समंदर क्या है 

हो तो क़तरे में भी तूफाँ का असर होता है 

​नरोत्तम शर्मा का यह संग्रह संवेदनशीलता और साहस का अद्भुत मिश्रण है। उनकी भाषा सरल है लेकिन मारक है। वे जहाँ प्रेम की मधुरता बिखेरते हैं, वहीं समाज की विसंगतियों पर कड़ा प्रहार करने से भी नहीं चूकते। यह ग़ज़ल संग्रह आज के समय और समाज का एक आईना है-

किसी की आँख में अब शर्म का पानी नहीं है 

यही है ज़िंदगी तो फिर कोई मानी नहीं है

नरोत्तम शर्मा की ग़ज़लों में मुहब्बत का गुलशन है मगर उन्होंने ग़ज़ल को आम आदमी के चूल्हे-चौके, आँगन की धूप और समाज के कड़वे सच से जोड़ने का नेक काम भी किया है। उनका यह ग़ज़ल संग्रह मात्र ग़ज़लों का गुलदस्ता नहीं, बल्कि आज के दौर का एक दस्तावेज़ भी है। इसमें जहाँ एक ओर प्रेम की कोमलता है, वहीं दूसरी ओर मुखौटों के पीछे छिपे चेहरों को बेनक़ाब करने का साहस भी है। नरोत्तम शर्मा की आवाज़ उस आम आदमी की आवाज़ है जो झूठ और फ़रेब के बाज़ार में अपनी मासूमियत बचाने की जद्दोजहद कर रहा है।

​अगर आप ऐसी ग़ज़लों की तलाश में हैं जो रूह को छुएँ और ज़हन को झकझोर दें, तो यह संग्रह आपके लिए है। सर्दियों की गुनगुनी धूप जैसी ये ग़ज़लें आपको ज़िंदगी को एक नए नज़रिए से देखना सिखाएंगी। आस्था प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित इस किताब का मूल्य है 275 रूपये। 

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आपका : देवमणि पांडेय 98210 82126

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति बिल्डिंग, कन्या पाडा, फ़िल्मसिटी रोड, गोकुलधाम, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063 

डॉ शोभा दीक्षित भावना का ग़ज़ल संग्रह ​

 

"फिर भी तुम हो" शोभा दीक्षित 'भावना' का ग़ज़ल संग्रह ​

डॉ शोभा दीक्षित 'भावना' का ग़ज़ल संग्रह "फिर भी तुम हो" समकालीन ग़ज़ल की दुनिया में ताज़ा हवा के झोंके की तरह है। उनकी ग़ज़लों से गुज़रते हुए प्रेम, प्रकृति, पर्यावरण जैसे विविधरंगी दृश्यों से समृद्ध होना है। देखने में उनकी ग़ज़लें निहायत सीधी सादी हैं लेकिन उनके अंदर भावनाओं का विशाल भंडार छुपा हुआ है। 

​आमतौर पर 'इश्क़' और 'मुहब्बत' जैसे विषयों पर लिखना और कुछ नया दे पाना चुनौती भरा काम होता है। लेकिन शोभा जी ने यहाँ अपनी मौलिकता सिद्ध की है। उनके पास बिम्बों की एक नई दुनिया है। जब वे कहती हैं-

​साँस की जलतरंग बजती है,

इश्क को गा रहा है फिर कोई।

​तो यहाँ 'साँस' और 'जलतरंग' का सामंजस्य पाठक के भीतर एक संगीतमय अनुभूति पैदा कर देता है। यही सादगी और गहराई ही उनकी लेखनी की विशेषता है।

​शोभा जी की ग़ज़लों में प्रेम का सफ़र रूहानी इबादत की ओर जाता है। उनके शेरों में 'सज़दा', 'इनायत' और 'गुलदान' जैसे शब्द प्रेम को एक गरिमा प्रदान करते हैं-

ये दिल मसरूफ है सज़दे में तेरे, 

तेरी मुझ पे इनायत हो गई है।


दिल मेरा तेरी उल्फ़त का गुलदान है, 

तेरी यादों को जिसमें बसाया गया।

शोभा जी के कई शेर प्रेम की मर्यादा और उदात्त सोच के परिचायक हैं। वे जिस सलीक़े के साथ अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करती हैं वह दिलों के तार झंकृत कर देता है-

​उंगली मुझ पर उठी बहुत सी तुम पर ये इल्ज़ाम न आये,

लफ़्ज़-लफ़्ज़ में तुम हो लेकिन कहीं तुम्हारा नाम न आये।

​यह 'बिना नाम लिए सब कुछ कह देना' ही एक कुशल ग़ज़लकार की असली पहचान है। यह भी ग़ौरतलब है कि ​एक संवेदनशील रचनाकार केवल कुछ विषयों तक ही सीमित नहीं हो सकता। उसे समाज की हलचलें भी बेचैन करती हैं। शोभा जी ने ग्रामीण अंचल की विसंगतियों और राजनीति की भेंट चढ़ते रिश्तों को बड़ी बेबाक़ी से पकड़ा है-

बाप ने अपना ख़ून सुखाकर जमा किया था जो, 

बेटा इतना औघड़ दानी कुछ भी नहीं बचा।


​खेत बेंचकर दारू बाँटी फिर भी हार गए,

सबकुछ तो ले गयी प्रधानी, कुछ भी नहीं बचा।

​चुनाव की भेंट चढ़ते किसान और पिता की मेहनत को लुटाते बेटे का यह चित्र समाज के युगीन यथार्थ को आईना दिखाता है। ​​पर्यावरण और मासूमियत के प्रति कवयित्री की चिंता हृदयस्पर्शी है। कटते हुए पेड़ों के बीच बिजली के तारों पर बैठी कोयल का बिम्ब विकास की अंधी दौड़ पर एक करारा प्रहार है। वहीं, स्कूल जाती 'नाज़ुक कली' के बहाने वे स्त्री सुरक्षा और शिक्षा की दुआ भी मांगती हैं-

इसे महफूज़ रखना रहम करना या मेरे मालिक, 

ये नाजुक़ सी कली जो गाँव से स्कूल जाती है।


शजर सब कट गये, बैठी हुई बिजली के तारों पर, 

बहुत तकलीफ़ में है फिर भी कोयल गुनगुनाती 

"फिर भी तुम हो" ग़ज़ल ​संग्रह में जहाँ दिल की कोमल भावनाओं के लिए जगह है, वहीं देश की मिट्टी के प्रति अगाध प्रेम भी झलकता है। कश्मीर को दुनिया का इकलौता तोहफ़ा बताना कवयित्री के भारतीय गौरव को दर्शाता है-

हमारे हिन्द को ही सिर्फ़ मालिक ने दिया तोहफ़ा 

कहीं देखा है तुमने दूसरा कश्मीर दुनिया में 

​"फिर भी तुम हो" ग़ज़ल संग्रह डॉ. शोभा दीक्षित 'भावना' के अनुभवों, भावनाओं, सोच और सरोकार का दस्तावेज़ है। उनकी भाषा में रवानी है, ख़्यालों में ताज़गी है और बयान में ईमानदारी है। वे जिस तरह से व्यक्तिगत वेदना को सामाजिक चेतना से जोड़ती हैं, वह अभिव्यक्ति कौशल उन्हें ग़ज़ल की एक समर्थ आवाज़ बनाता है। मेरी शुभकामना है कि वे निरंतर प्रगति पथ पर अग्रसर रहें और ग़ज़ल के कैनवास पर नये नये चित्र बनाती रहें। 

देवमणि पांडेय : 98210 82126

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फ़िल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210 82126


सोमवार, 16 मार्च 2026

गोपाल दास नीरज पर केंद्रित वाङमय पत्रिका

 

वाङमय पत्रिका गोपाल दास नीरज पर केंद्रित 

अलीगढ़ की त्रैमासिक पत्रिका 'वाङमय' ने शताब्दी स्मरण करते हुए गोपाल दास नीरज पर केंद्रित अंक प्रकाशित किया है। इस विशेषांक की अतिथि संपादक हैं डॉ शगुफ्ता नियाज़ और संपादक हैं डॉ एम फ़ीरोज़ अहमद। कालजयी कवि नीरज की रचनात्मकता को जानने समझने, काव्य मंचों पर उनके योगदान और सिने गीतकार के रूप में उनकी उपलब्धियों के आकलन के लिहाज से 392 पेज़ की यह एक बेहद महत्वपूर्ण कृति है।

हिंदी काव्य साहित्य के सबसे लोकप्रिय कवि गोपालदास सक्सेना नीरज का जन्म 4 जनवरी 1925 को हुआ था। अतिथि सम्पादक के अनुसार- "पद्मभूषण गोपालदास 'नीरज' जी की जन्मशती का यह पावन अवसर केवल एक तिथि का स्मरण नहीं, बल्कि शब्द और स्वर के उस महाकुंभ का उत्सव है जिसने आधी सदी से भी अधिक समय तक हिंदी काव्य-चेतना को आलोकित किया। 'वाङमय' का यह विशेषांक उनके विराट व्यक्तित्व, कालजयी कृतित्त्व और उन अनछुए ऐतिहासिक प्रसंगों को समर्पित है, जो अब तक साहित्य की मुख्यधारा की चर्चाओं से ओझल रहे थे।"


'वाङमय' के इस विशेषांक में नीरज पर मेरा भी एक लेख शामिल है-" ए भाइ ज़रा देखके चलो"। उसकी कुछ पंक्तियां मैं आपके लिए यहां पेश कर रहा हूं। .......... बच्चन की परंपरा में नीरज एकमात्र ऐसे कवि हैं जिसमें साहित्यिक गुणवत्ता और मंचीय कौशल एक साथ मौजूद हैं। लगातार सात दशकों तक हिंदी काव्य मंच पर कामयाब पारी खेलने का कीर्तिमान सिर्फ़ नीरज के पास है। नीरज ने कहा था- "नासमझ आदमी की ताली कविता को बरबाद कर देती है।" हिंदी काव्य मंच के साथ भी यही हुआ। कवि सम्मेलन घटियापन के शिकार हो गए। अपने चाहने वालों के लिए नीरज को घटिया मंचों पर भी जाना पड़ा। मगर कभी उन्होंने घटियापन का साथ नहीं दिया। उन्होंने हमेशा अपना स्तर बनाए रखा।

यह सच है कि कवि सम्मेलनों का कवि प्रसाद और निराला नहीं बन सकता। यह भी सच है कि कवि सम्मेलनों में ‘कामायनी’ नहीं 'मधुशाला' पढ़ी जाती है। फिर भी, जिस तरह साहिर और शैलेंद्र के योगदान को महज़ फ़िल्मी गीत कहकर नकारा नहीं जा सकता, ठीक उसी तरह नीरज की मंचीय प्रस्तुति के बावजूद उनके साहित्यिक पक्ष को अनदेखा नहीं किया जा सकता। नीरज के साहित्य में मीरा का दर्द है, सूर की प्यास है, तुलसी की विन्रमता है और इसी के साथ कबीर का फक्कड़न भी है। नीरज ने बौद्धिकता का मायाजाल रचने के बजाय भावनाओं की ऐसी उदात्त धारा प्रवाहित की जिसने हमारे मन-प्राणों को पवित्रता, शीतलता और ताज़गी से भर दिया।

नीरज को जानने और समझने के लिए आपको 'वाङमय' का यह विशेषांक पढ़ना चाहिए। इसमें कुछ ऐसे अनछुए पहलुओं को भी उद्घाटित किया गया है जो शोधार्थियों के लिए बेहद उपयोगी हैं।


नीरज ने स्वीकार किया था-"अपनी कविता द्वारा मनुष्य बनकर मनुष्य तक पहुँचना चाहता हूँ। रास्ते पर कहीं मेरी कविता भटक न जाए, इसलिए उसके हाथ में मैंने प्रेम का दीपक दे दिया है। प्रेम एक ऐसी हृदय-साधना है जो निरंतर हमारी विकृतियों का शमन करती हुई हमें मनुष्यता के निकट ले जाती है।"

नीरज से बढ़के और धनी कौन है यहाँ
उसके हृदय में पीर है सारे जहान की

इस बेमिसाल अंक के लिए संपादकीय टीम को मैं दिल से बधाई देता हूँ। आशा है यह विशेषांक के सभी काव्य प्रेमियों को पसंद आएगा।
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आपका : #देवमणि_पांडेय

सम्पादकीय सम्पर्क : 205- फेज-1, ओहद रेजीडेंसी, नियर पान वाली कोठी, दोदपुर रोड, सिविल लाइन, अलीगढ़-202002 मोबा : 7007606806
E-mail: vangmaya@gmail.com

इस अंक का मूल्य : 300/- रूपये
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शनिवार, 14 मार्च 2026

हिंदी ग़ज़ल के पचास वर्ष : ज्ञान प्रकाश विवेक


हिन्दी ग़ज़ल के पचास वर्ष : ज्ञान प्रकाश विवेक  

दुष्यंत कुमार के बनाए राजमार्ग पर चलते हुए हिन्दी ग़ज़ल ने पचास साल का सफ़र तय कर लिया है। हिन्दी ग़ज़ल में हिंदुस्तानियत की ख़ुशबू है। यहाँ के रीति-रिवाज, परंपरा, समाज, सियासत और संस्कृति से जुड़ाव हिंदी ग़ज़ल की ख़ासियत है।

​पिछली सदी के बहुत सारे ग़ज़लकार 'आकाश में सूराख़' करने के लिए प्रतिबद्ध दिखाई पड़ते थे। इक्कीसवीं सदी की हिन्दी ग़ज़ल में विविधता और नयापन आया है। पहाड़ के दुर्गम रास्तों से निकलकर हिन्दी ग़ज़ल अब मैदानी इलाक़ों में आ गई है। हिंदी काव्य-परंपरा के किनारों को स्पर्श करते हुए वह अपनी धुन में आगे बढ़ रही है। इसलिए आज उसके प्रवाह में शोर-शराबे के बजाय कल-कल का संगीत सुनाई पड़ रहा है। वह नारों और झंडों को पीछे छोड़ चुकी है।

​ज्ञान प्रकाश विवेक के संपादन में 'श्वेतवर्णा प्रकाशन' (नोएडा) से प्रकाशित 'हिंदी गज़ल के पचास वर्ष' पुस्तक हिन्दी ग़ज़लों का एक ख़ूबसूरत गुलदस्ता है। यह ख़ुद में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है। या यूँ कहें कि यह ख़ुद में एक समृद्ध हिन्दी ग़ज़लकोश है। इसमें 238 ऐसे हिन्दी ग़ज़लकार हैं शामिल हैं जिन्होंने दुष्यंत कुमार के बाद हिंदी ग़ज़ल को संवारने और निखारने में योगदान किया है। इस सूची में वरिष्ठ ग़ज़लकारों से लेकर कई युवा ग़ज़लकार भी शामिल हैं। 


अपनी महत्वपूर्ण भूमिका में ज्ञान जी ने हिन्दी ग़ज़ल की विकास यात्रा का बहुत सुन्दर आकलन पेश किया है। उनके अनुसार- "हिन्दी ग़ज़ल का व्यापक होता परिसर, इस बात की तस्दीक है कि हिन्दी ग़ज़ल लेखकों ने, गज़ल विधा में नया रचने का हर संभव प्रयास किया है। इस दौर में बहुत सशक्त, प्रयोगधर्मी और आकर्षण पैदा करती ग़ज़लें लिखी गई हैं। पचास वर्ष के सफ़र में ग़ज़ल ने विधा के रूप में अपना स्थान अर्जित किया है तो बात स्पष्ट है कि अच्छी ग़ज़लें अधिक लिखी गई हैं।" 

​एक दृष्टि सम्पन्न आलोचक होने के साथ ही ज्ञान प्रकाश विवेक बेहतरीन ग़ज़लकार भी हैं। बिना किसी भेदभाव के उन्होंने इस संकलन में ऐसे ग़ज़लकारों को भी शामिल किया है जो प्यार-मोहब्बत जैसे विषयों को भी अपनी ग़ज़ल में बख़ूबी अभिव्यक्त कर रहे हैं। कुल मिलाकर यह पुस्तक ग़ज़ल प्रेमियों और शोधार्थियों के लिए बेहद उपयोगी किताब है। इस नेक काम को अंजाम तक पहुँचाने के लिए संपादक ज्ञान प्रकाश विवेक और श्वेतवर्णा प्रकाशन को हार्दिक बधाई। 519 पेज़ की इस किताब का मूल्य 799 रूपये है। 

 

आपका : देवमणि पांडेय 98210 82126 

सम्पर्क : Shwetwarna Prakashan

212 A, Express View Apartment Super MIG, Sector 93, Noida-201304, INDIA

Mobile: +91 8447540078

Email: shwetwarna@gmail.com

Website: www.shwetwarna.com


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अनामिका सिंह का ग़ज़ल संग्रह

 

'राहतों के नाम पर बेचैनियाँ' अनामिका सिंह का ग़ज़ल संग्रह

ग़ज़ल के सुपरिचित तौर तरीक़ों से बाहर निकल कर अपनी भाषा में, अपने अंदाज में, अपनी ग़ज़ल कहना बड़े हुनर का काम है और यह काम ग़ज़लकार अनामिका सिंह बख़ूबी कर रही हैं। श्वेतवर्णा प्रकाशन (नोएडा) से अनामिका सिंह का ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित हुआ है- 'राहतों के नाम पर बेचैनियाँ'। यह संग्रह साबित करता है कि अनामिका के पास वह अभिव्यक्ति कौशल है जो उन्हें एक विशिष्ट पहचान देता है। 

आसपास के जो मंज़र दिल को प्रभावित करते हैं, जो दृश्य आँखों में उतर आते हैं, जो अनुभव मन को विचलित कर देते हैं, उन्हें वे बड़े सलीक़े से अपनी रचनात्मकता का हिस्सा बनाती हैं। सृजन की इस यात्रा में उनके यहाँ कुछ विलक्षण मुक़ाम आते हैं। अचानक वे कुछ ऐसे चित्र और चरित्र हमारे सामने पेश कर देती हैं जो ग़ज़ल की दुनिया में सर्वथा नए हैं। ये किरदार अपने सुख-दुख और अपनी जिजीविषा के साथ हमारे सामने आते हैं और हमेशा के लिए हमारी स्मृति का हिस्सा बन जाते हैं-

सैलून में खड़ीं जो सुबह शाम लड़कियां

दिन भर में कितने करती हैं वो काम लड़कियां


हर कस्टमर को डील करे हैं वो जूझकर

पाती नहीं है दो घड़ी आराम लड़कियां 

अनामिका सिंह का ग़ज़ल संग्रह साहित्य के दरवाज़े पर एक ताज़ा दस्तक है। अनामिका के पास दूसरों के दुख को महसूस करने की शक्ति है तथा उससे उबरने की कोशिश भी है। वे हौसले को बचाए रखने का हुनर जानती हैं। उनका यह शेर उम्मीदों की नई कोपलें फूटने का आश्वासन देता है-

​डाली ने हौसला दिया पतझड़ में पेड़ को

मत हो उदास आएंगे ख़ुशियों के पात और


अनामिका की ग़ज़लों के कथ्य में विविधता है। वे समय के सवाल और समाज की समस्याओं से जुड़ी हैं। उनकी सोच और सरोकार के दायरे में वे लोग शामिल हैं जो ज़िन्दगी की दौड़ में पीछे छूट गए हैं। वे ऐसे लोगों के दुख-दर्द और पीड़ा को शब्द देती हैं। एक माँ की बेबसी और व्यवस्था की नाकामी को वे इस तरह रेखांकित करती हैं कि पाठक उनके मर्म को महसूस कर सके-

​ख़ाली पतीली देख तब आंसू ढुलक पड़े

बच्चों ने मां से बोला परस थोड़े भात और

​देश के मौजूदा हालात और राजनीति की विसंगतियों पर कई जगह अनामिका का तंज बेहद नुकीला है। वे विडंबनाओं को उजागर करने के लिए देशज मुहावरों का इस्तेमाल एक हथियार की तरह करती हैं-

बूढ़ा बरगद, चलती आरी, देख परिन्दे हैरां हैं 

सदमे से काँपी है डाली, क्या कहना है सब चंगा 

​जब घर बँटता है तो सिर्फ़ दीवारें नहीं खड़ी होतीं, स्मृतियाँ और रिश्ते भी लहूलुहान होते हैं। अनामिका इस दर्द को बड़ी ही सादगी से बयां करती हैं-

​घर ईंट-ईट बँट गया, दालान बँट गया

लो माँ के साथ-साथ ये सामान बँट गया

कट बँट गये दरख़्त कभी छाँव थे किये 

तुलसी बँटी औ' काँच का गुलदान बँट गया

​तुलसी का बँटना और काँच के गुलदान का बँटना उस परम्परा, संस्कृति और पारिवारिक मूल्यों की ओर संकेत करता है जिसे आधुनिकता की दौड़ में हम खोते जा रहे हैं।

​बेरोज़गारी का क़हर हो या सड़क पर दम तोड़ती इंसानियत, उनकी क़लम हर मुद्दे पर मुखर है। वे समय की रफ़्तार पर सवाल उठाती हैं कि सीढ़ियाँ तो चढ़ी-उतरी जा रही हैं, पर बदलाव की सुबह कहाँ है?

​सड़क पर हादसे कितने, मगर है फ़र्क भी किसको

किसी की जान को कोई बचाने कब उतरता है

​अनामिका सिंह की ग़ज़लों में सादा ज़बान, अभिव्यक्ति का कौशल और वह ताज़गी है जिसकी आज के समय को दरकार है। वे अपनी ग़ज़लों के ज़रिए अन्याय, शोषण और संवेदनहीनता के ख़िलाफ़ प्रतिरोध दर्ज करती हैं। यह संग्रह हिंदी ग़ज़ल के भविष्य के लिए एक बेहतर संभावना का संकेत देता है।

काव्य भाषा और कथ्य के स्तर पर अनामिका के यहाँ बेहद ताज़गी और नयापन है। वस्तुतः यही उनकी रचनात्मकता की उपलब्धि है। वे समय के साथ चलते हुए समाज को देखती हैं। आसपास जो स्याह रंग हैं, दुख, अभाव और संत्रास है, वे सभी उनकी ग़ज़लों का कथ्य बन जाते हैं। अभिव्यक्ति की इस प्रक्रिया में वे कभी-कभी नुकीले और अनगढ़ शब्दों से भी काम लेती हैं। उन्हें इस बात पर ध्यान देना चाहिए ग़ज़ल ऐसी नाजुक़ काव्य विधा है जो हर लफ़्ज़ का बोझ नहीं उठा सकती। कुल मिलाकर अनामिका ने अपने इस संकलन के ज़रिए ग़ज़ल की विकास यात्रा में बेहतर योगदान दिया है। मैं उन्हें दिल से बधाई देता हूँ। 

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आपका : 

देवमणि पांडेय : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063 

मो : 98210 82126


सम्पर्क : Shwetwarna Prakashan
212 A, Express View Apartment Super MIG, Sector 93, Noida-201304, INDIA

Mobile: +91 8447540078
Email: shwetwarna@gmail.com
Website: www.shwetwarna.com
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उर्दू अदीबों की दुनिया में कमलेश भट्ट कमल

उर्दू अदीबों की दुनिया में कमलेश भट्ट कमल 

सुपरिचित हिंदी ग़ज़लकार और आलोचक कमलेश भट्ट कमल एक नायाब पुस्तक लेकर आपके सामने आए हैं जिसका नाम है-'उर्दू अदीबों की दुनिया में'। इसमें वली, चकबस्त, सुरूर, फ़ैज़ और फ़िराक़ से लेकर राही मासूम रज़ा, नक़्श लायलपुरी, जानकी प्रसाद शर्मा और वसीम बरेलवी जैसे पंद्रह प्रतिष्ठित शायरों की मौजूदगी इसे महत्वपूर्ण बनाती है। इन शायरों के बारे में विस्तृत जानकारी उपलब्ध कराने के साथ ही इस पुस्तक में अदब के बारे में इनके नज़रिए को सामने लाने की सराहनीय कोशिश की गई है। इस संग्रह में कमाल अमरोही एवं जॉन एलिया से संबंधित संस्मरण भी है जो अमरोहा के एक ऐसे मकान की यात्रा से जुड़ा हुआ है जो दोनों शायरों का पैतृक मकान रहा है।

पुस्तक के पंद्रह में से सात अदीबों से लेखक की मुलाक़ातें हुई हैं। हिंदी-उर्दू दोनों साहित्य में आवाजाही करने वाले डॉ जानकी प्रसाद शर्मा एक मात्र ऐसे आलोचक हैं जो हिंदी ग़ज़ल के साथ लगातार खड़े रहे हैं। सन् 1977 में जब हिंदी ग़ज़ल की एक विधा के रूप में चर्चा शुरू ही हुई थी तब अपने एक लेख "हिंदी ग़ज़ल की प्रकृति" में डॉ जानकी प्रसाद शर्मा खुले तौर पर हिंदी ग़ज़ल को एक स्वतंत्र और समर्थ रचना विधा के रूप में न केवल मान्यता देते हैं और रेखांकित करते हैं बल्कि वह ऐसे लोगों को खड़ा जवाब भी देते हैं जो यह कहते हैं कि ग़ज़ल उर्दू के मूल व्यक्तित्व के साथ हिंदी में परिग्रहीत हुई है।


इस पुस्तक को तैयार करने में कमलेश भट्ट कमल ने भरपूर मेहनत की है। शायर सिने गीतकार नक़्श लायलपुरी से यूं तो उनकी मुलाक़ात हो चुकी थी लेकिन उसे अद्यतन करने के लिए उन्होंने मुझसे फ़ोन पर कई बार चर्चा की। इस सिलसिले में नक़्श लायलपुरी पर लिखी मेरी एक फेसबुक पोस्ट का उन्होंने बहुत सुंदर उपयोग किया है। इसी सिलसिले में उन्होंने ऐसे 19 रचनाकार मित्रों को भी धन्यवाद दिया है जिनसे इस किताब को सामने लाने में कुछ न कुछ सहायता मिली है। पुस्तक की अनुशंसा एवं भूमिका के लिए उन्होंने उर्दू के सुप्रसिद्ध साहित्यकार पद्मश्री शीन काफ़ निज़ाम और राष्ट्रीय सहारा (उर्दू) के पूर्व संपादक डॉ असद रज़ा का आभार व्यक्त किया है।

स्वयं लेखक के अनुसार 'उर्दू अदीबों की दुनिया में' पुस्तक को पढ़कर आप इन अदीबों की दुनिया से अच्छी तरह तो परिचित होंगे ही, यह भी जान सकेंगे कि इन रचनाकारों की दुनिया कितने संघर्षों, कितनी रचनात्मकताओं, कितने जोश और जज़्बे से भरी हुई रही है।

ग़ज़ल और ग़ज़ल से संबंधित गद्य पुस्तकों के प्रकाशन में जिस तरह से "श्वेतवर्णा प्रकाशन" ने योगदान किया है वह बेहद क़ाबिले तारीफ़ है। इस पुस्तक को सामने लाने के लिए कमलेश भट्ट कमल ने श्वेतवर्णा प्रकाशन के राहुल शिवाय और शारदा सुमन के सहयोग को रेखांकित किया है।

इस महत्वपूर्ण पुस्तक के लिए मैं लेखक मित्र कमलेश भट्ट कमल को हार्दिक बधाई देता हूँ। 223 पेज की इस पेपर बैक पुस्तक का मूल्य 499 रूपये है।

आपका : #देवमणि_पांडेय

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