शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026

मृदुला मिश्र का काव्य संग्रह स्रोतस्विनी

 मृदुला मिश्र का काव्य संग्रह स्रोतस्विनी 

कवयित्री मृदुला मिश्र का काव्य संग्रह 'स्रोतस्विनी' हमारे समय की विसंगतियों, मानवीय पीड़ा और आंतरिक संघर्ष को वाणी देता है। उनकी कविताएँ उस संवेदनशील मन की अभिव्यक्ति हैं जो न केवल समाज की दुखती रगों को पहचानता है, बल्कि गहरे आत्म-मंथन में उतरकर यथार्थ का सामना भी करता है।


कवयित्री की रचनाधर्मिता आम आदमी के सुख-दुख से जुड़ी है। “मौन पड़ गया गीत” दरअसल उस रचनाकार की पुकार है जो भीषण त्रासदी के सामने शब्दों की निरर्थकता महसूस करता है। "जाने कौन घोल गया, हवाओं ही में ज़हर" का प्रश्न उस आधुनिक प्रदूषण और अराजकता की ओर इशारा करता है जो हमारे भौतिक और नैतिक वातावरण को दूषित कर रही हैं।


​मृदुला मिश्र केवल व्यक्तिगत या सामाजिक दुख तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि वे व्यापक वैश्विक संकट पर भी गंभीर चिंतन करती हैं। ”हर जगह चल रही है, युद्ध की विभीषिका" जैसी पंक्तियों में मानवता के विनाशकारी परिदृश्य पर चिंता व्यक्त की गई है। यह कविता मनुष्य को आत्म-विनाश के कगार पर खड़ा देखती है। 'नदी' को "सर्प की जिव्हा-सी लपलपाती" और "अपने अंदर की सारी गंदगी" का वमन करते हुए दिखाना, मनुष्य के बुरे कर्मों से उपजे "गूंगे-बहरे समाज" का बिम्ब है। यह पर्यावरण और नैतिक पतन के अंतर्संबंधों को रेखांकित करता है।


कवयित्री की दृष्टि बाहर के कोलाहल से मुड़कर भीतर की गहराइयों में भी उतरती है। "रात विक्षुब्ध, क्लांत होकर / अतीत को सहलाती है। / और मैं मंत्रों के वशीभूत हो / आत्मा की गहराई में उतर जाती हूँ" – ऐसी पंक्तियाँ हैं जो गहन आत्म-चिंतन और मन की गहराईयों में झांकने का संकेत देती हैं। यह संग्रह एक यात्रा है जहाँ कवयित्री बाह्य जगत की आहटों को अपने अंतर्मन में साधती है।


​स्त्री जीवन की जटिलताएँ और उसके अस्तित्व का संघर्ष इस संग्रह का एक महत्वपूर्ण आयाम है। "मौन रहकर बहुत कुछ कहने से बच जाती है स्त्री" या "रात आते ही अपने-आप में सिहर जाती है स्त्री" जैसे चित्रण स्त्री की सामयिक सोच और उसकी आंतरिक असुरक्षा को व्यक्त करते हैं। 'कील' कविता इस पहचान की खोज को नया मोड़ देती है, जहाँ कवयित्री आह्वान करती है कि स्त्री "कील से नहीं ख़ुशियों से" अपना घर बनाए, जो उसकी भावनात्मक और वास्तविक स्वतंत्रता की ओर इशारा है।


गहन यथार्थ के बीच कुछ कविताएँ स्मृतियों के सुखद शरणस्थल की ओर ले जाती हैं। "बस एक बार आ जाओ / बचपन जी लें हम दोबारा" और मायके को "सारे जगत में सबसे सुंदर सबसे न्यारा" घोषित करने वाली पंक्तियाँ बताती हैं कि निराशा के बीच भी, जीवन की बाती को जलाने के लिए कवयित्री बचपन की मासूमियत और प्रेम की थाती को ही सच्चा आश्रय मानती है।


​मृदुला मिश्र का यह काव्य संग्रह 'स्रोतस्विनी' सोच, संवेदना और संघर्ष का सृजनात्मक संगम है। यह हमें चुनौती देता है कि हम अपने आस-पास के शोर और भीतर के मौन दोनों को सुनें। मृदुला मिश्र की कविताएँ समय के माथे पर लिखी गई वह ईमानदार टिप्पणी है, जो पाठकों को केवल सोचने पर ही नहीं, बल्कि महसूस करने पर भी मजबूर करती है। इस सुंदर काव्य संग्रह के लिए मैं उन्हें हार्दिक बधाई देता हूं। वे रचनाकार जगत में अपनी एक महत्वपूर्ण पहचान बनाने में कामयाब हों, यही मेरी शुभकामना है।


देवमणि पांडेय : 98210 82126 

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गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026

समय समाज और संवेदना का दस्तावेज़ 'नवाइयत'

 

समय समाज और संवेदना का दस्तावेज़ 'नवाइयत'

​वर्तमान ग़ज़ल-परिदृश्य में शायर नवीन जोशी 'नवा' ने देश विदेश में अपनी उल्लेखनीय पहचान बनाई है। नवा का प्रथम ग़ज़ल-संग्रह 'नवाइयत' इस बात का प्रमाण है कि शिल्प और तकनीकी बंदिशों के इल्म के साथ ही उनके पास जीवन का गहरा अनुभव, संवेदना की आँच तथा समय और समाज को अभिव्यक्ति करने का नज़रिया भी है। 

कहा जाता है कि शायरी में सब कुछ कहा जा चुका है। यानी कहने के लिए कुछ नया विषय नहीं है। यह भी माना जाता है कि किसी शायर का अंदाज़ ए बयां ही उसकी रचनात्मकता को नया रंग रूप देता है। उसे एक नई पहचान अता करता है। इस सिलसिले में नवीन जोशी नवा के चंद अशआर देखे जा सकते हैं जो उनके विशिष्ट अंदाज़ ए बयां की मिसाल हैं - 


इतने पंछी पकड़े फिर भी ये न समझ पाया सय्याद

पिंजरे में जो गूँगे थे वो पेड़ पे कैसे गाते हैं


तुम्हें चंदा कहेंगे हम, अगर रातों में तुम चमको

तुम्हें सूरज भी कह देंगे, सवेरा तो करो पहले


इश्क़ की राह पर इक बार टहल कर आया

ज़िंदगी भर कभी फिर पाँव के छाले न गए


शायद ये बात उससे न कह पाऊँ मैं कभी

उसका ख़याल उससे ज़ियादा हसीन है


किसी को नींद मिली तो किसी को ख़्वाब मिला 

हर आदमी को यहाँ उसका इंतिख़ाब मिला

'नवा' की शायरी का सबसे मजबूत पक्ष है अपनी मिट्टी, अपने परिवेश और मनुष्यता से गहरी प्रगाढ़ता। वे मनुष्य के भीतर की कोमलता और संवेदनशीलता को सुरक्षित देखना चाहते हैं। उनका यह शेर इस बात की उम्दा मिसाल है-


​नमी हो जिसकी आँखों में वो बंजर हो नहीं सकता।

जिसे मिट्टी से निस्बत हो वो पत्थर हो नहीं सकता।


यह शेर मनुष्य के भीतर बचे रहने वाले करुणा भाव का उद्घोष है। जो व्यक्ति अपनी जड़ों यानी मिट्टी से जुड़ा है, जिसकी आँखों में भावनाओं की नमी है, वह कभी संवेदनहीन नहीं हो सकता। समय और समाज पर 'नवा' की गहरी पकड़ है। उनका यह शेर वैश्विक स्तर पर नफ़रत की राजनीति और अमानवीयता पर करारा प्रहार करता है-


​ज़माने भर की लाशों पर भी हो जाए खड़ी नफ़रत,

पर उसका क़द मुहब्बत के बराबर हो नहीं सकता।

​यहाँ शायर ने नफ़रत और मुहब्बत के क़द का बहुत ही अनोखा और विराट बिंब उकेरा है। चाहे हालात कितने भी विभाजनकारी क्यों न हों, नफ़रत का ढांचा कितना भी विशाल क्यों न लगे, प्रेम की ऊँचाई और उसका प्रभाव हमेशा उससे श्रेष्ठ और बड़ा रहता है। 'नवा' की ग़ज़लों की ख़ूबी यह है कि वे बड़े से बड़े दार्शनिक और गहरे सत्य को बेहद सरलता और सहजता से कह जाते हैं। उनके शेरों में निहित यही मौलिकता पाठकों के दिल को सीधा छूती है-


​किसी ख़ामोश कहानी की तरह रहता है।

दर्द हर आँख में पानी की तरह रहता है।


​दर्द का मानवीकरण और उसे हर आँख में 'पानी' की तरह स्वाभाविक रूप से मौजूद बताना इस शेर की ख़ूबी है। यह शेर हर आम आदमी के भीतर छिपी उस ख़ामोश दास्तान को बयान करता है जिसे हर व्यक्ति अपने जीवन में जीता है। जीवन की सहजता और मासूमियत को दर्शाती हुई उनकी एक अन्य बानगी देखिए-


​उसको क्या मालूम वो ख़ुशियाँ लाती है।

चिड़िया तो बस दाना चुगने आती है।


यह शेर जीवन के उन अनजाने पलों और चेहरों की ओर इशारा करता है जो हमारे जीवन में ख़ुशियों की सौग़ात ले आते हैं पर उन्हें ख़ुद इस बात का अहसास तक नहीं होता। इसमें प्रकृति और जीवन का एक बेहद ख़ूबसूरत और भोला-भाला संसार बसता है। आध्यात्मिक और आन्तरिक खोज को नवीन जोशी नवा ने बहुत ही सलीक़े से ज़मीनी फ़लक पर उतारा है। ईश्वर या परमसत्य को आसमान की ऊँचाइयों में खोजने के बजाय अपने भीतर और अपनी आसपास की दुनिया में तलाशने का संदेश उनका यह शेर देता है-


​तुझे आसमाँ भी ज़मीं पर मिलेगा।

जहाँ सर झुकाया वहीं पर मिलेगा।


यह समर्पण और आस्था का वह बिंदु है जहाँ साधक और साध्य के बीच की दूरी समाप्त हो जाती है। नवीन जोशी 'नवा' के पास किसी भी कथ्य की अभिव्यक्ति के लिए अपना ख़ास अंदाज़ ए बयां मौजूद है। संग्रह के एक शेर में शायर का आत्मविश्वास देखते ही बनता है-


​मुझसे मिलना हो तो फिर वक़्त कोई शर्त नहीं

मैं तो शाइर हूँ मेरे बा’द भी मिल सकता हूँ


​यह शेर कालजयी कला और एक रचनाकार की अमरता का घोषणा पत्र है। एक भौतिक शरीर भले ही न रहे लेकिन एक कलाकार, एक शाइर अपने शब्दों, अपने कला-कर्म और अपनी ग़ज़लों के माध्यम से सदियों तक जीवंत रहता है।

​नवीन जोशी 'नवा' का ग़ज़ल संग्रह 'नवाइयत' वर्तमान समय, आधुनिक समाज और गहरी सोच का जीवंत दस्तावेज़ है। जब शायरी ज़मीन की ख़ुशबू, इंसान की सम्वेदना और मुहब्बत की ऊष्मा से जुड़ती है तो वह कालजयी बन जाती है। 'नवाइयत' की इन ग़ज़लों में भावनाओं का सहज प्रवाह है, फ़िक्र की परवाज़ है और समकालीन जीवन के संघर्ष को अभिव्यक्त करने का सलीक़ा है। कुल मिलाकर 'नवाइयत' आधुनिक ग़ज़ल की परंपरा में एक मूल्यवान और सार्थक इज़ाफ़ा है। यह ग़ज़ल संग्रह पाठकों को सोचने और महसूस करने के लिए नए आयाम देता है।

मेरी दिली कामना है कि नवीन जोशी 'नवा' इसी तरह रचनात्मकता का सफ़र तय करते हुए प्रगति पथ पर अग्रसर रहें। मुझे यह भी उम्मीद है कि उनकी ख़ूबसूरत ग़ज़लें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी विशिष्ट पहचान बनाएंगी। 

आपका : देवमणि पांडेय 

सम्पर्क : 98210 82126 

मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026

नंदलाल पाठक साहित्य सम्मान समारोह

 




नंदलाल पाठक साहित्य सम्मान समारोह 

हिंदी ग़ज़ल साहित्य में विशिष्ट योगदान के लिए वरिष्ठ ग़ज़लकार माधव कौशिक और डॉ भावना को नंदलाल पाठक साहित्य सम्मान से सम्मानित किया गया। पुरस्कार स्वरूप उन्हें स्मृति चिन्ह, सम्मान पत्र और ढाई लाख रूपये की धनराशि भेंट की गई। ग़ज़लकार गरिमा सक्सेना को नंदलाल पाठक प्रतिभा पुरस्कार (स्मृति चिन्ह, सम्मान पत्र और एक लाख रूपये) से सम्मानित किया गया। 


साहित्यायन फाउंडेशन मुम्बई की ओर से शनिवार 17 अक्टूबर 2026 को आईएनटी आदित्य बिरला परफार्मिंग आर्ट्स एकेडमी, मुम्बई में आयोजित एक साहित्य समारोह में मुख्य अतिथि सांसद सुधांशु त्रिवेदी और समारोहाध्यक्ष पद्मभूषण श्रीमती राजश्री बिरला ने तीनों रचनाकारों को पुरस्कार प्रदान करके सम्मानित किया। कार्यक्रम का संचालन शायर देवमणि पांडेय ने किया। मंच पर मौजूद वरिष्ठ ग़ज़लकार प्रो नंदलाल पाठक ने सभी को शुभकामनाएँ दीं। 


इस अवसर पर आयोजित ग़ज़ल संध्या में ग़ज़ल पाठ करने वाले रचनाकार थे- नवीन जोशी नवा, गरिमा सक्सेना, माधव कौशिक, डॉ भावना, देवमणि पांडेय, डॉ सुमन जैन, नंदलाल लाल पाठक और वृषाली बियानी।


सभागार में कला और साहित्य की दुनिया से जुड़े हुए गणमान्य लोग अच्छी संख्या में मौजूद थे। जानेमाने उद्योगपति कुमार मंगलम बिरला ने भी अपनी मौजूदगी से कार्यक्रम की गरिमा बढ़ाई।





सम्पर्क : देवमणि पांडेय 98210 82126 

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