सोमवार, 16 मार्च 2026

गोपाल दास नीरज पर केंद्रित वाङमय पत्रिका

 

वाङमय पत्रिका गोपाल दास नीरज पर केंद्रित 

अलीगढ़ की त्रैमासिक पत्रिका 'वाङमय' ने शताब्दी स्मरण करते हुए गोपाल दास नीरज पर केंद्रित अंक प्रकाशित किया है। इस विशेषांक की अतिथि संपादक हैं डॉ शगुफ्ता नियाज़ और संपादक हैं डॉ एम फ़ीरोज़ अहमद। कालजयी कवि नीरज की रचनात्मकता को जानने समझने, काव्य मंचों पर उनके योगदान और सिने गीतकार के रूप में उनकी उपलब्धियों के आकलन के लिहाज से 392 पेज़ की यह एक बेहद महत्वपूर्ण कृति है।

हिंदी काव्य साहित्य के सबसे लोकप्रिय कवि गोपालदास सक्सेना नीरज का जन्म 4 जनवरी 1925 को हुआ था। अतिथि सम्पादक के अनुसार- "पद्मभूषण गोपालदास 'नीरज' जी की जन्मशती का यह पावन अवसर केवल एक तिथि का स्मरण नहीं, बल्कि शब्द और स्वर के उस महाकुंभ का उत्सव है जिसने आधी सदी से भी अधिक समय तक हिंदी काव्य-चेतना को आलोकित किया। 'वाङमय' का यह विशेषांक उनके विराट व्यक्तित्व, कालजयी कृतित्त्व और उन अनछुए ऐतिहासिक प्रसंगों को समर्पित है, जो अब तक साहित्य की मुख्यधारा की चर्चाओं से ओझल रहे थे।"


'वाङमय' के इस विशेषांक में नीरज पर मेरा भी एक लेख शामिल है-" ए भाइ ज़रा देखके चलो"। उसकी कुछ पंक्तियां मैं आपके लिए यहां पेश कर रहा हूं। .......... बच्चन की परंपरा में नीरज एकमात्र ऐसे कवि हैं जिसमें साहित्यिक गुणवत्ता और मंचीय कौशल एक साथ मौजूद हैं। लगातार सात दशकों तक हिंदी काव्य मंच पर कामयाब पारी खेलने का कीर्तिमान सिर्फ़ नीरज के पास है। नीरज ने कहा था- "नासमझ आदमी की ताली कविता को बरबाद कर देती है।" हिंदी काव्य मंच के साथ भी यही हुआ। कवि सम्मेलन घटियापन के शिकार हो गए। अपने चाहने वालों के लिए नीरज को घटिया मंचों पर भी जाना पड़ा। मगर कभी उन्होंने घटियापन का साथ नहीं दिया। उन्होंने हमेशा अपना स्तर बनाए रखा।

यह सच है कि कवि सम्मेलनों का कवि प्रसाद और निराला नहीं बन सकता। यह भी सच है कि कवि सम्मेलनों में ‘कामायनी’ नहीं 'मधुशाला' पढ़ी जाती है। फिर भी, जिस तरह साहिर और शैलेंद्र के योगदान को महज़ फ़िल्मी गीत कहकर नकारा नहीं जा सकता, ठीक उसी तरह नीरज की मंचीय प्रस्तुति के बावजूद उनके साहित्यिक पक्ष को अनदेखा नहीं किया जा सकता। नीरज के साहित्य में मीरा का दर्द है, सूर की प्यास है, तुलसी की विन्रमता है और इसी के साथ कबीर का फक्कड़न भी है। नीरज ने बौद्धिकता का मायाजाल रचने के बजाय भावनाओं की ऐसी उदात्त धारा प्रवाहित की जिसने हमारे मन-प्राणों को पवित्रता, शीतलता और ताज़गी से भर दिया।

नीरज को जानने और समझने के लिए आपको 'वाङमय' का यह विशेषांक पढ़ना चाहिए। इसमें कुछ ऐसे अनछुए पहलुओं को भी उद्घाटित किया गया है जो शोधार्थियों के लिए बेहद उपयोगी हैं।


नीरज ने स्वीकार किया था-"अपनी कविता द्वारा मनुष्य बनकर मनुष्य तक पहुँचना चाहता हूँ। रास्ते पर कहीं मेरी कविता भटक न जाए, इसलिए उसके हाथ में मैंने प्रेम का दीपक दे दिया है। प्रेम एक ऐसी हृदय-साधना है जो निरंतर हमारी विकृतियों का शमन करती हुई हमें मनुष्यता के निकट ले जाती है।"

नीरज से बढ़के और धनी कौन है यहाँ
उसके हृदय में पीर है सारे जहान की

इस बेमिसाल अंक के लिए संपादकीय टीम को मैं दिल से बधाई देता हूँ। आशा है यह विशेषांक के सभी काव्य प्रेमियों को पसंद आएगा।
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आपका : #देवमणि_पांडेय

सम्पादकीय सम्पर्क : 205- फेज-1, ओहद रेजीडेंसी, नियर पान वाली कोठी, दोदपुर रोड, सिविल लाइन, अलीगढ़-202002 मोबा : 7007606806
E-mail: vangmaya@gmail.com

इस अंक का मूल्य : 300/- रूपये
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शनिवार, 14 मार्च 2026

हिंदी ग़ज़ल के पचास वर्ष : ज्ञान प्रकाश विवेक


हिन्दी ग़ज़ल के पचास वर्ष : ज्ञान प्रकाश विवेक  

दुष्यंत कुमार के बनाए राजमार्ग पर चलते हुए हिन्दी ग़ज़ल ने पचास साल का सफ़र तय कर लिया है। हिन्दी ग़ज़ल में हिंदुस्तानियत की ख़ुशबू है। यहाँ के रीति-रिवाज, परंपरा, समाज, सियासत और संस्कृति से जुड़ाव हिंदी ग़ज़ल की ख़ासियत है।

​पिछली सदी के बहुत सारे ग़ज़लकार 'आकाश में सूराख़' करने के लिए प्रतिबद्ध दिखाई पड़ते थे। इक्कीसवीं सदी की हिन्दी ग़ज़ल में विविधता और नयापन आया है। पहाड़ के दुर्गम रास्तों से निकलकर हिन्दी ग़ज़ल अब मैदानी इलाक़ों में आ गई है। हिंदी काव्य-परंपरा के किनारों को स्पर्श करते हुए वह अपनी धुन में आगे बढ़ रही है। इसलिए आज उसके प्रवाह में शोर-शराबे के बजाय कल-कल का संगीत सुनाई पड़ रहा है। वह नारों और झंडों को पीछे छोड़ चुकी है।

​ज्ञान प्रकाश विवेक के संपादन में 'श्वेतवर्णा प्रकाशन' (नोएडा) से प्रकाशित 'हिंदी गज़ल के पचास वर्ष' पुस्तक हिन्दी ग़ज़लों का एक ख़ूबसूरत गुलदस्ता है। यह ख़ुद में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है। या यूँ कहें कि यह ख़ुद में एक समृद्ध हिन्दी ग़ज़लकोश है। इसमें 238 ऐसे हिन्दी ग़ज़लकार हैं शामिल हैं जिन्होंने दुष्यंत कुमार के बाद हिंदी ग़ज़ल को संवारने और निखारने में योगदान किया है। इस सूची में वरिष्ठ ग़ज़लकारों से लेकर कई युवा ग़ज़लकार भी शामिल हैं। 


अपनी महत्वपूर्ण भूमिका में ज्ञान जी ने हिन्दी ग़ज़ल की विकास यात्रा का बहुत सुन्दर आकलन पेश किया है। उनके अनुसार- "हिन्दी ग़ज़ल का व्यापक होता परिसर, इस बात की तस्दीक है कि हिन्दी ग़ज़ल लेखकों ने, गज़ल विधा में नया रचने का हर संभव प्रयास किया है। इस दौर में बहुत सशक्त, प्रयोगधर्मी और आकर्षण पैदा करती ग़ज़लें लिखी गई हैं। पचास वर्ष के सफ़र में ग़ज़ल ने विधा के रूप में अपना स्थान अर्जित किया है तो बात स्पष्ट है कि अच्छी ग़ज़लें अधिक लिखी गई हैं।" 

​एक दृष्टि सम्पन्न आलोचक होने के साथ ही ज्ञान प्रकाश विवेक बेहतरीन ग़ज़लकार भी हैं। बिना किसी भेदभाव के उन्होंने इस संकलन में ऐसे ग़ज़लकारों को भी शामिल किया है जो प्यार-मोहब्बत जैसे विषयों को भी अपनी ग़ज़ल में बख़ूबी अभिव्यक्त कर रहे हैं। कुल मिलाकर यह पुस्तक ग़ज़ल प्रेमियों और शोधार्थियों के लिए बेहद उपयोगी किताब है। इस नेक काम को अंजाम तक पहुँचाने के लिए संपादक ज्ञान प्रकाश विवेक और श्वेतवर्णा प्रकाशन को हार्दिक बधाई। 519 पेज़ की इस किताब का मूल्य 799 रूपये है। 

 

आपका : देवमणि पांडेय 98210 82126 

सम्पर्क : Shwetwarna Prakashan

212 A, Express View Apartment Super MIG, Sector 93, Noida-201304, INDIA

Mobile: +91 8447540078

Email: shwetwarna@gmail.com

Website: www.shwetwarna.com


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अनामिका सिंह का ग़ज़ल संग्रह

 

'राहतों के नाम पर बेचैनियाँ' अनामिका सिंह का ग़ज़ल संग्रह

ग़ज़ल के सुपरिचित तौर तरीक़ों से बाहर निकल कर अपनी भाषा में, अपने अंदाज में, अपनी ग़ज़ल कहना बड़े हुनर का काम है और यह काम ग़ज़लकार अनामिका सिंह बख़ूबी कर रही हैं। श्वेतवर्णा प्रकाशन (नोएडा) से अनामिका सिंह का ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित हुआ है- 'राहतों के नाम पर बेचैनियाँ'। यह संग्रह साबित करता है कि अनामिका के पास वह अभिव्यक्ति कौशल है जो उन्हें एक विशिष्ट पहचान देता है। 

आसपास के जो मंज़र दिल को प्रभावित करते हैं, जो दृश्य आँखों में उतर आते हैं, जो अनुभव मन को विचलित कर देते हैं, उन्हें वे बड़े सलीक़े से अपनी रचनात्मकता का हिस्सा बनाती हैं। सृजन की इस यात्रा में उनके यहाँ कुछ विलक्षण मुक़ाम आते हैं। अचानक वे कुछ ऐसे चित्र और चरित्र हमारे सामने पेश कर देती हैं जो ग़ज़ल की दुनिया में सर्वथा नए हैं। ये किरदार अपने सुख-दुख और अपनी जिजीविषा के साथ हमारे सामने आते हैं और हमेशा के लिए हमारी स्मृति का हिस्सा बन जाते हैं-

सैलून में खड़ीं जो सुबह शाम लड़कियां

दिन भर में कितने करती हैं वो काम लड़कियां


हर कस्टमर को डील करे हैं वो जूझकर

पाती नहीं है दो घड़ी आराम लड़कियां 

अनामिका सिंह का ग़ज़ल संग्रह साहित्य के दरवाज़े पर एक ताज़ा दस्तक है। अनामिका के पास दूसरों के दुख को महसूस करने की शक्ति है तथा उससे उबरने की कोशिश भी है। वे हौसले को बचाए रखने का हुनर जानती हैं। उनका यह शेर उम्मीदों की नई कोपलें फूटने का आश्वासन देता है-

​डाली ने हौसला दिया पतझड़ में पेड़ को

मत हो उदास आएंगे ख़ुशियों के पात और


अनामिका की ग़ज़लों के कथ्य में विविधता है। वे समय के सवाल और समाज की समस्याओं से जुड़ी हैं। उनकी सोच और सरोकार के दायरे में वे लोग शामिल हैं जो ज़िन्दगी की दौड़ में पीछे छूट गए हैं। वे ऐसे लोगों के दुख-दर्द और पीड़ा को शब्द देती हैं। एक माँ की बेबसी और व्यवस्था की नाकामी को वे इस तरह रेखांकित करती हैं कि पाठक उनके मर्म को महसूस कर सके-

​ख़ाली पतीली देख तब आंसू ढुलक पड़े

बच्चों ने मां से बोला परस थोड़े भात और

​देश के मौजूदा हालात और राजनीति की विसंगतियों पर कई जगह अनामिका का तंज बेहद नुकीला है। वे विडंबनाओं को उजागर करने के लिए देशज मुहावरों का इस्तेमाल एक हथियार की तरह करती हैं-

बूढ़ा बरगद, चलती आरी, देख परिन्दे हैरां हैं 

सदमे से काँपी है डाली, क्या कहना है सब चंगा 

​जब घर बँटता है तो सिर्फ़ दीवारें नहीं खड़ी होतीं, स्मृतियाँ और रिश्ते भी लहूलुहान होते हैं। अनामिका इस दर्द को बड़ी ही सादगी से बयां करती हैं-

​घर ईंट-ईट बँट गया, दालान बँट गया

लो माँ के साथ-साथ ये सामान बँट गया

कट बँट गये दरख़्त कभी छाँव थे किये 

तुलसी बँटी औ' काँच का गुलदान बँट गया

​तुलसी का बँटना और काँच के गुलदान का बँटना उस परम्परा, संस्कृति और पारिवारिक मूल्यों की ओर संकेत करता है जिसे आधुनिकता की दौड़ में हम खोते जा रहे हैं।

​बेरोज़गारी का क़हर हो या सड़क पर दम तोड़ती इंसानियत, उनकी क़लम हर मुद्दे पर मुखर है। वे समय की रफ़्तार पर सवाल उठाती हैं कि सीढ़ियाँ तो चढ़ी-उतरी जा रही हैं, पर बदलाव की सुबह कहाँ है?

​सड़क पर हादसे कितने, मगर है फ़र्क भी किसको

किसी की जान को कोई बचाने कब उतरता है

​अनामिका सिंह की ग़ज़लों में सादा ज़बान, अभिव्यक्ति का कौशल और वह ताज़गी है जिसकी आज के समय को दरकार है। वे अपनी ग़ज़लों के ज़रिए अन्याय, शोषण और संवेदनहीनता के ख़िलाफ़ प्रतिरोध दर्ज करती हैं। यह संग्रह हिंदी ग़ज़ल के भविष्य के लिए एक बेहतर संभावना का संकेत देता है।

काव्य भाषा और कथ्य के स्तर पर अनामिका के यहाँ बेहद ताज़गी और नयापन है। वस्तुतः यही उनकी रचनात्मकता की उपलब्धि है। वे समय के साथ चलते हुए समाज को देखती हैं। आसपास जो स्याह रंग हैं, दुख, अभाव और संत्रास है, वे सभी उनकी ग़ज़लों का कथ्य बन जाते हैं। अभिव्यक्ति की इस प्रक्रिया में वे कभी-कभी नुकीले और अनगढ़ शब्दों से भी काम लेती हैं। उन्हें इस बात पर ध्यान देना चाहिए ग़ज़ल ऐसी नाजुक़ काव्य विधा है जो हर लफ़्ज़ का बोझ नहीं उठा सकती। कुल मिलाकर अनामिका ने अपने इस संकलन के ज़रिए ग़ज़ल की विकास यात्रा में बेहतर योगदान दिया है। मैं उन्हें दिल से बधाई देता हूँ। 

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आपका : 

देवमणि पांडेय : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063 

मो : 98210 82126


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उर्दू अदीबों की दुनिया में कमलेश भट्ट कमल

उर्दू अदीबों की दुनिया में कमलेश भट्ट कमल 

सुपरिचित हिंदी ग़ज़लकार और आलोचक कमलेश भट्ट कमल एक नायाब पुस्तक लेकर आपके सामने आए हैं जिसका नाम है-'उर्दू अदीबों की दुनिया में'। इसमें वली, चकबस्त, सुरूर, फ़ैज़ और फ़िराक़ से लेकर राही मासूम रज़ा, नक़्श लायलपुरी, जानकी प्रसाद शर्मा और वसीम बरेलवी जैसे पंद्रह प्रतिष्ठित शायरों की मौजूदगी इसे महत्वपूर्ण बनाती है। इन शायरों के बारे में विस्तृत जानकारी उपलब्ध कराने के साथ ही इस पुस्तक में अदब के बारे में इनके नज़रिए को सामने लाने की सराहनीय कोशिश की गई है। इस संग्रह में कमाल अमरोही एवं जॉन एलिया से संबंधित संस्मरण भी है जो अमरोहा के एक ऐसे मकान की यात्रा से जुड़ा हुआ है जो दोनों शायरों का पैतृक मकान रहा है।

पुस्तक के पंद्रह में से सात अदीबों से लेखक की मुलाक़ातें हुई हैं। हिंदी-उर्दू दोनों साहित्य में आवाजाही करने वाले डॉ जानकी प्रसाद शर्मा एक मात्र ऐसे आलोचक हैं जो हिंदी ग़ज़ल के साथ लगातार खड़े रहे हैं। सन् 1977 में जब हिंदी ग़ज़ल की एक विधा के रूप में चर्चा शुरू ही हुई थी तब अपने एक लेख "हिंदी ग़ज़ल की प्रकृति" में डॉ जानकी प्रसाद शर्मा खुले तौर पर हिंदी ग़ज़ल को एक स्वतंत्र और समर्थ रचना विधा के रूप में न केवल मान्यता देते हैं और रेखांकित करते हैं बल्कि वह ऐसे लोगों को खड़ा जवाब भी देते हैं जो यह कहते हैं कि ग़ज़ल उर्दू के मूल व्यक्तित्व के साथ हिंदी में परिग्रहीत हुई है।


इस पुस्तक को तैयार करने में कमलेश भट्ट कमल ने भरपूर मेहनत की है। शायर सिने गीतकार नक़्श लायलपुरी से यूं तो उनकी मुलाक़ात हो चुकी थी लेकिन उसे अद्यतन करने के लिए उन्होंने मुझसे फ़ोन पर कई बार चर्चा की। इस सिलसिले में नक़्श लायलपुरी पर लिखी मेरी एक फेसबुक पोस्ट का उन्होंने बहुत सुंदर उपयोग किया है। इसी सिलसिले में उन्होंने ऐसे 19 रचनाकार मित्रों को भी धन्यवाद दिया है जिनसे इस किताब को सामने लाने में कुछ न कुछ सहायता मिली है। पुस्तक की अनुशंसा एवं भूमिका के लिए उन्होंने उर्दू के सुप्रसिद्ध साहित्यकार पद्मश्री शीन काफ़ निज़ाम और राष्ट्रीय सहारा (उर्दू) के पूर्व संपादक डॉ असद रज़ा का आभार व्यक्त किया है।

स्वयं लेखक के अनुसार 'उर्दू अदीबों की दुनिया में' पुस्तक को पढ़कर आप इन अदीबों की दुनिया से अच्छी तरह तो परिचित होंगे ही, यह भी जान सकेंगे कि इन रचनाकारों की दुनिया कितने संघर्षों, कितनी रचनात्मकताओं, कितने जोश और जज़्बे से भरी हुई रही है।

ग़ज़ल और ग़ज़ल से संबंधित गद्य पुस्तकों के प्रकाशन में जिस तरह से "श्वेतवर्णा प्रकाशन" ने योगदान किया है वह बेहद क़ाबिले तारीफ़ है। इस पुस्तक को सामने लाने के लिए कमलेश भट्ट कमल ने श्वेतवर्णा प्रकाशन के राहुल शिवाय और शारदा सुमन के सहयोग को रेखांकित किया है।

इस महत्वपूर्ण पुस्तक के लिए मैं लेखक मित्र कमलेश भट्ट कमल को हार्दिक बधाई देता हूँ। 223 पेज की इस पेपर बैक पुस्तक का मूल्य 499 रूपये है।

आपका : #देवमणि_पांडेय

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सोमवार, 9 मार्च 2026

चित्रनगरी संवाद मंच में कथाकार सूर्यबाला

चित्रनगरी संवाद मंच में कथाकार-व्यंग्यकार सूर्यबाला

अतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर मुम्बई की महिला रचनाकारों के सवालों का जवाब देते हुए प्रख्यात साहित्यकार सूर्यबाला जी ने कहा-

▪️लेखन तो बेख़ुदी में होता है, संवेदना और भावना स्वतः शामिल हो जाती हैं।

▪️लेखन काग़ज़ पर वैसा नहीं उतर पाता जैसा एहसास में होता है।

▪️एक लेखक के भीतर हमेशा सच्चाई मौजूद रहती है, तभी वह लिख पाता है।

▪️कहानी लिखना एक प्रतिक्रिया है। हमारे भीतर जो चीज़ें घुमड़ती रहती हैं, वही कहानी के रूप में जन्म लेती हैं।

▪️'वेणु की डायरी' के वेणु और 'मेरे संधि पत्र' के रत्नेश मेरे प्रिय चरित्र हैं।

▪️लेखन मनुष्य के अंदर की शाश्वत अनुभूतियों पर आधारित होता है। मैं भी अपने अंदर की दुनिया पर लिखती हूँ।

▪️किसी के लिए पैसा आत्मविश्वास होता है। मेरे लिए मेरे चरित्र ही विश्वास और प्रेम का संबल रहे।

▪️ऊहापोह के बीच लेखन होता है, समय और सुविधा के अनुसार नहीं।

▪️लिखना जीवन के साथ न्याय करना है, दूसरों के साथ अन्याय करना नहीं।

▪️मेरी कहानियों में कहीं भी खलनायक या खलनायिका नहीं हैं।

​▪️ख़ुद झुककर सामने वाले को जीतना चाहिए। कब झुकना है, यह समझ ज़रूरी है। तनकर खड़ा होने से आदमी टूट सकता है।

▪️हर लेखक की समस्या अलग होती है। विवाद में ख़ामोशी बड़ी ताक़त है। आदमी के भीतर धैर्य होना चाहिए।

▪️हम वस्तु नहीं हैं कि ख़ुद को प्लेट में परोसकर पेश करें।

कार्यक्रम के बाद श्रोताओं ने सूर्यबाला जी को अद्भुत वक्ता बताते हुए उनकी शालीनता और विनम्रता की मुक्त कंठ से तारीफ़ की। ख़ास बात यह थी कि जिस सलीक़े से सूर्यबाला जी ने दस महिलाओं के सवालों का संतुलित जवाब देते हुए उन्हें संतुष्ट किया वह अपने आप में बेमिसाल था। प्रतिष्ठित कथाकार-व्यंग्यकार सूर्यबाला से सृजन संवाद के अंतर्गत मुम्बई की दस रचनाकार महिलाओं ने सवाल पूछे। इनके नाम हैं-

1.रचना शंकर,  2.पारमिता षड़ंगी, 3.उषा साहू, 4.सोनाली बोस, 5.प्रज्ञा मिश्र 6.प्रतिमा सिन्हा, 7.अर्चना जौहरी, 8.लता हया, 9.सविता मनचंदा,   10.मधुबाला शुक्ल।

सूर्यबाला जी को यह बात बहुत अच्छी लगी कि श्रोताओं ने 'धर्मयुग' में धारावाहिक प्रकाशित उनके पहले उपन्यास 'मेरे सन्धिपत्र' से लेकर नवीनतम उपन्यास "कौन देस को वासी...वेणु की डायरी" से सम्बन्धित सवाल पूछे।


चित्रनगरी संवाद मंच मुम्बई की ओर से रविवार 8 मार्च 2026 को केशव गोरे स्मारक ट्रस्ट गोरेगांव के मृणालताई हाल में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस समारोह आयोजित किया गया। शुरुआत में सूर्यबाला जी ने अपना आत्मकथ्य प्रस्तुत करते हुए कहा कि मैं जो लिखना चाहती थी मैंने वही लिखा और आप लोगों को भी अपने मन का ही लेखन करना चाहिए।

बचपन में पिताजी जल्दी गुज़र गए थे। सूर्यबाला जी ने बताया कि उनका बचपन बहुत दुखद रहा। लेखनी उनके लिए दुखों की शरणस्थली थी। चरित्रों के दुख से पहले वे ख़ुद उस दुख से गुज़रती थीं। 'सारिका' के संपादक कमलेश्वर के सुझाव पर उन्होंने पहली कहानी 'जीजी' लिखी जो सारिका में प्रकाशित हुई।

चित्रनगरी सम्वाद मंच के संचालक देवमणि पांडेय के अनुरोध पर सूर्यबाला जी ने एक व्यंग्य रचना का पाठ किया- 'महिला दिवस और फ्रेंच टोस्ट' जिस पर तालियां बजीं और ठहाके भी लगे। अंत में कथाकार सूरज प्रकाश ने सूर्यबाला जी के लेखन की कुछ महत्वपूर्ण बातों का ज़िक्र करते हुए सभी को महिला दिवस की शुभकामनाएं दीं।

'इतनी सी बात' नाट्य प्रस्तुति 

​चित्रनगरी संवाद मंच में लता हया और अर्चना जौहरी के लघु नाटक 'इतनी सी बात' की प्रस्तुति शानदार रही। राजस्थानी जेठानी और उत्तर प्रदेश की देवरानी की नोंक-झोंक का लोगों ने भरपूर लुत्फ़ उठाया। देवरानी-जेठानी के आपसी प्रेम और सौहार्द ने लोगों को भाव-विभोर कर दिया। ढोलक की ताल पर झूमते हुए श्रोता ख़ुद भी लोकगीत की लय में शामिल हो गए थे। 

लता हया और अर्चना जौहरी के दमदार अभिनय से यह मालूम ही नहीं पड़ा कि यह नाटक की पहली प्रस्तुति थी। जाने माने अभिनेता राजेंद्र गुप्ता ने दोनों अभिनेत्रियों के सहज अभिनय की तारीफ़ करते हुए उन्हें बधाई दी और कहा कि दोनों ने शुरू से अंत तक सबको बांधे रखा। कथाकार सूर्यबाला ने अभिनय के साथ ही नाटक के बढ़िया संवादों की भी तारीफ़ की और दोनों अभिनेत्रियों को शुभकामनाएं दीं। मधुबाला शुक्ल ने नाटक की प्रस्तावना पेश की।


आपका : देवमणि पांडेय, मो: 98210 82126