सोच की परवाज़ : अनुज अब्र की ग़ज़लें
अनुज पांडेय अब्र लखनऊ महानगर में रहते हैं मगर उनकी निगाह हमेशा ऐसे किरदारों पर रहती है जो अपने श्रम और संघर्ष से ज़िंदगी की चुनौतियों का सामना करते हैं। वे अपनी ग़ज़लों में ऐसे चरित्रों को दर्ज करते हैं जो वक़्त बदलने के साथ बदलाव का शिकार हो जाते हैं। आज के हामिद अपनी दादी के लिए चिमटा नहीं लाते। वे शहर जाते हैं तो वापस ही नहीं लौटते। अब्र के पास अपनी बात कहने का कौशल है। वे अपने आसपास देखते हैं तो पाते हैं कि अमीर अभी भी ग़रीबों का लहू चूस रहे हैं। वे ऐसे यथार्थ को आम फ़हम भाषा में एक नए अंदाज़ में दर्ज करते हैं। यही कारण है कि उनकी अभिव्यक्ति में नएपन का अक्स नज़र आता है।
अब्र अपनी संस्कृति और परंपरा से गहराई से जुड़े हैं। उनके यहां तुलसी दल भी नज़र आता है और तुलसी का मानस भी। उन्हें मालूम है कि ऐसे प्रतीक हमारे मूल्यों के सबल वाहक हैं और समाज को इनकी ज़रूरत है। इस तरह अपनी ग़ज़लों के ज़रिए वे सामाजिक दायित्व का निर्वाह करते हैं। अब्र की ग़ज़लों में वे मिथकीय चरित्र भी नज़र आते हैं जो आम जन की बातचीत में शामिल हैं। उन्होंने महाभारत के चरित्रों के हवाले से कई महत्वपूर्ण शेर कहे हैं।
अब्र के यहां सोच की परवाज़ भी है और अभिव्यंजना का कौशल भी। वे झूठ के खिलाफ़ सच के पक्षधर हैं। उनकी ग़ज़लों में लोक व्यवहार और मानवीय भावनाओं की भी सशक्त अभिव्यक्ति दिखाई देती है। कभी-कभी वे सियासत को भी चुनौती देते हैं कि अगर आप ग़रीबों का सपना साकार नहीं कर सकते तो सत्ताधीश होने का मतलब क्या है। उनकी ग़ज़लों में समाज के वे सभी अहम मुद्दे मौजूद हैं जिनका ज़िक्र बेहद ज़रूरी है। कुल मिलाकर अनुज अब्र की ग़ज़लें अपने समय में सार्थक हस्तक्षेप करती हैं।
▪️देवमणि पांडेय : 98210 82126
अनुज अब्र की दस ग़ज़लें
(1)
मेरी लकीर से लम्बी लकीर खींच चुके
नई फ़सील तो ये राजगीर खींच चुके
लहू शरीर से खिंचने न देंगे अब ये ग़रीब
कि खींच सकते थे जितना अमीर खींच चुके
कोई उड़ाए परिंदों को पेड़ से जब तक
शिकारी डोर पे तब तक थे तीर खींच चुके
तुम्हें पता ही नहीं धान - बाजरे का भाव
तुम इन ग़रीब के हिस्से की पीर खींच चुके
नया कहाँ से तुम इन काग़ज़ों पे खींचोगे
सब 'अब्र' पहले ही तुलसी - कबीर खींच चुके
(2)
हमारा कल मिलेगा आप को तुलसी के मानस में
सुनहरा पल मिलेगा आपको तुलसी के मानस में
अगर दुविधा है कोई,, आपके जीवन में तो पढ़िये
सभी का हल मिलेगा आपको तुलसी के मानस में
भिगो कर आपकी जो आत्मा को शुद्ध कर डाले
वो गंगा जल मिलेगा आपको तुलसी के मानस में
पराजित सत्य जब होता नज़र आए तो पढ़ियेगा
बहुत सम्बल मिलेगा आपको तुलसी के मानस में
जिसे हम देखते ही अपने माथे पर लगाते हैं
वो तुलसी दल मिलेगा आपको तुलसी के मानस में
(3)
जिस तरह उस द्रोपदी की थी सुनी फ़रियाद कृष्ण
ठीक वैसे ही करो मेरी भी तुम इमदाद कृष्ण
बात जब अर्जुन पे आई तो उठाया शस्त्र भी
तोड़ दी ख़ुद की प्रतिज्ञा ऐसे थे अपवाद कृष्ण
मित्रता का मोल अब कोई चुकाता हैं कहाँ
अब सुदामा को कहाँ करता है कोई याद कृष्ण
जानते थे वो कोई प्रस्ताव मानेगा नहीं
फिर भी दुर्योधन से करने को गए संवाद कृष्ण
जाने क्या जादू हरे कृष्णा में आख़िर 'अब्र' है
नाम लेते ही तुम्हारा मिट गया अवसाद कृष्ण
(4)
अगर ख़फ़ा हो तो सब कुछ उजाड़ देती है
नदी पहाड़ का सीना भी फाड़ देती है
हवा को कम न समझना ख़िलाफ़ होने पर
बड़े शजर को भी जड़ से उखाड़ देती है
तुझे पता है न बेटे कि इक भली कोशिश
मुसीबतों को हमेशा पछाड़ देती है
ये बात कहने में तकलीफ़ दे रही है पर
कमीनी भूख बदन भी उघाड़ देती है
बहुत कम उम्र में हासिल हुई सफलता भी
बड़े बड़ों का तवाज़ुन बिगाड़ देती है
मैं सच बताऊँ मेरी आठ साल की बिटिया
ग़लत करूँ तो मुझे भी लताड़ देती है
अगर निगाह में क़ायम है "अब्र" शर्मो हया
तो एक दूब की पत्ती भी आड़ देती है
(5)
मुझे मालूम है किसको सुनाने बैठ जाते हो
जो हर इक शाम छत पर गीत गाने बैठ जाते हो
कहीं भी प्यार के दो बोल तुमसे बोल दे कोई
वहीं उस शख़्स से रिश्ता बनाने बैठ जाते हो
मियाँ अपने गिरेबाँ में भी देखो झाँक कर इक दिन
ये क्या हर शख़्स की कमियां गिनाने बैठ जाते हो
कहीं ऐसा न हो इक दिन अकेले ही नज़र आओ
ये जो हर आदमी को आज़माने बैठ जाते हो
नज़र आ जाये बस तुमको कोई ग़मगीन सा चेहरा
उसी पल "अब्र" ग़म उसका मिटाने बैठ जाते हो
(6)
मान भी लीजिए सरकार! नहीं कर सकते
आप हर बार चमत्कार नहीं कर सकते
आपके झूठ के जादू का असर ख़त्म हुआ
आप इस बात से इन्कार नहीं कर सकते
आपने कर के दिखाया है जो इस दुनिया को
सारी दुनिया के अदाकार नहीं कर सकते
आप के सर पे रखे ताज का मतलब क्या है
स्वप्न निर्धन के जो साकार नहीं कर सकते
आज के दौर में इल्ज़ाम लगा है हम पर
वार शब्दों से कलमकार नहीं कर सकते
(7)
झूठा कोई ख़्वाब दिखाया जाएगा
जुगनू को सूरज बतलाया जाएगा
मंदिर मस्जिद को लड़वाया जाएगा
मुद्दे से हमको भटकाया जाएगा
पैरों में डाली जाएँगी ज़ंजीरें
हाथों से रस्ता नपवाया जाएगा
काट लिए जाएँगे पर मासूमों के
फिर उनको आकाश दिखाया जाएगा
भेद खुलेगा ठाकुर की तब रहमत का
जब बुधुवा से खेत लिखाया जाएगा
बीन बजाई जाएगी इस कोने पर
उस कोने पर साँप दिखाया जाएगा
अब्र तुम्हारी बातें देश विरोधी हैं
मुझ पर ये इल्ज़ाम लगाया जाएगा
(8)
न पूछो कैसे मेरी ज़िन्दगी की रेल चलती है
अजब सा खौफ़ होता है ये जब पटरी बदलती है
भला कैसे हम अपनी फ़ेमिली को मॉल ले जायें
यहाँ तो फ़ीस ही बच्चों की मुश्किल से निकलती है
कई हामिद पलट कर शहर से वापस नहीं लौटे
कई माँओं की उँगली आज भी चूल्हे से जलती है
हम अपनी मुट्ठियों को जितना कस के बन्द करते हैं
हमारी मुट्ठियों से उतनी ही क़िस्मत फिसलती है
ज़मीनों में उगा करता है सोना 'अब्र' तुमसे ही
तुम्हारे वक़्त पर आने से इक उम्मीद पलती है
(9)
हैरत कि मेरी बात को टाला नहीं गया
यानी कि मुझको दिल से निकाला नहीं गया
देने लगे हैं सीख समुंदर को इन दिनों
जिनसे नदी में पाँव भी डाला नहीं गया
बेटे तो चार पाल लिए बाप ने मगर
बेटों से एक बाप को पाला नहीं गया
तब तक वो दर्द दर्द रहा एक शख़्स का
जब तक वो दर्द गीत में ढाला नहीं गया
तुमने भी 'अब्र' सीख लिया शायरी का फ़न
तुमसे भी दिल का दर्द सँभाला नहीं गया
(10)
इसी उसूल पे उसका निज़ाम चलता है
कि कांटा पांव का कांटे से ही निकलता है
हम उस चराग को अपना लहू भी दे देंगे
वो जो ख़िलाफ़ अंधेरे के रोज जलता है
जमीं तवाफ़ किये जा रही है इसका और
समझते हम हैं कि ये आफ़ताब चलता है
मेरी ये बात हमेशा दिमाग में रखना
हज़ार वक्त बुरा हो मगर बदलता है
ये कौन बात अकेले में करता है मुझ से
ये कौन छत पे मेरे साथ साथ चलता है
गए हो आग लगा कर न जाने ये कैसी
कि दिल में आज तलक इक अलाव जलता है
अनुज यक़ीन कभी उस पे तुम नहीं करना
हर एक बार जो अपना कहा बदलता है
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अनुज पाण्डेय
सेक्टर 12/149, इंदिरा नगर
लखनऊ - 226016
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