कवयित्री मृदुला मिश्र का काव्य संग्रह 'स्रोतस्विनी' हमारे समय की विसंगतियों, मानवीय पीड़ा और आंतरिक संघर्ष को वाणी देता है। उनकी कविताएँ उस संवेदनशील मन की अभिव्यक्ति हैं जो न केवल समाज की दुखती रगों को पहचानता है, बल्कि गहरे आत्म-मंथन में उतरकर यथार्थ का सामना भी करता है।
कवयित्री की रचनाधर्मिता आम आदमी के सुख-दुख से जुड़ी है। “मौन पड़ गया गीत” दरअसल उस रचनाकार की पुकार है जो भीषण त्रासदी के सामने शब्दों की निरर्थकता महसूस करता है। "जाने कौन घोल गया, हवाओं ही में ज़हर" का प्रश्न उस आधुनिक प्रदूषण और अराजकता की ओर इशारा करता है जो हमारे भौतिक और नैतिक वातावरण को दूषित कर रही हैं।
मृदुला मिश्र केवल व्यक्तिगत या सामाजिक दुख तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि वे व्यापक वैश्विक संकट पर भी गंभीर चिंतन करती हैं। ”हर जगह चल रही है, युद्ध की विभीषिका" जैसी पंक्तियों में मानवता के विनाशकारी परिदृश्य पर चिंता व्यक्त की गई है। यह कविता मनुष्य को आत्म-विनाश के कगार पर खड़ा देखती है। 'नदी' को "सर्प की जिव्हा-सी लपलपाती" और "अपने अंदर की सारी गंदगी" का वमन करते हुए दिखाना, मनुष्य के बुरे कर्मों से उपजे "गूंगे-बहरे समाज" का बिम्ब है। यह पर्यावरण और नैतिक पतन के अंतर्संबंधों को रेखांकित करता है।
कवयित्री की दृष्टि बाहर के कोलाहल से मुड़कर भीतर की गहराइयों में भी उतरती है। "रात विक्षुब्ध, क्लांत होकर / अतीत को सहलाती है। / और मैं मंत्रों के वशीभूत हो / आत्मा की गहराई में उतर जाती हूँ" – ऐसी पंक्तियाँ हैं जो गहन आत्म-चिंतन और मन की गहराईयों में झांकने का संकेत देती हैं। यह संग्रह एक यात्रा है जहाँ कवयित्री बाह्य जगत की आहटों को अपने अंतर्मन में साधती है।
स्त्री जीवन की जटिलताएँ और उसके अस्तित्व का संघर्ष इस संग्रह का एक महत्वपूर्ण आयाम है। "मौन रहकर बहुत कुछ कहने से बच जाती है स्त्री" या "रात आते ही अपने-आप में सिहर जाती है स्त्री" जैसे चित्रण स्त्री की सामयिक सोच और उसकी आंतरिक असुरक्षा को व्यक्त करते हैं। 'कील' कविता इस पहचान की खोज को नया मोड़ देती है, जहाँ कवयित्री आह्वान करती है कि स्त्री "कील से नहीं ख़ुशियों से" अपना घर बनाए, जो उसकी भावनात्मक और वास्तविक स्वतंत्रता की ओर इशारा है।
गहन यथार्थ के बीच कुछ कविताएँ स्मृतियों के सुखद शरणस्थल की ओर ले जाती हैं। "बस एक बार आ जाओ / बचपन जी लें हम दोबारा" और मायके को "सारे जगत में सबसे सुंदर सबसे न्यारा" घोषित करने वाली पंक्तियाँ बताती हैं कि निराशा के बीच भी, जीवन की बाती को जलाने के लिए कवयित्री बचपन की मासूमियत और प्रेम की थाती को ही सच्चा आश्रय मानती है।
मृदुला मिश्र का यह काव्य संग्रह 'स्रोतस्विनी' सोच, संवेदना और संघर्ष का सृजनात्मक संगम है। यह हमें चुनौती देता है कि हम अपने आस-पास के शोर और भीतर के मौन दोनों को सुनें। मृदुला मिश्र की कविताएँ समय के माथे पर लिखी गई वह ईमानदार टिप्पणी है, जो पाठकों को केवल सोचने पर ही नहीं, बल्कि महसूस करने पर भी मजबूर करती है। इस सुंदर काव्य संग्रह के लिए मैं उन्हें हार्दिक बधाई देता हूं। वे रचनाकार जगत में अपनी एक महत्वपूर्ण पहचान बनाने में कामयाब हों, यही मेरी शुभकामना है।
देवमणि पांडेय : 98210 82126
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