बुधवार, 1 जुलाई 2026

ख़ुदकुशी से ठीक पहले : 'अदा' का गज़ल संग्रह

पूर्णिमा 'अदा' का गज़ल संग्रह ख़ुदकुशी से ठीक पहले

रचना जब जीवन के अनुभवों की भट्टी में तपकर बाहर निकलती है तो वह सीधा आत्मा से संवाद करती है। पूर्णिमा जायसवाल 'अदा' का गज़ल संग्रह “ख़ुदकुशी से ठीक पहले” एक ऐसा ही सृजन है, जो हताशा के अंतिम छोर पर खड़े इंसान को हाथ पकड़कर वापस जीवन की रोशनी में ले आता है। ​इस संग्रह की गज़लों से गुज़रते हुए हम पाते हैं कि 'अदा' के पास दुखों को सहने की ही नहीं बल्कि उन्हें परिभाषित करने की एक अद्भुत दृष्टि है। जहाँ दुनिया हार मान लेने को अंत समझती है, वहाँ कवयित्री उदघोष करती है कि सृजन ही वह एकमात्र औषधि है जो विनाश को रोक सकती है - 

​ख़ुदकुशी टालने का तरीक़ा 'अदा'

इक क़लम तो उठा जिंदगी के लिए।

​'अदा' की शायरी में जहाँ एक ओर भरोसे के टूटने की टीस है, वहीं दूसरी ओर स्वाभिमान की गूँज भी है। उनके यहाँ संघर्ष व्यक्तित्व को माँजने की एक प्रक्रिया है। जब वे कहती हैं कि "सूरज को मैं रोज़ हराती हूं", तो यह केवल एक पंक्ति नहीं, बल्कि उस भारतीय नारी का जज़्बा है जो सूरज ढलने से पहले अपनी उम्मीदों के दीये जला लेती है। 

समाज के दोहरेपन पर चोट करते हुए वे आईने को भी चकित कर देती हैं, जो आज के दौर की कड़वी सच्चाई को बखूबी बयां करता है। "मेरी कहानी बिन तेरे भी पूरी है" कहकर वे आधुनिक स्त्री के उस स्वरूप को स्वर देती हैं जो किसी की मोहताज़ नहीं, बल्कि स्वयं में संपूर्ण है।

​सफलता की ऊँचाइयों को छूने की चाह हर दिल में होती है, लेकिन 'अदा' की ग़ज़लें हमें ज़मीन से जुड़े रहने का हुनर सिखाती हैं। वे याद दिलाती हैं कि चाँद-सितारों तक पहुँचना उपलब्धि है पर अपनी जड़ों की ओर लौटना संस्कार है।

​“ख़ुदकुशी से ठीक पहले” केवल एक ग़ज़ल  संग्रह नहीं, बल्कि एक 'हीलिंग प्रोसेस' (उपचार प्रक्रिया) है। यह उन सभी के लिए है जो मौन रहकर सहते हैं, जो भीड़ में अकेले हैं और जो अंधेरे में रोशनी की एक लकीर तलाश रहे हैं। पूर्णिमा जायसवाल 'अदा' की ये गज़लें पाठक को यह यक़ीन दिलाने में सफल होंगी कि हार मान लेना समाधान नहीं, बल्कि संघर्ष को उत्सव बना देना ही असली ज़िंदगी है।

​मुझे उम्मीद है कि यह संग्रह निश्चित रूप से अदबी दुनिया में अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाएगा। अदा को ढेर सारी शुभकामनाएं।

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देवमणि पांडेय

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फ़िल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210 82126

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सोमवार, 29 जून 2026

पोटली में चाँद : असलम हसन का काव्य संग्रह

 

पोटली में चाँद : असलम हसन का काव्य संग्रह

कहा जाता है कि बड़े शहरों ने बड़े लेखक नहीं दिए। जो बड़े लेखक महानगरों में दिखाई देते हैं वे अपने अनुभवों की गठरी गाँव से लेकर आए थे। असलम हसन के काव्य संग्रह 'पोटली में चाँद' को पढ़ते हुए यही महसूस होता है। उनकी कविताओं में गाँव की मिट्टी की सुगंध है। संयुक्त परिवार के रिश्तों की गर्माहट है। वे अपनी कविताओं के ज़रिए अपनी सोच, सरोकार और अनुभवों को असरदार ढंग से साझा करते हैं। उनके इसी नज़रिए को रेखांकित करने वाली कविता "तिलस्मी दुनिया" की कुछ पंक्तियां देखिए- 


ईंट ढोने वाले मज़दूर 

मिट्टी के घरों में बंद थे

जो बच्चे खीर खा सकते थे वे

माँड़ पी रहे थे


बेहतर सोचने वाले रील बना रहे थे

जिन्हें सुनना था

वे गाना गा रहे थे


और जो बोल सकते थे

उनकी ज़ुबान फिसल रही थी...


'पोटली में चाँद' की कविताएं हमारे वक़्त की आवाज़ हैं। सरल सहज भाषा में लिखी गईं इन कविताओं में समय और समाज की धड़कन शामिल है। इन कविताओं में निहित सम्वेदनाओं की ऊष्मा और भावनाओं की सुगंध को कोई भी सहृदय पाठक महसूस कर सकता है। 


संग्रह में कई लघु कविताएं हैं। कुछ कविताएं किसी सुविचार की तरह हमारे सामने आती हैं और कुछ कविताएं हाशिये पर खड़े वंचित लोगों का दर्द बयान करती हैं। "मेरी कविताएँ" कविता की कुछ पंक्तियां देखिए - 


कपाल की कठोर हड्डियों में कुशलता से 

टाँकता हूँ संवेदनाओं के पैबंद 

और इस तरह पृष्ठ के मध्य लिखता हूँ 

हाशिये का दर्द...


काव्यात्मक अभिव्यक्ति के ज़रिए कवि असलम हसन अपने समय और समाज के अहम् सवालों को सामने लाते हैं। हम जिस दौर में जी रहे हैं उस दौर को वे अपनी रचनात्मकता में साकार करते हैं। उनकी कविताओं में ज़िंदगी की दास्तान है। संघर्ष और सपने हैं। एक लघु कविता 'अपना गेहूँ' देखिए-


उधार का आटा आँचल में लेकर 

घर लौटती है वह शाम को अक्सर 

ठंडा चूल्हा पल भर जल कर 

सो जाता, फिर आँखें बंद कर 

सूनी आँखों में सपना बुन कर 

वह भी सोती है पहर भर 

रात भर उन आँखों का सपना 

सींचता रहता है गेहूँ अपना. 


ज़िंदगी के सफ़र में मुहब्बत के धागों से जो रिश्ते बुने जाते हैं उन रिश्तों में आत्मीयता की ख़ुशबू और एहसास की गहराई होती है। रिश्तों की यह ऊर्जा "पिता" और बेटी जैसी कविताओं में दिखाई पड़ती है। मुश्किल है आसां होना, कोलकाता, इक आग का दरिया था, मुंबई में बारिश, पाटलिपुत्र का हंसता हुआ बालक... आदि ऐसी कविताएं हैं जो इस संग्रह को सृजनात्मकता का दस्तावेज़ बना देती हैं। 


'पोटली में चाँद' संग्रह की कुछ कविताएं ग़ज़ल के फ्रेम में यानी छंद में हैं। इनमें जो कुछ कहा गया है वह अलग दृष्टि से कहा गया है। इन ग़ज़लों में फ़िक्र की आंच भी है और जज़्बात की नमी भी है। चंद शेर देखिए - 


है जिन्दगी तो एक सफ़र धूप छाँव का 

सूरज के आँख में है छुपी शाम देखना


ता-उम्र तेरे साथ ही चलता रहूँगा मैं 

ये हौसला ऐ गर्दिशे अय्याम देखना

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तिनके-तिनके में हौसला देखो 

कभी फ़ुर्सत से घोंसला देखो


चूम लेगा फ़लक की पेशानी 

इन परिंदों का क़ाफ़िला देखो

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मेरी नानी के मरते ही जुबाँ ख़ामोश है इनकी 

न मैना बोल सकती है न तोता बोल सकता है 


हसद की आग में दिन रात जो जलता है ए असलम 

वो अच्छा सोच सकता है न अच्छा बोल सकता है


'पोटली में चाँद' संग्रह की रचनाओं में भावनाओं की एक ऐसी तरंग है जो सीधे पाठकों के दिलों को छूती है। कवि अपने दिली जज़्बात, तजुर्बात, सामाजिक सरोकार और वक़्त के अहम् सवालों को अपनी इस काव्यात्मक अभिव्यक्ति में शामिल करने में कामयाब हुआ है। अभिव्यक्ति की सहजता और सोच की समृद्धि कवि को एक अलग पहचान अता करती है। 


मेरी दुआ है कि कवि असलम हसन इसी तरह रचनात्मकता के आकाश पर उड़ान भरते रहें। कविता के कैनवास पर भावनाओं के रंगों से ज़िंदगी की ख़ूबसूरत तस्वीर बनाते रहें। इस ख़ूबसूरत काव्य संग्रह 'पोटली में चाँद' के लिए उनको हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।  

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आपका-

देवमणि पांडेय 

सम्पर्क : 98210-82126

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सोमवार, 25 मई 2026

हिन्दी साहित्य और हिन्दी सिनेमा का सम्बंध

 

हिन्दी साहित्य और हिन्दी सिनेमा का सम्बंध

साहित्य और सिनेमा का क्या सम्बंध है?  देखने में तो दोनों रेलवे की पटरियों की तरह समांतर चलते हैं मगर दोनों में कोई गहरा सम्बन्ध है। दुनिया में कई साहित्यिक कृतियों पर महान फ़िल्में बनी हैं। वस्तुतः साहित्य निजी अभिव्यक्ति है। यह एक ऐसा सृजन है जिसमें व्यक्ति के सोच, सरोकार और संस्कार शामिल होते हैं। साहित्य का पाठक पढ़ा लिखा होता है। साहित्य में वर्णित किरदारों की छवि पाठकों के मन में अलग-अलग निर्मित होती है। हम अपनी सोच और सम्वेदना के अनुसार इनका स्वरूप तय करते हैं। कहा जाता है कि हर काल में साहित्य के पाठक प्रायः दो प्रतिशत ही होते हैं।


साहित्य की तुलना में सिनेमा एक सार्वजनिक माध्यम है। इसे समाज का विशाल वर्ग देखता है। इन दर्शकों में पढ़े लिखे भी होते हैं और अनपढ़ भी होते हैं। अमीर भी सिनेमा देखते हैं और ग़रीब भी देखते हैं। सभी को सिनेमा से मनोरंजन प्राप्त होता है। सिनेमा हॉल के अंधकार में व्यक्ति अकेला होता है और समूह में भी होता है। वह सब के साथ रोता है, सबके साथ हंसता है और सब के साथ तालियां बजाता है। सिनेमा मुख्य किरदार की जो छवि पेश करता है उसे सभी दर्शक स्वीकार कर लेते हैं। 'उमराव जान' उपन्यास पढ़ते समय हर पाठक को उमराव जान का चेहरा अलग अलग नज़र आता है। मगर फ़िल्म देखते समय अभिनेत्री रेखा को ही सारे दर्शक उमराव जान मान लेते हैं। 


साहित्य का पाठक अपनी कल्पनाशीलता से काम लेता है। सिनेमा निर्देशक का माध्यम होता है निर्देशक अपने विवेक से पर्दे पर जिस चरित्र को साकार करता है उसे ही दर्शक सच मान लेता है। निर्देशक का माध्यम होते हुए भी सिनेमा एक सामूहिक कर्म है। इस समूह में कहानीकार, पटकथाकार, संवाद लेखक, कलाकार, संगीतकार, लाइटमैन और कैमरामैन सब का योगदान होता है। ये सारे लोग अपना अपना काम करते हुए पर्दे पर निर्देशक की कल्पना को साकार करते हैं। साहित्य स्वांत: सुखाय या लोकरंजन के लिए हो सकता है। मगर सिनेमा का मुख्य उद्देश्य है मनोरंजन प्रदान करना। जिस तरह नाटक, लोककलाएं, रामलीला आदि का मंचन देखकर हमारा मनोरंजन होता है बिलकुल उसी तरह सिनेमा हमें मनोरंजन प्रदान करने वाला बेहद कलात्मक और सशक्त माध्यम है।


साहित्य हमें भीतर से समृद्ध करता है। हमारी संवेदना को जगाता है। ज़िंदगी, समय और समाज को समझने की दृष्टि प्रदान करता है। साहित्य से हम मनोरंजन की अपेक्षा नहीं कर सकते। मगर जब किसी साहित्यिक कृति पर फ़िल्म का निर्माण होता है तो वहां बाज़ार उपस्थित हो जाता है। बाज़ार की मांग को पूरा करने के लिए फ़िल्म में उन तत्वों को शामिल करना ज़रूरी हो जाता है जिनसे दर्शकों का मनोरंजन होता है। इस संदर्भ में निर्देशक बासु चटर्जी की फ़िल्म 'रजनीगंधा' का उदाहरण देख सकते हैं। मन्नू भंडारी की कहानी ‘यही सच है’ पर यह फ़िल्म आधारित है। फ़िल्म को मनोरंजक बनाने के लिए गीत-संगीत का बहुत सुंदर इस्तेमाल किया गया है। कहानी की मूल संवेदना को बरकरार रखते हुए ऐसे अतिरिक्त दृश्यों का भी फिल्मांकन किया गया जिनसे दर्शक सहज ही जुड़ाव महसूस करता है। दृश्य और ध्वनि के मेल से बॉसु चटर्जी ने एक जादुई असर पैदा किया। फ़िल्म रजनीगंधा कामयाबी की मंज़िल तक पहुंच गई। 

सिनेमा मनोरंजन का साधन है। इसलिए जब किसी साहित्यिक कृति पर फ़िल्म बनती है तो हमेशा व्यावसायिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।  साहित्य सैकड़ों पृष्ठों का हो सकता है मगर सिनेमा को दो से तीन घंटे की समय सीमा में ही अपने कथ्य को अभिव्यक्त करना होता है। क्या दिखाना है और क्या नहीं दिखाना है, यह बड़ा सवाल उपस्थित हो जाता है। उपन्यास के फ़िल्मांकन में कई अंश छोड़ने पड़ते हैं। अमूमन एक फ़िल्म में सौ के आसपास छोटे बड़े दृश्य होते हैं। दूसरी तरफ़ कहानी में दृश्य कम होते हैं। इसलिए उसे फ़िल्म का आकार देने के लिए कई दृश्य जोड़ने पड़ते हैं। कामना चंद्रा की कहानी पर राज कपूर ने 'प्रेम रोग' फ़िल्म बनाई। पटकथा में कई नए दृश्य जोड़े गए। गीत संगीत से फ़िल्म को सजाया गया। फ़िल्म कामयाब हुई क्योंकि राज कपूर ने कहानी की मूल संवेदना के साथ फ़िल्म का तालमेल बरकरार रखा। 


फ़िल्मकार के लिए ज़रूरी है कि वह लेखक की संवेदना, सोच और सरोकार को गहराई से समझे तभी वह कृति के साथ न्याय कर पाएगा। प्रेमचंद की कहानी 'शतरंज के खिलाड़ी' को सत्यजीत रे ने बड़े सुंदर तरीक़े से पेश किया। उन्होंने इसका अंत बदल दिया तो यह फ़िल्म दो नवाबों की दास्तान से ऊपर उठकर ऐतिहासिक काल खंड की सशक्त फ़िल्म बन गई। कहानी की बुनावट और परिवेश को ध्यान में रखते हुए सत्यजीत रे ने वाजिद अली शाह के चरित्र के लिए अभिनेता अमज़द खान का चयन किया। वे एक बेहतर फ़िल्म बनाने में कामयाब हुए। इसी तरह लेखकीय संवेदना के साथ संतुलन बिठाते हुए बिमल रॉय ने दो बीघा ज़मीन और गुरुदत्त ने साहब बीबी और ग़ुलाम जैसी बेमिसाल फ़िल्में बनाईं। 

सिनेमा वस्तुत: परदे पर साकार होने वाली विधा है। यानी कहानी को कैमरे की आंख से दृश्य माध्यम के रूप में पेश किया जाता है। किसी भाषा की विशिष्ट कृति को सिनेमा के रूप में पेश करते समय यह चुनौती मौजूद रहती है कि वह कहानी अलग-अलग भाषा बोलने वाले लोगों को पसंद आए और वे उससे जुड़ाव महसूस कर सकें। मसलन देवदास बंगाली भाषा की कृति है। इस कहानी में निहित संवेदना से दर्शक बहुत जल्दी तालमेल बिठा लेते हैं। यही कारण है कि एक दर्जन से अधिक भाषाओं में देवदास पर फ़िल्मों का निर्माण हुआ और उन्हें कामयाबी मिली। 

बांग्ला लेखकों के साहित्य में पारिवारिक भावनाएं, ज़िंदगी के मर्मस्पर्शी घटनाक्रम और दिल को छूने वाले दृश्य होते हैं। इसलिए कई बांग्ला कृतियों पर कामयाब फ़िल्मों का निर्माण हुआ। इनमें देवदास, नौकाडूबी, साहब बीवी और ग़ुलाम, मझली दीदी, परिणीता, दुर्गेश नंदिनी, आनंद मठ आदि शामिल हैं। साहित्य के लिए नोबुल पुरस्कार से सम्मानित रविंद्रनाथ टैगोर की कई कृतियों पर सफल फ़िल्मों का निर्माण हुआ। रविंद्रनाथ टैगोर के उपन्यास 'नौकाडूबी' पर निर्देशक नितिन बोस ने सन् 1946 में फ़िल्म बनाई जिसमें दिलीप कुमार की प्रमुख भूमिका थी। सुधेंदु राय ने सन् 1971 में रविंद्रनाथ टैगोर की कृति पर बनी फ़िल्म 'उपहार' का निर्देशन किया। इस फ़िल्म में अभिनेत्री जया बच्चन की प्रमुख भूमिका थी। सन् 1961 में रविंद्रनाथ टैगोर की कहानी पर बिमल रॉय ने 'काबुलीवाला' फ़िल्म बनाई। मुख्य भूमिका में बलराज साहनी थे। सत्यजीत राय की तीन मशहूर फ़िल्में- 'तीन कन्या' (1961), 'चारु लता' (1964] और 'घरे बाइरे' [1984] रविंद्रनाथ टैगोर की कृतियों पर आधारित हैं। 


बांग्ला साहित्य और सिनेमा का शुरू से ही घनिष्ठ संबंध रहा है। साहित्य जगत ने सिनेमा को और सिने जगत ने साहित्य को पर्याप्त सम्मान दिया। इसी तरह मराठी साहित्य और सिनेमा का भी रिश्ता अंतरंग है। कई मराठी कृतियों और नाटकों पर श्रेष्ठ फ़िल्मों का निर्माण हुआ और उन्हें कामयाबी हासिल हुई। उर्दू साहित्यकार भी सिनेमा के बहुत क़रीब रहे। गीत और संवाद लेखन में उन्हें भरपूर प्रतिष्ठा मिली। मगर हिंदी साहित्यकारों ने सिनेमा को उचित महत्व नहीं दिया। साहित्यकारों और फिल्मकारों में तालमेल के अभाव में हिंदी कृतियों पर बनी अधिकांश फ़िल्मों को असफलता का सामना करना पड़ा।


हिंदी में साहित्य पर आधारित फ़िल्मों की लगातार असफलता का दुष्परिणाम यह हुआ कि साहित्य और सिनेमा में दूरी बढ़ती गई। असफल फ़िल्मों में गोदान, दो बैलों की कथा, सदगति, तीसरी क़सम, महाभोज, समय की धारा (आपका बंटी), दामुल, उसने कहा था, सूरज का सातवां घोड़ा, उत्सव (मृच्छकटिकम्), एक चादर मैली सी, पिंजरे आदि अनेक फ़िल्में शामिल हैं। हिंदी साहित्यकारों के साथ फ़िल्मकार बासु चटर्जी के अच्छे रिश्ते थे। उन्होंने राजेंद्र यादव के उपन्यास 'सारा आकाश' और मन्नू भंडारी की कहानी पर 'रजनीगंधा' फ़िल्म बनाई। शिव मूर्ति की कहानी 'तिरिया चरित्र' पर टेलीफ़िल्म बनाई। कमलेश्वर और गुलज़ार अच्छे दोस्त थे। आपसी तालमेल अच्छा था। कमलेश्वर की कहानी पर गुलज़ार ने 'आंधी' और 'मौसम' फ़िल्म का लेखन निर्देशन किया। ये फ़िल्में  कामयाब रहीं। साहित्य पर आधारित आनंदमठ, दो बीघा ज़मीन, रूदाली, शतरंज के खिलाड़ी आदि कामयाब फ़िल्में थीं। 'साहब बीवी और ग़ुलाम' तथा 'उमराव जान' ऐसी कामयाब फ़िल्में थीं जो अपनी गुणवत्ता में मूल कृति से भी आगे निकल गईं। कला की दुनिया में रचनात्मकता का यह अद्भुत उदाहरण है।

हिंदी सिनेमा में लेखक को समुचित महत्व नहीं दिया जाता इसलिए कई लेखक मुंबई आकर वापस लौट गए। कथाकार भगवती चरण वर्मा आए थे उनके उपन्यास चित्रलेखा पर दो बार फ़िल्म बनी। प्रेमचंद की कहानी पर 'मिल मज़दूर' फ़िल्म बनी। इसे देखकर प्रेमचंद ने कहा था कि इसमें मेरा दस प्रतिशत भी नहीं है। प्रेमचंद एक साल के करार पर मुंबई आए थे मगर आठ महीने में वापस लौट गए। सुमित्रानंदन पंत भी आ कर वापस लौट गए। 'तीसरी क़सम' की पटकथा लिखने के लिए शैलेंद्र ने फणीश्वर नाथ रेणु को मुंबई बुलाया था। वितरकों का आग्रह था कि 'तीसरी क़सम' का अंत बदल दिया जाए। रेणु ने मना कर दिया। उन्होंने कहा कि अंत बदल देंगे तो 'तीसरी क़सम' नाम रखने का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। मनोहर श्याम जोशी भी यहां आकर वापस गए। कमलेश्वर और राही मासूम रज़ा ने जिस तरह बाज़ार की ज़रूरतों को समझ कर सिनेमा में योगदान किया वैसा जज़्बा बाद के रचनाकारों में नहीं दिखाई पड़ा। 


हिंदी साहित्यकार इस बात को समझना नहीं चाहते कि साहित्य को ज्यों का त्यों नहीं फ़िल्माया जा सकता। फ़िल्मकार कैमरे की आंख से कहानी का पुनर्सृजन करता है। शब्द की सत्ता के बजाय दृश्य की सत्ता क़ायम करता है। सत्यजीत रे ने प्रेमचंद की कहानी पर आधारित फ़िल्म शतरंज के खिलाड़ी में कई नए दृश्य जोड़े। फ़िल्म का अंत बदल दिया फिर भी उसे पसंद किया गया। फ़िल्म के निर्देशक को यह आज़ादी मिलनी ही चाहिए।


किसी साहित्यिक कृति पर निर्मित फ़िल्म नाकामयाब क्यों होती है इसके कई कारण हो सकते हैं। मसलन फ़िल्म 'गोदान' के खांटी देहाती मज़ाकिया होरी के रूप में मशहूर अभिनेता राजकुमार को दर्शक आत्मसात नहीं कर पाए। मन्नू भंडारी के उपन्यास 'आपका बंटी' पर 'समय की धारा' फ़िल्म बनी। बंटी के तलाक़शुदा मां और पिता दुबारा शादी कर लेते हैं। बंटी नई मां और नए पिता को स्वीकार नहीं कर पाता। वह अचानक घर से भाग जाता है और उसकी अप्रत्याशित मौत होती है। फ़िल्म के ऐसे त्रासद अंत को दर्शक पचा नहीं पाए। अमृता प्रीतम के उपन्यास' पिंजर' पर इसी नाम से फ़िल्म बनी। फ़िल्म की नायिका अंत में उसी मुस्लिम युवक के साथ पाकिस्तान चली जाती है जिसने उसका अपहरण किया था। फ़िल्म का ऐसा क्लाइमेक्स दर्शकों की सोच से सर्वथा विपरीत था। 


रामायण और महाभारत दो ऐसे महाकाव्य हैं जो बहुत सारी फ़िल्मों के लिए प्रेरणा स्रोत रहे। रामायण में बुराई पर अच्छाई की जीत होती है और महाभारत में अधर्म के ऊपर धर्म की विजय होती है। यह संदेश दर्शकों की सोच के अनुकूल है। दोनों कृतियों में ऐसे घटनाक्रम हैं जो हर भाषा के दर्शकों को पसंद आते हैं। दर्शकों को इनमें अपना अक्स दिखाई पड़ता है। किसी साहित्यिक कृति को जब फ़िल्म में तब्दील किया जाता है तो उसमें ऐसे सार्वकालिक गुणों का होना ज़रूरी है जिनके साथ दर्शक अपनी भावनाओं का जुड़ाव महसूस करें और अपनी सोच का तालमेल बिठा लें। 


साहित्य और सिनेमा के रिश्तों को मज़बूत करने के लिए हमें ऐसे फ़िल्मकारों की ज़रूरत है जो अपने सिनेमाई अनुभव को पाठकों के साथ साझा कर सकें। कई बांग्ला फिल्मकारों ने ऐसा किया। सत्यजीत रे ने एक महत्वपूर्ण किताब लिखी है- चलचित्र कल और आज। इसे पढ़कर यह समझना आसान हो जाता है कि साहित्य का एक साधारण दृश्य जब फ़िल्म के दृश्य में रूपांतरित होकर सामने आता है तो उसका असर कैसे कई गुना बढ़ जाता है। हिंदी में ऐसी कृतियों का अभाव है। 


हिंदी में कई साहित्यिक पत्रिकाओं ने फ़िल्मों में पर बड़े अच्छे विशेषांक निकाले। मनोहर श्याम जोशी और असग़र वजाहत ने पटकथा पर किताबें लिखीं। सवाल यह है कि हिंदी के कितने साहित्यकार ऐसी किताबों को पढ़ते हैं। अगर वे सिने साहित्य को भी अपने अध्ययन का हिस्सा बनाएंगे तो सिनेमा के अनुकूल समझ भी विकसित होगी। सिनेमा और साहित्य में नज़दीकियां पैदा होगीं। फ़िलहाल हिंदी साहित्य के क्षेत्र में एक नई प्रतिभाशाली पीढ़ी सक्रिय है। मुझे उम्मीद है कि यह पीढ़ी सिनेमा को समझेगी। इसके प्रयास से साहित्य और सिनेमा का रिश्ता मज़बूत होगा। 

आपका - देवमणि पांडेय 

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फ़िल्म सिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210 82126