हिंदी ग़ज़ल के परिदृश्य पर अनिल गौड़ एक ऐसी आवाज़ हैं जिनकी रचनात्मकता गहरी संवेदना और प्रभावशाली अभिव्यक्ति से समृद्ध है। उनका ग़ज़ल संग्रह 'रौशनी के नाम' स्वयं इस बात का प्रमाण है कि वे केवल शेर नहीं कहते, बल्कि समय और समाज से एक सार्थक संवाद स्थापित करते हैं। आम बोल चाल की भाषा में लिखी गईं ये सीधी, सादी ग़ज़लें पाठक और श्रोता के मन में जगह बनाने में सक्षम हैं। उनका यह शेर देखिए-
अपना दर्द छुपाए हम तो गाते हैं आंसू, आंसू
हमको कवि शायर मत कहना, हम रोते बंजारे हैं
यह शेर उनकी सोच और सरोकार का आईना है। यह एक ऐसे कवि की आवाज़ है जो अपनी रचना को महज कला नहीं, बल्कि अपने जीवन के दर्द की अभिव्यक्ति मानता है। सृजन का यही समर्पण उनकी ग़ज़लों को विशिष्ट बनाता है।
अनिल गौड़ की ग़ज़लों में सामाजिक पीड़ा और जीवन के विविध संदर्भ बड़ी मार्मिकता के साथ उभरते हैं। वे केवल व्यक्तिगत अनुभूतियों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि जन भावनाओं और सामाजिक सरोकारों के प्रति समर्पित दिखाई देते हैं। उनके लेखन में यथार्थ की कठोरता को संवेदना की आंच पर पकाया जाता है-
इंसान की मजबूरियों का नाम है रोज़ी
वह बर्फ़ बेचता है लपट में खड़ा हुआ
यह शेर एक ऐसा चित्र प्रस्तुत करता है, जहाँ विपरीत परिस्थितियों में जीवनयापन की जद्दोजहद है। 'बर्फ़' और 'लपट' का विरोधाभास सामाजिक विसंगतियों को बड़े सलीक़े के साथ रेखांकित करता है। अनिल गौड़ की ग़ज़लें समय के साथ चलती हैं। वे चुनौतियों को स्वीकार करते हैं और विसंगतियों पर निर्भीक होकर टिप्पणी करते हैं। उनकी ग़ज़लें अपने समय से मुख़ातिब हैं-
सच्चाई को कब तक पत्थर मारा जाएगा
आज नहीं तो कल उसको स्वीकार जाएगा
यह शेर आशावाद और सत्य की अनिवार्यता को बख़ूबी दर्शाता है। उनका एक और शेर देखिए जो समाज के नैतिक पतन पर तीखा व्यंग्य है-
जिसे भी देखो, वह हंसकर चपत लगाता है
वतन को हमने, यतीमों का गाल कर डाला
यहाँ 'यतीमों का गाल' जैसी नई और मौलिक उपमा सामाजिक पतन और देश की दुर्दशा को एक झटके में सामने ला देती है। कभी-कभी वे हमारे सामने कोई ऐसा मोहक चित्र प्रस्तुत कर देते हैं जिससे मन प्रसन्न हो जाता है। ऐसा ही एक दृश्य यशोदा और कृष्ण के प्यार भरे रिश्ते को दिखाता है जहाँ माँ डाँटती भी है, लेकिन उस डाँट में अपार स्नेह भरा होता है-
यशुमति ने पंखुड़ियों जैसे कान उमेठ दिए
बोल कि ग्वालिन के घर तू दोबारा जाएगा
इस शेर की सबसे बड़ी ख़ूबी 'पंखुड़ियों जैसे कान' की उपमा है। यह उपमा बालक कृष्ण की मासूमियत और सुकोमलता को दर्शाती है। आमतौर पर कान उमेठना एक दंड होता है, लेकिन पंखुड़ियों जैसे कान उमेठने का वर्णन यह दर्शाता है कि यह दंड भी प्रेम और लाड़ से भरा हुआ है। यह उपमा दृश्य को कोमल बना देती है। इस शेर में कृष्ण की बाल लीला को एक नए, सुंदर और मौलिक कोण से प्रस्तुत किया गया है।
अनिल गौड़ की ग़ज़लों में कभी-कभी दाम्पत्य जीवन के ऐसे चित्र भी नज़र आते हैं जहां प्रेम का माधुर्य है। उनकी एक लोकप्रिय ग़ज़ल का मतला है-
बांह डाल दी तुमने, हँस के मेरी गर्दन में
मैंने तो ये पूछा था,क्या बना है भोजन में
यह शेर रोज़मर्रा के जीवन के एक सीधे-सादे संवाद को अचानक प्रेम के मोड़ पर लाकर खड़ा कर देता है। यह दर्शाता है कि दाम्पत्य जीवन में छोटी-छोटी व्यावहारिक बातों के बीच भी प्रेम और स्नेह का प्रदर्शन कितना सहज और आकस्मिक हो सकता है।
अनिल गौड़ की रचनात्मकता में प्रेम और अध्यात्म के संदर्भ भी गहरे अर्थों के साथ आते हैं। कृष्ण से संबंधित उनका यह शेर जीवन के शाश्वत मूल्यों और दर्शन को नई ऊँचाई देता है-
कृष्ण का बड़ा क़द है, आदमी से ईश्वर तक
क्यों कि वे अकेले हैं, प्रेम के समर्थन में
उनके आध्यात्मिक चिंतन को रेखांकित करने वाला एक और शेर देखिए जो एक अंतिम आशा और गहरी आस्था की ओर इशारा करता है-
स्वयं दीप हो जाना ही है, एक मात्र अंतिम आशा
देह दीप है, प्रतिभा बाती, और आत्मा ही लौ है
यह शेर “अप्प दीपो भव” यानी आत्म-दीप्ति के दर्शन को एक सुंदर रूपक में प्रस्तुत करता है। यह कवि की गहन रचनात्मकता का प्रमाण है।
अनिल गौड़ की ग़ज़लें लयबद्धता, संप्रेषणीयता, सामाजिक प्रतिबद्धता और दार्शनिक गहराई का एक सुंदर संगम हैं। वे हिंदी ग़ज़ल की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उसे समकालीन चुनौतियों से जोड़ते हैं। समसामयिक और महत्वपूर्ण विषयवस्तु वाली उनकी ग़ज़लों में जनमानस से सीधे जुड़ने की क्षमता है। मुझे उम्मीद है कि अनिल गौड़ की ये ग़ज़लें हिंदी ग़ज़ल के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेंगी। आने वाले समय में वे हिंदी ग़ज़ल को एक विशिष्ट 'रौशनी' प्रदान करते रहें, यही मेरी शुभकामना है।
▪️
आपका : देवमणि पांडेय
सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फ़िल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210 82126



कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें