उर्दू अदीबों की दुनिया में कमलेश भट्ट कमल
सुपरिचित हिंदी ग़ज़लकार और आलोचक कमलेश भट्ट कमल एक नायाब पुस्तक लेकर आपके सामने आए हैं जिसका नाम है-'उर्दू अदीबों की दुनिया में'। इसमें वली, चकबस्त, सुरूर, फ़ैज़ और फ़िराक़ से लेकर राही मासूम रज़ा, नक़्श लायलपुरी, जानकी प्रसाद शर्मा और वसीम बरेलवी जैसे पंद्रह प्रतिष्ठित शायरों की मौजूदगी इसे महत्वपूर्ण बनाती है। इन शायरों के बारे में विस्तृत जानकारी उपलब्ध कराने के साथ ही इस पुस्तक में अदब के बारे में इनके नज़रिए को सामने लाने की सराहनीय कोशिश की गई है। इस संग्रह में कमाल अमरोही एवं जॉन एलिया से संबंधित संस्मरण भी है जो अमरोहा के एक ऐसे मकान की यात्रा से जुड़ा हुआ है जो दोनों शायरों का पैतृक मकान रहा है।
पुस्तक के पंद्रह में से सात अदीबों से लेखक की मुलाक़ातें हुई हैं। हिंदी-उर्दू दोनों साहित्य में आवाजाही करने वाले डॉ जानकी प्रसाद शर्मा एक मात्र ऐसे आलोचक हैं जो हिंदी ग़ज़ल के साथ लगातार खड़े रहे हैं। सन् 1977 में जब हिंदी ग़ज़ल की एक विधा के रूप में चर्चा शुरू ही हुई थी तब अपने एक लेख "हिंदी ग़ज़ल की प्रकृति" में डॉ जानकी प्रसाद शर्मा खुले तौर पर हिंदी ग़ज़ल को एक स्वतंत्र और समर्थ रचना विधा के रूप में न केवल मान्यता देते हैं और रेखांकित करते हैं बल्कि वह ऐसे लोगों को खड़ा जवाब भी देते हैं जो यह कहते हैं कि ग़ज़ल उर्दू के मूल व्यक्तित्व के साथ हिंदी में परिग्रहीत हुई है।
स्वयं लेखक के अनुसार 'उर्दू अदीबों की दुनिया में' पुस्तक को पढ़कर आप इन अदीबों की दुनिया से अच्छी तरह तो परिचित होंगे ही, यह भी जान सकेंगे कि इन रचनाकारों की दुनिया कितने संघर्षों, कितनी रचनात्मकताओं, कितने जोश और जज़्बे से भरी हुई रही है।
ग़ज़ल और ग़ज़ल से संबंधित गद्य पुस्तकों के प्रकाशन में जिस तरह से "श्वेतवर्णा प्रकाशन" ने योगदान किया है वह बेहद क़ाबिले तारीफ़ है। इस पुस्तक को सामने लाने के लिए कमलेश भट्ट कमल ने श्वेतवर्णा प्रकाशन के राहुल शिवाय और शारदा सुमन के सहयोग को रेखांकित किया है।
इस महत्वपूर्ण पुस्तक के लिए मैं लेखक मित्र कमलेश भट्ट कमल को हार्दिक बधाई देता हूँ। 223 पेज की इस पेपर बैक पुस्तक का मूल्य 499 रूपये है।
आपका : #देवमणि_पांडेय
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