बुधवार, 18 मार्च 2026

डॉ शोभा दीक्षित भावना का ग़ज़ल संग्रह ​

 

"फिर भी तुम हो" शोभा दीक्षित 'भावना' का ग़ज़ल संग्रह ​

डॉ शोभा दीक्षित 'भावना' का ग़ज़ल संग्रह "फिर भी तुम हो" समकालीन ग़ज़ल की दुनिया में ताज़ा हवा के झोंके की तरह है। उनकी ग़ज़लों से गुज़रते हुए प्रेम, प्रकृति, पर्यावरण जैसे विविधरंगी दृश्यों से समृद्ध होना है। देखने में उनकी ग़ज़लें निहायत सीधी सादी हैं लेकिन उनके अंदर भावनाओं का विशाल भंडार छुपा हुआ है। 

​आमतौर पर 'इश्क़' और 'मुहब्बत' जैसे विषयों पर लिखना और कुछ नया दे पाना चुनौती भरा काम होता है। लेकिन शोभा जी ने यहाँ अपनी मौलिकता सिद्ध की है। उनके पास बिम्बों की एक नई दुनिया है। जब वे कहती हैं-

​साँस की जलतरंग बजती है,

इश्क को गा रहा है फिर कोई।

​तो यहाँ 'साँस' और 'जलतरंग' का सामंजस्य पाठक के भीतर एक संगीतमय अनुभूति पैदा कर देता है। यही सादगी और गहराई ही उनकी लेखनी की विशेषता है।

​शोभा जी की ग़ज़लों में प्रेम का सफ़र रूहानी इबादत की ओर जाता है। उनके शेरों में 'सज़दा', 'इनायत' और 'गुलदान' जैसे शब्द प्रेम को एक गरिमा प्रदान करते हैं-

ये दिल मसरूफ है सज़दे में तेरे, 

तेरी मुझ पे इनायत हो गई है।


दिल मेरा तेरी उल्फ़त का गुलदान है, 

तेरी यादों को जिसमें बसाया गया।

शोभा जी के कई शेर प्रेम की मर्यादा और उदात्त सोच के परिचायक हैं। वे जिस सलीक़े के साथ अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करती हैं वह दिलों के तार झंकृत कर देता है-

​उंगली मुझ पर उठी बहुत सी तुम पर ये इल्ज़ाम न आये,

लफ़्ज़-लफ़्ज़ में तुम हो लेकिन कहीं तुम्हारा नाम न आये।

​यह 'बिना नाम लिए सब कुछ कह देना' ही एक कुशल ग़ज़लकार की असली पहचान है। यह भी ग़ौरतलब है कि ​एक संवेदनशील रचनाकार केवल कुछ विषयों तक ही सीमित नहीं हो सकता। उसे समाज की हलचलें भी बेचैन करती हैं। शोभा जी ने ग्रामीण अंचल की विसंगतियों और राजनीति की भेंट चढ़ते रिश्तों को बड़ी बेबाक़ी से पकड़ा है-

बाप ने अपना ख़ून सुखाकर जमा किया था जो, 

बेटा इतना औघड़ दानी कुछ भी नहीं बचा।


​खेत बेंचकर दारू बाँटी फिर भी हार गए,

सबकुछ तो ले गयी प्रधानी, कुछ भी नहीं बचा।

​चुनाव की भेंट चढ़ते किसान और पिता की मेहनत को लुटाते बेटे का यह चित्र समाज के युगीन यथार्थ को आईना दिखाता है। ​​पर्यावरण और मासूमियत के प्रति कवयित्री की चिंता हृदयस्पर्शी है। कटते हुए पेड़ों के बीच बिजली के तारों पर बैठी कोयल का बिम्ब विकास की अंधी दौड़ पर एक करारा प्रहार है। वहीं, स्कूल जाती 'नाज़ुक कली' के बहाने वे स्त्री सुरक्षा और शिक्षा की दुआ भी मांगती हैं-

इसे महफूज़ रखना रहम करना या मेरे मालिक, 

ये नाजुक़ सी कली जो गाँव से स्कूल जाती है।


शजर सब कट गये, बैठी हुई बिजली के तारों पर, 

बहुत तकलीफ़ में है फिर भी कोयल गुनगुनाती 

"फिर भी तुम हो" ग़ज़ल ​संग्रह में जहाँ दिल की कोमल भावनाओं के लिए जगह है, वहीं देश की मिट्टी के प्रति अगाध प्रेम भी झलकता है। कश्मीर को दुनिया का इकलौता तोहफ़ा बताना कवयित्री के भारतीय गौरव को दर्शाता है-

हमारे हिन्द को ही सिर्फ़ मालिक ने दिया तोहफ़ा 

कहीं देखा है तुमने दूसरा कश्मीर दुनिया में 

​"फिर भी तुम हो" ग़ज़ल संग्रह डॉ. शोभा दीक्षित 'भावना' के अनुभवों, भावनाओं, सोच और सरोकार का दस्तावेज़ है। उनकी भाषा में रवानी है, ख़्यालों में ताज़गी है और बयान में ईमानदारी है। वे जिस तरह से व्यक्तिगत वेदना को सामाजिक चेतना से जोड़ती हैं, वह अभिव्यक्ति कौशल उन्हें ग़ज़ल की एक समर्थ आवाज़ बनाता है। मेरी शुभकामना है कि वे निरंतर प्रगति पथ पर अग्रसर रहें और ग़ज़ल के कैनवास पर नये नये चित्र बनाती रहें। 

देवमणि पांडेय : 98210 82126

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फ़िल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210 82126


कोई टिप्पणी नहीं: