बुधवार, 25 मार्च 2026

कवि विनोद का प्रबंध काव्य 'बरवै_विनोद'

 

कवि विनोद शंकर शुक्ल को अमीर ख़ुसरो पुरस्कार

​लखनऊ के प्रतिष्ठित कवि विनोद शंकर शुक्ल 'विनोद' को उनके प्रबंध काव्य 'बरवै_विनोद' के लिए 22 मार्च 2026 को राज्य कर्मचारी साहित्य संस्थान उत्तर प्रदेश की ओर से एक लाख रूपये के अमीर ख़ुसरो पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इस रचनात्मक उपलब्धि के लिए विनोद जी को हार्दिक बधाई! 

वन विभाग, उत्तर प्रदेश में डी.एफ.ओ. के पद से वर्ष 2017 में सेवानिवृत्त होने के बाद विनोद जी पूर्णरूपेण साहित्य साधना में रत हैं। लखनऊ यात्रा के दौरान उनसे साहित्य-चर्चा में बहुत आनंद आया। विनोद जी ने मुझे अपनी तीन पुस्तकें भेंट कीं-'बरवै-विनोद', 'विश्वामित्र-मेनका' और 'कुरुवंशी महान'।

​पुरातन काव्य-परंपरा में विनोद जी की गहरी रुचि है। बरवै छंदों में उन्होंने 'बरवै-विनोद' का सृजन किया है। कहा जाता है कि बारह-सात मात्राओं वाले इस 'बरवै' छंद का नामकरण अब्दुल रहीम ख़ान-ए-ख़ाना ने किया था। इस छंद में रहीम की चर्चित पुस्तक है- 'बरवै नायिका भेद'। इसी छंद में महाकवि तुलसीदास ने भी 'बरवै रामायण' की रचना की। 

रहीम और तुलसीदास के बरवै अवधी भाषा में हैं। विनोद जी ने खड़ी बोली हिंदी में इस छंद को ढालकर 'बरवै-विनोद' का सृजन किया है। इस पुस्तक में सात सौ इक्कीस बरवै छंदों को छ: शीर्षकों में समाहित किया गया है- सौंदर्य, वियोग, संयोग, वात्सल्य, दायित्व और ज्ञान-भक्ति। सरस भाषा, रोचक शैली और मनमोहक भावनाओं से समृद्ध यह एक उत्कृष्ट कृति है।

​'कुरुवंशी महान' प्रबंध काव्य है। इसकी कथावस्तु महाभारत पर आधारित है। यह तेरह सर्गों में विभक्त है। इसका प्रत्येक सर्ग एक पृथक छंद में रचित है। 'विश्वामित्र-मेनका' खंडकाव्य में इन दो पात्रों के माध्यम से वैदिक कालीन आर्य संस्कृति की एक यशोगाथा प्रस्तुत की गई है। इसका अंतिम सर्ग 'हर्ष सर्ग' है जिसमें दुष्यंत की अपने पुत्र भरत एवं पत्नी शकुंतला से भेंट होती है। दुष्यंत उन्हें साथ लेकर अपनी राजधानी हस्तिनापुर वापस चले जाते हैं।सहज प्रवाह लिए हुए यह खंडकाव्य काफ़ी सरस है। 

​विनोद जी की लेखनी से निकली तीनों अनमोल कृतियाँ हिन्दी साहित्य जगत के लिए एक बहुमूल्य उपहार हैं और उनकी सृजनशीलता की महत्ता को प्रमाणित करती हैं। अवधी के पारंपरिक 'बरवै' छंद को खड़ी बोली की सरसता में पिरोकर विनोद जी ने आधुनिक हिंदी साहित्य में एक नया अध्याय जोड़ा है।

​'कुरुवंशी महान' में महाभारत की महानता और 'विश्वामित्र-मेनका' में वैदिक कालीन संस्कृति का उदात्त चित्रण विनोद जी की गहरी शोधपरक दृष्टि और सांस्कृतिक निष्ठा को दर्शाता है। इन उत्कृष्ट रचनाओं के लिए आपको हार्दिक बधाई। हम सबकी मंगल कामना है कि आपकी लेखनी इसी प्रकार माँ भारती की सेवा में निरंतर गतिशील रहे।

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आपका : देवमणि पांडेय 98210 82126 

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मंगलवार, 24 मार्च 2026

चित्रनगरी संवाद मंच मुम्बई के पांच साल

चित्रनगरी संवाद मंच मुम्बई के पांच साल 

चित्रनगरी संवाद मंच मुम्बई एक अनौपचारिक मंच है। हर रविवार इसके नियमित आयोजन में कविता पाठ, कहानी पाठ, नाटकों का मंचन, किताबों पर चर्चा, लेखक से मिलिए आदि कार्यक्रम होते हैं। बाहर से पधारे रचनाकारों के साथ सार्थक संवाद होता है और नये रचनाकारों को भी इस मंच पर भरपूर प्रोत्साहन दिया जाता है। पेश है ‘स्त्री दर्पण’ के लिए इसके संयोजक-संचालक देवमणि पांडेय से कथाकार-कवयित्री रीता दास राम की बातचीत। 

प्रश्न-1: आप यह चित्रनगरी संवाद मंच कब से चला रहे हैं और कितने आयोजन कर चुके हैं? 

अड्डेबाजी मेरा पुराना शौक़ है। जब मैं गोकुलधाम मुहल्ले में रहने के लिए आया तो अड्डेबाजी करने और मिलने जुलने के लिए फ़िल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व में होटल रॉयल चैलेंज के सामने एक कलात्मक जगह मिल गई- इडलिश कैफ़े। हमने तय किया कि प्रत्येक रविवार की शाम को खुले आसमान के नीचे 6 से 8 बजे हम नियमित यहां मिलेंगे। गपशप और चाय-काफ़ी का लुत्फ़ उठाएंगे। 

मुम्बई के गोरेगांव उपनगर में फ़िल्म सिटी रोड के आसपास बहुत सारे लेखक, पत्रकार, रंगकर्मी, कलाकार, गायक, संगीतकार और अभिव्यक्ति के अन्य माध्यमों से जुड़े लोग रहते हैं। इन सबको आपस में एक मंच के ज़रिए जोड़ने के लिए हम कुछ मित्रों ने वरिष्ठ कथाकार सूरज प्रकाश की अगुवाई में जनवरी 2020 में एक मंच बनाया- "चित्रनगरी संवाद मंच मुम्बई।" 


फ़िल्मसिटी रोड और आस पास रहने वाले जो रचनाकार कलाकार इस अड्डेबाजी में शुरुआती दिनों में शामिल हुए उनके नाम हैं सूरज प्रकाश, अशोक राजवाडे, रवींद्र कात्यायन, प्रेम रंजन अनिमेष, के पी सक्सेना ‘दूसरे’, प्रदीप गुप्ता, नवीन सी चतुर्वेदी, नवीन जोशी ‘नवा’, शैलेंद्र गौड़, राजीव जोशी, आर एस रावत, राजेश ऋतुपर्ण, राजू मिश्र, सविता दत्त तथा कुछ और साथी। लॉकडाउन (25 मार्च) के पहले, रविवार 22 मार्च 2020 को जो अड्डेबाजी हुई थी उसमें सिने गीतकार अभिलाष (इतनी शक्ति हमें देना दाता फेम) और नवगीतकार पं किरण मिश्र शामिल थे। कोरोना काल के दौरान इन दोनों साथियों का निधन हो गया। 

इडलिश कैफ़े में कितने कार्यक्रम हुए इसकी गिनती मुश्किल है। मगर मेरी फेसबुक वाल पर सबकी रिपोर्ट चित्र के साथ उपलब्ध है। आगे चलकर मराठी लेखक मित्र अशोक राजवाड़े के सौजन्य से हमें केशव गोरे स्मारक ट्रस्ट, गोरेगांव पश्चिम में मृणालताई हाल मिल गया। रविवार 3 जुलाई 2022 से वहां हर रविवार को सुचारू रूप से साप्ताहिक आयोजन होने लगे। अब तक वहां लगभग दो सौ कार्यक्रम आयोजित हो चुके हैं। उन कार्यक्रमों का ब्यौरा “चित्रनगरी संवाद मंच मुम्बई” के फेसबुक पेज पर देखा जा सकता है। 


प्रश्न-2: चित्रनगरी संवाद मंच में किन किन विधाओं और विषयों को शामिल किया?

चित्रनगरी संवाद मंच मुंबई एक अनौपचारिक मंच है। हर रविवार को इसके नियमित साप्ताहिक आयोजन में साहित्य चर्चा, कविता पाठ, कहानी पाठ, नाटकों का मंचन, किताबों पर चर्चा, सिने चर्चा, संगीत चर्चा, लेखक से मिलिए आदि कार्यक्रम होते हैं। नई किताबों के अंश का पाठ होता है। बाहर से पधारे रचनाकारों के साथ सार्थक संवाद होता है और नये रचनाकारों को भी इस मंच पर भरपूर प्रोत्साहन दिया जाता है।

प्रश्न-3: किन किन हस्तियों को यहाँ बुलाया गया या उन पर कार्यक्रम किया गया?

मुंबई के और देश के चुनिंदा रचनाकारों को समय-समय पर रचनात्मक संवाद के लिए चित्रनगरी संवाद मंच में आमंत्रित किया जाता है। मुंबई के लगभग सभी प्रमुख रचनाकार इसमें शिरकत कर चुके हैं। यहां आयोजित मुशायरों में मुम्बई के और बाहर के सौ से भी अधिक नामचीन शायर शिरकत कर चुके हैं। 

मुंबई से बाहर के जिन रचनाकारों ने अपनी मौजूदगी से चित्रनगरी संवाद मंच की गरिमा बढ़ाई उनमें कुछ प्रमुख नाम हैं - तेजेंद्र शर्मा (यूके), भारतेंदु विमल (लंदन), रेखा राजवंशी (ऑस्ट्रेलिया) नरेश सक्सेना (लखनऊ), राजेश जोशी (भोपाल) असग़र वजाहत (दिल्ली) , एस आर हरनोट (शिमला), विमल कुमार (दिल्ली) प्रेम जनमेजय (दिल्ली), सुभाष चंदर (दिल्ली), राजेन्द्र गौतम (दिल्ली), सुभाष वशिष्ठ (दिल्ली) विभा रश्मि  (दिल्ली), ममता जयंत  (दिल्ली), प्रभात समीर (दिल्ली), सोनाली बोस (दिल्ली), अशोक भौमिक (इलाहाबाद) रतिभान त्रिपाठी (प्रयाग), प्रतुल जोशी (लखनऊ), डॉ हरि प्रकाश श्रीवास्तव (लखनऊ), मंजुल मिश्र 'मंज़र' (लखनऊ), चंद्रभाल सुकुमार (वाराणसी), इंद्रजीत सिंह (देहरादून), राजशेखर व्यास (उज्जैन) ओमा शर्मा (वडोदरा), जितेन्द्र भाटिया (जयपुर), सुधा अरोड़ा (बंगलोर) अनुराधा सिंह (बंगलोर), चारु चित्रा (ग्वालियर), राकेश अचल (ग्वालियर) आर के पालीवाल (भोपाल), विनोद नागर (भोपाल), विजय शंकर चतुर्वेदी (सतना), दिनकर शर्मा (झारखंड), घनश्याम अग्रवाल (अकोला), सुजीत सहगल (धर्मशाला), ज़ुबैर अंसारी (लखनऊ), आदिल रशीद (दिल्ली), सिद्धार्थ शांडिल्य (हैदराबाद), सोनू पाटील (नागपुर), सपना मूलचंदानी (अजमेर), तनोज दधीच (कोटा) और लोक गायक राकेश तिवारी (रायपुर) 

प्रश्न-4: साहित्य का इससे कितना प्रचार प्रसार हुआ।

साहित्य का इससे कितना प्रचार प्रसार हुआ यह बताने के लिए मेरे पास कोई पैमाना नहीं है। मगर जो रचनाकार कलाकार चित्रनगरी संवाद मंच में आए उनको अपनी बात कहकर या अपनी रचना सुनाकर अच्छा लगा। श्रोताओं को भी इस अनौपचारिक संवाद में आनंद आया और उन्होंने ख़ुद को हमेशा समृद्ध महसूस किया। अब मैं किसी भी शहर में जाता हूं तो लोग चित्रनगरी संवाद मंच के बारे में पूछते हैं। इससे लगता है कि साहित्य का प्रचार प्रसार तो हो रहा है। यह भी उल्लेखनीय है कि कई युवा रचनाकारों की शुरुआत हमारे मंच से हुई और उन्होंने काफ़ी नाम कमाया। मेरी फेसबुक वॉल पर और चित्रनगरी संवाद मंच के फेसबुक पेज पर हमारी सारी गतिविधियों की रिपोर्ट मौजूद है। 

प्रश्न-5: श्रोताओं का फीड बैक क्या रहा?

चित्रनगरी संवाद मंच के बारे में श्रोताओं का फीडबैक हमेशा बहुत अच्छा रहा है। वे व्यक्तिगत रूप से फ़ोन करके भी अपनी प्रतिक्रिया बताते रहते हैं। श्रोताओं की राय को मानकर हम किसी रचनाकार का भाषण कराने के बजाय उनसे सवाल पूछते हैं और श्रोता भी सवाल पूछते हैं। इससे गंभीर विषय भी आसान हो जाता है। किसी को बोरियत नहीं होती। विश्व साहित्य के हिंदी अनुवाद पर बात करने के लिए जब कथाकार जितेंद्र भाटिया आए तो श्रोता उनसे दो घंटे तक सवाल पूछते रहे और कविता पाठ का सत्र स्थगित करना पड़ा। मधु कांकरिया की “ढाका डायरी” पर भी बढ़िया चर्चा हुई। स्त्री दर्पण के सौजन्य से आयोजित “स्त्री लेखन” पर आधारित चर्चा में श्रोताओं का भरपूर उत्साह दिखाई पड़ा। ओमा शर्मा के कहानी पाठ के बाद श्रोताओं ने उनसे इतने ज़्यादा सवाल पूछे कि वे दंग रह गए और उन्हें उत्तर देकर श्रोताओं की इस सहभागिता से बहुत ख़ुशी भी हुई। 

सुप्रसिद्ध मराठी लेखक लक्ष्मण गायकवाड़ से उनके आत्मकथात्मक उपन्यास 'उचक्का' के बारे में सुनना बेहद रोमांचक रहा। प्रतिष्ठित मराठी लेखिका डॉ स्मिता दातार से वायलिन वादक पद्मश्री डी के दातार की जीवनी के अंश सुनना भी यादगार अनुभव रहा। प्रसन्नता की बात है कि हर रविवार सिर्फ़ व्हाट्सएप संदेश पर प्राय: तीस चालीस लोग इकट्ठा हो जाते हैं। एक बार प्रेमचंद जयंती कार्यक्रम में और दूसरी बार एक संगीत नाटक में 70 से ज़्यादा लोग आ गए तो अलग से कुर्सियां लगवानी पड़ीं। 


प्रश्न-6: नाम चित्रनगरी है तो क्या फ़िल्म के लोग भी इसमें आये ?

हम सिने जगत से ग्लैमरस कलाकारों के बजाय उन लोगों को बुलाना पसंद करते हैं जिनका रचनात्मकता से रिश्ता है। चित्रनगरी संवाद मंच में सविता बजाज, हिमानी शिवपुरी, कुलबीर बडेसरों, प्रतिभा सुमन शर्मा, शाइस्ता ख़ान, दीप्ति मिश्र, लता हया, असीमा भट्ट, पूर्वा पराग, अलका अमीन, रावी गुप्ता, कामना सिंह चंदेल जैसी कई प्रतिष्ठित अभिनेत्रियां शिरकत कर चुकी हैं। लेखक-निर्देशक रंजीत कपूर, लेखक-निर्देशक संजय छेल, फ़िल्म लेखक अशोक मिश्र, अभिनेता यशपाल शर्मा, लेखक-निर्देशक पवन कुमार, सिने गीतकार नवाब आरज़ू, सिने गीतकार अहमद वसी, अभिनेता दयाशंकर पांडेय, अभिनेता-निर्देशक ओम कटारे, लेखक-निर्देशक-अभिनेता विजय कुमार, पटकथा लेखक विजय पंडित, लेखक-निर्देशक दिनेश लखनपाल, अभिनेता बी शांतनु, लेखक-अभिनेता अभिराम भडकमकर, अभिनेता अरुण शेखर, फ़िल्म पत्रकार अजित राय, फ़िल्म पत्रकार अजय ब्रह्मात्मज, फ़िल्म पत्रकार पराग छापेकर, अभिनेता शैलेंद्र गौड़, आर जे प्रीति गौड़, सिने गीतकार संदीप नाथ, सिने गीतकार-गायक विनोद दुबे, सिने गीतकार शेखर अस्तित्व, पद्मश्री संगीतकार अली ग़नी, पार्श्वगायिका सोमा बनर्जी, पद्मश्री गायिका डॉ सोमा घोष और जाने माने अभिनेता राजेंद्र गुप्ता ने हमारे आयोजनों में शिरकत करके चित्रनगरी संवाद मंच की गरिमा बढ़ाई है। 

प्रश्न-7: इन आयोजनों में आपको किस तरह का साहित्य सुनने को मिला। उसकी विविधता और गुणवत्ता कैसी लगी।

चित्रनगरी संवाद मंच में इस्मत चुगताई, प्रेमचंद, परसाई, शरद जोशी, मुक्तिबोध और कामता नाथ की कहानियों का मंचन हो चुका है। रंगकर्मी विजय कुमार द्वारा निर्देशित और मुहम्मद अली जिन्ना पर केंद्रित '5 अगस्त 1947' नाटक का पाठ यहां किया गया। लेखक ब्रत्य वसु के इस बांग्ला नाटक का हिंदी अनुवाद जैनद्र भारती ने किया है। तुलसीदास और अकबर की मुलाक़ात पर आधारित असग़र वजाहत के नाटक ‘महाबली’ का मंचन हुआ। मराठी रंगकर्मी आनंद माड़ये के नाट्य ग्रुप ने परसाई की कहानियों का मंचन किया। न्यूज़ चैनल की पत्रकारिता पर आधारित अरुण शेखर द्वारा लिखित निर्देशित व्यंग्य नाटक ‘आ से आम’ का पहला मंचन हुआ। असीमा भट्ट, दीप्ति मिश्र, लता हया और अर्चना जौहरी के लघु नाटकों का मंचन हुआ। सिने जगत की क़िस्सागोई पर आधारित पवन कुमार के संगीतमय नाटक ‘सिने फीलिया’ का मंचन हुआ। 

आबिद सुरती और लक्ष्मण गायकवाड़ ने अपनी आत्मकथा सुनाई। जितेंद्र भाटिया और विजय कुमार महानगरों के अतीत पर लिखी हुई अपनी किताबों के साथ आए। असग़र वजाहत, एस आर हरनोट, ओमा शर्मा, मधु कांकरिया और सुधा अरोड़ा जैसे प्रतिष्ठित रचनाकारों ने कहानियां सुनाईं। नरेश सक्सेना और राजेश जोशी जैसे सुप्रसिद्ध कवियों के साथ संवाद करना और उनकी कविताओं को सुनना सबके लिए बहुत सुखद और प्रेरक रहा। रंजीत कपूर, अशोक मिश्र और संजय छेल जैसे फ़िल्म लेखकों से फ़िल्म लेखन की चुनौतियों पर चर्चा भी काफ़ी पसंद की गई। अभिनेता राजेन्द्र गुप्ता से प्रेमचंद की कहानी सुनना, सूरज प्रकाश से लेखकों की दुनिया के रोचक क़िस्से सुनना, रंगकर्मी मुजीब ख़ान से प्रेमचंद के क़िस्से सुनना, रीता दास राम से उनके जीवन की प्रेरक कथा सुनना, मशहूर सैलानी रेखा सुतार से पहाड़ों की दुर्गम यात्रा का वृतांत सुनना, लेखिका रश्मि रविजा से परिंदों की रोचक दुनिया के बारे में जानना या पद्मश्री गायिका डॉ सोमा घोष से चैती, कजरी और ठुमरी सुनना लोगों के लिए यादगार अनुभव रहा। यह विविधता ही चित्रनगरी संवाद मंच की पहचान है। 

प्रश्न-8: चित्रनगरी संवाद मंच से नयी पीढ़ी को आपने जोड़ा?

नयी पीढ़ी में गद्य लेखक कम हैं। गीत, ग़ज़ल, कविता लिखने वाले ज़्यादा है। इन्हें जोड़ने के लिए हम कभी-कभी युवा कवि सम्मेलन, मुशायरा और कवयित्री सम्मेलन करते हैं। नाटकों के मंचन के समय भी नई पीढ़ी की मौजूदगी रहती है। चित्रनगरी संवाद मंच में प्राय: एक घंटे चर्चा और एक घंटे कविता पाठ का आयोजन होता है। कविता पाठ में नई पीढ़ी भरपूर उत्साह के साथ शिरकत करती है। यह अच्छी बात है कि कुछ महिलाओं ने अपनी पहली कहानी का पहला पाठ चित्रनगरी संवाद मंच में किया।एक युवा लेखिका डॉ मधुबाला शुक्ल को हमने संचालन के लिए प्रोत्साहित किया। अब वे भरपूर आत्म विश्वास के साथ बोलती हैं और लोग पसंद करते हैं। 


प्रश्न-9: कुल मिलाकर आपका अनुभव कैसा रहा।

कुल मिलाकर अनुभव बहुत अच्छा रहा। कोरोना ने तो लोगों को घरों में क़ैद कर दिया था। कई रचनाकार भी मानसिक अवसाद से गुज़र रहे थे। ऐसे माहौल में चित्रनगरी संवाद मंच के ज़रिए लोगों को मिलने-जुलने का, गपशप करने का अवसर मिला तो सभी को बहुत अच्छा लगा। प्रो नंदलाल पाठक 97 साल के हो चुके हैं। उन्होंने पूरे दमख़म के साथ जब चित्रनगरी संवाद मंच में ग़ज़लें सुनाईं तो श्रोता दंग रह गए। 90 साल के ढब्बू जी (आबिद सुरती) कई बार चित्रनगरी संवाद मंच में ठहाके लगवा चुके हैं। हम पहले 5 से 5:30 बजे चाय पीते हैं। एक दूजे का हाल पूछते हैं। इसके बाद 5:30 से 7:30 बजे तक कार्यक्रम होता है। समय की पाबंदी का फ़ायदा यह है कि लोग भोजन के समय अपने-अपने घर पहुंच जाते हैं। कई ऐसे रचनाकार हैं जो नियमित आते हैं क्योंकि उन्हें सुनना सुनाना अच्छा लगता है। मुझे भी मिलने मिलाने का यह सिलसिला अच्छा लगता है। कुंवर बेचैन का शेर है - मिलना जुलना रहे तो मेले हैं /वरना दुनिया में सब अकेले हैं। 

चित्रनगरी सम्वाद मंच की एक आयोजन समिति है। इसमें सूरज प्रकाश, देवमणि पांडेय, सुभाष काबरा, राजेश ऋतुपर्ण और मधुबाला शुक्ल शामिल हैं। इससे आयोजनों की रूपरेखा निर्धारित करने में सहूलियत रहती है। 

प्रश्न 10: चित्रनगरी संवाद मंच के अलावा आप और किस संस्था से जुड़े हैं उस बारे में जानकारी दीजिए।

चित्रनगरी संवाद मंच के अलावा मैं दो महत्वपूर्ण संस्थाओं में डायरेक्टर हूँ। ये हैं 'साहित्यायन फाउंडेशन' और 'इंशाद फाउंडेशन'। साहित्यायन फाउंडेशन की प्रवर्तक हैं मुंबई की प्रमुख उद्योगपति पद्मभूषण राजश्री बिरला। साहित्यायन फाउंडेशन के माध्यम से मुम्बई में दो अखिल भारतीय नए पुरस्कारों की शुरुआत हुई है। हिंदी काव्य साहित्य में विशिष्ट योगदान के लिए नंदलाल पाठक साहित्य पुरस्कार (₹ पांच लाख) और एक सम्भावनाशील युवा ग़ज़लकार को नंदलाल पाठक प्रतिभा पुरस्कार (₹ एक लाख) प्रदान किया जायेगा। यह दोनों पुरस्कार प्रतिवर्ष दिए जाएंगे। 

इंशाद फाउंडेशन के प्रवर्तक हैं प्रतिष्ठित शायर नवीन जोशी 'नवा'। इंशाद के ज़रिए प्रतिभाशाली युवा कवियों को मंच प्रदान किया जाता है। इसके आयोजन मुंबई से बाहर भी पुणे, बड़ौदा, सूरत, दिल्ली, पटना, नागपुर, इंदौर आदि शहरों में हो चुके हैं। मुम्बई में 'नस्ल ए नौ भारत' नाम से युवा शायरों का अखिल भारतीय मुशायरा आयोजित किया जाता है। मुंबई के रंग शारदा सभागार में यह सिलसिला प्रतिवर्ष चलता रहेगा।

प्रश्न-11: चित्रनगरी संवाद मंच में शामिल मुम्बई के प्रमुख रचनाकार?  

आबिद सुरती, लक्ष्मण गायकवाड़, विजय कुमार, मधु कांकरिया, मनहर चौहान, धीरेंद्र अस्थाना, अनूप सेठी, विनोद दास, हरीश पाठक, बोधिसत्व, करुणा शंकर उपाध्याय, प्रो राम बक्ष, प्रभात समीर, नंदलाल पाठक, सत्यदेव त्रिपाठी, विमल मिश्र, अभिलाष अवस्थी, रमन मिश्र, राकेश शर्मा, आशकरण अटल, सुभाष काबरा, संजीव निगम, अनंत श्रीमाली, हरि मृदुल, संजय भिसे, यूनुस ख़ान, गुलशन मदान, अनिल गौड़, यशपाल सिंह यश, रमाकांत शर्मा, गंगा शरण सिंह, उषा मिश्र, चित्रा देसाई, ममता सिंह, रश्मि रविजा, रीता दास राम, कमलेश पाठक, सुलभा कोरे, आभा बोधिसत्व, सीमा अग्रवाल, रेखा बब्बल, अलका शरर, अर्चना जौहरी, प्रज्ञा शर्मा, सम्वेदना रावत, प्रेमा झा जैसे ढेर सारे प्रतिष्ठित नाम शामिल हैं। यहां आयोजित मुशायरों में मुम्बई के और बाहर के सौ से भी अधिक नामचीन शायर शिरकत कर चुके हैं जिनमें विजय अरुण, सागर त्रिपाठी, माधव बर्वे ‘नूर’, सिद्धार्थ शांडिल्य, नदीम सिद्दीक़ी, शाहिद लतीफ़ और नवीन सी चतुर्वेदी जैसे मशहूर क़लमकार शामिल हैं। 

प्रश्न-12: आपको साहित्य के भविष्य के बारे में क्या लगता है?

हमने अपने लेखन के शुरुआती दौर में पत्र पत्रिकाओं में छपकर अपनी पहचान बनाई थी। आज कोई मुझे सर्च करेगा तो उसे सबसे पहले ‘रेख़्ता’ या ‘कविता कोश’ का लिंक मिलेगा। आज का नया लेखक सोशल मीडिया पर अपनी पहचान बनाता है। प्रिंट साहित्य भी ज़रूरी है मगर हमारे साहित्यकारों की सोशल मीडिया पर भी मौजूदगी ज़रूरी है। अपनी रचनाओं को अच्छी रिकॉर्डिंग के साथ यूट्यूब जैसे प्लेटफार्म पर पेश करना भी इस दौर की ज़रूरत है। युवा पीढ़ी के लोग प्रिंट में पढ़ने के बजाय यूट्यूब पर कविता, कहानी सुनना ज़्यादा पसंद करते हैं। ज़्यादातर नौजवान मोबाइल में ही अपनी पसंद का साहित्य पढ़ते हैं। किताबों का महत्व आज भी क़ायम है। मुझे कई ऐसे नौजवान मिले जो घर में किताबें रखना और पढ़ना पसंद करते हैं। बदलते वक़्त के साथ रचनाकार अगर क़दम मिलाकर आगे बढ़ेगा तो बेहतर होगा। लेखन में जो बदलाव आ रहे हैं उन्हें भी स्वीकार करना होगा। सोशल मीडिया के इस दौर में भी जिसमें दम होगा वही टिकेगा।  

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Reeta Das Ram

बुधवार, 18 मार्च 2026

अनिल गौड़ का ग़ज़ल संग्रह 'रौशनी के नाम'

 हिंदी ग़ज़ल की सार्थक आवाज़: अनिल गौड़

हिंदी ग़ज़ल के परिदृश्य पर ​अनिल गौड़ एक ऐसी आवाज़ हैं जिनकी रचनात्मकता गहरी संवेदना और प्रभावशाली अभिव्यक्ति से समृद्ध है। उनका ग़ज़ल संग्रह 'रौशनी के नाम' स्वयं इस बात का प्रमाण है कि वे केवल शेर नहीं कहते, बल्कि समय और समाज से एक सार्थक संवाद स्थापित करते हैं। आम बोल चाल की भाषा में लिखी गईं ये सीधी, सादी ग़ज़लें पाठक और श्रोता के मन में जगह बनाने में सक्षम हैं। उनका यह शेर देखिए-

​अपना दर्द छुपाए हम तो गाते हैं आंसू, आंसू

हमको कवि शायर मत कहना, हम रोते बंजारे हैं

​यह शेर उनकी सोच और सरोकार का आईना है। यह एक ऐसे कवि की आवाज़ है जो अपनी रचना को महज कला नहीं, बल्कि अपने जीवन के दर्द की अभिव्यक्ति मानता है। सृजन का यही समर्पण उनकी ग़ज़लों को विशिष्ट बनाता है।


अनिल गौड़ की ग़ज़लों में सामाजिक पीड़ा और जीवन के विविध संदर्भ बड़ी मार्मिकता के साथ उभरते हैं। वे केवल व्यक्तिगत अनुभूतियों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि जन भावनाओं और सामाजिक सरोकारों के प्रति समर्पित दिखाई देते हैं। उनके लेखन में यथार्थ की कठोरता को संवेदना की आंच पर पकाया जाता है-

​इंसान की मजबूरियों का नाम है रोज़ी

वह बर्फ़ बेचता है लपट में खड़ा हुआ

​यह शेर एक ऐसा चित्र प्रस्तुत करता है, जहाँ विपरीत परिस्थितियों में जीवनयापन की जद्दोजहद है। 'बर्फ़' और 'लपट' का विरोधाभास सामाजिक विसंगतियों को बड़े सलीक़े के साथ रेखांकित करता है। अनिल गौड़ की ग़ज़लें समय के साथ चलती हैं। वे चुनौतियों को स्वीकार करते हैं और विसंगतियों पर निर्भीक होकर टिप्पणी करते हैं। उनकी ग़ज़लें अपने समय से मुख़ातिब हैं-

​सच्चाई को कब तक पत्थर मारा जाएगा

आज नहीं तो कल उसको स्वीकार जाएगा

​यह शेर आशावाद और सत्य की अनिवार्यता को बख़ूबी दर्शाता है। उनका एक और शेर देखिए जो समाज के नैतिक पतन पर तीखा व्यंग्य है-

​जिसे भी देखो, वह हंसकर चपत लगाता है

वतन को हमने, यतीमों का गाल कर डाला

​यहाँ 'यतीमों का गाल' जैसी नई और मौलिक उपमा सामाजिक पतन और देश की दुर्दशा को एक झटके में सामने ला देती है। कभी-कभी वे हमारे सामने कोई ऐसा मोहक चित्र प्रस्तुत कर देते हैं जिससे मन प्रसन्न हो जाता है। ऐसा ही एक दृश्य यशोदा और कृष्ण के प्यार भरे रिश्ते को दिखाता है जहाँ माँ डाँटती भी है, लेकिन उस डाँट में अपार स्नेह भरा होता है-

 यशुमति ने पंखुड़ियों जैसे कान उमेठ दिए

​बोल कि ग्वालिन के घर तू दोबारा जाएगा

इस शेर की सबसे बड़ी ख़ूबी 'पंखुड़ियों जैसे कान' की उपमा है। यह उपमा बालक कृष्ण की मासूमियत और सुकोमलता को दर्शाती है। आमतौर पर कान उमेठना एक दंड होता है, लेकिन पंखुड़ियों जैसे कान उमेठने का वर्णन यह दर्शाता है कि यह दंड भी प्रेम और लाड़ से भरा हुआ है। यह उपमा दृश्य को कोमल बना देती है। इस शेर में कृष्ण की बाल लीला को एक नए, सुंदर और मौलिक कोण से प्रस्तुत किया गया है।

अनिल गौड़ की ग़ज़लों में कभी-कभी दाम्पत्य जीवन के ऐसे चित्र भी नज़र आते हैं जहां प्रेम का माधुर्य है। उनकी एक लोकप्रिय ग़ज़ल का मतला है-

​बांह डाल दी तुमने, हँस के मेरी गर्दन में

​मैंने तो ये पूछा था,क्या बना है भोजन में

यह शेर रोज़मर्रा के जीवन के एक सीधे-सादे संवाद को अचानक प्रेम के मोड़ पर लाकर खड़ा कर देता है। यह दर्शाता है कि दाम्पत्य जीवन में छोटी-छोटी व्यावहारिक बातों के बीच भी प्रेम और स्नेह का प्रदर्शन कितना सहज और आकस्मिक हो सकता है।

अनिल गौड़ की रचनात्मकता में प्रेम और अध्यात्म के संदर्भ भी गहरे अर्थों के साथ आते हैं। कृष्ण से संबंधित उनका यह शेर जीवन के शाश्वत मूल्यों और दर्शन को नई ऊँचाई देता है-

​कृष्ण का बड़ा क़द है, आदमी से ईश्वर तक

क्यों कि वे अकेले हैं, प्रेम के समर्थन में

उनके आध्यात्मिक चिंतन को रेखांकित करने वाला एक और शेर देखिए जो एक अंतिम आशा और गहरी आस्था की ओर इशारा करता है-

​स्वयं दीप हो जाना ही है, एक मात्र अंतिम आशा

देह दीप है, प्रतिभा बाती, और आत्मा ही लौ है

यह शेर “अप्प दीपो भव” यानी आत्म-दीप्ति के दर्शन को एक सुंदर रूपक में प्रस्तुत करता है। यह कवि की गहन रचनात्मकता का प्रमाण है।


अनिल गौड़ की ग़ज़लें लयबद्धता, संप्रेषणीयता, सामाजिक प्रतिबद्धता और दार्शनिक गहराई का एक सुंदर संगम हैं। वे हिंदी ग़ज़ल की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उसे समकालीन चुनौतियों से जोड़ते हैं। समसामयिक और महत्वपूर्ण विषयवस्तु वाली उनकी ग़ज़लों में जनमानस से सीधे जुड़ने की क्षमता है। मुझे उम्मीद है कि अनिल गौड़ की ये ग़ज़लें हिंदी ग़ज़ल के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेंगी। आने वाले समय में वे हिंदी ग़ज़ल को एक विशिष्ट 'रौशनी' प्रदान करते रहें, यही मेरी शुभकामना है।

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आपका : देवमणि पांडेय

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फ़िल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210 82126

नरोत्तम शर्मा का ग़ज़ल संग्रह एहसासात



एहसासात : नरोत्तम शर्मा का ग़ज़ल संग्रह

नरोत्तम शर्मा की ग़ज़लें केवल शब्दों का जाल नहीं हैं, बल्कि वे जीवन के अनुभवों की एक जीती-जाती तस्वीर हैं। उनके ग़ज़ल संग्रह ‘एहसासात’ में ज़िंदगी के वे तमाम रंग मौजूद हैं जिन्हें हम अक्सर भागदौड़ में अनदेखा कर देते हैं। ​शर्मा जी के लिए ग़ज़ल सिर्फ एक विधा नहीं, बल्कि एक 'एहसास' है। वे ग़ज़ल के सौंदर्य को प्रकृति और प्रेम के साथ जोड़कर देखते हैं-

​सर्दियों में धूप का एहसास होती है ग़ज़ल

प्रेमियों के हृदय का मधुमास होती है ग़ज़ल

​नरोत्तम शर्मा की ग़ज़लें पढ़ते समय ऐसा लगता है मानो कोई अपना हमारे पास बैठकर ज़िंदगी के फ़लसफ़े सुना रहा हो। उन्होंने मुहब्बत की दहलीज़ लांघ कर ग़ज़ल को आम आदमी की दहलीज़ तक पहुँचाया है। ​उनके अनुसार, सृजन की प्रक्रिया पीड़ादायक है, लेकिन उसका परिणाम मधुर होता है। वे कविता रचने के उस 'मधुर संत्रास'  को बख़ूबी समझते हैं-

जब तलक न शक्ल ले बेचैन रहता है हृदय 

सृजन की पीड़ा, मधुर संत्रास होती है ग़ज़ल

​आज के दौर में इंसान जो दिखता है, वह होता नहीं। नरोत्तम शर्मा ने समाज में व्याप्त पाखंड और 'मुखौटों' पर गहरा प्रहार किया है। वे आगाह करते हैं कि बाहरी चमक-धमक और माथे के चंदन पर भरोसा न करें, क्योंकि उसके पीछे 'विष' छुपा हो सकता है-

चिकनी चुपड़ी बातों, कपड़ों पर मत जाना 

विष भी हो सकता है माथे के चन्दन में

वे कपड़ों और चिकनी-चुपड़ी बातों के पीछे छिपी क्रूरता को बेनक़ाब करते हैं और सत्य की परख का संकेत देते हैं - 

चेहरा जो किसी शख्स का दिखता है सभी को, 

अक्सर वो उसी शख्स का चेहरा नहीं होता।

​शायर को इस बात का गहरा मलाल है कि समाज से 'शर्म' और 'ईमानदारी' लुप्त होती जा रही है। जहाँ चारों ओर झूठ और दगा हो, वहाँ सादगी से जीना भी किसी जंग से कम नहीं है-

​हर तरफ झूठ, दगा, और बेवफ़ाई है

आज के दौर में जीना भी इक लड़ाई है

​नरोत्तम शर्मा की ग़ज़लों में एक आम आदमी की बेबसी और उसकी ज़मीन से जुड़ी संवेदनाएँ भी हैं। वे घर न बना पाने के दर्द को स्वीकारते हैं, लेकिन 'घर' होने के अहसास को जीवित रखते हैं। वहीं, 'आँगन के चूजों का सूप बन जाना' उस सामाजिक निष्ठुरता को दर्शाता है जहाँ मासूमियत को सत्ता या स्वार्थ निगल जाता है-

गो बना पाया नहीं आज तलक मैं कोई घर 

एक एहसास तो होता है कि घर होता है


कोई बना के उनका सूप पी गया होगा 

वो चूजे, जो मेरे आँगन में आ के खेलते थे


तल्ख़ियों के बावजूद, नरोत्तम जी के यहाँ निराशा नहीं है। वे व्यक्ति को कर्मशील होने की प्रेरणा देते हैं। उनका मानना है कि ज्ञान की रोशनी तभी काम आती है जब आप स्वयं प्रयास का 'दीया' जलाएँ-

इल्म से रोशनी तो मिलती है 

पर दिया ख़ुद जलाना पड़ता है

वे सिखाते हैं कि अगर इरादों में जोश हो, तो एक 'क़तरा' भी समंदर जैसा तूफ़ान पैदा कर सकता है-

जोश जिसमें न अगर हो तो समंदर क्या है 

हो तो क़तरे में भी तूफाँ का असर होता है 

​नरोत्तम शर्मा का यह संग्रह संवेदनशीलता और साहस का अद्भुत मिश्रण है। उनकी भाषा सरल है लेकिन मारक है। वे जहाँ प्रेम की मधुरता बिखेरते हैं, वहीं समाज की विसंगतियों पर कड़ा प्रहार करने से भी नहीं चूकते। यह ग़ज़ल संग्रह आज के समय और समाज का एक आईना है-

किसी की आँख में अब शर्म का पानी नहीं है 

यही है ज़िंदगी तो फिर कोई मानी नहीं है

नरोत्तम शर्मा की ग़ज़लों में मुहब्बत का गुलशन है मगर उन्होंने ग़ज़ल को आम आदमी के चूल्हे-चौके, आँगन की धूप और समाज के कड़वे सच से जोड़ने का नेक काम भी किया है। उनका यह ग़ज़ल संग्रह मात्र ग़ज़लों का गुलदस्ता नहीं, बल्कि आज के दौर का एक दस्तावेज़ भी है। इसमें जहाँ एक ओर प्रेम की कोमलता है, वहीं दूसरी ओर मुखौटों के पीछे छिपे चेहरों को बेनक़ाब करने का साहस भी है। नरोत्तम शर्मा की आवाज़ उस आम आदमी की आवाज़ है जो झूठ और फ़रेब के बाज़ार में अपनी मासूमियत बचाने की जद्दोजहद कर रहा है।

​अगर आप ऐसी ग़ज़लों की तलाश में हैं जो रूह को छुएँ और ज़हन को झकझोर दें, तो यह संग्रह आपके लिए है। सर्दियों की गुनगुनी धूप जैसी ये ग़ज़लें आपको ज़िंदगी को एक नए नज़रिए से देखना सिखाएंगी। आस्था प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित इस किताब का मूल्य है 275 रूपये। 

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आपका : देवमणि पांडेय 98210 82126

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति बिल्डिंग, कन्या पाडा, फ़िल्मसिटी रोड, गोकुलधाम, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063 

डॉ शोभा दीक्षित भावना का ग़ज़ल संग्रह ​

 

"फिर भी तुम हो" शोभा दीक्षित 'भावना' का ग़ज़ल संग्रह ​

डॉ शोभा दीक्षित 'भावना' का ग़ज़ल संग्रह "फिर भी तुम हो" समकालीन ग़ज़ल की दुनिया में ताज़ा हवा के झोंके की तरह है। उनकी ग़ज़लों से गुज़रते हुए प्रेम, प्रकृति, पर्यावरण जैसे विविधरंगी दृश्यों से समृद्ध होना है। देखने में उनकी ग़ज़लें निहायत सीधी सादी हैं लेकिन उनके अंदर भावनाओं का विशाल भंडार छुपा हुआ है। 

​आमतौर पर 'इश्क़' और 'मुहब्बत' जैसे विषयों पर लिखना और कुछ नया दे पाना चुनौती भरा काम होता है। लेकिन शोभा जी ने यहाँ अपनी मौलिकता सिद्ध की है। उनके पास बिम्बों की एक नई दुनिया है। जब वे कहती हैं-

​साँस की जलतरंग बजती है,

इश्क को गा रहा है फिर कोई।

​तो यहाँ 'साँस' और 'जलतरंग' का सामंजस्य पाठक के भीतर एक संगीतमय अनुभूति पैदा कर देता है। यही सादगी और गहराई ही उनकी लेखनी की विशेषता है।

​शोभा जी की ग़ज़लों में प्रेम का सफ़र रूहानी इबादत की ओर जाता है। उनके शेरों में 'सज़दा', 'इनायत' और 'गुलदान' जैसे शब्द प्रेम को एक गरिमा प्रदान करते हैं-

ये दिल मसरूफ है सज़दे में तेरे, 

तेरी मुझ पे इनायत हो गई है।


दिल मेरा तेरी उल्फ़त का गुलदान है, 

तेरी यादों को जिसमें बसाया गया।

शोभा जी के कई शेर प्रेम की मर्यादा और उदात्त सोच के परिचायक हैं। वे जिस सलीक़े के साथ अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करती हैं वह दिलों के तार झंकृत कर देता है-

​उंगली मुझ पर उठी बहुत सी तुम पर ये इल्ज़ाम न आये,

लफ़्ज़-लफ़्ज़ में तुम हो लेकिन कहीं तुम्हारा नाम न आये।

​यह 'बिना नाम लिए सब कुछ कह देना' ही एक कुशल ग़ज़लकार की असली पहचान है। यह भी ग़ौरतलब है कि ​एक संवेदनशील रचनाकार केवल कुछ विषयों तक ही सीमित नहीं हो सकता। उसे समाज की हलचलें भी बेचैन करती हैं। शोभा जी ने ग्रामीण अंचल की विसंगतियों और राजनीति की भेंट चढ़ते रिश्तों को बड़ी बेबाक़ी से पकड़ा है-

बाप ने अपना ख़ून सुखाकर जमा किया था जो, 

बेटा इतना औघड़ दानी कुछ भी नहीं बचा।


​खेत बेंचकर दारू बाँटी फिर भी हार गए,

सबकुछ तो ले गयी प्रधानी, कुछ भी नहीं बचा।

​चुनाव की भेंट चढ़ते किसान और पिता की मेहनत को लुटाते बेटे का यह चित्र समाज के युगीन यथार्थ को आईना दिखाता है। ​​पर्यावरण और मासूमियत के प्रति कवयित्री की चिंता हृदयस्पर्शी है। कटते हुए पेड़ों के बीच बिजली के तारों पर बैठी कोयल का बिम्ब विकास की अंधी दौड़ पर एक करारा प्रहार है। वहीं, स्कूल जाती 'नाज़ुक कली' के बहाने वे स्त्री सुरक्षा और शिक्षा की दुआ भी मांगती हैं-

इसे महफूज़ रखना रहम करना या मेरे मालिक, 

ये नाजुक़ सी कली जो गाँव से स्कूल जाती है।


शजर सब कट गये, बैठी हुई बिजली के तारों पर, 

बहुत तकलीफ़ में है फिर भी कोयल गुनगुनाती 

"फिर भी तुम हो" ग़ज़ल ​संग्रह में जहाँ दिल की कोमल भावनाओं के लिए जगह है, वहीं देश की मिट्टी के प्रति अगाध प्रेम भी झलकता है। कश्मीर को दुनिया का इकलौता तोहफ़ा बताना कवयित्री के भारतीय गौरव को दर्शाता है-

हमारे हिन्द को ही सिर्फ़ मालिक ने दिया तोहफ़ा 

कहीं देखा है तुमने दूसरा कश्मीर दुनिया में 

​"फिर भी तुम हो" ग़ज़ल संग्रह डॉ. शोभा दीक्षित 'भावना' के अनुभवों, भावनाओं, सोच और सरोकार का दस्तावेज़ है। उनकी भाषा में रवानी है, ख़्यालों में ताज़गी है और बयान में ईमानदारी है। वे जिस तरह से व्यक्तिगत वेदना को सामाजिक चेतना से जोड़ती हैं, वह अभिव्यक्ति कौशल उन्हें ग़ज़ल की एक समर्थ आवाज़ बनाता है। मेरी शुभकामना है कि वे निरंतर प्रगति पथ पर अग्रसर रहें और ग़ज़ल के कैनवास पर नये नये चित्र बनाती रहें। 

देवमणि पांडेय : 98210 82126

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फ़िल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210 82126


सोमवार, 16 मार्च 2026

गोपाल दास नीरज पर केंद्रित वाङमय पत्रिका

 

वाङमय पत्रिका गोपाल दास नीरज पर केंद्रित 

अलीगढ़ की त्रैमासिक पत्रिका 'वाङमय' ने शताब्दी स्मरण करते हुए गोपाल दास नीरज पर केंद्रित अंक प्रकाशित किया है। इस विशेषांक की अतिथि संपादक हैं डॉ शगुफ्ता नियाज़ और संपादक हैं डॉ एम फ़ीरोज़ अहमद। कालजयी कवि नीरज की रचनात्मकता को जानने समझने, काव्य मंचों पर उनके योगदान और सिने गीतकार के रूप में उनकी उपलब्धियों के आकलन के लिहाज से 392 पेज़ की यह एक बेहद महत्वपूर्ण कृति है।

हिंदी काव्य साहित्य के सबसे लोकप्रिय कवि गोपालदास सक्सेना नीरज का जन्म 4 जनवरी 1925 को हुआ था। अतिथि सम्पादक के अनुसार- "पद्मभूषण गोपालदास 'नीरज' जी की जन्मशती का यह पावन अवसर केवल एक तिथि का स्मरण नहीं, बल्कि शब्द और स्वर के उस महाकुंभ का उत्सव है जिसने आधी सदी से भी अधिक समय तक हिंदी काव्य-चेतना को आलोकित किया। 'वाङमय' का यह विशेषांक उनके विराट व्यक्तित्व, कालजयी कृतित्त्व और उन अनछुए ऐतिहासिक प्रसंगों को समर्पित है, जो अब तक साहित्य की मुख्यधारा की चर्चाओं से ओझल रहे थे।"


'वाङमय' के इस विशेषांक में नीरज पर मेरा भी एक लेख शामिल है-" ए भाइ ज़रा देखके चलो"। उसकी कुछ पंक्तियां मैं आपके लिए यहां पेश कर रहा हूं। .......... बच्चन की परंपरा में नीरज एकमात्र ऐसे कवि हैं जिसमें साहित्यिक गुणवत्ता और मंचीय कौशल एक साथ मौजूद हैं। लगातार सात दशकों तक हिंदी काव्य मंच पर कामयाब पारी खेलने का कीर्तिमान सिर्फ़ नीरज के पास है। नीरज ने कहा था- "नासमझ आदमी की ताली कविता को बरबाद कर देती है।" हिंदी काव्य मंच के साथ भी यही हुआ। कवि सम्मेलन घटियापन के शिकार हो गए। अपने चाहने वालों के लिए नीरज को घटिया मंचों पर भी जाना पड़ा। मगर कभी उन्होंने घटियापन का साथ नहीं दिया। उन्होंने हमेशा अपना स्तर बनाए रखा।

यह सच है कि कवि सम्मेलनों का कवि प्रसाद और निराला नहीं बन सकता। यह भी सच है कि कवि सम्मेलनों में ‘कामायनी’ नहीं 'मधुशाला' पढ़ी जाती है। फिर भी, जिस तरह साहिर और शैलेंद्र के योगदान को महज़ फ़िल्मी गीत कहकर नकारा नहीं जा सकता, ठीक उसी तरह नीरज की मंचीय प्रस्तुति के बावजूद उनके साहित्यिक पक्ष को अनदेखा नहीं किया जा सकता। नीरज के साहित्य में मीरा का दर्द है, सूर की प्यास है, तुलसी की विन्रमता है और इसी के साथ कबीर का फक्कड़न भी है। नीरज ने बौद्धिकता का मायाजाल रचने के बजाय भावनाओं की ऐसी उदात्त धारा प्रवाहित की जिसने हमारे मन-प्राणों को पवित्रता, शीतलता और ताज़गी से भर दिया।

नीरज को जानने और समझने के लिए आपको 'वाङमय' का यह विशेषांक पढ़ना चाहिए। इसमें कुछ ऐसे अनछुए पहलुओं को भी उद्घाटित किया गया है जो शोधार्थियों के लिए बेहद उपयोगी हैं।


नीरज ने स्वीकार किया था-"अपनी कविता द्वारा मनुष्य बनकर मनुष्य तक पहुँचना चाहता हूँ। रास्ते पर कहीं मेरी कविता भटक न जाए, इसलिए उसके हाथ में मैंने प्रेम का दीपक दे दिया है। प्रेम एक ऐसी हृदय-साधना है जो निरंतर हमारी विकृतियों का शमन करती हुई हमें मनुष्यता के निकट ले जाती है।"

नीरज से बढ़के और धनी कौन है यहाँ
उसके हृदय में पीर है सारे जहान की

इस बेमिसाल अंक के लिए संपादकीय टीम को मैं दिल से बधाई देता हूँ। आशा है यह विशेषांक के सभी काव्य प्रेमियों को पसंद आएगा।
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आपका : #देवमणि_पांडेय

सम्पादकीय सम्पर्क : 205- फेज-1, ओहद रेजीडेंसी, नियर पान वाली कोठी, दोदपुर रोड, सिविल लाइन, अलीगढ़-202002 मोबा : 7007606806
E-mail: vangmaya@gmail.com

इस अंक का मूल्य : 300/- रूपये
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शनिवार, 14 मार्च 2026

हिंदी ग़ज़ल के पचास वर्ष : ज्ञान प्रकाश विवेक


हिन्दी ग़ज़ल के पचास वर्ष : ज्ञान प्रकाश विवेक  

दुष्यंत कुमार के बनाए राजमार्ग पर चलते हुए हिन्दी ग़ज़ल ने पचास साल का सफ़र तय कर लिया है। हिन्दी ग़ज़ल में हिंदुस्तानियत की ख़ुशबू है। यहाँ के रीति-रिवाज, परंपरा, समाज, सियासत और संस्कृति से जुड़ाव हिंदी ग़ज़ल की ख़ासियत है।

​पिछली सदी के बहुत सारे ग़ज़लकार 'आकाश में सूराख़' करने के लिए प्रतिबद्ध दिखाई पड़ते थे। इक्कीसवीं सदी की हिन्दी ग़ज़ल में विविधता और नयापन आया है। पहाड़ के दुर्गम रास्तों से निकलकर हिन्दी ग़ज़ल अब मैदानी इलाक़ों में आ गई है। हिंदी काव्य-परंपरा के किनारों को स्पर्श करते हुए वह अपनी धुन में आगे बढ़ रही है। इसलिए आज उसके प्रवाह में शोर-शराबे के बजाय कल-कल का संगीत सुनाई पड़ रहा है। वह नारों और झंडों को पीछे छोड़ चुकी है।

​ज्ञान प्रकाश विवेक के संपादन में 'श्वेतवर्णा प्रकाशन' (नोएडा) से प्रकाशित 'हिंदी गज़ल के पचास वर्ष' पुस्तक हिन्दी ग़ज़लों का एक ख़ूबसूरत गुलदस्ता है। यह ख़ुद में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है। या यूँ कहें कि यह ख़ुद में एक समृद्ध हिन्दी ग़ज़लकोश है। इसमें 238 ऐसे हिन्दी ग़ज़लकार हैं शामिल हैं जिन्होंने दुष्यंत कुमार के बाद हिंदी ग़ज़ल को संवारने और निखारने में योगदान किया है। इस सूची में वरिष्ठ ग़ज़लकारों से लेकर कई युवा ग़ज़लकार भी शामिल हैं। 


अपनी महत्वपूर्ण भूमिका में ज्ञान जी ने हिन्दी ग़ज़ल की विकास यात्रा का बहुत सुन्दर आकलन पेश किया है। उनके अनुसार- "हिन्दी ग़ज़ल का व्यापक होता परिसर, इस बात की तस्दीक है कि हिन्दी ग़ज़ल लेखकों ने, गज़ल विधा में नया रचने का हर संभव प्रयास किया है। इस दौर में बहुत सशक्त, प्रयोगधर्मी और आकर्षण पैदा करती ग़ज़लें लिखी गई हैं। पचास वर्ष के सफ़र में ग़ज़ल ने विधा के रूप में अपना स्थान अर्जित किया है तो बात स्पष्ट है कि अच्छी ग़ज़लें अधिक लिखी गई हैं।" 

​एक दृष्टि सम्पन्न आलोचक होने के साथ ही ज्ञान प्रकाश विवेक बेहतरीन ग़ज़लकार भी हैं। बिना किसी भेदभाव के उन्होंने इस संकलन में ऐसे ग़ज़लकारों को भी शामिल किया है जो प्यार-मोहब्बत जैसे विषयों को भी अपनी ग़ज़ल में बख़ूबी अभिव्यक्त कर रहे हैं। कुल मिलाकर यह पुस्तक ग़ज़ल प्रेमियों और शोधार्थियों के लिए बेहद उपयोगी किताब है। इस नेक काम को अंजाम तक पहुँचाने के लिए संपादक ज्ञान प्रकाश विवेक और श्वेतवर्णा प्रकाशन को हार्दिक बधाई। 519 पेज़ की इस किताब का मूल्य 799 रूपये है। 

 

आपका : देवमणि पांडेय 98210 82126 

सम्पर्क : Shwetwarna Prakashan

212 A, Express View Apartment Super MIG, Sector 93, Noida-201304, INDIA

Mobile: +91 8447540078

Email: shwetwarna@gmail.com

Website: www.shwetwarna.com


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अनामिका सिंह का ग़ज़ल संग्रह

 

'राहतों के नाम पर बेचैनियाँ' अनामिका सिंह का ग़ज़ल संग्रह

ग़ज़ल के सुपरिचित तौर तरीक़ों से बाहर निकल कर अपनी भाषा में, अपने अंदाज में, अपनी ग़ज़ल कहना बड़े हुनर का काम है और यह काम ग़ज़लकार अनामिका सिंह बख़ूबी कर रही हैं। श्वेतवर्णा प्रकाशन (नोएडा) से अनामिका सिंह का ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित हुआ है- 'राहतों के नाम पर बेचैनियाँ'। यह संग्रह साबित करता है कि अनामिका के पास वह अभिव्यक्ति कौशल है जो उन्हें एक विशिष्ट पहचान देता है। 

आसपास के जो मंज़र दिल को प्रभावित करते हैं, जो दृश्य आँखों में उतर आते हैं, जो अनुभव मन को विचलित कर देते हैं, उन्हें वे बड़े सलीक़े से अपनी रचनात्मकता का हिस्सा बनाती हैं। सृजन की इस यात्रा में उनके यहाँ कुछ विलक्षण मुक़ाम आते हैं। अचानक वे कुछ ऐसे चित्र और चरित्र हमारे सामने पेश कर देती हैं जो ग़ज़ल की दुनिया में सर्वथा नए हैं। ये किरदार अपने सुख-दुख और अपनी जिजीविषा के साथ हमारे सामने आते हैं और हमेशा के लिए हमारी स्मृति का हिस्सा बन जाते हैं-

सैलून में खड़ीं जो सुबह शाम लड़कियां

दिन भर में कितने करती हैं वो काम लड़कियां


हर कस्टमर को डील करे हैं वो जूझकर

पाती नहीं है दो घड़ी आराम लड़कियां 

अनामिका सिंह का ग़ज़ल संग्रह साहित्य के दरवाज़े पर एक ताज़ा दस्तक है। अनामिका के पास दूसरों के दुख को महसूस करने की शक्ति है तथा उससे उबरने की कोशिश भी है। वे हौसले को बचाए रखने का हुनर जानती हैं। उनका यह शेर उम्मीदों की नई कोपलें फूटने का आश्वासन देता है-

​डाली ने हौसला दिया पतझड़ में पेड़ को

मत हो उदास आएंगे ख़ुशियों के पात और


अनामिका की ग़ज़लों के कथ्य में विविधता है। वे समय के सवाल और समाज की समस्याओं से जुड़ी हैं। उनकी सोच और सरोकार के दायरे में वे लोग शामिल हैं जो ज़िन्दगी की दौड़ में पीछे छूट गए हैं। वे ऐसे लोगों के दुख-दर्द और पीड़ा को शब्द देती हैं। एक माँ की बेबसी और व्यवस्था की नाकामी को वे इस तरह रेखांकित करती हैं कि पाठक उनके मर्म को महसूस कर सके-

​ख़ाली पतीली देख तब आंसू ढुलक पड़े

बच्चों ने मां से बोला परस थोड़े भात और

​देश के मौजूदा हालात और राजनीति की विसंगतियों पर कई जगह अनामिका का तंज बेहद नुकीला है। वे विडंबनाओं को उजागर करने के लिए देशज मुहावरों का इस्तेमाल एक हथियार की तरह करती हैं-

बूढ़ा बरगद, चलती आरी, देख परिन्दे हैरां हैं 

सदमे से काँपी है डाली, क्या कहना है सब चंगा 

​जब घर बँटता है तो सिर्फ़ दीवारें नहीं खड़ी होतीं, स्मृतियाँ और रिश्ते भी लहूलुहान होते हैं। अनामिका इस दर्द को बड़ी ही सादगी से बयां करती हैं-

​घर ईंट-ईट बँट गया, दालान बँट गया

लो माँ के साथ-साथ ये सामान बँट गया

कट बँट गये दरख़्त कभी छाँव थे किये 

तुलसी बँटी औ' काँच का गुलदान बँट गया

​तुलसी का बँटना और काँच के गुलदान का बँटना उस परम्परा, संस्कृति और पारिवारिक मूल्यों की ओर संकेत करता है जिसे आधुनिकता की दौड़ में हम खोते जा रहे हैं।

​बेरोज़गारी का क़हर हो या सड़क पर दम तोड़ती इंसानियत, उनकी क़लम हर मुद्दे पर मुखर है। वे समय की रफ़्तार पर सवाल उठाती हैं कि सीढ़ियाँ तो चढ़ी-उतरी जा रही हैं, पर बदलाव की सुबह कहाँ है?

​सड़क पर हादसे कितने, मगर है फ़र्क भी किसको

किसी की जान को कोई बचाने कब उतरता है

​अनामिका सिंह की ग़ज़लों में सादा ज़बान, अभिव्यक्ति का कौशल और वह ताज़गी है जिसकी आज के समय को दरकार है। वे अपनी ग़ज़लों के ज़रिए अन्याय, शोषण और संवेदनहीनता के ख़िलाफ़ प्रतिरोध दर्ज करती हैं। यह संग्रह हिंदी ग़ज़ल के भविष्य के लिए एक बेहतर संभावना का संकेत देता है।

काव्य भाषा और कथ्य के स्तर पर अनामिका के यहाँ बेहद ताज़गी और नयापन है। वस्तुतः यही उनकी रचनात्मकता की उपलब्धि है। वे समय के साथ चलते हुए समाज को देखती हैं। आसपास जो स्याह रंग हैं, दुख, अभाव और संत्रास है, वे सभी उनकी ग़ज़लों का कथ्य बन जाते हैं। अभिव्यक्ति की इस प्रक्रिया में वे कभी-कभी नुकीले और अनगढ़ शब्दों से भी काम लेती हैं। उन्हें इस बात पर ध्यान देना चाहिए ग़ज़ल ऐसी नाजुक़ काव्य विधा है जो हर लफ़्ज़ का बोझ नहीं उठा सकती। कुल मिलाकर अनामिका ने अपने इस संकलन के ज़रिए ग़ज़ल की विकास यात्रा में बेहतर योगदान दिया है। मैं उन्हें दिल से बधाई देता हूँ। 

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देवमणि पांडेय : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063 

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उर्दू अदीबों की दुनिया में कमलेश भट्ट कमल

उर्दू अदीबों की दुनिया में कमलेश भट्ट कमल 

सुपरिचित हिंदी ग़ज़लकार और आलोचक कमलेश भट्ट कमल एक नायाब पुस्तक लेकर आपके सामने आए हैं जिसका नाम है-'उर्दू अदीबों की दुनिया में'। इसमें वली, चकबस्त, सुरूर, फ़ैज़ और फ़िराक़ से लेकर राही मासूम रज़ा, नक़्श लायलपुरी, जानकी प्रसाद शर्मा और वसीम बरेलवी जैसे पंद्रह प्रतिष्ठित शायरों की मौजूदगी इसे महत्वपूर्ण बनाती है। इन शायरों के बारे में विस्तृत जानकारी उपलब्ध कराने के साथ ही इस पुस्तक में अदब के बारे में इनके नज़रिए को सामने लाने की सराहनीय कोशिश की गई है। इस संग्रह में कमाल अमरोही एवं जॉन एलिया से संबंधित संस्मरण भी है जो अमरोहा के एक ऐसे मकान की यात्रा से जुड़ा हुआ है जो दोनों शायरों का पैतृक मकान रहा है।

पुस्तक के पंद्रह में से सात अदीबों से लेखक की मुलाक़ातें हुई हैं। हिंदी-उर्दू दोनों साहित्य में आवाजाही करने वाले डॉ जानकी प्रसाद शर्मा एक मात्र ऐसे आलोचक हैं जो हिंदी ग़ज़ल के साथ लगातार खड़े रहे हैं। सन् 1977 में जब हिंदी ग़ज़ल की एक विधा के रूप में चर्चा शुरू ही हुई थी तब अपने एक लेख "हिंदी ग़ज़ल की प्रकृति" में डॉ जानकी प्रसाद शर्मा खुले तौर पर हिंदी ग़ज़ल को एक स्वतंत्र और समर्थ रचना विधा के रूप में न केवल मान्यता देते हैं और रेखांकित करते हैं बल्कि वह ऐसे लोगों को खड़ा जवाब भी देते हैं जो यह कहते हैं कि ग़ज़ल उर्दू के मूल व्यक्तित्व के साथ हिंदी में परिग्रहीत हुई है।


इस पुस्तक को तैयार करने में कमलेश भट्ट कमल ने भरपूर मेहनत की है। शायर सिने गीतकार नक़्श लायलपुरी से यूं तो उनकी मुलाक़ात हो चुकी थी लेकिन उसे अद्यतन करने के लिए उन्होंने मुझसे फ़ोन पर कई बार चर्चा की। इस सिलसिले में नक़्श लायलपुरी पर लिखी मेरी एक फेसबुक पोस्ट का उन्होंने बहुत सुंदर उपयोग किया है। इसी सिलसिले में उन्होंने ऐसे 19 रचनाकार मित्रों को भी धन्यवाद दिया है जिनसे इस किताब को सामने लाने में कुछ न कुछ सहायता मिली है। पुस्तक की अनुशंसा एवं भूमिका के लिए उन्होंने उर्दू के सुप्रसिद्ध साहित्यकार पद्मश्री शीन काफ़ निज़ाम और राष्ट्रीय सहारा (उर्दू) के पूर्व संपादक डॉ असद रज़ा का आभार व्यक्त किया है।

स्वयं लेखक के अनुसार 'उर्दू अदीबों की दुनिया में' पुस्तक को पढ़कर आप इन अदीबों की दुनिया से अच्छी तरह तो परिचित होंगे ही, यह भी जान सकेंगे कि इन रचनाकारों की दुनिया कितने संघर्षों, कितनी रचनात्मकताओं, कितने जोश और जज़्बे से भरी हुई रही है।

ग़ज़ल और ग़ज़ल से संबंधित गद्य पुस्तकों के प्रकाशन में जिस तरह से "श्वेतवर्णा प्रकाशन" ने योगदान किया है वह बेहद क़ाबिले तारीफ़ है। इस पुस्तक को सामने लाने के लिए कमलेश भट्ट कमल ने श्वेतवर्णा प्रकाशन के राहुल शिवाय और शारदा सुमन के सहयोग को रेखांकित किया है।

इस महत्वपूर्ण पुस्तक के लिए मैं लेखक मित्र कमलेश भट्ट कमल को हार्दिक बधाई देता हूँ। 223 पेज की इस पेपर बैक पुस्तक का मूल्य 499 रूपये है।

आपका : #देवमणि_पांडेय

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सोमवार, 9 मार्च 2026

चित्रनगरी संवाद मंच में कथाकार सूर्यबाला

चित्रनगरी संवाद मंच में कथाकार-व्यंग्यकार सूर्यबाला

अतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर मुम्बई की महिला रचनाकारों के सवालों का जवाब देते हुए प्रख्यात साहित्यकार सूर्यबाला जी ने कहा-

▪️लेखन तो बेख़ुदी में होता है, संवेदना और भावना स्वतः शामिल हो जाती हैं।

▪️लेखन काग़ज़ पर वैसा नहीं उतर पाता जैसा एहसास में होता है।

▪️एक लेखक के भीतर हमेशा सच्चाई मौजूद रहती है, तभी वह लिख पाता है।

▪️कहानी लिखना एक प्रतिक्रिया है। हमारे भीतर जो चीज़ें घुमड़ती रहती हैं, वही कहानी के रूप में जन्म लेती हैं।

▪️'वेणु की डायरी' के वेणु और 'मेरे संधि पत्र' के रत्नेश मेरे प्रिय चरित्र हैं।

▪️लेखन मनुष्य के अंदर की शाश्वत अनुभूतियों पर आधारित होता है। मैं भी अपने अंदर की दुनिया पर लिखती हूँ।

▪️किसी के लिए पैसा आत्मविश्वास होता है। मेरे लिए मेरे चरित्र ही विश्वास और प्रेम का संबल रहे।

▪️ऊहापोह के बीच लेखन होता है, समय और सुविधा के अनुसार नहीं।

▪️लिखना जीवन के साथ न्याय करना है, दूसरों के साथ अन्याय करना नहीं।

▪️मेरी कहानियों में कहीं भी खलनायक या खलनायिका नहीं हैं।

​▪️ख़ुद झुककर सामने वाले को जीतना चाहिए। कब झुकना है, यह समझ ज़रूरी है। तनकर खड़ा होने से आदमी टूट सकता है।

▪️हर लेखक की समस्या अलग होती है। विवाद में ख़ामोशी बड़ी ताक़त है। आदमी के भीतर धैर्य होना चाहिए।

▪️हम वस्तु नहीं हैं कि ख़ुद को प्लेट में परोसकर पेश करें।

कार्यक्रम के बाद श्रोताओं ने सूर्यबाला जी को अद्भुत वक्ता बताते हुए उनकी शालीनता और विनम्रता की मुक्त कंठ से तारीफ़ की। ख़ास बात यह थी कि जिस सलीक़े से सूर्यबाला जी ने दस महिलाओं के सवालों का संतुलित जवाब देते हुए उन्हें संतुष्ट किया वह अपने आप में बेमिसाल था। प्रतिष्ठित कथाकार-व्यंग्यकार सूर्यबाला से सृजन संवाद के अंतर्गत मुम्बई की दस रचनाकार महिलाओं ने सवाल पूछे। इनके नाम हैं-

1.रचना शंकर,  2.पारमिता षड़ंगी, 3.उषा साहू, 4.सोनाली बोस, 5.प्रज्ञा मिश्र 6.प्रतिमा सिन्हा, 7.अर्चना जौहरी, 8.लता हया, 9.सविता मनचंदा,   10.मधुबाला शुक्ल।

सूर्यबाला जी को यह बात बहुत अच्छी लगी कि श्रोताओं ने 'धर्मयुग' में धारावाहिक प्रकाशित उनके पहले उपन्यास 'मेरे सन्धिपत्र' से लेकर नवीनतम उपन्यास "कौन देस को वासी...वेणु की डायरी" से सम्बन्धित सवाल पूछे।


चित्रनगरी संवाद मंच मुम्बई की ओर से रविवार 8 मार्च 2026 को केशव गोरे स्मारक ट्रस्ट गोरेगांव के मृणालताई हाल में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस समारोह आयोजित किया गया। शुरुआत में सूर्यबाला जी ने अपना आत्मकथ्य प्रस्तुत करते हुए कहा कि मैं जो लिखना चाहती थी मैंने वही लिखा और आप लोगों को भी अपने मन का ही लेखन करना चाहिए।

बचपन में पिताजी जल्दी गुज़र गए थे। सूर्यबाला जी ने बताया कि उनका बचपन बहुत दुखद रहा। लेखनी उनके लिए दुखों की शरणस्थली थी। चरित्रों के दुख से पहले वे ख़ुद उस दुख से गुज़रती थीं। 'सारिका' के संपादक कमलेश्वर के सुझाव पर उन्होंने पहली कहानी 'जीजी' लिखी जो सारिका में प्रकाशित हुई।

चित्रनगरी सम्वाद मंच के संचालक देवमणि पांडेय के अनुरोध पर सूर्यबाला जी ने एक व्यंग्य रचना का पाठ किया- 'महिला दिवस और फ्रेंच टोस्ट' जिस पर तालियां बजीं और ठहाके भी लगे। अंत में कथाकार सूरज प्रकाश ने सूर्यबाला जी के लेखन की कुछ महत्वपूर्ण बातों का ज़िक्र करते हुए सभी को महिला दिवस की शुभकामनाएं दीं।

'इतनी सी बात' नाट्य प्रस्तुति 

​चित्रनगरी संवाद मंच में लता हया और अर्चना जौहरी के लघु नाटक 'इतनी सी बात' की प्रस्तुति शानदार रही। राजस्थानी जेठानी और उत्तर प्रदेश की देवरानी की नोंक-झोंक का लोगों ने भरपूर लुत्फ़ उठाया। देवरानी-जेठानी के आपसी प्रेम और सौहार्द ने लोगों को भाव-विभोर कर दिया। ढोलक की ताल पर झूमते हुए श्रोता ख़ुद भी लोकगीत की लय में शामिल हो गए थे। 

लता हया और अर्चना जौहरी के दमदार अभिनय से यह मालूम ही नहीं पड़ा कि यह नाटक की पहली प्रस्तुति थी। जाने माने अभिनेता राजेंद्र गुप्ता ने दोनों अभिनेत्रियों के सहज अभिनय की तारीफ़ करते हुए उन्हें बधाई दी और कहा कि दोनों ने शुरू से अंत तक सबको बांधे रखा। कथाकार सूर्यबाला ने अभिनय के साथ ही नाटक के बढ़िया संवादों की भी तारीफ़ की और दोनों अभिनेत्रियों को शुभकामनाएं दीं। मधुबाला शुक्ल ने नाटक की प्रस्तावना पेश की।


आपका : देवमणि पांडेय, मो: 98210 82126 

गुरुवार, 5 मार्च 2026

आधुनिकता के बीच बनारस का स्वभाव

आधुनिकता के बीच बनारस का स्वभाव और संस्कृति

लखनऊ और सुलतानपुर की तरह वाराणसी यात्रा की भी स्मृतियां काफ़ी सुखद रहीं। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. वशिष्ठ अनूप स्वयं प्रतिष्ठित ग़ज़लकार हैं। उनके संयोजन में बीएचयू के एम्फी पांडाल में आयोजित छात्र कल्याण केंद्र का कवि सम्मेलन मुशायरा किसी विराट उत्सव से कम नहीं था। रचनात्मकता का यह उत्सव शानदार और यादगार रहा। रूमानी शायरी के साथ यहाँ संजीदा गीत और गज़लों को विद्यार्थी समुदाय ने जिस जोश और उमंग के साथ सुना, वह बेहद क़ाबिले-तारीफ़ है। 


बाबा विश्वनाथ का स्पर्श दर्शन इस यात्रा की विशेष उपलब्धि रही। उसके बाद युवा शायर अंश प्रताप सिंह 'ग़ाफ़िल' के साथ नए भव्य कॉरिडोर से होते हुए जब हमने गंगा जी के दर्शन किए तो मन ख़ुशी से भर उठा। बनारस की गलियों में क़दम रखते ही लगा जैसे वक़्त ठहर गया है। काशी विश्वनाथ मंदिर के आसपास की गलियाँ आज भी वैसी ही हैं जैसी चालीस साल पहले थीं। हमने कचौड़ी गली की संकरी गली में जाकर स्वादिष्ट कचौड़ी का लुत्फ़ उठाया। गौरी केदारेश्वर मंदिर की पतली गली में इतनी भीड़ थी कि बड़ी मुश्किल से बाइक खड़ी करने की जगह मिली।


कुल मिलाकर आधुनिकता के राजमार्ग पर चलते हुए बनारस का स्वभाव और संस्कृति वही है। माहौल में वही मस्ती और फक्कड़पन है। हाँ, कॉरीडोर बनने के बाद से श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ गई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रतिदिन एक लाख से अधिक श्रद्धालु बाबा विश्वनाथ के दर्शन कर रहे हैं। 


वाराणसी के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी विद्या भूषण मिश्र इतने सरल और सहज हैं कि लगा ही नहीं कि हमारी पहली मुलाक़ात है। बतौर कवि लेखक उनकी पाँच पुस्तकें प्रकाशित हैं। उनके आवास पर बढ़िया गपशप हुई। मैंने, अंश प्रताप सिंह 'ग़ाफ़िल' और ख़ुद मिश्र जी ने ग़ज़लें सुनाईं। मिश्र जी ने हमें सनातन सम्वाद कथाएं  पुस्तक भेंट की। मशहूर फोटोग्राफर राजेश कुमार सिंह इस अवसर पर विशेष रूप से मौजूद थे। उन्होंने बड़ा ख़ूबसूरत टेबल कलेंडर भेंट जिसमें रामलला की अद्भुत तस्वीरें हैं। 


कुल मिलाकर वाराणसी की इस अनुपम यात्रा के दौरान कई सुखद और रोमांचक अनुभव हुए। हमारी स्मृतियों के ख़ज़ाने में ये सुनहरी यादें हमेशा सुरक्षित रहेंगी।

आपका : देवमणि पांडेय 98210 82126