सोमवार, 25 मई 2026

हिन्दी साहित्य और हिन्दी सिनेमा का सम्बंध

 

हिन्दी साहित्य और हिन्दी सिनेमा का सम्बंध

साहित्य और सिनेमा का क्या सम्बंध है?  देखने में तो दोनों रेलवे की पटरियों की तरह समांतर चलते हैं मगर दोनों में कोई गहरा सम्बन्ध है। दुनिया में कई साहित्यिक कृतियों पर महान फ़िल्में बनी हैं। वस्तुतः साहित्य निजी अभिव्यक्ति है। यह एक ऐसा सृजन है जिसमें व्यक्ति के सोच, सरोकार और संस्कार शामिल होते हैं। साहित्य का पाठक पढ़ा लिखा होता है। साहित्य में वर्णित किरदारों की छवि पाठकों के मन में अलग-अलग निर्मित होती है। हम अपनी सोच और सम्वेदना के अनुसार इनका स्वरूप तय करते हैं। कहा जाता है कि हर काल में साहित्य के पाठक प्रायः दो प्रतिशत ही होते हैं।


साहित्य की तुलना में सिनेमा एक सार्वजनिक माध्यम है। इसे समाज का विशाल वर्ग देखता है। इन दर्शकों में पढ़े लिखे भी होते हैं और अनपढ़ भी होते हैं। अमीर भी सिनेमा देखते हैं और ग़रीब भी देखते हैं। सभी को सिनेमा से मनोरंजन प्राप्त होता है। सिनेमा हॉल के अंधकार में व्यक्ति अकेला होता है और समूह में भी होता है। वह सब के साथ रोता है, सबके साथ हंसता है और सब के साथ तालियां बजाता है। सिनेमा मुख्य किरदार की जो छवि पेश करता है उसे सभी दर्शक स्वीकार कर लेते हैं। 'उमराव जान' उपन्यास पढ़ते समय हर पाठक को उमराव जान का चेहरा अलग अलग नज़र आता है। मगर फ़िल्म देखते समय अभिनेत्री रेखा को ही सारे दर्शक उमराव जान मान लेते हैं। 


साहित्य का पाठक अपनी कल्पनाशीलता से काम लेता है। सिनेमा निर्देशक का माध्यम होता है निर्देशक अपने विवेक से पर्दे पर जिस चरित्र को साकार करता है उसे ही दर्शक सच मान लेता है। निर्देशक का माध्यम होते हुए भी सिनेमा एक सामूहिक कर्म है। इस समूह में कहानीकार, पटकथाकार, संवाद लेखक, कलाकार, संगीतकार, लाइटमैन और कैमरामैन सब का योगदान होता है। ये सारे लोग अपना अपना काम करते हुए पर्दे पर निर्देशक की कल्पना को साकार करते हैं। साहित्य स्वांत: सुखाय या लोकरंजन के लिए हो सकता है। मगर सिनेमा का मुख्य उद्देश्य है मनोरंजन प्रदान करना। जिस तरह नाटक, लोककलाएं, रामलीला आदि का मंचन देखकर हमारा मनोरंजन होता है बिलकुल उसी तरह सिनेमा हमें मनोरंजन प्रदान करने वाला बेहद कलात्मक और सशक्त माध्यम है।


साहित्य हमें भीतर से समृद्ध करता है। हमारी संवेदना को जगाता है। ज़िंदगी, समय और समाज को समझने की दृष्टि प्रदान करता है। साहित्य से हम मनोरंजन की अपेक्षा नहीं कर सकते। मगर जब किसी साहित्यिक कृति पर फ़िल्म का निर्माण होता है तो वहां बाज़ार उपस्थित हो जाता है। बाज़ार की मांग को पूरा करने के लिए फ़िल्म में उन तत्वों को शामिल करना ज़रूरी हो जाता है जिनसे दर्शकों का मनोरंजन होता है। इस संदर्भ में निर्देशक बासु चटर्जी की फ़िल्म 'रजनीगंधा' का उदाहरण देख सकते हैं। मन्नू भंडारी की कहानी ‘यही सच है’ पर यह फ़िल्म आधारित है। फ़िल्म को मनोरंजक बनाने के लिए गीत-संगीत का बहुत सुंदर इस्तेमाल किया गया है। कहानी की मूल संवेदना को बरकरार रखते हुए ऐसे अतिरिक्त दृश्यों का भी फिल्मांकन किया गया जिनसे दर्शक सहज ही जुड़ाव महसूस करता है। दृश्य और ध्वनि के मेल से बॉसु चटर्जी ने एक जादुई असर पैदा किया। फ़िल्म रजनीगंधा कामयाबी की मंज़िल तक पहुंच गई। 

सिनेमा मनोरंजन का साधन है। इसलिए जब किसी साहित्यिक कृति पर फ़िल्म बनती है तो हमेशा व्यावसायिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।  साहित्य सैकड़ों पृष्ठों का हो सकता है मगर सिनेमा को दो से तीन घंटे की समय सीमा में ही अपने कथ्य को अभिव्यक्त करना होता है। क्या दिखाना है और क्या नहीं दिखाना है, यह बड़ा सवाल उपस्थित हो जाता है। उपन्यास के फ़िल्मांकन में कई अंश छोड़ने पड़ते हैं। अमूमन एक फ़िल्म में सौ के आसपास छोटे बड़े दृश्य होते हैं। दूसरी तरफ़ कहानी में दृश्य कम होते हैं। इसलिए उसे फ़िल्म का आकार देने के लिए कई दृश्य जोड़ने पड़ते हैं। कामना चंद्रा की कहानी पर राज कपूर ने 'प्रेम रोग' फ़िल्म बनाई। पटकथा में कई नए दृश्य जोड़े गए। गीत संगीत से फ़िल्म को सजाया गया। फ़िल्म कामयाब हुई क्योंकि राज कपूर ने कहानी की मूल संवेदना के साथ फ़िल्म का तालमेल बरकरार रखा। 


फ़िल्मकार के लिए ज़रूरी है कि वह लेखक की संवेदना, सोच और सरोकार को गहराई से समझे तभी वह कृति के साथ न्याय कर पाएगा। प्रेमचंद की कहानी 'शतरंज के खिलाड़ी' को सत्यजीत रे ने बड़े सुंदर तरीक़े से पेश किया। उन्होंने इसका अंत बदल दिया तो यह फ़िल्म दो नवाबों की दास्तान से ऊपर उठकर ऐतिहासिक काल खंड की सशक्त फ़िल्म बन गई। कहानी की बुनावट और परिवेश को ध्यान में रखते हुए सत्यजीत रे ने वाजिद अली शाह के चरित्र के लिए अभिनेता अमज़द खान का चयन किया। वे एक बेहतर फ़िल्म बनाने में कामयाब हुए। इसी तरह लेखकीय संवेदना के साथ संतुलन बिठाते हुए बिमल रॉय ने दो बीघा ज़मीन और गुरुदत्त ने साहब बीबी और ग़ुलाम जैसी बेमिसाल फ़िल्में बनाईं। 

सिनेमा वस्तुत: परदे पर साकार होने वाली विधा है। यानी कहानी को कैमरे की आंख से दृश्य माध्यम के रूप में पेश किया जाता है। किसी भाषा की विशिष्ट कृति को सिनेमा के रूप में पेश करते समय यह चुनौती मौजूद रहती है कि वह कहानी अलग-अलग भाषा बोलने वाले लोगों को पसंद आए और वे उससे जुड़ाव महसूस कर सकें। मसलन देवदास बंगाली भाषा की कृति है। इस कहानी में निहित संवेदना से दर्शक बहुत जल्दी तालमेल बिठा लेते हैं। यही कारण है कि एक दर्जन से अधिक भाषाओं में देवदास पर फ़िल्मों का निर्माण हुआ और उन्हें कामयाबी मिली। 

बांग्ला लेखकों के साहित्य में पारिवारिक भावनाएं, ज़िंदगी के मर्मस्पर्शी घटनाक्रम और दिल को छूने वाले दृश्य होते हैं। इसलिए कई बांग्ला कृतियों पर कामयाब फ़िल्मों का निर्माण हुआ। इनमें देवदास, नौकाडूबी, साहब बीवी और ग़ुलाम, मझली दीदी, परिणीता, दुर्गेश नंदिनी, आनंद मठ आदि शामिल हैं। साहित्य के लिए नोबुल पुरस्कार से सम्मानित रविंद्रनाथ टैगोर की कई कृतियों पर सफल फ़िल्मों का निर्माण हुआ। रविंद्रनाथ टैगोर के उपन्यास 'नौकाडूबी' पर निर्देशक नितिन बोस ने सन् 1946 में फ़िल्म बनाई जिसमें दिलीप कुमार की प्रमुख भूमिका थी। सुधेंदु राय ने सन् 1971 में रविंद्रनाथ टैगोर की कृति पर बनी फ़िल्म 'उपहार' का निर्देशन किया। इस फ़िल्म में अभिनेत्री जया बच्चन की प्रमुख भूमिका थी। सन् 1961 में रविंद्रनाथ टैगोर की कहानी पर बिमल रॉय ने 'काबुलीवाला' फ़िल्म बनाई। मुख्य भूमिका में बलराज साहनी थे। सत्यजीत राय की तीन मशहूर फ़िल्में- 'तीन कन्या' (1961), 'चारु लता' (1964] और 'घरे बाइरे' [1984] रविंद्रनाथ टैगोर की कृतियों पर आधारित हैं। 


बांग्ला साहित्य और सिनेमा का शुरू से ही घनिष्ठ संबंध रहा है। साहित्य जगत ने सिनेमा को और सिने जगत ने साहित्य को पर्याप्त सम्मान दिया। इसी तरह मराठी साहित्य और सिनेमा का भी रिश्ता अंतरंग है। कई मराठी कृतियों और नाटकों पर श्रेष्ठ फ़िल्मों का निर्माण हुआ और उन्हें कामयाबी हासिल हुई। उर्दू साहित्यकार भी सिनेमा के बहुत क़रीब रहे। गीत और संवाद लेखन में उन्हें भरपूर प्रतिष्ठा मिली। मगर हिंदी साहित्यकारों ने सिनेमा को उचित महत्व नहीं दिया। साहित्यकारों और फिल्मकारों में तालमेल के अभाव में हिंदी कृतियों पर बनी अधिकांश फ़िल्मों को असफलता का सामना करना पड़ा।


हिंदी में साहित्य पर आधारित फ़िल्मों की लगातार असफलता का दुष्परिणाम यह हुआ कि साहित्य और सिनेमा में दूरी बढ़ती गई। असफल फ़िल्मों में गोदान, दो बैलों की कथा, सदगति, तीसरी क़सम, महाभोज, समय की धारा (आपका बंटी), दामुल, उसने कहा था, सूरज का सातवां घोड़ा, उत्सव (मृच्छकटिकम्), एक चादर मैली सी, पिंजरे आदि अनेक फ़िल्में शामिल हैं। हिंदी साहित्यकारों के साथ फ़िल्मकार बासु चटर्जी के अच्छे रिश्ते थे। उन्होंने राजेंद्र यादव के उपन्यास 'सारा आकाश' और मन्नू भंडारी की कहानी पर 'रजनीगंधा' फ़िल्म बनाई। शिव मूर्ति की कहानी 'तिरिया चरित्र' पर टेलीफ़िल्म बनाई। कमलेश्वर और गुलज़ार अच्छे दोस्त थे। आपसी तालमेल अच्छा था। कमलेश्वर की कहानी पर गुलज़ार ने 'आंधी' और 'मौसम' फ़िल्म का लेखन निर्देशन किया। ये फ़िल्में  कामयाब रहीं। साहित्य पर आधारित आनंदमठ, दो बीघा ज़मीन, रूदाली, शतरंज के खिलाड़ी आदि कामयाब फ़िल्में थीं। 'साहब बीवी और ग़ुलाम' तथा 'उमराव जान' ऐसी कामयाब फ़िल्में थीं जो अपनी गुणवत्ता में मूल कृति से भी आगे निकल गईं। कला की दुनिया में रचनात्मकता का यह अद्भुत उदाहरण है।

हिंदी सिनेमा में लेखक को समुचित महत्व नहीं दिया जाता इसलिए कई लेखक मुंबई आकर वापस लौट गए। कथाकार भगवती चरण वर्मा आए थे उनके उपन्यास चित्रलेखा पर दो बार फ़िल्म बनी। प्रेमचंद की कहानी पर 'मिल मज़दूर' फ़िल्म बनी। इसे देखकर प्रेमचंद ने कहा था कि इसमें मेरा दस प्रतिशत भी नहीं है। प्रेमचंद एक साल के करार पर मुंबई आए थे मगर आठ महीने में वापस लौट गए। सुमित्रानंदन पंत भी आ कर वापस लौट गए। 'तीसरी क़सम' की पटकथा लिखने के लिए शैलेंद्र ने फणीश्वर नाथ रेणु को मुंबई बुलाया था। वितरकों का आग्रह था कि 'तीसरी क़सम' का अंत बदल दिया जाए। रेणु ने मना कर दिया। उन्होंने कहा कि अंत बदल देंगे तो 'तीसरी क़सम' नाम रखने का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। मनोहर श्याम जोशी भी यहां आकर वापस गए। कमलेश्वर और राही मासूम रज़ा ने जिस तरह बाज़ार की ज़रूरतों को समझ कर सिनेमा में योगदान किया वैसा जज़्बा बाद के रचनाकारों में नहीं दिखाई पड़ा। 


हिंदी साहित्यकार इस बात को समझना नहीं चाहते कि साहित्य को ज्यों का त्यों नहीं फ़िल्माया जा सकता। फ़िल्मकार कैमरे की आंख से कहानी का पुनर्सृजन करता है। शब्द की सत्ता के बजाय दृश्य की सत्ता क़ायम करता है। सत्यजीत रे ने प्रेमचंद की कहानी पर आधारित फ़िल्म शतरंज के खिलाड़ी में कई नए दृश्य जोड़े। फ़िल्म का अंत बदल दिया फिर भी उसे पसंद किया गया। फ़िल्म के निर्देशक को यह आज़ादी मिलनी ही चाहिए।


किसी साहित्यिक कृति पर निर्मित फ़िल्म नाकामयाब क्यों होती है इसके कई कारण हो सकते हैं। मसलन फ़िल्म 'गोदान' के खांटी देहाती मज़ाकिया होरी के रूप में मशहूर अभिनेता राजकुमार को दर्शक आत्मसात नहीं कर पाए। मन्नू भंडारी के उपन्यास 'आपका बंटी' पर 'समय की धारा' फ़िल्म बनी। बंटी के तलाक़शुदा मां और पिता दुबारा शादी कर लेते हैं। बंटी नई मां और नए पिता को स्वीकार नहीं कर पाता। वह अचानक घर से भाग जाता है और उसकी अप्रत्याशित मौत होती है। फ़िल्म के ऐसे त्रासद अंत को दर्शक पचा नहीं पाए। अमृता प्रीतम के उपन्यास' पिंजर' पर इसी नाम से फ़िल्म बनी। फ़िल्म की नायिका अंत में उसी मुस्लिम युवक के साथ पाकिस्तान चली जाती है जिसने उसका अपहरण किया था। फ़िल्म का ऐसा क्लाइमेक्स दर्शकों की सोच से सर्वथा विपरीत था। 


रामायण और महाभारत दो ऐसे महाकाव्य हैं जो बहुत सारी फ़िल्मों के लिए प्रेरणा स्रोत रहे। रामायण में बुराई पर अच्छाई की जीत होती है और महाभारत में अधर्म के ऊपर धर्म की विजय होती है। यह संदेश दर्शकों की सोच के अनुकूल है। दोनों कृतियों में ऐसे घटनाक्रम हैं जो हर भाषा के दर्शकों को पसंद आते हैं। दर्शकों को इनमें अपना अक्स दिखाई पड़ता है। किसी साहित्यिक कृति को जब फ़िल्म में तब्दील किया जाता है तो उसमें ऐसे सार्वकालिक गुणों का होना ज़रूरी है जिनके साथ दर्शक अपनी भावनाओं का जुड़ाव महसूस करें और अपनी सोच का तालमेल बिठा लें। 


साहित्य और सिनेमा के रिश्तों को मज़बूत करने के लिए हमें ऐसे फ़िल्मकारों की ज़रूरत है जो अपने सिनेमाई अनुभव को पाठकों के साथ साझा कर सकें। कई बांग्ला फिल्मकारों ने ऐसा किया। सत्यजीत रे ने एक महत्वपूर्ण किताब लिखी है- चलचित्र कल और आज। इसे पढ़कर यह समझना आसान हो जाता है कि साहित्य का एक साधारण दृश्य जब फ़िल्म के दृश्य में रूपांतरित होकर सामने आता है तो उसका असर कैसे कई गुना बढ़ जाता है। हिंदी में ऐसी कृतियों का अभाव है। 


हिंदी में कई साहित्यिक पत्रिकाओं ने फ़िल्मों में पर बड़े अच्छे विशेषांक निकाले। मनोहर श्याम जोशी और असग़र वजाहत ने पटकथा पर किताबें लिखीं। सवाल यह है कि हिंदी के कितने साहित्यकार ऐसी किताबों को पढ़ते हैं। अगर वे सिने साहित्य को भी अपने अध्ययन का हिस्सा बनाएंगे तो सिनेमा के अनुकूल समझ भी विकसित होगी। सिनेमा और साहित्य में नज़दीकियां पैदा होगीं। फ़िलहाल हिंदी साहित्य के क्षेत्र में एक नई प्रतिभाशाली पीढ़ी सक्रिय है। मुझे उम्मीद है कि यह पीढ़ी सिनेमा को समझेगी। इसके प्रयास से साहित्य और सिनेमा का रिश्ता मज़बूत होगा। 

आपका - देवमणि पांडेय 

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फ़िल्म सिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210 82126


रविवार, 24 मई 2026

चित्रनगरी संवाद मंच में 'कौन देस को वासी'

 

चित्रनगरी संवाद मंच में कौन देस को वासी पर चर्चा 

साहित्य, संवाद और विमर्श की यह एक आत्मीय शाम थी। रविवार 24 मई 2026 को चित्रनगरी संवाद मंच मुम्बई में प्रख्यात कथाकार सूर्यबाला के महत्वपूर्ण उपन्यास "कौन देस को वासी" (वेणु की डायरी) पर चर्चा का आयोजन किया गया। किसी ने सोचा नहीं था कि किसी संजीदा किताब पर चर्चा इतनी भी रोचक हो सकती है। हंसते, मुस्कुराते, ठहाके लगते कब चर्चा पूर्णता के मुक़ाम पर पहुंच गई पता ही नहीं चला। 

▪️ प्रस्तावना पेश करते हुए कार्यक्रम के संचालक देवमणि पांडेय ने कहा कि इस पुस्तक में तीन पीढियों की महागाथा है। दो देशों की संस्कृतियों के द्वंद्व को, वहाँ प्रवास कर रहे भारतीयों के भावनात्मक अकेलेपन और अपनी जड़ों से जुड़ाव को जिस बारीक़ी से सूर्यबाला जी ने उकेरा है वह बेमिसाल है। 

▪️ पुस्तक की पठनीयता की तारीफ़ करते हुए गंगा शरण सिंह ने जीवंत भाषा, आत्मीय शैली और वसुधा के स्वाभिमानी चरित्र पर प्रकाश डाला।  

▪️ सविता मनचंदा ने वेणु की मां के चरित्र का आकलन करते हुए कहा कि सूर्यबाला जी ने रिश्तों को गहराई से गढ़ा है। 

▪️ रेखा निगम ने प्रवासी भारतीय की समस्याओं का ज़िक्र करते हुए कहा कि सूर्यबाला जी ने अमेरिका में पढ़ाई कर रहे छात्रों का यथार्थ चित्रण किया है। 

▪️ चित्रा देसाई ने इस पुस्तक के कुछ प्रेरक प्रसंगों का उल्लेख करते हुए कहा कि यह पुस्तक अंधेरे में उजास की तरह है। 

▪️ सुदर्शना द्विवेदी ने सूर्यबाला जी की सुदीर्घ लेखन यात्रा को रेखांकित करते हुए उनकी 'चिड़िया जैसी मां' कहानी के हवाले से मां और बेटे के रिश्ते की मार्मिक व्याख्या प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि इस अकेली कृति 'वेणु की डायरी' के ज़रिए सूर्यबाला जी इतिहास में दर्ज हो चुकी हैं। 

▪️ डॉ उषा मिश्र ने इसे आज के दौर की एक महत्वपूर्ण कृति बताया। 

▪️ हरि मृदुल ने कहा कि समय के साथ इस पुस्तक की चमक लगातार बढ़ती जा रही है। 

▪️ चर्चित चित्रकार आबिद सुरती उर्फ़ ढब्बू जी इसे रचनात्मकता का कीर्तिमान बताया। उन्होंने अपनी किताब भेंट करके सूर्यबाला जी को शुभकामनाएं दीं।


▪️ यह भी एक रोमांचक दृश्य था जब नौ महिला रचनाकारों ने एक-एक प्रश्न पूछकर सूर्यबाला जी से सम्वाद किया। इनके नाम हैं - डॉ मधुबाला शुक्ल, प्रतिमा सिन्हा, ममता झा, मधु चौधरी, पारमिता षडंगी, वर्षा गर्ग, अंबिका झा, अनामिका शर्मा और डॉ भारती सिंह। 

▪️ कवि सुभाष काबरा की व्यंग्य रचना पाठ से कार्यक्रम का समापन हुआ। 'वेणु की डायरी' पुस्तक को व्यास सम्मान से नवाज़ा जा चुका है। सुभाष काबरा ने जब सूर्यबाला जी से पूछा- "सम्मान स्वरूप जो चार लाख रुपये प्राप्त हुए उसका आपने क्या किया" तो इस सवाल पर ज़ोरदार ठहाका लगा। 

▪️ सूर्यबाला जी ने सभी सवालों के जवाब बेहद विनम्रता से दिए। उन्होंने इस तथ्य को स्पष्ट किया कि 'वेणु की डायरी' उपन्यास में कोई भी पात्र काल्पनिक नहीं है। उन्होंने कहा कि अच्छा लिखने के लिए संयम ज़रूरी है। सूर्यबाला जी ने अपनी किताब के चरित्रों के बारे में और प्रमुख घटनाओं पर विस्तार से बातें कीं। उन्होंने आर्थिक मंदी के बारे में पूछे गए सवाल का भी जवाब दिया। चर्चा को पूर्णता प्रदान करते हुए उन पंक्तियों को उद्धरित किया गया जो इस उपन्यास के अंत में दर्ज हैं-

▪️ "इस पूरे विश्व में हम कहीं रहें, किसी भी जाति, धर्म, वर्ण के नाम से, क्या फ़र्क़ पड़ता है, सिवा इसके कि हम कितने मनुष्य बने रह पाए हैं ! "

▪️ कुल मिलाकर यह एक ऐसा शानदार और यादगार कार्यक्रम था जो हमारी मधुर यादों में हमेशा के लिए दर्ज हो गया है। 

आपका : देवमणि पांडेय - 98210 82126 


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शुक्रवार, 15 मई 2026

अनुज अब्र की ग़ज़लों में सोच की परवाज़

सोच की परवाज़ : अनुज अब्र की ग़ज़लें 

अनुज पांडेय अब्र लखनऊ महानगर में रहते हैं मगर उनकी निगाह हमेशा ऐसे किरदारों पर रहती है जो अपने श्रम और संघर्ष से ज़िंदगी की चुनौतियों का सामना करते हैं। वे अपनी ग़ज़लों में ऐसे चरित्रों को दर्ज करते हैं जो वक़्त बदलने के साथ बदलाव का शिकार हो जाते हैं। आज के हामिद अपनी दादी के लिए चिमटा नहीं लाते। वे शहर जाते हैं तो वापस ही नहीं लौटते। अब्र के पास अपनी बात कहने का कौशल है। वे अपने आसपास देखते हैं तो पाते हैं कि अमीर अभी भी ग़रीबों का लहू चूस रहे हैं। वे ऐसे यथार्थ को आम फ़हम भाषा में एक नए अंदाज़ में दर्ज करते हैं। यही कारण है कि उनकी अभिव्यक्ति में नएपन का अक्स नज़र आता है। 

अब्र अपनी संस्कृति और परंपरा से गहराई से जुड़े हैं। उनके यहां तुलसी दल भी नज़र आता है और तुलसी का मानस भी। उन्हें मालूम है कि ऐसे प्रतीक हमारे मूल्यों के सबल वाहक हैं और समाज को इनकी ज़रूरत है। इस तरह अपनी ग़ज़लों के ज़रिए वे सामाजिक दायित्व का निर्वाह करते हैं। अब्र की ग़ज़लों में वे मिथकीय चरित्र भी नज़र आते हैं जो आम जन की बातचीत में शामिल हैं। उन्होंने महाभारत के चरित्रों के हवाले से कई महत्वपूर्ण शेर कहे हैं। 


अब्र के यहां सोच की परवाज़ भी है और अभिव्यंजना का कौशल भी। वे झूठ के खिलाफ़ सच के पक्षधर हैं। उनकी ग़ज़लों में लोक व्यवहार और मानवीय भावनाओं की भी सशक्त अभिव्यक्ति दिखाई देती है। कभी-कभी वे सियासत को भी चुनौती देते हैं कि अगर आप ग़रीबों का सपना साकार नहीं कर सकते तो सत्ताधीश होने का मतलब क्या है। उनकी ग़ज़लों में समाज के वे सभी अहम मुद्दे मौजूद हैं जिनका ज़िक्र बेहद ज़रूरी है। कुल मिलाकर अनुज अब्र की ग़ज़लें अपने समय में सार्थक हस्तक्षेप करती हैं।

 

▪️देवमणि पांडेय : 98210 82126 


अनुज अब्र की दस ग़ज़लें 

(1) 

मेरी लकीर से लम्बी लकीर खींच चुके

नई फ़सील तो ये राजगीर खींच चुके


लहू शरीर से खिंचने न देंगे अब ये ग़रीब

कि खींच सकते थे जितना अमीर खींच चुके


कोई उड़ाए परिंदों को पेड़ से जब तक 

शिकारी डोर पे तब तक थे तीर खींच चुके


तुम्हें पता ही नहीं  धान - बाजरे का भाव 

तुम इन ग़रीब के हिस्से की पीर खींच चुके


नया कहाँ से तुम इन काग़ज़ों पे खींचोगे 

सब 'अब्र' पहले ही तुलसी - कबीर खींच चुके


(2)

हमारा कल मिलेगा आप को तुलसी के मानस में 

सुनहरा पल मिलेगा आपको तुलसी के मानस में 


अगर दुविधा है कोई,, आपके जीवन में तो पढ़िये

सभी का हल मिलेगा आपको तुलसी के मानस में


भिगो कर आपकी जो आत्मा को शुद्ध कर डाले 

वो गंगा जल मिलेगा आपको तुलसी के मानस में


पराजित सत्य जब होता नज़र आए तो पढ़ियेगा 

बहुत सम्बल मिलेगा आपको तुलसी के मानस में


जिसे हम देखते ही अपने माथे पर लगाते हैं 

वो तुलसी दल मिलेगा आपको तुलसी के मानस में


(3)

जिस तरह उस द्रोपदी की थी सुनी फ़रियाद कृष्ण 

ठीक वैसे ही करो मेरी भी तुम इमदाद कृष्ण 


बात जब अर्जुन पे आई तो उठाया शस्त्र भी 

तोड़ दी ख़ुद की प्रतिज्ञा ऐसे थे अपवाद कृष्ण


मित्रता का  मोल अब कोई  चुकाता हैं कहाँ

अब सुदामा को कहाँ करता है कोई याद कृष्ण


जानते थे वो कोई प्रस्ताव मानेगा नहीं 

फिर भी दुर्योधन से करने को गए संवाद कृष्ण


जाने क्या जादू हरे कृष्णा में आख़िर 'अब्र' है 

नाम लेते ही तुम्हारा मिट गया अवसाद कृष्ण


(4)

अगर ख़फ़ा हो तो सब कुछ उजाड़ देती है 

नदी पहाड़ का सीना भी फाड़ देती है


हवा को कम न समझना ख़िलाफ़ होने पर 

बड़े शजर को भी जड़ से उखाड़ देती है


तुझे पता है न बेटे कि इक भली कोशिश

मुसीबतों को हमेशा पछाड़ देती है


ये बात कहने में तकलीफ़ दे रही है पर 

कमीनी भूख बदन भी उघाड़ देती है


बहुत कम उम्र में हासिल हुई सफलता भी 

बड़े बड़ों का तवाज़ुन बिगाड़ देती है


मैं सच बताऊँ मेरी आठ साल की बिटिया 

ग़लत करूँ तो मुझे भी लताड़ देती है


अगर निगाह में क़ायम है "अब्र"  शर्मो हया

तो एक दूब की पत्ती भी आड़ देती है


(5)

मुझे मालूम है किसको सुनाने बैठ जाते हो 

जो हर इक शाम छत पर गीत गाने बैठ जाते हो


कहीं भी प्यार के दो बोल तुमसे बोल दे कोई 

वहीं उस शख़्स से रिश्ता बनाने बैठ जाते हो


मियाँ अपने गिरेबाँ में भी देखो झाँक कर इक दिन 

ये क्या हर शख़्स की कमियां गिनाने बैठ जाते हो


कहीं ऐसा न हो इक दिन अकेले ही नज़र आओ

ये जो हर आदमी को आज़माने बैठ जाते हो


नज़र आ जाये बस तुमको कोई ग़मगीन सा चेहरा 

उसी पल "अब्र" ग़म उसका मिटाने बैठ जाते हो


(6)

मान भी लीजिए सरकार! नहीं कर सकते 

आप हर बार चमत्कार नहीं कर सकते 


आपके झूठ के जादू का असर ख़त्म हुआ 

आप इस बात से इन्कार नहीं कर सकते


आपने कर के दिखाया है जो इस दुनिया को 

सारी दुनिया के अदाकार नहीं कर सकते


आप के सर पे रखे ताज का मतलब क्या है 

स्वप्न निर्धन के जो साकार नहीं कर सकते


आज के दौर में इल्ज़ाम लगा है हम पर 

वार शब्दों से कलमकार नहीं कर सकते


(7)

झूठा कोई ख़्वाब दिखाया जाएगा

जुगनू को सूरज बतलाया जाएगा


मंदिर मस्जिद को लड़वाया जाएगा 

मुद्दे से हमको भटकाया जाएगा


पैरों में डाली जाएँगी ज़ंजीरें

हाथों से रस्ता नपवाया जाएगा


काट लिए जाएँगे पर मासूमों के 

फिर उनको आकाश दिखाया जाएगा


भेद खुलेगा ठाकुर की तब रहमत का 

जब बुधुवा से खेत लिखाया जाएगा


बीन बजाई जाएगी इस कोने पर

उस कोने पर साँप दिखाया जाएगा


अब्र तुम्हारी बातें देश विरोधी हैं 

मुझ पर ये इल्ज़ाम लगाया जाएगा


(8)

न पूछो कैसे मेरी ज़िन्दगी की रेल चलती है 

अजब सा खौफ़ होता है ये जब पटरी बदलती है


भला कैसे हम अपनी फ़ेमिली को मॉल ले जायें

यहाँ तो फ़ीस ही बच्चों की मुश्किल से निकलती है


कई हामिद पलट कर शहर से वापस नहीं लौटे 

कई माँओं की उँगली आज भी चूल्हे से जलती है


हम अपनी मुट्ठियों को जितना कस के बन्द करते हैं

हमारी मुट्ठियों से उतनी ही क़िस्मत फिसलती है


ज़मीनों में उगा करता है सोना 'अब्र' तुमसे ही 

तुम्हारे वक़्त पर आने से इक उम्मीद पलती है


(9)

हैरत कि मेरी बात को टाला नहीं गया 

यानी कि मुझको दिल से निकाला नहीं गया


देने लगे हैं सीख समुंदर को इन दिनों 

जिनसे नदी में पाँव भी डाला नहीं गया


बेटे तो चार  पाल  लिए बाप ने  मगर

बेटों से एक बाप को पाला नहीं गया


तब तक वो दर्द दर्द रहा एक शख़्स का

जब तक वो दर्द गीत में ढाला नहीं गया


तुमने भी 'अब्र' सीख लिया शायरी का फ़न

तुमसे भी दिल का दर्द सँभाला नहीं गया


(10)

इसी उसूल पे उसका निज़ाम चलता है 

कि कांटा पांव का कांटे से ही निकलता है 


हम उस चराग को अपना लहू भी दे देंगे 

वो जो ख़िलाफ़ अंधेरे के रोज जलता है 


जमीं तवाफ़ किये जा रही है इसका और

समझते हम हैं कि ये आफ़ताब चलता है 


मेरी ये बात हमेशा दिमाग में रखना 

हज़ार वक्त बुरा हो मगर बदलता है 


ये कौन बात अकेले में करता है मुझ से 

ये कौन छत पे मेरे साथ साथ चलता है 


गए हो आग लगा कर न जाने ये कैसी 

कि दिल में आज तलक इक अलाव जलता है 


अनुज यक़ीन कभी उस पे तुम नहीं करना 

हर एक बार जो अपना कहा बदलता है


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अनुज पाण्डेय 

सेक्टर 12/149, इंदिरा नगर 

लखनऊ - 226016

मोबाइल : 9532521100

शनिवार, 9 मई 2026

कथाकार मनहर चौहान का रचना संसार

 

कथाकार मनहर चौहान के साथ गपशप का आनंद

कथाकार मनहर चौहान बिल्कुल स्वस्थ और प्रसन्न हैं। पत्रकार रेणु शर्मा ने उनका ज़िक्र किया और शनिवार 9 मई 2026 को हमने उनसे मिलने का प्लान बना लिया। कथा पत्रिका 'सारिका' के सुनहरे दौर में चर्चित हुए 86 वर्ष के मनहर चौहान ने कुछ दिलचस्प अनुभव हमारे साथ साझा किये और हमारे साथ कई बार ज़ोरदार ठहाके भी लगाए।

तस्वीरें देखकर आप ख़ुद अंदाज़ा लगा सकते हैं कि मनहर चौहान कितने स्वस्थ और प्रसन्न नज़र आ रहे हैं। मनहर जी ने हमारे साथ दही बड़ा, मिठाई, कचोरी और नमकीन खाने में कोई कोताही नहीं की। उनकी पत्नी लक्ष्मी चौहान एवं बेटी वंदना चौहान ने भी इस रोचक चर्चा का भरपूर लुत्फ़ उठाया।

दो साल पहले मनहर चौहान ने चित्रनगरी संवाद मंच में बिना काग़ज़ देखे कहानी पाठ किया था। उनकी कहानी #चैतू_और_चमेली चरित्र प्रधान कहानी थी। पुराने ज़माने में ठेकेदार मज़दूरों को कैसे ट्रेन के डिब्बे में भेड़ बकरियों की तरह ले जाते थे यह दृश्य विचलित कर देने वाला था। मनहर जी ने उस कार्यक्रम का ज़िक्र किया। मैंने कहा- आप अपनी एक कहानी दे दीजिए रेणु शर्मा उसका पाठ करेंगी। उन्होंने कहा- ए आई से लिखवा कर भेज दूंगा और फिर ठहाका लगाया।

लेखक, पत्रकार और कथाकार मनहर चौहान विशेष रूप से सामाजिक सरोकारों, मानवीय संवेदनाओं और मध्यम वर्ग के जीवन के इर्द-गिर्द बुनी गई कहानियों के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने उपन्यास, कहानी और बाल साहित्य जैसी विभिन्न विधाओं में लेखन किया है। उनकी कहानियों में आम आदमी के संघर्ष और रिश्तों की जटिलताओं का बारीक चित्रण मिलता है।

मनहर चौहान साहित्य सृजन के साथ-साथ संपादन और पत्रकारीय गतिविधियों से भी जुड़े रहे हैं। 'दमख़म' पत्रिका के ज़रिए उन्होंने कई लेखकों को पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे 'दमख़म' में मेरे फोटो के साथ मेरी ग़ज़ल प्रकाशित करना चाहते थे। उन्हें मेरा कोई फोटो पसंद नहीं आया। वे बोले- आप हमेशा कैमरे में क्यों झांकते हैं? मैं एक स्टूडियो में गया। उनके निर्देशानुसार फोटो खिंचाया तब उन्होंने ग़ज़ल छापी।

दो साल पहले मनहर चौहान ने मुझे अपना नया उपन्यास 'वध' भेंट किया था। रहस्य रोमांच से भरपूर इस उपन्यास के ज़रिए मनहर जी ने यह साबित किया है कि एक सामान्य इंसान के भीतर भी हिंसक और जटिल विचार जन्म ले सकते हैं। 'वध' की भाषा बहुत कसी हुई और प्रभावशाली है।


सत्तर के दशक में श्रीपत राय के सम्पादन में प्रकाशित होने वाली पत्रिका 'कहानी' ने अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता का आयोजन किया था। मनहर चौहान की कहानी #घरघुसरा को उसमें प्रथम पुरस्कार मिला था। 'घरघुसरा' कहानी मध्यमवर्गीय समाज के उन किरदारों पर केंद्रित है जिन्हें अक्सर समाज 'अंतर्मुखी' या घरघुसरा कहकर पुकारता है। समाज किसी व्यक्ति की निजता और उसके स्वभाव को किस तरह परिभाषित करता है इस द्वंद्व को यह कहानी बहुत ख़ूबसूरती से उभारती है।

​मनहर चौहान का मशहूर उपन्यास #अरे_ओमप्रकाश व्यवस्था, भ्रष्टाचार और आम आदमी की बेबसी पर चोट करता है। इसमें समाज की विसंगतियों और व्यवस्था के भीतर फंसे एक आम इंसान 'ओमप्रकाश' की छटपटाहट को दिखाया गया है। इसकी शैली में व्यंग्य और यथार्थ का गहरा पुट है।

मनहर चौहान ने प्रचुर मात्रा में #बाल_साहित्य का भी सृजन किया है। उनकी सबसे बड़ी ख़ूबी यह है कि वे मनोवैज्ञानिक गहराई के साथ-साथ बोलचाल की सरल भाषा का प्रयोग करते हैं जिससे पाठक किरदारों के साथ सीधा जुड़ाव महसूस करता है।


मनहर चौहान हमेशा कलमजीवी साहित्यकार रहे। कई सालों तक उन्होंने मुम्बई के दहिसर स्टेशन के पास अपना लेखन कार्यालय बनाया था। एक दौर में उन्होंने कई #जासूसी_उपन्यास भी लिखे जो काफी पसंद किये गए। उन्होंने गुजराती और मराठी कृतियों का अनुवाद भी किया। मराठी से हिन्दी में अनूदित उपन्यास 'अघोरियों के बीच' जनसत्ता सबरंग में धारावाहिक प्रकाशित होकर बहुचर्चित हुआ।

मनहर जी से गपशप में आनंद आया। उनसे मिलकर अच्छा लगा। हमारी दुआ है कि वे इसी तरह स्वस्थ और प्रसन्न रहें। हँसते मुस्कराते रहें और ठहाके लगाते रहें।

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आपका : 
देवमणि पांडेय 98210 82126 

बुधवार, 25 मार्च 2026

कवि विनोद का प्रबंध काव्य 'बरवै_विनोद'

 

कवि विनोद शंकर शुक्ल को अमीर ख़ुसरो पुरस्कार

​लखनऊ के प्रतिष्ठित कवि विनोद शंकर शुक्ल 'विनोद' को उनके प्रबंध काव्य 'बरवै_विनोद' के लिए 22 मार्च 2026 को राज्य कर्मचारी साहित्य संस्थान उत्तर प्रदेश की ओर से एक लाख रूपये के अमीर ख़ुसरो पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इस रचनात्मक उपलब्धि के लिए विनोद जी को हार्दिक बधाई! 

वन विभाग, उत्तर प्रदेश में डी.एफ.ओ. के पद से वर्ष 2017 में सेवानिवृत्त होने के बाद विनोद जी पूर्णरूपेण साहित्य साधना में रत हैं। लखनऊ यात्रा के दौरान उनसे साहित्य-चर्चा में बहुत आनंद आया। विनोद जी ने मुझे अपनी तीन पुस्तकें भेंट कीं-'बरवै-विनोद', 'विश्वामित्र-मेनका' और 'कुरुवंशी महान'।

​पुरातन काव्य-परंपरा में विनोद जी की गहरी रुचि है। बरवै छंदों में उन्होंने 'बरवै-विनोद' का सृजन किया है। कहा जाता है कि बारह-सात मात्राओं वाले इस 'बरवै' छंद का नामकरण अब्दुल रहीम ख़ान-ए-ख़ाना ने किया था। इस छंद में रहीम की चर्चित पुस्तक है- 'बरवै नायिका भेद'। इसी छंद में महाकवि तुलसीदास ने भी 'बरवै रामायण' की रचना की। 

रहीम और तुलसीदास के बरवै अवधी भाषा में हैं। विनोद जी ने खड़ी बोली हिंदी में इस छंद को ढालकर 'बरवै-विनोद' का सृजन किया है। इस पुस्तक में सात सौ इक्कीस बरवै छंदों को छ: शीर्षकों में समाहित किया गया है- सौंदर्य, वियोग, संयोग, वात्सल्य, दायित्व और ज्ञान-भक्ति। सरस भाषा, रोचक शैली और मनमोहक भावनाओं से समृद्ध यह एक उत्कृष्ट कृति है।

​'कुरुवंशी महान' प्रबंध काव्य है। इसकी कथावस्तु महाभारत पर आधारित है। यह तेरह सर्गों में विभक्त है। इसका प्रत्येक सर्ग एक पृथक छंद में रचित है। 'विश्वामित्र-मेनका' खंडकाव्य में इन दो पात्रों के माध्यम से वैदिक कालीन आर्य संस्कृति की एक यशोगाथा प्रस्तुत की गई है। इसका अंतिम सर्ग 'हर्ष सर्ग' है जिसमें दुष्यंत की अपने पुत्र भरत एवं पत्नी शकुंतला से भेंट होती है। दुष्यंत उन्हें साथ लेकर अपनी राजधानी हस्तिनापुर वापस चले जाते हैं।सहज प्रवाह लिए हुए यह खंडकाव्य काफ़ी सरस है। 

​विनोद जी की लेखनी से निकली तीनों अनमोल कृतियाँ हिन्दी साहित्य जगत के लिए एक बहुमूल्य उपहार हैं और उनकी सृजनशीलता की महत्ता को प्रमाणित करती हैं। अवधी के पारंपरिक 'बरवै' छंद को खड़ी बोली की सरसता में पिरोकर विनोद जी ने आधुनिक हिंदी साहित्य में एक नया अध्याय जोड़ा है।

​'कुरुवंशी महान' में महाभारत की महानता और 'विश्वामित्र-मेनका' में वैदिक कालीन संस्कृति का उदात्त चित्रण विनोद जी की गहरी शोधपरक दृष्टि और सांस्कृतिक निष्ठा को दर्शाता है। इन उत्कृष्ट रचनाओं के लिए आपको हार्दिक बधाई। हम सबकी मंगल कामना है कि आपकी लेखनी इसी प्रकार माँ भारती की सेवा में निरंतर गतिशील रहे।

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आपका : देवमणि पांडेय 98210 82126 

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मंगलवार, 24 मार्च 2026

चित्रनगरी संवाद मंच मुम्बई के पांच साल

चित्रनगरी संवाद मंच मुम्बई के पांच साल 

चित्रनगरी संवाद मंच मुम्बई एक अनौपचारिक मंच है। हर रविवार इसके नियमित आयोजन में कविता पाठ, कहानी पाठ, नाटकों का मंचन, किताबों पर चर्चा, लेखक से मिलिए आदि कार्यक्रम होते हैं। बाहर से पधारे रचनाकारों के साथ सार्थक संवाद होता है और नये रचनाकारों को भी इस मंच पर भरपूर प्रोत्साहन दिया जाता है। पेश है ‘स्त्री दर्पण’ के लिए इसके संयोजक-संचालक देवमणि पांडेय से कथाकार-कवयित्री रीता दास राम की बातचीत। 

प्रश्न-1: आप यह चित्रनगरी संवाद मंच कब से चला रहे हैं और कितने आयोजन कर चुके हैं? 

अड्डेबाजी मेरा पुराना शौक़ है। जब मैं गोकुलधाम मुहल्ले में रहने के लिए आया तो अड्डेबाजी करने और मिलने जुलने के लिए फ़िल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व में होटल रॉयल चैलेंज के सामने एक कलात्मक जगह मिल गई- इडलिश कैफ़े। हमने तय किया कि प्रत्येक रविवार की शाम को खुले आसमान के नीचे 6 से 8 बजे हम नियमित यहां मिलेंगे। गपशप और चाय-काफ़ी का लुत्फ़ उठाएंगे। 

मुम्बई के गोरेगांव उपनगर में फ़िल्म सिटी रोड के आसपास बहुत सारे लेखक, पत्रकार, रंगकर्मी, कलाकार, गायक, संगीतकार और अभिव्यक्ति के अन्य माध्यमों से जुड़े लोग रहते हैं। इन सबको आपस में एक मंच के ज़रिए जोड़ने के लिए हम कुछ मित्रों ने वरिष्ठ कथाकार सूरज प्रकाश की अगुवाई में जनवरी 2020 में एक मंच बनाया- "चित्रनगरी संवाद मंच मुम्बई।" 


फ़िल्मसिटी रोड और आस पास रहने वाले जो रचनाकार कलाकार इस अड्डेबाजी में शुरुआती दिनों में शामिल हुए उनके नाम हैं सूरज प्रकाश, अशोक राजवाडे, रवींद्र कात्यायन, प्रेम रंजन अनिमेष, के पी सक्सेना ‘दूसरे’, प्रदीप गुप्ता, नवीन सी चतुर्वेदी, नवीन जोशी ‘नवा’, शैलेंद्र गौड़, राजीव जोशी, आर एस रावत, राजेश ऋतुपर्ण, राजू मिश्र, सविता दत्त तथा कुछ और साथी। लॉकडाउन (25 मार्च) के पहले, रविवार 22 मार्च 2020 को जो अड्डेबाजी हुई थी उसमें सिने गीतकार अभिलाष (इतनी शक्ति हमें देना दाता फेम) और नवगीतकार पं किरण मिश्र शामिल थे। कोरोना काल के दौरान इन दोनों साथियों का निधन हो गया। 

इडलिश कैफ़े में कितने कार्यक्रम हुए इसकी गिनती मुश्किल है। मगर मेरी फेसबुक वाल पर सबकी रिपोर्ट चित्र के साथ उपलब्ध है। आगे चलकर मराठी लेखक मित्र अशोक राजवाड़े के सौजन्य से हमें केशव गोरे स्मारक ट्रस्ट, गोरेगांव पश्चिम में मृणालताई हाल मिल गया। रविवार 3 जुलाई 2022 से वहां हर रविवार को सुचारू रूप से साप्ताहिक आयोजन होने लगे। अब तक वहां लगभग दो सौ कार्यक्रम आयोजित हो चुके हैं। उन कार्यक्रमों का ब्यौरा “चित्रनगरी संवाद मंच मुम्बई” के फेसबुक पेज पर देखा जा सकता है। 


प्रश्न-2: चित्रनगरी संवाद मंच में किन किन विधाओं और विषयों को शामिल किया?

चित्रनगरी संवाद मंच मुंबई एक अनौपचारिक मंच है। हर रविवार को इसके नियमित साप्ताहिक आयोजन में साहित्य चर्चा, कविता पाठ, कहानी पाठ, नाटकों का मंचन, किताबों पर चर्चा, सिने चर्चा, संगीत चर्चा, लेखक से मिलिए आदि कार्यक्रम होते हैं। नई किताबों के अंश का पाठ होता है। बाहर से पधारे रचनाकारों के साथ सार्थक संवाद होता है और नये रचनाकारों को भी इस मंच पर भरपूर प्रोत्साहन दिया जाता है।

प्रश्न-3: किन किन हस्तियों को यहाँ बुलाया गया या उन पर कार्यक्रम किया गया?

मुंबई के और देश के चुनिंदा रचनाकारों को समय-समय पर रचनात्मक संवाद के लिए चित्रनगरी संवाद मंच में आमंत्रित किया जाता है। मुंबई के लगभग सभी प्रमुख रचनाकार इसमें शिरकत कर चुके हैं। यहां आयोजित मुशायरों में मुम्बई के और बाहर के सौ से भी अधिक नामचीन शायर शिरकत कर चुके हैं। 

मुंबई से बाहर के जिन रचनाकारों ने अपनी मौजूदगी से चित्रनगरी संवाद मंच की गरिमा बढ़ाई उनमें कुछ प्रमुख नाम हैं - तेजेंद्र शर्मा (यूके), भारतेंदु विमल (लंदन), रेखा राजवंशी (ऑस्ट्रेलिया) नरेश सक्सेना (लखनऊ), राजेश जोशी (भोपाल) असग़र वजाहत (दिल्ली) , एस आर हरनोट (शिमला), विमल कुमार (दिल्ली) प्रेम जनमेजय (दिल्ली), सुभाष चंदर (दिल्ली), राजेन्द्र गौतम (दिल्ली), सुभाष वशिष्ठ (दिल्ली) विभा रश्मि  (दिल्ली), ममता जयंत  (दिल्ली), प्रभात समीर (दिल्ली), सोनाली बोस (दिल्ली), अशोक भौमिक (इलाहाबाद) रतिभान त्रिपाठी (प्रयाग), प्रतुल जोशी (लखनऊ), डॉ हरि प्रकाश श्रीवास्तव (लखनऊ), मंजुल मिश्र 'मंज़र' (लखनऊ), चंद्रभाल सुकुमार (वाराणसी), इंद्रजीत सिंह (देहरादून), राजशेखर व्यास (उज्जैन) ओमा शर्मा (वडोदरा), जितेन्द्र भाटिया (जयपुर), सुधा अरोड़ा (बंगलोर) अनुराधा सिंह (बंगलोर), चारु चित्रा (ग्वालियर), राकेश अचल (ग्वालियर) आर के पालीवाल (भोपाल), विनोद नागर (भोपाल), विजय शंकर चतुर्वेदी (सतना), दिनकर शर्मा (झारखंड), घनश्याम अग्रवाल (अकोला), सुजीत सहगल (धर्मशाला), ज़ुबैर अंसारी (लखनऊ), आदिल रशीद (दिल्ली), सिद्धार्थ शांडिल्य (हैदराबाद), सोनू पाटील (नागपुर), सपना मूलचंदानी (अजमेर), तनोज दधीच (कोटा) और लोक गायक राकेश तिवारी (रायपुर) 

प्रश्न-4: साहित्य का इससे कितना प्रचार प्रसार हुआ।

साहित्य का इससे कितना प्रचार प्रसार हुआ यह बताने के लिए मेरे पास कोई पैमाना नहीं है। मगर जो रचनाकार कलाकार चित्रनगरी संवाद मंच में आए उनको अपनी बात कहकर या अपनी रचना सुनाकर अच्छा लगा। श्रोताओं को भी इस अनौपचारिक संवाद में आनंद आया और उन्होंने ख़ुद को हमेशा समृद्ध महसूस किया। अब मैं किसी भी शहर में जाता हूं तो लोग चित्रनगरी संवाद मंच के बारे में पूछते हैं। इससे लगता है कि साहित्य का प्रचार प्रसार तो हो रहा है। यह भी उल्लेखनीय है कि कई युवा रचनाकारों की शुरुआत हमारे मंच से हुई और उन्होंने काफ़ी नाम कमाया। मेरी फेसबुक वॉल पर और चित्रनगरी संवाद मंच के फेसबुक पेज पर हमारी सारी गतिविधियों की रिपोर्ट मौजूद है। 

प्रश्न-5: श्रोताओं का फीड बैक क्या रहा?

चित्रनगरी संवाद मंच के बारे में श्रोताओं का फीडबैक हमेशा बहुत अच्छा रहा है। वे व्यक्तिगत रूप से फ़ोन करके भी अपनी प्रतिक्रिया बताते रहते हैं। श्रोताओं की राय को मानकर हम किसी रचनाकार का भाषण कराने के बजाय उनसे सवाल पूछते हैं और श्रोता भी सवाल पूछते हैं। इससे गंभीर विषय भी आसान हो जाता है। किसी को बोरियत नहीं होती। विश्व साहित्य के हिंदी अनुवाद पर बात करने के लिए जब कथाकार जितेंद्र भाटिया आए तो श्रोता उनसे दो घंटे तक सवाल पूछते रहे और कविता पाठ का सत्र स्थगित करना पड़ा। मधु कांकरिया की “ढाका डायरी” पर भी बढ़िया चर्चा हुई। स्त्री दर्पण के सौजन्य से आयोजित “स्त्री लेखन” पर आधारित चर्चा में श्रोताओं का भरपूर उत्साह दिखाई पड़ा। ओमा शर्मा के कहानी पाठ के बाद श्रोताओं ने उनसे इतने ज़्यादा सवाल पूछे कि वे दंग रह गए और उन्हें उत्तर देकर श्रोताओं की इस सहभागिता से बहुत ख़ुशी भी हुई। 

सुप्रसिद्ध मराठी लेखक लक्ष्मण गायकवाड़ से उनके आत्मकथात्मक उपन्यास 'उचक्का' के बारे में सुनना बेहद रोमांचक रहा। प्रतिष्ठित मराठी लेखिका डॉ स्मिता दातार से वायलिन वादक पद्मश्री डी के दातार की जीवनी के अंश सुनना भी यादगार अनुभव रहा। प्रसन्नता की बात है कि हर रविवार सिर्फ़ व्हाट्सएप संदेश पर प्राय: तीस चालीस लोग इकट्ठा हो जाते हैं। एक बार प्रेमचंद जयंती कार्यक्रम में और दूसरी बार एक संगीत नाटक में 70 से ज़्यादा लोग आ गए तो अलग से कुर्सियां लगवानी पड़ीं। 


प्रश्न-6: नाम चित्रनगरी है तो क्या फ़िल्म के लोग भी इसमें आये ?

हम सिने जगत से ग्लैमरस कलाकारों के बजाय उन लोगों को बुलाना पसंद करते हैं जिनका रचनात्मकता से रिश्ता है। चित्रनगरी संवाद मंच में सविता बजाज, हिमानी शिवपुरी, कुलबीर बडेसरों, प्रतिभा सुमन शर्मा, शाइस्ता ख़ान, दीप्ति मिश्र, लता हया, असीमा भट्ट, पूर्वा पराग, अलका अमीन, रावी गुप्ता, कामना सिंह चंदेल जैसी कई प्रतिष्ठित अभिनेत्रियां शिरकत कर चुकी हैं। लेखक-निर्देशक रंजीत कपूर, लेखक-निर्देशक संजय छेल, फ़िल्म लेखक अशोक मिश्र, अभिनेता यशपाल शर्मा, लेखक-निर्देशक पवन कुमार, सिने गीतकार नवाब आरज़ू, सिने गीतकार अहमद वसी, अभिनेता दयाशंकर पांडेय, अभिनेता-निर्देशक ओम कटारे, लेखक-निर्देशक-अभिनेता विजय कुमार, पटकथा लेखक विजय पंडित, लेखक-निर्देशक दिनेश लखनपाल, अभिनेता बी शांतनु, लेखक-अभिनेता अभिराम भडकमकर, अभिनेता अरुण शेखर, फ़िल्म पत्रकार अजित राय, फ़िल्म पत्रकार अजय ब्रह्मात्मज, फ़िल्म पत्रकार पराग छापेकर, अभिनेता शैलेंद्र गौड़, आर जे प्रीति गौड़, सिने गीतकार संदीप नाथ, सिने गीतकार-गायक विनोद दुबे, सिने गीतकार शेखर अस्तित्व, पद्मश्री संगीतकार अली ग़नी, पार्श्वगायिका सोमा बनर्जी, पद्मश्री गायिका डॉ सोमा घोष और जाने माने अभिनेता राजेंद्र गुप्ता ने हमारे आयोजनों में शिरकत करके चित्रनगरी संवाद मंच की गरिमा बढ़ाई है। 

प्रश्न-7: इन आयोजनों में आपको किस तरह का साहित्य सुनने को मिला। उसकी विविधता और गुणवत्ता कैसी लगी।

चित्रनगरी संवाद मंच में इस्मत चुगताई, प्रेमचंद, परसाई, शरद जोशी, मुक्तिबोध और कामता नाथ की कहानियों का मंचन हो चुका है। रंगकर्मी विजय कुमार द्वारा निर्देशित और मुहम्मद अली जिन्ना पर केंद्रित '5 अगस्त 1947' नाटक का पाठ यहां किया गया। लेखक ब्रत्य वसु के इस बांग्ला नाटक का हिंदी अनुवाद जैनद्र भारती ने किया है। तुलसीदास और अकबर की मुलाक़ात पर आधारित असग़र वजाहत के नाटक ‘महाबली’ का मंचन हुआ। मराठी रंगकर्मी आनंद माड़ये के नाट्य ग्रुप ने परसाई की कहानियों का मंचन किया। न्यूज़ चैनल की पत्रकारिता पर आधारित अरुण शेखर द्वारा लिखित निर्देशित व्यंग्य नाटक ‘आ से आम’ का पहला मंचन हुआ। असीमा भट्ट, दीप्ति मिश्र, लता हया और अर्चना जौहरी के लघु नाटकों का मंचन हुआ। सिने जगत की क़िस्सागोई पर आधारित पवन कुमार के संगीतमय नाटक ‘सिने फीलिया’ का मंचन हुआ। 

आबिद सुरती और लक्ष्मण गायकवाड़ ने अपनी आत्मकथा सुनाई। जितेंद्र भाटिया और विजय कुमार महानगरों के अतीत पर लिखी हुई अपनी किताबों के साथ आए। असग़र वजाहत, एस आर हरनोट, ओमा शर्मा, मधु कांकरिया और सुधा अरोड़ा जैसे प्रतिष्ठित रचनाकारों ने कहानियां सुनाईं। नरेश सक्सेना और राजेश जोशी जैसे सुप्रसिद्ध कवियों के साथ संवाद करना और उनकी कविताओं को सुनना सबके लिए बहुत सुखद और प्रेरक रहा। रंजीत कपूर, अशोक मिश्र और संजय छेल जैसे फ़िल्म लेखकों से फ़िल्म लेखन की चुनौतियों पर चर्चा भी काफ़ी पसंद की गई। अभिनेता राजेन्द्र गुप्ता से प्रेमचंद की कहानी सुनना, सूरज प्रकाश से लेखकों की दुनिया के रोचक क़िस्से सुनना, रंगकर्मी मुजीब ख़ान से प्रेमचंद के क़िस्से सुनना, रीता दास राम से उनके जीवन की प्रेरक कथा सुनना, मशहूर सैलानी रेखा सुतार से पहाड़ों की दुर्गम यात्रा का वृतांत सुनना, लेखिका रश्मि रविजा से परिंदों की रोचक दुनिया के बारे में जानना या पद्मश्री गायिका डॉ सोमा घोष से चैती, कजरी और ठुमरी सुनना लोगों के लिए यादगार अनुभव रहा। यह विविधता ही चित्रनगरी संवाद मंच की पहचान है। 

प्रश्न-8: चित्रनगरी संवाद मंच से नयी पीढ़ी को आपने जोड़ा?

नयी पीढ़ी में गद्य लेखक कम हैं। गीत, ग़ज़ल, कविता लिखने वाले ज़्यादा है। इन्हें जोड़ने के लिए हम कभी-कभी युवा कवि सम्मेलन, मुशायरा और कवयित्री सम्मेलन करते हैं। नाटकों के मंचन के समय भी नई पीढ़ी की मौजूदगी रहती है। चित्रनगरी संवाद मंच में प्राय: एक घंटे चर्चा और एक घंटे कविता पाठ का आयोजन होता है। कविता पाठ में नई पीढ़ी भरपूर उत्साह के साथ शिरकत करती है। यह अच्छी बात है कि कुछ महिलाओं ने अपनी पहली कहानी का पहला पाठ चित्रनगरी संवाद मंच में किया।एक युवा लेखिका डॉ मधुबाला शुक्ल को हमने संचालन के लिए प्रोत्साहित किया। अब वे भरपूर आत्म विश्वास के साथ बोलती हैं और लोग पसंद करते हैं। 


प्रश्न-9: कुल मिलाकर आपका अनुभव कैसा रहा।

कुल मिलाकर अनुभव बहुत अच्छा रहा। कोरोना ने तो लोगों को घरों में क़ैद कर दिया था। कई रचनाकार भी मानसिक अवसाद से गुज़र रहे थे। ऐसे माहौल में चित्रनगरी संवाद मंच के ज़रिए लोगों को मिलने-जुलने का, गपशप करने का अवसर मिला तो सभी को बहुत अच्छा लगा। प्रो नंदलाल पाठक 97 साल के हो चुके हैं। उन्होंने पूरे दमख़म के साथ जब चित्रनगरी संवाद मंच में ग़ज़लें सुनाईं तो श्रोता दंग रह गए। 90 साल के ढब्बू जी (आबिद सुरती) कई बार चित्रनगरी संवाद मंच में ठहाके लगवा चुके हैं। हम पहले 5 से 5:30 बजे चाय पीते हैं। एक दूजे का हाल पूछते हैं। इसके बाद 5:30 से 7:30 बजे तक कार्यक्रम होता है। समय की पाबंदी का फ़ायदा यह है कि लोग भोजन के समय अपने-अपने घर पहुंच जाते हैं। कई ऐसे रचनाकार हैं जो नियमित आते हैं क्योंकि उन्हें सुनना सुनाना अच्छा लगता है। मुझे भी मिलने मिलाने का यह सिलसिला अच्छा लगता है। कुंवर बेचैन का शेर है - मिलना जुलना रहे तो मेले हैं /वरना दुनिया में सब अकेले हैं। 

चित्रनगरी सम्वाद मंच की एक आयोजन समिति है। इसमें सूरज प्रकाश, देवमणि पांडेय, सुभाष काबरा, राजेश ऋतुपर्ण और मधुबाला शुक्ल शामिल हैं। इससे आयोजनों की रूपरेखा निर्धारित करने में सहूलियत रहती है। 

प्रश्न 10: चित्रनगरी संवाद मंच के अलावा आप और किस संस्था से जुड़े हैं उस बारे में जानकारी दीजिए।

चित्रनगरी संवाद मंच के अलावा मैं दो महत्वपूर्ण संस्थाओं में डायरेक्टर हूँ। ये हैं 'साहित्यायन फाउंडेशन' और 'इंशाद फाउंडेशन'। साहित्यायन फाउंडेशन की प्रवर्तक हैं मुंबई की प्रमुख उद्योगपति पद्मभूषण राजश्री बिरला। साहित्यायन फाउंडेशन के माध्यम से मुम्बई में दो अखिल भारतीय नए पुरस्कारों की शुरुआत हुई है। हिंदी काव्य साहित्य में विशिष्ट योगदान के लिए नंदलाल पाठक साहित्य पुरस्कार (₹ पांच लाख) और एक सम्भावनाशील युवा ग़ज़लकार को नंदलाल पाठक प्रतिभा पुरस्कार (₹ एक लाख) प्रदान किया जायेगा। यह दोनों पुरस्कार प्रतिवर्ष दिए जाएंगे। 

इंशाद फाउंडेशन के प्रवर्तक हैं प्रतिष्ठित शायर नवीन जोशी 'नवा'। इंशाद के ज़रिए प्रतिभाशाली युवा कवियों को मंच प्रदान किया जाता है। इसके आयोजन मुंबई से बाहर भी पुणे, बड़ौदा, सूरत, दिल्ली, पटना, नागपुर, इंदौर आदि शहरों में हो चुके हैं। मुम्बई में 'नस्ल ए नौ भारत' नाम से युवा शायरों का अखिल भारतीय मुशायरा आयोजित किया जाता है। मुंबई के रंग शारदा सभागार में यह सिलसिला प्रतिवर्ष चलता रहेगा।

प्रश्न-11: चित्रनगरी संवाद मंच में शामिल मुम्बई के प्रमुख रचनाकार?  

आबिद सुरती, लक्ष्मण गायकवाड़, विजय कुमार, मधु कांकरिया, मनहर चौहान, धीरेंद्र अस्थाना, अनूप सेठी, विनोद दास, हरीश पाठक, बोधिसत्व, करुणा शंकर उपाध्याय, प्रो राम बक्ष, प्रभात समीर, नंदलाल पाठक, सत्यदेव त्रिपाठी, विमल मिश्र, अभिलाष अवस्थी, रमन मिश्र, राकेश शर्मा, आशकरण अटल, सुभाष काबरा, संजीव निगम, अनंत श्रीमाली, हरि मृदुल, संजय भिसे, यूनुस ख़ान, गुलशन मदान, अनिल गौड़, यशपाल सिंह यश, रमाकांत शर्मा, गंगा शरण सिंह, उषा मिश्र, चित्रा देसाई, ममता सिंह, रश्मि रविजा, रीता दास राम, कमलेश पाठक, सुलभा कोरे, आभा बोधिसत्व, सीमा अग्रवाल, रेखा बब्बल, अलका शरर, अर्चना जौहरी, प्रज्ञा शर्मा, सम्वेदना रावत, प्रेमा झा जैसे ढेर सारे प्रतिष्ठित नाम शामिल हैं। यहां आयोजित मुशायरों में मुम्बई के और बाहर के सौ से भी अधिक नामचीन शायर शिरकत कर चुके हैं जिनमें विजय अरुण, सागर त्रिपाठी, माधव बर्वे ‘नूर’, सिद्धार्थ शांडिल्य, नदीम सिद्दीक़ी, शाहिद लतीफ़ और नवीन सी चतुर्वेदी जैसे मशहूर क़लमकार शामिल हैं। 

प्रश्न-12: आपको साहित्य के भविष्य के बारे में क्या लगता है?

हमने अपने लेखन के शुरुआती दौर में पत्र पत्रिकाओं में छपकर अपनी पहचान बनाई थी। आज कोई मुझे सर्च करेगा तो उसे सबसे पहले ‘रेख़्ता’ या ‘कविता कोश’ का लिंक मिलेगा। आज का नया लेखक सोशल मीडिया पर अपनी पहचान बनाता है। प्रिंट साहित्य भी ज़रूरी है मगर हमारे साहित्यकारों की सोशल मीडिया पर भी मौजूदगी ज़रूरी है। अपनी रचनाओं को अच्छी रिकॉर्डिंग के साथ यूट्यूब जैसे प्लेटफार्म पर पेश करना भी इस दौर की ज़रूरत है। युवा पीढ़ी के लोग प्रिंट में पढ़ने के बजाय यूट्यूब पर कविता, कहानी सुनना ज़्यादा पसंद करते हैं। ज़्यादातर नौजवान मोबाइल में ही अपनी पसंद का साहित्य पढ़ते हैं। किताबों का महत्व आज भी क़ायम है। मुझे कई ऐसे नौजवान मिले जो घर में किताबें रखना और पढ़ना पसंद करते हैं। बदलते वक़्त के साथ रचनाकार अगर क़दम मिलाकर आगे बढ़ेगा तो बेहतर होगा। लेखन में जो बदलाव आ रहे हैं उन्हें भी स्वीकार करना होगा। सोशल मीडिया के इस दौर में भी जिसमें दम होगा वही टिकेगा।  

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Reeta Das Ram

बुधवार, 18 मार्च 2026

अनिल गौड़ का ग़ज़ल संग्रह 'रौशनी के नाम'

 हिंदी ग़ज़ल की सार्थक आवाज़: अनिल गौड़

हिंदी ग़ज़ल के परिदृश्य पर ​अनिल गौड़ एक ऐसी आवाज़ हैं जिनकी रचनात्मकता गहरी संवेदना और प्रभावशाली अभिव्यक्ति से समृद्ध है। उनका ग़ज़ल संग्रह 'रौशनी के नाम' स्वयं इस बात का प्रमाण है कि वे केवल शेर नहीं कहते, बल्कि समय और समाज से एक सार्थक संवाद स्थापित करते हैं। आम बोल चाल की भाषा में लिखी गईं ये सीधी, सादी ग़ज़लें पाठक और श्रोता के मन में जगह बनाने में सक्षम हैं। उनका यह शेर देखिए-

​अपना दर्द छुपाए हम तो गाते हैं आंसू, आंसू

हमको कवि शायर मत कहना, हम रोते बंजारे हैं

​यह शेर उनकी सोच और सरोकार का आईना है। यह एक ऐसे कवि की आवाज़ है जो अपनी रचना को महज कला नहीं, बल्कि अपने जीवन के दर्द की अभिव्यक्ति मानता है। सृजन का यही समर्पण उनकी ग़ज़लों को विशिष्ट बनाता है।


अनिल गौड़ की ग़ज़लों में सामाजिक पीड़ा और जीवन के विविध संदर्भ बड़ी मार्मिकता के साथ उभरते हैं। वे केवल व्यक्तिगत अनुभूतियों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि जन भावनाओं और सामाजिक सरोकारों के प्रति समर्पित दिखाई देते हैं। उनके लेखन में यथार्थ की कठोरता को संवेदना की आंच पर पकाया जाता है-

​इंसान की मजबूरियों का नाम है रोज़ी

वह बर्फ़ बेचता है लपट में खड़ा हुआ

​यह शेर एक ऐसा चित्र प्रस्तुत करता है, जहाँ विपरीत परिस्थितियों में जीवनयापन की जद्दोजहद है। 'बर्फ़' और 'लपट' का विरोधाभास सामाजिक विसंगतियों को बड़े सलीक़े के साथ रेखांकित करता है। अनिल गौड़ की ग़ज़लें समय के साथ चलती हैं। वे चुनौतियों को स्वीकार करते हैं और विसंगतियों पर निर्भीक होकर टिप्पणी करते हैं। उनकी ग़ज़लें अपने समय से मुख़ातिब हैं-

​सच्चाई को कब तक पत्थर मारा जाएगा

आज नहीं तो कल उसको स्वीकार जाएगा

​यह शेर आशावाद और सत्य की अनिवार्यता को बख़ूबी दर्शाता है। उनका एक और शेर देखिए जो समाज के नैतिक पतन पर तीखा व्यंग्य है-

​जिसे भी देखो, वह हंसकर चपत लगाता है

वतन को हमने, यतीमों का गाल कर डाला

​यहाँ 'यतीमों का गाल' जैसी नई और मौलिक उपमा सामाजिक पतन और देश की दुर्दशा को एक झटके में सामने ला देती है। कभी-कभी वे हमारे सामने कोई ऐसा मोहक चित्र प्रस्तुत कर देते हैं जिससे मन प्रसन्न हो जाता है। ऐसा ही एक दृश्य यशोदा और कृष्ण के प्यार भरे रिश्ते को दिखाता है जहाँ माँ डाँटती भी है, लेकिन उस डाँट में अपार स्नेह भरा होता है-

 यशुमति ने पंखुड़ियों जैसे कान उमेठ दिए

​बोल कि ग्वालिन के घर तू दोबारा जाएगा

इस शेर की सबसे बड़ी ख़ूबी 'पंखुड़ियों जैसे कान' की उपमा है। यह उपमा बालक कृष्ण की मासूमियत और सुकोमलता को दर्शाती है। आमतौर पर कान उमेठना एक दंड होता है, लेकिन पंखुड़ियों जैसे कान उमेठने का वर्णन यह दर्शाता है कि यह दंड भी प्रेम और लाड़ से भरा हुआ है। यह उपमा दृश्य को कोमल बना देती है। इस शेर में कृष्ण की बाल लीला को एक नए, सुंदर और मौलिक कोण से प्रस्तुत किया गया है।

अनिल गौड़ की ग़ज़लों में कभी-कभी दाम्पत्य जीवन के ऐसे चित्र भी नज़र आते हैं जहां प्रेम का माधुर्य है। उनकी एक लोकप्रिय ग़ज़ल का मतला है-

​बांह डाल दी तुमने, हँस के मेरी गर्दन में

​मैंने तो ये पूछा था,क्या बना है भोजन में

यह शेर रोज़मर्रा के जीवन के एक सीधे-सादे संवाद को अचानक प्रेम के मोड़ पर लाकर खड़ा कर देता है। यह दर्शाता है कि दाम्पत्य जीवन में छोटी-छोटी व्यावहारिक बातों के बीच भी प्रेम और स्नेह का प्रदर्शन कितना सहज और आकस्मिक हो सकता है।

अनिल गौड़ की रचनात्मकता में प्रेम और अध्यात्म के संदर्भ भी गहरे अर्थों के साथ आते हैं। कृष्ण से संबंधित उनका यह शेर जीवन के शाश्वत मूल्यों और दर्शन को नई ऊँचाई देता है-

​कृष्ण का बड़ा क़द है, आदमी से ईश्वर तक

क्यों कि वे अकेले हैं, प्रेम के समर्थन में

उनके आध्यात्मिक चिंतन को रेखांकित करने वाला एक और शेर देखिए जो एक अंतिम आशा और गहरी आस्था की ओर इशारा करता है-

​स्वयं दीप हो जाना ही है, एक मात्र अंतिम आशा

देह दीप है, प्रतिभा बाती, और आत्मा ही लौ है

यह शेर “अप्प दीपो भव” यानी आत्म-दीप्ति के दर्शन को एक सुंदर रूपक में प्रस्तुत करता है। यह कवि की गहन रचनात्मकता का प्रमाण है।


अनिल गौड़ की ग़ज़लें लयबद्धता, संप्रेषणीयता, सामाजिक प्रतिबद्धता और दार्शनिक गहराई का एक सुंदर संगम हैं। वे हिंदी ग़ज़ल की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उसे समकालीन चुनौतियों से जोड़ते हैं। समसामयिक और महत्वपूर्ण विषयवस्तु वाली उनकी ग़ज़लों में जनमानस से सीधे जुड़ने की क्षमता है। मुझे उम्मीद है कि अनिल गौड़ की ये ग़ज़लें हिंदी ग़ज़ल के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेंगी। आने वाले समय में वे हिंदी ग़ज़ल को एक विशिष्ट 'रौशनी' प्रदान करते रहें, यही मेरी शुभकामना है।

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आपका : देवमणि पांडेय

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फ़िल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210 82126

नरोत्तम शर्मा का ग़ज़ल संग्रह एहसासात



एहसासात : नरोत्तम शर्मा का ग़ज़ल संग्रह

नरोत्तम शर्मा की ग़ज़लें केवल शब्दों का जाल नहीं हैं, बल्कि वे जीवन के अनुभवों की एक जीती-जाती तस्वीर हैं। उनके ग़ज़ल संग्रह ‘एहसासात’ में ज़िंदगी के वे तमाम रंग मौजूद हैं जिन्हें हम अक्सर भागदौड़ में अनदेखा कर देते हैं। ​शर्मा जी के लिए ग़ज़ल सिर्फ एक विधा नहीं, बल्कि एक 'एहसास' है। वे ग़ज़ल के सौंदर्य को प्रकृति और प्रेम के साथ जोड़कर देखते हैं-

​सर्दियों में धूप का एहसास होती है ग़ज़ल

प्रेमियों के हृदय का मधुमास होती है ग़ज़ल

​नरोत्तम शर्मा की ग़ज़लें पढ़ते समय ऐसा लगता है मानो कोई अपना हमारे पास बैठकर ज़िंदगी के फ़लसफ़े सुना रहा हो। उन्होंने मुहब्बत की दहलीज़ लांघ कर ग़ज़ल को आम आदमी की दहलीज़ तक पहुँचाया है। ​उनके अनुसार, सृजन की प्रक्रिया पीड़ादायक है, लेकिन उसका परिणाम मधुर होता है। वे कविता रचने के उस 'मधुर संत्रास'  को बख़ूबी समझते हैं-

जब तलक न शक्ल ले बेचैन रहता है हृदय 

सृजन की पीड़ा, मधुर संत्रास होती है ग़ज़ल

​आज के दौर में इंसान जो दिखता है, वह होता नहीं। नरोत्तम शर्मा ने समाज में व्याप्त पाखंड और 'मुखौटों' पर गहरा प्रहार किया है। वे आगाह करते हैं कि बाहरी चमक-धमक और माथे के चंदन पर भरोसा न करें, क्योंकि उसके पीछे 'विष' छुपा हो सकता है-

चिकनी चुपड़ी बातों, कपड़ों पर मत जाना 

विष भी हो सकता है माथे के चन्दन में

वे कपड़ों और चिकनी-चुपड़ी बातों के पीछे छिपी क्रूरता को बेनक़ाब करते हैं और सत्य की परख का संकेत देते हैं - 

चेहरा जो किसी शख्स का दिखता है सभी को, 

अक्सर वो उसी शख्स का चेहरा नहीं होता।

​शायर को इस बात का गहरा मलाल है कि समाज से 'शर्म' और 'ईमानदारी' लुप्त होती जा रही है। जहाँ चारों ओर झूठ और दगा हो, वहाँ सादगी से जीना भी किसी जंग से कम नहीं है-

​हर तरफ झूठ, दगा, और बेवफ़ाई है

आज के दौर में जीना भी इक लड़ाई है

​नरोत्तम शर्मा की ग़ज़लों में एक आम आदमी की बेबसी और उसकी ज़मीन से जुड़ी संवेदनाएँ भी हैं। वे घर न बना पाने के दर्द को स्वीकारते हैं, लेकिन 'घर' होने के अहसास को जीवित रखते हैं। वहीं, 'आँगन के चूजों का सूप बन जाना' उस सामाजिक निष्ठुरता को दर्शाता है जहाँ मासूमियत को सत्ता या स्वार्थ निगल जाता है-

गो बना पाया नहीं आज तलक मैं कोई घर 

एक एहसास तो होता है कि घर होता है


कोई बना के उनका सूप पी गया होगा 

वो चूजे, जो मेरे आँगन में आ के खेलते थे


तल्ख़ियों के बावजूद, नरोत्तम जी के यहाँ निराशा नहीं है। वे व्यक्ति को कर्मशील होने की प्रेरणा देते हैं। उनका मानना है कि ज्ञान की रोशनी तभी काम आती है जब आप स्वयं प्रयास का 'दीया' जलाएँ-

इल्म से रोशनी तो मिलती है 

पर दिया ख़ुद जलाना पड़ता है

वे सिखाते हैं कि अगर इरादों में जोश हो, तो एक 'क़तरा' भी समंदर जैसा तूफ़ान पैदा कर सकता है-

जोश जिसमें न अगर हो तो समंदर क्या है 

हो तो क़तरे में भी तूफाँ का असर होता है 

​नरोत्तम शर्मा का यह संग्रह संवेदनशीलता और साहस का अद्भुत मिश्रण है। उनकी भाषा सरल है लेकिन मारक है। वे जहाँ प्रेम की मधुरता बिखेरते हैं, वहीं समाज की विसंगतियों पर कड़ा प्रहार करने से भी नहीं चूकते। यह ग़ज़ल संग्रह आज के समय और समाज का एक आईना है-

किसी की आँख में अब शर्म का पानी नहीं है 

यही है ज़िंदगी तो फिर कोई मानी नहीं है

नरोत्तम शर्मा की ग़ज़लों में मुहब्बत का गुलशन है मगर उन्होंने ग़ज़ल को आम आदमी के चूल्हे-चौके, आँगन की धूप और समाज के कड़वे सच से जोड़ने का नेक काम भी किया है। उनका यह ग़ज़ल संग्रह मात्र ग़ज़लों का गुलदस्ता नहीं, बल्कि आज के दौर का एक दस्तावेज़ भी है। इसमें जहाँ एक ओर प्रेम की कोमलता है, वहीं दूसरी ओर मुखौटों के पीछे छिपे चेहरों को बेनक़ाब करने का साहस भी है। नरोत्तम शर्मा की आवाज़ उस आम आदमी की आवाज़ है जो झूठ और फ़रेब के बाज़ार में अपनी मासूमियत बचाने की जद्दोजहद कर रहा है।

​अगर आप ऐसी ग़ज़लों की तलाश में हैं जो रूह को छुएँ और ज़हन को झकझोर दें, तो यह संग्रह आपके लिए है। सर्दियों की गुनगुनी धूप जैसी ये ग़ज़लें आपको ज़िंदगी को एक नए नज़रिए से देखना सिखाएंगी। आस्था प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित इस किताब का मूल्य है 275 रूपये। 

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आपका : देवमणि पांडेय 98210 82126

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति बिल्डिंग, कन्या पाडा, फ़िल्मसिटी रोड, गोकुलधाम, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063