पूर्णिमा 'अदा' का गज़ल संग्रह ख़ुदकुशी से ठीक पहले
रचना जब जीवन के अनुभवों की भट्टी में तपकर बाहर निकलती है तो वह सीधा आत्मा से संवाद करती है। पूर्णिमा जायसवाल 'अदा' का गज़ल संग्रह “ख़ुदकुशी से ठीक पहले” एक ऐसा ही सृजन है, जो हताशा के अंतिम छोर पर खड़े इंसान को हाथ पकड़कर वापस जीवन की रोशनी में ले आता है। इस संग्रह की गज़लों से गुज़रते हुए हम पाते हैं कि 'अदा' के पास दुखों को सहने की ही नहीं बल्कि उन्हें परिभाषित करने की एक अद्भुत दृष्टि है। जहाँ दुनिया हार मान लेने को अंत समझती है, वहाँ कवयित्री उदघोष करती है कि सृजन ही वह एकमात्र औषधि है जो विनाश को रोक सकती है -
ख़ुदकुशी टालने का तरीक़ा 'अदा'
इक क़लम तो उठा जिंदगी के लिए।
'अदा' की शायरी में जहाँ एक ओर भरोसे के टूटने की टीस है, वहीं दूसरी ओर स्वाभिमान की गूँज भी है। उनके यहाँ संघर्ष व्यक्तित्व को माँजने की एक प्रक्रिया है। जब वे कहती हैं कि "सूरज को मैं रोज़ हराती हूं", तो यह केवल एक पंक्ति नहीं, बल्कि उस भारतीय नारी का जज़्बा है जो सूरज ढलने से पहले अपनी उम्मीदों के दीये जला लेती है।
समाज के दोहरेपन पर चोट करते हुए वे आईने को भी चकित कर देती हैं, जो आज के दौर की कड़वी सच्चाई को बखूबी बयां करता है। "मेरी कहानी बिन तेरे भी पूरी है" कहकर वे आधुनिक स्त्री के उस स्वरूप को स्वर देती हैं जो किसी की मोहताज़ नहीं, बल्कि स्वयं में संपूर्ण है।
सफलता की ऊँचाइयों को छूने की चाह हर दिल में होती है, लेकिन 'अदा' की ग़ज़लें हमें ज़मीन से जुड़े रहने का हुनर सिखाती हैं। वे याद दिलाती हैं कि चाँद-सितारों तक पहुँचना उपलब्धि है पर अपनी जड़ों की ओर लौटना संस्कार है।
“ख़ुदकुशी से ठीक पहले” केवल एक ग़ज़ल संग्रह नहीं, बल्कि एक 'हीलिंग प्रोसेस' (उपचार प्रक्रिया) है। यह उन सभी के लिए है जो मौन रहकर सहते हैं, जो भीड़ में अकेले हैं और जो अंधेरे में रोशनी की एक लकीर तलाश रहे हैं। पूर्णिमा जायसवाल 'अदा' की ये गज़लें पाठक को यह यक़ीन दिलाने में सफल होंगी कि हार मान लेना समाधान नहीं, बल्कि संघर्ष को उत्सव बना देना ही असली ज़िंदगी है।
मुझे उम्मीद है कि यह संग्रह निश्चित रूप से अदबी दुनिया में अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाएगा। अदा को ढेर सारी शुभकामनाएं।
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देवमणि पांडेय
सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फ़िल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210 82126
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