'राहतों के नाम पर बेचैनियाँ' अनामिका सिंह का ग़ज़ल संग्रह
ग़ज़ल के सुपरिचित तौर तरीक़ों से बाहर निकल कर अपनी भाषा में, अपने अंदाज में, अपनी ग़ज़ल कहना बड़े हुनर का काम है और यह काम ग़ज़लकार अनामिका सिंह बख़ूबी कर रही हैं। श्वेतवर्णा प्रकाशन (नोएडा) से अनामिका सिंह का ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित हुआ है- 'राहतों के नाम पर बेचैनियाँ'। यह संग्रह साबित करता है कि अनामिका के पास वह अभिव्यक्ति कौशल है जो उन्हें एक विशिष्ट पहचान देता है।
आसपास के जो मंज़र दिल को प्रभावित करते हैं, जो दृश्य आँखों में उतर आते हैं, जो अनुभव मन को विचलित कर देते हैं, उन्हें वे बड़े सलीक़े से अपनी रचनात्मकता का हिस्सा बनाती हैं। सृजन की इस यात्रा में उनके यहाँ कुछ विलक्षण मुक़ाम आते हैं। अचानक वे कुछ ऐसे चित्र और चरित्र हमारे सामने पेश कर देती हैं जो ग़ज़ल की दुनिया में सर्वथा नए हैं। ये किरदार अपने सुख-दुख और अपनी जिजीविषा के साथ हमारे सामने आते हैं और हमेशा के लिए हमारी स्मृति का हिस्सा बन जाते हैं-
सैलून में खड़ीं जो सुबह शाम लड़कियां
दिन भर में कितने करती हैं वो काम लड़कियां
हर कस्टमर को डील करे हैं वो जूझकर
पाती नहीं है दो घड़ी आराम लड़कियां
अनामिका सिंह का ग़ज़ल संग्रह साहित्य के दरवाज़े पर एक ताज़ा दस्तक है। अनामिका के पास दूसरों के दुख को महसूस करने की शक्ति है तथा उससे उबरने की कोशिश भी है। वे हौसले को बचाए रखने का हुनर जानती हैं। उनका यह शेर उम्मीदों की नई कोपलें फूटने का आश्वासन देता है-
डाली ने हौसला दिया पतझड़ में पेड़ को
मत हो उदास आएंगे ख़ुशियों के पात और
अनामिका की ग़ज़लों के कथ्य में विविधता है। वे समय के सवाल और समाज की समस्याओं से जुड़ी हैं। उनकी सोच और सरोकार के दायरे में वे लोग शामिल हैं जो ज़िन्दगी की दौड़ में पीछे छूट गए हैं। वे ऐसे लोगों के दुख-दर्द और पीड़ा को शब्द देती हैं। एक माँ की बेबसी और व्यवस्था की नाकामी को वे इस तरह रेखांकित करती हैं कि पाठक उनके मर्म को महसूस कर सके-
ख़ाली पतीली देख तब आंसू ढुलक पड़े
बच्चों ने मां से बोला परस थोड़े भात और
देश के मौजूदा हालात और राजनीति की विसंगतियों पर कई जगह अनामिका का तंज बेहद नुकीला है। वे विडंबनाओं को उजागर करने के लिए देशज मुहावरों का इस्तेमाल एक हथियार की तरह करती हैं-
बूढ़ा बरगद, चलती आरी, देख परिन्दे हैरां हैं
सदमे से काँपी है डाली, क्या कहना है सब चंगा
जब घर बँटता है तो सिर्फ़ दीवारें नहीं खड़ी होतीं, स्मृतियाँ और रिश्ते भी लहूलुहान होते हैं। अनामिका इस दर्द को बड़ी ही सादगी से बयां करती हैं-
घर ईंट-ईट बँट गया, दालान बँट गया
लो माँ के साथ-साथ ये सामान बँट गया
कट बँट गये दरख़्त कभी छाँव थे किये
तुलसी बँटी औ' काँच का गुलदान बँट गया
तुलसी का बँटना और काँच के गुलदान का बँटना उस परम्परा, संस्कृति और पारिवारिक मूल्यों की ओर संकेत करता है जिसे आधुनिकता की दौड़ में हम खोते जा रहे हैं।
बेरोज़गारी का क़हर हो या सड़क पर दम तोड़ती इंसानियत, उनकी क़लम हर मुद्दे पर मुखर है। वे समय की रफ़्तार पर सवाल उठाती हैं कि सीढ़ियाँ तो चढ़ी-उतरी जा रही हैं, पर बदलाव की सुबह कहाँ है?
सड़क पर हादसे कितने, मगर है फ़र्क भी किसको
किसी की जान को कोई बचाने कब उतरता है
अनामिका सिंह की ग़ज़लों में सादा ज़बान, अभिव्यक्ति का कौशल और वह ताज़गी है जिसकी आज के समय को दरकार है। वे अपनी ग़ज़लों के ज़रिए अन्याय, शोषण और संवेदनहीनता के ख़िलाफ़ प्रतिरोध दर्ज करती हैं। यह संग्रह हिंदी ग़ज़ल के भविष्य के लिए एक बेहतर संभावना का संकेत देता है।
काव्य भाषा और कथ्य के स्तर पर अनामिका के यहाँ बेहद ताज़गी और नयापन है। वस्तुतः यही उनकी रचनात्मकता की उपलब्धि है। वे समय के साथ चलते हुए समाज को देखती हैं। आसपास जो स्याह रंग हैं, दुख, अभाव और संत्रास है, वे सभी उनकी ग़ज़लों का कथ्य बन जाते हैं। अभिव्यक्ति की इस प्रक्रिया में वे कभी-कभी नुकीले और अनगढ़ शब्दों से भी काम लेती हैं। उन्हें इस बात पर ध्यान देना चाहिए ग़ज़ल ऐसी नाजुक़ काव्य विधा है जो हर लफ़्ज़ का बोझ नहीं उठा सकती। कुल मिलाकर अनामिका ने अपने इस संकलन के ज़रिए ग़ज़ल की विकास यात्रा में बेहतर योगदान दिया है। मैं उन्हें दिल से बधाई देता हूँ।
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