सोमवार, 16 मार्च 2026

गोपाल दास नीरज पर केंद्रित वाङमय पत्रिका

 

वाङमय पत्रिका गोपाल दास नीरज पर केंद्रित 

अलीगढ़ की त्रैमासिक पत्रिका 'वाङमय' ने शताब्दी स्मरण करते हुए गोपाल दास नीरज पर केंद्रित अंक प्रकाशित किया है। इस विशेषांक की अतिथि संपादक हैं डॉ शगुफ्ता नियाज़ और संपादक हैं डॉ एम फ़ीरोज़ अहमद। कालजयी कवि नीरज की रचनात्मकता को जानने समझने, काव्य मंचों पर उनके योगदान और सिने गीतकार के रूप में उनकी उपलब्धियों के आकलन के लिहाज से 392 पेज़ की यह एक बेहद महत्वपूर्ण कृति है।

हिंदी काव्य साहित्य के सबसे लोकप्रिय कवि गोपालदास सक्सेना नीरज का जन्म 4 जनवरी 1925 को हुआ था। अतिथि सम्पादक के अनुसार- "पद्मभूषण गोपालदास 'नीरज' जी की जन्मशती का यह पावन अवसर केवल एक तिथि का स्मरण नहीं, बल्कि शब्द और स्वर के उस महाकुंभ का उत्सव है जिसने आधी सदी से भी अधिक समय तक हिंदी काव्य-चेतना को आलोकित किया। 'वाङमय' का यह विशेषांक उनके विराट व्यक्तित्व, कालजयी कृतित्त्व और उन अनछुए ऐतिहासिक प्रसंगों को समर्पित है, जो अब तक साहित्य की मुख्यधारा की चर्चाओं से ओझल रहे थे।"


'वाङमय' के इस विशेषांक में नीरज पर मेरा भी एक लेख शामिल है-" ए भाइ ज़रा देखके चलो"। उसकी कुछ पंक्तियां मैं आपके लिए यहां पेश कर रहा हूं। .......... बच्चन की परंपरा में नीरज एकमात्र ऐसे कवि हैं जिसमें साहित्यिक गुणवत्ता और मंचीय कौशल एक साथ मौजूद हैं। लगातार सात दशकों तक हिंदी काव्य मंच पर कामयाब पारी खेलने का कीर्तिमान सिर्फ़ नीरज के पास है। नीरज ने कहा था- "नासमझ आदमी की ताली कविता को बरबाद कर देती है।" हिंदी काव्य मंच के साथ भी यही हुआ। कवि सम्मेलन घटियापन के शिकार हो गए। अपने चाहने वालों के लिए नीरज को घटिया मंचों पर भी जाना पड़ा। मगर कभी उन्होंने घटियापन का साथ नहीं दिया। उन्होंने हमेशा अपना स्तर बनाए रखा।

यह सच है कि कवि सम्मेलनों का कवि प्रसाद और निराला नहीं बन सकता। यह भी सच है कि कवि सम्मेलनों में ‘कामायनी’ नहीं 'मधुशाला' पढ़ी जाती है। फिर भी, जिस तरह साहिर और शैलेंद्र के योगदान को महज़ फ़िल्मी गीत कहकर नकारा नहीं जा सकता, ठीक उसी तरह नीरज की मंचीय प्रस्तुति के बावजूद उनके साहित्यिक पक्ष को अनदेखा नहीं किया जा सकता। नीरज के साहित्य में मीरा का दर्द है, सूर की प्यास है, तुलसी की विन्रमता है और इसी के साथ कबीर का फक्कड़न भी है। नीरज ने बौद्धिकता का मायाजाल रचने के बजाय भावनाओं की ऐसी उदात्त धारा प्रवाहित की जिसने हमारे मन-प्राणों को पवित्रता, शीतलता और ताज़गी से भर दिया।

नीरज को जानने और समझने के लिए आपको 'वाङमय' का यह विशेषांक पढ़ना चाहिए। इसमें कुछ ऐसे अनछुए पहलुओं को भी उद्घाटित किया गया है जो शोधार्थियों के लिए बेहद उपयोगी हैं।


नीरज ने स्वीकार किया था-"अपनी कविता द्वारा मनुष्य बनकर मनुष्य तक पहुँचना चाहता हूँ। रास्ते पर कहीं मेरी कविता भटक न जाए, इसलिए उसके हाथ में मैंने प्रेम का दीपक दे दिया है। प्रेम एक ऐसी हृदय-साधना है जो निरंतर हमारी विकृतियों का शमन करती हुई हमें मनुष्यता के निकट ले जाती है।"

नीरज से बढ़के और धनी कौन है यहाँ
उसके हृदय में पीर है सारे जहान की

इस बेमिसाल अंक के लिए संपादकीय टीम को मैं दिल से बधाई देता हूँ। आशा है यह विशेषांक के सभी काव्य प्रेमियों को पसंद आएगा।
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आपका : #देवमणि_पांडेय

सम्पादकीय सम्पर्क : 205- फेज-1, ओहद रेजीडेंसी, नियर पान वाली कोठी, दोदपुर रोड, सिविल लाइन, अलीगढ़-202002 मोबा : 7007606806
E-mail: vangmaya@gmail.com

इस अंक का मूल्य : 300/- रूपये
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