एहसासात : नरोत्तम शर्मा का ग़ज़ल संग्रह
नरोत्तम शर्मा की ग़ज़लें केवल शब्दों का जाल नहीं हैं, बल्कि वे जीवन के अनुभवों की एक जीती-जाती तस्वीर हैं। उनके ग़ज़ल संग्रह ‘एहसासात’ में ज़िंदगी के वे तमाम रंग मौजूद हैं जिन्हें हम अक्सर भागदौड़ में अनदेखा कर देते हैं। शर्मा जी के लिए ग़ज़ल सिर्फ एक विधा नहीं, बल्कि एक 'एहसास' है। वे ग़ज़ल के सौंदर्य को प्रकृति और प्रेम के साथ जोड़कर देखते हैं-
सर्दियों में धूप का एहसास होती है ग़ज़ल
प्रेमियों के हृदय का मधुमास होती है ग़ज़ल
नरोत्तम शर्मा की ग़ज़लें पढ़ते समय ऐसा लगता है मानो कोई अपना हमारे पास बैठकर ज़िंदगी के फ़लसफ़े सुना रहा हो। उन्होंने मुहब्बत की दहलीज़ लांघ कर ग़ज़ल को आम आदमी की दहलीज़ तक पहुँचाया है। उनके अनुसार, सृजन की प्रक्रिया पीड़ादायक है, लेकिन उसका परिणाम मधुर होता है। वे कविता रचने के उस 'मधुर संत्रास' को बख़ूबी समझते हैं-
जब तलक न शक्ल ले बेचैन रहता है हृदय
सृजन की पीड़ा, मधुर संत्रास होती है ग़ज़ल
आज के दौर में इंसान जो दिखता है, वह होता नहीं। नरोत्तम शर्मा ने समाज में व्याप्त पाखंड और 'मुखौटों' पर गहरा प्रहार किया है। वे आगाह करते हैं कि बाहरी चमक-धमक और माथे के चंदन पर भरोसा न करें, क्योंकि उसके पीछे 'विष' छुपा हो सकता है-
चिकनी चुपड़ी बातों, कपड़ों पर मत जाना
विष भी हो सकता है माथे के चन्दन में
वे कपड़ों और चिकनी-चुपड़ी बातों के पीछे छिपी क्रूरता को बेनक़ाब करते हैं और सत्य की परख का संकेत देते हैं -
चेहरा जो किसी शख्स का दिखता है सभी को,
अक्सर वो उसी शख्स का चेहरा नहीं होता।
शायर को इस बात का गहरा मलाल है कि समाज से 'शर्म' और 'ईमानदारी' लुप्त होती जा रही है। जहाँ चारों ओर झूठ और दगा हो, वहाँ सादगी से जीना भी किसी जंग से कम नहीं है-
हर तरफ झूठ, दगा, और बेवफ़ाई है
आज के दौर में जीना भी इक लड़ाई है
नरोत्तम शर्मा की ग़ज़लों में एक आम आदमी की बेबसी और उसकी ज़मीन से जुड़ी संवेदनाएँ भी हैं। वे घर न बना पाने के दर्द को स्वीकारते हैं, लेकिन 'घर' होने के अहसास को जीवित रखते हैं। वहीं, 'आँगन के चूजों का सूप बन जाना' उस सामाजिक निष्ठुरता को दर्शाता है जहाँ मासूमियत को सत्ता या स्वार्थ निगल जाता है-
गो बना पाया नहीं आज तलक मैं कोई घर
एक एहसास तो होता है कि घर होता है
कोई बना के उनका सूप पी गया होगा
वो चूजे, जो मेरे आँगन में आ के खेलते थे
तल्ख़ियों के बावजूद, नरोत्तम जी के यहाँ निराशा नहीं है। वे व्यक्ति को कर्मशील होने की प्रेरणा देते हैं। उनका मानना है कि ज्ञान की रोशनी तभी काम आती है जब आप स्वयं प्रयास का 'दीया' जलाएँ-
इल्म से रोशनी तो मिलती है
पर दिया ख़ुद जलाना पड़ता है
वे सिखाते हैं कि अगर इरादों में जोश हो, तो एक 'क़तरा' भी समंदर जैसा तूफ़ान पैदा कर सकता है-
जोश जिसमें न अगर हो तो समंदर क्या है
हो तो क़तरे में भी तूफाँ का असर होता है
नरोत्तम शर्मा का यह संग्रह संवेदनशीलता और साहस का अद्भुत मिश्रण है। उनकी भाषा सरल है लेकिन मारक है। वे जहाँ प्रेम की मधुरता बिखेरते हैं, वहीं समाज की विसंगतियों पर कड़ा प्रहार करने से भी नहीं चूकते। यह ग़ज़ल संग्रह आज के समय और समाज का एक आईना है-
किसी की आँख में अब शर्म का पानी नहीं है
यही है ज़िंदगी तो फिर कोई मानी नहीं है
नरोत्तम शर्मा की ग़ज़लों में मुहब्बत का गुलशन है मगर उन्होंने ग़ज़ल को आम आदमी के चूल्हे-चौके, आँगन की धूप और समाज के कड़वे सच से जोड़ने का नेक काम भी किया है। उनका यह ग़ज़ल संग्रह मात्र ग़ज़लों का गुलदस्ता नहीं, बल्कि आज के दौर का एक दस्तावेज़ भी है। इसमें जहाँ एक ओर प्रेम की कोमलता है, वहीं दूसरी ओर मुखौटों के पीछे छिपे चेहरों को बेनक़ाब करने का साहस भी है। नरोत्तम शर्मा की आवाज़ उस आम आदमी की आवाज़ है जो झूठ और फ़रेब के बाज़ार में अपनी मासूमियत बचाने की जद्दोजहद कर रहा है।
अगर आप ऐसी ग़ज़लों की तलाश में हैं जो रूह को छुएँ और ज़हन को झकझोर दें, तो यह संग्रह आपके लिए है। सर्दियों की गुनगुनी धूप जैसी ये ग़ज़लें आपको ज़िंदगी को एक नए नज़रिए से देखना सिखाएंगी। आस्था प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित इस किताब का मूल्य है 275 रूपये।
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आपका : देवमणि पांडेय 98210 82126
सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति बिल्डिंग, कन्या पाडा, फ़िल्मसिटी रोड, गोकुलधाम, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063


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