मंगलवार, 30 नवंबर 2021

चित्रनगरी संवाद मंच में ढब्बूजी उर्फ़ आबिद सुरती

 

चित्रनगरी संवाद मंच की अड्डेबाजी में ढब्बूजी

चित्रनगरी संवाद मंच की रविवार 28 नवम्बर 2021 की अड्डेबाजी में ख़ास मेहमान थे प्रतिष्ठित कथाकार, चित्रकार और कार्टूनिस्ट आबिद सुरती। 'धर्मयुग' के ढब्बूजी फेम आबिद सुरती की उम्रउम्र 86 साल है। हिंदी, उर्दू, गुजराती, अंग्रेजी आदि विभिन्न भाषाओं में उनकी 80 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। वे इतने चुस्त-दुरुस्त हैं कि उनकी ऊर्जा से नौजवानों को रश्क होता है।

ड्रॉपडेड फाउंडेशन के ज़रिए आबिद सुरती ने जल संरक्षण में कीर्तिमान कायम किया है। महानायक अमिताभ बच्चन ने केबीसी कार्यक्रम में उनके इस फाउंडेशन को दस लाख का डोनेशन दिया। इंद्रजाल कामिक्स के उनके सुपर हीरो बहादुर की तस्वीर अभिनेता शाहरुख ख़ान ने अपने घर में लगा रखी है।

आबिद सुरती के साथ गपशप का लुत्फ़ उठाने के लिए हमारे 15 रचनाकार कलाकार दोस्त हाज़िर हुए। आबिद जी ने बड़े रोचक तरीके से इंद्रजाल कामिक्स के अपने सुपर हीरो बहादुर की संकल्पना के बारे में बताया। यह भी बताया कि अपने इस सुपर हीरो को साकार करने के लिए कैसे उन्होंने डाकुओं के इलाक़े में जाकर उनकी कार्यशैली की जानकारी हासिल की।

लेखनी और ब्रश के दम पर बेलौस ज़िन्दगी जीने वाले आबिद सुरती अद्भुत लेखक हैं। उनकी एक चित्रकथा 'दौड़' पर राज कपूर फ़िल्म बनाना चाहते थे। इसके लिए कई बैठकें हुईं और यह सिलसिला बीस साल चला। अंततः राज कपूर के निधन के साथ यह अध्याय बंद हो गया। राज कपूर की शख़्सियत और कार्यशैली के बारे में उनके संस्मरण बहुत दिलचस्प थे।

आबिद जी का बचपन दक्षिण मुंबई के डोंगरी मोहल्ले में बीता। बचपन में वे फुटपाथ पर सोते थे। उनके कुछ सहपाठी ऐसे भी थे जो आगे चलकर बहुत बड़े माफिया और डान बने। अपने आत्मकथात्मक उपन्यास 'सूफ़ी' में उन्होंने इन घटनाओं का दिलचस्प वर्णन किया है। उनकी यह किताब हिंदी में वाणी प्रकाशन और अंग्रेजी में पेंगुइन से प्रकाशित हुई।  एक ज़माने में उनकी 'काली किताब 'भी बेहद चर्चित रही है। इस किताब का सात भाषाओं में अनुवाद हुआ।

चित्रनगरी संवाद मंच की  अड्डेबाजी में आबिद सुरती के शिरकत करने वालों के नाम हैं-

देवयानी जोशी, नवीन जोशी 'नवा', मोइन अहमद देहलवी, अतुल कुमार वी, रवींद्र यादव, भारतेंदु विमल, के पी सक्सेना, संजीव निगम, प्रदीप गुप्ता, अनिल गौड़, राजेश भट्ट, दिनेश दुबे, देवमणि पांडेय और दीनदयाल मुरारका।

चित्रनगरी संवाद मंच के अड्डे पर रचनाकारों, कलाकारों और काव्य प्रेमियों का हमेशा स्वागत है।गपशप का लुत्फ़ उठाने के लिए आप भी पधारिए। पता है-

इडलिश कैफ़े, होटल रॉयल चैलेंज के सामने, निकट ओबेरॉय माल, फ़िल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, शाम 6:00 से 8:00 बजे।

आपका-
देवमणि पांडेय : 98210-82126

खटराग : केपी सक्सेना 'दूसरे' का काव्य संग्रह



नहीं सिधाई की बहुत, इस युग में दरकार


कवि, लेखक, व्यंग्यकार के.पी. सक्सेना 'दूसरे' के नए काव्य संग्रह का नाम है खटराग। उनके इस खटराग में कई काव्य विधाएं शामिल हैं। अपनी बात में उन्होंने लिखा है- "काव्य लेखन मेरे लिए न तो शब्दों की जादूगरी है और न ही वैचारिक जुगाली। यह आंसुओं का अनुवाद है जो अमूमन व्यंग्यात्मक शैली में दोहा, मुक्तक, क्षणिका या अतुकांत कविता के रूप में काग़ज़ पर अवतरित होने के लिए आतुर हो उठता है। कविता वक़्त के साथ अपना रंग बदलती है। जब हम ख़ुश होते हैं तो कविता झूमने लगती है और जब हम उदास होते हैं तो सर टिकाने के लिए एक कांधे की तरह हाज़िर हो जाती है।"


अपनी अनुभूतियों के रूपांतरण के लिए कवि केपी सक्सेना ने बोलचाल की भाषा का इस्तेमाल किया है। इसलिए उनकी अभिव्यक्ति सहजता से पाठकों तक पहुंच जाती है। किसी भी विधा में बात कहते समय वे यथार्थ का दामन कभी नहीं छोड़ते। उनके दोहे 'गागर में सागर' युक्ति को चरितार्थ करते हैं। उनका कहना है-


लघुकथा से बात बन जाए अगर,

क्यों पुलिंदों में मगज़मारी करें l 

सार जीवन का छुपा दो लाइनों में 

हम तो दोहों की तरफ़दारी करें II


केपी सक्सेना की दोहावली में अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों शामिल हैं। उनकी अभिव्यक्ति के प्लेटफार्म पर त्रेता, द्वापर, नीति, अनीति, प्रेम, प्रकृति, चुनाव, राजनीति, धर्म, संस्कृति आदि विविध विषय दिखाई देते हैं। मिसाल के लिए उनके चंद दोहे देखिए- 


युग कोई भी हो रहा, दगा न पूजा जाय। 

नाम विभीषण आज भी, कुल में रखा न जाय II


वह भी मां स्तुत्य है, जो दे सुत को श्राप। 

कैकेई कारण बनी, रावण मरा ना आप II 


छल से जब एकलव्य का, लिया अंगूठा दान। तब ही से जग में घटा, गुरुओं का सम्मान II


नहीं सिधाई की बहुत, इस युग में दरकार।

सभी काटते छांट कर, पहले सीधी डार II


जो धमकी से ना सधे, वो साधे मुस्कान। 

झरना देखो प्रेम से, रेत रहा चट्टान II


सदा काम आवे नहीं, कोरा पुस्तक ज्ञान। 

जीवन से जो सीख ले, होय सफल इंसान II


'काना' कहकर क्यों करें, काने का अपमान।

'समदर्शी' कह देखिए, करे निछावर जान II


रचनात्मकता को धार देने के लिए व्यंग्य का लहजा असरदार साबित होता है। अपने युग के यथार्थ की अभिव्यक्ति के लिए केपी सक्सेना इस लहजे का भी बढ़िया इस्तेमाल करते हैं-


ना कालिख, ना गालियां, ना जूतम-पैज़ार। 

आख़िर दिनभर मीडिया, कैसे करे प्रचार II 


उनकी महिमा आज तक, सका न कोई भेद।

बालों को काला करें, धन को करें सफ़ेद II


केपी सक्सेना के खटराग में 63 मुक्तक भी शामिल हैं। इन मुक्तकों में भी उन्होंने अपने समय और समाज के सच को बयान करने में कोई कोताही नहीं की है। सीधी साधी भाषा में और सहज सरल लहजे में वे जो कुछ भी कहना चाहते हैं वह आसानी से पाठकों तक पहुंच जाता है-


बंदिशें कुछ तो ढील दे मौला, 

ख़्वाहिशों को ज़मीन दे मौला। 

देख दिन की नमाज़ भी पढ़ ली, 

अब तो शामें हसीन दे मौला II


10 मार्च 1947 में सतना, मध्य प्रदेश में जन्मे केपी सक्सेना कृषि विज्ञान तथा हिंदी में स्नातकोत्तर हैं। उन्होंने क़ानून की उपाधि भी प्राप्त की है। 35 सालों तक भारतीय खाद्य निगम में सेवा के पश्चात उन्होंने सन् 2004 में ऐच्छिक सेवानिवृत्त ले ली और स्वतंत्र लेखन करने लगे। केपी सक्सेना एक दृष्टि संपन्न रचनाकार हैं। अपने आसपास की घटनाओं, माहौल और जीवन पर उनकी हमेशा नज़र रहती है। इसलिए वे अपनी रचनाओं में समय के सच को बयान करते हैं। अभिव्यक्ति की यही ईमानदारी उन्हें एक उम्दा क़लमकार के रूप में स्थापित करती है। हमारी मंगल कामना है कि उनकी यह लेखनी इसी तरह हमेशा सक्रिय रहे। वे साहित्य के गुलशन में विविध रंगी फूल खिलाते रहें और जीवन की बग़िया को महकाते रहें। 


बीएफसी पब्लिकेशन, गोमती नगर, लखनऊ से प्रकाशित इस पुस्तक का मूल्य है 200 रुपए। आप मोबाइल नंबर 95840 25175 और 95944 80055 पर कवि के.पी. सक्सेना 'दूसरे' से संपर्क कर सकते हैं।



आपका-

देवमणि पांडेय 


सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063 मो : 98210 82126


मैं उर्दू बोलूं : अजय सहाब का शेरी मज्मूआ

 



अंधे परख रहे यहां मेयारे रोशनी 

शायर अजय सहाब का पहला शेरी मज्मूआ 'उम्मीद' सन् 2015 में शाया हुआ था और ख़ूब मक़बूल रहा। हाल ही में उनका दूसरा शेरी मज्मूआ 'मैं उर्दू बोलूं' मंज़रे आम पर आया है। इसके ज़रिए भी उन्होंने अपनी रचनात्मकता के फ़न और हुनर का जलवा दिखाया है। क्लासिकल ग़ज़ल की जो विरासत हमें मीर ओ ग़ालिब से हासिल हुई है उसे बड़ी ख़ूबसूरती से अजय सहाब ने आगे बढ़ाया है-


वो तअल्लुक़ तेरा मेरा, था कोई बुत मोम का

फ़ुरक़तों की आग में, अपना वो रिश्ता जल गया 


हम गए थे उनसे करने अपनी हालत का गिला 

उनके चश्मे पुरशरर से सारा शिकवा जल गया


साहिर उनके प्रिय शायर हैं। साहिर की तरह सहाब के पास भी अपने तजुर्बात के इज़हार के लिए धारदार तेवर है। एहसास की गहराई है। बोलती हुई मीठी ज़बान है। इसलिए सहाब की ग़ज़लें और नज़्में सीधे दिल के दरवाजे पर दस्तक देती हैं और हमारी भावनाओं के साथ एक अंतरंग रिश्ते में ढल जाती हैं।


मग़रिब से आ गई यहां तहज़ीबे बरहना 

मशरिक तेरी रिवायती पाकीज़गी की ख़ैर


अंधे परख रहे यहां मेयारे रोशनी 

दीदावरे हुनर तेरी, दीदावरी की ख़ैर


सहाब के पास शायरी का जो सरमाया है वह रिवायती भी है और जदीद भी है। उनकी सोच का कैनवास बहुत वसीह है। इसमें मुहब्बत की धड़कन है। सोच की लहरें हैं। फ़िक्र के उफ़क़ पर ज़िन्दगी की सतरंगी धनक है-


तेज तूफ़ान में उड़ते हुए पत्ते जैसा 

ज़िन्दगी तेरा मुक़द्दर भी है तिनके जैसा


तुमको फ़ुर्सत ही नहीं उसको पहनके देखो

अपना रिश्ता है जो उतरे हुए गहने जैसा


सहाब दौरे हाज़िर के मसाइल और सवालात को अल्फ़ाज़ में ढालने का हुनर जानते हैं। यही वजह है कि उनकी शायरी को हर तरह के पाठक और सामयीन पसंद करते हैं। सहाब के पास साफ़ नज़रिया है। लफ़्ज़ों को बरतने का सलीक़ा है। बिना किसी अवरोध के उनके सोच की कश्ती जज़्बात की झील में तैरती हुई नज़र आती है-


या तो सच कहने पर सुक़रात को मारे न कोई

या तू संसार से सच्चाई को वापस ले ले 


और कितनों के सफ़ीने यहां डूबेंगे ख़ुदा 

इस समंदर से तू गहराई को वापस ले ले


सहाब एक ऐसे मोतबर शायर हैं जिनकी शायरी अदबी रिसालों में शाया होती है। संगीत की स्वर लहरियों में गूंजती है। मुशायरों के मंच पर अवाम से गुफ़्तगू करती है। सहाब को उर्दू से बेइंतहा मुहब्बत है। उनकी उर्दू इतनी नफ़ीस है कि उससे बड़े-बड़े शायरों को रश्क हो सकता है। 


लिखा है आज कोई शेर मैंने उर्दू में 

ये मेरा लफ़्ज़ भी इतरा के चल रहा होगा


"अल्फ़ाज़ और आवाज़" स्टेज कार्यक्रम के ज़रिए भी अजय सहाब देश विदेश में उर्दू ज़बान और उर्दू अदब का परचम लहराते हैं। यूट्यूब पर उनके इस कार्यक्रम के करोड़ों दर्शक हैं। 


जैसे पुराना हार था रिश्ता तेरा मेरा 

अच्छा किया जो रख दिया तूने उतार के 


दिल में हज़ार दर्द हों, आंसू छुपा के रख 

कोई तो कारोबार हो, बिन इश्तेहार के


फ़िक्र की आंच, एहसास की शिद्दत और सोच की गहराई के ज़रिए सहाब ने अपने शायराना सफ़र को एक खूबसूरत मुक़ाम तक पहुंचाया है। हमारी दुआ है कि उनकी तख़लीक़ का यह सफ़र मुसलसल इसी तरह कामयाबी की नई मंज़िलें तय करता रहे। रायपुर छ.ग. में अजय साहब एक सरकारी महकमे में उच्च अधिकारी हैं। हमें उनकी इस ख़्वाहिश का एहतराम करना चाहिए-


मेरे ओहदे से, न क़द से, न बदन से जाने

मुझको दुनिया मेरे मेयार ए सुख़न से जाने


प्रकाशक : विजया बुक्स, 1/10753 सुभाष पार्क, नवीन शाहदरा, दिल्ली 110032

क़ीमत 295/- रूपये 


▪▪▪▪▪


आपका-

देवमणि पांडेय 


सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063 मो : 98210 82126


बुधवार, 3 नवंबर 2021

सफ़र इक ख्वाब का : अभिलाष का काव्य संग्रह

तेरा ख़याल ही काफी है उम्र भर के लिए

'इतनी शक्ति हमें देना दाता' इस लोकप्रिय प्रार्थना गीत के गीतकार अभिलाष का काव्य संग्रह 'सफ़र इक ख्वाब का' प्रकाशित हुआ है। इसमें अभिलाष की ग़ज़लें और नज़्में शामिल हैं। निर्माता-निर्देशक अभिनेता धीरज कुमार के अनुसार यह एक ऐसे कवि का सफ़रनामा है जो पिछले 42 सालों से मुंबई की माया नगरी में क़लम के सहारे अपने वजूद की हक़ीक़त तलाश कर रहा था। अभिलाष की रचनाओं में वही ताज़गी, सादगी और फ़िलासफ़ी है जो उनके निजी जीवन में भी झलकती रही।

गीतकार अभिलाष का जन्म 13 मार्च 1946 को दिल्ली में हुआ। दिल्ली में उनके पिता का व्यवसाय था। वे चाहते थे कि अभिलाष व्यवसाय में उनका हाथ बटाएं। लेकिन ऐसा संभव नहीं हुआ। छात्र जीवन में बारह साल की उम्र में अभिलाष ने कविताएं लिखनी शुरू कर दी थीं। मैट्रिक की पढ़ाई के बाद वे मंच पर भी सक्रिय हो गए। उनका वास्तविक नाम ओम प्रकाश कटारिया है। उन्होंने अपना तख़ल्लुस 'अज़ीज़' रख लिया। ओमप्रकाश' अज़ीज़' के नाम से उनकी ग़ज़लें, नज़्में और कहानियां कई पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं। 'अज़ीज़' देहलवी नाम से अभिलाष ने मुशायरों में शिरकत की। मन ही मन साहिर लुधियानवी को अपना उस्ताद मान लिया।

दिल्ली के एक मुशायरे में साहिर लुधियानवी पधारे। नौजवान शायर 'अज़ीज़' देहलवी ने उनसे मिलकर उनका आशीर्वाद लिया। साहिर साहब को कुछ नज़्में सुनाईं। साहिर ने कहा- मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मैं तुम्हारे मुंह से अपनी नज़्में सुन रहा हूं। तुम अपना रास्ता अलग करो। ऐसी ग़ज़लें और नज़्में लिखो जिसमें तुम्हारा अपना रंग दिखाई पड़े। 

इस किताब की नज़्में पढ़ते हुए साहिर का अंदाज़ ए बयां याद आना स्वाभाविक है। अभिलाष जी की नज़्म 'क़ैद' की कुछ लाइनें देखिए- 


सिलसिले कितने बने और बन के टूट गए 

मैं तेरी याद की ज़िंदां से रिहा हो न सका 

उम्र भर ग़म में जला फिर भी तक़ाज़ा मुझसे 

तेरी इक पल की मुहब्बत का अदा हो न सका


साहिर का मशवरा मानकर ओमप्रकाश अज़ीज़ जब गीतकार अभिलाष बन गए तो उनकी नज़्मों में उनका अपना रंग नज़र आया। 'सफ़र इक ख़्वाब का' नज़्म की चंद लाइनें देखिए-


शानो-शौक़त जिसे महलों की न रास आई कभी 

ज़िन्दगी अपनी बसर जिसने की नादारों में 

पा लिया जिसने ख़ुद अपने को मैं वो गौतम हूं

क़ैद जो हो न सका, ऐश की दीवारों में 


मैं ही गांधी हूं, अहिंसा का निगहबान हूं मैं

मुझको पाओगे सदाक़त के तरफ़दारों में



अभिलाष की ग़ज़लों में दिल की जो दुनिया है उसमें मुहब्बत के सभी मौसम शामिल हैं। चंद अशआर देखिए-


सुकून ए दिल के लिए, राहत ए जिगर के लिए

तेरा ख़याल ही काफ़ी है उम्र भर के लिए 


न सही गाता हुआ, गुनगुनाता मिल जाता

कहीं तो शख़्स कोई मुस्कुराता मिल जाता 


किस क़दर दुश्वार है ये ज़िन्दगी का रास्ता

आंसुओं से हो रहा है, तय ख़ुशी का रास्ता


जिस गली में भूल आया हूं मैं अपनी ज़िन्दगी 

पूछता हूं हर किसी से उस गली का रास्ता 


पलकों पर आंसुओं का जनाज़ा लिए हुए 

दिल घुट रहा है बारे तमन्ना लिए हुए 


नज़दीक जाके देखा तो महसूस ये हुआ 

हर आदमी है चेहरे पर चेहरा लिए हुए 


ख़याल आता है मुझको कि मैं भी ज़िंदा हूं

तेरे ख़याल की गलियों से जब गुज़रता हूं 


इस काव्य संग्रह में अभिलाष जी के दस क़त्आत भी शामिल हैं। उनका एक क़त्आ देखिए- 


गंगा जमुना का नीर हो जाता 

सारी दुनिया की पीर हो जाता 

अर्थ समझा न अपने होने का 

वरना, मैं भी कबीर हो जाता


अपनी रचनाओं में गीतकार अभिलाष ने अपने अनुभव, सुख-दुख, सोच और सरोकार को इस तरह अभिव्यक्त किया है कि वह पढ़ने वालों को बड़ी जल्दी सम्वेदना की डोर में बांध लेता है। उन्होंने जिस ज़मीन पर अपना सफ़र तय किया है और जिस आसमान को अपना हमसफ़र बनाया है उसी का अक्स अपनी रचनाओं में दिखाया है। उन्होंने संघर्ष का एक लंबा रास्ता तय किया है। इस रास्ते में फूल कम है कांटे ज़्यादा हैं। अभिलाषा ने पलकों पर आंसुओं का जनाज़ा लिए हुए अपना सफ़र तय किया है। उनकी ग़ज़लों और नज़्मों में जो नमी है, जो तरलता है वह पाठकों के अंतर्मन को भिगो देती है। उम्मीद है कि अभिलाष का यह संकलन पाठकों को पसंद आएगा।

 


फ़िल्मसिटी रोड गोरेगांव पूर्व के इडलिश कैफ़े में 19 मार्च 2020 को चित्र नगरी संवाद मंच की अड्डेबाजी में सिने गीतकार अभिलाष की मौजूदगी ने हमेशा के लिए इस बैठक को यादगार बना दिया।


27 सितंबर 2020 को अभिलाष जी का स्वर्गवास हो गया। अपने गीतों के जरिए वे हमेशा हम सब की स्मृतियों में ज़िंदा रहेंगे। 


गीतकार अभिलाष का यह काव्य संग्रह  'सफ़र इक ख्वाब का' समाज विकास मंच, गोकुल धाम, गोरेगांव पूर्व के महामंत्री दिवेश यादव के सौजन्य से प्राप्त हुआ। इस सुंदर उपहार के लिए दिवेश जी का शुक्रिया।

 

आपका-

देवमणि पांडेय 


सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063 मो : 98210 82126


प्रकाशक : विजय जाधव, सृजन प्रकाशन गोमती, एफ-2, 2:4, सेक्टर 8ब, सीबीडी बेलापुर, नई मुंबई 400614

फ़ोन : 97 69 66 83 69


--------- ---------

गुरुवार, 23 सितंबर 2021

सुहबतें फ़क़ीरों की : रक़ीब का ग़ज़ल संग्रह


 सुहबतें फ़क़ीरों की : रक़ीब का ग़ज़ल संग्रह

सतीश शुक्ला 'रक़ीब' नेकदिल इंसान और उम्दा शायर हैं। शायरी की शाहराह पर कई सालों के मुसलसल सफ़र के बाद हाल ही में उनका पहला शेरी मज्मूआ मंज़रे-आम पर आया है। इसका नाम है 'सुहबतें फ़क़ीरों की'।


हर ख़ुशी क़दम चूमे कायनात की उसके 

रास आ गईं जिसको सुहबतें फ़क़ीरों की 


सतीश शुक्ला 'रक़ीब' ने अपने फ़िक्र ओ फ़न को उसी रास्ते का हमवार बनाया है जो रास्ता मीर ओ ग़ालिब से चलता हुआ हम सब तक आया है। इस रिवायती शायरी में वे अपना रंग घोलने में कामयाब हुए हैं -


तुम्हारे शहर में मशहूर नाम किसका था 

मिरा नहीं था तो फिर एहतराम किसका था


वो कल जो बज़्मे - सुखन में सुनाया था तूने 

बहुत हसीन था लेकिन कलाम किसका था


रक़ीब के इज़हार में एहसास की ख़ुशबू है। उनकी ग़ज़लों में मुहब्बत की धनक मुस्कुराती हुई नज़र आती है। वे मुहब्बत की इस जानी पहचानी दुनिया में और कोई न कोई दिलचस्प पहलू निकाल ही लेते हैं-


आपसे तुम, तुमसे तू, कहने लगे 

छू के मुझको, मुझको छू, कहने लगे 


पहले अपनी जान कहते थे मुझे 

अब वो जाने आरज़ू कहने लगे 


रक़ीब के दिल की दुनिया में जज़्बात के ऐसे ख़ुशरंग नज़ारे हैं जो सब को भाते हैं। वहां मुहब्बत का एक गुलशन आबाद है। इस गुलशन में हवाएं मुहब्बत की ख़ुशबू बांटती हैं-


हवा के दोश पे किस गुलबदन की ख़ुशबू है 

गुमान होता है सारे चमन की ख़ुशबू है


अपने जज़्बात के इज़हार के लिए रक़ीब ने उर्दू ज़बान का ख़ूबसूरत इस्तेमाल किया है। उनकी उर्दू आम बोलचाल की उर्दू है। ज़बान से उनका जो रिश्ता है उसे आप उन्हीं के एक शेर से समझ सकते हैं-


हर एक लफ़्ज़ पे वो जां निसार करता है

अदब नवाज़ है उर्दू से प्यार करता है 


भारतीय साहित्य संग्रह नेहरू नगर, कानपुर से प्रकाशित इस ग़ज़ल संग्रह का मूल्य है 400 रूपये। ग़ज़लों की इस दिलकश किताब के लिए सतीश शुक्ला रक़ीब को बहुत-बहुत बधाई। उम्मीद है कि उनकी तख़लीक़ का यह सफ़र इसी ख़ूबसूरती से आगे भी जारी रहेगा। 


आपका- 

देवमणि_पांडेय 


सम्पर्क : सतीश शुक्ला 'रक़ीब'

98921 65892 & 99675 14139

सोमवार, 8 फ़रवरी 2021

आधारशिला : कवि मंगलेश डबराल पर केंद्रित


आधारशिला : कवि मंगलेश डबराल पर विशेष

अपने-अपने दौर में बड़ी कविता उन्हीं लोगों ने लिखी है जो कविता को जीवन के बीच खोजते रहे। कबीर, मीरा, निराला, मुक्तिबोध आदि कवियों में समय और संवेदना का बहुत अंतराल है पर अगर कबीर और मीरा की कविता हमें आज भी विचलित कर देती है और इतनी पुरानी होने के बावजूद आधुनिक और आवश्यक लगती है तो इसलिए कि उन्होंने कविता को जीवन से दूर और अलग नहीं माना और वे उस कविता को साहस के साथ धरती पर उतार लाए जो एक धुंधली शक्ल में हवा में तैर रही थी।

यह कहना है हिंदी के  दिवंगत कवि  मंगलेश डबराल का। आधारशिला के जनवरी 2021 अंक  में कवि मंगलेश डबराल पर विशेष सामग्री दी गई है। साहित्य, समय और समाज के बारे में मंगलेश डबराल जी से की गई बातचीत बहुत महत्वपूर्ण और सार्थक है। मंगलेश जी के अनुसार कविता के जो बुनियादी कथ्य रहे हैं उनमें एक यह है कि हम अपने जीवन, अस्तित्व और नियति के सवालों का सामना करें।

मंगलेश जी का यह कहना भी ग़ौरतलब है कि आज़ादी के बाद से हिंदी में जो भी सार्थक कविता लिखी गई है उसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह चीखना चिल्लाना तो दूर, बोलती भी बहुत कम है पर कहती बहुत कुछ है और इस कहने में ही वह सत्ता प्रतिष्ठान से अपने बुनियादी विरोध को दर्ज कर देती है।

आधारशिला के इस अंक में शामिल कहानियां, कविताएं, फ़िल्म समीक्षा, आलेख और अन्य रचनाएं भी अच्छी और पठनीय हैं।

उल्लेखनीय है कि आधारशिला के प्रधान संपादक दिवाकर भट्ट विदेशों में हिन्दी साहित्य और हिंदी भाषा के प्रचार प्रसार के लिए कटिबद्ध हैं। वे हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा बनाने के अभियान से भी जुड़े हैं।

सम्पर्क का पता है-

आधारशिला प्रधान : संपादक दिवाकर भट्ट
बड़ी मुखानी, हल्द्वानी, नैनीताल (उत्तराखंड)- 263 139 फ़ोन : 98970 872 48 , 86501 636 23

आपका-
देवमणि पांडेय

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, 
कन्या पाडा, गोकुलधाम, फ़िल्मसिटी रोड, 
गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063
98210 82126

---- ---- ---- ----- ---- 

रविवार, 7 फ़रवरी 2021

पुस्तक भेंट करने की परंपरा : रोचक क़िस्से


 पुस्तक भेंट करने की परंपरा

आयोजन शुरू होने से पहले लेखक महोदय अपनी कार की डिक्की में सौ डेढ़ सौ किताबें लेकर पहुंच गए। उन्होंने नाम पूछ पूछ कर लोगों को किताबें भेंट करनी शुरू कर दीं। एक किताब कथाकार सूरज प्रकाश को भी प्राप्त हुई जिस पर लिखा था- 'सूरज प्रकाश को सप्रेम भेंट'। थोड़ी देर बाद कुछ लोग और आ गए तो लेखक महोदय यह भूल गए कि किसको किताब दी थी और किसको नहीं। उन्होंने सूरज प्रकाश से दोबारा पूछा- आपका नाम ? सूरज प्रकाश ने मुस्कुराकर जवाब दिया- रशीद ख़ान। उन्होंने एक किताब पर लिखा- 'रशीद खान को सप्रेम भेंट' और सूरज प्रकाश को दोबारा किताब पकड़ा दी। 


कल शाम हम लोग फ़िल्म सिटी रोड, गोरेगांव पूर्व के फिएस्टा रेस्टोरेंट में कथाकार सूरज प्रकाश की अगुवाई में अड्डेबाज़ी के लिए बैठे थे। हमारे साथ शायर राजेश राज़ और कवि राजू मिश्रा भी मौजूद थे। हम लोगों के बीच पुस्तक भेंट करने की संस्कृति पर मज़ेदार चर्चा हुई।


क़िस्सा शायर बाक़र मेहंदी का


उर्दू के जाने-माने शायर और नक़्काद बाक़र मेहंदी के घर जाकर एक नौजवान ने उनको अपना नया काव्य संग्रह भेंट किया। बाक़र मेहंदी ने उलट पुलट कर दो तीन पन्ने देखे। फिर उस किताब को खिड़की से बाहर फेंक दिया। नौजवान हैरत से बोला- यह आपने क्या किया ? बाक़र मेहंदी बोले- जब तुम अपना काम कर रहे थे तो मैंने तुम्हारे काम में कोई दख़ल नहीं दिया। अब मैं अपना काम कर रहा हूं तो तुम क्यों एतराज़ कर रहे हो। 

 

क़िस्सा शायर सरदार जाफ़री का


भारतीय ज्ञानपीठ अवार्ड से सम्मानित शायर सरदार जाफ़री एक मुशायरे में दिल्ली गए थे। एक शायर ने उन्हें अपना शेरी मज्मूआ भेंट किया। दूसरे दिन वह शायर किसी काम से चांदनी चौक गया तो फुटपाथ पर रद्दी की दुकान पर अपनी वही किताब देखी। उठाकर देखा तो उसमें वह पन्ना भी सही सलामत था जिस पर उसने सरदार जाफ़री का नाम मुहब्बत के साथ लिखा था।


शायर ने फ़ोन किया और शिकायत की। सरदार जाफ़री ने जवाब दिया- मेरे घर में चार ही किताबें रखने की जगह है। मीर और ग़ालिब का दीवान है। कबीर और मीरा का काव्य संग्रह है। अब आप ही बताइए कि इनमें से मैं कौन सी किताब को बाहर निकाल दूं और आप का काव्य संग्रह घर में रखूं। शायर खामोश हो गया। 


इस मामले में हिंदी के समालोचक रामविलास शर्मा का नज़रिया ग़ौरतलब है। जब कोई रचनाकार उन्हें किताब भेंट करता तो वे तुरंत उसे वापस कर देते। वे कहते थे- "मुझे किताब ख़रीद कर पढ़ने की आदत है मैं आपकी किताब ख़रीद कर पढ़ लूंगा।"


अब आप ख़ुद ही यह तय कीजिए कि आपको अपनी नई नवेली किताब किसे भेंट करनी है और किसे नहीं।


आपका-

देवमणि पांडेय


सम्पर्क: बी-103, दिव्य स्तुति, 

कन्या पाडा, गोकुलधाम, 

फ़िल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, 

मुम्बई-400063, M : 98210 82126


नौजवान दोस्तो! तानसेन नहीं कानसेन बनिए

अपना भी कोई सानी रख

हिंदी के कई नौजवान कवि किसी गोष्ठी में जाते हैं तो सिर्फ़ सुनाने की फ़िराक़ में रहते हैं। दूसरा कवि क्या सुना रहा है, उस पर ध्यान नहीं देते। इनमें कई ऐसे भी होते हैं जो अपनी कविता सुना कर धीरे से खिसक भी जाते हैं। ऐसी ही एक काव्यगोष्ठी में कवयित्री-अभिनेत्री हेमा चंदानी अंजुलि ने एक ग़ज़ल पढ़ी, जिसमें एक शेर यह भी था -

अपने को तन्हा ना कर ,
अपना भी कोई सानी रख.

गोष्ठी की समाप्ति पर इस शेर के लिए मैंने हेमा चंदानी को बधाई दी। मेरी नज़र में काव्य गोष्ठी कविता की एक कार्यशाला होती है जिसमें एक सजग रचनाकार कुछ न कुछ ज़रूर सीखता है। वह अपने बड़े से भी सीख सकता है और अपने छोटे से भी सीख सकता है। हेमा चंदानी से मैं सीनियर हूं, लेकिन मैंने उनसे यह सीखा कि शायरी में 'सानी' शब्द का कितना ख़ूबसूरत इस्तेमाल किया जा सकता है। अब आइए इस शेर के बारे में थोड़ी सी गुफ़्तगू की जाए।

यह एक सीधा सादा शेर है जिसमें मशविरा दिया गया है कि अकेले रहना ठीक नहीं, किसी को अपना साथी बनाओ। कुछ ऐसा ही कभी मैंने भी अपने एक शेर में कहा था-

रहोगे कब तलक तन्हा किसी के अब तो हो जाओ
बशर की ज़िंदगानी तो फ़क़त दो-चार दिन की है

हेमा जी के शेर का हुस्न बस एक लफ़्ज़ 'सानी' में समाया हुआ है। यानी आपका सानी या साथी कैसा होना चाहिए।

(1) सानी का अर्थ है जोड़ीदार। एक मुहावरा है- "अमुक का कोई सानी नहीं है"। यानी अमुक जी बेजोड़ हैं। तो आपको एक ऐसा दोस्त बनाना है जो बेजोड़ हो।

(2) ग़ज़ल के ऊपर वाले मिसरे को ऊला कहते हैं और नीचे वाले मिसरे को सानी कहते हैं । यानी आप ऊला हैं और आपको एक सानी यानी जोड़ीदार चाहिए। ऊला और सानी मिसरे में रब्त यानी गहरा रिश्ता होना ज़रूरी है तभी शेर मुकम्मल होता है। जैसे दोनों हाथ की हथेलियों को आप मिलाते हैं तो नमस्कार की मुद्रा बन जाती है। या दोनों हाथ टकराते हैं तो ताली की आवाज़ सुनाई पड़ती है। यानी दोनों हाथ एक दूसरे के जोड़ीदार हैं और उनमें रब्त भी है।

(3) शायरी की रिवायत के अनुसार सानी मिसरा हमेशा ऊला से बेहतर होना चाहिए। यानी आप जिससे दोस्ती करना चाहते हैं वह आप से बेहतर हो। आपसे ज़्यादा समझदार हो कि आप उससे कुछ सीख सकें। तो अगर आप अब तक ऊला की तरह अकेले हैं तो आप अपना कोई सानी तलाश कीजिए। अगर आपको अपना सानी मिल गया तो आप एक ग़ज़ल के शेर की तरह मुकम्मल हो जाएंगे।

(4) यही ज़िन्दगी का दर्शन है जो हेमा चंदानी के शेर से ध्वनित हो रहा है। यानी इस शेर में सपाट बयानी नहीं है। इस शेर में जो व्यंजना है अगर आप उसको समझ पाते हैं तो यह शेर आपको बहुत अच्छा लगेगा।


किसी काव्यगोष्ठी में जाने का शऊर और सलीक़ा यही है कि आप वहां से कम से कम दो लाइन तो अपने साथ लेकर आएं। आप हमेशा तानसेन यानी सुनाने वाला मत बनिए। आप अच्छे कानसेन यानी श्रोता भी बनिए तभी आप कुछ सीख सकेंगे। अंत में मैं फिर से कवयित्री हेमा चंदानी को बधाई और शुभकामनाएं देता हूं कि वे इसी तरह बेहतरीन शेर कहती रहें।

आपका-
देवमणि पांडेय

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति,
कन्या पाड़ा, गोकुलधाम, फ़िलसिटी रोड, 
गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 
मो : 98210-82126

शुक्रवार, 22 जनवरी 2021

सुलगते मौसम में इमरोज़ आलम

सुलगते मौसम में इमरोज़ आलम

इमरोज़ आलम का शायराना मिज़ाज उनके चेहरे पर तबस्सुम के गुल खिलाता है। यह तबस्सुम उनकी शख़्सियत में चार चांद लगाता है और काव्य रसिकों को उनके क़रीब लाता है। इमरोज़ आलम में शायर होने की सारी ख़ूबियां मौजूद हैं। जोश है, जज़्बा है और जुनून है। उनका पहला शेरी मजमूआ “सुलगते मौसम में” जब मंज़रे आम पर आया तो उन्होंने हास्य कलाकार जॉनी लीवर से पुस्तक का लोकार्पण कराया। 

इमरोज़ आलम एक अलग ही राह के मुसाफ़िर हैं। मगर उनकी शायरी कभी इक़बाल की तरह सोते हुए को जगाती है। कभी साहिर लुधियानवी की तरह ख़ुद से बतियाती है। कभी वो फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के लहजे में क्रांति की मशाल जलाते हैं और कभी अहमद फ़राज़ के रंग में डूब कर मुहब्बत की ग़ज़ल सुनाते हैं - 

अंदेशा बिछड़ जाने का होता भी बहुत है
ऐ जान मगर तुझपे भरोसा भी बहुत है

इमरोज़ आलम की शायरी में ख़ूबसूरत मंज़रकशी है। यही ख़ासियत उनमें स्क्रिप्ट राइटर बनने का ख़्वाब जगाती है। उन्हें पूरा यक़ीन है कि एक दिन उनकी भी मेहनत रंग लाएगी और यह फ़िल्म इंडस्ट्री सलीम जावेद की तरह उन्हें भी सर आंखों पर बिठाएगी। 

इमरोज़ आलम की शायरी में मुहब्बत के अफ़साने पोशीदा हैं। दिल टूटने की सदाएं भी हैं। टूटे हुए दिल का यही दर्द उनकी शायरी की ताक़त भी है -

न तुम से नज़रें मिलाते न बेकली होती
बड़ी हसीन हमारी ये ज़िंदगी होती

तुम्हारे होने ने बर्बाद कर दिया हमको
वगरना हमसे कहां जान शायरी होती

इमरोज़ आलम ने अपने ज़ाती तजरुबों से शायरी का तामहल बनाया है। उसे सूरज की तपिश और चांद की किरनों से सजाया है। इस दयार में मुहब्बत के फूल मुस्कुराते हैं और नागफ़नी के कांटे भी जगह पाते हैं। कहीं रोशनी का उपहार है तो कहीं अंधेरों की सौग़ात है। इमरोज़ आलम की शायरी में धनक के सभी रंग नज़र आते हैं। अभी उन्हें यह तय करना है कि रिवायत की क़दीम राह पे चलना है, कि नए सफ़र का आग़ाज करना है। मेरी दिली ख़्वाहिश है कि ऊपर वाला उन्हें राह दिखाए और मंज़िले मक़सूद तक पहुंचाए। आमीन। 


आपका-
देवमणि पांडेय

सम्पर्क: बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, 
गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210 82126

गुरुवार, 7 जनवरी 2021

शायर पंछी जालौनवी का काव्य संग्रह : दो सफ़र


शायर पंछी जालौनवी का काव्य संग्रह : दो सफ़र

लॉक डाउन में ज़िंदगी की परवाज जैसे थम गई। शायर पंछी जालौनवी ने अपने घर के दरीचे से ज़िंदगी की जो हलचल देखी उस मंज़र को उन्होंने लफ़्ज़ों का लिबास पहना कर नज़्मों की शक्ल में पेश किया। पंछी एक हस्सास शायर हैं। इन नज़्मों में शामिल उनका एहसास पाठकों के दिल पर दस्तक देता है। उनके इज़हार में फ़िक्र के साथ आंखों की नमी भी शामिल है-

दर्द एहसास का 
इस क़द्र भी मर सकता है 
नंगे पावों
मीलों का सफ़र 
कोई ख़ुद अपनी सवारी पे 
पैदल भी कर सकता है 

पंछी ने कोरोना काल में लिखी गई अपनी इन नज़्मों के मज्मूए को 'दूसरा सफ़र' उन्वान दिया है। इस सिलसिले में वह अपने ज़ाती सफ़र से बाहर निकलकर दूसरों के दुखों के कारवां में शरीक होते हैं और उसे अपनी रचनात्मकता में बख़ूबी ढाल देते हैं-

मैंने देखा-
तीस बरस की 
बूढ़ी मां का 
आठ बरस का जवान बच्चा 
अपने कांधे का सहारा देकर 
मां के क़दमों से 
सफ़र की थकान उठा रहा था 

पंछी जालौनवी की यह किताब कोरोना के साए में सफ़र तय करती ज़िंदगी का एक अहम दस्तावेज़ है। पलायन, किराएदार, झोपड़पट्टी, रेलगाड़ी, हमारी रात फुटपाथ, नींद का कातिल, इबादतगाह, दफ़्तर, आपबीती, सुरक्षाकर्मी, मास्क आदि उनकी कई ऐसी नज़्में हैं जो कोरोना के मुश्किल समय में झेली गई तकलीफ़ और पीड़ा को सामने लाकर गुजिश्ता वक़्त की जीती जागती तस्वीर पेश कर देती हैं। 


सरल सहज ज़बान में कही गईं ये सीधी-सादी नज़्में पढ़ने वालों पर गहरा असर डालती हैं। पंछी एक उम्दा शायर होने के साथ-साथ एक अच्छे सिने गीतकार भी हैं। उन्होंने कई फ़िल्मों को अपने गीतों से सजाया है। 'दस बहाने करके ले गए दिल' फ़िल्म 'दस' का यह गीत उन्ही की क़लम का कमाल है। लखनऊ के मशहूर शायर पवन कुमार के सानिध्य में ऑनलाइन आयोजित एक कार्यक्रम में पंछी की इस किताब का इस्तक़बाल किया गया। इसकी निज़ामत शायर रोहित विक्रम भदोरिया ने की। सदारत की ज़िम्मेदारी आपके दोस्त देवमणि पांडेय को सौंपी गई थी।

इस सुंदर किताब के लिए मैं पंछी जालौनवी को हार्दिक बधाई देता हूं। मेरी दुआ है कि उनकी रचनात्मकता का यह सिलसिला इसी तरह कामयाबी के साथ जारी रहे।

आपका-

देवमणि पांडेय
सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, 
कन्या पाड़ा, गोकुलधाम, फ़िल्म सिटी रोड, 
गोरेगांव पूर्व, मुंबई- 400063, 98210-82126

मंगलवार, 29 दिसंबर 2020

उज़्बेकिस्तान : मज़हबी पाबंदियों से मुक्त इस्लामिक देश

 
मज़हबी पाबंदियों से मुक्त इस्लामिक देश उज़्बेकिस्तान

इस्लामिक देशों के बारे हमारे मन में एक अलग ही इमेज़ होती है। मगर सन् 2012 में उज़्बेकिस्तान पहुँचकर पांच दिन ताशकंद में और एक दिन समरकंद में घूमते हुए जो सामाजिक, सांस्कृतिक और मज़हबी मंज़र नज़र आया वह हमें हैरत में डाल देने वाला था। उज़्बेकिस्तान एक जनतांत्रिक इस्लामिक देश है। मगर यहाँ का जीवन अफ़गानिस्तान, पाकिस्तान और सऊदी अरब के इस्लामपरस्त लोगों से बिल्कुल अलग है। हमें यहाँ सड़क, मैदान या किसी मुहल्ले में कहीं भी कोई मस्जिद, मक़तब या मदरसा नज़र नहीं आया। कहीं कोई अज़ान नहीं सुनाई दी। यहाँ तक कि कोई चर्च या मंदिर भी दिखाई नहीं पड़ा। कोई महिला मज़हबी लिबास (बुर्क़ा) नहीं पहनती।

हमारे गाइड रुस्तम ने बताया कि समरकंद में अमीर तिमूर (तैमूर लंग) के मक़बरे के अंदर एक मस्जिद है और ताशकंद में हज़रत इमाम के मकबरे के अंदर एक मस्जिद है। मगर ये इबादत के बजाय पर्यटन के प्रमुख केंद्र हैं। कुछ लोग अपने घरों के अंदर नमाज़ अदा करते हैं मगर उसके लिए कोई वक़्त मुक़र्रर नहीं है। यहाँ मुस्लिम, ईसाई और ईश्वर को न मानने वाले वामपंथियों के बीच ज़ब़ान और मज़हब को लेकर कोई संघर्ष भी नहीं है। उज़्बेकिस्तान की राजधानी ताशकंद की जनसंख्या 30 लाख है। इनमें 90% मुसलमान हैं और 8% क्रिचियन हैं और 2% में बाकी दुनिया शामिल है। सन् 1991 में सोवियत यूनियन से अलग होकर एक आज़ाद देश बनने के बावजूद उज़्बेकिस्तान ने मज़हबी मरकज़ बनाने के बजाय मूलभूत सुविधाओं- शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार के विकास पर ज़ोर दिया। यहाँ बी.ए. तक सभी के लिए शिक्षा मुफ्त़ है।
आज़ादी का स्मारक : इंडिपेंडेंस स्क्वायर

उज़्बेकिस्तान की राजधानी ताशकंद का सबसे प्रमुख स्थल माना जाता है - इंडिपेंडेंस स्क्वायर। पहले इसका नाम था लेनिन स्क्वायर। सन् 1955 में जब यह बना था तो एक ऊँचे स्तम्भ पर लेनिन की आदमकद विशाल प्रतिमा स्थापित की गई थी। सन् 1991 में सोवियत यूनियन से आज़ाद होकर उज़्बेकिस्तान एक जनतांत्रिक इस्लामिक देश बन गया। लेनिन की प्रतिमा ध्वस्त कर दी गई और उसकी जगह एक ग्लोब स्थापित किया गया। इस ग्लोब पर उज़्बेकिस्तान का मानचित्र अंकित किया गया है। ग्लोब के नीचे अपनी गोद में शिशु लिए एक जवान माँ बैठी है। उसके चेहरे पर आत्मीय मुस्कान है। माँ बच्चे से कह रही है- 'बेटा तू बहुत ख़ुशक़िस्मत है जो आज़ाद मुल्क में पैदा हुआ'।

इंडिपेंडेंस स्क्वायर के दूसरे कोने पर एक बूढ़ी माँ की उदासी में डूबी हुई प्रतिमा है। यह शोकमग्न माँ अपने उन बेटों का इंतज़ार कर रही है जो कभी नहीं लौटेंगे। द्वितीय विश्वयुद्ध में उज़्बेकिस्तान के छ: लाख लोग मारे गए थे। उनकी याद में यहाँ एक अमर ज्योति अनवरत जल रही है। नज़दीक के बरामदे में ताम्रपत्रों पर इन शहीदों के नाम अंकित हैं। नाम के साथ उनके जन्म और मृत्यु का साल भी दर्ज किया गया है।
चौदह हज़ार शहीदों का स्मारक : शहीद पार्क

ताशकन्द शहर के मध्य में टीवी टावर के पास हरियाली और फूलों से समृद्ध एक पार्क में शहीदों का भव्य स्मारक आकर्षण का प्रमुख केंद्र है। यह किसी युद्ध में शहीद हुए सैनिकों का स्मारक नहीं है। हमारे गाइड ने बताया कि यह उन 14000 बुद्धिजीवियों, विचारकों, लेखकों और कलाकारों की यादों का मरक़ज़ है, जिन्हें किसी समय उज़्बेकिस्तान को सोवियत रिपब्लिक का हिस्सा बनाने के लिए एक साथ, एक जगह इकट्ठा करके क़त्ल करने के बाद यहीं दफ़ना दिया गया था। उस वक़्त यह एक निर्जन स्थान था। आज़ाद देश बनने पर इसे शहीद पार्क बनाया गया। पास से गुज़रती एक नदी की धारा को मोड़ कर इसके बीचों-बीच से गुज़ारा गया । पक्के किनारों वाली इस नदी, हरियाली और फूलों ने शहीद पार्क को बेहद ख़ूबसूरत बना दिया है। आज यह पार्क कला और साहित्य का पावन तीर्थ बना हुआ है और दूर-दूर से लोग शहीदों की स्मृति को सलाम करने के लिए आते हैं।
ताशकन्द, समरकन्द और बुखारा

उज़्बेकिस्तान एक छोटा-सा, हरा-भरा और बहुत प्यारा देश है। यहाँ के तीन प्रमुख शहर- ताशकन्द, समरकन्द और बुखारा मशहूर हैं। ताश माने पत्थर और कंद माने शहर। ताशकन्द यानी पत्थरों का शहर। इसके चारों तरफ़ छोटे-छोटे पहाड़ हैं। वास्तुकला के नायाब नमूने हैं। यहाँ गगनचुम्बी इमारतें नहीं हैं क्यों कि यहाँ कभी-कभी तेज़ भूकम्प आते हैं। ताशकंद से चारवाक लेक जाते हुए रास्ते में एक छोटा-सा क़स्बा नज़र आता है ग़ज़लकन्द। ग़ज़लकन्द यानी ग़ज़लों का शहर। यहाँ के लोग कहते हैं कि ग़ज़ल यहीं पैदा हुई और बाद में मक़बूल होकर पूरी दुनिया पर छा गई।

समर कहते हैं फल को। फलों ने समरकन्द को इतनी दौलत दी है कि इसे अमीर लोगों का शहर कहा जाता है। जगह-जगह अंगूर, सेब, चेरी, खुबानी, खरबूज़ और तरबूज़ दिखाई पड़ते हैं। यहाँ तक कि इस शहर की गलियों में भी लोहे के पाइप पर अँगूर की बेलें झूलती रहती हैं और राहगीरों को धूप से बचाती हैं। ड्राई फ्रूट का विशाल मार्केट भी यहीं है। सन् 1398 में जब अमीर तिमूर (तैमूर लंग) दिल्ली आया था तो वह समरकंद का बादशाह था। यहाँ तैमूर लंग का बनवाया हुआ एक शानदार मक़बरा है। इसके गुम्बद की नक़्क़ाशी में सोने का भरपूर उपयोग किया गया है। कहा जाता है कि उसने यह मक़बरा अपने बेटे के लिए बनवाया था। एक दुर्घटना में अपनी जान गँवाने पर ख़ुद तैमूर लंग को इसी में दफ़न होना पड़ा। चंगेज़ ख़ाँ, नादिर शाह और बाबर का भी समरक़ंद और बुखारा से ऐतिहासिक रिश्ता रहा है। वैसे बुखारा को सूफ़ियों का शहर माना जाता है। हमें बताया गया कि यह निज़ामुद्दीन औलिया की मुहब्बत तथा मुइनुद्दीन चिश्ती की इबादत का शहर है।

परदे से मुक्त महिलाओं का समाज

ताशकंद के प्रमुख बाज़ारों, चिमगान हिल, चारवाक लेन और समरकंद के विशाल ड्राई फ्रूट मार्केट में घूमते हुए हमने देखा कि यहाँ की महिलाएं परदा नहीं करतीं। बाज़ार में, रेस्तराँ में, शापिंग माल में वे मर्दों से अधिक संख्या में चुस्ती-फुर्ती से काम करती हुई नज़र आती हैं। वे देर रात तक आज़ादी से घूमती- फिरती हैं। हमारे गाइड ने बताया कि यहाँ लड़कों की तुलना में लड़कियों की संख्या दो गुनी है। काफ़ी महिलाएं ऊपरी दाँतों में सोना मढ़वाती हैं। वे जब हँसती या बोलती हैं तो यह स्वर्णिम दंतपंक्ति बड़ी सुंदर लगती है। यहाँ की अधिकांश लड़कियाँ हाई हील पहनती हैं। होटल और रेस्तराँ में हाई हील पहनकर लड़कियाँ बैली डांस करती हैं। जब वे बिजली की गति से नाचती हैं तो हाई हील पर उनका बैलेंस देखने लायक होता है। 

आर्थिक आत्मनिर्भरता

उज़्बेकिस्तान में खेती-बारी ज़बरदस्त है। गेहूँ, सब्ज़ियां, फल बहुतायत से पैदा होते हैं। कपास निर्यात करने में उज़्बेकिस्तान दुनिया में तीसरे नम्बर पर है। तेल और गैस भी भरपूर है। भारतीय मुद्रा में पेट्रोल 25 रूपए लीटर है। सात रूपए का टिकट लेकर मेट्रो ट्रेन या लो फ्लोर वातानुकूलित बस में पूरे दिन कहीं भी आ-जा सकते हैं। यहाँ मोटर सायकिल, बाइक या स्कूटर नहीं हैं। महज कारें, बसें और टैक्सियाँ ही नज़र आती हैं। इक्का-दुक्का अपवाद छोड़ दें तो अधिकांश कारें और टैक्सियाँ सफ़ेद रंग की ही हैं। यहाँ के लोगों में ख़ुद इतना अनुशासन है कि छ: दिन में हमें कहीं हार्न की आवाज़ नहीं सुनाई पड़ी। हमारी बस के ड्राइवरों ने भी कभी हार्न नहीं बजाया।
अपराध मुक्त देश उज़्बेकिस्तान

उज़्बेकिस्तान एक अपराध मुक्त देश है। हमको यहाँ कहीं भी पुलिस के दर्शन नहीं हुए। गीतकार डॉ बुद्धिनाथ मिश्र के साथ सुबह 6 बजे मार्निंग वाक करते हुए हम संसद भवन के गेट पर चले गए। संसद भवन पर भी पुलिस का पहरा नहीं है। गाइड ने बताया कि यहाँ अपराध ज़ीरो है। न चोरी, न डकैती, न मार पीट, न भ्रष्टाचार। आम जनता को अंग्रेजी बिल्कुल नहीं आती। बस चंद लोगों को काम चलाऊ अंग्रेज़ी ही आती है। किसी दुकानदार से कुछ ख़रीदिए और अंग्रेज़ी में दाम पूछिए तो वह कुछ बोलता नहीं, झट से कलकुलेटर या मोबाइल स्क्रीन पर टाइप करके दाम दिखा देता है। कहीं अंग्रेज़ी का अख़बार भी नज़र नहीं आता। यहाँ तक कि हमारे चार सितारा होटल पार्क ट्यूरान की लॉबी में भी कोई अख़बार नहीं दिखाई पड़ा- चैन हो जाए अगर मुल्क में अख़बार न हो। उज़्बेकी ज़बान में कुछ अख़बार निकलते ज़रूर हैं मगर प्रसार बहुत कम है।

ताशकंद में सुख, सुविधा और शांति

उज़्बेकिस्तान की राजधानी ताशकंद में हर तरफ़ हरियाली है, रंग-बिरंगे फूल हैं। न तो कोई घास पर बैठता है और न ही कोई घास पर चलता है । कोई फूल भी नहीं तोड़ता। ऐसे अलिखित नियमों का पालन हर इंसान करता है क्यों कि वे स्व-अनुशासित हैं। यूएस डॉलर की तुलना में स्थानीय मुद्रा सोम की क़ीमत बहुत कम है। सौ डॉलर में अढ़ाई लाख सोम मिलते हैं। चाय एक हज़ार, कॉफी दो हज़ार और टैक्सी का न्यूनतम किराया तीन हज़ार सोम है। ताशकंद में कई भारतीय होटल-रेस्तराँ हैं जहाँ भारतीय वेज़ और नानवेज़ भोजन मिल जाता है। पिछले 21 साल से राष्ट्रपति इस्लाम करीमोव अपने पद पर बने हुए हैं। पाँच राजनीतिक पार्टियाँ हैं मगर राजनीतिक उठापटक नहीं है। इस लिए यहाँ सुख, सुविधा और शांति है।
हमारे देश भारत के लिए उज़्बेकिस्तान के लोगों में बहुत प्यार है। शास्त्री स्ट्रीट में हमारे स्व. प्रधान मंत्री लालबहादुर शास्त्री की प्रतिमा को उन्होंने बहुत आदर से साफ़-सुथरा और सँभालकर रखा है। बच्चों से लेकर लड़कियाँ, मर्द और औरतें जब हमें देखते हैं तो बड़े प्यार से सिर झुकाकर या अदब से हाथ जोड़कर कहते हैं- नमस्ते। वे नमस्ते इतनी विनम्रता और म्यूज़िकल ढंग से बोलते हैं कि तबियत ख़ुश हो जाती है।

सृजन सम्मान (छत्तीस गढ़) की ओर से पांचवा अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन, ताशकंद, उज्बेकिस्तान में आयोजित किया गया था। उन्हीं के सौजन्य से 24 से 30 जून 2012 तक उज़्बेकिस्तान की यह साहित्यिक यात्रा सम्पन्न हुई थी। इसमें देश-विदेश से 135 हिंदी रचनाकारों को आंत्रित किया गया था।


आपका- 
देवमणि पांडेय

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्यापाड़ा, 
गोकुलधाम, फ़िलमसिटी रोड, 
गोरेगांव पूर्व, मुम्बई - 400 063,
फोन : 98210-82126