बुधवार, 25 दिसंबर 2024
लखनऊ यात्रा की मधुर यादें
सोमवार, 29 जुलाई 2024
मुकेश जयंती पर मुम्बई में संगीत समारोह
मुकेश जयंती पर मुम्बई में संगीत समारोह
बेमिसाल गायक मुकेश ने वक़्त के कैनवास पर अपनी आवाज़ के रंगों से कामयाबी की एक ऐसी इबारत लिखी जिसकी चमक आज भी बरकरार है। वे लफ़्ज़ों की रोशनाई में अपने दिल की सम्वेदना घोल देते थे। इसलिए उनके गीत आज भी श्रोताओं की धड़कनों के साथ एक आत्मीय रिश्ता क़ायम कर लेते हैं।
आज भी गायक मुकेश की रूहानी आवाज़ उदासियों के अंधेरों में रोशनी की लकीर खींच देती है। हालांकि उन्होंने उमंग और उल्लास के भी कई गीत गाए, लेकिन उनकी इमोशनल आवाज़ दर्द की जागीर बन गई है। उनके ऐसे गीतों ने प्यार करने वालों की कई-कई बेचैन पीढ़ियों को सुकून अता किया है। कहा जाता है कि मुकेश ने अपने 35 साल के कैरियर में 525 हिन्दी फ़िल्मों में 900 गीत ही गाये मगर मुकेश के गीतों की लोकप्रियता इतनी ज़्यादा रही कि अक्सर लोग यही समझते हैं कि मुकेश ने भी हज़ारों गीत गाये होंगे। उन्होंने अपने दौर के सभी प्रमुख अभिनेताओं के लिए गाया। राज कपूर उन्हें अपनी आवाज़ कहते थे।
दक्षिण मुंबई में जहां नेपियन सी रोड और भूलाभाई देसाई रोड का मिलन होता है उसका नाम है मुकेश चौक। इसी मोहल्ले की सरकारी कॉलोनी हैदराबाद इस्टेट में मैं तेरह साल तक रहा। थोड़ी ही दूर पर कमला नेहरू पार्क यानी हैंगिंग गार्डन है। फ़िल्म पत्रिका माधुरी के संपादक अरविंद कुमार जी ने बताया था कि इस पार्क में रोज़ सुबह मॉर्निंग वॉक के लिए गायक मुकेश आते थे। कोई भी उनसे मुलाक़ात कर सकता था। बात कर सकता था। मगर अब समय बदल गया है। हैदराबाद इस्टेट के सामने प्रियदर्शनी पार्क है। एक दिन शाम को इसी पार्क में घूमते हुए मुकेश जी के पौत्र नील नितिन मुकेश से सामना हो गया। उनके दाएं बाएं दो बॉडीगार्ड थे। एक नौकर तौलिया लेकर पीछे पीछे चल रहा था। यानी उनसे संवाद का कोई रास्ता नहीं था।
दिल्ली के मुकेशचंद्र माथुर का जन्म 22 जुलाई 1923 को हुआ। उन्होंने दसवीं तक पढ़ाई करके सार्वजनिक निर्माण विभाग में नौकरी शुरू की लेकिन क़िस्मत ने उन्हें दिल्ली से मुंबई पहुंचा दिया। इसका श्रेय अभिनेता मोतीलाल को दिया जाता है। फ़िल्म 'निर्दोष' (1941) में मुकेश को गाने और अभिनय का काम मिला। बतौर पार्श्व गायक सन् 1945 में फ़िल्म 'पहली नज़र' से पहचान मिली। गीत था - "दिल जलता है तो जलने दे "। मुकेश के आदर्श गायक कुंदनलाल सहगल का प्रभाव इस पर स्पष्ट दिखाई देता है। संगीतकार नौशाद के साथ मुकेश ने अपनी पार्श्व गायन शैली विकसित की।
चालीस के दशक में दिलीप कुमार के लिए सबसे ज़्यादा गीत गाने वाले मुकेश को पचास के दशक में एक नयी पहचान मिली। उन्हें राज कपूर की आवाज़ कहा जाने लगा। ख़ुद राज कपूर ने स्वीकार किया - "मैं तो बस शरीर हूँ मेरी आत्मा तो मुकेश है।" बतौर पार्श्व गायक लोकप्रियता हासिल करने के बाद एक दिन मुकेश फ़िल्म निर्माता बन गये। सन् 1951 में फ़िल्म ‘मल्हार’ और 1956 में ‘अनुराग’ निर्मित की। दोनों फ़िल्में फ्लॉप रहीं। कहा जाता है कि मुकेश को बचपन से ही अभिनय का शौक था। फ़िल्म ‘अनुराग’ और ‘माशूक़ा’ में वे हीरो बनकर आये। लेकिन जनता ने उन्हें पसंद नहीं किया। वे फिर से गायिकी की दुनिया में लौट आये। यहूदी, मधुमती, अनाड़ी और जिस देश में गंगा बहती है जैसी फ़िल्मों ने उनकी गायकी को एक नयी पहचान दी।
▪️गायक मुकेश को अपनी बेमिसाल गायिकी के लिए चार बार फ़िल्म फेयर अवार्ड मिला।▪️
(1) सन् 1959 में अनाड़ी फ़िल्म के गीत ‘सब कुछ सीखा हमने न सीखी होशियारी’ के लिए। ऋषिकेश मुखर्जी की फ़िल्म 'अनाड़ी' में मुकेश के जिगरी दोस्त राज कपूर को भी पहला फ़िल्म फेयर अवॉर्ड मिला।
(2) सन् 1970 में मनोज कुमार की फ़िल्म 'पहचान' के गीत "सबसे बड़ा नादान" के लिए।
(3) सन् 1972 में मनोज कुमार की ही फ़िल्म 'बेईमान' के गीत "जय बोलो बेईमान की" के लिए।
(उपरोक्त तीनों फ़िल्मों के संगीतकार शंकर जयकिशन थे)
(4) सन् 1976 में यश चोपड़ा की फ़िल्म ''कभी कभी के शीर्षक गीत के लिए मुकेश को चौथा फ़िल्म फेयर अवॉर्ड मिला। (संगीतकार ख़य्याम)
साल 1974 में फ़िल्म ''रजनीगंधा'' के गाने "कई बार यूं भी देखा है" के लिए मुकेश को राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
सत्तर के दशक में धरम करम, आनन्द, अमर अकबर अॅन्थनी आदि फिल्मों में मुकेश ने सुपरहिट गाने दिये। मुकेश ने अपने कैरियर का आखिरी गाना अपने दोस्त राज कपूर की फ़िल्म सत्यम शिवम् सुंदरम के लिए गाया- “चंचल शीतल निर्मल कोमल”। लेकिन 1978 में इस फ़िल्म के रिलीज होने से दो साल पहले ही 27 अगस्त 1976 को मुकेश ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।
मुकेश का परिवार :
घर वालों की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ अपने जन्मदिन 22 जुलाई 1946 को गुजराती लड़की सरल त्रिवेदी से मुकेश ने प्रेम विवाह किया था। वे तीन बच्चों के पिता बने। बेटे का नाम नितिन मुकेश और बेटियों का रीटा और नलिनी है।
मुकेश के बेटे गायक नितिन मुकेश ने भी कई फ़िल्मों में अपनी आवाज़ दी है। नितिन मुकेश के बेटे यानी मुकेश के पौत्र नील नितिन मुकेश बॉलीवुड के चर्चित अभिनेता हैं।
गीतकार हरिश्चंद्र दास गायक मुकेश के परम भक्त हैं। वे पिछले सैंतीस सालों से गायक मुकेश के जन्मदिन पर मुकेश जयंती समारोह आयोजित करते हैं। इस बार यह संगीत समारोह 27 जुलाई 2024 को कांदिवली, मुम्बई के निर्वाण सभागृह में आयोजित किया गया जिसमें कई बेहतरीन गायकों ने शिरकत की। इनमें सुधाकर स्नेह, सुरेशानंद, नारायण आहूजा, संजीव झा, कमल धमाली, दामोदर राव, श्रीरंजनी अय्यर, दर्शना कदम, श्रुति झा, रेखा राव, ममता राव और स्वयं हरिश्चंद्र दास शामिल थे। इस संगीत संध्या के संचालन में मुझे भी भरपूर आनंद आया। मेरे दोस्तों- पुष्पा वर्मा, अर्चना जौहरी, रतिका जौहरी, प्रतिमा सिन्हा, क़मर हाजीपुरी और ताज मोहम्मद सिद्दीकी ने अपनी मौजूदगी से आयोजन की गरिमा बढ़ाई।
हिंदी सिनेमा के महान गायक मुकेश की जयंती पर उनकी स्मृतियों को सादर नमन ! आइए हम भी मुकेश की आवाज में गुनगुनाएं ....
किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार
किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार
किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार
जीना इसी का नाम है ...
रिश्ता दिल से दिल के ऐतबार का
ज़िन्दा है हमीं से नाम प्यार का
कि मर के भी किसी को याद आयेंगे
किसी के आँसुओं में मुस्कुरायेंगे
कहेगा फूल हर कली से बार बार
जीना इसी का नाम है...
* * *
आपका - देवमणि_पांडेय
सम्पर्क : 98210 82126
गुरुवार, 20 जुलाई 2023
मुकेश जयंती : जीना इसी का नाम है
मुकेश जयंती पर मुम्बई में संगीत समारोह
मेरे मित्र गीतकार हरिश्चंद्र के दिल में गायक मुकेश के प्रति दीवानगी है। पिछले कई सालों से वे मुंबई में 22 जुलाई को मुकेश जयंती समारोह का आयोजन करते हैं। गायक मुकेश के साथ देश-विदेश में स्टेज प्रोग्राम कर चुकीं गायिका उषा तिमूथी अपनी मौजूदगी से कार्यक्रम की गरिमा बढ़ाती हैं। संचालन की ज़िम्मेदारी पूरे अधिकार के साथ हरिश्चंद्र जी मुझे सौंप देते हैं।
दक्षिण मुंबई में जहां नेपियन सी रोड और भूलाभाई देसाई रोड का मिलन होता है उसका नाम है मुकेश चौक। इसी मोहल्ले की सरकारी कॉलोनी हैदराबाद इस्टेट में मैं तेरह साल तक रहा। थोड़ी ही दूर पर कमला नेहरू पार्क यानी हैंगिंग गार्डन है। फ़िल्म पत्रिका माधुरी के संपादक अरविंद कुमार जी ने बताया था कि इस पार्क में रोज़ सुबह मॉर्निंग वॉक के लिए गायक मुकेश आते थे। वे सुबह 6 से 8 बजे तक इस पार्क में मौजूद रहते थे। कोई भी उनसे मुलाक़ात कर सकता था। बात कर सकता था।
मगर अब समय बदल गया है। हैदराबाद इस्टेट के सामने प्रियदर्शनी पार्क है। एक दिन शाम को इसी पार्क में घूमते हुए मुकेश जी के पौत्र नील नितिन मुकेश से सामना हो गया। उनके दाएं बाएं दो बॉडीगार्ड थे। एक नौकर तौलिया लेकर पीछे पीछे चल रहा था। यानी उनसे संवाद का कोई रास्ता नहीं था।
दिल्ली के मुकेशचंद्र माथुर का जन्म 22 जुलाई 1923 को हुआ। उन्होंने दसवीं तक पढ़ाई करके पीडब्लूडी में नौकरी शुरू की लेकिन क़िस्मत ने उन्हें दिल्ली से मुंबई पहुंचा दिया।इसका श्रेय अभिनेता मोतीलाल को दिया जाता है।
फ़िल्म 'निर्दोष' (1941) में मुकेश को गाने और अभिनय का काम मिला। बतौर पार्श्व गायक सन् 1945 में फ़िल्म 'पहली नज़र' से पहचान मिली। गीत था - "दिल जलता है तो जलने दे "। मुकेश के आदर्श गायक कुंदनलाल सहगल का प्रभाव इस पर स्पष्ट दिखाई देता है। संगीतकार नौशाद के साथ मुकेश ने अपनी पार्श्व गायन शैली विकसित की।
चालीस के दशक में दिलीप कुमार के लिए सबसे ज़्यादा गीत गाने वाले मुकेश को पचास के दशक में एक नयी पहचान मिली। उन्हें राज कपूर की आवाज़ कहा जाने लगा। ख़ुद राज कपूर ने स्वीकार किया - "मैं तो बस शरीर हूँ मेरी आत्मा तो मुकेश है।"
बतौर पार्श्व गायक लोकप्रियता हासिल करने के बाद एक दिन मुकेश फ़िल्म निर्माता बन गये। सन् 1951 में फ़िल्म ‘मल्हार’ और 1956 में ‘अनुराग’ निर्मित की। दोनों फ़िल्में फ्लॉप रहीं। कहा जाता है कि मुकेश को बचपन से ही अभिनय का शौक था। फ़िल्म ‘अनुराग’ और ‘माशूक़ा’ में वे हीरो बनकर आये। लेकिन जनता ने उन्हें पसंद नहीं किया। वे फिर से गायिकी की दुनिया में लौट आये। यहूदी, मधुमती, अनाड़ी और जिस देश में गंगा बहती है जैसी फ़िल्मों ने उनकी गायकी को एक नयी पहचान दी।
गायक मुकेश को अपनी बेमिसाल गायिकी के लिए चार बार फ़िल्म फेयर अवार्ड मिला।
(1) सन् 1959 में अनाड़ी फ़िल्म के गीत ‘सब कुछ सीखा हमने न सीखी होशियारी’ के लिए। ऋषिकेश मुखर्जी की फ़िल्म 'अनाड़ी' में मुकेश के जिगरी दोस्त राज कपूर को भी पहला फ़िल्म फेयर अवॉर्ड मिला।
(2) सन् 1970 में मनोज कुमार की फ़िल्म 'पहचान' के गीत "सबसे बड़ा नादान" के लिए।
(3) सन् 1972 में मनोज कुमार की ही फ़िल्म 'बेईमान' के गीत "जय बोलो बेईमान की" के लिए।
(उपरोक्त तीनों फ़िल्मों के संगीतकार शंकर जयकिशन थे)
(4) सन् 1976 में यश चोपड़ा की फ़िल्म ''कभी कभी के शीर्षक गीत के लिए मुकेश को चौथा फ़िल्म फेयर अवॉर्ड मिला। (संगीतकार ख़य्याम)
साल 1974 में फ़िल्म ''रजनीगंधा'' के गाने "कई बार यूं भी देखा है" के लिए मुकेश को राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
सत्तर के दशक में धरम करम, आनन्द, अमर अकबर अॅन्थनी आदि फिल्मों में मुकेश ने सुपरहिट गाने दिये। मुकेश ने अपने कैरियर का आखिरी गाना अपने दोस्त राज कपूर की फ़िल्म सत्यम शिवम् सुंदरम के लिए गाया- “चंचल शीतल निर्मल कोमल”। लेकिन 1978 में इस फ़िल्म के रिलीज होने से दो साल पहले ही 27 अगस्त 1976 को मुकेश ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।
बेमिसाल गायक मुकेश ने वक़्त के कैनवास पर अपनी आवाज़ के रंगों से कामयाबी की एक ऐसी इबारत लिखी जिसकी चमक आज भी बरकरार है। वे लफ़्ज़ों की रोशनाई में अपने दिल की सम्वेदना घोल देते थे। इसलिए उनके गीतों ने श्रोताओं की धड़कनों के साथ आत्मीय रिश्ता क़ायम करने की एक मिसाल कायम की।
सिने संगीत के सुनहरे दौर में मुकेश की रूहानी आवाज़ उदासियों के अंधेरों में रोशनी की लकीर खींच देती थी। हालांकि उन्होंने उमंग और उल्लास के भी गीत गाए, लेकिन उनकी इमोशनल आवाज़ दर्द की जागीर बन गई। उनके ऐसे गीतों ने प्यार करने वालों की कई-कई बेचैन पीढ़ियों को सुकून अता किया है।
फ़िल्मी पंडितों के अनुसार मुकेश ने अपने 35 साल के कैरियर में 525 हिन्दी फ़िल्मों में 900 गीत ही गाये मगर मुकेश के गीतों की लोकप्रियता बेमिसाल रही। उनके गीत आज भी हमारी तनहाइयों के साथी हैं।
मुकेश का परिवार :
घर वालों की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ अपने जन्मदिन 22 जुलाई 1946 को गुजराती लड़की सरल त्रिवेदी से मुकेश ने प्रेम विवाह किया था। वे तीन बच्चों के पिता बने। बेटे का नाम नितिन मुकेश और बेटियों का रीटा और नलिनी है।
मुकेश के बेटे गायक नितिन मुकेश ने भी कई फ़िल्मों में अपनी आवाज़ दी है। नितिन मुकेश के बेटे यानी मुकेश के पौत्र नील नितिन मुकेश बॉलीवुड के चर्चित अभिनेता हैं।
हिंदी सिनेमा के महान गायक मुकेश की जयंती पर उनकी स्मृतियों को सादर नमन ! आइए हम भी मुकेश की आवाज में गुनगुनाएं ....
किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार
किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार
किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार
जीना इसी का नाम है ...
रिश्ता दिल से दिल के ऐतबार का
ज़िन्दा है हमीं से नाम प्यार का
कि मर के भी किसी को याद आयेंगे
किसी के आँसुओं में मुस्कुरायेंगे
कहेगा फूल हर कली से बार बार
जीना इसी का नाम है...
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आपका-
देवमणि पांडेय : 98210 82126
सोमवार, 17 जुलाई 2023
बाबूजी कहते थे : शेखर अस्तित्व का काव्य संग्रह
बाबूजी कहते थे : शेखर अस्तित्व का काव्य संग्रह
शेखर अस्तित्व के प्रथम काव्य संग्रह का नाम है 'बाबूजी कहते थे'। शेखर एक संवेदनशील कवि होने के साथ-साथ भावप्रवण गीतकार हैं। गीत उनके लिए भावनाओं का सहज उदगार है। इस लिए उनकी अभिव्यक्ति में कहीं भी बौद्धिकता का अवरोध नहीं दिखता। सहजता हर जगह मौजूद है। जीवन को जानने समझने की रचनात्मक दृष्टि उन्हें अपने पिता से विरासत में मिली है। इसलिए वे बड़ी से बड़ी बात को भी बिना किसी जटिलता के बड़ी सरलता से अभिव्यक्त कर देते हैं-
मानव मन गहरा सागर है
या कोई पगला निर्झर है
या मदमस्त भोर का पंछी
प्रतिपल उड़ने को तत्पर है
शेखर अस्तित्व के पास गहन जीवन बोध के साथ समसामयिक युगबोध भी है। वे भावनाओं के ज्वार को सोच के किनारों से नियंत्रित रखते हैं। सहज भाषा में सुगम अभिव्यक्ति उनकी विशेषता है। अपनी सकारात्मकता को साथ लेकर चलते हुए उनके गीत पाठक और श्रोता को बेहतर इंसान बनने के लिए प्रेरित करते हैं।
यह आवश्यक नहीं कि, दुख
सहने वाला हरदम रोता है
दुख उसको ही मिलता जिसमें
सहने का साहस होता है
शेखर के मन के अंदर गांव से बिछड़ने की कसक है। जीवन मूल्यों से जुड़े रहने की ललक है। धर्म और अध्यात्म की महक है। उनके अंदर एक मस्त मौला, फक्कड़ कवि है जो जीवन की चुनौतियों का सामना हर हाल में करता है-
बीच सड़क डुगडुगी बजाओ
बंदर तभी नचा पाओगे
उतने सफल रहोगे तुम
जितना शोर मचा पाओगे
शेखर अस्तित्व के गीत पाठक के अंतस् को आलोकित करते हैं। निराशा में भी आशा का दीप जलाते हैं। ज़िंदगी की राहों में आगे बढ़ने का हौसला जगाते हैं-
अहंकार के उच्च शिखर से
नीचे स्वयं उतर के आना
मुझसे मिलने का मन हो तो
ख़ुद को ख़ाली करके आना
गेयता गीत का मूल स्वभाव है। शेखर अस्तित्व के गीतों में गेयता झरने की तरह प्रभावित होती है। शेखर हिंदी काव्य मंच के लोकप्रिय और संजीदा कवि हैं। मुझे उम्मीद है कि उनके गीत जनमानस में अपनी जगह बनाने में कामयाब होंगें। मैं उन्हें इस नई किताब के लिए बधाई देता हूं।
अद्विक प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित इस काव्य संग्रह का मूल्य 230 रूपये है।
आपका-
देवमणि पांडेय : 98210 82126
शुक्रवार, 14 जुलाई 2023
तुम क्यों उदास हो : कुलबीर बडेसरों का कहानी संग्रह
पंजाबी कथाकार कुलबीर बडेसरों के हिंदी कहानी संग्रह का नाम है- तुम क्यों उदास हो। सुखों के प्रवाह, दुखों के ज्वार और झरने की तरह झरते मानवीय आवेग को कुलबीर जिस तन्मयता के साथ चित्रित करती हैं वह अद्भुत है। सूक्ष्म से सूक्ष्म ब्यौरों को भी अपनी अभिव्यक्ति में शामिल करके वे उसे मानवीय अनुभवों की अमूल्य धरोहर की तरह सहेज लेती हैं। उनके एहसास जिस तरह हमारी सोच और संवेदना में घुल मिल जाते हैं वह एक विरल संरचना है।
कुलबीर की कहानियों के संजीदा पात्र माहौल में ऐसी नमी घोल देते हैं कि पाठक का मन तरबतर हो जाता है। भावनाओं के आवेग के साथ आगे बढ़ती हुई कहानियां एक ऐसे मुकाम पर जाकर ठहरती हैं कि पढ़ने वाला स्तब्ध रह जाता है। फिर काफ़ी देर तक सिर्फ़ ख़ामोशी की आवाज़ सुनाई पड़ती है। कुलबीर की कहानियों में एक सुनियोजित क्लाइमैक्स है। यह क्लाइमेक्स इतने स्वाभाविक ढंग से अचानक उपस्थित होता है कि हमेशा के लिए पाठकों की स्मृति का हिस्सा बन जाता है।
बोलचाल की जीवंत भाषा, रिश्ते नातों की ऊर्जा से समृद्ध कथ्य और सहज सरल अभिव्यक्ति वाली कहानियों का यह संग्रह बेहद पठनीय है। कुलबीर बडेसरों एक अच्छी अभिनेत्री भी हैं। उन्होंने वीर ज़ारा, हिन्दी मीडियम और केसरी जैसी कई सुपरहिट फ़िल्मों और धारावाहिकों में अपने अभिनय का जादू दिखाया है। उन्हें पता है कि मनुष्य के अंतस में छुपी भावनाओं को असरदार तरीके से कैसे पेश किया जा सकता है। फ़नकारी का यह कमाल उनकी कहानियों को यादगार बना देता है। पंजाबी से इन कहानियों का हिंदी में ख़ूबसूरत अनुवाद प्रतिष्ठित कवि कथाकार सुभाष नीरव ने किया है। इस सुंदर कहानी संग्रह के लिए कुलबीर बडेसरों को बहुत-बहुत बधाई और शुभकामनाएं।
आपका -
देवमणि पांडेय : 98210 82126
महाभारत यथार्थ कथा : बोधिसत्व की किताब
शुक्रवार, 16 जून 2023
फ़िल्म आदि पुरुष : अहंकार की छाती पर विजय का भगवा ध्वज
मंगलवार, 13 जून 2023
ग़ज़ल कमल ग़ज़ल गुलाब : विजय 'अरुण' का ग़ज़ल संग्रह
ग़ज़ल कमल ग़ज़ल गुलाब : विजय 'अरुण' का ग़ज़ल संग्रह
advikpublication1@gmail.com
Web : www.advikpublication.com
#मूल्य : मूल्य : 300/- रूपए
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मंगलवार, 28 मार्च 2023
सिने गीतकार पुस्तक समीक्षा: यश मालवीय

शनिवार, 25 मार्च 2023
भोजपुरी फ़िल्मों का इतिहास
भोजपुरी फ़िल्मों का इतिहास
आकाशवाणी मुम्बई के सेवानिवृत्त अधिकारी डॉ राजेंद्र संजय की किताब 'भोजपुरी फ़िल्मों का इतिहास' एक संग्रहणीय दस्तावेज़ है। इससे पहले मैंने भोजपुरी सिनेमा के बारे में छिटपुट आलेख ही पढ़े थे। पहली बार इस किताब के ज़रिए भोजपुरी फ़िल्मों के भूत, वर्तमान और भविष्य को बहुत सुरुचिपूर्ण और व्यवस्थित ढंग से पेश करने की सराहनीय कोशिश हुई है। मूल विषय वस्तु के अलावा इसमें कुछ और भी महत्वपूर्ण चीज़ें शामिल की गई हैं। मसलन- चलचित्र के जन्म, भारत में इसके आगमन और मूक फ़िल्मों के निर्माण से लेकर बोलती फ़िल्मों का एक महत्वपूर्ण ख़ाका इस किताब के ज़रिए प्रस्तुत किया गया है।
लेखक राजेंद्र संजय ने भोजपुरी फ़िल्मों के जन्म और विकास को तीन दौर में समेटा है। इसमें 1962 से लेकर सन् 2000 और उससे आगे का कालखंड शामिल है। यह एक ग़ौरतलब तथ्य है कि पहली बोलती फ़िल्म 'आलमआरा' (हिंदी) के 31 वर्षों के बाद सन् 1962 में भोजपुरी की पहली फ़िल्म बनी- 'गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो'। भोजपुरी फ़िल्म का यह सपना साकार करने में अभिनेता नज़ीर हुसैन और निर्माता विश्वनाथ प्रसाद शाहाबादी का विशिष्ट योगदान रहा। यह फ़िल्म रिकॉर्ड तोड़ सफलता के साथ कई सिनेमा हॉल में हाउसफुल चलती रही। 'गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो' फ़िल्म के गीतकार शैलेंद्र और संगीतकार चित्रगुप्त हैं। कथा, पटकथा और संवाद लेखन चरित्र अभिनेता नज़ीर हुसैन ने किया।
'गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो' फ़िल्म एक ऐसी लड़की की कहानी है जो शादी के तुरंत बाद विधवा हो जाती है और लोग उसे कुलक्षणी मान लेते हैं। आगे चलकर सबको झूठा साबित करती हुई वह गांव वालों के दकियानूसी विचारों को बदल देती है। इस फ़िल्म में कई सामाजिक समस्याओं को दर्शाया गया था। लोक धुनों पर आधारित इसके गीतों ने पूरे देश में धूम मचा दी थी। दर्शकों ने इस फ़िल्म के कलाकार असीम कुमार, कुमकुम और पदमा खन्ना को स्टार बना दिया। उषा और लता मंगेशकर की आवाज़ में 'हे गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो' शीर्षक गीत घर घर में गाया जाने लगा। "काहे बंसुरिया बजवले, कि सुध बिसरवले, गईल सुखचैन हमार" गीत में लता की आवाज़ ने कमाल किया। मो. रफ़ी के स्वर में एक दर्दीला गीत था- सोनवा के पिंजरा में बंद भईल हाय राम, चिरई के जियरा उदास…यह गीत लोगों को बहुत पसंद आया। इतने सालों बाद भी ऐसे गीतों की लोकप्रियता क़ायम है। 'बिदेशिया' और 'लागी नहीं छूटे राम' फ़िल्मों ने भोजपुरी फ़िल्मों की कामयाबी के इस सिलसिले को आगे बढ़ाया।
इन तीन फ़िल्मों की कामयाबी के बाद भोजपुरी फ़िल्म निर्माण में बहुत लोग टूट पड़े। लेकिन बहुत सारी फ़िल्मों को जनता का प्यार नहीं मिला क्योंकि उनमें भोजपुरी जनजीवन अनुपस्थित था। लेखक राजेंद्र संजय ने सालाना आंकड़े जुटाकर भोजपुरी फ़िल्मों की सूची पेश की है। दूसरे दौर में दंगल, बलम परदेसिया, जागल भाग हमार, रूस गइले सैंया हमार, चनवा को ताके चकोर, धरती मैया, गंगा घाट आदि उल्लेखनीय फ़िल्में रहीं। तीसरे दौर में सईंया हमार, ससुरा बड़ा पइसा वाला, गंगा, कब होई गवनवा हमार, भोले शंकर, जैसी भोजपुरी फ़िल्मों ने दर्शकों का मनोरंजन किया।
यह भी उल्लेखनीय बात है कि लेखक ने सभी महत्वपूर्ण फ़िल्मों का कथा सार प्रस्तुत किया है। साथ ही उनके गीत संगीत पर बात की है और जनता का इनके साथ क्या प्रतिसाद रहा उसका भी आकलन किया है। बीच-बीच में ऐसी भी भोजपुरी फ़िल्में आईं जिनके द्विअर्थी संवादों और फूहड़ गीतों ने सिने प्रेमियों को निराश किया। लेखक के अनुसार नई सदी की फ़िल्मों से उम्मीद बंधी है कि भविष्य की भोजपुरी फ़िल्मों में भोजपुरिया संस्कृति, कला, रहन-सहन और रीति-रिवाज का सही और मर्यादित चित्रण होगा। सेक्सी दृश्यों के फिल्मांकन में अतिरेक पर अंकुश लगाया जाएगा। गीतों में फूहड़ता और सस्तेपन का निषेध होगा। इस किताब में भोजपुरिया कला संस्कृति और जीवन शैली पर महत्वपूर्ण आलेख हैं साथ ही हिंदी फ़िल्मों में भोजपुरी गीतों के सफ़र को बहुत प्रमाणिक तरीके से पेश किया गया है।
किताब की साज सज्जा और छपाई आकर्षक है। इसके प्रकाशक हैं- संस्कार साहित्य माला, अंधेरी, मुंबई- 400058, फ़ोन : 98209 46062 / 99699 77079
पुस्तक का मूल्य है 1800/- रूपए
आपका : देवमणि पांडेय (मुम्बई) मो : 98210 82126
devmanipandey@gmail.com
तुम्हीं से ज़िया है : ज़िया का ग़ज़ल संग्रह
वक़्त के साथ-साथ ग़ज़ल का चेहरा बदला है। सुभाष पाठक ज़िया की ग़ज़लों में भी ये बदलते हुए अक्स नज़र आते हैं। उनके पास कथ्य की विविधता है और उसे ख़ूबसूरती से पेश करने का हुनर भी है। 'दिल धड़कता है' ग़ज़ल संग्रह के बाद शिवपुरी (म. प्र.) के युवा ग़ज़लकार ज़िया का नया ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित हुआ है- 'तुम्हीं से ज़िया है'। उनकी ये ग़ज़लें नई संभावनाओं का संकेत देती हैं। वे नई शब्द संपदा और नए भाव बोध के साथ ग़ज़ल का गुलदस्ता सजाते हैं। अभिव्यक्ति का नया तेवर उन्हें एक अलग पहचान देता है।
इस संग्रह में शामिल 106 ग़ज़लों में एहसास की शिद्दत है और अपने वक़्त की आहट है। सीधी सरल ज़बान में अपने कथ्य को बड़ी सादगी से वे अभिव्यक्ति का लिबास पहना देते हैं। हमारे आस पास के मंज़र को ज़िया बड़े सलीक़े से ग़ज़ल के पैकर में ढाल देते हैं। एक जानी पहचानी बात को जब वे अपने नज़रिए से पेश करते हैं तो उसमें नयापन और ताज़गी शामिल हो जाती है-
सूरज जब दिन की बातों से ऊब गया
परवत से उतरा दरिया में डूब गया
मख़मल की चादर कांटों सी लगती है
जाने वाला 'लॉन' से लेकर दूब गया
ग़ज़ल एक ऐसी चित्रकारी है जिसके कैनवास पर नए रदीफ़ और नए क़ाफ़िए के इस्तेमाल से नए रंग उभारे जा सकते हैं। सुभाष पाठक ज़िया में यह हुनर मौजूद है। उन्होंने अपने रचनात्मक कौशल से अपनी ग़ज़लों में यह कमाल दिखाया है। एक मंज़र देखिए-
शजर उदास न हो गर उतर गए पत्ते
हवा उदास थी ख़ुश उसको कर गए पत्ते
हरे रहे, हुए पीले, फिर एक दिन सूखे
सफ़र हयात का तय ऐसे कर गए पत्ते
ज़िया जब ग़ज़ल में रिवायती लफ़्ज़ों का इस्तेमाल करते हैं तो उनमें भी नई मिठास और नई ख़ुशबू घोल देते हैं। उनकी ग़ज़लों में इश्क़ का आगाज़ है, ख़ामुशी की आवाज़ है और दिल धड़कने का अंदाज़ भी है। ग़ज़ल की शाह राह पर मुसाफ़िरों की बहुत भीड़ है मगर जिया की ग़ज़लों का रोशन चेहरा दूर से नज़र आता है। इन ग़ज़लों में फ़िक और एहसास के वे सभी रंग शामिल हैं जो ज़िंदगी की तस्वीर को ख़ुशनुमा बनाते हैं। इस ख़ूबसूरत ग़ज़ल संग्रह के लिए मैं ज़िया को बधाई देता हूं। मुझे उम्मीद है कि उनकी ग़ज़लों की ख़ुशबू दूर दूर तक पहुंचेगी। अमिता प्रकाशन मुजफ्फरपुर से प्रकाशित इस ग़ज़ल संग्रह का मूल्य ₹300 है।
आपका-
देवमणि पांडेय : 98210 82126
devmanipandey@gmail.com
रविवार, 12 फ़रवरी 2023
आनंद बख़्शी के गीतों में ज़िंदगी की दास्तान
आनंद बख़्शी के गीतों में ज़िंदगी की दास्तान
बुधवार, 11 जनवरी 2023
मुंबई के अतीत का आईना : आमची मुम्बई
मुंबई के अतीत का आईना : आमची मुम्बई
मंगलवार, 20 दिसंबर 2022
नवीन चतुर्वेदी का ग़ज़ल संग्रह धानी चुनर
नवीन चतुर्वेदी का हिन्दी ग़ज़ल संग्रह धानी चुनर
नवीन चतुर्वेदी के नए ग़ज़ल संग्रह का नाम है धानी चुनर। इससे पहले ब्रज ग़ज़लों के उनके दो संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। इस संग्रह में 87 रसीली एवं व्यंजनात्मक हिंदी ग़ज़लें शामिल हैं। संग्रह की पहली ग़ज़ल में उन्होंने हिंदी ग़ज़ल के प्रति अपनी आस्था का उद्घोष किया है-
ओढ़कर धानी चुनर हिंदी ग़ज़ल
बढ़ रही सन्मार्ग पर हिंदी ग़ज़ल
देवभाषा की सलोनी संगिनी
मूल स्वर में है प्रवर हिंदी ग़ज़ल
हिंदी भाषा के पास संस्कृत की परंपरा से प्राप्त विपुल शब्द संपदा है। नवीन जी ने इस शब्द संपदा का सराहनीय उपयोग किया है। ऐसे बहुत से शब्द हैं जो हमारी बोलचाल से बाहर होकर हमारी स्मृति या शब्दकोश तक सीमित हो गए हैं। नवीन जी ने इनको ग़ज़लों में पिरो कर संरक्षित करने का नेक काम किया है। तदोपरांत और अंततोगत्वा ऐसे ही शब्द हैं। ग़ज़ल में इनकी शोभा देखिए-
हृदय को सर्वप्रथम निर्विकार करना था
तदोपरांत विषय पर विचार करना था
अंततोगत्वा दशानन हारता है राम से
शांतिहंता शांति दूतों को हरा सकते नहीं
फ़िराक़ गोरखपुरी ने एक बातचीत में कहा था कि हिंदुस्तान में ग़ज़ल को आए हुए अरसा हो गया। अब तक उसमें यहां की नदियां, पर्वत, लोक जीवन, राम और कृष्ण क्यों शामिल नहीं हैं? कवि नवीन चतुर्वेदी ने अपने हिंदी ग़ज़ल संग्रह 'धानी चुनर' में फ़िराक़ साहब के मशवरे पर भरपूर अमल किया है। उनकी हिंदी ग़ज़लों में हमारी सांस्कृतिक विरासत के साथ-साथ हमारे पौराणिक चरित्र राम सीता, कृष्ण राधा, शिव पार्वती आदि अपने मूल स्वभाव के साथ शामिल हैं। हमारी आस्था के केंद्र में रहने वाले ये पात्र अपनी विशेषताओं के साथ बार-बार नवीन जी की ग़ज़लों में आते हैं और हमारी सोच एवं सरोकार का हिस्सा बन जाते हैं-
अगर अमृत गटकना हो तो कतराते हैं माहेश्वर
मगर विषपान करना हो तो आ जाते हैं माहेश्वर
निरंतर सद्गुणों का उन्नयन करते हुए रघुवर
यती बनकर जिए पल पल जतन करते हुए रघुवर
किसी भी रचनाकार का एक दायित्व यह भी होता है कि वह समाज के कुछ विशिष्ट मुद्दों को रेखांकित करे ताकि दूसरों के मन में भी सकारात्मक सोच का उदय हो। इसी सामाजिक सरोकार के तहत नवीन चतुर्वेदी ने कई ग़ज़लों में स्त्री अस्मिता को रेखांकित करने की अच्छी कोशिश की है-
हे शुभांगी कोमलांगों का प्रदर्शन मत करो
ये ही सब करना है तो संस्कार वाचन मत करो
सृष्टि के आरंभ से ही तुम सहज स्वाधीन थीं
क्यों हुई परवश विचारो, मात्र रोदन मत करो
सामाजिक सरोकार के इसी क्रम में नवीन जी ने पुरुषों की मानसिकता को भी उद्घाटित किया है-
व्यर्थ साधो बन रहे हो, कामना तो कर चुके हो
उर्वशी से प्रेम की तुम, याचना तो कर चुके हो
जैसे नटनागर ने स्पर्श किया राधा का मन
उसका अंतस वैसी ही शुचिता से छूना था
इन गज़लों में नयापन है, ताज़गी है और कथ्य की विशिष्टता है। ये ग़ज़लें उस मोड़ का पता देती हैं जहां से हिंदी ग़ज़ल का एक नया कारवां शुरू होगा-
दुखों की दिव्यता प्रत्येक मस्तक पर सुशोभित है
समस्या को सदा संवेदना की दृष्टि से देखें
वो जो दो पंक्तियों के मध्य का विवरण न पढ़ पाए
उसे पाठक तो कह सकते हैं संपादक कहें कैसे
नवीन चतुर्वेदी की हिंदी ग़ज़लें प्रथम दृष्टि में शास्त्रीय संगीत की तरह दुरूह लगती हैं। मगर जब आप इन के समीप जाते हैं, इन्हें महसूस करते हैं तो इनमें निहित विचारों और भावनाओं की ख़ुशबू से आपका मन महकने लगता है। ये कहना उचित होगा कि नवीन चतुर्वेदी की हिंदी ग़ज़लें किसी संत के सरस प्रवचन की तरह हैं जो हमारे अंतस को आलोकित करती हैं और मन को भी आह्लादित करती हैं। इस रचनात्मक उपलब्धि के लिए मैं Navin C. Chaturvedi को बहुत-बहुत बधाई देता हूं।
इस किताब के प्रकाशक हैं आर. के. पब्लिकेशन मुंबई। उनका संपर्क नंबर है- 90225-21190, 98212-51190
आपका-
देवमणि पांडेय
सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063 , 98210 82126
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