गुरुवार, 23 सितंबर 2021

सुहबतें फ़क़ीरों की : रक़ीब का ग़ज़ल संग्रह


 सुहबतें फ़क़ीरों की : रक़ीब का ग़ज़ल संग्रह

सतीश शुक्ला 'रक़ीब' नेकदिल इंसान और उम्दा शायर हैं। शायरी की शाहराह पर कई सालों के मुसलसल सफ़र के बाद हाल ही में उनका पहला शेरी मज्मूआ मंज़रे-आम पर आया है। इसका नाम है 'सुहबतें फ़क़ीरों की'।


हर ख़ुशी क़दम चूमे कायनात की उसके 

रास आ गईं जिसको सुहबतें फ़क़ीरों की 


सतीश शुक्ला 'रक़ीब' ने अपने फ़िक्र ओ फ़न को उसी रास्ते का हमवार बनाया है जो रास्ता मीर ओ ग़ालिब से चलता हुआ हम सब तक आया है। इस रिवायती शायरी में वे अपना रंग घोलने में कामयाब हुए हैं -


तुम्हारे शहर में मशहूर नाम किसका था 

मिरा नहीं था तो फिर एहतराम किसका था


वो कल जो बज़्मे - सुखन में सुनाया था तूने 

बहुत हसीन था लेकिन कलाम किसका था


रक़ीब के इज़हार में एहसास की ख़ुशबू है। उनकी ग़ज़लों में मुहब्बत की धनक मुस्कुराती हुई नज़र आती है। वे मुहब्बत की इस जानी पहचानी दुनिया में और कोई न कोई दिलचस्प पहलू निकाल ही लेते हैं-


आपसे तुम, तुमसे तू, कहने लगे 

छू के मुझको, मुझको छू, कहने लगे 


पहले अपनी जान कहते थे मुझे 

अब वो जाने आरज़ू कहने लगे 


रक़ीब के दिल की दुनिया में जज़्बात के ऐसे ख़ुशरंग नज़ारे हैं जो सब को भाते हैं। वहां मुहब्बत का एक गुलशन आबाद है। इस गुलशन में हवाएं मुहब्बत की ख़ुशबू बांटती हैं-


हवा के दोश पे किस गुलबदन की ख़ुशबू है 

गुमान होता है सारे चमन की ख़ुशबू है


अपने जज़्बात के इज़हार के लिए रक़ीब ने उर्दू ज़बान का ख़ूबसूरत इस्तेमाल किया है। उनकी उर्दू आम बोलचाल की उर्दू है। ज़बान से उनका जो रिश्ता है उसे आप उन्हीं के एक शेर से समझ सकते हैं-


हर एक लफ़्ज़ पे वो जां निसार करता है

अदब नवाज़ है उर्दू से प्यार करता है 


भारतीय साहित्य संग्रह नेहरू नगर, कानपुर से प्रकाशित इस ग़ज़ल संग्रह का मूल्य है 400 रूपये। ग़ज़लों की इस दिलकश किताब के लिए सतीश शुक्ला रक़ीब को बहुत-बहुत बधाई। उम्मीद है कि उनकी तख़लीक़ का यह सफ़र इसी ख़ूबसूरती से आगे भी जारी रहेगा। 


आपका- 

देवमणि_पांडेय 


सम्पर्क : सतीश शुक्ला 'रक़ीब'

98921 65892 & 99675 14139

सोमवार, 8 फ़रवरी 2021

आधारशिला : कवि मंगलेश डबराल पर केंद्रित


आधारशिला : कवि मंगलेश डबराल पर विशेष

अपने-अपने दौर में बड़ी कविता उन्हीं लोगों ने लिखी है जो कविता को जीवन के बीच खोजते रहे। कबीर, मीरा, निराला, मुक्तिबोध आदि कवियों में समय और संवेदना का बहुत अंतराल है पर अगर कबीर और मीरा की कविता हमें आज भी विचलित कर देती है और इतनी पुरानी होने के बावजूद आधुनिक और आवश्यक लगती है तो इसलिए कि उन्होंने कविता को जीवन से दूर और अलग नहीं माना और वे उस कविता को साहस के साथ धरती पर उतार लाए जो एक धुंधली शक्ल में हवा में तैर रही थी।

यह कहना है हिंदी के  दिवंगत कवि  मंगलेश डबराल का। आधारशिला के जनवरी 2021 अंक  में कवि मंगलेश डबराल पर विशेष सामग्री दी गई है। साहित्य, समय और समाज के बारे में मंगलेश डबराल जी से की गई बातचीत बहुत महत्वपूर्ण और सार्थक है। मंगलेश जी के अनुसार कविता के जो बुनियादी कथ्य रहे हैं उनमें एक यह है कि हम अपने जीवन, अस्तित्व और नियति के सवालों का सामना करें।

मंगलेश जी का यह कहना भी ग़ौरतलब है कि आज़ादी के बाद से हिंदी में जो भी सार्थक कविता लिखी गई है उसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह चीखना चिल्लाना तो दूर, बोलती भी बहुत कम है पर कहती बहुत कुछ है और इस कहने में ही वह सत्ता प्रतिष्ठान से अपने बुनियादी विरोध को दर्ज कर देती है।

आधारशिला के इस अंक में शामिल कहानियां, कविताएं, फ़िल्म समीक्षा, आलेख और अन्य रचनाएं भी अच्छी और पठनीय हैं।

उल्लेखनीय है कि आधारशिला के प्रधान संपादक दिवाकर भट्ट विदेशों में हिन्दी साहित्य और हिंदी भाषा के प्रचार प्रसार के लिए कटिबद्ध हैं। वे हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा बनाने के अभियान से भी जुड़े हैं।

सम्पर्क का पता है-

आधारशिला प्रधान : संपादक दिवाकर भट्ट
बड़ी मुखानी, हल्द्वानी, नैनीताल (उत्तराखंड)- 263 139 फ़ोन : 98970 872 48 , 86501 636 23

आपका-
देवमणि पांडेय

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, 
कन्या पाडा, गोकुलधाम, फ़िल्मसिटी रोड, 
गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063
98210 82126

---- ---- ---- ----- ---- 

रविवार, 7 फ़रवरी 2021

पुस्तक भेंट करने की परंपरा : रोचक क़िस्से


 पुस्तक भेंट करने की परंपरा

आयोजन शुरू होने से पहले लेखक महोदय अपनी कार की डिक्की में सौ डेढ़ सौ किताबें लेकर पहुंच गए। उन्होंने नाम पूछ पूछ कर लोगों को किताबें भेंट करनी शुरू कर दीं। एक किताब कथाकार सूरज प्रकाश को भी प्राप्त हुई जिस पर लिखा था- 'सूरज प्रकाश को सप्रेम भेंट'। थोड़ी देर बाद कुछ लोग और आ गए तो लेखक महोदय यह भूल गए कि किसको किताब दी थी और किसको नहीं। उन्होंने सूरज प्रकाश से दोबारा पूछा- आपका नाम ? सूरज प्रकाश ने मुस्कुराकर जवाब दिया- रशीद ख़ान। उन्होंने एक किताब पर लिखा- 'रशीद खान को सप्रेम भेंट' और सूरज प्रकाश को दोबारा किताब पकड़ा दी। 


कल शाम हम लोग फ़िल्म सिटी रोड, गोरेगांव पूर्व के फिएस्टा रेस्टोरेंट में कथाकार सूरज प्रकाश की अगुवाई में अड्डेबाज़ी के लिए बैठे थे। हमारे साथ शायर राजेश राज़ और कवि राजू मिश्रा भी मौजूद थे। हम लोगों के बीच पुस्तक भेंट करने की संस्कृति पर मज़ेदार चर्चा हुई।


क़िस्सा शायर बाक़र मेहंदी का


उर्दू के जाने-माने शायर और नक़्काद बाक़र मेहंदी के घर जाकर एक नौजवान ने उनको अपना नया काव्य संग्रह भेंट किया। बाक़र मेहंदी ने उलट पुलट कर दो तीन पन्ने देखे। फिर उस किताब को खिड़की से बाहर फेंक दिया। नौजवान हैरत से बोला- यह आपने क्या किया ? बाक़र मेहंदी बोले- जब तुम अपना काम कर रहे थे तो मैंने तुम्हारे काम में कोई दख़ल नहीं दिया। अब मैं अपना काम कर रहा हूं तो तुम क्यों एतराज़ कर रहे हो। 

 

क़िस्सा शायर सरदार जाफ़री का


भारतीय ज्ञानपीठ अवार्ड से सम्मानित शायर सरदार जाफ़री एक मुशायरे में दिल्ली गए थे। एक शायर ने उन्हें अपना शेरी मज्मूआ भेंट किया। दूसरे दिन वह शायर किसी काम से चांदनी चौक गया तो फुटपाथ पर रद्दी की दुकान पर अपनी वही किताब देखी। उठाकर देखा तो उसमें वह पन्ना भी सही सलामत था जिस पर उसने सरदार जाफ़री का नाम मुहब्बत के साथ लिखा था।


शायर ने फ़ोन किया और शिकायत की। सरदार जाफ़री ने जवाब दिया- मेरे घर में चार ही किताबें रखने की जगह है। मीर और ग़ालिब का दीवान है। कबीर और मीरा का काव्य संग्रह है। अब आप ही बताइए कि इनमें से मैं कौन सी किताब को बाहर निकाल दूं और आप का काव्य संग्रह घर में रखूं। शायर खामोश हो गया। 


इस मामले में हिंदी के समालोचक रामविलास शर्मा का नज़रिया ग़ौरतलब है। जब कोई रचनाकार उन्हें किताब भेंट करता तो वे तुरंत उसे वापस कर देते। वे कहते थे- "मुझे किताब ख़रीद कर पढ़ने की आदत है मैं आपकी किताब ख़रीद कर पढ़ लूंगा।"


अब आप ख़ुद ही यह तय कीजिए कि आपको अपनी नई नवेली किताब किसे भेंट करनी है और किसे नहीं।


आपका-

देवमणि पांडेय


सम्पर्क: बी-103, दिव्य स्तुति, 

कन्या पाडा, गोकुलधाम, 

फ़िल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, 

मुम्बई-400063, M : 98210 82126


नौजवान दोस्तो! तानसेन नहीं कानसेन बनिए

अपना भी कोई सानी रख

हिंदी के कई नौजवान कवि किसी गोष्ठी में जाते हैं तो सिर्फ़ सुनाने की फ़िराक़ में रहते हैं। दूसरा कवि क्या सुना रहा है, उस पर ध्यान नहीं देते। इनमें कई ऐसे भी होते हैं जो अपनी कविता सुना कर धीरे से खिसक भी जाते हैं। ऐसी ही एक काव्यगोष्ठी में कवयित्री-अभिनेत्री हेमा चंदानी अंजुलि ने एक ग़ज़ल पढ़ी, जिसमें एक शेर यह भी था -

अपने को तन्हा ना कर ,
अपना भी कोई सानी रख.

गोष्ठी की समाप्ति पर इस शेर के लिए मैंने हेमा चंदानी को बधाई दी। मेरी नज़र में काव्य गोष्ठी कविता की एक कार्यशाला होती है जिसमें एक सजग रचनाकार कुछ न कुछ ज़रूर सीखता है। वह अपने बड़े से भी सीख सकता है और अपने छोटे से भी सीख सकता है। हेमा चंदानी से मैं सीनियर हूं, लेकिन मैंने उनसे यह सीखा कि शायरी में 'सानी' शब्द का कितना ख़ूबसूरत इस्तेमाल किया जा सकता है। अब आइए इस शेर के बारे में थोड़ी सी गुफ़्तगू की जाए।

यह एक सीधा सादा शेर है जिसमें मशविरा दिया गया है कि अकेले रहना ठीक नहीं, किसी को अपना साथी बनाओ। कुछ ऐसा ही कभी मैंने भी अपने एक शेर में कहा था-

रहोगे कब तलक तन्हा किसी के अब तो हो जाओ
बशर की ज़िंदगानी तो फ़क़त दो-चार दिन की है

हेमा जी के शेर का हुस्न बस एक लफ़्ज़ 'सानी' में समाया हुआ है। यानी आपका सानी या साथी कैसा होना चाहिए।

(1) सानी का अर्थ है जोड़ीदार। एक मुहावरा है- "अमुक का कोई सानी नहीं है"। यानी अमुक जी बेजोड़ हैं। तो आपको एक ऐसा दोस्त बनाना है जो बेजोड़ हो।

(2) ग़ज़ल के ऊपर वाले मिसरे को ऊला कहते हैं और नीचे वाले मिसरे को सानी कहते हैं । यानी आप ऊला हैं और आपको एक सानी यानी जोड़ीदार चाहिए। ऊला और सानी मिसरे में रब्त यानी गहरा रिश्ता होना ज़रूरी है तभी शेर मुकम्मल होता है। जैसे दोनों हाथ की हथेलियों को आप मिलाते हैं तो नमस्कार की मुद्रा बन जाती है। या दोनों हाथ टकराते हैं तो ताली की आवाज़ सुनाई पड़ती है। यानी दोनों हाथ एक दूसरे के जोड़ीदार हैं और उनमें रब्त भी है।

(3) शायरी की रिवायत के अनुसार सानी मिसरा हमेशा ऊला से बेहतर होना चाहिए। यानी आप जिससे दोस्ती करना चाहते हैं वह आप से बेहतर हो। आपसे ज़्यादा समझदार हो कि आप उससे कुछ सीख सकें। तो अगर आप अब तक ऊला की तरह अकेले हैं तो आप अपना कोई सानी तलाश कीजिए। अगर आपको अपना सानी मिल गया तो आप एक ग़ज़ल के शेर की तरह मुकम्मल हो जाएंगे।

(4) यही ज़िन्दगी का दर्शन है जो हेमा चंदानी के शेर से ध्वनित हो रहा है। यानी इस शेर में सपाट बयानी नहीं है। इस शेर में जो व्यंजना है अगर आप उसको समझ पाते हैं तो यह शेर आपको बहुत अच्छा लगेगा।


किसी काव्यगोष्ठी में जाने का शऊर और सलीक़ा यही है कि आप वहां से कम से कम दो लाइन तो अपने साथ लेकर आएं। आप हमेशा तानसेन यानी सुनाने वाला मत बनिए। आप अच्छे कानसेन यानी श्रोता भी बनिए तभी आप कुछ सीख सकेंगे। अंत में मैं फिर से कवयित्री हेमा चंदानी को बधाई और शुभकामनाएं देता हूं कि वे इसी तरह बेहतरीन शेर कहती रहें।

आपका-
देवमणि पांडेय

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति,
कन्या पाड़ा, गोकुलधाम, फ़िलसिटी रोड, 
गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 
मो : 98210-82126

शुक्रवार, 22 जनवरी 2021

सुलगते मौसम में इमरोज़ आलम

सुलगते मौसम में इमरोज़ आलम

इमरोज़ आलम का शायराना मिज़ाज उनके चेहरे पर तबस्सुम के गुल खिलाता है। यह तबस्सुम उनकी शख़्सियत में चार चांद लगाता है और काव्य रसिकों को उनके क़रीब लाता है। इमरोज़ आलम में शायर होने की सारी ख़ूबियां मौजूद हैं। जोश है, जज़्बा है और जुनून है। उनका पहला शेरी मजमूआ “सुलगते मौसम में” जब मंज़रे आम पर आया तो उन्होंने हास्य कलाकार जॉनी लीवर से पुस्तक का लोकार्पण कराया। 

इमरोज़ आलम एक अलग ही राह के मुसाफ़िर हैं। मगर उनकी शायरी कभी इक़बाल की तरह सोते हुए को जगाती है। कभी साहिर लुधियानवी की तरह ख़ुद से बतियाती है। कभी वो फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के लहजे में क्रांति की मशाल जलाते हैं और कभी अहमद फ़राज़ के रंग में डूब कर मुहब्बत की ग़ज़ल सुनाते हैं - 

अंदेशा बिछड़ जाने का होता भी बहुत है
ऐ जान मगर तुझपे भरोसा भी बहुत है

इमरोज़ आलम की शायरी में ख़ूबसूरत मंज़रकशी है। यही ख़ासियत उनमें स्क्रिप्ट राइटर बनने का ख़्वाब जगाती है। उन्हें पूरा यक़ीन है कि एक दिन उनकी भी मेहनत रंग लाएगी और यह फ़िल्म इंडस्ट्री सलीम जावेद की तरह उन्हें भी सर आंखों पर बिठाएगी। 

इमरोज़ आलम की शायरी में मुहब्बत के अफ़साने पोशीदा हैं। दिल टूटने की सदाएं भी हैं। टूटे हुए दिल का यही दर्द उनकी शायरी की ताक़त भी है -

न तुम से नज़रें मिलाते न बेकली होती
बड़ी हसीन हमारी ये ज़िंदगी होती

तुम्हारे होने ने बर्बाद कर दिया हमको
वगरना हमसे कहां जान शायरी होती

इमरोज़ आलम ने अपने ज़ाती तजरुबों से शायरी का तामहल बनाया है। उसे सूरज की तपिश और चांद की किरनों से सजाया है। इस दयार में मुहब्बत के फूल मुस्कुराते हैं और नागफ़नी के कांटे भी जगह पाते हैं। कहीं रोशनी का उपहार है तो कहीं अंधेरों की सौग़ात है। इमरोज़ आलम की शायरी में धनक के सभी रंग नज़र आते हैं। अभी उन्हें यह तय करना है कि रिवायत की क़दीम राह पे चलना है, कि नए सफ़र का आग़ाज करना है। मेरी दिली ख़्वाहिश है कि ऊपर वाला उन्हें राह दिखाए और मंज़िले मक़सूद तक पहुंचाए। आमीन। 


आपका-
देवमणि पांडेय

सम्पर्क: बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, 
गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210 82126

गुरुवार, 7 जनवरी 2021

शायर पंछी जालौनवी का काव्य संग्रह : दो सफ़र


शायर पंछी जालौनवी का काव्य संग्रह : दो सफ़र

लॉक डाउन में ज़िंदगी की परवाज जैसे थम गई। शायर पंछी जालौनवी ने अपने घर के दरीचे से ज़िंदगी की जो हलचल देखी उस मंज़र को उन्होंने लफ़्ज़ों का लिबास पहना कर नज़्मों की शक्ल में पेश किया। पंछी एक हस्सास शायर हैं। इन नज़्मों में शामिल उनका एहसास पाठकों के दिल पर दस्तक देता है। उनके इज़हार में फ़िक्र के साथ आंखों की नमी भी शामिल है-

दर्द एहसास का 
इस क़द्र भी मर सकता है 
नंगे पावों
मीलों का सफ़र 
कोई ख़ुद अपनी सवारी पे 
पैदल भी कर सकता है 

पंछी ने कोरोना काल में लिखी गई अपनी इन नज़्मों के मज्मूए को 'दूसरा सफ़र' उन्वान दिया है। इस सिलसिले में वह अपने ज़ाती सफ़र से बाहर निकलकर दूसरों के दुखों के कारवां में शरीक होते हैं और उसे अपनी रचनात्मकता में बख़ूबी ढाल देते हैं-

मैंने देखा-
तीस बरस की 
बूढ़ी मां का 
आठ बरस का जवान बच्चा 
अपने कांधे का सहारा देकर 
मां के क़दमों से 
सफ़र की थकान उठा रहा था 

पंछी जालौनवी की यह किताब कोरोना के साए में सफ़र तय करती ज़िंदगी का एक अहम दस्तावेज़ है। पलायन, किराएदार, झोपड़पट्टी, रेलगाड़ी, हमारी रात फुटपाथ, नींद का कातिल, इबादतगाह, दफ़्तर, आपबीती, सुरक्षाकर्मी, मास्क आदि उनकी कई ऐसी नज़्में हैं जो कोरोना के मुश्किल समय में झेली गई तकलीफ़ और पीड़ा को सामने लाकर गुजिश्ता वक़्त की जीती जागती तस्वीर पेश कर देती हैं। 


सरल सहज ज़बान में कही गईं ये सीधी-सादी नज़्में पढ़ने वालों पर गहरा असर डालती हैं। पंछी एक उम्दा शायर होने के साथ-साथ एक अच्छे सिने गीतकार भी हैं। उन्होंने कई फ़िल्मों को अपने गीतों से सजाया है। 'दस बहाने करके ले गए दिल' फ़िल्म 'दस' का यह गीत उन्ही की क़लम का कमाल है। लखनऊ के मशहूर शायर पवन कुमार के सानिध्य में ऑनलाइन आयोजित एक कार्यक्रम में पंछी की इस किताब का इस्तक़बाल किया गया। इसकी निज़ामत शायर रोहित विक्रम भदोरिया ने की। सदारत की ज़िम्मेदारी आपके दोस्त देवमणि पांडेय को सौंपी गई थी।

इस सुंदर किताब के लिए मैं पंछी जालौनवी को हार्दिक बधाई देता हूं। मेरी दुआ है कि उनकी रचनात्मकता का यह सिलसिला इसी तरह कामयाबी के साथ जारी रहे।

आपका-

देवमणि पांडेय
सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, 
कन्या पाड़ा, गोकुलधाम, फ़िल्म सिटी रोड, 
गोरेगांव पूर्व, मुंबई- 400063, 98210-82126

मंगलवार, 29 दिसंबर 2020

उज़्बेकिस्तान : मज़हबी पाबंदियों से मुक्त इस्लामिक देश

 
मज़हबी पाबंदियों से मुक्त इस्लामिक देश उज़्बेकिस्तान

इस्लामिक देशों के बारे हमारे मन में एक अलग ही इमेज़ होती है। मगर सन् 2012 में उज़्बेकिस्तान पहुँचकर पांच दिन ताशकंद में और एक दिन समरकंद में घूमते हुए जो सामाजिक, सांस्कृतिक और मज़हबी मंज़र नज़र आया वह हमें हैरत में डाल देने वाला था। उज़्बेकिस्तान एक जनतांत्रिक इस्लामिक देश है। मगर यहाँ का जीवन अफ़गानिस्तान, पाकिस्तान और सऊदी अरब के इस्लामपरस्त लोगों से बिल्कुल अलग है। हमें यहाँ सड़क, मैदान या किसी मुहल्ले में कहीं भी कोई मस्जिद, मक़तब या मदरसा नज़र नहीं आया। कहीं कोई अज़ान नहीं सुनाई दी। यहाँ तक कि कोई चर्च या मंदिर भी दिखाई नहीं पड़ा। कोई महिला मज़हबी लिबास (बुर्क़ा) नहीं पहनती।

हमारे गाइड रुस्तम ने बताया कि समरकंद में अमीर तिमूर (तैमूर लंग) के मक़बरे के अंदर एक मस्जिद है और ताशकंद में हज़रत इमाम के मकबरे के अंदर एक मस्जिद है। मगर ये इबादत के बजाय पर्यटन के प्रमुख केंद्र हैं। कुछ लोग अपने घरों के अंदर नमाज़ अदा करते हैं मगर उसके लिए कोई वक़्त मुक़र्रर नहीं है। यहाँ मुस्लिम, ईसाई और ईश्वर को न मानने वाले वामपंथियों के बीच ज़ब़ान और मज़हब को लेकर कोई संघर्ष भी नहीं है। उज़्बेकिस्तान की राजधानी ताशकंद की जनसंख्या 30 लाख है। इनमें 90% मुसलमान हैं और 8% क्रिचियन हैं और 2% में बाकी दुनिया शामिल है। सन् 1991 में सोवियत यूनियन से अलग होकर एक आज़ाद देश बनने के बावजूद उज़्बेकिस्तान ने मज़हबी मरकज़ बनाने के बजाय मूलभूत सुविधाओं- शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार के विकास पर ज़ोर दिया। यहाँ बी.ए. तक सभी के लिए शिक्षा मुफ्त़ है।
आज़ादी का स्मारक : इंडिपेंडेंस स्क्वायर

उज़्बेकिस्तान की राजधानी ताशकंद का सबसे प्रमुख स्थल माना जाता है - इंडिपेंडेंस स्क्वायर। पहले इसका नाम था लेनिन स्क्वायर। सन् 1955 में जब यह बना था तो एक ऊँचे स्तम्भ पर लेनिन की आदमकद विशाल प्रतिमा स्थापित की गई थी। सन् 1991 में सोवियत यूनियन से आज़ाद होकर उज़्बेकिस्तान एक जनतांत्रिक इस्लामिक देश बन गया। लेनिन की प्रतिमा ध्वस्त कर दी गई और उसकी जगह एक ग्लोब स्थापित किया गया। इस ग्लोब पर उज़्बेकिस्तान का मानचित्र अंकित किया गया है। ग्लोब के नीचे अपनी गोद में शिशु लिए एक जवान माँ बैठी है। उसके चेहरे पर आत्मीय मुस्कान है। माँ बच्चे से कह रही है- 'बेटा तू बहुत ख़ुशक़िस्मत है जो आज़ाद मुल्क में पैदा हुआ'।

इंडिपेंडेंस स्क्वायर के दूसरे कोने पर एक बूढ़ी माँ की उदासी में डूबी हुई प्रतिमा है। यह शोकमग्न माँ अपने उन बेटों का इंतज़ार कर रही है जो कभी नहीं लौटेंगे। द्वितीय विश्वयुद्ध में उज़्बेकिस्तान के छ: लाख लोग मारे गए थे। उनकी याद में यहाँ एक अमर ज्योति अनवरत जल रही है। नज़दीक के बरामदे में ताम्रपत्रों पर इन शहीदों के नाम अंकित हैं। नाम के साथ उनके जन्म और मृत्यु का साल भी दर्ज किया गया है।
चौदह हज़ार शहीदों का स्मारक : शहीद पार्क

ताशकन्द शहर के मध्य में टीवी टावर के पास हरियाली और फूलों से समृद्ध एक पार्क में शहीदों का भव्य स्मारक आकर्षण का प्रमुख केंद्र है। यह किसी युद्ध में शहीद हुए सैनिकों का स्मारक नहीं है। हमारे गाइड ने बताया कि यह उन 14000 बुद्धिजीवियों, विचारकों, लेखकों और कलाकारों की यादों का मरक़ज़ है, जिन्हें किसी समय उज़्बेकिस्तान को सोवियत रिपब्लिक का हिस्सा बनाने के लिए एक साथ, एक जगह इकट्ठा करके क़त्ल करने के बाद यहीं दफ़ना दिया गया था। उस वक़्त यह एक निर्जन स्थान था। आज़ाद देश बनने पर इसे शहीद पार्क बनाया गया। पास से गुज़रती एक नदी की धारा को मोड़ कर इसके बीचों-बीच से गुज़ारा गया । पक्के किनारों वाली इस नदी, हरियाली और फूलों ने शहीद पार्क को बेहद ख़ूबसूरत बना दिया है। आज यह पार्क कला और साहित्य का पावन तीर्थ बना हुआ है और दूर-दूर से लोग शहीदों की स्मृति को सलाम करने के लिए आते हैं।
ताशकन्द, समरकन्द और बुखारा

उज़्बेकिस्तान एक छोटा-सा, हरा-भरा और बहुत प्यारा देश है। यहाँ के तीन प्रमुख शहर- ताशकन्द, समरकन्द और बुखारा मशहूर हैं। ताश माने पत्थर और कंद माने शहर। ताशकन्द यानी पत्थरों का शहर। इसके चारों तरफ़ छोटे-छोटे पहाड़ हैं। वास्तुकला के नायाब नमूने हैं। यहाँ गगनचुम्बी इमारतें नहीं हैं क्यों कि यहाँ कभी-कभी तेज़ भूकम्प आते हैं। ताशकंद से चारवाक लेक जाते हुए रास्ते में एक छोटा-सा क़स्बा नज़र आता है ग़ज़लकन्द। ग़ज़लकन्द यानी ग़ज़लों का शहर। यहाँ के लोग कहते हैं कि ग़ज़ल यहीं पैदा हुई और बाद में मक़बूल होकर पूरी दुनिया पर छा गई।

समर कहते हैं फल को। फलों ने समरकन्द को इतनी दौलत दी है कि इसे अमीर लोगों का शहर कहा जाता है। जगह-जगह अंगूर, सेब, चेरी, खुबानी, खरबूज़ और तरबूज़ दिखाई पड़ते हैं। यहाँ तक कि इस शहर की गलियों में भी लोहे के पाइप पर अँगूर की बेलें झूलती रहती हैं और राहगीरों को धूप से बचाती हैं। ड्राई फ्रूट का विशाल मार्केट भी यहीं है। सन् 1398 में जब अमीर तिमूर (तैमूर लंग) दिल्ली आया था तो वह समरकंद का बादशाह था। यहाँ तैमूर लंग का बनवाया हुआ एक शानदार मक़बरा है। इसके गुम्बद की नक़्क़ाशी में सोने का भरपूर उपयोग किया गया है। कहा जाता है कि उसने यह मक़बरा अपने बेटे के लिए बनवाया था। एक दुर्घटना में अपनी जान गँवाने पर ख़ुद तैमूर लंग को इसी में दफ़न होना पड़ा। चंगेज़ ख़ाँ, नादिर शाह और बाबर का भी समरक़ंद और बुखारा से ऐतिहासिक रिश्ता रहा है। वैसे बुखारा को सूफ़ियों का शहर माना जाता है। हमें बताया गया कि यह निज़ामुद्दीन औलिया की मुहब्बत तथा मुइनुद्दीन चिश्ती की इबादत का शहर है।

परदे से मुक्त महिलाओं का समाज

ताशकंद के प्रमुख बाज़ारों, चिमगान हिल, चारवाक लेन और समरकंद के विशाल ड्राई फ्रूट मार्केट में घूमते हुए हमने देखा कि यहाँ की महिलाएं परदा नहीं करतीं। बाज़ार में, रेस्तराँ में, शापिंग माल में वे मर्दों से अधिक संख्या में चुस्ती-फुर्ती से काम करती हुई नज़र आती हैं। वे देर रात तक आज़ादी से घूमती- फिरती हैं। हमारे गाइड ने बताया कि यहाँ लड़कों की तुलना में लड़कियों की संख्या दो गुनी है। काफ़ी महिलाएं ऊपरी दाँतों में सोना मढ़वाती हैं। वे जब हँसती या बोलती हैं तो यह स्वर्णिम दंतपंक्ति बड़ी सुंदर लगती है। यहाँ की अधिकांश लड़कियाँ हाई हील पहनती हैं। होटल और रेस्तराँ में हाई हील पहनकर लड़कियाँ बैली डांस करती हैं। जब वे बिजली की गति से नाचती हैं तो हाई हील पर उनका बैलेंस देखने लायक होता है। 

आर्थिक आत्मनिर्भरता

उज़्बेकिस्तान में खेती-बारी ज़बरदस्त है। गेहूँ, सब्ज़ियां, फल बहुतायत से पैदा होते हैं। कपास निर्यात करने में उज़्बेकिस्तान दुनिया में तीसरे नम्बर पर है। तेल और गैस भी भरपूर है। भारतीय मुद्रा में पेट्रोल 25 रूपए लीटर है। सात रूपए का टिकट लेकर मेट्रो ट्रेन या लो फ्लोर वातानुकूलित बस में पूरे दिन कहीं भी आ-जा सकते हैं। यहाँ मोटर सायकिल, बाइक या स्कूटर नहीं हैं। महज कारें, बसें और टैक्सियाँ ही नज़र आती हैं। इक्का-दुक्का अपवाद छोड़ दें तो अधिकांश कारें और टैक्सियाँ सफ़ेद रंग की ही हैं। यहाँ के लोगों में ख़ुद इतना अनुशासन है कि छ: दिन में हमें कहीं हार्न की आवाज़ नहीं सुनाई पड़ी। हमारी बस के ड्राइवरों ने भी कभी हार्न नहीं बजाया।
अपराध मुक्त देश उज़्बेकिस्तान

उज़्बेकिस्तान एक अपराध मुक्त देश है। हमको यहाँ कहीं भी पुलिस के दर्शन नहीं हुए। गीतकार डॉ बुद्धिनाथ मिश्र के साथ सुबह 6 बजे मार्निंग वाक करते हुए हम संसद भवन के गेट पर चले गए। संसद भवन पर भी पुलिस का पहरा नहीं है। गाइड ने बताया कि यहाँ अपराध ज़ीरो है। न चोरी, न डकैती, न मार पीट, न भ्रष्टाचार। आम जनता को अंग्रेजी बिल्कुल नहीं आती। बस चंद लोगों को काम चलाऊ अंग्रेज़ी ही आती है। किसी दुकानदार से कुछ ख़रीदिए और अंग्रेज़ी में दाम पूछिए तो वह कुछ बोलता नहीं, झट से कलकुलेटर या मोबाइल स्क्रीन पर टाइप करके दाम दिखा देता है। कहीं अंग्रेज़ी का अख़बार भी नज़र नहीं आता। यहाँ तक कि हमारे चार सितारा होटल पार्क ट्यूरान की लॉबी में भी कोई अख़बार नहीं दिखाई पड़ा- चैन हो जाए अगर मुल्क में अख़बार न हो। उज़्बेकी ज़बान में कुछ अख़बार निकलते ज़रूर हैं मगर प्रसार बहुत कम है।

ताशकंद में सुख, सुविधा और शांति

उज़्बेकिस्तान की राजधानी ताशकंद में हर तरफ़ हरियाली है, रंग-बिरंगे फूल हैं। न तो कोई घास पर बैठता है और न ही कोई घास पर चलता है । कोई फूल भी नहीं तोड़ता। ऐसे अलिखित नियमों का पालन हर इंसान करता है क्यों कि वे स्व-अनुशासित हैं। यूएस डॉलर की तुलना में स्थानीय मुद्रा सोम की क़ीमत बहुत कम है। सौ डॉलर में अढ़ाई लाख सोम मिलते हैं। चाय एक हज़ार, कॉफी दो हज़ार और टैक्सी का न्यूनतम किराया तीन हज़ार सोम है। ताशकंद में कई भारतीय होटल-रेस्तराँ हैं जहाँ भारतीय वेज़ और नानवेज़ भोजन मिल जाता है। पिछले 21 साल से राष्ट्रपति इस्लाम करीमोव अपने पद पर बने हुए हैं। पाँच राजनीतिक पार्टियाँ हैं मगर राजनीतिक उठापटक नहीं है। इस लिए यहाँ सुख, सुविधा और शांति है।
हमारे देश भारत के लिए उज़्बेकिस्तान के लोगों में बहुत प्यार है। शास्त्री स्ट्रीट में हमारे स्व. प्रधान मंत्री लालबहादुर शास्त्री की प्रतिमा को उन्होंने बहुत आदर से साफ़-सुथरा और सँभालकर रखा है। बच्चों से लेकर लड़कियाँ, मर्द और औरतें जब हमें देखते हैं तो बड़े प्यार से सिर झुकाकर या अदब से हाथ जोड़कर कहते हैं- नमस्ते। वे नमस्ते इतनी विनम्रता और म्यूज़िकल ढंग से बोलते हैं कि तबियत ख़ुश हो जाती है।

सृजन सम्मान (छत्तीस गढ़) की ओर से पांचवा अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन, ताशकंद, उज्बेकिस्तान में आयोजित किया गया था। उन्हीं के सौजन्य से 24 से 30 जून 2012 तक उज़्बेकिस्तान की यह साहित्यिक यात्रा सम्पन्न हुई थी। इसमें देश-विदेश से 135 हिंदी रचनाकारों को आंत्रित किया गया था।


आपका- 
देवमणि पांडेय

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्यापाड़ा, 
गोकुलधाम, फ़िलमसिटी रोड, 
गोरेगांव पूर्व, मुम्बई - 400 063,
फोन : 98210-82126

गुरुवार, 24 दिसंबर 2020

मर्यादा क़ानूनों की : डॉ क्षमा पांडेय का काव्यसंग्रह

मर्यादा क़ानूनों की : डॉ क्षमा पांडेय का काव्यसंग्रह

मनुष्य के सोच और सरोकार की अभिव्यक्ति के लिए कविता एक असरदार माध्यम है। भोपाल की कवयित्री डॉ क्षमा पांडेय ने अपनी कविताओं के ज़रिए यह साबित किया है कि वैचारिक संवाद के लिए काव्य सृजन का इस्तेमाल कितनी ख़ूबसूरती से किया जा सकता है। उनके नए काव्य संग्रह का नाम है-  मर्यादा क़ानूनों की। कथ्य की नवीनता और  प्रस्तुतीकरण के धारदार तेवर के कारण यह काव्य संग्रह पाठकों के मन मस्तिष्क पर एक गहरी छाप छोड़ने में सक्षम है। 

डॉ क्षमा पांडेय की कविताओं का फलक बहुत व्यापक है। उनकी कविताएं देश, समाज, और मनुष्यता के पक्ष में खड़ी हैं। ये कविताएं विषय वैविध्य का अद्भुत नमूना हैं। क्षमा जी ने स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, पर्यावरण, मां, बेटी, पिता, दीदी, फूल, प्रेम, वर्षा, मनुष्य, विश्व शांति आदि विषयों पर कविताएं लिखकर नई पीढ़ी के सामने देश प्रेम, समाज प्रेम और प्रकृति प्रेम का आदर्श प्रस्तुत किया है। अपनी संवेदना के ज़रिए ये कविताएं पाठकों के साथ अपना एक आत्मीय रिश्ता जोड़ लेती हैं।

डॉ क्षमा पांडेय का जन्म एक साहित्यिक परिवार में हुआ। वे "लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती" जैसी प्रेरक कविता लिखने वाले पद्मश्री राष्ट्रकवि सोहनलाल द्विवेदी की सुपौत्री हैं। उनके पिता डॉ शिव शरण द्विवेदी संस्कृत साहित्य के  प्रकांड विद्वान और कवि थे। मां मनोरमा देवी का संगीत से गहरा लगाव था। ऐसे साहित्यिक माहौल में डॉ क्षमा पांडेय की रचनात्मकता को आगे बढ़ने का हौसला मिला। अपनी सशक्त लेखनी से उन्होंने साबित किया कि वे एक समर्थ कवयित्री हैं।

'मर्यादा क़ानूनों की' काव्य संकलन के लिए मैं डॉ क्षमा पांडेय को हार्दिक बधाई देता हूं। मेरी शुभकामना है कि उनकी कविताओं को जनमानस में लोकप्रियता हासिल हो और वे इसी तरह कामयाबी की मंज़िलें तय करती रहें।

नमन प्रकाशन दरियागंज नई दिल्ली से प्रकाशित किस काव्य संग्रह का मूल्य ₹250 है। डॉ क्षमा पांडेय का सम्पर्क नंबर है 9826 99 1191.

आपका-
देवमणि पांडेय

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, 
कन्या पाड़ा, गोकुलधाम, 
फ़िल्म सिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, 
मुंबई- 400063, 98210-82126

रविवार, 20 दिसंबर 2020

सच ही तो कहा है : प्रदीप गुप्ता का काव्य संग्रह

हर समय बस आप बोलें और मैं सुनता रहूं

लॉकडाउन के दौरान वक़्त की झोली से लम्हों की जो सौग़ात हासिल हुई उसका लोगों ने अपने मन मुताबिक सदुपयोग किया। देश के एक प्रतिष्ठित बैंकिंग संस्थान से सेवानिवृत्त कवि, लेखक, पत्रकार और छायाकार प्रदीप गुप्ता ने अपनी रचनात्मकता का सबूत देने के लिए गुज़रे दिनों की खिड़किया़ं खोलीं और जमकर कविताएं लिखीं। ईशा प्रकाशन मुंबई से प्रकाशित उनके काव्य संग्रह का नाम है- 'सच ही तो कहा है'। लॉकडाउन के दौरान घरों में क़ैद लोग किस मानसिकता से गुज़र रहे थे इसे कवि प्रदीप गुप्ता की दो लाइनों से समझा जा सकता है-

इन दिनों घर पर ही हूं कब किधर जाता हूं मैं
जब कभी सांकल बजे फिर तो डर जाता हूं मैं

कवि प्रदीप गुप्ता ने अपना यह काव्य संकलन यारों के यार सिने पत्रकार मनोहर ठाकुर की स्मृति को समर्पित किया है। मनोहर ठाकुर के आवास पर अंधेरी में अक्सर कविता पाठ और संगीत की महफ़िलें जमती थीं। लोग झूम कर सुनते और बाद में वहां से झूमते हुए अपने घर जाते। मनोहर ठाकुर के निधन के बाद अब वहां सिर्फ़ तनहाइयां झूमती हैं।

प्रदीप गुप्ता की कविताओं से यह साफ़ ज़ाहिर होता है कि उन्होंने लॉकडाउन के दौरान ख़ुद को उदासी और अवसाद की गिरफ़्त में आने नहीं दिया। उनकी कविताओं में महकती हुई तन्हाई है, चाहत है, मुहब्बत है और दिल के अफ़साने हैं। उन्होंने इन कविताओं में किशोरावस्था के रंगीन जज़्बातों और हसीन अरमानों का गुलदस्ता पेश किया है।

दिलकश ज़बान में लिखी गई ये कविताएं सीधा दिल के दरवाज़े पर दस्तक देती हैं। प्रदीप गुप्ता ने तस्लीम किया है कि आज भी उनके भीतर एक किशोर ज़िंदा है। इसी वजह से इस उम्र में भी वे रोमानी कविताएं लिख रहे हैं। ख़ास बात यह है कि उनके इज़हार के लहजे में भी किशोरावस्था का जोश, उमंग और तरंग है। उन्होंने लिखा है-

इश्क़ बैंक बैलेंस नहीं है, ना ही बिजनेस खाता है
इसमें पाने से भी ज़्यादा, खोकर बड़ा मज़ा आता है

अपनी काव्यात्मक अभिव्यक्ति में प्रदीप गुप्ता आम आदमी से भी अपना रिश्ता जोड़ लेते हैं। वस्तुत: यह उनकी सृजनात्मक उपलब्धि है-

हर समय बस आप बोलें और मैं सुनता रहूं
अब तो पानी चढ़ गया है सर से ऊपर ऐ हुज़ूर

किस क़दर हालात बिगड़े हैं ज़माने के प्रदीप
आदमी बेबस है लेकिन ख़ून खौले है ज़रूर

किशोरावस्था में समाज की बंदिशों और मानदंडों की परवाह किए बिना सपने उड़ान भरते हैं। कवि प्रदीप गुप्ता ने भी बंदिशों की क़ैद से आज़ाद होकर मुक्त मन से ये कविताएं लिखी हैं। मधुर भावनाओं से सजी हुईं ये कविताएं काव्याकाश पर उन्मुक्त उड़ान भरती हैं।

कहा जाता है कि हर आदमी के भीतर एक बच्चा होता है। उसी तरह कह सकते हैं कि हर आदमी के भीतर एक किशोर होता है जो मुहब्बत की ज़बान बोलता है। प्रदीप गुप्ता की कविताओं में छलकते हुए मीठे जज़्बात हैं। मधुर भावनाओं का उमड़ता हुआ समंदर है। मुहब्बत का बहता हुआ दरिया है। आप अपना बौद्धिक जामा उतार कर अगर इन कविताओं के पास जाएंगे तो ये कविताएं आपको पसंद आएंगी। इनसे गुज़रते हुए आप भी एहसास की ख़ुशबू से तरबतर हो जाएंगे।
कुल मिलाकर प्रदीप गुप्ता का यह काव्य संग्रह युवा दिल के तारों में झंकार पैदा करने की सामर्थ्य रखता है। मैं उन्हें बधाई और शुभकामनाएं देता हूं कि वे इसी तरह महकते ख़्वाबों के गुलदस्ते सजाते रहें और दिल की दुनिया को महकाते रहें।

आपका-
देवमणि पांडेय
सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति,
कन्या पाड़ा, गोकुलधाम, फ़िल्म सिटी रोड,
गोरेगांव पूर्व, मुंबई- 400063, 98210-82126

दर्द का अहसास : विवेक का ग़ज़ल संग्रह

दर्द का अहसास : विवेक का ग़ज़ल संग्रह

ग़ज़ल एक ऐसा राजमार्ग है जिस पर लाखों मुसाफ़िर सफ़र तय कर रहे हैं। इस कारवां में दूसरों से अलग नज़र आना लाज़िमी है। इसके लिए अपना कथ्य, अपनी ज़बान और अपना अंदाज़ ए बयां चाहिए। यह अच्छी बात है कि ग़ज़लकार ओंकार सिंह 'विवेक' के पास रचनात्मकता की यह पूंजी है।

मेरा अंदाज़ ए बयां मेरा मिज़ाज
ख़ुद समझ लीजे मेरे अशआर से

अपने प्रथम ग़ज़ल संग्रह 'दर्द का अहसास' में ओंकार सिंह 'विवेक' ने यह साबित करने कि सराहनीय कोशिश की है कि क्या कहना है और कैसे कहना है।

जब घिरा छल फ़रेबों के तूफ़ान में
मैंने रक्खा यकीं अपने ईमान में
दूसरों को नसीहत से पहले ज़रा
झांकिए आप अपने गरीबान में

ग़ज़ल एक लंबा फासला तय कर चुकी है। आज की ग़ज़ल वक़्त के बदलते हुए मिज़ाज की साक्षी है। आज का युग जज़्बात का नहीं व्यावहारिकता का युग है। इस तल्ख़ हक़ीक़त को विवेक अपनी ग़ज़लों में रेखांकित करते हैं।

जिस किसी को देखिए है तल्ख़ उसका ही मिज़ाज
अब कहां है नम्रता और सादगी व्यवहार में
तुझको मैं आगाह कर दूं अक़्ल का यह दौर है
काम लेने की ज़रूरत अब नहीं जज़्बात से
किसी को फ़र्ज़ की अपने यहां कोई नहीं चिंता
मगर हक़ मांगने को हर कोई तैयार बैठा है

अपने अहसास को अल्फ़ाज़ में पिरोकर विवेक ने ग़ज़ल का दामन सजाया है। उन्होंने आसान ज़बान, बोलचाल की शैली और छोटी बहर में कई ऐसी ग़ज़लें कही हैं जो पाठकों को पसंद आएंगी-

कर रहे हैं मंज़िलों की जुस्तजू
लोग अपना हौसला खोते हुए
ख़्वाब से कैसे हो आंखें आशना
जागते रहते हैं हम सोते हुए

विवेक को उर्दू लफ़्ज़ों से कुछ ज़्यादा ही मुहब्बत है। उन्होंने कई ऐसे उर्दू शब्दों का इस्तेमाल अपनी ग़ज़लों में किया है जो आम प्रचलन में नहीं हैं। उन्हें इस बंदिश से आज़ाद होने की ज़रूरत है। जब वे आम बोलचाल की ज़बान में अपनी बात कहते हैं तो उसका असर ज़्यादा दिखाई देता है।

किसी के ग़म को हमें अपना ग़म बनाने में
बड़ा सुकून मिला नेकियाँ कमाने में

ओंकार सिंह 'विवेक' ने अपने प्रथम ग़ज़ल संग्रह में बेहतर संभावनाओं का संकेत दिया है। अपने आसपास की दुनिया, अपने समाज की हक़ीक़त और अपने वक़्त के सवालों को उन्होंने अपनी अभिव्यक्ति कौशल से ग़ज़लों में ढालने की कोशिश की है। मुझे उम्मीद है कि अपनी सीमाओं को पहचान कर वे निरंतर प्रगति के पथ पर अग्रसर रहेंगे। 'दर्द का अहसास' ग़ज़ल संग्रह के लिए मैं उन्हें हार्दिक बधाई देता हूं और अंत में उन्हीं का एक शेर उनको भेंट करता हूं।

मश्क करना बहुत ज़रूरी है
शायरी में निखार लाने को

आपका-
देवमणि पांडेय
सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाड़ा,
गोकुलधाम, फ़िल्म सिटी रोड, गोरेगांव पूर्व,
मुंबई- 400063, 98210-82126

 

शनिवार, 19 दिसंबर 2020

हिंदुस्तान के लोक कवि अब्दुर्रहीम खानखाना

 

हिंदुस्तान के लोक कवि खानखाना रहीम

हिंदी में शोध ग्रंथों की दशा और दिशा से आप सुपरिचित हैं। कंकड़ के इस ढेर में कभी-कभी हीरे भी नज़र आते हैं। डॉ दीपा गुप्ता की प्रकाशित शोध पुस्तक 'खानखाना रहीम' से गुज़रते हुए महसूस हुआ कि यह पुस्तक सृजनात्मकता का महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है। सौ से अधिक किताबों के अध्ययन, मनन और अनुशीलन से डॉ दीपा गुप्ता ने लोक कवि खानखाना रहीम का जो व्यक्तित्व निर्मित किया है वह बेमिसाल और विलक्षण है। उल्लेखनीय है कि रहीम के कवि रूप के साथ साथ दीपा जी ने उनके शौर्य और पराक्रम वाले रूप को भी प्रमुखता से सामने रखा है।
अब्दुर्रहीम खानखाना अपनी काव्यात्मक उपलब्धियों के ज़रिए आज भी भारतीय जनमानस में रचे बसे हैं। दीपा गुप्ता अपने शोध में इस तथ्य को सामने लाती हैं कि खानखाना रहीम ने अरबी, फारसी, तुर्की, संस्कृत, ब्रज, अवधी आदि कई भाषाओं में काव्य रचना की। नीति, भक्ति, श्रृंगार और जीवन दर्शन से समृद्ध अपने दोहों के लिए रहीम आज भी लोक स्मृति का हिस्सा बने हुए हैं। लोक भाषा में लोक भावनाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले उनके दोहे आज भी बात बात में उद्धृत किए जाते हैं-
रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय
टूटे तो फिर ना जुड़े, जुड़े गांठ पड़ि जाय
रहीम जिस तरह हमारी परंपरा और संस्कृति से जुड़े लोक नायकों को दोहे का कथ्य बनाते हैं वह अद्भुत है- थोरो किए बड़ेन की, बड़ी बड़ाई होय ज्यों रहीम हनुमंत को, गिरिधर कहे न कोय जो बड़ेन को लघु कहें, नहिं रहीम घट जाहिं गिरिधर-मुरलीधर कहे, कछु दुख मानत नाहिं दूध में मिश्री की तरह रहीम भारतीय समाज में घुल मिल गए थे। कृष्ण भक्त रहीम ने आम आदमी की सोच से अपना रिश्ता जोड़ लिया था। उन्होंने कई ऐसे दोहे रचे जो आज भी भारतीय समाज में आचरण और व्यवहार की कसौटी माने जाते हैं-

रहिमन निज मन की व्यथा, मन ही राख्यो गोय सुनि इठलइहैं लोग सब, बांट न लेइहैं कोय टूटे सुजन मनाइए, जो टूटे सौ बार रहिमन फिरि फिरि पोइए, टूटे मुक्ताहार
डॉ दीपा गुप्ता ने अपनी इस शोध पुस्तक के ज़रिए रेखांकित किया है कि जीवन के अंतिम दिनों तक रहीम को बार-बार युद्ध में शामिल होना पड़ा। वे बार-बार शाही खानदान के सदस्यों के छल कपट का शिकार हुए। कई बार उन्हें गंभीर मानसिक यंत्रणा से गुजरना पड़ा। जहांगीर के शासनकाल में रहीम को उपेक्षा और अनादर के दिन देखने पड़े। ऐसी विषम परिस्थितियों में रहते हुए रहीम ने किस तरह लगातार काव्य सृजन किया यह हैरत की बात है। रहीम अपने संगीत प्रेम के लिए भी विख्यात हुए।

खानखाना रहीम ने परंपरा से प्राप्त विविध काव्य विधाओं में काव्य रचना के अलावा बरवै छंद में 'बरवै नायिका भेद' लिखा। उनकी यह कृति काफ़ी पसन्द की गई। रहीम क़लम और तलवार दोनों के धनी थे। वे हुमायूं के विश्वासपात्र और अकबर के संरक्षक बैरम खां के सुपुत्र थे। सोलह साल की उम्र में सम्राट अकबर के सेनापति के रूप में रहीम रण क्षेत्र में सक्रिय हो गए थे। युवावस्था में ही गुजरात युद्ध में अदभुत शौर्य का परिचय देने के बाद उनको खानखाना की उपाधि प्रदान की गई थी।
जीवन के आख़िरी दिनों में खानखाना रहीम लाहौर में थे। वे आख़िरी सांस दिल्ली में लेना चाहते थे। लाहौर से दिल्ली पहुंचने पर सन् 1627 में लगभग 72 वर्ष की उम्र में रहीम का प्राणांत हो गया। दिल्ली में हुमायूं के मकबरे के पास खानखाना रहीम की कब्र मौजूद है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संरक्षण में आगा खां ट्रस्ट फॉर कल्चर ने इसके पुनरुद्धार की ज़िम्मेदारी ली है। ट्रस्ट के प्रयास से रहीम के मकबरे को नया स्वरूप प्राप्त हुआ है।
डॉ दीपा गुप्ता संभल (उप्र) की मूल निवासी हैं। उत्तराखंड की सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा के एक कॉलेज में विगत सोलह साल से हिंदी पढ़ाती हैं। राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में उनके शोध, लेख, कहानी और कविताओं का नियमित प्रकाशन होता है। खानखाना रहीम पर यह शोध कार्य उन्होंने 23 वर्ष की उम्र में किया था। किताब कुछ समय पहले प्रकाशित हुई। दीपाजी के अनुसार रहीम का जीवन जैसा गरिमामय, आदर्श और विराट था उनका काव्य भी उतना ही उदात्त एवं मंगलमय है। उसमें अनुभूति, सरसता और अभिव्यंजना तीनों का ही उदात्त रूप प्राप्त होता है।

रहीम का जन्म 17 दिसंबर 1556 को हुआ था। पिता बैरम ख़ान की अप्रत्याशित मृत्यु होने पर 4 साल के अबोध बालक रहीम को आगरा बुलाकर अकबर ने उनकी शिक्षा दीक्षा का समुचित प्रबंध किया। रहीम ने अपने गुरुजनों से अरबी, फारसी, तुर्की और संस्कृत का ज्ञान प्राप्त किया। रहीम की दानशीलता के अनेक क़िस्से लोक में किवदंती बन गए।
दान देते समय रहीम अपनी आंखें नीची रखते थे क्योंकि उनके मन में कीर्ति की कामना नहीं थी। एक बार गंग कवि ने उनसे पूछा-
सीखे कहाँ नवाब जू, ऐसी दैनी दैन
ज्यों ज्यों कर ऊंचा करो, त्यों त्यों नीचे नैन
इस पर रहीम ने उत्तर दिया-
देनदार कोई और है, भेजत है दिन रैन
लोग भरम हम पर करें, याते नीचे नैन
खानखाना रहीम कवि, सेनानी, संगीत रसिक और कला पारखी होने के साथ साथ दीन दुखियों के मददगार थे। सरल सहज भाषा और आत्मीय शैली में लिखी गई डॉ दीपा गुप्ता की यह कृति रहीम के व्यक्तित्व और कृतित्व को बड़े सलीक़े और सुरुचिपूर्ण तरीके से हमारे सामने उद्घाटित करती है। इस कृति के ज़रिए डॉ दीपा गुप्ता ने यह साबित किया है कि अगर अध्ययन, चिंतन, लगन और समर्पण से शोध किया जाए तो वह साहित्य की एक अमूल्य धरोहर बन सकता है। इस सुंदर कृति के लिए मैं डॉ दीपा गुप्ता को बधाई देता हूं। उम्मीद करता हूं कि वे सृजनात्मकता के इस सिलसिले को आगे भी जारी रखेंगी। इसी नेक ख़्वाहिशात के साथ-
आपका-

देवमणि पांडेय : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाड़ा,
गोकुलधाम, फ़िल्म सिटी रोड, गोरेगांव पूर्व,
मुंबई- 400063, 98210-82126

प्रकाशक :

हिंदुस्तानी भाषा अकादमी,
3675 राजा पार्क, रानी बाग दिल्ली-1100 34
फ़ोन : 98735 56781, 99680 97816
मूल्य : 200 रूपए

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2020

मुंबई के बॉलीवुड में गीतकार माया गोविंद


बॉलीवुड में गीतकार माया गोविंद 

माया गोविंद के सिने गीतों में लखनऊ के महकते लफ़्ज़ों की ख़ुशबू है। ज़बान को बरतने का सलीक़ा है। जज़्बात को नफ़ासत के साथ पेश करने का हुनर है। इसी लिए उनके गीत सुनने वालों को तरबतर कर देते हैं। उनके गीत माहौल में रस घोलते और मुहब्बत की ज़बान बोलते दिखाई पड़ते हैं। उनमें अदब सांस लेता है और कविता की धड़कन सुनाई देती है। अपनी इसी ख़ासियत के कारण माया गोविंद के सिने गीत संगीत रसिकों के साथ बड़ी जल्दी एक आत्मीय रिश्ता क़ायम कर लेते हैं। 

गीतकार माया गोविंद का मुंबई में आगमन 1971 में हुआ। इसी साल फ़िल्म निर्माता ताराचंद बड़जात्या ने कवियों को लेकर एक फ़िल्म 'कवि सम्मेलन' बनाई थी। इसमें माया गोविंद को भी शामिल किया गया। सन् 1973 में भूपेन हज़ारिका के संगीत निर्देशन में फ़िल्म 'आरोप' में उन्हें पहली बार गीत लिखने का मौक़ा मिला। माया गोविंद का लिखा पहला गीत लता और किशोर की आवाज़ में बेहद लोकप्रिय हुआ- 

नैनो में दर्पण है, दर्पण में कोई, 
देखूं जिसे सुबह शाम 
बोलो जी बोलो, ये राज़ खोलो, 
हम भी सुनें दिल को थाम 

निर्माता-निर्देशक रामानंद सागर के आमंत्रण पर फ़िल्म 'जलते बदन' (1973) के लिए माया गोविंद ने गीत लिखे। इस फ़िल्म के संगीतकार थे लक्ष्मीकांत प्यारेलाल। सारे गीत पसंद किए गए। एक गीत सुपरहिट हुआ- 

वादा भूल न जाना, वादा भूल न जाना 
वो जाने वाले लौट के आना 

माया गोविंद के गीतों से सजी हुई फ़िल्म 'क़ैद' (1975) ने रजत जयंती मनाई। इस फ़िल्म में उनके एक गीत को लता मंगेशकर ने अपने बीस श्रेष्ठ गीतों की सूची में शामिल किया। यह गीत है- 

यहां कौन है असली, कौन है नक़ली 
अपने हैं या बेगाने, ये तो राम जाने 

आलोचना के घेरे में गीतकार माया गोविंद 

निर्माता प्रकाश मेहरा की फ़िल्म 'दलाल' (1993) में लिखे एक गीत के लिए माया गोविंद को आलोचना भी झेलनी पड़ी। ख़ुद माया गोविंद का कहना है कि इस तरह के गीत लिखने से लोकप्रियता तो मिलती है लेकिन मन को संतोष नहीं मिलता। कभी-कभी ऐसे गीत इसलिए ज़रूरी हो जाते हैं कि फ़िल्में आम जनता को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं। अगर वह बुद्धिजीवियों को भी पसंद आ जाएं तो यह उनकी अतिरिक्त उपलब्धि है। 

हमारे लोकगीतों में तोता, मैना, कबूतर आदि पक्षियों के माध्यम से संकेतों में बात की जाती है। फ़िल्म दलाल के इस 'अटरिया' गीत में भी अश्लीलता से बचते हुए संकेतों में ही सारी बातें कही गई हैं। मगर इस गीत का फिल्मांकन ऐसे भड़कीले तरीक़े से किया गया कि लोगों को उसमें दूसरा अर्थ भी दिखाई पड़ने लगा। फ़िल्म 'दलाल' में माया गोविंद ने एक बढ़िया भजन लिखा। उनका एक और दिलकश गीत भी इस फ़िल्म में शामिल है- 

ठहरे हुए पानी में कंकर न मार सांवरे 
मन में हलचल सी मच जाएगी बावरे 

फ़िल्म 'दलाल' में माया गोविंद के इस सुंदर गीत का ज़िक्र नहीं हुआ मगर 'अटरिया' वाले गीत को लेकर काफ़ी चर्चा हुई। सिनेमा में एक गीतकार को पात्र और कहानी के अनुसार ही गीत लिखने पड़ते हैं। यहां विशुद्ध साहित्य नहीं चलता। अगर गीतकार साहित्यिक गीत लिखने की ज़िद करे तो रोज़ी-रोटी कैसे चलेगी। कभी-कभी अच्छी सिचुएशन आ जाती है तो गीतकार को अपनी रचनात्मकता दिखाने का अवसर मिल जाता है। फ़िल्म 'त्रिकोण का चौथा कोण' (1986) में माया गोविंद का एक गीत अपनी काव्यात्मकता के लिए काफ़ी सराहा गया- 

प्यार है अमृत कलश अंबर तले 
प्यार बांटा जाए जितना बांट ले 

फ़िल्मों में गीत लिखकर माया गोविंद को दौलत, शोहरत और सम्मान तीनों मिले। फ़िल्म गीत लेखन एक व्यवसाय है। जैसी मांग होती है वैसी पूर्ति करनी पड़ती है। बाज़ार में बिकने लायक़ माल अगर गीतकार के पास नहीं है तो वह बाज़ार से बाहर हो जाएगा। फ़िल्मों में आने से पहले ही माया गोविंद को एक कवयित्री के रूप में काव्य मंचों पर अपार लोकप्रियता हासिल हो चुकी थी। लखनऊ के रवींद्रालय सभागार में आयोजित एक कवि सम्मेलन में उन्हें अभिनेता भारत भूषण और निर्माता आर चंद्रा ने सुना। उनके गीत से प्रभावित होकर भारत भूषण ने अपनी फ़िल्म 'मेघ मल्हार' और आर चंद्रा ने 'मुशायरा' फ़िल्म में गीत लिखने का आमंत्रण दिया। इस आमंत्रण पर वे सन् 1972 में मुंबई आ गईं। 'मेघमल्हार' फ़िल्म कुछ कारणों से शुरू नहीं हो पाई। 'मुशायरा' फ़िल्म के लिए माया गोविंद ने दो गीत लिखे- 

हमें हुक्म था ग़म उठाना पड़ेगा 
इसी ज़िद में हमने जवानी लुटा दे 
सारी रतिया मचाए उत्पात 
सिपहिया सोने न दे 

आर चंद्रा के आकस्मिक निधन से 'मुशायरा' फ़िल्म का निर्माण रुक गया। बाद में उनके बेटे राकेश चंद्रा ने फ़िल्म 'मुट्ठी भर चावल' में दोनों गीतों का इस्तेमाल किया। निर्माता आत्माराम ने माया गोविंद को अपनी पांच फ़िल्मों में गीत लिखने का प्रस्ताव दिया। ये फ़िल्में थीं- आरोप, क़ैद, आफ़त, ख़ंजर और प्यार के राही। फ़िल्म ‘क़ैद’ के सारे गाने चले और इस फ़िल्म ने सिल्वर जुबली मनाई। फ़िल्म 'आरोप' के गीतों के लिए उत्तर प्रदेश फ़िल्म पत्रकार संघ ने माया गोविंद को सन् 1976 में सर्वश्रेष्ठ गीतकार का सम्मान दिया। 

कशमकश, हीरा और पत्थर, अलबेली, बावरी आदि फ़िल्मों के बाद सन् 1979 में राजश्री प्रोडक्शंस की फ़िल्म ‘सावन को आने दो’ के लिए माया गोविंद ने गीत लिखे। इसमें एक गीत के लिए उन्हें ‘फ़िल्म वर्ल्ड’ जैसा प्रतिष्ठित पुरस्कार मिला। गीत के बोल थे- 

कजरे की बाती अंसुवन के तेल में 
आली मैं हार गई अंखियन के खेल में 

राजश्री प्रोडक्शंस की फ़िल्म ‘पायल की झंकार’ (1980) में माया गोविंद को अच्छे गीत लिखने के मौक़े मिले। येसुदास की आवाज में एक गीत बहुत पसंद किया गया- ‘देखो कान्हा नहीं मानत बतिया’। राजश्री की फ़िल्म ‘एक बार कहो’ (1980) में भी माया गोविंद का एक गीत काफ़ी पसंद किया गया- 

चार दिन की ज़िंदगी है जा रहे हैं दिन 
दो गए तेरे मिलने से पहले दो गए तेरे बिन 
प्रिये कब मिलन होगा 
माया गोविंद को सर्वश्रेष्ठ गीतकार का सम्मान 

गीतकार माया गोविंद की कामयाबी का सफ़र लगातार जारी रहा । सन् 1982 में फ़िल्म ‘ये रिश्ता टूटे ना’ में उनका शीर्षक गीत इतना अधिक लोकप्रिय हुआ कि उत्तर प्रदेश फ़िल्म पत्रकार संघ ने दोबारा उन्हें सर्वश्रेष्ठ गीतकार का सम्मान दिया। इसके बाद ऋषिकेश मुखर्जी जैसे प्रतिष्ठित फ़िल्मकार ने उनसे ‘रंग बिरंगी’ (1983) और ‘झूठी’ (1985) फ़िल्मों के गीत लिखवाए। फ़िल्म ‘झूठी’ में एक बार फिर जनता ने उनका गीत गुनगुनाया- ‘चंदा देखे चंदा तो चंदा शरमाय’। 

फ़िल्म रज़िया सुल्तान (1983) में माया गोविंद ने 'शुभ घड़ी आई' गीत लिखा। संगीतकार ख़य्याम ने ग्यारह श्रेष्ठ गायकों की आवाज़ में यह गीत रिकॉर्ड किया। प्यार के राही, ख़ुशनसीब, तक़दीर, सजाय दे मांग हमार, सदक़ा कमली वाले का, बेटी, हमसे है ज़माना, मैं और मेरा हाथी, जीत हमारी आदि फ़िल्मों में लिखने के बाद माया गोविंद ने फ़िल्म ‘पिघलता आसमान’ (1985) के गीत लिखे। इस फ़िल्म में उनका लिखा एक गीत आज भी युवा दिलों की पसंद बना हुआ है- 

तेरी मेरी प्रेम कहानी 
किताबों में भी न मिलेगी 

कामयाबी के इस सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए माया गोविंद ने त्रिकोण का चौथा कोण, पत्तों की बाज़ी, कहानी फूलवती की, मां-बेटी, ईमानदार आदि फ़िल्मों के गीत लिखे। मनोज कुमार की फ़िल्म ‘कलियुग और रामायण’ (1987) में उनके एक गीत ने धूम मचाई- 

क्या क्या न सितम हाय ढाती हैं चूड़ियां 
जब भी किसी कलाई में आती हैं चूड़ियां 

सन् 1988 में राम गोविंद के निर्देशन में एक फ़िल्म बनी ‘तोहफ़ा मोहब्बत का’। इस फिल्म में गीतकार माया गोविंद ने अभिनेता गोविंदा की माँ की भूमिका निभाई। इस फ़िल्म के संगीतकार हैं अनूप जलोटा। इस फ़िल्म के एक गीत के लिए माया गोविंद को सुर सिंगार संसद ने सम्मानित किया। इस गीत के बोल हैं- 

प्रेम का ग्रंथ पढ़ाऊँ सजनवा 
जो अक्षर मैंने कभी न बांचे 
उनके अर्थ बताऊँ सजनवा 

माया गोविंद की कामयाबी के इस सिलसिले को मेरे बाद, सजना साथ निभाना, गलियों का बादशाह, मौत की सज़ा, यमुना किनारे, शत्रुता, नया शहर, अनमोल, आग का तूफ़ान, आजा मेरी जान, पुलिसवाला गुंडा, कर्मवीर, रफ़ूचक्कर, बाल ब्रह्मचारी, तांडव, मैदाने जंग, क़ैदी नंबर 36, मृत्युंजय, अमानत, स्मगलर, मिस्टर श्रीमती, रात के गुनाह, ज़ालिम जमाना, प्रेम योग आदि फ़िल्मों ने आगे बढ़ाया। 

मशहूर चित्रकार एम एफ हुसैन की फ़िल्म 'गजगामिनी' (2000) के गीतों को लिखने का काम माया गोविंद को सौंपा गया था। इस फ़िल्म के लिए माया जी ने चार गीत लिखे। सुप्रसिद्ध संगीतकार भूपेन हजारिका ने इन गीतों को संगीतबद्ध किया था। हुसैन साहब के पब्लिसिटी स्टंट के चलते लोगों का ध्यान फ़िल्म के गीतों की ओर कम ही गया। श्याम बेनेगल की फ़िल्म हरी भरी (2000) के मधुर गीतों के लिए भी माया गोविंद की सराहना की गई। राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित कल्पना लाज़मी की फ़िल्म 'दमन' (2001) के सातों गीत माया गोविंद की क़लम से निकले हैं। गीतकार माया गोविंद ने 350 फिल्मों में 750 से अधिक गाने लिखे हैं । वैसे तो उनके अनेक गीत पसंद किए गए पर फ़िल्म 'टक्कर' (1980) के गीत को बेहद लोकप्रियता मिली-

आंखों में बसे हो तुम, तुम्हें दिल में छुपा लूंगा 
जब चाहूँ तुम्हे देखूं,आईना बना लूंगा

कुणाल गांजावाल की मधुर आवाज़ में फ़िल्म 'शीशा' (1986) का गीत लोकप्रियता के चार्ट में ऊपर रहा-

यार को मैंने, मुझे यार ने, सोने न दिया 
प्यार ही प्यार किया, प्यार ने, सोने न दिया

संगीत रसिकों का पसंदीदा गीत है फ़िल्म 'गलियों का बादशाह' (1989) का ये गीत-

मुझे ज़िन्दगी की दुआ न दे, मेरी ज़िंदगी से बनी नही 
कोई ज़िन्दगी पे करे यक़ीं, मेरी ज़िंदगी से बनी नहीं


माया गोविंद को लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड 

माया गोविंद के ग़ैर फ़िल्मी गीतों के भी कई अलबम जारी हुए। कई धारावाहिकों में भी उन्होंने गीत लिखे। द्रोपदी और श्रीकांत जैसे लोकप्रिय धारावाहिकों के अलावा माया गोविंद ने रामायण धारावाहिक (पाँच एपिसोड) के गीत लिखे। अभिनेत्री हेमा मालिनी के लिए लिखा गया उनका बैले ‘मीरा’ बहुत पसंद किया गया। वीनस संगीत कंपनी ने माया गोविंद की कविताओं का एक अलबम 'संगीत सुधा' नाम से जारी किया। फ़िल्म संगीत में रचनात्मक योगदान के लिए सन् 1999 में माया गोविंद को फ़िल्म राइटर्स एसोसिएशन ने लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया। 

लखनऊ की मूल निवासी कवयित्री माया गोविंद ने मशहूर कथक गुरु शंभु महाराज से कथक नृत्य का प्रशिक्षण प्राप्त किया। भातखंडे संगीत विद्यालय से उन्होंने गायन सीखा है। कैरियर के शुरुआती दिनों में माया गोविंद आकाशवाणी लखनऊ में स्टाफ आर्टिस्ट और ड्रामा आर्टिस्ट थीं। दर्पण संस्था के ज़रिए उन्होंने दस साल तक रंगमंच पर भी काम किया। 'ख़ामोश अदालत जारी है' नाटक में श्रेष्ठ अभिनय के लिए सन् 1970 में माया गोविंद को संगीत नाटक अकादमी का बेस्ट एक्ट्रेस अवॉर्ड प्राप्त हुआ। 

फ़िल्मी गीतों में बढ़ती अश्लीलता के सवाल पर माया गोविंद कहती हैं- गीतों से ज़्यादा अश्लीलता तो गीतों के फिल्मांकन में है। ऐसे कई गीत हैं जो सुनने में तो अश्लील नहीं लगते लेकिन पर्दे पर दिखाए जाने में अश्लील लगते हैं। इसके लिए सबसे बड़ा दोषी हमारा सेंसर बोर्ड है। हम जब सिनेमा में गीत लिखते हैं तो हमें दर्शकों के घर परिवार का और अपने बच्चों का भी ख़्याल रहता है। 

माया गोविंद की अब तक एक दर्जन से अधिक किताबें प्रकाशित हुई हैं। मुंबई विश्वविद्यालय और पुणे विश्व विद्यालय में उनके साहित्य पर पीएचडी हो रही है। देश-विदेश में जो उन्हें जो यश और प्रतिष्ठा प्राप्त हुई वह दुर्लभ है। सर्दियों के आगोश में जैसे धूप और बदली के दामन में जैसे बूँद पनाह लेती है, उसी तरह कवयित्री माया गोविंद के दिल में प्रेम की पीर बसी हुई है। यह पीर उनकी भाग्य रेखा पर लालिमा की तरह उपस्थित है- 

जैसे कोई सर्दियों में धूप को छुपा ले 
जैसे कोई बदली से बूँद को चुरा ले 
वैसे मैंने भी चुरा ली प्यार की ये पीर 
सेंदुर-सेंदुर हो गई मेरे भाग्य की लकीर 


कवयित्री माया गोविंद का 80वां जन्मदिन 17 जनवरी 2020 को जुहू में आयोजित काव्य संध्या में मनाया गया। चित्र में (बाएं से) आपके दोस्त देवमणि पांडेय , संध्या रियाज़, माया गोविंद, रामगोविंद, गुलशन मदान, देवेंद्र काफ़िर और शेखर अस्तित्व।

कवयित्री माया गोविंद के लिए प्रेम भले ही मोक्ष का मार्ग हो लेकिन अपने गीतों में उन्होंने जीवन और समाज के अहम् सवालों के जवाब ढूँढ़ने की कोशिश की। माया गोविंद हिंदी काव्य मंच की सबसे लोकप्रिय कवयित्री हैं। पिछले साठ साल से वे हिंदी काव्य मंच पर सक्रिय हैं। फ़िलहाल वे जीवंती फाउंडेशन के माध्यम से कला और साहित्य की सेवा कर रहीं हैं। 

शुक्रवार 9 अक्टूबर 2020 को कवयित्री माया गोविंद से मेरी बातचीत हुई। बेटे अजय, बहू शिवाली, पौत्र विशेष और पौत्री सुहानी के साथ माया गोविंद और राम गोविंद अपने घर में स्वस्थ और प्रसन्न हैं। 17 जनवरी 1940 कवयित्री माया गोविंद की जन्म तारीख़ है। उन्होंने अपना 80वां जन्मदिन 17 जनवरी 2020 को जुहू में आयोजित एक काव्य संध्या में मनाया था। कवयित्री माया गोविंद ने बताया कि वे 17 जनवरी 2021 को अपना 81वां जन्मदिन आप सबके साथ मनाना चाहती हैं। आइए उस दिन का इंतज़ार करें जब हम सब मिलकर कहेंगे- "जन्मदिन बहुत-बहुत मुबारक हो माया जी।"


आपका-
देवमणि पांडेय

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा,
गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व,
मुम्बई-400063, M : 98210 82126
devmanipandey.blogspot.com