मंगलवार, 8 सितंबर 2020

लैंडलाइन के ज़माने में अभिनेता जितेंद्र


लैंडलाइन के ज़माने में अभिनेता जितेंद्र 

एक इवेंट ऑर्गेनाइज़र ने एक फ़िल्म पीआरओ से एक अभिनेता का मोबाइल नंबर मांगा। पीआरओ ने कहा- पांच हज़ार दीजिए नंबर दे देता हूं। अगर सामने वाले ने नहीं उठाया तो इसकी ज़िम्मेदारी मेरी नहीं है। कुछ लोग अभिनेता अभिनेत्रियों का मोबाइल नंबर देने के लिए दस हज़ार भी लेते हैं। 

भला कोई संघर्षरत कलाकार मोबाइल नंबर के लिए इतना पैसा कैसे ख़र्च कर सकता है। कास्टिंग डायरेक्टर का ज़माना शुरू होने से पहले अभिनेता पंकज त्रिपाठी अभिनेता बनने के लिए संघर्ष कर रहे थे। उन्होंने एक तरक़ीब निकाली। फ़िल्म प्रोडक्शन हाउस में रिसेप्शन पर जाकर वे पूछते थे कि आपके यहां कास्टिंग का काम कौन है देख रहा है। मालूम पड़ता कि अमुक जी देख रहे हैं। वे बोलते अमुक जी को बोलिए कि पंकज त्रिपाठी आए हैं। ईश्वर जी ने भेजा है। अमुक जी सोच में पड़ जाते कि ईश्वर कौन है और फिर उन्हें अंदर बुला लेते। वे पूछते ईश्वर जी कौन हैं तो पंकज त्रिपाठी मुस्कुराते हुए जवाब देते- ईश्वर जो हम सबका मालिक है। उनकी इस बात पर सामने वाला हंस पड़ता। उनकी यह तरक़ीब काम कर गई और इसी के ज़रिए वे धीरे-धीरे गैंग्स ऑफ वासेपुर तक पहुंच गए। 

लैंडलाइन के ज़माने में इस तरह की परेशानियां नहीं थी। श्रीदेवी और जयप्रदा के साथ में अभिनेता जितेंद्र की कई फिल्में सुपरहिट हो चुकी थीं। सन् 1988 में मैंने उनकी फ़िल्म न्यू दिल्ली देखी। इसमें जितेंद्र का काम लीक से हटकर था। मैंने सोचा चलो इसी बहाने जितेंद्र से मुलाकात कर लेते हैं। 

मैंने फ़िल्म डायरेक्टरी से अभिनेता जितेंद्र का लैंडलाइन नंबर निकाला। सुबह 9:30 बजे फ़ोन किया। फ़ोन उन्होंने ख़ुद उठाया। जब हेलो कहा तो मैंने आवाज़ पहचान ली। मैंने कहा- गुड मॉर्निंग जीतू साहब। गुड मॉर्निंग उन्होंने जवाब दिया। मैंने उन्हें बताया कि न्यू दिल्ली फ़िल्म के बारे में एक अख़बार के लिए बातचीत करनी है। उन्होंने झट से जवाब दिया- आप शाम को 5:00 बजे फ़िल्मालय स्टूडियो अंधेरी में आ जाइए। 

फ़िल्मालय स्टूडियो में अभिनेता जितेंद्र 

नियत समय पर मैं स्टूडियो में दाख़िल हुआ। अचानक सुनाई पड़ा कि जीतू साहब आ गए। गेट में उनकी कार की एंट्री हो रही थी। गेट से राइट साइड में मेकअप रूम था। इसलिए वे कार से वहीं उतर गए। वे केसरिया रंग का कुर्ता और लुंगी पहने हुए थे। मैंने आगे बढ़कर हाथ मिलाया। तभी सिक्योरिटी गार्ड ने उनसे निवेदन किया कि उसके गांव के दो लड़के उनके साथ फोटो खिंचाना चाहते हैं। एक लड़का उनके साथ खड़ा हुआ। दूसरे ने कैमरा क्लिक कर दिया। जिसका फोटो हो गया था जब उसने कैमरा थामा तो मारे ख़ुशी के वो थरथर कांपने लगा। कैमरा उसके हाथ से गिरते-गिरते बचा। मैंने उसका कंधा थपथपाया- आराम से खींचो। वह क्लिक करने में कामयाब हो गया। 

अभिनेता जितेंद्र के साथ मैं उनके मेकअप रूम में गया तो वहां अभिनेता प्रेम चोपड़ा पहले से मौजूद थे। जीतू साहब ने उनसे परिचय कराया। यह इंटरव्यू हम तीनों की गपशप में बदल गया। एक आदमी पानी लेकर आया। जीतू साहब ने उससे कहा- कैंटीन में जो स्नेक्स हो एक-एक प्लेट लाओ। वह वड़ा, इडली और सैंड्विच लेकर आया। मुझे लगा ये तीन प्लेट नाश्ता हम तीनों के लिए है। प्रेम चोपड़ा ने मना किया। मैंने जीतू साहब से कहा- लीजिए। वे बोले- ये सब आपके लिए है। पिछले बीस साल से मैंने कभी ये सब नहीं खाया। तभी उनका ड्राइवर हरे रंग का एक प्लास्टिक का डिब्बा लेकर आया। उन्होंने उसे खोला तो उसमें संतरे की फांकें थीं। वे बोले- मेरा नाश्ता यही है। आप शुरू कीजिए। मैंने सैंडविच लिया। बाक़ी वापस कर दिया। 

अभिनेता जितेंद्र से पहला सवाल 

मेरा पहला सवाल सुनते ही प्रेम चोपड़ा बोले- पांडेय जी, आप तो दिलचस्प इंसान हैं। पहला सवाल था- अगर किसी फ़िल्म को देखकर दर्शक कहते हैं कि अभिनेता ने बड़ा शानदार अभिनय किया है तो इसका श्रेय अभिनेता को दिया जाना चाहिए कि निर्देशक को। जीतू साहब सोच में पड़ गए। फिर उन्होंने जवाब दिया- इसका क्रेडिट निर्देशक को देना चाहिए। दरअसल हर अभिनेता के अंदर अभिनय का एक कुआं होता है। यह निर्देशक पर निर्भर करता है कि वह उस कुएं से कितना पानी खींच पाता है। अगर निर्देशक अच्छा न हुआ तो अभिनेता की सारी प्रतिभा धरी की धरी रह जाती है। 

बातचीत के आख़िर में मैंने जीतू साहब से कहा- आप मुझे कोई ऐसी घटना बताइए जिसे आज तक आपने किसी भी पत्रकार को नहीं बताई है। उन्होंने काफ़ी सोचा मगर याद नहीं आया। तभी उनका मेकअप मैन आ गया। उन्होंने कहा- पांडेय जी मैं सोचता हूं। आप ऐसा कीजिए कि कल चार बजे विले पार्ले के नानावटी बंगले में आ जाइए। हम वहां बात करते हैं। 

अगले दिन मैं नानावटी बंगले पर गया। जीतू साहब के कमरे से ज़ोर-ज़ोर से बोलने की आवाजें आ रही थीं। जैसे किसी को डांट रहे हों। उनके सहायक ने उनको मेरे आने की ख़बर दी। उन्होंने मुझे अंदर बुला लिया। उनके सामने अभिनेता सुजीत कुमार बैठे हुए थे। जब वे चले गए तो मैंने जीतू साहब से पूछा- आप इतने ज़ोर-ज़ोर से क्यों बोल रहे थे। वे हंसने लगे। उन्होंने बताया कि सुजीत कुमार को कानों से कम सुनाई देता है। इस लिए ज़ोर-ज़ोर से बोलना पड़ता है। 

जितेंद्र, राखी और दिल्ली की पानी पूरी 

इस मुलाक़ात में अभिनेता जितेंद्र ने वह घटना बताई जिसे उन्होंने किसी और से साझा नहीं किया था। दिल्ली में अभिनेत्री राखी के साथ एक फ़िल्म की शूटिंग थी। अगले दिन रविवार की छुट्टी थी। राखी ने प्रस्ताव रखा कि किसी पब्लिक प्लेस पर घूमने चला जाए। समस्या यह थी कि अगर किसी ने पहचान लिया तो भीड़ लग जाएगी। 

जितेंद्र ने ड्रेसमैन से अपने लिए एक साधारण कुर्ता पाज़ामा और अंगोछा मंगवाया। राखी ने एक सस्ती सी साड़ी पहनी और घूंघट निकाल लिया ताकि कोई पहचान न सके। शाम को दोनों दिल्ली के एक मैदान में गए। वहां मेला जैसा लगा हुआ था। दोनों कुछ देर वहां घूमते रहे। किसी ने नहीं पहचाना। फिर उन्होंने एक ठेले पर पानी पूरी खाई। पानी पूरी खाते खाते राखी के सर का पल्लू सरक गया। फिर भी किसी ने नहीं पहचाना। कोई सोच भी नहीं सकता था कि ऐसे पब्लिक प्लेस में कोई मशहूर अभिनेता या अभिनेत्री मौजूद होगा। वापस लौटते समय दोनों बहुत उदास थे। होटल आए तो राखी की आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने कहा- एक कलाकार के लिए इससे बड़ी ट्रेजडी क्या हो सकती है कि पब्लिक उसे पहचाने ही नहीं। 

वह लैंडलाइन का ज़माना था। हम किसी को भी फ़ोन कर सकते थे। किसी से भी मिल सकते थे। अब मोबाइल का ज़माना आ गया है। फ़िल्मी लोग उन लोगों का फ़ोन नहीं उठाते जिनके नंबर उनके मोबाइल में फीड नहीं होते। आज किसी निर्माता, निर्देशक, कलाकार, संगीतकार या गीतकार से मोबाइल पर बात करना या उनसे मिलना आसान काम नहीं है। #नया_ज्ञानोदय के सम्पादक #रवीन्द्र-कालिया को #गुलज़ार से कोई काम था। उन्होंने मोबाइल पर संदेश भेजा- गुलज़ार साहब, क्या मैं आपको फ़ोन कर सकता हूं ? इसके बाद गुलज़ार ने उन्हें ख़ुद फ़ोन किया। मगर सिने जगत के नए गीतकारों से आप ऐसे सहयोग की उम्मीद नहीं कर सकते। 

अगर आप उनकी प्राथमिकता सूची में हैं तभी वे आपकी कॉल रिसीव करेंगे। वे यह देखते हैं कि आप से बात करने में उन्हें क्या फ़ायदा मिल सकता है। लैंडलाइन के ज़माने के फ़िल्म लेखक कमलेश पांडेय (रंग दे बसंती) से बात करना आसान है मगर मोबाइल के ज़माने के फ़िल्म लेखक कमल पांडेय (मेरी शादी में ज़रूर आना) से बात करना आसान नहीं है। मोबाइल ने लोगों को आत्मकेंद्रित और स्वार्थी बना दिया है। 

मोबाइल ने लोगों को आत्मकेंद्रित और स्वार्थी बना दिया है। फ़िल्म लाइन में लोग दुखी और अकेले हैं मगर किसी से मिलना नहीं चाहते। साहिर लुधियानवी का एक शेर है- 

न दोस्ती न मुहब्बत न दिलबरी न ख़ुलूस 
किसी का कोई नहीं, सब यहां अकेले हैं 


आपका- 
देवमणि पांडेय 

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, 
गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, 
मुम्बई-400063, M : 98210 82126 
devmanipandey.blogspot.com 

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