शनिवार, 30 मई 2020

गुलज़ार के ग़ालिब : बना है शाह का मुसाहिब




गुलज़ार के मिर्ज़ा ग़ालिब
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मिर्ज़ा ग़ालिब ने पालकी में बैठे शायर इब्राहिम ज़ौक़ की तरफ़ एक जुमला उछाला- "बना है शाह का मुसाहिब फिरे है इतराता"। अंतिम मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के उस्ताद थे ज़ौक़ साहब। ये ख़बर बादशाह तक पहुंच गई कि मिर्ज़ा नौशा उर्फ़ ग़ालिब ने ज़ौक़ साहब का मज़ाक उड़ाया। लाल क़िले में जुम्मे को मुशायरा था।  ज़ौक़ साहब के इशारे पर मिर्ज़ा नौशा (ग़ालिब) को दावतनामा भेजा गया। मुशायरे के आगाज़ के समय बादशाह ने ग़ालिब से इस जुमले की वजह पूछी। मिर्ज़ा नौशा (ग़ालिब) ने फ़रमाया- ये तो उनकी ताज़ा ग़ज़ल के मक़्ते का मिसरा ऊला है। बादशाह ने कहा- मक़्ता पेश किया जाए। ग़ालिब ने पेश कर दिया-

बना है शाह का मुसाहिब फिरे है इतराता
वगर्ना शहर में ग़ालिब की आबरू क्या है

भरपूर दाद मिली। ज़ौक़ साहब ने तंज़िया लहजे में कहा- मक़्ता इतना ख़ूबसूरत है तो ग़ज़ल क्या होगी? बादशाह की गुज़ारिश पर ग़ालिब ने जेब से काग़ज़ निकाला और ग़ज़ल का मतला पेश किया- 

हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है 
तुम्ही कहो कि ये अंदाज़ ए गुफ़्तगू क्या है

मतले पर भी दाद मिली। अगले शेर पर तो शेख़ इब्राहिम ज़ौक़ ने भी दाद दी- 

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल 
जो आंख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है

इस शेर पर दाद के साथ मुक़र्रर की आवाज़ भी बुलंद हुई। साथ में बैठे शायर ने मिर्ज़ा ग़ालिब के हाथ से वो काग़ज़ लेकर हैरत से देखा। वह काग़ज़ कोरा था। उस पर कोई ग़ज़ल नहीं थी। मौक़े की नज़ाकत देखकर तत्काल ग़ज़ल कह देने का कमाल मिर्ज़ा ग़ालिब ही कर सकते थे। कुल मिलाकर कहा जाए तो गालिब ने यह मुशायरा लूट लिया था। इस कामयाबी के साथ उनकी शोहरत दिल्ली पर छा गई। 

मुंबई के फ़िल्मालय में 
मिर्ज़ा ग़ालिब 
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सन् 1988 म़े अंधेरी मुम्बई के फ़िल्मालय स्टूडियो में मेरी आंखों के सामने यही दृश्य फ़िल्माया जा रहा था। मुम्बई के फ़िल्मालय स्टूडियो में नितीश राय द्वारा निर्मित मिर्ज़ा ग़ालिब के विशाल सेट को देखकर लगता था कि जैसे ग़ालिब की दिल्ली की गली क़ासिम और बल्लीमारान मुहल्ला ही उठकर चला आया हो। मिर्ज़ा ग़ालिब धारावाहिक के कार्यकारी निर्माता जय सिंह ने मुझे इसी सेट पर लंच के लिए आमंत्रित किया था। 

मई महीना था। दोपहर की तेज़ धूप, भयंकर गर्मी और जानलेवा उमस थी। पसीने से लथपथ चार कहारों के कंधों पर एक पालकी आ रही थी। उसमें शायर इब्राहिम ज़ौक़ (शफी इनामदार) थे। नुक्कड़ पर एक जूती की दुकान पर कुछ दोस्तों के साथ मिर्ज़ा ग़ालिब (नसीरुद्दीन शाह) बैठे हुए थे। जैसे ही पालकी उनके पास से गुज़री उन्होंने बुलंद आवाज़ में एक जुमला उछाल दिया- "बना है शाह का मुसाहिब फिरे है इतराता।" इस पर पहले वाह-वाह हुई फिर ज़ोरदार ठहाका सुनाई पड़ा।

दो बार रिटेक हुआ। गर्मी से परेशान यूनिट के कुछ लोग चीख़ने चिल्लाने लगे। गुलज़ार का एक सहायक कहारों पर भड़क उठा। रिटेक कहारों की चाल की वजह से हुआ था। धूप और गर्मी से बेहाल कहार कभी मध्यम तो कभी तेज़ चाल में आते। टाइमिंग मैच न होने से रिटेक हो जाता था। जब यूनिट के अधिकांश लोग गर्मी और ग़ुस्से में उबल रहे थे तो मैंने देखा-  एक सहायक के छाते के नीचे ख़ामोश खड़े गुलज़ार मंद मंद  मुस्कुरा रहे थे। उनको देख कर लगता था कि इस इंसान को कभी ग़ुस्सा ही नहीं आता। आख़िर शाट ओके हुआ और लंच की घोषणा हो गई।

जयसिंह और गुलज़ार की फ़िल्म अंगूर
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गुलज़ार कभी मिर्ज़ा ग़ालिब की ज़िंदगी पर अभिनेता संजीव कुमार के साथ एक फ़िल्म बनाना चाहते थे। तब इस योजना पर वे अमल नहीं कर पाए। उत्तर प्रदेश के बिजनौर ज़िले के व्यवसायी जय सिंह ने जैसे ही ग़ालिब पर धारावाहिक बनाने का प्रस्ताव रखा गुलज़ार ने सहमति दे दी। पटकथा पहले से तैयार थी। कुछ तब्दीलियां करके उसे धारावाहिक का रूप दिया गया। मंडी हाउस ने गुलज़ार साहब के इस प्रस्ताव को मंज़ूर कर लिया।

फ़िल्म निर्माण में पैसा लगाना बहुत बड़े  जोख़िम का काम है। पैसा डूबने का डर हमेशा लगा रहता है। बहुत कम लोग हैं जिन पर भरोसा किया जा सकता है। निर्माता जय सिंह की नज़र में गुलज़ार बहुत नेक और ईमानदार इंसान हैं। इसलिए उन्होंने गुलज़ार पर भरोसा किया। कई सालों की मेहनत से कमाई धनराशि व्यवसायी जयसिंह ने गुलज़ार साहब को सौंपकर कहा कि इन्हीं पैसों से मेरे लिए एक फ़िल्म बना दीजिए। सन् 1982 में गुलज़ार ने उनके लिए फ़िल्म 'अंगूर' बना दी। जयसिंह फ़िल्म निर्माता बन गए । उन्होंने जितना पैसा लगाया था उससे ज़्यादा वापस आ गया। दुबारा गुलज़ार ने उनको मिर्ज़ा ग़ालिब धारावाहिक के रूप में एक शानदार तोहफ़ा दिया। 

मिर्ज़ा ग़ालिब पर बनी थी फ़िल्म
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मिर्ज़ा ग़ालिब की निजी ज़िंदगी के कुछ ख़ास पहलुओं पर पहले भी एक फ़िल्म बन चुकी है। इस फ़िल्म में भारत भूषण और सुरैया ने काम किया था। इस फ़िल्म की सबसे बड़ी कमज़ोरी इसकी अति नाटकीयता थी। एक तवायफ़ के साथ ग़ालिब के रिश्तों को इसमें कुछ ज़्यादा ही अहमियत दी गई थी। यह फ़िल्म ग़ालिब की ज़िंदगी, उनके फ़न, उनकी शख़्सियत और उस दौर के हालात को बख़ूबी साकार नहीं कर पाई जिनसे गुज़र कर असद उल्लाह खां एक दिन मिर्ज़ा ग़ालिब बन गए थे। 

गुलज़ार अपने मिशन में कामयाब हुए । अपने सोलह किस्तों के धारावाहिक में उन्होंने मिर्ज़ा ग़ालिब के फ़न, शख़्सियत और हालात को इस तरह छोटे पर्दे पर उतारा कि एक महान शायर की दास्तान को ज़िंदगी मिल गई। फ़िल्म 'मीरा' के फ्लॉप होने के बाद गुलज़ार की हिम्मत नहीं हो रही थी कि मिर्ज़ा ग़ालिब पर फ़िल्म बनाएं। उन्होंने जय सिंह से कहा-  लेकिन इस आग को सीने में दबाए मैं मरना भी नहीं चाहता।

गुलज़ार इस मायने में ख़ुशनसीब हैं कि ग़ालिब की ज़िंदगी और हालात पर सामाग्री जुटाने में उन्हें कैफ़ी आज़मी से काफ़ी मदद मिल गई। फ़िल्म निर्देशक सुखदेव ने मिर्ज़ा ग़ालिब पर फ़िल्म बनाने की योजना बनाई थी। उनके निधन के बाद यह योजना धरी की धरी रह गई। उनके लिए मिर्ज़ा ग़ालिब पर सारा शोध कैफ़ी आज़मी ने किया था। उनके इस शोध को सम्मान देते हुए गुलज़ार ने स्क्रीन पर अपने नाम के ऊपर कैफ़ी आज़मी का नाम दिया।

ग़ालिब के ज़माने की दास्तान
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एक बेहतरीन शायर होने के साथ ग़ालिब एक अच्छे पत्र लेखक भी थे। अपने ख़तों में उन्होंने समय-समय पर होने वाली महत्वपूर्ण घटनाओं का को भी दर्ज किया है। इन ख़तों से न सिर्फ़ ग़ालिब के निजी जीवन की दिलचस्प जानकारियां मिलती हैं बल्कि ये अपने समय के ऐतिहासिक दस्तावेज भी हैं। अपने धारावाहिक में इन ख़तों के ज़रिए गुलज़ार ने उस दौर की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं की तह में जाने की सराहनीय कोशिश की। ग़ालिब और बहादुरशाह ज़फ़र का ज़माना एक था। इसी ज़माने में 1857 का गदर हुआ। इस उथल-पुथल भरे दौर में ग़ालिब की शायरी क्या ख़ास मायने रखती है, इस खोजबीन में गुलज़ार ने कई साल लगाए थे। 

एक असाधारण इंसान पर बना गुलज़ार का यह धारावाहिक ज्ञानवर्धक भी है और अर्थपूर्ण भी। धारावाहिक में मिर्ज़ा ग़ालिब की भूमिका एक चुनौती थी। इस चुनौती के असली हक़दार थे नसीरुद्दीन शाह। ख़ुद उन्होंने ग़ालिब की भूमिका निभाने का सपना देखा था। टीवी धारावाहिकों में कभी काम न करने का फ़ैसला कर चुके नसीर के सामने जब गुलज़ार का प्रस्ताव आया तो उनका सपना साकार हुआ।

ग़ालिब की ज़िंदगी में कई तरह के उतार-चढ़ाव आए। गहरी निराशा, तंगहाली, पहचान का संघर्ष, आम लोगों से जुड़ने की आकांक्षा, दरबार में रहने की मजबूरी और दरबार से दूरी भी। हर तरह की आज़ादी के क़ायल ग़ालिब की ज़िंदगी में आशा और निराशा के बादल लगातार बरसते रहे। 14 साल की उम्र में उनकी शादी दिल्ली के मिर्ज़ा इलाही बख़्श (इफ्तिख़ार) की बेटी उमराव जान (तन्वी आज़मी) के साथ हुई। वे घर जमाई बनकर दिल्ली आ गए। शायरी, चौसर और कंचे के दीवाने ग़ालिब अपनी बेगम से बेइंतहा मुहब्बत करते थे। 


मिर्ज़ा ग़ालिब और 
तवायफ़ नवाब जान
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दिल्ली में ग़ालिब का दिल रमा नहीं। इसकी सबसे बड़ी वजह थी उनकी शायरी की उपेक्षा। लोग उन्हें आगरे का शायर मानते थे दिल्ली का नहीं। उनका दीवान छापने को कोई प्रकाशक तैयार नहीं हुआ। अलबत्ता मशहूर तवायफ़ नवाब जान (नीना गुप्ता) के मुंह से अपना कलाम सुनकर वे ज़रूर ख़ुश हुए। यह भी कहा जाता है कि अगर चमत्कारिक रूप से नवाब जान ग़ालिब की ज़िंदगी में न आती तो ग़ालिब दिल्ली छोड़ कर चले गए होते।

एक दिन ग़ालिब अपने क़ुतुब फ़रोश (पुस्तक विक्रेता) दोस्त हाज़ी मीर की दुकान पर बैठे थे। उसी समय कोठे से आती हुई सुरीली आवाज़ सुनकर ग़ालिब दंग रह गए। कोई सुरों की मलिका उन्हीं की ग़ज़ल को आवाज़ दे रही थी। ग़ालिब ने हाज़ी मीर से कहा- पहली बार दिल्ली में किसी दूसरे के मुंह से अपनी ग़ज़ल सुन रहा हूं। ग़ालिब के पांव ख़ुद-ब-ख़ुद कोठे की सीढ़ियां चढ़ने लगे। उन्होंने देखा- एक हसीना उन्हीं की ग़ज़ल गा रही है-

दिल ही तो है न संग ओ ख़िश्त दर्द से भर न आए क्यूं 
रोएंगे हम हज़ार बार कोई हमें रुलाए क्यूं

तवायफ़ नवाब जान को वो अधूरी ग़ज़ल चूरन की एक पुड़िया म़ें मिली थी। उसका मक़्ता ग़ायब था। ग़ालिब ने ग़ज़ल पूरा करवा दी। उन्होंने ख़ुद को ग़ालिब का दोस्त बताया। ग़ालिब को भरोसा हो गया कि जो ग़ज़ल तवायफ़ के कोठे तक पहुंच गई वह एक दिन अवाम तक ज़रूर पहुंचेगी। नवाब जान एक उम्दा कलाकार थी। वह ग़ालिब की शायरी की प्रशंसक और प्रेरणा थी। अभिनेत्री नीना गुप्ता ने नवाब जान की भूमिका को असरदार तरीके से निभाया। नवाब जान (नीना गुप्ता) का हुस्न, अदा और मोहक अंदाज़ देखने लायक़ है जब वह ग़ालिब की ग़ज़ल पेश करती है-

दिल ए नाद़ां तुझे हुआ क्या है 
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है

नवाब जान को दिया 
ग़ालिब ने दुशाला
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नवाब जान ग़ालिब को दीवानगी की हद तक प्यार करती थी। ग़ालिब को अपनी बीवी से मुहब्बत थी। उन्होंने हमेशा उसके साथ सम्मानजनक व्यवहार किया। अपनी बेगम के ज़ोर देने पर बच्चे की सलामती की दुआ मांगने ग़ालिब पहली बार पीर की मज़ार पर गए। वहां नक़ाबपोश नवाब जान ने उन्हें पहचान लिया। नवाब जान ने कहा- मेरे औलिया मेरी हर दुआ क़बूल करते हैं। मैंने उनसे दुआ मांगी है कि मेरे शायर को दिल्ली का सरताज बना दें। ग़ालिब ने कहा- ऐसा हुआ तो मैं तुम्हारे घर आकर एक दुशाला भेंट करूंगा। नवाब जान ने ग़ालिब को अपनी हथेलियां दिखाकर कहा- आपके इंतज़ार में हथेलियों की मेहंदी का रंग फ़ीका पड़ गया।

लाल क़िले के मुशायरे में जब दिल्ली ने ग़ालिब को अपना शायर मान लिया तो उन्होंने स्वीकार किया- ये शायद नवाब जान की दुआओं का असर है। ग़ालिब जब उसके घर गए तो मालूम हुआ कि शहर कोतवाल की धमकियों से तंग आकर नवाब जान शहर छोड़कर चली गई। ग़ालिब जब अपनी पेंशन के मामले में कलकत्ता जा रहे थे तो बनारस में अचानक नवाब जान की मां से मुलाक़ात हुई। मालूम हुआ कि ग़ालिब की मुहब्बत में नवाब जान ने अपनी जान क़ुर्बान कर दी। वे ग़ालिब को नवाब जान की क़ब्र पर ले गईं। ग़ालिब ने अपने कंधे पर से दुशाला उतारा और क़ब्र में लेटी नवाब जान को ओढ़ा दिया।

दर्द के साए में 
ग़ालिब की ज़िंदगी 
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गुलज़ार के धारावाहिक मिर्ज़ा ग़ालिब में एक शायर के रूप में ग़ालिब के संघर्ष और उनकी त्रासद ज़िंदगी का बेबाक चित्रण किया गया। वास्तव में ग़ालिब की ज़िंदगी ही इतनी नाटकीय रही कि उनकी कहानी को परदे पर लाने के लिए कल्पना की ज़रूरत ही नहीं रह जाती। ग़ालिब की ज़िंदगी का सबसे बड़ा हादसा था एक के बाद एक सात बेटों की मौत। इतनी बड़ी त्रासदी का सामना ग़ालिब  और उनकी बेगम ने  कैसे किया होगा। बेटों की मौत ने ग़ालिब को अंदर से तोड़ दिया। वे इतना टूट गए ख़ुदा पर भी उनका भरोसा नहीं रहा। फिर भी उनकी बेगम के मन में आस्था की एक लौ टिमटिमाती रही कि ऊपर वाला जो भी करता है अच्छा करता है। 

ग़ालिब का पागल भाई  युसूफ़ कर्फ़्यू के दौरान मारा जाता है और वे उसके जनाज़े में शामिल नहीं हो पाते।  ग़ालिब की ज़िंदगी की ये घटनाएं संवेदनशील लोगों की आंखें भिगो देने के लिए काफ़ी हैं। बेख़ौफ़ ग़ालिब ने ख़ुद को जुए और शराब में डुबो दिया। जुआ खेलने के जुर्म में छ: महीने जेल की हवा खाई। इस कठिन दौर से गुज़रते हुए भी ग़ालिब की क़लम रुकी नहीं। दिनोंदिन और धारदार होती गई। 

जेल से बाहर निकलते ही ग़ालिब का दीवान प्रकाशित हो गया और उनकी शायरी की धूम मच गई। एक शायर के रूप में ख़ुद को स्थापित करने के लिए ग़ालिब ने काफ़ी संघर्ष किया था।  लेकिन उनको  स्वीकृति और पहचान तब मिली जब वे अपना सब कुछ हार चुके थे। 

एक दिन ग़ालिब ने हाज़ी मीर से दिल्ली छोड़कर लखनऊ जाने की ख़्वाहिश जताई। हाज़ी मीर ने कहा- लखनऊ वाले दूसरे शहर के शायर को स्वीकार नहीं करते। ग़ालिब ने कहा- मैं उर्दू का शायर हूँ, किसी शहर का शायर नहीं। दिल्ली, लखनऊ, इलाहाबाद, आगरा और हैदराबाद की कोख़ से अगर एक हिंदुस्तान पैदा होगा तो उसकी एक शाख़ पर मेरा भी आशियां होगा। बेगम जान ने ग़ालिब को दिल्ली का सरताज बनाया था। ग़ालिब के दीवान ने उन्हें हिंदुस्तान का सरताज बना दिया। शेख़ इब्राहिम ज़ौक़ के इंतक़ाल के बाद बहादुर शाह ज़फ़र ने ग़ालिब को अपना उस्ताद बनाया। कुछ समय बाद 1857 का गदर हो गया। ग़ालिब ने दिल्ली की तबाही अपनी आंखों से देखी। बादशाह को क़ैद करके अंग्रेजों ने रंगून भेज दिया। ग़ालिब फिर अकेले हो गए।

इब्राहिम ज़ौक़ और 
मिर्ज़ा ग़ालिब
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मिर्ज़ा ग़ालिब धारावाहिक के सेट पर शायर इब्राहिम ज़ौक़ की भूमिका कर रहे अभिनेता शफी इनामदार से गपशप हुई। मैंने ये जानना चाहा कि ज़ौक़ और ग़ालिब में टकराव  की वजह क्या थी? वे बोले- ज़ौक़ साहब और मिर्ज़ा ग़ालिब कड़े प्रतिद्वंदी थे। अगर मिर्ज़ा ग़ालिब इस धारावाहिक के नायक हैं तो इब्राहिम ज़ौक़ विलेन हैं। दोनों उस समय के नंबर वन शायर थे और आख़िर तक नंबर वन ही रहे। हक़ीक़त यह है कि ज़ौक़ साहब दिल ही दिल में मिर्ज़ा ग़ालिब की प्रतिभा के क़ायल थे। लेकिन वे विरोध इस वजह से करते थे कि ग़ालिब की संभावनाओं को देखते हुए उन्हें अपना सिंहासन डोलता नज़र आ रहा था। दोनों ही दिग्गज शायर थे मगर रहन सहन के स्तर पर फ़र्क़ था। ज़ौक़ साहब नमाज़ी आदमी थे। सादा जीवन बसर करते थे और इसका उन्हें गर्व था। दूसरी तरफ़ ग़ालिब मस्तमौला क़िस्म के इंसान थे। शराब पीते थे, जुआ खेलते थे और तवायफ़ के कोठे पर भी नज़र आ जाते थे। मगर उस समय के लोग प्रतिभा की क़द्र करना जानते थे। यही कारण है कि ज़ौक़ साहब जहां अबू ज़फ़र के उस्ताद थे वहीं ज़फ़र के बेटे मिर्ज़ा फ़खरू के उस्ताद मिर्ज़ा ग़ालिब थे।

मिर्ज़ा ग़ालिब धारावाहिक से ये सच सामने आया कि ग़ालिब एक असाधारण इंसान और महान शायर थे। वे कभी भी न तो अपनी शायरी में और न ज़ाती ज़िंदगी में साधारण आदमी की तरह जिए। ग़ालिब की ज़िंदगी के कैनवास पर प्यार का रंग भी उभरा लेकिन इश्क़ में कभी वे दीवाना नहीं बने।

गुलज़ार के ग़ालिब का करिश्मा 
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मिर्ज़ा ग़ालिब को बड़े पर्दे पर उतारने का जो सपना गुलज़ार ने देखा था उस सपने को उन्होंने छोटे पर्दे पर साकार किया। गुलज़ार ने इतनी ख़ूबसूरती से इस काम को अंजाम दिया कि लोग कहने लगे- मिर्ज़ा ग़ालिब की दास्तान ए ज़िंदगी को उनके अलावा कोई दूसरा इतने असरदार तरीके से साकार नहीं कर सकता था। गुलज़ार ख़ुद भी एक हस्सास शायर हैं। उन्होंने ग़ालिब की ज़िंदगी की त्रासदी और ग़ालिब की शायरी की संवेदनशीलता को मिलाकर जो तस्वीर बनाई ग़ालिब की वह तस्वीर लोगों को बहुत भाई। उस तस्वीर में ज़िंदगी के जीते जागते अक्स थे। उस तस्वीर के नक़्श बोल रहे थे। उस तस्वीर में एक महान शायर की ज़िंदगी सांस ले रही थी। कुल मिलाकर मिर्ज़ा ग़ालिब धारावाहिक के रूप में गुलज़ार ने हमें एक बेमिसाल तोहफ़ा दिया। इस धारावाहिक के ज़रिए गुलज़ार ने साबित किया कि इतिहास को दोबारा ज़िंदा किया जा सकता है।

हैं और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे 
कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाज़ ए बयां और


मिर्ज़ा ग़ालिब का कालजयी संगीत जगजीत सिंह ने तैयार किया। जगजीत और चित्रा की आवाज़ में मिर्ज़ा ग़ालिब की उर्दू शायरी हिंदुस्तान के घर घर तक पहुंच गई। फ़कीर (जावेद ख़ान) के लिए जगजीत ने विनोद  सहगल की आवाज़ का शानदार उपयोग किया। इस धारावाहिक के संगीत का डबल कैसेट जारी किया गया। उसकी भी ज़बरदस्त बिक्री हुई।

अगर आप पटकथा और संवाद लेखन में दिलचस्पी रखते हैं तो आपको रूपा एंड कंपनी से प्रकाशित यह किताब ज़रूर पढ़नी चाहिए- "Mirza Ghalib : A Biographical Scenario by Gulzar." मशहूर कवि-लेखक, हम सबके प्यारे दोस्त यतीन्द्र मिश्र इन दिनों गुलज़ार साहब की आत्मकथा पर काम कर रहे हैं। मेरी दिली दुआ है कि 'लता सुरगाथा' की तरह उनकी यह किताब भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रियता हासिल करे।

आपका-
देवमणि पांडेय

Devmani Pandey : B-103, Divya Stuti,
 Kanya Pada, Gokuldham, Film City Road, 
Goregaon East, Mumbai- 400063, M : 98210-82126

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शुक्रवार, 29 मई 2020

फ़िल्म निर्देशक भीमसेन : एक अकेला इस शहर में




भीमसेन की फ़िल्म घरौंदा 

लॉक डाउन के दौरान मैंने निर्माता-निर्देशक भीमसेन की फ़िल्म 'घरौंदा' देखी। उनका हालचाल जानने के लिए मैंने उनके प्रिय मित्र कथाकार-चित्रकार आबिद सुरती को फ़ोन किया। आबिद जी बोले- अरे वे तो साल भर पहले गुज़र गए। मैंने भीमसेन जी के बेटे किरीट खुराना से बात की। किरीट ने बताया- 17 अप्रैल 2018 को पापा गुज़र गए। 

सन् 1975 में निर्माता निर्देशक के रूप में भीमसेन ने 'घरौंदा' फ़िल्म बनाई। डॉ शंकर शेष की कहानी पर आधारित इस फ़िल्म की पटकथा गुलज़ार ने लिखी। संवाद गुलज़ार और भूषण वनमाली ने लिखे थे। 'घरौंदा' में संगीतकार जयदेव के संगीत ने कमाल किया। गुलज़ार के गीत 'दो दीवाने शहर में' और 'एक अकेला इस शहर में' काफ़ी लोकप्रिय हुए। फ़िल्म 'घरौंदा' में रूना लैला की आवाज़ में एक गीत नक़्श लायलपुरी ने का भी है-

तुम्हें हो ना हो, मुझको तो यकीं है
मुझे प्यार तुमसे,  नहीं है,  नहीं है

फ़िल्म “घरौंदा” मुम्बई महानगर में घर का सपना देखने और इसे साकार करने का प्रयास करते मिडिल क्लास प्रेमी युगल सुदीप (अमोल पालेकर) और छाया (ज़रीना वहाब) के नैतिक पतन की और उनके द्वारा किये गए अप्रत्याशित समझौतों की दास्तान है। फ़िल्म 'घरौंदा' में मुम्बई शहर एक निर्दयी किरदार है। वह आम आदमी के सपनों का क़ातिल है। वह अनैतिक समझौते करने पर विवश करता है। इस फ़िल्म का एक सम्वाद है- "इस शहर के लोग रोने पर कंधा नहीं देते। मरने का इंतज़ार करते हैं कंधा देने के लिए।" 




फ़िल्म 'घरौंदा' को 
फ़िल्म फेयर अवार्ड
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लीक से हटकर बनी फ़िल्म 'घरौंदा' की कामयाबी पर फ़िल्म आलोचकों ने आशंका जताई। साल भर इंतज़ार के बाद अपना सब कुछ दांव पर लगा कर भीमसेन ने  सन् 1977 में इस फ़िल्म को रिलीज़ किया। 'घरौंदा' फ़िल्म ने ज़बरदस्त लोकप्रियता हासिल की। सन् 1977 में कई बड़ी फ़िल्में रिलीज़ हुई़। इनके नाम हैं- अमर अकबर एंथोनी, परवरिश, हम किसी से कम नहीं, चाचा भतीजा, आदमी सड़क का, दूसरा आदमी, शतरंज के खिलाड़ी, भूमिका और दुल्हन वही जो पिया मन भाए। इन बड़े बैनर की फ़िल्मों के सामने फ़िल्म 'घरौंदा' बॉक्स ऑफिस पर टिकी रही और इसने सिनेमा हाल में सौंवा दिन मनाया।

'घरौंदा' फ़िल्म में बेस्ट सपोर्टिंग ऐक्टर के लिए डॉ श्रीराम लागू को और बेस्ट लिरिक के लिए गुलज़ार को फ़िल्म फेयर अवार्ड मिला। फ़िल्म फेयर अवार्ड की चार और श्रेणियों में 'घरौंदा' का नामांकन हुआ था- बेस्ट स्टोरी, बेस्ट एक्ट्रेस, बेस्ट फिल्म और बेस्ट डायरेक्टर। इसके अलावा राष्ट्रीय स्तर पर फ़िल्म 'घरौंदा' को 30 पुरस्कार मिले। निर्देशन के लिए भीमसेन को बेस्ट क्रिटिक अवार्ड प्राप्त हुआ। इस फ़िल्म में अमोल पालेकर, ज़रीना वहाब और डॉ श्रीराम लागू की प्रमुख भूमिकाएं थी।


सन् 1979 में निर्माता-निर्देशक भीमसेन ने फ़िल्म 'दूरियां' बनाई। बेस्ट स्टोरी के लिए इसे भी फ़िल्मफेयर अवार्ड मिला। इस फ़िल्म की कहानी, पटकथा और संवाद डॉ शंकर शेष ने लिखे थे। जयदेव के संगीत ने फिर कमाल किया। इस फ़िल्म में सुदर्शन फ़ाकिर के लिखे तीनों गीत लोकप्रिय हुए-
  
ज़िंदगी! मेरे घर आना ज़िंदगी ...
ज़िंदगी में जब तुम्हारे हम नहीं थे ...
खोटा पैसा नहीं चलेगा ….. 

फ़िल्म 'दूरियां' में उत्तम कुमार और शर्मिला टैगोर की प्रमुख भूमिकाएं थीं। इस फ़िल्म में बाल कलाकार मोजू के रूप में  भीमसेन के बेटे किरीट खुराना ने सराहनीय  अभिनय किया है। अपने विषय के नएपन के कारण यह फ़िल्म काफ़ी सराही गई। अगले साल 1980 में फ़िल्म अभिनेता उत्तम कुमार का निधन हो गया।

लखनऊ से मुंबई का सफ़र
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भीमसेन का जन्म 24 नवंबर 1936 में मुल्तान में हुआ था। पिता कलाकार थे। पेंटिंग के फ्रेम बनाते थे। ग्यारह साल की उम्र में भीमसेन को विभाजन की त्रासदी से गुज़रना पड़ा। उनका परिवार अपनी ज़मीन और जड़ों से बिछड़कर लखनऊ में बस गया। लखनऊ विश्वविद्यालय से भीमसेन ने शास्त्रीय संगीत और फाइन आर्ट की तालीम हासिल की।

अपने सपनों को साकार करने के लिए भीमसेन सन् 1961 में मुंबई आए। फ़िल्म डिवीजन में बैकग्राउंड आर्टिस्ट का काम मिल गया। मशहूर एनिमेटर राम मोहन से भीमसेन ने एनीमेशन की कला सीखी। सन् 1970 में एक मिनट की एनीमेशन शॉर्ट फ़िल्म 'दि क्लाइंब' बनाई। शिकागो इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल में इस शार्ट फ़िल्म को 'सिल्वर हुगो' अवार्ड मिला। वापसी में इस पुरस्कार के लिए भीमसेन को ₹14000 कस्टम ड्यूटी चुकानी पड़ी। 

क्लाइंब फ़िल्म्स की शुरुआत
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सन् 1971 में भीमसेन ने अपनी कम्पनी 'क्लाइंब फ़िल्म्स' की शुरुआत की। दिन में विज्ञापन और रात में शॉर्ट फिल्में बनाई। सन् 1974 में 'एक अनेक और एकता' एनीमेशन फ़िल्म को नेशनल अवार्ड मिला। एनीमेशन और शार्ट फ़िल्मों के लिए भीमसेन ने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बहुत नाम कमाया। उन्हें 16 नेशनल अवॉर्ड और 8 इंटरनेशनल अवार्ड प्राप्त हुए। 

सन् 1977 में फ़िल्म 'घरौंदा' और सन् 1979 में फ़िल्म 'दूरियां' के बाद भीमसेन की तीसरी फ़िल्म आई- 'तुम लौट आओ'। इन फ़िल्मों ने उन्हें एक संवेदनशील फ़िल्मकार के रूप में स्थापित कर दिया। 'लोकगाथा' और 'वर्तमान' नामक एनिमेशन धारावाहिक बनाने का श्रेय उन्हें मिला। भीमसेन ने अंधविश्वास पर 'छोटी बड़ी बातें' धारावाहिक बनाया। सन् 1992 में कार एक्सीडेंट में छोटा बेटा जतिन गुज़र गया। इस दुख से बाहर निकलने के लिए उन्होंने एनीमेशन सीरीज़ शुरू की जो हिंदुस्तान की सबसे बड़ी सीरीज़ मानी जाती है। जहां से उन्होंने अपने कैरियर की शुरुआत की थी उसी फ़िल्म डिवीजन ने भीमसेन की एनीमेशन फ़िल्मों का विशेष शो आयोजित किया।


बेटों को सिखाया घर बसाना
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लोगों को यह शिकायत रहती है कि मां-बाप जब बूढ़े होते हैं तो बेटे उनका साथ छोड़ देते हैं। तीन मंज़िला मकान में रहने वाले फ़िल्मकार भीमसेन का नज़रिया अलग था। बेटे जवान हुए तो उन्होंने बेटों से कहा- जिस दिन तुम शादी करोगे उसी दिन तुम्हें मेरा घर छोड़ना होगा। उन्होंने बेटों को समझाया- घर बसाने से पहले घर बनाना ज़रूरी है। उनके दोनों बेटों ने उनकी सीख मानी। बांद्रा के उसी मुहल्ले में बेटों ने पहले घर बनाया, फिर घर बसाया यानी शादी की। भीमसेन के बड़े बेटे हिमांशु खुराना की एडवरटाइजिंग कंपनी है। छोटा बेटा किरीट खुराना एनिमेशन फ़िल्मों में व्यस्त है। 

नेशनल कॉलेज बांद्रा के सामने भीमसेन का तीन मंज़िला मकान है। ग्राउंड फ्लोर में उनका स्टूडियो है। पहली और दूसरी मंज़िल पर वे बीवी के साथ रहते थे। उन्होंने बताया था- दोनों बेटे अपने बच्चों के साथ प्रतिदिन शाम को उनसे मिलने के लिए आते हैं। मुंबई महानगर में ऐसी मुहब्बत दुर्लभ है। घर के नज़दीक एक हरे-भरे पार्क में रोज़ शाम को एक घंटे भीमसेन जी सैर करते थे। दो बार उनके साथ मैं भी शाम की सैर के लिए उनके साथ गया।

जवान बेटे से बिछड़ने का ग़म
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सन् 2003 में बांद्रा में भीमसेन जी के घर पर पहली मुलाक़ात हुई। श्वेत बाल, श्वेत दाढ़ी और श्वेत कुर्ते पाज़ामे में उनका व्यक्तित्व बहुत दिव्य लग रहा था। उन्होंने अपनी कविता पुस्तक 'एक जमा एक' मुझे भेंट की। उसमें आध्यात्मिक रंग वाली कविताएं हैं। उनकी बातचीत में भी आध्यात्मिकता झलक रही थी। मैंने उनसे इसका कारण पूछा। उन्होंने बताया कि छोटे बेटे को ईश्वर ने अपने पास बुला लिया। तब से उनका झुकाव आध्यात्मिकता की तरफ़ हो गया। 

सन् 1992 में दीवाली की रात भीमसेन का छोटा बेटा जतिन एक दोस्त के यहां पूजा में भाग लेने जा रहा था। सिद्धिविनायक मंदिर के सामने एक कार दुर्घटना में उसकी मौत हो गई। जतिन 22 साल का था। नादिरा बब्बर और दिनेश ठाकुर के साथ नाटक कर रहा था। एफडीआई की फ़िल्में की थीं। भीमसेन के धारावाहिक 'छोटी बड़ी बातें' में काम किया था। मुम्बई की लाइफ पर उसने एक कहानी लिखी थी 'दुविधा'। जतिन इस पर फ़िल्म डायरेक्ट करना चाहता था। बेटे की मौत के बाद भीमसेन ने ख़ुद को ईश्वर के हाथों में सौंप दिया।


टेलीफ़िल्म गुलकी बन्नो
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सन 2003 में नौजवानों की एक नई टीम के साथ भीमसेन राष्ट्रीय दूरदर्शन के लिए डॉ धर्मवीर भारती की कहानी पर टेलीफ़िल्म 'गुलकी बन्नो' के निर्माण में व्यस्त थे। गुलकी की भूमिका में अनन्या खरे और बुआ के किरदार में सुरेखा सीकरी थीं। वीरेंद्र सक्सेना गुलकी के पति बने थे। भीमसेन के अनुसार गुलकी बन्नो हमारे भारतीय समाज की असली दास्तान है। इस लघु कहानी में घर-परिवार, समाज और जीवन की अद्भुत तस्वीर है। जीवन दर्शन है। यह कहानी मानवीय भावनाओं का जीवंत दस्तावेज है।

फ़िल्मकार भीमसेन को बचपन से ही संगीत से लगाव था। उन्हें गाने का बेहद शौक़ था। उन्होंने अपने स्टूडियो में अपने रिकॉर्ड किए हुए कई गीत मुझे सुनाए थे और कहा था- "दरअसल इसी संगीत ने मुझे ज़िंदा रखा है। मेरे पास दस अल्बम की सामग्री है। पांच अल्बम एक साथ जारी करने की योजना बना रहा हूं।"  गाते गाते भीमसेन ने लिखना शुरू कर दिया। उनकी सात पुस्तकें प्रकाशित हुईं। 

भीमसेन ने अपनी फ़िल्मों से साबित किया कि वे ऋषिकेश मुखर्जी और बासु चटर्जी की परंपरा के संवेदनशील फ़िल्मकार हैं। उनकी फ़िल्मों में ज़िंदगी उसी तरह हंसती मुस्कराती है जिस तरह हम उसे देखते हैं। अपनी फ़िल्मों के कैनवास पर उन्होंने ज़िंदगी और समाज की सच्चाइयों को साकार किया। उनकी फ़िल्मों में मध्यवर्गीय इंसान के सपने हैं। उन्हें सच करने का संघर्ष है। सपनों के टूटने की आवाज़ भी है। गिरकर फिर से खड़े होने और मंज़िल की तरफ़ चल देने का हौसला भी है। इसलिए उनकी फ़िल्में अपने बहुत क़रीब लगती हैं। उनके किरदार अपने आसपास के, अपने घर के सदस्य लगते हैं। अपनी इसी कलात्मक अभिव्यक्ति के दम पर भीमसेन हमेशा हमारी स्मृतियों में हमारे साथ रहेंगे। 

आपका-
देवमणि पांडेय

Devmani Pandey : 
B-103, Divya Stuti, Kanya Pada, Gokuldham,
Film City Road, Goregaon East, Mumbai-40006
M : 98210-82126
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गुरुवार, 28 मई 2020

राज कपूर के गाल पर किदार शर्मा का थप्पड़



राज कपूर के गाल पर किदार शर्मा का थप्पड़
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राज कपूर ने कॉलेज की पढ़ाई छोड़ दी । पृथ्वीराज कपूर ने अपने बेटे से कहा- कम से कम ग्रेजुएशन तो कर लो। राज ने जवाब दिया- निर्माता निर्देशक बनने के लिए ग्रेजुएशन की डिग्री ज़रूरी नहीं होती। पृथ्वीराज कपूर अपने दोस्त किदार शर्मा के पास गए। उदास लहजे में बोले- राजू बिगड़ रहा है। पढ़ाई लिखाई से उसने मुंह मोड़ लिया है। किदार शर्मा ने कहा- उसे मेरे पास भेज दो। मैं उसे सुधार दूंगा। लेकिन तुम बीच में दख़ल मत देना। मैं चाहे उसे मारूं चाहे पीटूं। 

किदार शर्मा ने राज कपूर को अपना तीसरा सहायक बनाया। राज का काम था क्लैप देना। किदार शर्मा ने नोट किया कि क्लैप देने से पहले राज हमेशा जेब से कंघी निकालकर बालों पर फिराता था। उन्होंने सोचा किशोर लड़का है। उत्साही है। चलने दो। इससे मेरा क्या नुक़सान होता है। कभी-कभी क्लैप देने से पहले राज कपूर कैमरे में झांक कर अपना चेहरा देखने की कोशिश करता।

विषकन्या' की आउटडोर शूटिंग
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सन् 1940 में किदार शर्मा फ़िल्म 'विषकन्या' की आउटडोर शूटिंग कर रहे थे। पूरी यूनिट शाम ढलने की प्रतीक्षा कर रही थी। शॉट सूर्यास्त का था। अचानक उन्हें राज का ख़याल आया। किदार शर्मा ने उसे समझाया। बेटा राज! आज के दिन तुम कंघी मत करना। अगर कहीं समय निकल गया तो कल पूरी यूनिट लेकर वापस आना पड़ेगा। कल अगर मौसम ख़राब हुआ तो दो-चार दिन बर्बाद हो सकते हैं। सिर्फ़ एक शॉट का सवाल है। राज मान गया। 

थोड़ी सी प्रतीक्षा के बाद वह पल आ गया। सब कुछ तैयार था। किदार शर्मा ने इशारा किया। राज क्लैप लेकर आगे बढ़ा। लेकिन कैमरे के सामने आते ही वह किदार शर्मा की हिदायत भूल गया। राज ने हमेशा की तरह जेब से कंघी निकाली। बालों में कंघी फिराई। किदार शर्मा चुपचाप देखते रहे। एक कलाकार दाढ़ी मूंछ लगाकर राजा बना हुआ था। राज ने उसके चेहरे के सामने क्लैप लगाया और खट से दबा दिया। पता नहीं कैसे दाढ़ी के बाल क्लैप के अंदर आ गए। अगले ही पल कलाकार की दाढ़ी उखड़कर क्लैप के साथ राज के हाथों में झूल रही थी। 


राजकपूर के गाल पर 
ज़ोरदार थप्पड़
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किदार शर्मा को ग़ुस्सा आ गया। उन्होंने कहा- राज इधर आओ। वह डरता डरता किदार शर्मा के पास आया। अचानक किदार शर्मा के दाएं हाथ का एक ज़ोरदार थप्पड़ राज के बाएं गाल पर पड़ा। पूरी यूनिट सन्न रह गई। थप्पड़ इतना ज़ोरदार था कि राज के गाल पर उंगलियों के निशान पड़ गए। राज कपूर न रोया, न उसने प्रतिरोध किया। चुपचाप जाकर एक किनारे बैठ गया। किदार शर्मा को रात में नींद नहीं आई। उन्होंने सोचा- इसमें राज की क्या ग़लती है। हवा से उड़ कर भी तो दाढ़ी क्लैप में फंस सकती थी। उनके मन में यह ख़याल आया कि राज हमेशा क्लैप के समय यूं ही तो कंघी नहीं करता। उसके मन में कहीं न कहीं अभिनेता बनने की चाहत है। 

उस समय किदार शर्मा 'नील कमल' फ़िल्म के निर्माण की योजना बना रहे थे। सुबह ऑफिस पहुंचकर उन्होंने राज कपूर के नाम से एक कांट्रैक्ट बनाया। साथ में पांच हज़ार का चेक संलग्न किया। उस समय यह बहुत बड़ी रकम थी। उन दिनों स्टूडियो में नियमित हाज़िरी ज़रूरी थी। राज आया तो किदार शर्मा ने उसे पास बुलाया। राज ने अपना दायां गाल दिखाते हुए कहा- नहीं, आप इस पर भी मारेंगे। किदार शर्मा के विश्वास दिलाने पर वह नज़दीक आया। उन्होंने राज को कांट्रैक्ट लेटर और साइनिंग अमाउंट का चेक पकड़ा दिया। 



फ़िल्म नीलकमल का हीरो
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कांट्रैक्ट पढ़ते ही राज रोने लगा। रोते-रोते बोला- अंकल आप मुझे बहुत प्यार करते हैं। मुझ जैसे सिरफ़िरे आदमी को हीरो बनाने से आपकी फ़िल्म डूब जाएगी। किदार शर्मा बोले- नहीं डूबेगी। फ़िल्म बनाना मुझे अच्छी तरह आता है। इस पर वह बोला- अंकल! आप मुझे हीरोइन तो सुंदर देंगे ना! किदार शर्मा ने कहा- तेरी जो भी पसंद हो बोल दे। इस पर शरमाते हुए राज ने बताया कि अपने स्टूडियो में जो छोटी सी, सुंदर सी लड़की आती है। हमेशा हंसती रहती है। उसका इशारा मधुबाला की ओर था। तब तक रंजीत स्टूडियो की फ़िल्मों में मधुबाला को छोटी-मोटी भूमिकाएं ही दी जाती थीं। किदार शर्मा ने फ़िल्म 'नीलकमल' में उसे राज कपूर की नायिका बना दिया। 

किदार शर्मा से सन् 1993 में मेरी मुलाक़ात हुई। माहिम में हिंदुजा अस्पताल के पास वाली बिल्डिंग में उनका ऑफिस था। बातचीत के बड़े रसिक थे। इसलिए उनके कार्यालय में कई बार मेरा जाना हुआ। उन्होंने बताया- "राज खुद में एक परफेक्ट इंसान था। 'बरसात' फ़िल्म बन जाने पर वह मेरे पास आया। उसका आग्रह था कि फ़िल्म का पहला शो मैं उसके साथ देखूं।" समयानुसार किदार शर्मा लिबर्टी टॉकीज़ पहुंचे। गेट पर राज प्रतीक्षा कर रहा था। वे अंदर गए तो पूरे हाल में एक भी आदमी नहीं था। राज ने मुस्कुराते हुए कहा- यह पहला शो मेरे गुरु किदार शर्मा के लिए है। दोनों ने एक साथ फ़िल्म देखी। ज़्यादातर समय राज अपने गुरु की बगल में खड़ा रहा। किदार शर्मा ने उसे आशीर्वाद दिया। किदार शर्मा के अनुसार पूरे जीवन में उन्हें राज जैसा शिष्य और पृथ्वीराज जैसा मित्र दूसरा कोई नहीं मिला।

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आपका-
देवमणि पांडेय

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति,
कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड,
गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063 , 98210 82126
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