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शनिवार, 30 मई 2020

गुलज़ार के ग़ालिब : बना है शाह का मुसाहिब




गुलज़ार के मिर्ज़ा ग़ालिब
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मिर्ज़ा ग़ालिब ने पालकी में बैठे शायर इब्राहिम ज़ौक़ की तरफ़ एक जुमला उछाला- "बना है शाह का मुसाहिब फिरे है इतराता"। अंतिम मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के उस्ताद थे ज़ौक़ साहब। ये ख़बर बादशाह तक पहुंच गई कि मिर्ज़ा नौशा उर्फ़ ग़ालिब ने ज़ौक़ साहब का मज़ाक उड़ाया। लाल क़िले में जुम्मे को मुशायरा था।  ज़ौक़ साहब के इशारे पर मिर्ज़ा नौशा (ग़ालिब) को दावतनामा भेजा गया। मुशायरे के आगाज़ के समय बादशाह ने ग़ालिब से इस जुमले की वजह पूछी। मिर्ज़ा नौशा (ग़ालिब) ने फ़रमाया- ये तो उनकी ताज़ा ग़ज़ल के मक़्ते का मिसरा ऊला है। बादशाह ने कहा- मक़्ता पेश किया जाए। ग़ालिब ने पेश कर दिया-

बना है शाह का मुसाहिब फिरे है इतराता
वगर्ना शहर में ग़ालिब की आबरू क्या है

भरपूर दाद मिली। ज़ौक़ साहब ने तंज़िया लहजे में कहा- मक़्ता इतना ख़ूबसूरत है तो ग़ज़ल क्या होगी? बादशाह की गुज़ारिश पर ग़ालिब ने जेब से काग़ज़ निकाला और ग़ज़ल का मतला पेश किया- 

हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है 
तुम्ही कहो कि ये अंदाज़ ए गुफ़्तगू क्या है

मतले पर भी दाद मिली। अगले शेर पर तो शेख़ इब्राहिम ज़ौक़ ने भी दाद दी- 

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल 
जो आंख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है

इस शेर पर दाद के साथ मुक़र्रर की आवाज़ भी बुलंद हुई। साथ में बैठे शायर ने मिर्ज़ा ग़ालिब के हाथ से वो काग़ज़ लेकर हैरत से देखा। वह काग़ज़ कोरा था। उस पर कोई ग़ज़ल नहीं थी। मौक़े की नज़ाकत देखकर तत्काल ग़ज़ल कह देने का कमाल मिर्ज़ा ग़ालिब ही कर सकते थे। कुल मिलाकर कहा जाए तो गालिब ने यह मुशायरा लूट लिया था। इस कामयाबी के साथ उनकी शोहरत दिल्ली पर छा गई। 

मुंबई के फ़िल्मालय में 
मिर्ज़ा ग़ालिब 
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सन् 1988 म़े अंधेरी मुम्बई के फ़िल्मालय स्टूडियो में मेरी आंखों के सामने यही दृश्य फ़िल्माया जा रहा था। मुम्बई के फ़िल्मालय स्टूडियो में नितीश राय द्वारा निर्मित मिर्ज़ा ग़ालिब के विशाल सेट को देखकर लगता था कि जैसे ग़ालिब की दिल्ली की गली क़ासिम और बल्लीमारान मुहल्ला ही उठकर चला आया हो। मिर्ज़ा ग़ालिब धारावाहिक के कार्यकारी निर्माता जय सिंह ने मुझे इसी सेट पर लंच के लिए आमंत्रित किया था। 

मई महीना था। दोपहर की तेज़ धूप, भयंकर गर्मी और जानलेवा उमस थी। पसीने से लथपथ चार कहारों के कंधों पर एक पालकी आ रही थी। उसमें शायर इब्राहिम ज़ौक़ (शफी इनामदार) थे। नुक्कड़ पर एक जूती की दुकान पर कुछ दोस्तों के साथ मिर्ज़ा ग़ालिब (नसीरुद्दीन शाह) बैठे हुए थे। जैसे ही पालकी उनके पास से गुज़री उन्होंने बुलंद आवाज़ में एक जुमला उछाल दिया- "बना है शाह का मुसाहिब फिरे है इतराता।" इस पर पहले वाह-वाह हुई फिर ज़ोरदार ठहाका सुनाई पड़ा।

दो बार रिटेक हुआ। गर्मी से परेशान यूनिट के कुछ लोग चीख़ने चिल्लाने लगे। गुलज़ार का एक सहायक कहारों पर भड़क उठा। रिटेक कहारों की चाल की वजह से हुआ था। धूप और गर्मी से बेहाल कहार कभी मध्यम तो कभी तेज़ चाल में आते। टाइमिंग मैच न होने से रिटेक हो जाता था। जब यूनिट के अधिकांश लोग गर्मी और ग़ुस्से में उबल रहे थे तो मैंने देखा-  एक सहायक के छाते के नीचे ख़ामोश खड़े गुलज़ार मंद मंद  मुस्कुरा रहे थे। उनको देख कर लगता था कि इस इंसान को कभी ग़ुस्सा ही नहीं आता। आख़िर शाट ओके हुआ और लंच की घोषणा हो गई।

जयसिंह और गुलज़ार की फ़िल्म अंगूर
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गुलज़ार कभी मिर्ज़ा ग़ालिब की ज़िंदगी पर अभिनेता संजीव कुमार के साथ एक फ़िल्म बनाना चाहते थे। तब इस योजना पर वे अमल नहीं कर पाए। उत्तर प्रदेश के बिजनौर ज़िले के व्यवसायी जय सिंह ने जैसे ही ग़ालिब पर धारावाहिक बनाने का प्रस्ताव रखा गुलज़ार ने सहमति दे दी। पटकथा पहले से तैयार थी। कुछ तब्दीलियां करके उसे धारावाहिक का रूप दिया गया। मंडी हाउस ने गुलज़ार साहब के इस प्रस्ताव को मंज़ूर कर लिया।

फ़िल्म निर्माण में पैसा लगाना बहुत बड़े  जोख़िम का काम है। पैसा डूबने का डर हमेशा लगा रहता है। बहुत कम लोग हैं जिन पर भरोसा किया जा सकता है। निर्माता जय सिंह की नज़र में गुलज़ार बहुत नेक और ईमानदार इंसान हैं। इसलिए उन्होंने गुलज़ार पर भरोसा किया। कई सालों की मेहनत से कमाई धनराशि व्यवसायी जयसिंह ने गुलज़ार साहब को सौंपकर कहा कि इन्हीं पैसों से मेरे लिए एक फ़िल्म बना दीजिए। सन् 1982 में गुलज़ार ने उनके लिए फ़िल्म 'अंगूर' बना दी। जयसिंह फ़िल्म निर्माता बन गए । उन्होंने जितना पैसा लगाया था उससे ज़्यादा वापस आ गया। दुबारा गुलज़ार ने उनको मिर्ज़ा ग़ालिब धारावाहिक के रूप में एक शानदार तोहफ़ा दिया। 

मिर्ज़ा ग़ालिब पर बनी थी फ़िल्म
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मिर्ज़ा ग़ालिब की निजी ज़िंदगी के कुछ ख़ास पहलुओं पर पहले भी एक फ़िल्म बन चुकी है। इस फ़िल्म में भारत भूषण और सुरैया ने काम किया था। इस फ़िल्म की सबसे बड़ी कमज़ोरी इसकी अति नाटकीयता थी। एक तवायफ़ के साथ ग़ालिब के रिश्तों को इसमें कुछ ज़्यादा ही अहमियत दी गई थी। यह फ़िल्म ग़ालिब की ज़िंदगी, उनके फ़न, उनकी शख़्सियत और उस दौर के हालात को बख़ूबी साकार नहीं कर पाई जिनसे गुज़र कर असद उल्लाह खां एक दिन मिर्ज़ा ग़ालिब बन गए थे। 

गुलज़ार अपने मिशन में कामयाब हुए । अपने सोलह किस्तों के धारावाहिक में उन्होंने मिर्ज़ा ग़ालिब के फ़न, शख़्सियत और हालात को इस तरह छोटे पर्दे पर उतारा कि एक महान शायर की दास्तान को ज़िंदगी मिल गई। फ़िल्म 'मीरा' के फ्लॉप होने के बाद गुलज़ार की हिम्मत नहीं हो रही थी कि मिर्ज़ा ग़ालिब पर फ़िल्म बनाएं। उन्होंने जय सिंह से कहा-  लेकिन इस आग को सीने में दबाए मैं मरना भी नहीं चाहता।

गुलज़ार इस मायने में ख़ुशनसीब हैं कि ग़ालिब की ज़िंदगी और हालात पर सामाग्री जुटाने में उन्हें कैफ़ी आज़मी से काफ़ी मदद मिल गई। फ़िल्म निर्देशक सुखदेव ने मिर्ज़ा ग़ालिब पर फ़िल्म बनाने की योजना बनाई थी। उनके निधन के बाद यह योजना धरी की धरी रह गई। उनके लिए मिर्ज़ा ग़ालिब पर सारा शोध कैफ़ी आज़मी ने किया था। उनके इस शोध को सम्मान देते हुए गुलज़ार ने स्क्रीन पर अपने नाम के ऊपर कैफ़ी आज़मी का नाम दिया।

ग़ालिब के ज़माने की दास्तान
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एक बेहतरीन शायर होने के साथ ग़ालिब एक अच्छे पत्र लेखक भी थे। अपने ख़तों में उन्होंने समय-समय पर होने वाली महत्वपूर्ण घटनाओं का को भी दर्ज किया है। इन ख़तों से न सिर्फ़ ग़ालिब के निजी जीवन की दिलचस्प जानकारियां मिलती हैं बल्कि ये अपने समय के ऐतिहासिक दस्तावेज भी हैं। अपने धारावाहिक में इन ख़तों के ज़रिए गुलज़ार ने उस दौर की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं की तह में जाने की सराहनीय कोशिश की। ग़ालिब और बहादुरशाह ज़फ़र का ज़माना एक था। इसी ज़माने में 1857 का गदर हुआ। इस उथल-पुथल भरे दौर में ग़ालिब की शायरी क्या ख़ास मायने रखती है, इस खोजबीन में गुलज़ार ने कई साल लगाए थे। 

एक असाधारण इंसान पर बना गुलज़ार का यह धारावाहिक ज्ञानवर्धक भी है और अर्थपूर्ण भी। धारावाहिक में मिर्ज़ा ग़ालिब की भूमिका एक चुनौती थी। इस चुनौती के असली हक़दार थे नसीरुद्दीन शाह। ख़ुद उन्होंने ग़ालिब की भूमिका निभाने का सपना देखा था। टीवी धारावाहिकों में कभी काम न करने का फ़ैसला कर चुके नसीर के सामने जब गुलज़ार का प्रस्ताव आया तो उनका सपना साकार हुआ।

ग़ालिब की ज़िंदगी में कई तरह के उतार-चढ़ाव आए। गहरी निराशा, तंगहाली, पहचान का संघर्ष, आम लोगों से जुड़ने की आकांक्षा, दरबार में रहने की मजबूरी और दरबार से दूरी भी। हर तरह की आज़ादी के क़ायल ग़ालिब की ज़िंदगी में आशा और निराशा के बादल लगातार बरसते रहे। 14 साल की उम्र में उनकी शादी दिल्ली के मिर्ज़ा इलाही बख़्श (इफ्तिख़ार) की बेटी उमराव जान (तन्वी आज़मी) के साथ हुई। वे घर जमाई बनकर दिल्ली आ गए। शायरी, चौसर और कंचे के दीवाने ग़ालिब अपनी बेगम से बेइंतहा मुहब्बत करते थे। 


मिर्ज़ा ग़ालिब और 
तवायफ़ नवाब जान
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दिल्ली में ग़ालिब का दिल रमा नहीं। इसकी सबसे बड़ी वजह थी उनकी शायरी की उपेक्षा। लोग उन्हें आगरे का शायर मानते थे दिल्ली का नहीं। उनका दीवान छापने को कोई प्रकाशक तैयार नहीं हुआ। अलबत्ता मशहूर तवायफ़ नवाब जान (नीना गुप्ता) के मुंह से अपना कलाम सुनकर वे ज़रूर ख़ुश हुए। यह भी कहा जाता है कि अगर चमत्कारिक रूप से नवाब जान ग़ालिब की ज़िंदगी में न आती तो ग़ालिब दिल्ली छोड़ कर चले गए होते।

एक दिन ग़ालिब अपने क़ुतुब फ़रोश (पुस्तक विक्रेता) दोस्त हाज़ी मीर की दुकान पर बैठे थे। उसी समय कोठे से आती हुई सुरीली आवाज़ सुनकर ग़ालिब दंग रह गए। कोई सुरों की मलिका उन्हीं की ग़ज़ल को आवाज़ दे रही थी। ग़ालिब ने हाज़ी मीर से कहा- पहली बार दिल्ली में किसी दूसरे के मुंह से अपनी ग़ज़ल सुन रहा हूं। ग़ालिब के पांव ख़ुद-ब-ख़ुद कोठे की सीढ़ियां चढ़ने लगे। उन्होंने देखा- एक हसीना उन्हीं की ग़ज़ल गा रही है-

दिल ही तो है न संग ओ ख़िश्त दर्द से भर न आए क्यूं 
रोएंगे हम हज़ार बार कोई हमें रुलाए क्यूं

तवायफ़ नवाब जान को वो अधूरी ग़ज़ल चूरन की एक पुड़िया म़ें मिली थी। उसका मक़्ता ग़ायब था। ग़ालिब ने ग़ज़ल पूरा करवा दी। उन्होंने ख़ुद को ग़ालिब का दोस्त बताया। ग़ालिब को भरोसा हो गया कि जो ग़ज़ल तवायफ़ के कोठे तक पहुंच गई वह एक दिन अवाम तक ज़रूर पहुंचेगी। नवाब जान एक उम्दा कलाकार थी। वह ग़ालिब की शायरी की प्रशंसक और प्रेरणा थी। अभिनेत्री नीना गुप्ता ने नवाब जान की भूमिका को असरदार तरीके से निभाया। नवाब जान (नीना गुप्ता) का हुस्न, अदा और मोहक अंदाज़ देखने लायक़ है जब वह ग़ालिब की ग़ज़ल पेश करती है-

दिल ए नाद़ां तुझे हुआ क्या है 
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है

नवाब जान को दिया 
ग़ालिब ने दुशाला
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नवाब जान ग़ालिब को दीवानगी की हद तक प्यार करती थी। ग़ालिब को अपनी बीवी से मुहब्बत थी। उन्होंने हमेशा उसके साथ सम्मानजनक व्यवहार किया। अपनी बेगम के ज़ोर देने पर बच्चे की सलामती की दुआ मांगने ग़ालिब पहली बार पीर की मज़ार पर गए। वहां नक़ाबपोश नवाब जान ने उन्हें पहचान लिया। नवाब जान ने कहा- मेरे औलिया मेरी हर दुआ क़बूल करते हैं। मैंने उनसे दुआ मांगी है कि मेरे शायर को दिल्ली का सरताज बना दें। ग़ालिब ने कहा- ऐसा हुआ तो मैं तुम्हारे घर आकर एक दुशाला भेंट करूंगा। नवाब जान ने ग़ालिब को अपनी हथेलियां दिखाकर कहा- आपके इंतज़ार में हथेलियों की मेहंदी का रंग फ़ीका पड़ गया।

लाल क़िले के मुशायरे में जब दिल्ली ने ग़ालिब को अपना शायर मान लिया तो उन्होंने स्वीकार किया- ये शायद नवाब जान की दुआओं का असर है। ग़ालिब जब उसके घर गए तो मालूम हुआ कि शहर कोतवाल की धमकियों से तंग आकर नवाब जान शहर छोड़कर चली गई। ग़ालिब जब अपनी पेंशन के मामले में कलकत्ता जा रहे थे तो बनारस में अचानक नवाब जान की मां से मुलाक़ात हुई। मालूम हुआ कि ग़ालिब की मुहब्बत में नवाब जान ने अपनी जान क़ुर्बान कर दी। वे ग़ालिब को नवाब जान की क़ब्र पर ले गईं। ग़ालिब ने अपने कंधे पर से दुशाला उतारा और क़ब्र में लेटी नवाब जान को ओढ़ा दिया।

दर्द के साए में 
ग़ालिब की ज़िंदगी 
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गुलज़ार के धारावाहिक मिर्ज़ा ग़ालिब में एक शायर के रूप में ग़ालिब के संघर्ष और उनकी त्रासद ज़िंदगी का बेबाक चित्रण किया गया। वास्तव में ग़ालिब की ज़िंदगी ही इतनी नाटकीय रही कि उनकी कहानी को परदे पर लाने के लिए कल्पना की ज़रूरत ही नहीं रह जाती। ग़ालिब की ज़िंदगी का सबसे बड़ा हादसा था एक के बाद एक सात बेटों की मौत। इतनी बड़ी त्रासदी का सामना ग़ालिब  और उनकी बेगम ने  कैसे किया होगा। बेटों की मौत ने ग़ालिब को अंदर से तोड़ दिया। वे इतना टूट गए ख़ुदा पर भी उनका भरोसा नहीं रहा। फिर भी उनकी बेगम के मन में आस्था की एक लौ टिमटिमाती रही कि ऊपर वाला जो भी करता है अच्छा करता है। 

ग़ालिब का पागल भाई  युसूफ़ कर्फ़्यू के दौरान मारा जाता है और वे उसके जनाज़े में शामिल नहीं हो पाते।  ग़ालिब की ज़िंदगी की ये घटनाएं संवेदनशील लोगों की आंखें भिगो देने के लिए काफ़ी हैं। बेख़ौफ़ ग़ालिब ने ख़ुद को जुए और शराब में डुबो दिया। जुआ खेलने के जुर्म में छ: महीने जेल की हवा खाई। इस कठिन दौर से गुज़रते हुए भी ग़ालिब की क़लम रुकी नहीं। दिनोंदिन और धारदार होती गई। 

जेल से बाहर निकलते ही ग़ालिब का दीवान प्रकाशित हो गया और उनकी शायरी की धूम मच गई। एक शायर के रूप में ख़ुद को स्थापित करने के लिए ग़ालिब ने काफ़ी संघर्ष किया था।  लेकिन उनको  स्वीकृति और पहचान तब मिली जब वे अपना सब कुछ हार चुके थे। 

एक दिन ग़ालिब ने हाज़ी मीर से दिल्ली छोड़कर लखनऊ जाने की ख़्वाहिश जताई। हाज़ी मीर ने कहा- लखनऊ वाले दूसरे शहर के शायर को स्वीकार नहीं करते। ग़ालिब ने कहा- मैं उर्दू का शायर हूँ, किसी शहर का शायर नहीं। दिल्ली, लखनऊ, इलाहाबाद, आगरा और हैदराबाद की कोख़ से अगर एक हिंदुस्तान पैदा होगा तो उसकी एक शाख़ पर मेरा भी आशियां होगा। बेगम जान ने ग़ालिब को दिल्ली का सरताज बनाया था। ग़ालिब के दीवान ने उन्हें हिंदुस्तान का सरताज बना दिया। शेख़ इब्राहिम ज़ौक़ के इंतक़ाल के बाद बहादुर शाह ज़फ़र ने ग़ालिब को अपना उस्ताद बनाया। कुछ समय बाद 1857 का गदर हो गया। ग़ालिब ने दिल्ली की तबाही अपनी आंखों से देखी। बादशाह को क़ैद करके अंग्रेजों ने रंगून भेज दिया। ग़ालिब फिर अकेले हो गए।

इब्राहिम ज़ौक़ और 
मिर्ज़ा ग़ालिब
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मिर्ज़ा ग़ालिब धारावाहिक के सेट पर शायर इब्राहिम ज़ौक़ की भूमिका कर रहे अभिनेता शफी इनामदार से गपशप हुई। मैंने ये जानना चाहा कि ज़ौक़ और ग़ालिब में टकराव  की वजह क्या थी? वे बोले- ज़ौक़ साहब और मिर्ज़ा ग़ालिब कड़े प्रतिद्वंदी थे। अगर मिर्ज़ा ग़ालिब इस धारावाहिक के नायक हैं तो इब्राहिम ज़ौक़ विलेन हैं। दोनों उस समय के नंबर वन शायर थे और आख़िर तक नंबर वन ही रहे। हक़ीक़त यह है कि ज़ौक़ साहब दिल ही दिल में मिर्ज़ा ग़ालिब की प्रतिभा के क़ायल थे। लेकिन वे विरोध इस वजह से करते थे कि ग़ालिब की संभावनाओं को देखते हुए उन्हें अपना सिंहासन डोलता नज़र आ रहा था। दोनों ही दिग्गज शायर थे मगर रहन सहन के स्तर पर फ़र्क़ था। ज़ौक़ साहब नमाज़ी आदमी थे। सादा जीवन बसर करते थे और इसका उन्हें गर्व था। दूसरी तरफ़ ग़ालिब मस्तमौला क़िस्म के इंसान थे। शराब पीते थे, जुआ खेलते थे और तवायफ़ के कोठे पर भी नज़र आ जाते थे। मगर उस समय के लोग प्रतिभा की क़द्र करना जानते थे। यही कारण है कि ज़ौक़ साहब जहां अबू ज़फ़र के उस्ताद थे वहीं ज़फ़र के बेटे मिर्ज़ा फ़खरू के उस्ताद मिर्ज़ा ग़ालिब थे।

मिर्ज़ा ग़ालिब धारावाहिक से ये सच सामने आया कि ग़ालिब एक असाधारण इंसान और महान शायर थे। वे कभी भी न तो अपनी शायरी में और न ज़ाती ज़िंदगी में साधारण आदमी की तरह जिए। ग़ालिब की ज़िंदगी के कैनवास पर प्यार का रंग भी उभरा लेकिन इश्क़ में कभी वे दीवाना नहीं बने।

गुलज़ार के ग़ालिब का करिश्मा 
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मिर्ज़ा ग़ालिब को बड़े पर्दे पर उतारने का जो सपना गुलज़ार ने देखा था उस सपने को उन्होंने छोटे पर्दे पर साकार किया। गुलज़ार ने इतनी ख़ूबसूरती से इस काम को अंजाम दिया कि लोग कहने लगे- मिर्ज़ा ग़ालिब की दास्तान ए ज़िंदगी को उनके अलावा कोई दूसरा इतने असरदार तरीके से साकार नहीं कर सकता था। गुलज़ार ख़ुद भी एक हस्सास शायर हैं। उन्होंने ग़ालिब की ज़िंदगी की त्रासदी और ग़ालिब की शायरी की संवेदनशीलता को मिलाकर जो तस्वीर बनाई ग़ालिब की वह तस्वीर लोगों को बहुत भाई। उस तस्वीर में ज़िंदगी के जीते जागते अक्स थे। उस तस्वीर के नक़्श बोल रहे थे। उस तस्वीर में एक महान शायर की ज़िंदगी सांस ले रही थी। कुल मिलाकर मिर्ज़ा ग़ालिब धारावाहिक के रूप में गुलज़ार ने हमें एक बेमिसाल तोहफ़ा दिया। इस धारावाहिक के ज़रिए गुलज़ार ने साबित किया कि इतिहास को दोबारा ज़िंदा किया जा सकता है।

हैं और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे 
कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाज़ ए बयां और


मिर्ज़ा ग़ालिब का कालजयी संगीत जगजीत सिंह ने तैयार किया। जगजीत और चित्रा की आवाज़ में मिर्ज़ा ग़ालिब की उर्दू शायरी हिंदुस्तान के घर घर तक पहुंच गई। फ़कीर (जावेद ख़ान) के लिए जगजीत ने विनोद  सहगल की आवाज़ का शानदार उपयोग किया। इस धारावाहिक के संगीत का डबल कैसेट जारी किया गया। उसकी भी ज़बरदस्त बिक्री हुई।

अगर आप पटकथा और संवाद लेखन में दिलचस्पी रखते हैं तो आपको रूपा एंड कंपनी से प्रकाशित यह किताब ज़रूर पढ़नी चाहिए- "Mirza Ghalib : A Biographical Scenario by Gulzar." मशहूर कवि-लेखक, हम सबके प्यारे दोस्त यतीन्द्र मिश्र इन दिनों गुलज़ार साहब की आत्मकथा पर काम कर रहे हैं। मेरी दिली दुआ है कि 'लता सुरगाथा' की तरह उनकी यह किताब भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रियता हासिल करे।

आपका-
देवमणि पांडेय

Devmani Pandey : B-103, Divya Stuti,
 Kanya Pada, Gokuldham, Film City Road, 
Goregaon East, Mumbai- 400063, M : 98210-82126

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सोमवार, 18 मई 2020

गोपालसिंह नेपाली : दीपक जलता रहा रात भर


मुंबई के बॉलीवुड में गोपालसिंह नेपाली

'धर्मयुग' के सम्पादक डॉ धर्मवीर भारती इलाहाबाद की वार्षिक प्रदर्शनी में घूम रहे थे। एक पांडाल में कवि सम्मेलन था। प्रवेश के लिए टिकट था। पांडाल हाउसफुल था। अचानक पांडाल में ख़ामोशी छा गई। बेहद दिलकश तरन्नुम में एक गीत के शब्द सुनाई पड़े- "दीपक जलता रहा रात भर"। गीत में ऐसी कशिश थी कि उनके क़दम अपने आप रुक गए। डॉ भारती ने वहीं यानी पंडाल के बाहर खड़े होकर पूरा गीत सुना। बाद में डॉ धर्मवीर भारती को मालूम हुआ कि उस नौजवान गीतकार का नाम गोपाल सिंह नेपाली है। इस अदेखे, अनजाने नौजवान पर डॉ भारती ने आगे चलकर एक लेख लिखा और गीतकार नेपाली की मुक्त कंठ से तारीफ़ की। 'धर्मयुग' सन् 1956 ने उनका यह गीत प्रकाशित किया था-

तू पढ़ती है मेरी पुस्तक, मैं तेरा मुखड़ा पढ़ता हूँ
तू चलती है पन्ने-पन्ने, मैं लोचन-लोचन बढ़ता हूँ

मै खुली क़लम का जादूगर, 
तू बंद क़िताब कहानी की
मैं हँसी-ख़ुशी का सौदागर, 
तू रात हसीन जवानी की
तू श्याम नयन से देखे तो, 
मैं नील गगन में उड़ता हूँ

तू पढ़ती है मेरी पुस्तक, मैं तेरा मुखड़ा पढ़ता हूँ 

गीतों के राजकुमार गोपालसिंह नेपाली
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हिन्दी एवं नेपाली के सुप्रसिद्ध कवि गोपालसिंह नेपाली की आज 17 अप्रैल को पुण्यतिथि है।  उनका जन्म चम्पारन जिले के बेतिया नामक स्थान पर 11 अगस्त 1911 को हुआ था। उनका मूल नाम गोपाल बहादुर सिंह था| नेपाली उपनाम उन्हें महाकवि निराला ने दिया। "गीतों के राजकुमार" कहे जाने वाले गोपाल सिंह नेपाली आज़ादी के पहले और आजादी के बाद हिंदी काव्य मंच के सबसे लोकप्रिय और सबसे लाडले कवि थे। महाकवि निराला, राष्ट्रकवि दिनकर, हरिवंश राय बच्चन...सभी उनके प्रति बहुत स्नेह रखते थे। 

प्रेम, प्रकृति, देशभक्ति और मानवीय मूल्यों से परिपूर्ण गीतों से हिंदी काव्य साहित्य को समृद्ध करने वाले गोपाल सिंह नेपाली के सात काव्य संग्रह प्रकाशित हुए। उन्होंने कई पत्र-पत्रिकाओं का संपादन भी किया। सन् 1962 के चीनी आक्रमण के समय गोपाल सिंह नेपाली ने अपने देशभक्ति के गीतों से भारतीय जनमानस में नवीन चेतना का संचार किया। उनका एक गीत बेहद मशहूर हुआ- 'कल्पना करो, नवीन कल्पना करो'। इस गीत पर देश के कई कवियों ने पैरोडियां लिखी थीं।

मुंबई के बॉलीवुड में गोपाल सिंह नेपाली
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गोपाल सिंह नेपाली ने बॉलीवुड की कई फ़िल्मों में गीत लिखे। अधिकतर फ़िल्में धार्मिक थीं। इसलिए उनको उतना नाम और दाम नहीं मिला जिसके वो हक़दार थे। संगीतकार चित्रगुप्त उन्हें बहुत पसंद करते थे। नेपाली जी की प्रमुख फिल्मों के नाम हैं - ‘नाग पंचमी’, ‘नवरात्रि’, ‘नई राहें’, ‘जय भवानी’, ‘गजरे’, ‘नरसी भगत’ आदि। 'नरसी भगत' फ़िल्म में ही नेपाली जी ने "दर्शन दो घनश्याम नाथ मोरी अँखियाँ प्यासी" जैसा बेहतरीन भक्ति गीत लिखा था। फ़िल्म 'स्लमडॉग मिलेनियर' में इसे सूरदास की रचना बताकर पेश कर दिया गया था। नेपाली जी का एक और सिने गीत है-

रोटियाँ ग़रीब की प्रार्थना बनी रहीं

चूम कर जिन्हें सदा क्राँतियाँ गुज़र गईं
गोद में लिये जिन्हें आँधियाँ बिखर गईं
पूछता ग़रीब वह रोटियाँ किधर गईं
देश भी तो बँट गया वेदना बँटी नहीं

रोटियाँ ग़रीब की प्रार्थना बनी रहीं

बतौर निर्माता नेपाली जी ने तीन फ़ीचर फिल्मों का निर्माण भी किया था। - नज़राना, सनसनी और ख़ुशबू। नेपाली जी की सुपुत्री कमला जी आकाशवाणी मुंबई की विविध भारतीय सेवा में कार्यरत थीं। चर्चगेट में मेरे पड़ोस में प्रतिष्ठा भवन में उनका कार्यालय था। जब भी मिलतीं नेपाली जी को बहुत याद करतीं। मलाड में रहती थीं। सेवा निवृत्त हुईं तो उनसे संपर्क टूट गया। वे बताती थीं कि नेपाली जी फ़िल्म जगत की लम्बी बैठकें, कृत्रिम व्यवहार और अनावश्यक दिखावे से परेशान हो जाते थे। अंततः चीनी युद्ध के समय 1962 में वे मुंबई छोड़कर चले गए। मायूसी के आलम में उन्होंने यह गीत लिखा था-

बदनाम रहे बटमार मगर, घर तो रखवालों ने लूटा
मेरी चाँद सी दुल्‍हन रातों को, नौलाख सितारों ने लूटा

दो दिन के रैन-बसेरे में, हर चीज़ चुराई जाती है
दीपक तो जलता रहता है, पर रात पराई होती है
गलियों से नैन चुरा लाई, तस्‍वीर किसी के मुखड़े की
रह गये खुले भर रात नयन, दिल तो दिलदारों ने लूटा

गोपाल सिंह नेपाली ने 'बेटी' को केंद्र में रखकर एक गीत लिखा था। इसमें स्त्री के जन्म से लेकर उसकी मृत्यु तक की दास्तान थी। यह गीत इतना लंबा था कि इसे सुनाने में नेपाली जी को एक घंटा लग जाता था। फिर भी लोग सुनते थे और माता-पिता इसे सुनकर रोते थे। उस गीत की कुछ लाइनें देखिए-

बाबुल तुम बगिया के तरुवर, हम तरुवर की चिड़ियाँ रे
दाना चुगते उड़ जाएँ हम, पिया मिलन की घड़ियाँ रे
उड़ जाएँ तो लौट न आयें, ज्यों मोती की लडियां रे...बाबुल तुम बगिया के तरुवर …….

हमको सुध न जनम के पहले, अपनी कहाँ अटारी थी
आँख खुली तो नभ के नीचे, हम थे गोद तुम्हारी थी
ऐसा था वह रैन-बसेरा
जहाँ सांझ भी लगे सवेरा
बाबुल तुम गिरिराज हिमालय, हम झरनों की कड़ियाँ रे
उड़  जाएँ तो लौट न आयें, ज्यों मोती की लडियां रे...

गोपाल सिंह नेपाली का आकस्मिक निधन 
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गोपाल सिंह नेपाली काव्य मंचों के सर्वाधिक लोकप्रिय कवि थे इसलिए कविता पाठ में उनका नंबर सबसे बाद में आता था। इसलिए उन्हें रात-रात भर जागना पड़ता। काव्य रसिक उन्हें सुनने के लिए कई किलोमीटर पैदल चलकर आते और रात भर बैठे रहते। अनियमित दिनचर्या और अनियमित खानपान उनके स्वास्थ्य के लिए घातक सिद्ध हुआ। 16 अप्रैल 1963 की रात को एक कवि सम्मेलन में कविता पाठ करने के बाद सुबह वे ट्रेन में बैठ गए। रास्ते में उनकी तबीयत ख़राब हो गई। 17 अप्रैल 1963 को मात्र 52 वर्ष की उम्र में भागलपुर रेलवे स्टेशन पर नेपाली जी का आकस्मिक निधन हो गया। श्रद्धांजलि स्वरूप उन्हीं की पंक्तियां उनको समर्पित हैं-

अफ़सोस नहीं इसका हमको, जीवन में हम कुछ कर न सके,
झोलियाँ किसी की भर न सके, सन्ताप किसी का हर न सके, 
अपने प्रति सच्चा रहने का, जीवन भर हमने काम किया,
देखा-देखी हम जी न सके, देखा-देखी हम मर न सके। 

यह लघु सरिता का बहता जल : नेपाली
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अपनी प्राथमिक पाठशाला में हम सब बच्चे मिलजुल कर नेपाली जी की यह रचना गाते थे-

यह लघु सरिता का बहता जल
कितना शीतल, कितना निर्मल
हिमगिरि के हिम से निकल-निकल,
यह निर्मल दूध-सा हिम का जल,
कर-कर निनाद कल-कल छल-छल,

तन का चंचल मन का विह्वल
यह लघु सरिता का बहता जल

ऊँचे शिखरों से उतर-उतर,
गिर-गिर, गिरि की चट्टानों पर,
कंकड़-कंकड़ पैदल चलकर,
दिन भर, रजनी भर, जीवन भर,

धोता वसुधा का अन्तस्तल
यह लघु सरिता का बहता जल

हिम के पत्थर वो पिघल पिघल,
बन गए धरा का वारि विमल,
सुख पाता जिससे पथिक विकल
पी-पी कर अंजलि भर मृदुजल,

नित जलकर भी कितना शीतल
यह लघु सरिता का बहता जल
कितना कोमल, कितना वत्सल,
रे जननी का वह अन्तस्तल,
जिसका यह शीतल करुणा जल,
बहता रहता युग-युग अविरल,

गंगा, यमुना, सरयू निर्मल
यह लघु सरिता का बहता जल

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आपका-
देवमणि पांडेय

Devmani Pandey : B-103, Divya Stuti, Kanya Pada, 
Gokuldham, Film City Road,Goregaon East, 
Mumbai-400063, M : 98210-82126