गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026

समय समाज और संवेदना का दस्तावेज़ 'नवाइयत'

 

समय समाज और संवेदना का दस्तावेज़ 'नवाइयत'

​वर्तमान ग़ज़ल-परिदृश्य में शायर नवीन जोशी 'नवा' ने देश विदेश में अपनी उल्लेखनीय पहचान बनाई है। नवा का प्रथम ग़ज़ल-संग्रह 'नवाइयत' इस बात का प्रमाण है कि शिल्प और तकनीकी बंदिशों के इल्म के साथ ही उनके पास जीवन का गहरा अनुभव, संवेदना की आँच तथा समय और समाज को अभिव्यक्ति करने का नज़रिया भी है। 

कहा जाता है कि शायरी में सब कुछ कहा जा चुका है। यानी कहने के लिए कुछ नया विषय नहीं है। यह भी माना जाता है कि किसी शायर का अंदाज़ ए बयां ही उसकी रचनात्मकता को नया रंग रूप देता है। उसे एक नई पहचान अता करता है। इस सिलसिले में नवीन जोशी नवा के चंद अशआर देखे जा सकते हैं जो उनके विशिष्ट अंदाज़ ए बयां की मिसाल हैं - 


इतने पंछी पकड़े फिर भी ये न समझ पाया सय्याद

पिंजरे में जो गूँगे थे वो पेड़ पे कैसे गाते हैं


तुम्हें चंदा कहेंगे हम, अगर रातों में तुम चमको

तुम्हें सूरज भी कह देंगे, सवेरा तो करो पहले


इश्क़ की राह पर इक बार टहल कर आया

ज़िंदगी भर कभी फिर पाँव के छाले न गए


शायद ये बात उससे न कह पाऊँ मैं कभी

उसका ख़याल उससे ज़ियादा हसीन है


किसी को नींद मिली तो किसी को ख़्वाब मिला 

हर आदमी को यहाँ उसका इंतिख़ाब मिला

'नवा' की शायरी का सबसे मजबूत पक्ष है अपनी मिट्टी, अपने परिवेश और मनुष्यता से गहरी प्रगाढ़ता। वे मनुष्य के भीतर की कोमलता और संवेदनशीलता को सुरक्षित देखना चाहते हैं। उनका यह शेर इस बात की उम्दा मिसाल है-


​नमी हो जिसकी आँखों में वो बंजर हो नहीं सकता।

जिसे मिट्टी से निस्बत हो वो पत्थर हो नहीं सकता।


यह शेर मनुष्य के भीतर बचे रहने वाले करुणा भाव का उद्घोष है। जो व्यक्ति अपनी जड़ों यानी मिट्टी से जुड़ा है, जिसकी आँखों में भावनाओं की नमी है, वह कभी संवेदनहीन नहीं हो सकता। समय और समाज पर 'नवा' की गहरी पकड़ है। उनका यह शेर वैश्विक स्तर पर नफ़रत की राजनीति और अमानवीयता पर करारा प्रहार करता है-


​ज़माने भर की लाशों पर भी हो जाए खड़ी नफ़रत,

पर उसका क़द मुहब्बत के बराबर हो नहीं सकता।

​यहाँ शायर ने नफ़रत और मुहब्बत के क़द का बहुत ही अनोखा और विराट बिंब उकेरा है। चाहे हालात कितने भी विभाजनकारी क्यों न हों, नफ़रत का ढांचा कितना भी विशाल क्यों न लगे, प्रेम की ऊँचाई और उसका प्रभाव हमेशा उससे श्रेष्ठ और बड़ा रहता है। 'नवा' की ग़ज़लों की ख़ूबी यह है कि वे बड़े से बड़े दार्शनिक और गहरे सत्य को बेहद सरलता और सहजता से कह जाते हैं। उनके शेरों में निहित यही मौलिकता पाठकों के दिल को सीधा छूती है-


​किसी ख़ामोश कहानी की तरह रहता है।

दर्द हर आँख में पानी की तरह रहता है।


​दर्द का मानवीकरण और उसे हर आँख में 'पानी' की तरह स्वाभाविक रूप से मौजूद बताना इस शेर की ख़ूबी है। यह शेर हर आम आदमी के भीतर छिपी उस ख़ामोश दास्तान को बयान करता है जिसे हर व्यक्ति अपने जीवन में जीता है। जीवन की सहजता और मासूमियत को दर्शाती हुई उनकी एक अन्य बानगी देखिए-


​उसको क्या मालूम वो ख़ुशियाँ लाती है।

चिड़िया तो बस दाना चुगने आती है।


यह शेर जीवन के उन अनजाने पलों और चेहरों की ओर इशारा करता है जो हमारे जीवन में ख़ुशियों की सौग़ात ले आते हैं पर उन्हें ख़ुद इस बात का अहसास तक नहीं होता। इसमें प्रकृति और जीवन का एक बेहद ख़ूबसूरत और भोला-भाला संसार बसता है। आध्यात्मिक और आन्तरिक खोज को नवीन जोशी नवा ने बहुत ही सलीक़े से ज़मीनी फ़लक पर उतारा है। ईश्वर या परमसत्य को आसमान की ऊँचाइयों में खोजने के बजाय अपने भीतर और अपनी आसपास की दुनिया में तलाशने का संदेश उनका यह शेर देता है-


​तुझे आसमाँ भी ज़मीं पर मिलेगा।

जहाँ सर झुकाया वहीं पर मिलेगा।


यह समर्पण और आस्था का वह बिंदु है जहाँ साधक और साध्य के बीच की दूरी समाप्त हो जाती है। नवीन जोशी 'नवा' के पास किसी भी कथ्य की अभिव्यक्ति के लिए अपना ख़ास अंदाज़ ए बयां मौजूद है। संग्रह के एक शेर में शायर का आत्मविश्वास देखते ही बनता है-


​मुझसे मिलना हो तो फिर वक़्त कोई शर्त नहीं

मैं तो शाइर हूँ मेरे बा’द भी मिल सकता हूँ


​यह शेर कालजयी कला और एक रचनाकार की अमरता का घोषणा पत्र है। एक भौतिक शरीर भले ही न रहे लेकिन एक कलाकार, एक शाइर अपने शब्दों, अपने कला-कर्म और अपनी ग़ज़लों के माध्यम से सदियों तक जीवंत रहता है।

​नवीन जोशी 'नवा' का ग़ज़ल संग्रह 'नवाइयत' वर्तमान समय, आधुनिक समाज और गहरी सोच का जीवंत दस्तावेज़ है। जब शायरी ज़मीन की ख़ुशबू, इंसान की सम्वेदना और मुहब्बत की ऊष्मा से जुड़ती है तो वह कालजयी बन जाती है। 'नवाइयत' की इन ग़ज़लों में भावनाओं का सहज प्रवाह है, फ़िक्र की परवाज़ है और समकालीन जीवन के संघर्ष को अभिव्यक्त करने का सलीक़ा है। कुल मिलाकर 'नवाइयत' आधुनिक ग़ज़ल की परंपरा में एक मूल्यवान और सार्थक इज़ाफ़ा है। यह ग़ज़ल संग्रह पाठकों को सोचने और महसूस करने के लिए नए आयाम देता है।

मेरी दिली कामना है कि नवीन जोशी 'नवा' इसी तरह रचनात्मकता का सफ़र तय करते हुए प्रगति पथ पर अग्रसर रहें। मुझे यह भी उम्मीद है कि उनकी ख़ूबसूरत ग़ज़लें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी विशिष्ट पहचान बनाएंगी। 

आपका : देवमणि पांडेय 

सम्पर्क : 98210 82126 

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