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गुरुवार, 28 मई 2020

राज कपूर के गाल पर किदार शर्मा का थप्पड़



राज कपूर के गाल पर किदार शर्मा का थप्पड़
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राज कपूर ने कॉलेज की पढ़ाई छोड़ दी । पृथ्वीराज कपूर ने अपने बेटे से कहा- कम से कम ग्रेजुएशन तो कर लो। राज ने जवाब दिया- निर्माता निर्देशक बनने के लिए ग्रेजुएशन की डिग्री ज़रूरी नहीं होती। पृथ्वीराज कपूर अपने दोस्त किदार शर्मा के पास गए। उदास लहजे में बोले- राजू बिगड़ रहा है। पढ़ाई लिखाई से उसने मुंह मोड़ लिया है। किदार शर्मा ने कहा- उसे मेरे पास भेज दो। मैं उसे सुधार दूंगा। लेकिन तुम बीच में दख़ल मत देना। मैं चाहे उसे मारूं चाहे पीटूं। 

किदार शर्मा ने राज कपूर को अपना तीसरा सहायक बनाया। राज का काम था क्लैप देना। किदार शर्मा ने नोट किया कि क्लैप देने से पहले राज हमेशा जेब से कंघी निकालकर बालों पर फिराता था। उन्होंने सोचा किशोर लड़का है। उत्साही है। चलने दो। इससे मेरा क्या नुक़सान होता है। कभी-कभी क्लैप देने से पहले राज कपूर कैमरे में झांक कर अपना चेहरा देखने की कोशिश करता।

विषकन्या' की आउटडोर शूटिंग
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सन् 1940 में किदार शर्मा फ़िल्म 'विषकन्या' की आउटडोर शूटिंग कर रहे थे। पूरी यूनिट शाम ढलने की प्रतीक्षा कर रही थी। शॉट सूर्यास्त का था। अचानक उन्हें राज का ख़याल आया। किदार शर्मा ने उसे समझाया। बेटा राज! आज के दिन तुम कंघी मत करना। अगर कहीं समय निकल गया तो कल पूरी यूनिट लेकर वापस आना पड़ेगा। कल अगर मौसम ख़राब हुआ तो दो-चार दिन बर्बाद हो सकते हैं। सिर्फ़ एक शॉट का सवाल है। राज मान गया। 

थोड़ी सी प्रतीक्षा के बाद वह पल आ गया। सब कुछ तैयार था। किदार शर्मा ने इशारा किया। राज क्लैप लेकर आगे बढ़ा। लेकिन कैमरे के सामने आते ही वह किदार शर्मा की हिदायत भूल गया। राज ने हमेशा की तरह जेब से कंघी निकाली। बालों में कंघी फिराई। किदार शर्मा चुपचाप देखते रहे। एक कलाकार दाढ़ी मूंछ लगाकर राजा बना हुआ था। राज ने उसके चेहरे के सामने क्लैप लगाया और खट से दबा दिया। पता नहीं कैसे दाढ़ी के बाल क्लैप के अंदर आ गए। अगले ही पल कलाकार की दाढ़ी उखड़कर क्लैप के साथ राज के हाथों में झूल रही थी। 


राजकपूर के गाल पर 
ज़ोरदार थप्पड़
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किदार शर्मा को ग़ुस्सा आ गया। उन्होंने कहा- राज इधर आओ। वह डरता डरता किदार शर्मा के पास आया। अचानक किदार शर्मा के दाएं हाथ का एक ज़ोरदार थप्पड़ राज के बाएं गाल पर पड़ा। पूरी यूनिट सन्न रह गई। थप्पड़ इतना ज़ोरदार था कि राज के गाल पर उंगलियों के निशान पड़ गए। राज कपूर न रोया, न उसने प्रतिरोध किया। चुपचाप जाकर एक किनारे बैठ गया। किदार शर्मा को रात में नींद नहीं आई। उन्होंने सोचा- इसमें राज की क्या ग़लती है। हवा से उड़ कर भी तो दाढ़ी क्लैप में फंस सकती थी। उनके मन में यह ख़याल आया कि राज हमेशा क्लैप के समय यूं ही तो कंघी नहीं करता। उसके मन में कहीं न कहीं अभिनेता बनने की चाहत है। 

उस समय किदार शर्मा 'नील कमल' फ़िल्म के निर्माण की योजना बना रहे थे। सुबह ऑफिस पहुंचकर उन्होंने राज कपूर के नाम से एक कांट्रैक्ट बनाया। साथ में पांच हज़ार का चेक संलग्न किया। उस समय यह बहुत बड़ी रकम थी। उन दिनों स्टूडियो में नियमित हाज़िरी ज़रूरी थी। राज आया तो किदार शर्मा ने उसे पास बुलाया। राज ने अपना दायां गाल दिखाते हुए कहा- नहीं, आप इस पर भी मारेंगे। किदार शर्मा के विश्वास दिलाने पर वह नज़दीक आया। उन्होंने राज को कांट्रैक्ट लेटर और साइनिंग अमाउंट का चेक पकड़ा दिया। 



फ़िल्म नीलकमल का हीरो
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कांट्रैक्ट पढ़ते ही राज रोने लगा। रोते-रोते बोला- अंकल आप मुझे बहुत प्यार करते हैं। मुझ जैसे सिरफ़िरे आदमी को हीरो बनाने से आपकी फ़िल्म डूब जाएगी। किदार शर्मा बोले- नहीं डूबेगी। फ़िल्म बनाना मुझे अच्छी तरह आता है। इस पर वह बोला- अंकल! आप मुझे हीरोइन तो सुंदर देंगे ना! किदार शर्मा ने कहा- तेरी जो भी पसंद हो बोल दे। इस पर शरमाते हुए राज ने बताया कि अपने स्टूडियो में जो छोटी सी, सुंदर सी लड़की आती है। हमेशा हंसती रहती है। उसका इशारा मधुबाला की ओर था। तब तक रंजीत स्टूडियो की फ़िल्मों में मधुबाला को छोटी-मोटी भूमिकाएं ही दी जाती थीं। किदार शर्मा ने फ़िल्म 'नीलकमल' में उसे राज कपूर की नायिका बना दिया। 

किदार शर्मा से सन् 1993 में मेरी मुलाक़ात हुई। माहिम में हिंदुजा अस्पताल के पास वाली बिल्डिंग में उनका ऑफिस था। बातचीत के बड़े रसिक थे। इसलिए उनके कार्यालय में कई बार मेरा जाना हुआ। उन्होंने बताया- "राज खुद में एक परफेक्ट इंसान था। 'बरसात' फ़िल्म बन जाने पर वह मेरे पास आया। उसका आग्रह था कि फ़िल्म का पहला शो मैं उसके साथ देखूं।" समयानुसार किदार शर्मा लिबर्टी टॉकीज़ पहुंचे। गेट पर राज प्रतीक्षा कर रहा था। वे अंदर गए तो पूरे हाल में एक भी आदमी नहीं था। राज ने मुस्कुराते हुए कहा- यह पहला शो मेरे गुरु किदार शर्मा के लिए है। दोनों ने एक साथ फ़िल्म देखी। ज़्यादातर समय राज अपने गुरु की बगल में खड़ा रहा। किदार शर्मा ने उसे आशीर्वाद दिया। किदार शर्मा के अनुसार पूरे जीवन में उन्हें राज जैसा शिष्य और पृथ्वीराज जैसा मित्र दूसरा कोई नहीं मिला।

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आपका-
देवमणि पांडेय

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति,
कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड,
गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063 , 98210 82126
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बुधवार, 27 मई 2020

किदार शर्मा की चेतक के महाराणा प्रताप


किदार शर्मा की चेतक के महाराणा प्रताप 

फ़िल्म निर्देशक किदार शर्मा और अभिनेता पृथ्वीराज कपूर अलग-अलग रास्तों पर चलते हुए भी ताउम्र अच्छे दोस्त बने रहे । किदार शर्मा ने हमेशा नए कलाकारों के साथ फ़िल्में बनाईं। पृथ्वीराज कपूर बड़े स्टार बन गए थे। उन्होंने बड़ी फ़िल्में की। पं जवाहरलाल नेहरू के सुझाव पर किदार शर्मा को चिल्ड्रन फ़िल्म सोसायटी का डायरेक्टर इन चीफ बनाया गया। सोसाइटी के लिए किदार शर्मा ने कई बाल फ़िल्में बनाई। सन् 1956 में फ़िल्म 'जलदीप' के लिए उन्हें बेस्ट चिल्ड्रन फ़िल्म का नेशनल अवार्ड मिला।

किदार शर्मा चिल्ड्रन फ़िल्म सोसाइटी के लिए 'चेतक' फ़िल्म बना रहे थे। यह सवाल उठा कि महाराणा प्रताप कौन बनेगा। उन्होंने कहा- बस एक ही इंसान महाराणा प्रताप बनने लायक़ है पृथ्वीराज कपूर। सोसाइटी वाले मान गए। यह प्रस्ताव पाकर पृथ्वीराज कपूर बहुत ख़ुश हुए। बोले- यार किदार शर्मा, इतने दिनों बाद ऑफर दिया वह भी सेकंड लीड का। इसमें असली हीरो तो चेतक है।


जानवर डायलॉग 
नहीं समझते
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'चेतक' की मौत के बाद महाराणा प्रताप द्वारा उसे विदा करने का दृश्य फिल्माया जाना था। सारी तैयारी हो चुकी थी। पृथ्वीराज कपूर को डायलॉग बोलने का बहुत शौक़ था। उन्होंने सोचा था कि इस दृश्य में राणा प्रताप आठ दस लंबे भावुक डायलॉग बोलेगा। आते ही वे बोले- लाइए संवाद कहां हैं? याद कर लूं। किदार शर्मा ने कहा- संवाद नहीं हैं। पृथ्वीराज को बहुत आश्चर्य हुआ। बोले- ऐसा सीन संवाद के बिना कैसे हो सकता है! किदार शर्मा ने जवाब दिया- जानवर डायलॉग नहीं समझते। तुम अपना मुंह चेतक के मुंह पर रख देना और दो मिनट तक चुप रहना। सीन ऐसे ही फ़िल्माया गया और बहुत प्रभावशाली बन गया।

पृथ्वीराज कपूर बीमार पड़े। अस्पताल में भर्ती थे। किदार शर्मा उनसे मिलने गए। दोस्त को दिलासा देते हुए उन्होंने कहा- महाराणा प्रताप इतनी आसानी से नहीं मरेगा। अभी तुम्हें मेरे साथ काम करना है। पृथ्वीराज थोड़ी देर उन्हें देखते रहे। उनकी आंखें छलक उठीं। बोले- जानवर डायलॉग नहीं समझते। मेरे मुंह पर अपना मुंह रख दो। किदार शर्मा ने तुरंत अपना गाल उनके गाल पर रख दिया। दोनों रो पड़े। यह दो दोस्तों का अंतिम मिलन था। वापस आने के लिए किदार शर्मा अस्पताल की सीढ़ियां उतर रहे थे। उसी समय पीछे से शम्मी भागता हुआ आया। बोला- अंकल पिता जी गुज़र गए। 29 मई 1971 को किदार शर्मा का सबसे प्यारा दोस्त छोड़कर चला गया। उस दृश्य को याद करके वे कई बार रोए। 2 जून 1988 को उनका शिष्य राजकपूर भी चला गया। उसने भी किदार शर्मा को बहुत रुलाया।


किदार शर्मा और 
संगीतकार मदन मोहन
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किदार शर्मा 1954 में फ़िल्म 'शोख़ियां' का संगीत तैयार करवा रहे थे। संगीत की रिहर्सल के समय एक नौजवान पूरे समय दरवाज़े के पास कान लगाए खड़ा रहता था। उन्होंने सोचा- जाने दो होगा कोई। एक दिन किसी ने बताया- अरे वो तो रायबहादुर चुन्नीलाल का बेटा मदन मोहन है। किदार शर्मा ने उसे बुलाया और कहा- मदन मोहन तुमको मेरे पास आकर बैठना चाहिए था। जवाब में उसने एक शेर सुनाया। 

मैं लुटा रहा हूं सजदे अभी तेरी रहगुज़र में
तेरी आस्तां के क़ाबिल अभी मेरा सर नहीं है

मदन मोहन ने कहा- सुना है आप जिस पर ख़ुश होते हैं उसे चवन्नी देते हैं। किदार शर्मा ने कहा- ठीक सुना है। वह बोला- मैंने एक धुन बनाई है। कल आपको सुनाता हूं। अच्छी लगे तो मुझे भी चवन्नी दीजिएगा। दूसरे दिन मदन मोहन आया। उसने बहुत बढ़िया धुन में एक गीत सुनाया। 

सावन के महीने में 
इक आग सी सीने में 
लगती है तो पी लेता हूं 
दो चार घड़ी जी लेता हूं

मदन मोहन की धुन सुनकर किदार शर्मा ने जेब में हाथ डाला। सौ रूपये का एक नोट निकाला। मदन मोहन के हाथ पर रख दिया। वह बोला- आपने तो चवन्नी देने की बात कही थी। किदार शर्मा बोले- तुम्हारी यह धुन अनमोल है। जैसा कि आप जानते हैं आगे चलकर मदन मोहन बहुत बड़े संगीतकार बने।

किदार शर्मा की भीगी पलकें
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ज़िंदगी में एक मोड़ ऐसा भी आता है जब आपकी मुट्ठी से रेत की तरह वक़्त फिसलने लगता है। किदार शर्मा के साथ भी ऐसा ही हुआ। 'हमारी याद आएगी' (1961) के बाद किदार शर्मा ने 'मयख़ाना' बनाई। सिनेमा में अब साहित्य की मांग कम हो गई थी। मारधाड़ और सेक्स का प्रवेश हो चुका था। फ़िल्म 'मयख़ाना' सुपर फ्लॉप हुई। किदार शर्मा के लिए बुरा वक़्त आ गया। लेकिन उन्होंने हारना नहीं सीखा था। सन् 1971 में उन्होंने 'प्यासे नैन' बनाई। परेशानियों से जूझती यह फ़िल्म दिसंबर 1989 में सेंसर द्वारा पास की गई। कोई वितरक नहीं मिला तो उन्होंने इसे दूरदर्शन को दे दिया। इसके बाद किदार शर्मा को अनुभव हुआ कि अब जिस तरह बिना सिर पैर वाली फ़िल्में बन रही हैं ऐसी फ़िल्में वे नहीं बना सकते। माहौल भी अनुकूल नहीं है। अब लोग पहले की तरह बड़ों की क़द्र नहीं करते।

दूरदर्शन के लिए किदार शर्मा ने टेलीफ़िल्में बनाईं। फ़िल्म 'भीगी पलकें' में उन्होंने अभिनेत्री सपना सारंग को इंट्रोड्यूस किया। इसके बाद 'अंधविश्वास',  'ऐसे लोग भी होते हैं' तथा 'काग़ज़ की नाव' फ़िल्में बनाईं। सभी में उन्होंने सपना सारंग को अवसर दिया। दूरदर्शन के लिए वह एक अच्छी अभिनेत्री थी। सन् 1993 में किदार शर्मा से कई मुलाकातें हुईं। एक दिन बोले- अब मैं 83 साल का हो चुका हूं। कान और आंखें उतना साथ नहीं देतीं। फिर भी एक फ़िल्म का काम चल रहा है। 


किदार शर्मा के 
सहमे हुए सितारे
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किदार शर्मा की आख़िरी फ़िल्म थी 'सहमे हुए सितारे'। इसमें भी उन्होंने एक नई लड़की बैम्बी को नायिका के रूप में इंट्रोड्यूस किया। मुख्य भूमिका में थे मराठी अभिनेता रमेश भाटकर। यह फ़िल्म बाप बेटी के भावनात्मक रिश्तों पर आधारित है। सन् 1993 में किदार शर्मा ने इस फ़िल्म के विशेष शो में मुझे बुलाया। लघु बजट की यह फ़िल्म अच्छी थी। यह पता नहीं चल सका कि फ़िल्म रिलीज़ हुई या नहीं।

लेखक, निर्देशक, गीतकार किदार शर्मा का जन्म 12 अप्रैल 1910 को अमृतसर में हुआ। 29 अप्रैल 1999 को 89 साल की उम्र में मुंबई में उनका स्वर्गवास हुआ। सन् 2002 में उनके बेटे विक्रम शर्मा के संपादन में अंग्रेजी में उनकी आत्मकथा प्रकाशित हुई- 'दि वन एंड लोनली किदार शर्मा'। 

फ़िल्म लेखक कमलेश पांडेय के अनुसार केदार शर्मा बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। लेखक और चित्रकार तो थे ही सौंदर्य के पारखी भी थे और शायर भी। उनकी फ़िल्में उनके अद्भुत सौंदर्यबोध का प्रमाण हैं। किदार शर्मा ने अपने बेटे अशोक शर्मा को फ़िल्महमारी याद आएगीमें हीरो बना कर लॉंच किया मगर बेटा चल नहीं पाया। उनकीजोगनएक क्लासिक फ़िल्म है। उनका एक शेर याद आता है-

तेरा चेहरा है कि क़ुरान का पाकीज़ा वरक़
तेरी आँखों में है लिखी हुई गीता जैसे.

मां की तीन क़समें
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सन् 1933 में 23 साल की उम्र में किदार शर्मा फ़िल्मों में अपना भाग्य आज़माने जब कलकत्ता जा रहे थे तो उनकी मां ने उन्हें तीन क़समें दिलाई थीं-

1. कभी मांसाहारी भोजन नहीं करेंगे। 
2. कभी शराब नहीं पिएंगे। 
3. कभी ऐसी फ़िल्म नहीं बनाएंगे जिसे मां बेटी एक साथ बैठकर न देख सकें। 

किदार शर्मा ने आजीवन मां से किया हुआ वादा निभाया। किदार शर्मा ने मुझसे कहा था- एक कलाकार को अच्छा इंसान भी होना चाहिए। मैं न हिंदू हूँ और न मुसलमान। फ़िल्म ही मेरा धर्म है। इसी के साथ जिऊंगा। इसी के साथ मरूंगा। 

सौंदर्य के पारखी किदार शर्मा
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सन् 1993 में मैं पहली बार किदार शर्मा से मिलने गया। उनका ऑफिस एक सुसज्जित फ्लैट में था। उनकी मेज़ बहुत बड़ी थी। शायद 8X4 फुट की। जैसे ही मैं उनके सामने बैठा वे बोले- दो मिनट बैठो मैं आता हूं। मैंने देखा उनकी कुर्सी के पीछे एक शानदार रंगीन पोस्टर था। पोस्टर में एक षोडशी बाला थी। कमर से ऊपर निर्वस्त्र। लड़की के होंठों पर मंद मुस्कान थी। उसकी देहयष्टि बेहद कलात्मक थी। उसको देखने से मन में किसी विपरीत विचार के बजाय सौंदर्य के प्रति सराहना का भाव जगता था। 

किदार शर्मा लौट कर आए। हंसते हुए बोले- देख लिया। जी हां, मैंने जवाब दिया। वे बोले- स्त्री, सौंदर्य और कला की देवी है। हमें उसके इस रूप का सम्मान करना चाहिए। फ़िल्म 'चित्रलेखा' में मैंने एक स्नान दृश्य फ़िल्माया था। इसमें एक साथ कई स्त्रियों को नहाते हुए दिखाया गया था। यह दृश्य भी कलात्मक था। इस दृश्य की भी तारीफ़ हुई थी। फ़िल्म लेखक कमलेश पांडेय ने किदार शर्मा का एक शेर सुनाया था। वह शायद इसी बाला के सम्मान में कहा गया था-

तेरा चेहरा है कि क़ुरान का पाकीज़ा वरक़, 
तेरी आँखों में है लिखी हुई गीता जैसे.

फ़िल्म लेखक कमलेश पांडेय के अनुसार किदार शर्मा बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। लेखक और चित्रकार तो थे ही, सौंदर्य के पारखी भी थे और शायर भी। उनकी फ़िल्में उनके अद्भुत सौंदर्यबोध का प्रमाण हैं। किदार शर्मा की ‘जोगन’ एक क्लासिक फ़िल्म है। 

किस हाल में है रंजीत स्टूडियो
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किदार शर्मा बातचीत के रसिक थे। उनकी गपशप में लुत्फ़ आता था। इसलिए मैं उनके ऑफिस में कई बार मिलने गया। उन्होंने बताया कि दिलीप कुमार और नरगिस की फ़िल्म 'जोगन' उन्होंने रंजीत स्टूडियो में 29 दिन में पूरी कर डाली थी। मन में एक इच्छा जगी कि उस जगह के दर्शन किए जाएं। दादर पूर्व में टर्मिनस के सामने जो गली हिंदमाता की तरफ़ जाती है उसी गली में अधिकांश स्टूडियो थे। दादर की उस गली में पहुंचा तो पहले रूपतारा स्टूडियो का बोर्ड दिखाई पड़ा। थोड़ा आगे बढ़ने पर रंजीत स्टूडियो का वह गेट मिला जहां फ़िल्म 'गौरी' की नायिका मोनिका देसाई ने दरबानों से झगड़ा किया था। रंजीत स्टूडियो की खपरैल वाली बिल्डिंग में कई एसोसिएशन के कार्यालय थे। स्टूडियो अपने अतीत का गौरव समेटे ख़ामोश खड़ा था। श्रीसाउंड स्टूडियो के बारे में मालूम पड़ा कि उसकी जगह टावर बन गया है और उसमें आधुनिक सुविधा संपन्न रिकॉर्डिंग स्टूडियो खुल गया है। पिछले 25 सालों में उस गली में मेरा आना जाना फिर नहीं हुआ। पता नहीं अब किस हाल में हैं ये स्टूडियो। 

एक भव्य दुनिया के स्मारक
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दादर स्टेशन के सामने पुरानी इमारतें लगातार टूट रही हैं। गगनचुंबी टावर बन रहे हैं। हिंदी सिनेमा के गौरवशाली अतीत को साकार करने वाले ये केंद्र स्मृति शेष बनते जा रहे हैं। तीस साल पहले मैं मालाड में बाम्बे टॉकीज देखने गया था। इस स्टूडियो की मालकिन देविका रानी ने एक साम्राज्ञी के रूप में कभी फ़िल्म जगत पर राज किया था। सन् 1939 में गीतकार पं प्रदीप ने एक सुसज्जित विशाल हाल में ऊपर से आती हुई अर्धचंद्राकार सीढ़ियों पर देविका रानी को महारानी की तरह उतरते हुए देखा था। जब मैं वहां गया था तो बाम्बे टॉकीज के मलबे पर कई दुकानें बन गईं थी। स्टूडियो के अवशेष के रूप में टूटे फूटे सिर्फ़ दो पिलर ही दिखाई पड़े थे। तब समझ में आया कि एक जीती जागती भव्य दुनिया पहले खंडहर में, फिर मलबे में और फिर इतिहास में कैसे तब्दील हो जाती है।

किदार शर्मा ने अपना एक शेर सुनाया था जो आज भी मेरे साथ है और हमेशा रहेगा। इसी शेर के साथ उनकी दास्तान मुकम्मल होती है। 

मैंने तो हमेशा कश्ती को धारे के सहारे छोड़ा है 
वर्ना ये किनारे ऐसे हैं जब चाहें किनारा कर जाएं

आपका-
देवमणि पांडेय

Devmani Pandey : B-103, Divya Stuti, 
Kanya Pada, Gokuldham, Film City Road, 
Goregaon East, Mumbai-400063, M: 98210 82126
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सोमवार, 25 मई 2020

किदार शर्मा : कलकत्ता के न्यू थियेटर्स में

कलकत्ता में फ़िल्म डायरेक्टर किदार शर्मा

श्वेत श्याम फ़िल्मों के सुपरस्टार अभिनेता मोतीलाल ने किदार शर्मा से कहा था- शर्मा जी, आप मुझे फ़ोन मत किया करो। मेरी मां डांटती है। कहती है रोज़ किसी लड़की का फ़ोन आ जाता है। नाम पूछती हूँ तो बोलती है- किदार शर्मा। राजकपूर के गुरु किदार शर्मा की आवाज़ सचमुच औरतों जैसी थी। माहिम के हिंदुजा अस्पताल के पास उनका ऑफिस था। मार्च 1993 में 83 साल के किदार शर्मा से मेरी मुलाक़ात हुई। दुबले पतले किदार शर्मा स्वभाव से मज़ाकिया और हाज़िर जवाब थे।

देवकी बोस की फ़िल्म पूरन भगत
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लाहौर विश्व विद्यालय में एम.ए. अंग्रेज़ी की परीक्षा देने के बाद किदार शर्मा ने  फ़िल्म 'पूरन भगत' (1933) देखी। तन मन पर जादू छा गया। क्या कोई इतनी सुंदर फ़िल्म बना सकता है ! मन में विचार आया कि अगर देवकी बोस जैसी प्रतिभा के साथ काम नहीं किया तो यह जीवन व्यर्थ है। न्यू थियेटर्स की इस फ़िल्म के निर्देशक थे देवकी बोस।

उस समय भले घर के लड़के लड़कियों का फ़िल्मों में काम करना बहुत बुरा माना जाता था। पिताजी नहीं चाहते थे ब्राह्मण का बच्चा भांट का काम करे। सुनते ही उबल पड़े- "अगर ज़ुबान से दोबारा ऐसी बात निकाली तो एक झापड़ मारूंगा मुंह टेढ़ा हो जाएगा।" किदार शर्मा ने तुरंत उत्तर दिया- मुंह टेढ़ा हो जाए या सीधा, कलकत्ता ज़रूर जाऊंगा। 

बचपन से ही किदार शर्मा बहुत ज़िद्दी थे। पिताजी चाहते थे कि वे कॉलेज में प्रोफेसर बनें। मकान गिरवी रख कर उन्हें एम.ए. करने के लिए भेजा था। पिताजी भड़क गए- मैं तुम्हें पैतृक संपत्ति से बेदख़ल कर दूंगा। बेटे ने जवाब दिया- लाइए बेदख़ली के काग़ज़, मैं अभी दस्तख़त कर देता हूं। पिताजी ने हथियार डाल दिए। उन्हें समझाया- देखो किदार, न तो तुम सुंदर हो और न ही तुम्हारे पास अच्छी क़द काठी है। आवाज़ भी लड़कियों जैसी है। क्या करोगे फ़िल्मों में जाकर। किदार ने उत्तर दिया- मेरे पास दिल और दिमाग़ है।

पिताजी ने आख़िरी चाल चली। बेटे की शादी कर दी। फिर भी किदार शर्मा अपने इरादे से हिले नहीं। एक दिन पिताजी ने व्यंग्य किया- कब जा रहे हो कलकत्ते। किदार ने कहा- जिस दिन किराए की रकम पच्चीस रूपए जुटा लूंगा निकल जाऊंगा। मगर आपसे एक भी पैसा नहीं लूंगा। रात में पत्नी ने हाथ में पच्चीस रूपए रख दिए। बोली- यह पैसे मुझे मुंह दिखाई में मिले थे। क़रीब साल भर तक किदार शर्मा कलकत्ते में भटकते रहे। कई बार देवकी बोस से मिलने का प्रयास किया। लेकिन दरबानों ने स्टूडियो में घुसने नहीं दिया।

देवकी बोस की राजरानी दुर्गा खोटे
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किदार शर्मा को मालूम पड़ा कि पड़ोस में दो पंजाबी (पृथ्वीराज कपूर और केएल सहगल) रहते हैं। दोनों न्यू थियेटर में काम करते हैं। किदार शर्मा उनके यहां पहुंच गए। पृथ्वीराज सितार से कुश्ती लड़ रहे थे यानी गाने का अभ्यास कर रहे थे। सहगल अपने दोनों हाथों में दो बड़ी-बड़ी ककड़ी लेकर उसे घुमाकर कसरत कर रहे थे। पृथ्वीराज समझते थे कि अभिनेता बनने के लिए सहगल की तरह गाना आना चाहिए। सहगल समझते थे कि अभिनेता की क़द काठी पृथ्वीराज जैसी होनी चाहिए।

सहगल ने किदार शर्मा से कहा- देवकी बोस तो मुझे ऐक्टर ही नहीं मानते। सिर्फ़ गायक मानते हैं। मैं तुम्हें दुर्गा खोटे से मिला दूंगा। सहगल उन दिनों दुर्गा खोटे को गाना सिखाते थे। देवकी बोस की फ़िल्म 'राजरानी मीरा' में दुर्गा खोटे मुख्य भूमिका कर रहीं थीं। देवकी बोस उनकी अभिनय प्रतिभा पर फ़िदा थे। दुर्गा खोटे उन दिनों कलकत्ता के मोहिनी पैलेस में रहती थीं। अगले दिन उन्होंने देवकी बोस से किदार शर्मा का परिचय कराया। देवकी बोस ने पूछा- तुम क्या कर सकते हो? किदार शर्मा तपाक से बोले- फ्रॉम कुली टू ए डायरेक्टर, आई कैन डू एवरीथिंग। 

देवकी बोस बोले- तुम बहुत दुबले पतले हो। सामान उठाओगे तो दो कुली तुम्हें संभालने के लिए रखने पड़ेंगे। तीनों के लिए तनख़्वाह जुटानी पड़ेगी। फोटो खींच सकते हो ? किदार शर्मा ने हां कह दिया। दूसरे दिन कोट पैंट और टाई लगाकर किदार शर्मा फ़िल्म 'सीता' के सेट पर पहुंच गए। उनका हुलिया देखकर यूनिट के लोग जल भुन गए। एक बंगाली ने उनकी नेगेटिव ख़राब कर दी। ईस्ट इंडिया फ़िल्म कंपनी के मालिक खेमका जी थे। दूसरे दिन उन्होंने सफेद नेगेटिव लहराते हुए कहा- तुमने यही फोटो खींचे हैं। किदार शर्मा हाज़िर जवाब थे। बोले- दे आर ऐज क्लीयर ऐज माई कांशस। निगेटिव जानबूझकर ख़राब की गई है। वर्ना इसमें कुछ न कुछ ज़रूर आता। अगले दिन फोटो खींचने के बाद किदार शर्मा ने ख़ुद एक्सपोज किया। फोटो बहुत ख़ूबसूरत थे। खेमका जी ने जैसे ही किदार शर्मा की तारीफ़ शुरू की उन्होंने एक काग़ज़ उन्हें पकड़ा दिया। यह किदार शर्मा का त्यागपत्र था। उन्हें रोका गया लेकिन वे नहीं रुके क्योंकि उनकी ईमानदारी पर शक़ किया गया था। 

कुछ दिन बाद देवकी बोस ने किदार शर्मा को न्यू थियेटर में बुलाकर बैकग्राउंड पेंटर का काम दिलवा दिया। रोज़ी रोटी चलने लगी। सुबह से शाम तक हाथ, पैर और मुंह में पेंट लगाए किदार शर्मा जुटे रहते थे। एक दिन ज़ोरदार बारिश हुई। उनके पास न तो छाता था और न रेनकोट। बारिश में भीगते हुए मस्त चाल से जा रहे थे। फिर एक करिश्मा हुआ। 

फ़िल्म देवदास के लेखक किदार शर्मा
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किदार शर्मा बारिश में भीगते हुए पैदल जा रहे थे। एक शानदार कार आकर रुकी। उसमें न्यू थिएटर के मालिक बीएन सरकार थे। किदार शर्मा को अपने स्टूडियो में कई बार देख चुके थे। बोले- आओ अंदर बैठो। किदार शर्मा को मालूम नहीं था कि कार का दरवाज़ा कैसे खुलेगा। अपनी हाज़िर जवाबी का परिचय देते हुए आवाज़ लगाई- खुल जा सिम सिम। बीएन सरकार ने हंसते हुए दरवाज़ा खोला। 

लॉर्ड क्लाइव शुरू में कलर्क था। उसने कंपनी के अधिकारियों को लिखा था- "प्लीज टेक अवे दिस पेन एंड गिव मी द सोर्ड।" किदार शर्मा ने बीएन सरकार से कहा- प्लीज टेक माय ब्रश एंड गिव मी पेन, देन आई शो व्हाट कैन आई डू। आप मेरा ब्रश ले लीजिए। मुझे क़लम दे दीजिए। फिर मैं दिखा दूंगा कि मैं क्या कर सकता हूं। किदार शर्मा की बात से बीएन सरकार प्रभावित हुए।

आख़िर वह दिन जल्दी आ गया। फ़िल्म 'देवदास' (1936) के लिए एक लेखक की ज़रूरत थी। किदार शर्मा को कलम थमा दी गई। उन्होंने 'देवदास' के गीत और संवाद लिखे। इस फ़िल्म के हीरो कुंदन लाल सहगल थे। फ़िल्म सुपर हिट हो गई। साथ ही किदार शर्मा की डिमांड शुरू हो गई। इस फ़िल्म में उनके लिखे गीत "बालम आए बसो मेरे मन में" तथा "दुख के अब दिन बिसरत नाहीं" बहुत लोकप्रिय हुए। कुछ समय बाद किदार शर्मा को फ़िल्म 'विद्यापति' के गीत और संवाद लिखने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई। 


फ़िल्म विद्यापति के लेखक किदार शर्मा
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फ़िल्म 'देवदास' (1936) के गीत और संवाद किदार शर्मा ने लिखे।  फ़िल्म सुपर हिट हो गई। इसके बाद किदार शर्मा को फ़िल्म 'विद्यापति' (1937) के गीत और संवाद लिखने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई। न्यू थियेटर्स की इस फ़िल्म के निर्देशक थे देवकी बोस। पहाड़ी सान्याल, कानन देवी और पृथ्वीराज कपूर मुख्य भूमिका में थे। संगीतकार थे रायचंद बोराल। 'विद्यापति' फ़िल्म को क़ाज़ी नज़रुल इस्लाम ने मूलत: बांग्ला में लिखा था। किदार शर्मा ने उसी के आधार पर हिंदी में यह फ़िल्म लिखी। फ़िल्म 'विद्यापति' में काज़ी नज़रुल इस्लाम के एक गीत के बोल थे - 

आंगन आवत जब रसिया 
पलटि चलूं मैं हँसिया 
कचुआ धरत जब पियरा ... 

कचुआ का मतलब 'स्तन' होता है। इसे लेकर बड़ी बहस हुई। निर्देशक चाहते थे कि यह हिंदी में भी ज्यों का त्यों लाया जाए। किदार शर्मा ने कहा कि अगर ऐसा किया गया तो हिंदी दर्शक बर्दाश्त नहीं करेंगे। वे पर्दा फाड़ सकते हैं। सिनेमा हॉल में आग लगा सकते हैं। किदार शर्मा को यह गीत अपने तरीक़े से लिखने की छूट मिल गई। उन्होंने लिखा-

मोरे अंगना में आएं आली 
मैं चालूं मतवाली 
वो आंचल हमरा पकड़ें 
हम हंस हंस उनसे झगड़ें 
चोली पे नजरिया जाए 
मोरी चुनरी लिपट मोसे जाए

विद्यापति मैथिली के बहुत प्रतिष्ठित कवि थे। किदार शर्मा ने बीएन सरकार से कहा कि इस फ़िल्म में ऐसा भी कोई गीत होना चाहिए जिससे दर्शकों को विद्यापति के काव्य चातुर्य का पता चल सके। बीएन सरकार ने कहा- अगर तुम ऐसा कर सकते हो तो करो। अगले ही दिन किदार शर्मा ने ऐसा गीत लिखा जिसे सुनकर बीएन सरकार बहुत ख़ुश हुए। दर्शकों को भी वो गीत बहुत पसंद आया। गीत की शुरुआती लाइनें थीं- 

इक बांस की थी पतली सी नली 
जंगल में उगी जंगल में पली 
तक़दीर मगर कुछ अच्छी थी 
मधुसूदन के मैं हाथ लगी 
सजनी जो कटा हर अंग मेरा 
कुछ और ही निकला रंग मेरा 
मैं प्रेम को समझी थी आसां 
सुनकर तू भी होगी हैरां 
छेदों से मेरा सीना है भरा 
आ हाथ लगाके देख ज़रा 
अब तन क्या है इक तान सखी 
प्रीतम के स्वास हैं जान सखी 

किदार शर्मा जिद्दी होने के साथ-साथ स्वाभिमानी भी थे। एक दिन वे स्टूडियो में मेज़ पर पड़ी हुई शूटिंग स्क्रिप्ट को यूं ही उलट पलट कर देख रहे थे। देवकी बोस के सहायकों ने आपत्ति की- शूटिंग स्क्रिप्ट को हाथ लगाने का अधिकार केवल डायरेक्टर को होता है। आप इसे नहीं छू सकते। यह सुनकर किदार शर्मा को अपमान का बोध हुआ। वे न्यू थियेटर को अलविदा कहकर बाहर निकल आए। उन्होंने क़सम खाई- अगर इन सबको डायरेक्टर बनकर नहीं दिखाया तो मेरा नाम भी किदार शर्मा नहीं। उन्होंने लकड़ी का एक बोर्ड बनवाया। उसे दरवाज़े पर टांग दिया- फ़िल्म डायरेक्टर किदार शर्मा। देवदास की कामयाबी के बाद वे बीवी को भी कलकत्ता ले आए थे। बोर्ड देखकर लोग मज़ाक करते किदार शर्मा क्या डायरेक्ट करते हो? वे जवाब देते आजकल तो बीवी को ही डायरेक्ट कर रहा हूं।

किदार शर्मा की औलाद का करिश्मा
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एक छोटी सी कंपनी थी फ़िल्म कारपोरेशन ऑफ़ इंडिया। उसकी एक फ़िल्म को अधूरी छोड़कर उसका डायरेक्टर लंदन चला गया। कंपनी ने तीन हज़ार रूपए में इसे पूरा करने का प्रस्ताव किदार शर्मा के सामने रखा। किदार शर्मा ने फ़िल्म पूरी कर दी। कंपनी ने बीस हज़ार में दो फ़िल्में डायरेक्टर करने का प्रस्ताव उनके सामने रखा। इस तरह संयोगवश किदार शर्मा डायरेक्टर बन गए। उन्होंने पहली फ़िल्म 'औलाद' बनाई। इसकी अप्रत्याशित सफलता से चारों तरफ सनसनी फैल गई। यह एक छोटी कंपनी और बिल्कुल नए डायरेक्टर की फ़िल्म थी। मगर लीक से हटकर थी। फ़िल्म का संदेश था- पिता को अपने बच्चों से कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। 'औलाद' को लोगों ने न्यूवेब फ़िल्म के रूप में स्वीकार किया। इसकी सफलता से फ़िल्म जगत में एक कहावत चल पड़ी- 

"आदमी वी शांताराम का, औरत महबूब ख़ान की लेकिन औलाद किदार शर्मा की।

किदार शर्मा और जद्दनबाई
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मुंबई के कृष्णा टॉकीज़ में फ़िल्म 'औलाद' लगी थी। उस समय जद्दनबाई जानी-मानी फ़िल्म निर्माता थीं। उन्होंने यह फ़िल्म कई बार देखी और मैनेजर से कहा- मुझे किदार शर्मा से मिलवाओ। एक दिन अचानक किदार शर्मा उसी शो में पहुंच गए जिसमें जद्दनबाई यह फ़िल्म देख रही थी। मैनेजर उनको लेकर किदार शर्मा के सामने आया। किदार शर्मा की दुबली पतली काया देखकर जद्दनबाई आश्चर्य से बोल पड़ीं- अरे ये लौंडा किदार शर्मा है! किदार शर्मा ने जवाब दिया- मैडम प्रतिभा शरीर में नहीं दिमाग़ में होती है। बाद में दोनों में अच्छी बातें हुईं। किदार शर्मा फ़िल्म 'सुहागरात' बनाने की योजना बना रहे थे। जद्दनबाई ने उसमें नरगिस को लेने का प्रस्ताव रखा। किदार शर्मा ने मना कर दिया। उन्हें अपनी नायिका के रूप में एक अल्हड़ और गंवार लड़की की ज़रूरत थी। नरगिस हर तरह से अभिजात्य दिखती थीं। किदार शर्मा ने 'सुहागरात' में गीता बाली को लिया और नरगिस को फ़िल्म 'जोगन' में मौक़ा दिया।

मुंबई के रंजीत स्टूडियो में किदार शर्मा
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'औलाद' के बाद किदार शर्मा ने अगली फ़िल्म 'चित्रलेखा' बनाई। इस फ़िल्म की कामयाबी के साथ केदार शर्मा की गिनती फ़िल्म उद्योग के बड़े निर्देशकों में होने लगी। उन्होंने मुंबई में चंदूलाल शाह के साथ रंजीत स्टूडियो ज्वाइन कर लिया। इस कंपनी में किदार शर्मा को पहली फ़िल्म सौंपी गई 'अरमान'। इस फ़िल्म की पटकथा, संवाद और गीत उन्होंने लिखे। 

'अरमान' का नायक (मोतीलाल) अंधा था। नायिका (शमीम) के लिए किदार शर्मा ने गीत लिखा। इसकी शुरुआती लाइनें थीं- 

लाओ तो ज़रा दिल को इस दिल में बिठाऊं 
बैठो मेरी आंखों में तुम्हें दुनिया दिखाऊं 
टीले हैं कि सब्ज़े से लदे ऊंट खड़े हैं 
और जुगनू हरी झाड़ियों में हीरे जड़े हैं 
आकाश में कुछ तारे हैं वो झांक रहे हैं 
कुछ जल में विचारे हैं वो सब कांप रहे हैं 
गुल हैं कि हवाओं की महक सूंघ रहे हैं 
उन झोपड़ों में देखो दिये ऊंघ रहे हैं 

उस समय डीएन मधोक और पं इंद्रजीत शर्मा दो प्रतिष्ठित गीतकार चंदूलाल शाह के साथ थे। चंदू लाल जी ने मधोक से इस गीत के बारे में राय मांगी। उन्होंने उत्तर दिया- किदार शर्मा के इस गीत पर मेरे सारे गीत क़ुर्बान। किदार शर्मा के एक दोस्त पाकिस्तान गए थे। उनकी क़तील शिफ़ाई से मुलाक़ात हो गई। उन्होंने केदार शर्मा की तारीफ़ करते हुए कहा कि इस समय उनके टक्कर का कोई गीतकार नहीं है। उन्होंने किदार शर्मा का एक शेर सुना दिया- 

मेरे तलवों का लहू चूस के गुल बन बैठे
ख़ार जो राह में बिछाए थे बियाबानों ने 


अरमान के नायक मोतीलाल
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चंदूलाल शाह ने किदार शर्मा से कहा- तुम जाकर मोतीलाल को हीरो के रूप में साइन कर लो। मोतीलाल उस समय के सुपरस्टार थे। उन्हें साइन करना हंसी खेल नहीं था। किदार शर्मा मोतीलाल के पास गए। वे बोले- आहा! आप ही पं किदार शर्मा हैं जो कलाकारों को रिहर्सल करवाते हैं। मैं आपके साथ काम तो करूंगा मगर तीन शर्तों पर। बिना सुने ही किदार शर्मा ने कह दिया मुझे मंज़ूर है। उनकी शर्तें थी- 

1- मैं ठीक नौ बजे सेट पर हाज़िर हो जाऊंगा और ठीक छ: बजे सेट छोड़ दूंगा। चाहे शॉट अधूरा ही क्यों न हो।
 2- मैं रविवार को काम नहीं करूंगा।
 3- मैं रिहर्सल नहीं करूंगा। 

मोतीलाल अगले दिन समय पर आए। ठीक नौ बजे सब कुछ तैयार था। किदार शर्मा ने कहा- आज आपका सिर्फ़ एक शॉट है। काम जल्दी हो जाएगा तो यूनिट वाले भी एक दिन आराम कर लेंगे। आपको दुआएं देंगे। मोतीलाल आश्चर्य से उन्हें देखने लगे। किदार शर्मा बोले- शॉट कॉम्प्लिकेटेड है। मैं एक बार आपको करके दिखा देता हूं। फिर उन्होंने करके दिखा दिया। 

मोतीलाल ने शॉट दिया। किदार शर्मा ने कहा- वाह, बहुत अच्छा रहा। वे बोले नहीं, आपने जो किया था उससे उन्नीस रहा। मैं उससे इक्कीस करना चाहता हूं। उन्होंने दुबारा किया। फिर बोले- यह तो और भी बुरा हुआ। फिर से करते हैं। इस तरह फिर फिर करते रात के नौ बज गए। मोतीलाल की आंखों में आंसू आ गए- शर्मा जी कैसे होगा। शर्मा जी बोले रिहर्सल से। वे तैयार हो गए। शॉट ओके हो गया। मोतीलाल बोले- आज पहली बार मुझे गुरु मिला। मुझे अपना सहायक बना लीजिए। यहां तो चंदूलाल मानेंगे नहीं। आउटडोर में आपके साथ चलूंगा। 

इस बात पर कौन यक़ीन करेगा कि दस हज़ार का सूट पहनने वाले उस समय के टॉप स्टार मोतीलाल ने किदार शर्मा की फ़िल्म में क्लैप तक दिया था। ज़रूरत पड़ने पर एक बार सूट पहने ही गंदे पानी में उतर गए थे। आज के हीरो बीस नखरे करते हैं। अपने पैसे से सिगरेट तक नहीं पीते। उस समय मोतीलाल प्रतिदिन एक टोकरी समोसा यूनिट के लिए लाते और सबके साथ बैठ कर खाते। किदार शर्मा की आवाज़ काफ़ी पतली थी। एक दिन उन्होंने मज़ाक किया- शर्मा जी आप मेरे घर फ़ोन मत किया करो। मां डांटती है कि कोई लड़की रोज़ फ़ोन करती है और नाम पूछने पर कहती है किदार शर्मा। किदार शर्मा और मोतीलाल की दोस्ती अंत तक कायम रही। 


सन 1946 में ब्रिटिश डेलीगेट के एक सदस्य के रूप में किदार शर्मा ब्रिटेन और अमेरिका गए। फिल्मांकन के बारे में बहुत कुछ सीखा। वापस आकर 'नीलकमल' पूरी की। इसमें राजकपूर और मधुबाला को इंट्रोड्यूस किया। इसी फ़िल्म में स्नेहल भाटकर को संगीत निर्देशन का अवसर दिया। सन् 1947 में 'नीलकमल' रिलीज़ हुई और कामयाब हुई।



आपका-

देवमणि पांडेय

Devmani Pandey : B-103, Divya Stuti,
Kanya Pada, Gokuldham, Film City Road,
Goregaon East, Mumbai-400063, M: 98210 82126
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