रविवार, 13 फ़रवरी 2022

यादों की कतरन : अर्चना जौहरी का काव्य संग्रह

 

चेहरा तो दिल का हाल छुपाता नहीं कभी

कविता निजी भावनाओं की सार्वजनिक अभिव्यक्ति है। किसी रचनाकार के काव्य सृजन से जब पाठकगण अपनी भावनाओं का धागा जोड़ लेते हैं तो उस सृजन का दायरा व्यापक हो जाता है। अर्चना गुप्ता की ग़ज़लें निजी डायरी की तरह सामने आती हैं। मगर उनमें एहसास की ऐसी शिद्दत है कि उनसे गुज़रने वाला इंसान इस एहसास की नमी में तरबतर हो जाता है और ये ग़ज़लें उसके एहसास का हिस्सा बन जाती हैं।


मैं अपनी राह चलती हूं, मैं अपनी राह पे चल के 

करूंगी तय सफ़र अपना, सफ़र की आग में जल के 

ये माना है डगर मुश्किल मगर मैं क्यों भला ठहरूं 

महकते फूल भी कितने यहां कांटों में ही पल के 


अर्चना जौहरी के काव्य संग्रह का नाम है- 'यादों की कतरन'। संग्रह की कई ग़ज़लों में यादों का सैलाब नज़र आता है। इस सैलाब में किसी से बिछड़ जाने की कसक, दर्द, चुभन और आंसू शामिल हैं। यही चीज़ें अर्चना की ग़ज़लों को निजता से ऊपर उठा कर दूसरों के दुख दर्द से जोड़ देती हैं। वस्तुतः यही उनकी रचनात्मकता की उपलब्धि है।


कैसे कहूं कि याद वो आता नहीं कभी 

सच तो यही है ज़ह्न से ज्यादा नहीं कभी 

क्यूं पूछते हो हाल मुझे देखने के बाद 

चेहरा तो दिल का हाल छुपाता नहीं कभी



मुझे यकीन है कि इन ग़ज़लों का रंग और ख़ुशबू संवेदनशील पाठकों को पसंद आएगी। अर्चना की भाषा आम फ़हम है। अंदाज़ में रवानी है। अभिव्यक्ति में सहजता है। यही कारण है कि उनकी ग़ज़लें दिल से निकलती हैं और दिल तक पहुंच जाती हैं। 


मुझे हालात ने रौंदा बहुत है 

पर मैंने उनसे हां सीखा बहुत है 

उसी से सबसे ज़्यादा है शिकायत 

उसी को मैंने पर चाहा बहुत है


संग्रह में कुछ नज्में भी हैं जिनमें रिश्ते नाते, समय और समाज शामिल हैं। इस ख़ूबसूरत काव्य संग्रह के लिए मैं कवयित्री अर्चना जौहरी को बधाई देता हूं। प्रलेक प्रकाशन मुम्बई से प्रकाशित इस काव्य संग्रह का मूल्य 249/- रूपए है। मुझे पूरी उम्मीद है कि काव्य जगत में इस काव्य संग्रह का भरपूर स्वागत होगा। 



आपका-

देवमणि पांडेय 

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फ़िल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063 , 98210 82126

शनिवार, 22 जनवरी 2022

अभिनेता अरुण वर्मा का इंतक़ाल

 

एक कुंवारे अभिनेता का दुखद अंत


अभिनेता अरुण वर्मा की जाने की उम्र नहीं थी मगर 20 जनवरी 2022 की सुबह वे चले गए। उनके गृहनगर भोपाल में उन्होंने अंतिम सांस ली। यहां के रंग मंडल में बतौर रंगकर्मी उन्होंने काफ़ी योगदान किया था। बा. व. कारंत के साथ कई नाटकों में वे अभिनय का इतिहास रच चुके थे।

'मुझसे शादी करोगी' फ़िल्म में आपने अभिनेता अरुण वर्मा को जादूगर के रूप में देखा। 'हीरोपंती' में टाइगर के जीजा के रूप में उन्हें आप देख चुके हैं। फ़िल्म 'किक' में वे एक ऐसे चौकीदार की भूमिका में थे जिसे घर से दस लाख की नकदी निकलती है। हिना, प्रेम ग्रंथ, खलनायक, डकैत आदि बड़े बैनर की कई फ़िल्मों में वे एक अच्छे अभिनेता के रूप में सराहनीय भागीदारी कर चुके हैं।


कोरोना की दूसरी लहर के बाद अरुण वर्मा मुम्बई लौटे। एक मेगा सीरियल में उनकी रात्रिकालीन शूटिंग शुरू हो गई। कुछ दिन बाद भोपाल से उनका फ़ोन आया कि रात में शूटिंग और दिन में स्क्रीन टेस्ट दे दे कर उनको पर्याप्त नींद नहीं मिली और तबीयत ख़राब हो गई। फिर भी वे इस बात से ख़ुश थे कि उन्हें अपने बुज़ुर्ग पिता की सेवा करने का अवसर मिल रहा है।

बज़्मे इंशाद दिल्ली जाने से पहले 17 दिसंबर 2021 को मैंने अरुण को फ़ोन किया। मैंने उनसे मशवरा मांगा कि दिल्ली के मुशायरे में क्या मैं काली शर्ट और काले पैंट के ऊपर सफ़ेद कोट पहन सकता हूं। वे झट से बोले- हां पहनिए और कंधे पर एक काला दुपट्टा लटका लीजिए। मैंने उनकी सलाह पर अमल किया। दिल्ली से लौटकर मैंने उन्हें फ़ोन किया तो उन्होंने फ़ोन नहीं उठाया। वे पहले से ज़्यादा अस्वस्थ हो गए थे। नया साल मुबारक बोलने के लिए भी मैंने फ़ोन किया था मगर उन्होंने नहीं उठाया।


अरुण वर्मा मुझसे कविता सुनाकर मशवरा मानते थे और मैं उनसे पोशाक के बारे में। उनके मशवरे पर ही मैंने लिनेन का सफ़ेद कोट बनवाया था। लोखंडवाला मार्केट में घूमते हुए उनकी नज़र एक जींस जैकेट पर पड़ी। बोले इसे ख़रीद लीजिए। मैंने ख़रीद लिया और पूछा- इसे कब पहनूं। वे बोले- जब आप हवाई यात्रा करते हैं तो आते जाते समय जींस के पैंट पर जींस की जैकेट पहनिए। इसी तरह एक बार उनकी नज़र एक लाल ब्लेज़र पर गई। उनके सुझाव पर मैंने उसे ख़रीद लिया। उनके कहने से मैंने लाल जैकेट भी ख़रीदी। उनका कहना था कि जब आप मंच पर जाते हैं तब हर बार आपका नया लुक दिखाई पड़ना चाहिए। इस तरह लिबास के बारे में मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा। वे कहते थे- जूतों पर ख़ास निगाह रखो। आप स्टेज पर जाते हैं तो सबसे पहले लोग आप का जूता देखते हैं। मैंने हमेशा उनके मशवरे का पालन किया।

लगभग 90 फिल्में करने के बावजूद अरुण वर्मा मुंबई में अपना मकान नहीं बना पाए। वे हमेशा पैसे की तंगी में रहे। मैंने उन्हें सुझाव दिया कि वे मेरे साथ कवि सम्मेलन में कविता पाठ करें ताकि कुछ आमदनी तो हो। मेरा सुझाव मानकर अभिनेता अरुण वर्मा ने कुछ कवि सम्मेलनों में भागीदारी की। उन्हें मानदेय भी प्राप्त हुआ। एक बार मैंने उन्हें मालाड के एक गर्ल्स कॉलेज में कविता पाठ के लिए आमंत्रित किया। मानदेय की समुचित व्यवस्था थी। मगर अरुण वर्मा ने हाथ जोड़ लिए। बोले देवमणि जी, मुझे माफ़ कर दीजिए। मैं बहुत बड़ी ग़लती करने जा रहा था। मैं तो एक अभिनेता हूं। मुझे कवि सम्मेलन में कवि के रूप में कविता पाठ नहीं करना चाहिए। कविता पाठ मेरी शख्स़ियत के लिए हानिकारक है। आपसे अनुरोध है कि आगे जब कभी आप मुझे बुलाएं तो बतौर अभिनेता बुलाएं। दक्षिण मुंबई के बिरला मातुश्री सभागार में राजस्थानी महिला मंडल का कार्यक्रम था। मैंने अभिनेता अरुण वर्मा को मुख्य अतिथि के रूप में बुलाया।


अरुण वर्मा की शादी नहीं हुई। उन्होंने मान लिया था कि अब उनकी शादी नहीं होगी। अब वे 62 साल के हो चुके थे। एक दिन मेरे कुरेदने पर उन्होंने बताया कि लड़कियां मुंबई में उन्हीं लड़कों से शादियां करना चाहती है जिनके पास अपना मकान हो। मैंने कहा आपको ऐसी लड़की तलाश करनी चाहिए जिसके पास अपना मकान हो। उन्होंने कहा कि दो बार ऐसी लड़कियां मिली थीं मगर बात जमी नहीं। पहली लड़की ने उनसे कहा था कि आपको घर ख़र्च के लिए हर महीने मेरे खाते में 25 हज़ार जमा करने होंगे। दूसरी लड़की ने प्रस्ताव रखा था कि अगर वे उसके छोटे भाई की शिक्षा का सारा खर्च उठाएं तो वह शादी के लिए तैयार है। उन्होंने दोनों की शर्ते नहीं मानीं और कुंवारे रह गए।

अरुण के आग्रह पर कभी-कभी मैं चाय पीने उनके रूम पर चला जाता था। वहां वे कभी मुगले आज़म के संवाद सुनाते और कभी फ़िल्म यहूदी के। वे ठेठ भोपाली भाषा का भी नमूना पेश करते। साथ ही मारवाड़ी, सिंधी, पंजाबी आदि व्यापारियों के अंदाज़ ए बयां को भी सामने लाते। वे बेहद प्रतिभाशाली अभिनेता थे मगर उनको प्रतिभा के अनुसार काम नहीं मिला। फ़िल्म लेखक निर्देशक रूमी जाफ़री उनके ख़ास मित्रों में हैं लेकिन अपने बारे में कुछ बात करने में उन्हें बहुत संकोच होता था।

अरुण वर्मा एक अच्छे चित्रकार भी थे। ख़ासतौर से वे स्केच बहुत अच्छा बनाते थे। कोरोना के पहले लॉकडाउन में वे प्रतिदिन एक स्केच बनाते थे। अभिनय भी एक नशा है। एक बार इंसान इसमें डूब जाए तो बाहर नहीं निकल पाता। अरुण वर्मा को भी लगता था कि आने वाले कल में कुछ बहुत अच्छा होने वाला है। पिछली मुलाक़ात में उन्होंने कहा था- तीन चार फ़िल्मों में अच्छी भूमिका की बात चल रही है। इस बार पैसा मिलेगा तो मीरा रोड में एक छोटा सा फ्लैट खरीद लूंगा। मगर ऐसा नहीं हो पाया। अपने साथ अपना यह अधूरा ख़्वाब लेकर वे इस दुनिया से हमेशा के लिए विदा हो गए।

अलविदा अरुण वर्मा!

आपका-
देवमणि पांडेय
सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फ़िल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063 , 98210 82126

शायर सिने गीतकार इब्राहीम अश्क का जाना


शायर सिने गीतकार इब्राहीम अश्क का जाना 


तेरी ज़मी  से  उठेंगे   तो  आसमां होंगे

हम ऐसे लोग ज़माने में फिर कहाँ होंगे

चले  गए  तो  पुकारेगी हर सदा हम को,

न जाने कितनी ज़बानों से हम बयाँ होंगे।

इब्राहीम अश्क 


शायर सिने गीतकार इब्राहिम अश्क मुंबई की हलचल थे। वे किसी पत्रिका में कुछ ऐसा लिख देते या कुछ ऐसा बोल देते कि महीनों तक उसकी गूंज सुनाई पड़ती। कोई ऐतराज़ करता तो बहस में उसे धराशाई कर देते। रचनाकार मित्र ऐसे सरस प्रकरण को दोहराते, मज़ा लेते। अश्क से मेरी आख़िरी मुलाकात 21 दिसंबर 2021 को हुई। 


हम सब संत मुरारी बापू के सानिध्य में कविता पाठ करने मुंबई के वॉलकेश्वर इलाके़ में आए थे। अभी तक मोबाइल से अश्क की दोस्ती नहीं हो पाई थी। शायरा दीप्ति मिश्र ग्रुप में बार-बार मैसेज डालती थीं- अश्क जी, कुछ तो जवाब दीजिए। अश्क के बदले शायर शमीम अब्बास का संदेश आता- अश्क जी के बेटे से मेरी बात हो गई है। वे आ रहे हैं। अंततः अश्क जी अच्छे मूड में पधारे। सबसे दिल खोलकर मिले। काव्य संध्या में बड़ी आत्मीयता से कविता पाठ किया। श्रोताओं का भरपूर प्रतिसाद मिला। अपनी एक नज़्म में उन्होंने भाव विभोर होकर उज्जैन के पास बड़नगर क़स्बे में अपने पैतृक घर को याद किया जिसे कई साल पहले वे पीछे छोड़ आए थे। 


इब्राहिम अश्क की ग़ज़लों और नज़्मों में उनका दिल शामिल था। मगर जब वे तनक़ीदी गद्य लिखने के लिए कमर कसते तो बौद्धिकता के बीहड़ में बंदूक लेकर उतर पड़ते थे। वे फायर पर फायर करते चले जाते और किसी के धराशायी होने की परवाह नहीं करते थे। उन्होंने अपने एक लेख में शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की प्रगतिशीलता को कटघरे में खड़ा कर दिया। दूसरे लेख में शायर निदा फ़ाज़ली की जदीदियत पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया। तीसरे लेख में रेखांकित किया कि शायरा परवीन शाकिर की शायरी में सामाजिक सरोकार ही नहीं है और उसने कभी कोई बड़ा शेर नहीं कहा। 


इस तरह उन्होंने और भी कई लेख लिखे और कई लोगों को नाराज़ होने का मौक़ा दिया। एक बार उन्होंने 'शबख़ून' पत्रिका में पत्र लिखकर उसके संपादक जाने-माने समालोचक शमसुर्रहमान फ़ारूक़ी पर ज़बरदस्त प्रहार किया। गुलज़ार और जावेद अख़्तर से भी वे ख़ुश नहीं थे। शायर बशीर बद्र से ख़फ़ा होकर उन्होंने उन पर एक ऐसी ग़ज़ल कही जिसमें कई रोचक गालियों का इस्तेमाल किया गया था। 


सिने जगत में गीतकार बनने के लिए क्या संघर्ष करना पड़ता है, कैसे-कैसे पापड़ बेलने पड़ते हैं... इब्राहिम अश्क का जीवन ख़ुद में इसकी एक मिसाल है। अस्सी के दशक की शुरुआत में वे एक दिन दिल्ली प्रेस में अपनी पत्रकारिता की नौकरी छोड़कर सिने गीतकार बनने का ख़्वाब पूरा करने के लिए मुंबई पहुंच गए। 


वे दूरदराज मुंब्रा उपनगर से ट्रेन पकड़ कर दादर होते हुए बांद्रा पहुंचते थे। फिर खार, सांताक्रुज, जहू, अंधेरी आदि उनकी संघर्ष यात्रा में शामिल हो जाते। कवि चित्रकार कमल शुक्ल के बांद्रा कार्यालय में अश्क से मेरी पहली मुलाक़ात सन् 1990 में हुई थी। मुंब्रा से बांद्रा के इस सफ़र का सिलसिला तब तक चला जब तक वे मिल्लत नगर, अंधेरी में अपने मकान में नहीं आ गए। जब फ़िल्म "कहो ना प्यार है" में उनके गीतों ने कामयाबी का परचम लहराया तो अंधेरी में बसने का उनका सपना साकार हुआ। 


एक दिन उन्होंने अपने नए मकान में मुझे चाय पीने के लिए बुलाया। मैंने उनसे पूछा- ऋतिक रोशन की इस फ़िल्म में काम पाने के लिए उन्हें कितना संघर्ष करना पड़ा है। वे मुस्कुराए, बोले- मैं एक साल तक लगातार सांताक्रुज में संगीतकार राजेश रोशन के म्यूजिक रूम का चक्कर लगाता रहा। हाज़िरी देता रहा। आख़िर एक साल बाद उन्होंने "कहो ना प्यार है" फ़िल्म में गीत लिखने का मौक़ा दिया। इससे आप समझ सकते हैं कि सिने गीतकार बनने के लिए इंसान में कितना धीरज चाहिए। 


सिने जगत में एक दौर ऐसा आया जब गीतकारों, संगीतकारों की एक नई पीढ़ी सक्रिय हो गई। पुराने संगीतकार और गीतकारों में निर्माताओं की दिलचस्पी कम हो गई। वे सिने परिदृश्य से ग़ायब होने लगे।  इस चुनौती का सामना इब्राहिम अश्क ने यूं किया कि अंधेरी का अपना मकान बेचकर वे सपरिवार मीरा रोड में बस गए। रविवार 16 जनवरी 2022 की शाम को चार बजे उनका इंतक़ाल हुआ। कोविड 19 वायरस से संक्रमित होने के कारण वे स्वास्थ्य की चुनौतियों का सामना कर रहे थे। 


20 जुलाई 1951 को मध्य प्रदेश के उज्जैन ज़िले में जन्मे शायर इब्राहीम अश्क ने ‘इन्दौर समाचार’, ‘शमा’, ‘सुषमा’ और ‘सरिता’ आदि पत्र-पत्रिकाओं के लिए पत्रकारिता की। मुंबई आने पर उन्होंने ‘कहो न प्यार है’, ‘कोई मिल गया’, ‘ऐतबार’, ‘कोई मेरे दिल से पूछे’, ‘आप मुझे अच्छे लगने लगे’, ‘ये तेरा घर ये मेरा घर’ आदि कई फ़िल्मों को अपने गीतों से सजाया। कई मशहूर ग़ज़ल गायकों के अलबम में उनके गीत ग़ज़ल शामिल हैं। उनकी  ‘इलहाम, आगही’, ‘कर्बला’, ‘अलाव’, ‘अंदाज़े बयां’, ‘तनक़ीदी शऊर’ आदि 18 किताबें प्रकाशित हुईं। उनकी शायरी पर पांच लोगों ने पीएचडी हासिल की है। 


आपका :

देवमणि पांडेय : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063 , 98210 82126


सोमवार, 6 दिसंबर 2021

गीतकार हरिश्चंद्र का उपन्यास कुलक्षिणी



गीतकार हरिश्चंद्र का उपन्यास कुलक्षिणी

भक्ति गीतों के क्षेत्र में गीतकार हरिश्चंद्र दास ने बहुत नाम कमाया है। उनके लिखे हुए भक्ति गीतों ने पद्मश्री अनूप जलोटा की आवाज़ में कामयाबी का कीर्तिमान क़ायम किया। आज भी रेडियो पर हरिश्चंद्र का भक्तिगीत सुनाई पड़ता है- 

दुख से मत घबराना पंछी उड़ना तुझे अकेला है

गीतकार हरिश्चंद्र के भोजपुरी गीतों के कई अल्बम बने और कई भोजपुरी फ़िल्मों को उन्होंने अपने गीतों से लोकप्रिय बनाया। अब गीतकार हरिश्चंद्र दास ने एक नया करिश्मा दिखाया है। आरके पब्लिकेशन मुंबई से उनका एक उपन्यास प्रकाशित होकर पाठकों के हाथों में आया है। हरिश्चंद्र का यह उपन्यास सरस गद्य और रोचक कथा का अद्भुत नमूना है। 

हरिश्चंद्र का उपन्यास 'कुलक्षिणी'  एक ऐसी सुशील युवती की जीवन गाथा है जो अपने नारी सुलभ गुणों से ससुराल वालों का दिल जीत लेती है। मगर वक़्त के साथ पासा पलटता है और इस सुशील युवती को कुलक्षिणी घोषित करके गृह त्याग पर मजबूर किया जाता है। कई उतार-चढ़ाव और त्रासद घटनाओं के बाद अंततः उसी परिवार में एक सुलक्षिणी के रूप में उसकी पुन: वापसी होती है। 

बेस्टसेलर किताबों की तरह यह किताब सहज, सरल और प्रवाहमय है। एक बार आप पढ़ना शुरू करेंगे तो पढ़ते चले जाएंगे। कहीं भी कोई गति अवरोधक नहीं आता। हरिश्चंद्र जी की लेखन शैली में ऐसा जादू है कि उपन्यास की घटनाएं फ़िल्म के दृश्यों की तरह आंखों के सामने साकार हो उठती हैं। इस उपन्यास के सारे चरित्र ऐसे हैं जो हमें गांव और क़स्बों में अक्सर दिखाई पड़ते हैं। इसलिए पाठक इन चरित्रों के साथ बड़ी सहजता से अपना तादात्म्य स्थापित कर लेता है। 

कुलक्षिणी उपन्यास के रूप में हरिश्चंद्र जी ने पाठकों को नायाब तोहफ़ा दिया है। इसके लिए उन्हें बहुत-बहुत बधाई। मेरी मंगलकामना है कि इस ख़ूबसूरत उपन्यास की सुगंध घर घर में पहुंचे। मुझे उम्मीद है कि हरिश्चंद्र की रचनात्मकता का सफ़र ऐसी ही जीवंतता के साथ जारी रहेगा और वे अपनी कामयाबी का परचम लहराते रहेंगे।

इस पुस्तक का मूल्य ₹295 है। इसे प्राप्त करने के लिए यहां संपर्क करें-

आरके पब्लिकेशन : 
90225-21190, 98212-51190 
गीतकार हरिश्चंद्र : 93221-82627

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आपका-
देवमणि पांडेय 

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063 मो : 98210 82126

बुधवार, 1 दिसंबर 2021

आहटों के अर्थ : सीमा अग्रवाल का नवगीत संग्रह

 



फूलों की चौपालों में खुशबू जब नृत्य करेगी

"नई कविता के तेवर को छंद में जीने का यत्न ही नवगीत है।" यह परिभाषा सन् 1982 में प्रकाशित नवगीत दशक-1 की भूमिका में सम्पादक गीतकार उमाकांत मालवीय ने दी थी। नवगीत दशक का लोकार्पण श्रीमती इंदिरा गांधी ने अपने आवास पर किया था। निराला की सरस्वती वंदना में आए नवगति शब्द को नवगीत की पीठिका मानने वाले गीतकार यश मालवीय नवगीत को कविता की समानांतर काव्य विधा मानते हैं।


सन् 1958 में प्रकाशित समवेत गीत संकलन गीतांगिनी की भूमिका में सम्पादक राजेंद्र प्रसाद सिंह ने पहली बार नवगीत शब्द का उल्लेख किया। उन्होंने लिखा था- "नवगीत बदले स्वर के नए गीत हैं।" सन् 1960 में नवगीत चर्चा में आ चुके थे। इसलिए सन् 2020 में जब नवगीत 60 वर्ष का हुआ तो कई पत्रिकाओं ने विशेषांक निकाले और लखनऊ, बनारस आदि शहरों में उत्सव भी मनाया गया। 


पारंपरिक गीत व्यक्तिगत सुख दुख का अनुगायन था, नवगीत समकालीन संदर्भों का शिलालेख है। नवगीत ने पारम्परिक गीत विधा में नई चेतना का संचार किया। सीमित दायरे से बाहर निकलकर गीत के इस नए तेवर ने नए बिम्ब, नए प्रतीक और नए कथ्य को अपना सहयात्री बनाया। कवयित्री सीमा अग्रवाल इसी नवगीत विधा की एक सुपरिचित हस्ताक्षर हैं। उनके नवगीत संग्रह का नाम है 'आहटों के अर्थ।'


मैं तुम्हारी याद में हूं/ या हवा में उड़ रही हूं/ सोच तो लूं


नर्म घेरे हैं तुम्हारी/ बाजुओं के

या कि मैं लिपटी हुई हूं/ बादलों में 

पक्षियों के झुंड में मैं/ खो गई हूं 

गुम हुई हूं या कि खुद की/ हलचलों में 


दूर होती जा रही हूं/ या कि खुद से जुड़ रही हूं

सोच तो लूं


सीमा अग्रवाल के पास हिंदी की समृद्ध शब्द संपदा, कथ्य की विविधता और अभिव्यक्ति का कौशल है। वे जब किसी चिरपरिचित विषय पर भी लिखती हैं तो उसमें नयापन और जीवंतता घोल देती हैं। बसंत ऋतु पर उनके गीत 'घर है राह जोहता' की पंक्तियां देखिए-


झाड़ बुहारी कर शुभ को न्यौतूं/ अगरू महकाऊं 

चलूं सूर्य की अगवानी को/ वंदनवार सजाऊं 

चुप-चुप सी है खड़ी रसोई/ जरा इसे सहला दूं

तनिक नेह की आंच अगोरूं/ चूल्हे को सुलगा दूं


अपने समय पर सीमा जी की अच्छी पकड़ है। वे समय के सवाल को जब रचनात्मकता के कटघरे में प्रस्तुत करती हैं तो हमारे सामने एक जानी पहचानी दुनिया खुल जाती है- 


साथ एक के चार मुफ़्त हैं/ उपदेशों की पैंठ लगी है/ गली गली 


रंग बिरंगी कहीं झंडियां/ कहीं सजी है चमचम पन्नी 

हद से मीठी कहीं बुलाहट/ ग्राहक काट न जाए कन्नी

 

पर फैशन के महादौर में/ नहीं परखना क्या असली है/ क्या नकली 


उनकी क़लम के दायरे में घर आंगन की घरेलू दुनिया है। मौसम और उत्सव हैं, साथ ही रिश्ते नाते भी सांस लेते हैं। नानी और नतनी को साथ-साथ देखना सुखद लगता है-


अहा चल पड़ीं/ नानी नतनी/ सुंदर-सुंदर बनकर 

टिकुली लाली/ काजल माला/ मधु मुस्कान पहनकर 


कल ने कल की उंगली थामी/ कहा नहीं घबराना 

कोई भी मुश्किल हो तुम हमको/ आवाज लगाना 


हम दोनों मिल जुल कर/ डांटेंगे मुश्किल को तन कर


सीमा अग्रवाल के नवगीतों में समय के ज्वलंत सवाल, समाज और राजनीति के स्याह पक्ष और माहौल की विसंगतियां नज़र आती हैं। प्रेम और प्रकृति का चित्रण भी सीमा जी बड़ी निष्ठा और समर्पण के साथ करती हैं। ज़िन्दगी के क्षितिज पर भावनाओं के इंद्रधनुष को वे इस तरह साकार करती हैं-


तुम अबीर हो बस जाओ/ मेरी सांसों में 

मैं फागुन हो जाऊं 


फूलों की चौपालों में/ खुशबू जब नृत्य करेगी

पूरनमासी ओढ़ निशा तब /महुए सा महकेगी


मैं पलाश भर आंचल में तब/ अगर कहो तो 

मिलने तुमसे आऊं


नवगीत की प्रचलित परंपरा के अनुसार उन्होंने एक लाइन और डेढ़ लाइन के मुखड़ों का काफ़ी उपयोग किया है। संप्रेषणीयता में असर के लिए और लोक स्मृति में बस जाने के लिए दो लाइन के मुखड़े ज़्यादा असरदार होते हैं। जहां-जहां उन्होंने दो लाइन के मुखड़ों का उपयोग किया है वहां वहां यह असर दिखाई देता है- 


बर्तन बोले बर्तन से/ हम देख देख हैरान 

हमसे ज्यादा खड़क रहे हैं/ अक्लमंद इंसान


नई कविता से होड़ लेने की कोशिश में नवगीत विधा का नुकसान भी हुआ। नवगीतों की भाषा और शिल्प में जटिलता, शुष्कता और कृत्रिमता का आगमन होने से जनमानस में उनकी लोकप्रियता का ह्रास हुआ। यह ख़ुशी की बात है कि सीमा अग्रवाल ने ख़ुद को इन सीमाओं से बचाया है। अपने नवगीतों को उन्होंने संवेदना, सरसता और तरलता से सजाया है।


गीत और नवगीत एक ऐसी नाज़ुक गेय काव्य विधा है जिसमें समाज के खुरदरे और जटिल यथार्थ की भी कोमल अभिव्यक्ति होती है। सीमा जी ने अपने शब्द चयन, वाक्य विन्यास और सृजनात्मक प्रस्तुति में हर जगह इस रचनात्मक कौशल का निर्वाह किया है। वस्तुतः यह उनकी उपलब्धि है। मैं उनको इस नवगीत संग्रह के लिए बधाई देता हूं और उम्मीद करता हूं कि उनके इस रचनात्मक कौशल का सर्वत्र स्वागत किया जाएगा।


शारदेय प्रकाशन, 5/234, विपुल खंड, गोमती नगर, लखनऊ से प्रकाशित इस नवगीत संग्रह का मूल्य है 250 रूपये।

आपका-

देवमणि पांडेय 

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063 मो : 98210 82126

मंगलवार, 30 नवंबर 2021

चित्रनगरी संवाद मंच में ढब्बूजी उर्फ़ आबिद सुरती

 

चित्रनगरी संवाद मंच की अड्डेबाजी में ढब्बूजी

चित्रनगरी संवाद मंच की रविवार 28 नवम्बर 2021 की अड्डेबाजी में ख़ास मेहमान थे प्रतिष्ठित कथाकार, चित्रकार और कार्टूनिस्ट आबिद सुरती। 'धर्मयुग' के ढब्बूजी फेम आबिद सुरती की उम्रउम्र 86 साल है। हिंदी, उर्दू, गुजराती, अंग्रेजी आदि विभिन्न भाषाओं में उनकी 80 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। वे इतने चुस्त-दुरुस्त हैं कि उनकी ऊर्जा से नौजवानों को रश्क होता है।

ड्रॉपडेड फाउंडेशन के ज़रिए आबिद सुरती ने जल संरक्षण में कीर्तिमान कायम किया है। महानायक अमिताभ बच्चन ने केबीसी कार्यक्रम में उनके इस फाउंडेशन को दस लाख का डोनेशन दिया। इंद्रजाल कामिक्स के उनके सुपर हीरो बहादुर की तस्वीर अभिनेता शाहरुख ख़ान ने अपने घर में लगा रखी है।

आबिद सुरती के साथ गपशप का लुत्फ़ उठाने के लिए हमारे 15 रचनाकार कलाकार दोस्त हाज़िर हुए। आबिद जी ने बड़े रोचक तरीके से इंद्रजाल कामिक्स के अपने सुपर हीरो बहादुर की संकल्पना के बारे में बताया। यह भी बताया कि अपने इस सुपर हीरो को साकार करने के लिए कैसे उन्होंने डाकुओं के इलाक़े में जाकर उनकी कार्यशैली की जानकारी हासिल की।

लेखनी और ब्रश के दम पर बेलौस ज़िन्दगी जीने वाले आबिद सुरती अद्भुत लेखक हैं। उनकी एक चित्रकथा 'दौड़' पर राज कपूर फ़िल्म बनाना चाहते थे। इसके लिए कई बैठकें हुईं और यह सिलसिला बीस साल चला। अंततः राज कपूर के निधन के साथ यह अध्याय बंद हो गया। राज कपूर की शख़्सियत और कार्यशैली के बारे में उनके संस्मरण बहुत दिलचस्प थे।

आबिद जी का बचपन दक्षिण मुंबई के डोंगरी मोहल्ले में बीता। बचपन में वे फुटपाथ पर सोते थे। उनके कुछ सहपाठी ऐसे भी थे जो आगे चलकर बहुत बड़े माफिया और डान बने। अपने आत्मकथात्मक उपन्यास 'सूफ़ी' में उन्होंने इन घटनाओं का दिलचस्प वर्णन किया है। उनकी यह किताब हिंदी में वाणी प्रकाशन और अंग्रेजी में पेंगुइन से प्रकाशित हुई।  एक ज़माने में उनकी 'काली किताब 'भी बेहद चर्चित रही है। इस किताब का सात भाषाओं में अनुवाद हुआ।

चित्रनगरी संवाद मंच की  अड्डेबाजी में आबिद सुरती के शिरकत करने वालों के नाम हैं-

देवयानी जोशी, नवीन जोशी 'नवा', मोइन अहमद देहलवी, अतुल कुमार वी, रवींद्र यादव, भारतेंदु विमल, के पी सक्सेना, संजीव निगम, प्रदीप गुप्ता, अनिल गौड़, राजेश भट्ट, दिनेश दुबे, देवमणि पांडेय और दीनदयाल मुरारका।

चित्रनगरी संवाद मंच के अड्डे पर रचनाकारों, कलाकारों और काव्य प्रेमियों का हमेशा स्वागत है।गपशप का लुत्फ़ उठाने के लिए आप भी पधारिए। पता है-

इडलिश कैफ़े, होटल रॉयल चैलेंज के सामने, निकट ओबेरॉय माल, फ़िल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, शाम 6:00 से 8:00 बजे।

आपका-
देवमणि पांडेय : 98210-82126

खटराग : केपी सक्सेना 'दूसरे' का काव्य संग्रह



नहीं सिधाई की बहुत, इस युग में दरकार


कवि, लेखक, व्यंग्यकार के.पी. सक्सेना 'दूसरे' के नए काव्य संग्रह का नाम है खटराग। उनके इस खटराग में कई काव्य विधाएं शामिल हैं। अपनी बात में उन्होंने लिखा है- "काव्य लेखन मेरे लिए न तो शब्दों की जादूगरी है और न ही वैचारिक जुगाली। यह आंसुओं का अनुवाद है जो अमूमन व्यंग्यात्मक शैली में दोहा, मुक्तक, क्षणिका या अतुकांत कविता के रूप में काग़ज़ पर अवतरित होने के लिए आतुर हो उठता है। कविता वक़्त के साथ अपना रंग बदलती है। जब हम ख़ुश होते हैं तो कविता झूमने लगती है और जब हम उदास होते हैं तो सर टिकाने के लिए एक कांधे की तरह हाज़िर हो जाती है।"


अपनी अनुभूतियों के रूपांतरण के लिए कवि केपी सक्सेना ने बोलचाल की भाषा का इस्तेमाल किया है। इसलिए उनकी अभिव्यक्ति सहजता से पाठकों तक पहुंच जाती है। किसी भी विधा में बात कहते समय वे यथार्थ का दामन कभी नहीं छोड़ते। उनके दोहे 'गागर में सागर' युक्ति को चरितार्थ करते हैं। उनका कहना है-


लघुकथा से बात बन जाए अगर,

क्यों पुलिंदों में मगज़मारी करें l 

सार जीवन का छुपा दो लाइनों में 

हम तो दोहों की तरफ़दारी करें II


केपी सक्सेना की दोहावली में अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों शामिल हैं। उनकी अभिव्यक्ति के प्लेटफार्म पर त्रेता, द्वापर, नीति, अनीति, प्रेम, प्रकृति, चुनाव, राजनीति, धर्म, संस्कृति आदि विविध विषय दिखाई देते हैं। मिसाल के लिए उनके चंद दोहे देखिए- 


युग कोई भी हो रहा, दगा न पूजा जाय। 

नाम विभीषण आज भी, कुल में रखा न जाय II


वह भी मां स्तुत्य है, जो दे सुत को श्राप। 

कैकेई कारण बनी, रावण मरा ना आप II 


छल से जब एकलव्य का, लिया अंगूठा दान। तब ही से जग में घटा, गुरुओं का सम्मान II


नहीं सिधाई की बहुत, इस युग में दरकार।

सभी काटते छांट कर, पहले सीधी डार II


जो धमकी से ना सधे, वो साधे मुस्कान। 

झरना देखो प्रेम से, रेत रहा चट्टान II


सदा काम आवे नहीं, कोरा पुस्तक ज्ञान। 

जीवन से जो सीख ले, होय सफल इंसान II


'काना' कहकर क्यों करें, काने का अपमान।

'समदर्शी' कह देखिए, करे निछावर जान II


रचनात्मकता को धार देने के लिए व्यंग्य का लहजा असरदार साबित होता है। अपने युग के यथार्थ की अभिव्यक्ति के लिए केपी सक्सेना इस लहजे का भी बढ़िया इस्तेमाल करते हैं-


ना कालिख, ना गालियां, ना जूतम-पैज़ार। 

आख़िर दिनभर मीडिया, कैसे करे प्रचार II 


उनकी महिमा आज तक, सका न कोई भेद।

बालों को काला करें, धन को करें सफ़ेद II


केपी सक्सेना के खटराग में 63 मुक्तक भी शामिल हैं। इन मुक्तकों में भी उन्होंने अपने समय और समाज के सच को बयान करने में कोई कोताही नहीं की है। सीधी साधी भाषा में और सहज सरल लहजे में वे जो कुछ भी कहना चाहते हैं वह आसानी से पाठकों तक पहुंच जाता है-


बंदिशें कुछ तो ढील दे मौला, 

ख़्वाहिशों को ज़मीन दे मौला। 

देख दिन की नमाज़ भी पढ़ ली, 

अब तो शामें हसीन दे मौला II


10 मार्च 1947 में सतना, मध्य प्रदेश में जन्मे केपी सक्सेना कृषि विज्ञान तथा हिंदी में स्नातकोत्तर हैं। उन्होंने क़ानून की उपाधि भी प्राप्त की है। 35 सालों तक भारतीय खाद्य निगम में सेवा के पश्चात उन्होंने सन् 2004 में ऐच्छिक सेवानिवृत्त ले ली और स्वतंत्र लेखन करने लगे। केपी सक्सेना एक दृष्टि संपन्न रचनाकार हैं। अपने आसपास की घटनाओं, माहौल और जीवन पर उनकी हमेशा नज़र रहती है। इसलिए वे अपनी रचनाओं में समय के सच को बयान करते हैं। अभिव्यक्ति की यही ईमानदारी उन्हें एक उम्दा क़लमकार के रूप में स्थापित करती है। हमारी मंगल कामना है कि उनकी यह लेखनी इसी तरह हमेशा सक्रिय रहे। वे साहित्य के गुलशन में विविध रंगी फूल खिलाते रहें और जीवन की बग़िया को महकाते रहें। 


बीएफसी पब्लिकेशन, गोमती नगर, लखनऊ से प्रकाशित इस पुस्तक का मूल्य है 200 रुपए। आप मोबाइल नंबर 95840 25175 और 95944 80055 पर कवि के.पी. सक्सेना 'दूसरे' से संपर्क कर सकते हैं।



आपका-

देवमणि पांडेय 


सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063 मो : 98210 82126


मैं उर्दू बोलूं : अजय सहाब का शेरी मज्मूआ

 



अंधे परख रहे यहां मेयारे रोशनी 

शायर अजय सहाब का पहला शेरी मज्मूआ 'उम्मीद' सन् 2015 में शाया हुआ था और ख़ूब मक़बूल रहा। हाल ही में उनका दूसरा शेरी मज्मूआ 'मैं उर्दू बोलूं' मंज़रे आम पर आया है। इसके ज़रिए भी उन्होंने अपनी रचनात्मकता के फ़न और हुनर का जलवा दिखाया है। क्लासिकल ग़ज़ल की जो विरासत हमें मीर ओ ग़ालिब से हासिल हुई है उसे बड़ी ख़ूबसूरती से अजय सहाब ने आगे बढ़ाया है-


वो तअल्लुक़ तेरा मेरा, था कोई बुत मोम का

फ़ुरक़तों की आग में, अपना वो रिश्ता जल गया 


हम गए थे उनसे करने अपनी हालत का गिला 

उनके चश्मे पुरशरर से सारा शिकवा जल गया


साहिर उनके प्रिय शायर हैं। साहिर की तरह सहाब के पास भी अपने तजुर्बात के इज़हार के लिए धारदार तेवर है। एहसास की गहराई है। बोलती हुई मीठी ज़बान है। इसलिए सहाब की ग़ज़लें और नज़्में सीधे दिल के दरवाजे पर दस्तक देती हैं और हमारी भावनाओं के साथ एक अंतरंग रिश्ते में ढल जाती हैं।


मग़रिब से आ गई यहां तहज़ीबे बरहना 

मशरिक तेरी रिवायती पाकीज़गी की ख़ैर


अंधे परख रहे यहां मेयारे रोशनी 

दीदावरे हुनर तेरी, दीदावरी की ख़ैर


सहाब के पास शायरी का जो सरमाया है वह रिवायती भी है और जदीद भी है। उनकी सोच का कैनवास बहुत वसीह है। इसमें मुहब्बत की धड़कन है। सोच की लहरें हैं। फ़िक्र के उफ़क़ पर ज़िन्दगी की सतरंगी धनक है-


तेज तूफ़ान में उड़ते हुए पत्ते जैसा 

ज़िन्दगी तेरा मुक़द्दर भी है तिनके जैसा


तुमको फ़ुर्सत ही नहीं उसको पहनके देखो

अपना रिश्ता है जो उतरे हुए गहने जैसा


सहाब दौरे हाज़िर के मसाइल और सवालात को अल्फ़ाज़ में ढालने का हुनर जानते हैं। यही वजह है कि उनकी शायरी को हर तरह के पाठक और सामयीन पसंद करते हैं। सहाब के पास साफ़ नज़रिया है। लफ़्ज़ों को बरतने का सलीक़ा है। बिना किसी अवरोध के उनके सोच की कश्ती जज़्बात की झील में तैरती हुई नज़र आती है-


या तो सच कहने पर सुक़रात को मारे न कोई

या तू संसार से सच्चाई को वापस ले ले 


और कितनों के सफ़ीने यहां डूबेंगे ख़ुदा 

इस समंदर से तू गहराई को वापस ले ले


सहाब एक ऐसे मोतबर शायर हैं जिनकी शायरी अदबी रिसालों में शाया होती है। संगीत की स्वर लहरियों में गूंजती है। मुशायरों के मंच पर अवाम से गुफ़्तगू करती है। सहाब को उर्दू से बेइंतहा मुहब्बत है। उनकी उर्दू इतनी नफ़ीस है कि उससे बड़े-बड़े शायरों को रश्क हो सकता है। 


लिखा है आज कोई शेर मैंने उर्दू में 

ये मेरा लफ़्ज़ भी इतरा के चल रहा होगा


"अल्फ़ाज़ और आवाज़" स्टेज कार्यक्रम के ज़रिए भी अजय सहाब देश विदेश में उर्दू ज़बान और उर्दू अदब का परचम लहराते हैं। यूट्यूब पर उनके इस कार्यक्रम के करोड़ों दर्शक हैं। 


जैसे पुराना हार था रिश्ता तेरा मेरा 

अच्छा किया जो रख दिया तूने उतार के 


दिल में हज़ार दर्द हों, आंसू छुपा के रख 

कोई तो कारोबार हो, बिन इश्तेहार के


फ़िक्र की आंच, एहसास की शिद्दत और सोच की गहराई के ज़रिए सहाब ने अपने शायराना सफ़र को एक खूबसूरत मुक़ाम तक पहुंचाया है। हमारी दुआ है कि उनकी तख़लीक़ का यह सफ़र मुसलसल इसी तरह कामयाबी की नई मंज़िलें तय करता रहे। रायपुर छ.ग. में अजय साहब एक सरकारी महकमे में उच्च अधिकारी हैं। हमें उनकी इस ख़्वाहिश का एहतराम करना चाहिए-


मेरे ओहदे से, न क़द से, न बदन से जाने

मुझको दुनिया मेरे मेयार ए सुख़न से जाने


प्रकाशक : विजया बुक्स, 1/10753 सुभाष पार्क, नवीन शाहदरा, दिल्ली 110032

क़ीमत 295/- रूपये 


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आपका-

देवमणि पांडेय 


सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063 मो : 98210 82126


बुधवार, 3 नवंबर 2021

सफ़र इक ख्वाब का : अभिलाष का काव्य संग्रह

तेरा ख़याल ही काफी है उम्र भर के लिए

'इतनी शक्ति हमें देना दाता' इस लोकप्रिय प्रार्थना गीत के गीतकार अभिलाष का काव्य संग्रह 'सफ़र इक ख्वाब का' प्रकाशित हुआ है। इसमें अभिलाष की ग़ज़लें और नज़्में शामिल हैं। निर्माता-निर्देशक अभिनेता धीरज कुमार के अनुसार यह एक ऐसे कवि का सफ़रनामा है जो पिछले 42 सालों से मुंबई की माया नगरी में क़लम के सहारे अपने वजूद की हक़ीक़त तलाश कर रहा था। अभिलाष की रचनाओं में वही ताज़गी, सादगी और फ़िलासफ़ी है जो उनके निजी जीवन में भी झलकती रही।

गीतकार अभिलाष का जन्म 13 मार्च 1946 को दिल्ली में हुआ। दिल्ली में उनके पिता का व्यवसाय था। वे चाहते थे कि अभिलाष व्यवसाय में उनका हाथ बटाएं। लेकिन ऐसा संभव नहीं हुआ। छात्र जीवन में बारह साल की उम्र में अभिलाष ने कविताएं लिखनी शुरू कर दी थीं। मैट्रिक की पढ़ाई के बाद वे मंच पर भी सक्रिय हो गए। उनका वास्तविक नाम ओम प्रकाश कटारिया है। उन्होंने अपना तख़ल्लुस 'अज़ीज़' रख लिया। ओमप्रकाश' अज़ीज़' के नाम से उनकी ग़ज़लें, नज़्में और कहानियां कई पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं। 'अज़ीज़' देहलवी नाम से अभिलाष ने मुशायरों में शिरकत की। मन ही मन साहिर लुधियानवी को अपना उस्ताद मान लिया।

दिल्ली के एक मुशायरे में साहिर लुधियानवी पधारे। नौजवान शायर 'अज़ीज़' देहलवी ने उनसे मिलकर उनका आशीर्वाद लिया। साहिर साहब को कुछ नज़्में सुनाईं। साहिर ने कहा- मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मैं तुम्हारे मुंह से अपनी नज़्में सुन रहा हूं। तुम अपना रास्ता अलग करो। ऐसी ग़ज़लें और नज़्में लिखो जिसमें तुम्हारा अपना रंग दिखाई पड़े। 

इस किताब की नज़्में पढ़ते हुए साहिर का अंदाज़ ए बयां याद आना स्वाभाविक है। अभिलाष जी की नज़्म 'क़ैद' की कुछ लाइनें देखिए- 


सिलसिले कितने बने और बन के टूट गए 

मैं तेरी याद की ज़िंदां से रिहा हो न सका 

उम्र भर ग़म में जला फिर भी तक़ाज़ा मुझसे 

तेरी इक पल की मुहब्बत का अदा हो न सका


साहिर का मशवरा मानकर ओमप्रकाश अज़ीज़ जब गीतकार अभिलाष बन गए तो उनकी नज़्मों में उनका अपना रंग नज़र आया। 'सफ़र इक ख़्वाब का' नज़्म की चंद लाइनें देखिए-


शानो-शौक़त जिसे महलों की न रास आई कभी 

ज़िन्दगी अपनी बसर जिसने की नादारों में 

पा लिया जिसने ख़ुद अपने को मैं वो गौतम हूं

क़ैद जो हो न सका, ऐश की दीवारों में 


मैं ही गांधी हूं, अहिंसा का निगहबान हूं मैं

मुझको पाओगे सदाक़त के तरफ़दारों में



अभिलाष की ग़ज़लों में दिल की जो दुनिया है उसमें मुहब्बत के सभी मौसम शामिल हैं। चंद अशआर देखिए-


सुकून ए दिल के लिए, राहत ए जिगर के लिए

तेरा ख़याल ही काफ़ी है उम्र भर के लिए 


न सही गाता हुआ, गुनगुनाता मिल जाता

कहीं तो शख़्स कोई मुस्कुराता मिल जाता 


किस क़दर दुश्वार है ये ज़िन्दगी का रास्ता

आंसुओं से हो रहा है, तय ख़ुशी का रास्ता


जिस गली में भूल आया हूं मैं अपनी ज़िन्दगी 

पूछता हूं हर किसी से उस गली का रास्ता 


पलकों पर आंसुओं का जनाज़ा लिए हुए 

दिल घुट रहा है बारे तमन्ना लिए हुए 


नज़दीक जाके देखा तो महसूस ये हुआ 

हर आदमी है चेहरे पर चेहरा लिए हुए 


ख़याल आता है मुझको कि मैं भी ज़िंदा हूं

तेरे ख़याल की गलियों से जब गुज़रता हूं 


इस काव्य संग्रह में अभिलाष जी के दस क़त्आत भी शामिल हैं। उनका एक क़त्आ देखिए- 


गंगा जमुना का नीर हो जाता 

सारी दुनिया की पीर हो जाता 

अर्थ समझा न अपने होने का 

वरना, मैं भी कबीर हो जाता


अपनी रचनाओं में गीतकार अभिलाष ने अपने अनुभव, सुख-दुख, सोच और सरोकार को इस तरह अभिव्यक्त किया है कि वह पढ़ने वालों को बड़ी जल्दी सम्वेदना की डोर में बांध लेता है। उन्होंने जिस ज़मीन पर अपना सफ़र तय किया है और जिस आसमान को अपना हमसफ़र बनाया है उसी का अक्स अपनी रचनाओं में दिखाया है। उन्होंने संघर्ष का एक लंबा रास्ता तय किया है। इस रास्ते में फूल कम है कांटे ज़्यादा हैं। अभिलाषा ने पलकों पर आंसुओं का जनाज़ा लिए हुए अपना सफ़र तय किया है। उनकी ग़ज़लों और नज़्मों में जो नमी है, जो तरलता है वह पाठकों के अंतर्मन को भिगो देती है। उम्मीद है कि अभिलाष का यह संकलन पाठकों को पसंद आएगा।

 


फ़िल्मसिटी रोड गोरेगांव पूर्व के इडलिश कैफ़े में 19 मार्च 2020 को चित्र नगरी संवाद मंच की अड्डेबाजी में सिने गीतकार अभिलाष की मौजूदगी ने हमेशा के लिए इस बैठक को यादगार बना दिया।


27 सितंबर 2020 को अभिलाष जी का स्वर्गवास हो गया। अपने गीतों के जरिए वे हमेशा हम सब की स्मृतियों में ज़िंदा रहेंगे। 


गीतकार अभिलाष का यह काव्य संग्रह  'सफ़र इक ख्वाब का' समाज विकास मंच, गोकुल धाम, गोरेगांव पूर्व के महामंत्री दिवेश यादव के सौजन्य से प्राप्त हुआ। इस सुंदर उपहार के लिए दिवेश जी का शुक्रिया।

 

आपका-

देवमणि पांडेय 


सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063 मो : 98210 82126


प्रकाशक : विजय जाधव, सृजन प्रकाशन गोमती, एफ-2, 2:4, सेक्टर 8ब, सीबीडी बेलापुर, नई मुंबई 400614

फ़ोन : 97 69 66 83 69


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