शनिवार, 9 अक्टूबर 2010

सजा है इक नया सपना : देवमणि पांडेय की ग़ज़ल


देवमणि पांडेय की ग़ज़ल  

सजा है इक नया सपना हमारे मन की आँखों में
कि जैसे भोर की किरनें किसी आँगन की आँखों में

शरारत है, अदा है और भोलेपन की ख़ुशबू है
कभी संजीदगी मत ढूँढिए बचपन की आँखों में

कहीं झूला, कहीं कजली, कहीं रिमझिम फुहारें हैं
खिले हैं रंग कितने देखिए सावन की आँखों में

जो इसके सामने आए सँवर जाता है वो इंसां
छुपा है कौन-सा जादू भला दरपन की आँखों में

सुलगती है कहीं कैसे कोई भीगी हुई लकड़ी
दिखाई देगा ये मंज़र किसी बिरहन की आँखों में

फ़क़ीरी है, अमीरी है, मुहब्बत है, इबादत है
नज़र आई है इक दुनिया मुझे जोगन की आँखों में

देवमणि पाण्डेय 1988 (छायाकार स्व.बादल) 


आपका
देवमणिपांडेय
सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति,
कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड,
गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210-82126

रविवार, 26 सितंबर 2010

उदासी में न डूबे दिल किसी का : देवमणि पांडेय की ग़ज़ल


  देवमणि पांडेय की ग़ज़ल  

उदासी में न डूबे दिल किसी का 
छुपा है अश्क में चेहरा ख़ुशी का
   
तुम्हारा साथ जब छूटा तो जाना 
यहाँ होता नहीं कोई किसी का

न जाने कब छुड़ा ले हाथ अपना 
भरोसा क्या करें इस ज़िंदगी का
  
अभी तक ये भरम टूटा नहीं है 
समंदर साथ देगा तिश्नगी का

भला किस आस पर ज़िंदा रहेगा 
अगर हर ख़्वाब टूटे आदमी का

लबों से मुस्कराहट छिन गई है 
ये है अंजाम अपनी सादगी का
बाएं से - धनपत जैन, डॉ राजेंद्र सिंह, अभय नारायण त्रिपाठी (IFS), पत्रकार नंदकिशोर नौटियाल, राजनेता कृपाशंकर सिंह, पत्रकार विश्वनाथ सचदेव, नवभारत टाइम्स के सम्पादक शचींद्र त्रिपाठी, पूर्व निर्वाचन आयुक्त नंदलाल जी, संस्थाध्यक्ष चित्रसेन सिंह, सूचना आयुक्त रामानंद त्रिपाठी, समारोह संचालक कवि देवमणि पाण्डेय।
नवभारत टाइम्स के सम्पादक शचींद्र त्रिपाठी का सम्मान

शचींद्र त्रिपाठी का परिचय कराते हुए कवि-गीतकार देवमणि पाण्डेय ने कहा कि श्री त्रिपाठी एक विनम्र, मृदुभाषी और प्यारे आदमी होने के साथ-साथ एक श्रेष्ठ पत्रकार और सुयोग्य सम्पादक हैं। पत्रकारिता शचींद्र त्रिपाठी को विरासत में मिली है। उनके पिता योगेंद्रपति त्रिपाठी ने सिर्फ़ 31 साल की उम्र में ‘स्वतंत्र भारत’ लखनऊ के प्रधान सम्पादक की ज़िम्मेदारी सँभाल कर एक रिकार्ड कायम किया था। सन् 1971 में उनके स्वर्गवास के बाद प्रबंधकों के अनुरोध पर ‘स्वतंत्र भारत’ लखनऊ से ही शचींद्र त्रिपाठी ने पत्रकारिता की गौरवशाली शु्रुआत की। शचींद्र त्रिपाठी ने पत्रकारिता में अपने पिता से प्राप्त संस्कारों की रक्षा की। गोरखपुर में 01 जनवरी 1952 को जन्मे शचींद्र त्रिपाठी आज भी अपनी मिट्टी-पानी-हवा से जुड़े हुए हैं।

आपका
देवमणिपांडेय
सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति,
कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड,
गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210-82126


शनिवार, 4 सितंबर 2010

मजरुह : मैं अकेला ही चला था जानिब ए मंज़िल मगर


संस्कृति संगम के विमोचन समारोह में बाएं से- चित्रकार आबिद सुरती, सेक्सोलॉजिस्ट डॉ.प्रकाश कोठारी, कवि-राजनेता डॉ.राममनोहर त्रिपाठी, शायर मजरूह सुलतानपुरी (माइक पर), उद्योगपति महावीर सराफ, केंद्रीय साहित्य अकादमी के क्षेत्रीय सचिव प्रकाश भातम्ब्रेकर, कथाकार विभारानी और कवि देवमणि पाण्डेय (मुम्बई 1997) 
मजरुह सुलतानपुरी से देवमणि पांडेय की बातचीत

सबको मारा जिगर के शेरों ने, और जिगर को शराब ने मारा। इस हक़ीक़त को जीने वाले जिगर मुरादाबादी ज़िंदगी के अंतिम दिनों में जब गम्भीर रूप से बीमार पड़े तो मुम्बई में थे और एक साधारण से होटल में ठहरे हुए थे। एक पत्रकार ने उनका इंटरव्यू किया। उसने एक सवाल किया-‘जिगर साहब, आपने अपनी शायरी के अलावा इस दुनिया को क्या दिया है’ ? जिगर साहब ने फ़ौरन जवाब दिया- ‘मैंने इस दुनिया को मजरूह सुलतानपुरी दिया है’। दूसरे दिन एक उर्दू अख़बार में यह चर्चित इंटरव्यू प्रकाशित हुआ। मजरूह साहब अपने उस्ताद के पास गए। उन्हें एक अच्छे अस्पताल में दाख़िल कराया। ज़रा स्वस्थ हुए तो उन्हें ले जाकर कुछ दिनों अपने घर पर रखकर तीमारदारी की। पूरी तरह स्वस्थ होकर जिगर साहब अपने उस्ताद असगर गोंडवी के शहर गोंडा चले गए। वहाँ फिर से बीमार पड़े और हमेशा के लिए उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। आज जिगर साहब की कोई बात किसी को याद हो या न याद हो मगर मुम्बई के पुराने शायरों को उनका यह जुमला आज भी याद है- ‘मैंने इस दुनिया को मजरूह सुलतानपुरी दिया है’। 

मजरूह सुलतानपुरी उर्फ़ असरार हुसैन ख़ान का जन्म सन् 1919 में उत्तर प्रदेश के सुलतानपुर ज़िले की एक रियासत कुड़वार के पास गँजेड़ी गाँव में हुआ। 25 मई 2000 को उनका इंतकाल हो गया। सन् 1994 में मजरूह साहब को जब दादा साहब फाल्के अवार्ड मिला तो मैंने हिंदी दैनिक ‘जनसत्ता’ (मुम्बई) की नगर पत्रिका 'सबरंग' के लिए उनका इंटरव्यू किया था। अब वही धरोहर मैं आपके लिए पेश कर रहा हूँ। मुझे उम्मीद है कि मजरूह साहब की साफ़गोई आपको ज़रूर पसंद आएगी। 

आपको ‘फाल्के’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। पुरस्कारों के बारे में आपकी क्या राय है ? 

पुरस्कार तो अक्सर अपनों को ही दिए जाते हैं। फ़िल्मफ़ेयर से लेकर नोबल तक यही होता है। मैं तो चुपचाप लिखने वाला आदमी हूं। इसलिए जब मुझे सूचना मिली कि ‘फाल्के’ पुरस्कार मिलेगा तो एकबारगी विश्वास हीनहीं हुआ। अब तो पुरस्कार ख़रीदे जाते हैं। मैंने एक गीत लिखा था- ‘हम बेख़ुदी में तुमको पुकारे चले गए / साग़र को ज़िंदगी में उतारे चले गए।’ 

इसको ‘फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार’ नहीं मिला। शैलेन्द्र के गीत ‘ये मेरा दीवानापन था’ को मिल गया। काफ़ी लोगों ने मुझसे कहा था कि मजरुह साहब, आपका गीत ज़्य़ादा अच्छा था। युवा जब कॉलेज से निकलता है तो उसे नहीं मालूम होती। इस स्थिति को दर्शाने वाला गीत मैंने लिखा- ‘पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा’। भारी लोकप्रियता के बावजूद इसे पुरस्कार नहीं मिला और गुलज़ार के जाने किस गीत को मिल गया। गुलज़ार के गीत ‘यारा सिली सिली’ को भी पुरस्कार मिला। जबकि मेंहदी हसन ने मुझे बताया था कि यह गीत रेशमा का है। पुरस्कारों का सच यही है। 

एक गीतकार के रुप में आज आप खुद को कहाँ पाते हैं ? 

मैं हमेशा दो नावों पर सवार रहा- साहित्य और सिनेमा। जगह दोनों में मिली, लेकिन खुल के किसी के सिर पर नहीं बैठ सका। यानी न इधर के रहे न उधर के। सर्मपण के बावजूद मैं हमेशा नंबर दो पर रहा। राजेन्द्र कृष्ण के ज़माने में भी और आनंद बख़्शी के दौर में भी। आज समीर नंबर वन है तो भी मैं नंबर दो पर मौजूद हूँ। मैं हमेशा विभाजित रहा। लेकिन शायरी को मैंने पहले स्थान पर रखा, क्योंकि फ़िल्म गीत रोटी देता है मगर शायरी सुकून देती है। 

शायरी में प्रतिष्ठा के बावजूद किन कारणों से आपको फ़िल्म जगत में आना पड़ा ? 

फ़िल्म के लिए मेरे मन में कभी क्रेज़ नहीं रहा। आना नहीं चाहता था, संयोगवश आ गया। सन् 1940 में जब मैंने सुलतानपुर के पलटन बाज़ार में एक हकीम के रुप में दवाख़ाना खोला था तो उसी समय अचानक शेर कहना शुरुकिया। उस वक़्त अवध में मुशायरे बहुत होते थे। लोगों ने सर-आँखों पर उठा लिया, तो हकीमी छोड़कर मैं शायरीमें डूब गया। सन् 1945 में जिगर मुरादाबादी मुम्बई के एक मुशायरे में मुझे लेकर आए। मुशायरा बहुत बड़ा था।फ़िल्म जगत के तमाम लोग वहाँ उपस्थित थे। मैं नया था, लेकिन जम गया। बस फ़ौरन कारदार साहब का बुलावा आ गया। 

इस तरह मैं फ़िल्म लाइन में आ गया, पहले कोई इरादा नहीं था। उस वक्त एक डिप्टी कलेक्टर को ढाई सौ रुपये वेतन मिलता था। मैं मुशायरों से तीन-साढ़े तीन सौ कमा लेता था। इसलिए पहले तो मैंने इंकार कर दिया। जिगर साहब ने तब मुझे समझाया कि अभी तुमने न घर बनाया न शादी की। बीमार पड़ गये तो क्या करोगे ? आफ़र स्वीकार कर लो। पसंद न आए तो बाद में छोड़ देना। तब मैं तैयार हो गया। पाँच सौ रुपये मेरा वेतन निश्चित हुआ और कारदार साहब की फ़िल्म ‘शाहजहाँ’ के गीत मैंने लिखे। गीत तो सभी पसंद किए गए, लेकिन एक गीत को सहगल साहब ने लीजेंड बना दिया। गीत था – ‘जब दिल ही टूट गया, हम जीकर क्या करेंगे ?’ यह फ़िल्म 1947 मेंआई। इसके बाद विभाजन के कारण छह-सात महीने तक फ़िल्म उद्योग बंद ही रहा। 1949 में मैंने महबूब खान की फ़िल्म ‘अंदाज़’ के गीत लिखे। वे भी कामयाब हुए। 

सुना है उस दौरान आपको जेल भी हो गई थी ? 

हाँ, सही बात है। मुम्बई के परेल इलाक़े में मज़दूरों की एक सभा थी। मुझे वहां गीत पढ़ने के लिए बुलाया गया। मुझसे कहा गया कि मैं इतना सरल गीत पढूं कि अनपढ़ मज़दूरों की समझ में भी वह आ जाए। मैंने बहुत सरल भाषा में गीत लिखा, लेकिन बात वही थी, जो मैं कहना चाहता था। गीत के बोल थे – 

अमन का झंडा इस धरती पर 
किसने कहा लहराने न पाए 
ये भी है कोई हिटलर का चेला 
मार ले साथी जाने न पाए 

उस वक़्त कामनवेल्थ का काफी ज़ोर था। मैंने उसकी भी ख़बर गीत में ली थी। कुछ लोगों ने गलत ढंग से उसमें नेहरु का नाम जोड़कर प्रचारित कर दिया कि मैंने नेहरु को मारने की बात की है। अदालत में मेरी पेशी हुई। डिटेंशन ऐक्ट लगाया गया। मुझसे कहा गया कि आपने नेहरु को मारने के लिए भीड़ को उकसाया। माफ़ी मांगिए। मैं ठहरा स्वाभिमानी आदमी। माफ़ी मांगने का मतलब था अपनी ज़हनी सोच को नकारना। मैंने इंकार किया तो डेढ़ साल की कै़द सुनाई गई। आर्थर रोड जेल में बंद कर दिया गया। उसी दौरान ‘अंदाज’ फ़िल्म रिलीज़ हो गई। गाने लोकप्रिय हुए तो काम भी मिला। कमाल अमरोही ने फ़िल्म ‘दायरा’ और गुरुदत्त ने ‘बाज़’, ‘जाल’ आदि फ़िल्मों के गीत लिखवाए। 

फ़िल्म जगत के पुराने गीतकारों और आज के गीतकारों के बारे में आपकी क्या राय है ? 

मैं जब यहाँ आया तो फ़िल्म जगत में ख़ुमार बाराबंकवी, शकील बदायूंनी, साहिर लुधियानवी, कैफ़ी आज़मी, अली सरदार जाफ़री, राजेन्द्र कृष्ण जैसे गीतकार मौजूद थे। हम सब जो गीत लिखते थे, उसकी भाषा अच्छी होती थी। वह व्याकरण की दृष्टि से भी शुध्द होता था और उसके भावों में एक ख़ूबसूरती होती थी। एक ख़ास बात यह थी कि हम सब मिल बैठकर आमने-सामने एक दूसरे के गीतों को क्रिटिसाइज़ करते थे। मैंने फ़िल्म ‘दिल्ली का ठग’ में एक गीत लिखा था - ‘सी ए टी कैट, कैट माने बिल्ली, दिल है तेरे पंजे में तो क्या हुआ’। 

तब हमारे गीतकार मित्रों ने इसकी ख़ूब आलोचना की। मैंने उनसे कहा कि यह गीत किशोर कुमार जैसे उछल-कूद वाले अभिनेता के लिए लिखा गया है और सिचुएशन के अनुसार इसका कन्टेन्ट भी ठीक है तो मित्रगण सहमत हुए। क्योंकि शेक्सपियर भी अपने ‘क्लाउन’ के लिए कुछ अलग तरह के ही संवाद लिखते हैं, लेकिन वहां भी भाषा की एक मर्यादा होती है। अब कंसेप्शन बदल गया है। आज गीत में शायरी ऐब मानी जाती है। 

अब तो अर्थहीन शब्द चलते हैं। गीत का सोर्स तो ‘फ़ोक’ होता है लेकिन अब वह नहीं रहा। गीत में बहुत बड़ी बात कही जा सकती है, लेकिन अब पहले जैसी सादगी और गहराई नहीं रही। अब तो गीतों में बहुत वल्गराइजेशन आ गया है। ग़लत भाषा में लिखना और ‘गिमिक’ प्रस्तुत करना फैशन बन गया है। बहुत दुखी हूं मैं इससे। कभी-कभी तो रोने को जी चाहता है। 

पहले के अच्छे गीतकारों की प्रतिभा का आज उचित उपयोग नहीं हो रहा है। इस स्थिति को आप किस रुप में देखते हैं? 

अच्छी प्रतिभा के उपयोग की आज गुंजाइश ही कहाँ रही ? क्योंकि लेखन में एक गिरावट आ गई है। और मैं भी तो इसी में शामिल हूँ। जी बहुत चाहता है कि हमारे अनुभवी लेखक भाषा का सम्मान करें, लेकिन सिर्फ़ मेरे सोचने से क्या होता है। हर बदमाशी के लिए आदमी कोई दर्शन गढ़ लेता है। ‘कमोडिटी’ बन गया है आज सब कुछ। और मेरा भी हाल यह है कि –तूले ग़मे-हयात से घबरा रहा हूं मैं / घबरा रहा हूं और चला जा रहा हूं मैं। 

आपके गीत अपने नएपन, ताज़गी और अंदाज़ में अलग ही नज़र आते हैं। इसके लिए आपने किन बातों पर ध्यान दिया ? 

मैं चरित्रों के व्यक्तित्व, व्यवहार और बोलचाल को ध्यान में रखकर ही गीत लिखता हूँ। एक तरफ़ मैंने लिखा-‘गम दिए मुस्तकिल’, तो दूसरी तरफ़ लिखा-‘कभी आर कभी पार लागा तीरे नज़र’। तीसरी तरफ़ ‘छोड़ दो आंचल ज़माना क्या कहेगा’ जैसे गीत लिखकर मैंने रोमांटिक कामेडी गीतों के लिए एक नई राह बनाई। फ़िल्म क्षेत्र में सक्रियता के बावजूद मैंने मुशायरों में जाना बंद नहीं किया। सन् 1983 में मैं एक मुशायरे में अमेरिका गया। जगह-जगह लोग मुझे सुनना चाहते थे। साढ़े चार महीना मुझे रुकना पड़ गया। लौटकर आया तो देखा मेरी जगह कोई और बैठ गया था। फ़िल्म ‘क़यामत से क़यामत तक’ के ज़रिए मेरी वापसी हुई। 

आज की फ़िल्में आपको कैसी लगती है ? 

अब नान-प्रोफेशनल प्रोड्यूसरों की बाढ़ आ गई है। पहले लोग सामाजिक ज़िम्मेदारी महसूस करते थे और ऐसी फ़िल्में बनाते थे, जो सपरिवार देखी जा सकें। सन् 1994-95 से प्रोड्यूसरों की जो भीड़ आई है उसे समाज की कोई चिंता नहीं है। पहले तवायफ़ के परिवार से नायिकाएं आती थीं, मगर इनका पहनावा शरीफ़ घरों की औरतों की तरह होता था। आज की अभिनेत्रियां अच्छे घरों से आती हैं मगर इनका पहनावा तवायफ़ों से भी गया-बीता है। अमरीकी बनना चाहते हैं। लेकिन न अमरीकी बन पाते है और न भारतीय। तीतर-बटेर बनकर रह जाते हैं। इन्हें लड़के-लड़कियों के बिगड़ने की चिंता नहीं है। समाज के मूल्यों का ध्यान नहीं है। अब अधकचरा लेखन चल रहा है। गीत के नाम पर अर्थहीन शब्द चलते हैं। 

क्या अच्छे गीतों का जमाना कभी फिर लौटेगा ? 

नौशाद आदि के ज़माने में गीतों का जो स्तर था, वह अब वापस नहीं आने वाला। बच्चों में भी अब वैसी साहित्यिक और सांस्कृतिक समझ नहीं है। प्राइमरी में ही उन्हें दस-दस विषय पढ़ने पड़ते हैं। फलस्वरुप वे ‘जैक ऑफ आल’ और मास्टर ऑफ नन’ बनते हैं। उनका मानसिक स्तर काफ़ी नीचे होता है। आज गीतों में शायरी ऐब मानी जाती है। कई बार मुझे फ़िल्म में लेकर भी छोड़ दिया गया। उनको लगा कि मेरे गीतों में शायरी ज़्यादा है। पब्लिक की भी पसंद सस्ती होती जा रही है। उन्हें लगता है,यही अच्छे गीत हैं। मुझसे लिखवाने वाले अब बहुत थोड़े रह गये हैं। गीत और कविता का फ़र्क़ हर ज़माने में रहा है। गीत, कविता का ज़्यादा बोझ नहीं उठा पाता। ‘कितनी अकेली कितनी तनहा मैं लगी तुझसे मिलने के बाद’ या ‘वादियां मेरा दामन रास्ते मेरी बांहे’ अथवा ‘रहे न रहें हम, महका करेंगे’ जैसे काव्यात्मक गहराई वाले गीत अब नई पीढ़ी के पल्ले नहीं पड़ते। ऊँचे स्तर से वे घबरा जाते हैं। 

अपने बाद की पीढ़ी के गीतकारों के बारे में आपकी क्या राय है ? 

अब तो नया ज़माना आ गया है इसलिए शैली भी बदल गई है। आज के गीतकार के लिए ज़रुरी हो गया है कि वह कैबरे, कामेडी, भजन, ग़ज़ल, प्रेमगीत सब कुछ लिख सके। सभी पर उसकी कमांड होनी चाहिए। मेरे बाद की पीढ़ी में आनंद बख़्शी, फ़ारुक़ क़ैसर, एस.एच.बिहारी आदि ने अच्छे गीत लिखे। अनजान भी कभी-कभी अच्छा लिखते हैं। जावेद अख्त़र और हसन कमाल में बहुत अच्छी प्रतिभा है। निदा फ़ाज़ली क़तार में हैं। लेकिन मुझे लगता है उन्होंने अभी तक कुछ भी उल्लेखनीय नहीं लिखा है। 

साहित्य का इक़बाल सम्मान मिलने पर आपने कैसा महसूस किया था ? 

अच्छा लगा था। तीन साल से इसके लिए मेरा नाम लिया जाता था और हटा दिया जाता था। मेरे पहले यह जस्टिस आनन्द नारायण मुल्ला को मिला। वे अच्छे शायर हैं, सीनियर हैं। लेकिन शायरी ही देखी जाए तो मुझे उनसे पहले मिल जाना चाहिए था। मैंने प्रगतिशील ग़ज़लें लिखकर एक नई राह निकाली। 

लोग प्रगतिशील ग़ज़लों के लिए फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ को पहला श्रेय देते हैं ? 

बात बिल्कुल साफ़ है, मैं 1945 में प्रलेस (P.W.A.) से ज़ुडा। 1947 में मेरे कई प्रगतिशील शेर लोगों की ज़बान पर चढ़ चुके थे। फ़ैज़ का प्रगतिशील ग़ज़लों का संग्रह ‘दस्त-ए-सबा’ 1953 में आया। लोग इससे पहले उनकी प्रगतिशील ग़ज़लों से वाक़िफ़ नहीं थे। प्रगतिशील होते हुए भी फ़ैज़ हमेशा रोमांटिक बने रहे। बग़ैर माशूक़ के वे बात ही नहीं करते। असमानता, शोषण और जु़ल्म की बात भी वे माशूक़ के गले में बाहें डालकर ही करते हैं। उनकी ‘मुझसे पहले सी मुहब्बत मेरी महबूब न मांग’ तथा ‘चन्द रोज़ और मेरी जान’ आदि रचनाएं उस संदर्भ में देखी जा सकती हैं। मेरी ग़ज़लों का चरित्र हमेशा आंदोलनात्मक रहा। 

अभी आपने अपनी प्रगतिशील ग़ज़लों का ज़िक्र किया। इसके बारे में ज़रा और खुलासा करें ? 

कविता की तमाम आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए अपने समय की सबसे ज़्यादा चुभने वाली चीज़ों को साथ लेकर जो बातें कही जाती हैं, वही प्रगतिशील हैं। पहले तो ‘महबूब’ ही ग़ज़ल की मंज़िल थी, लेकिन बाद में इसमें बदलाव आया। उदाहरण के लिए मैं अपनी कुछ प्रगतिशील रचनाओं के मुखड़े सुना रहा हूं- 

मैं अकेला ही चला था जानिबे-मंज़िल मगर
लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया

सर पर हवाएं जु़ल्म चलें सौ जतन के साथ 
अपनी कुलाह कज है उसी बांकपन के साथ

देख ज़िंदां से परे रंग-ए-चमन जोशे बहार
रक़्स करना है तो फिर पांव की ज़ंजीर न देख
 
हम भी हमेशा क़त्ल हुए हैं और तुमने भी देखा दूर से लेकिन, 
ये न समझना हमको हुआ है जान का नुक़्सां तुमसे ज़ियादा

ये बातें मैंने बहुत पहले कही थीं, लेकिन इनकी प्रासंगिकता हमेशा रहेगी। इसलिए ये चीजें शाश्वत हैं। फ़ैज़ की प्रगतिशील ग़ज़लों का संग्रह ‘दस्त-ए-सबा’ सन् 1953 में देखा गया, जबकि मैंने ये ग़ज़लें 1945 में लिखीं थीं। इसीलिए मैं कहता हूं कि प्रगतिशील ग़ज़लों की शुरुआत मैंने की। फ़ैज़ और मजाज़ मुझसे सीनियर थे और बड़ी ख़ूबसूरत ग़ज़लें लिखते थे। उनके सामने मुझे अपनी ग़ज़लें काफी खुरदुरी लगती थी। मैंने फ़ैज़ और मजाज़ से बहुत कुछ सीखा। फ़ैज़ ग़ज़लों में हमेशा मीठा ही बोलते रहे। मैं समझता हूं कि यह भी एक प्रकार का ऐब है। कभी-कभी कड़वा बोलना भी बहुत ज़रुरी होता है, लेकिन फ़ैज़ का हाल तो यह था कि- 

ग़मे-जहां हो, रुख़े-यार हो कि दस्ते-अदू 
सुलूक जिससे किया हमने आशिक़ाना किया 

शांति के ज़माने में दुश्मनों को माफ़ करना तो ठीक है लेकिन जंग के मैदान में दुश्मन से आशिक़ाना व्यवहार कैसे हो सकता है ? इसके बावजूद फ़ैज़ से हमने सीखा है, वे हमारे बड़े शायर हैं। 

जिस शायर (इक़बाल) के नाम से आपको सम्मान दिया गया, उनकी शायरी आपको कैसी लगती है ? 

इक़बाल उर्दू शायरी की सर्वोच्च शैली के कवि हैं। वे बीसवीं सदी के सबसे बड़े शायर हैं। कुछ लोग उनके साथ फ़ैज़ का नाम रख देते हैं। मुक़ाबला वैसा ही है जैसे बड़े गु़लाम अली खां और मोहम्मद रफ़ी। मोहम्मद रफ़ी की नक़ल करने वाले बहुत मिलेंगे क्योंकि ऐसा करना आसान है। फ़ैज़ की शायरी इक़बाल से बहुत सस्ती है। इक़बाल के साथ जोश मलीहाबादी का ही नाम लिया जा सकता है। 

लेकिन आप यह भी स्वीकार करते हैं कि आपने ख़ुद फ़ैज़ से बहुत कुछ सीखा है ? 

हां, सही बात है। बाद में आने वाला शायर अपने सीनियर से सीखता है। मैंने फ़ैज़ से रसीला अंदाज़ सीखा। मैं चाहता था कि मेरे बयान में तनतना, जोश और ज़लज़ला के साथ ही रस हो, मिठास हो। मैंने ऐसा लिखा भी।‘साथी’ को ‘महबूब’ माना। एक शेर देखिए – 

मुझे सहल हो गईं मंज़िलें वो हवा के रुख़ भी बदल गए 
तेरा हाथ, हाथ में आया गया कि चराग़ राह में जल गए 

मैंने मजाज़ से भी बहुत कुछ सीखा। मजाज़ ने उर्दू नज्म़ में सबसे पहले नई राह बनाई। फ़ैज़ भी उनके पीछे चले। मजाज़ की ‘ख़्वाब-ए-शहर’ तथा ‘रात और रेल’ जैसी नज़्में पहले नहीं लिखी गईं थीं। मजाज़ की ग़ज़लों में भी ऐसे प्रगतिशील शेर थे कि मुझे आगे बढ़ने की राह मिली। फ़ैज़ का लहजा धीमा था। पर यह धीमा लहजा गंभीर भी था। 

फ़िराक़ गोरखपुरी का लबो-लहजा आपको कैसा लगता है ? 

फिराक़ का लबो-लहजा बिलकुल नया है। उन्होंने संस्कृत, अंग्रेज़ी और फ़ारसी से फा़यदा उठाकर बात कही। पहले ग़ज़ल का बैक ग्राउंड ‘तसव्वुर’ था। उन्होंने हिन्दू दर्शन के अनुसार सेक्स को इबादत का रुप देकर ग़ज़ल के पसमंज़र को तसव्वुर से आज़ाद करके यथार्थवादी आधार दिया। मतलब उन्होंने परंपरा की पृष्ठभूमि को बदला। लेकिन सेक्स के ज़रिए इबादत को लाना सबके वश का नहीं है। यह बहुत बड़े शायर का काम है। इससे ग़ज़ल ज़मीन पर आकर खड़ी हो गई। मगर इक़बाल तो खु़द में एक पहाड़ हैं। उनके सामने फ़िराक़ नहीं खड़े किए जा सकते। हाँ,फ़िराक़ ने उर्दू ग़ज़ल को एक नया लबो-लहजा दिया। इससे ग़ज़ल का काफ़ी फ़ायदा हुआ। 

बंबई (मुम्बई) में आपको सबसे अच्छा शायर कौन लगता है ? 

अगर गीतकार के रुप में देखें तो पहले स्थान पर जावेद अख़्तर, दूसरे स्थान पर हसन कमाल और तीसरे स्थान पर निदा फ़ाज़ली को रखा जा सकता है। लेकिन शायर के रुप में मुझे निदा फ़ाज़ली सबसे बेहतर लगता है। पता नहीं क्यों वह मेरी मुख़ालिफ़त भी करता है। निदा ने परंपरा से हटकर कुछ कहने की कोशिश की और अच्छा कहा। उसकी शायरी की ज़बान बहुत अच्छी है। उसे मामूली आदमी भी समझ लेता है। इनकी कमी यह है कि ये तीनों लोग अंग्रेज़ी और फ्रेंच साहित्य से प्रभावित हैं। इनकी बुनियाद बाहर से जुड़ी है। 

उर्दू में गीत को और हिन्दी में ग़ज़ल को उचित सम्मान क्यों नहीं मिला ? 

हिंदी की जड़ें ज़मीन में हैं। उर्दू इस मामले में पीछे है। ग़ज़ल महफ़िल से जुड़ी रही है। गीत में धरती की बात आएगी तो हिन्दी मे अच्छा लगेगा। हिन्दी जितनी नेशनल है, उर्दू उतनी नहीं। उर्दू का मिज़ाज उतना भारतीय नहीं है, जितना होना चाहिए। इधर कई भाषाओं में ग़ज़लें कही जा रही हैं। लेकिन मुझे गुजराती ग़ज़लें उर्दू के अधिक क़रीब लगती हैं। ग़ज़ल और नज़्म की शैली अलग है। ग़ज़ल की शैली ही हिन्दी वालों की पकड़ में नहीं आई। ग़ज़ल हर लफ़्ज़ का बोझ नहीं उठा सकती।

आपका
देवमणिपांडेय
सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति,
कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड,
गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210-82126

शनिवार, 31 जुलाई 2010

कचौड़ी गली सून कइले बलमू : बनारसी कजरी


मिर्ज़ापुर कइलन गुलज़ार हो

सावन में तीज का त्योहार मनाया जाता है। राजस्थान में इसे हरियाली तीज और उत्तर प्रदेश में कजरी तीज या माधुरी तीज कहा जाता है। हरापन समृद्धि का प्रतीक है। स्त्रियाँ हरे परिधान और हरी चूड़ियाँ पहनती हैं। हरे पत्तों और लताओं से झूलों को सजाया जाता है। झूले और कजरी के बिना सावन की कल्पना नहीं की जा सकती। हमारे यहाँ हर त्योहार के पीछे कोई न कोई सामाजिक या वैज्ञानिक कारण होता है। कुछ लोगों का कहना है कि बरसात में ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है। झूला झूलने से हमें अधिक ऑक्सीजन मिलती है। 

कजरी लोकगीत गायन की एक शैली है। कहा जाता है कि इसका जन्म मिर्ज़ापुर में हुआ। और बनारस ने इसे लोकप्रिय बनाया। कजरी में प्रेम के दोनों पक्ष यानी संयोग और वियोग दिखाई देते हैं। कजरी में लोक जीवन की कथा और देश प्रेम की यादगार दास्तान भी होती है। सावन आते ही पेड़ों पर झूले पढ़ जाते थे मगर वह पेड़ नहीं रहे जिन पर टंगे विशाल झूलों में एक साथ दस दस औरतें झूलती  थीं।

कजरी में प्रेम के दोनों पक्ष यानी संयोग और वियोग दिखाई देते हैं। कभी-कभी इसके पीछे कोई लोक कथा या यादगार दास्तान होती है। आज़ादी के आंदोलन का दौर था। शहर में कर्फ़्यू लगा हुआ था। एक नौजवान अपनी प्रियतमा से मिलने जा रहा था। एक अँग्रेज़ सिपाही ने गोली चला दी। मारा गया। मगर वह आज भी कजरी में ज़िंदा है - 'यहीं ठइयाँ मोतिया हेराय गइले रामा ...'

मॉरीशस और सूरीनाम से लेकर जावा-सुमात्रा तक जो लोग आज हिंदी का परचम लहरा रहे हैं, कभी उनके पूर्वज एग्रीमेंट (गिरमिट) पर यानी गिरमिटिया मज़दूर के रूप में वहाँ गए थे। इन लोगों को ले जाने के लिए मिर्ज़ापुर सेंटर बनाया गया था। वहाँ से हवाई जहाज़ के ज़रिए इन्हें रंगून पहुँचाया जाता था। जहाँ पानी के जहाज़ से ये विदेश भेज दिए जाते थे। बनारस की कचौड़ी गली में रहने वाली धनिया का पति जब इस अभियान पर रवाना हुआ तो कजरी बनी। उसकी व्यथा-कथा को सहेजने वाली कजरी आपने ज़रूर सुनी होगी- 
मिर्ज़ापुर कइले गुलज़ार हो ...

कचौड़ी गली सून कइले बलमू...
यही मिर्ज़ापुरवा से उड़ल जहजिया
पिया चलि गइले रंगून हो... 

कचौड़ी गली सून कइले बलमू...
मिर्ज़ापुर कइलन गुलज़ार हो ...

एक बार शास्त्रीय गायिका डॉ.सोमा घोष जब मुम्बई के एक कार्यक्रम में यह कजरी गा रही थीं तो उनके साथ संगत कर रहे थे भारतरत्न स्व.उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ। उन्होंने शहनाई पर ऐसा करुण सुर उभारा जैसे कलेजा चीरकर रख दिया हो। भाव भी कुछ वैसे ही कलेजा चाक कर देने वाले थे। प्रिय के वियोग में धनिया पेड़ की शाख़ से भी पतली हो गई है। शरीर ऐसे छीज रहा है जैसे कटोरी में रखी हुई नमक की डली गल जाती है -

डरियो से पातर भइल तोर धनिया
तिरिया गलेल जस नून हो...
कचौड़ी गली सून कइले बलमू... 

डॉ.सोमा घोष को स्व.उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ अपनी पुत्री मानते थे। सोमा जी हर साल उस्तादजी की याद में कार्यक्रम करती हैं। सोमाजी के 'यादें' नामक अलबम में यह लाइव कजरी शामिल है। बचपन मेंअपने गाँव में कजरी उत्सव में मैंने जो झूला देखा था उसकी स्मृतियाँ अभी भी ताज़ा हैं। आँखें बंद करता हूँ तो आज भी झूले पर कजरी गाती हुई स्त्रियाँ दिखाईं पड़ती हैं- अब के सावन मां साँवरिया तोहे नइहरे बोलाइब ना..' गाँव की उन्हीं मधुर स्मृतियों के आधार पर लिखे गए तीन गीत आपके लिए प्रस्तुत कर रहा हूं।

(1) महीना सावन का

सजनी आंख मिचौली खेले बांध दुपट्टा झीना
महीना सावन का
बिन सजना क्या जीना महीना सावन का ......

मौसम ने ली है अंगड़ाई
चुनरी उड़ि उड़ि जाए
बैरी बदरा गरजे बरसे
बिजुरी होश उड़ाए

घर-आंगन, गलियां चौबारा आए चैन कहीं ना
महीना सावन का ......

खेतों में फ़सलें लहराईं
बाग़ में पड़ गये झूले
लम्बी पेंग भरी गोरी ने
तन खाए हिचकोले

पुरवा संग मन डोले जैसे लहरों बीच सफ़ीना
महीना सावन का ......

बारिश ने जब मुखड़ा चूमा
महक उठी पुरवाई
मन की चोरी पकड़ी गई तो
धानी चुनर शरमाई

छुई मुई बन गई अचानक चंचंल शोख़ हसीना
महीना सावन का ......

कजरी गाएं सखियां सारी
मन की पीर बढ़ाएं
बूंदें लगती बान के जैसे
गोरा बदन जलाएंअब के जो ना आए संवरिया ज़हर पड़ेगा पीना
महीना सावन का ......

(2) सावन के सुहाने मौसम में


खिलते हैं दिलों में फूल सनम सावन के सुहाने मौसम में
होती है दिलों से भूल सनम सावन के सुहाने मौसम में


यह चाँद पुराना आशिक़ है 
दिखता है कभी छिप जाता है
छेड़े है कभी ये बिजुरी को
बदरी से कभी बतियाता है

यह इश्क़ नहीं है फ़िज़ूल सनम सावन के सुहाने मौसम में

बारिश की सुनी जब सरगोशी
बहके हैं क़दम पुरवाई के
बूंदों ने छुआ जब शाख़ों को
झोंके महके अमराई के

टूटे हैं सभी के उसूल सनम सावन के सुहाने मौसम में

यादों का मिला जब सिरहाना
बोझिल पलकों के साए हैं
मीठी सी हवा ने दस्तक दी
सजनी कॊ लगा वॊ आए हैं

चुभते हैं जिया में शूल सनम सावन के सुहाने मौसम में


(3) बरसे बदरिया (लोक धुन पर आधारित)

बरसे बदरिया सावन की
रुत है सखी मनभावन की

बालों में सज गया फूलों का गजरा
नैनों से झांक रहा प्रीतभरा कजरा
राह तकूं मैं पिया आवन की
बरसे बदरिया सावन की .....

चमके बिजुरिया मोरी निंदिया उड़ाए
याद पिया की मोहे पल पल आए
मैं तो दीवानी हुई साजन की
बरसे बदरिया सावन की .....

महक रहा है सखी मन का अँगनवा
आएंगे घर मोरे आज सजनवा
पूरी होगी आस सुहागन की
बरसे बदरिया सावन की .....


==== देवमणि पांडेय ====



Devmani Pandey : B-103, Divya Stuti,
Kanya Pada, Gokuldham, Film City Road,
Goregaon East, Mumbai-400063
M : 98210-82126
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रविवार, 18 जुलाई 2010

कौन बसंती धो गई नदी में अपने गाल : ज़फ़र गोराखपुरी


दोहे पर विचार-विमर्श


हिंदी में ‘ग़ज़ल’ और उर्दू में ‘दोहा’ कभी-कभी विवाद का विषय बन जाते हैं। इस मुद्दे पर बहस, तकरार और झड़पें हो चुकी हैं। मुझे लगा कि क्यों न इस मुद्दे पर बुज़ुर्गों की राय ले ली जाए। मुंबई में ज़फ़र गोरखपुरी और नक़्श लायलपुरी का शुमार सबसे वरिष्ठ शायरों में किया जाता हैं। दोहे पर इनकी राय पेश करते हुए मैं सभी पाठकों, कवियों और शायरों से अनुरोध करता हूं कि कृपया मिलजुल कर इस चर्चा को आगे बढ़ाएं। मगर इसके लिए अपनी उत्तेजना पर क़ाबू रखते हुए सह्रदयता, विनम्रता और धीरज से काम लें ताकि रचनात्मकता का भला हो सके।

दोहे में दोहे का अनुशासन ज़रुरी है -ज़फ़र गोराखपुरी


हिंदुस्तान में कबीर, रहीम, मीरां, तुलसी आदि के दोहों की एक समृद्ध परंपरा है । अमीर खुसरो ने भी दोहे लिखे हैं मसलन-

गोरी सोवे सेज पर ,मुख पर डारे केस ।
चल खुसरो घर आपने रैन हुई चहुं देस ।।



दोहे का छंद तेरह और ग्यारह मात्राओं में बंटा हुआ है। अगर इसमें एक भी मात्रा कम या ज़्यादा होती है तो वह दोहा नहीं रह जाता। पाकिस्तान में शायरों ने दोहा लिखने के लिए अलग बहर ( छंद) का इस्तेमाल किया। उसमें तेरह और ग्यारह मात्राओं का अनुशासन नहीं है हिंदुस्तान में भी कई शायरों ने उनका अनुकरण किया। मगर वैसी रचनाओं को ‘दोहा’ घोषित कर देने से उन्हें ‘दोहा’ नहीं माना जा सकता। उन्हें दोहा घोषित करने के बजाय मतला, मुखड़ा, मिनीकविता या मुक्तक जैसा ही कोई नाम देना ठीक होगा।

दोहा बहुत ख़ूबसूरत विधा है। हमें इसकी शुद्धता बरकरार रखनी चाहिए। दोहे में छंद के अनुशासन के साथ ही प्रभावशाली कथ्य और आम फहम भाषा का भी होना ज़रुरी है। अरबी, फ़ारसी या संस्कृत के कठिन शब्दों में दोहा लिखना दोहे के साथ अन्याय करना है। सहजता, सरलता और तर्क संगत बात दोहे में ज़रुरी है और यह बात तेरह- ग्यारह मात्राओं की बंदिश के साथ होनी चाहिए ।

ज़फ़र गोरखपुरी के दोहे

कौन बसंती धो गई, नदी में अपने गाल ।
तट ख़ुशबू से भर गया, सारा पानी लाल ।।

मेंहदी ऐसी रच सखी, आज हथेली थाम ।
लाल लकीरें जब मिलें, उभरे पी का नाम ।।

पी ने भीगी रैन में, आज छुआ यूं अंग ।
नैनों में खिल खिल गए, धनक के सातों रंग ।।

साजन को जल्दी सखी,मन है कि उमड़ा आय ।
कांटा समय के पांव में, काश कोई चुभ जाय ।।

आंगन चंचल नंद-सा, घर है ससुर समान ।
भीत अंदर दो खिड़कियां, ज्यों देवरान जेठान ।।

जन गणना के काम से, अफ़सर आया गांव ।
लाज आए लूं किस तरह, सखी मैं उनका नांव ।।

रैन सखी बरसात की, निंदिया उड़ उड़ जाय ।
थमें ज़रा जो बूंदिया, चूड़ी शोर मचाय ।।

साजन ने तन यूं हुआ, जैसे कोई चोर ।
सुन पाई न मैं सखी, सांसों का भी शोर ।।

मन में पिय के नेह का, चुभा ये कैसा तीर ।
मैके जाने की घड़ी, और आंखों में नीर ।।

गुज़रा घर के पास से, कौन सजिल सुकुमार ।
बिन होली के दूर तक,रंगों की बौछार ।।


दोहे पर बंदिश परवाज़ को रोकने की कोशिश है -नक्श़ लायल पुरी

दोहा हिंदी की देन है जिसमें तेरह और ग्यारह मात्राएं होती हैं। मैंने जानबूझकर इस रवायत से अलग हटकर नई बहर में दोहे लिखे। ग़ज़ल में भी जो रवायती बहरें हैं लोगों ने उनसे अलग नई बहरें ईजाद करके ग़ज़लें कहीं और उन्हें स्वीकार किया गया। दोहा नई बहर में भी हो सकता है मगर दोहे में मौलिकता का ध्यान रखना ज़रुरी है । उसमें ग़ज़ल की ज़बान और ग़ज़ल का कंटेंट नहीं चलता ।

शायर किसी बंदिश को तस्लीम नहीं करता। क़ाफ़िया-रदीफ़ की बंदिश तो हुनर है। शायर किसी विधा के लिए नई बहरें क्यों नहीं तराश सकता ? दोहे को इस दौर में तेरह-ग्यारह की बंदिश में बांधना शायरी की परवाज़ को रोकने की कोशिश है। ग़ज़ल फ़ारसी से आई मगर हिंदुस्तान में जल्दी लोकप्रिय हुई क्यों कि यहां दोहे में यानी दो मिसरों में बात कहने की ट्रैडीशन मौजूद थी । पुरानी ट्रैडीशन में विकास लाने के लिए बदलाव ज़रुरी है। मैंने फ़िल्मों के पारंपरिक मुखड़े को भी बदलने की कोशिश की और यह कोशिश कामयाब हुई । मसलन मेरे दो गीत के मुखड़े हैं-


न जाने क्या हुआ, जो तूने छू लिया 
खिला गुलाब की तरह मेरा बदन

चांदनी रात में इक बार तुझे देखा है
ख़ुद पे इतराते हुए, खुद से शरमाते हुए 


इन मुखड़ों में पारंपरिक तुकबंदी नहीं है। समय आ गया है कि हम नई बहर में दोहे लिखें और विकास का रास्ता रोशन करें।

नक़्श लायलपुरी के दोहे

अपना तो इक पल न बीते, हाथ पे धर के हाथ
दिन मेहनत मज़दूरी का हैं, सैंयाजी की रात

नैनों में सपनों की छाया, हर सपना अनमोल
साजन के संग सभी बहारें,कहूं बजाकर ढोल

आशा बिन जीवन है सूना, ज्यूं बाती बिन दीप
सीप है जीवन, आशा मोती, क्या मोती बिन सीप

आंखों देखी कान सुनी से, धोका भी हो जाए
सच का शोर मचाने वाला, क्या अपना झूठ छुपाए

पेड़ों से पत्ते झड़ जाएं, पेड़ न खोएं धीर
धूप सहें, सर्दी में सिकुड़े, खड़े रहें गंभीर

आंखों को लगते हैं प्यारे प्रेम के सारे रुप
प्रेम चैत की कभी चांदनी, कभी जेठ की धूप

दर्द न जब तक छेदे,दिल में छेद न होने पाए
छेद न हो तो कैसे मोती, कोई पिरोया जाए

तेरे हाथ में देखी मैंने, अपनी जीवन रेखा
मैंने अपना हर सपना, तेरी आंखों से देखा


किसी की पूजा निष्फल जाए, किसी का पाप फूले
हाथ किसी के चांद को नोचें, कोई हाथ मले

धन दौलत,बरसात,जवानी,चार दिनों का खेल
प्रेम की जोत सदा जलती है,बिन बाती बिन तेल



आपका-

देवमणि पांडेय : बी-103, दिव्य स्तुति, 
कन्या पाडा, गोकुलधाम, फ़िल्म सिटी रोड, 
गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210 82126 

गुरुवार, 1 जुलाई 2010

हम पंडितों के इश्क़ में बरबाद हो गए : मुनव्वर राना


नए मौसम के फूल के लोकार्पण समारोह में पत्रकार उपेंद्र राय, शायर मुनव्वर राना, सहारा इंडिया परिवार के डिप्टी एम.डी.ओ.पी. श्रीवास्तव, प्रकाशक नीरज अरोड़ा और शायर-संचालक देवमणि पाण्डेय (मुम्बई 21 मार्च 2009)

नए मौसम के फूल : मुनव्वर राना

बादशाहों को सिखाया है कलंदर होना

आप आसान समझते हैं मुनव्वर होना

मुनव्वर राना की शायरी में पारिवारिक रिश्तों की एक मोहक ख़ुशबू है। लफ़्ज़ों को बरतने का एक ख़ूबसूरत सलीक़ा है। अपने तजुर्बात को पेश करने का एक लासानी अंदाज है। यही ख़ासियतें उन्हें अलग और पुख़्ता पहचान देती हैं। वे अपनी मिट्टी,पानी और हवा से जुड़े हस्सास शायर हैं। वे तर्के- तआल्लुक़ात के इस दौर में भी संयुक्त परिवार का परचम लहराते हुए दिखाई पड़ते हैं – वो भी मुख़्तलिफ़ अंदाज़ में-

न कमरा जान पाता है न अँगनाई समझती है
कहां देवर का दिल अटका है भौजाई समझती है

मुनव्वर राणा का ख़ानदान विभाजन के वक़्त पाकिस्तान चला गया था। उनके पिता पं.जवाहरलाल नेहरू के आग्रह पर यहीं रह गए। इस मौज़ू पर उनका एक शेर है-

हिजरत को भूल-भालकर आबाद हो गए
हम पंडितों के इश्क़ में बरबाद हो गए

भारत-पाक विभाजन के दर्द पर मुनव्वर राणा ने एक ग़ज़ल कही है-

मुहाजिर हैं मगर हम एक दुनिया छोड़ आए हैं
तुम्हारे पास जितना है हम उतना छोड़ आए हैं

इसके ज़रिए उन्होंने एक नया रिकार्ड कायम किया है। इस ग़ज़ल में पाँच सौ शेर हैं। यानी इसे एक लम्बी नज़्म भी कह सकते हैं। कुछ दिनों पहले उन्होंने बताया कि यह तवील ग़ज़ल एक किताब की शक़्ल में ‘मुहाजिरनामा’ नाम से शाया हो गई है। इस आलेख के आख़िर में ‘मुहाजिरनामा’ से चंद अशआर आपके लिए पेश किए गए हैं।

हमारे सीनियर शायर जब हमें किताबें भेंट करते हैं तो अच्छा लगता है। शायर मुनव्वर राना ने मुझे अपनी किताब ‘घर अकेला हो गया’ दिनांक 24-11-04 को भेंट की। किताब के इस नाम के पीछे एक एहसास छुपा हुआ है। भाई राना की पांच बेटियां हैं। इनमें चार की शादी हो चुकी है। चौथी बेटी की शादी पटना (बिहार) में हुई है। एक दिन इस बेटी ने उनको एक एसएमएस भेजा ‘पापा ! आप और मम्मी सोचते होंगे कि हमारी शादी करके आप अपनी ज़िम्मेदारियों से मुक्त हो गए। मगर हम ये सोचते हैं कि अगर कुछ दिन और मम्मी-पापा की सेवा कर लेते तो बेहतर होता।’ इसे पढ़कर राना को देर रात तक नींद नहीं आई। फिर उन्होंने बेटी को एक शेर एसएमएस किया-

ऐसा लगता है कि जैसे ख़त्म मेला हो गया
उड़ गईं आंगन से चिड़ियां घर अकेला हो गया

इसी मौज़ू पर लिखा हुआ उनका एक शेर और भी मक़बूल हुआ-

ये बच्ची चाहती है और कुछ दिन मां को ख़ुश रखना
ये कपड़ो की मदत से अपनी लम्बाई छुपाती है

जनवरी में एक दिन राना साहब से बात हुई। बोले- यार सर्दियों में बीवी से रिश्ते बड़े अच्छे हो जाते हैं क्योंकि ज्य़ादातर समय मैं घर पर ही रहता हूँ। वैसे कभी-कभी मुझे सर्दी में भी गर्मी लगती है। एक बार लालक़िले के मुशायरे में जनवरी में कुर्ता-पायजामा पहनकर चला गया। बाक़ी शायर टाई-शूट में या कम्बल ओढ़कर आए थे। मेरे पीछे फुसफुसाहट शुरु हो गई – ‘देखो साला पीकर आया है, इसलिए इसे ठंड नहीं लग रही है।’

पीने से तो नहीं मगर पान पराग ज़्यादा खाने से मुनव्वर राना बीमार पड़ गए। डाक्टर के पास गए। डाक्टर ने कहा-‘अगर जीना चाहते हो तो गुटका (पान पराग) खाना छोड़ दो ।’ राना बोले, डाक्टर साहब ! अभी-अभी एक मतला हुआ है। सुनिए-

ये ज़हर ए जुदाई हमें पीना भी पड़ेगा
क्या सारे नशे छोड़कर जीना भी पड़ेगा

डाक्टर हँसने लगा। यानी दूसरों को हँसाने का हुनर राना साहब को मालूम है। दुष्यंत कुमार ने कहा था - मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूँ, वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूँ । सचमुच राना के लिए ग़ज़ल अब उनका ओढ़ना बिछौना बन गई है । 21 मार्च 2009 को मुंबई के पांच सितारा होटल सहारा स्टार में उनकी नई किताब ‘नए मौसम के फूल’ का लोकार्पण हुआ। उन्होंने बताया- ‘पहले घर से निकालता था तो देखता था – कौन सा शूट रखना है, कौन सा कुर्ता पायज़ामा रखना है । अब घर से बाहर जाता हूँ तो देखता हूँ कौन सी दवा रखनी है, कौन सी टेबलेट लेनी है।’ ज़िंदगी के इस मुकाम को उन्होंने ग़ज़ल में इस तरह दर्ज किया –

हमारे कुछ गुनाहों की सज़ा भी साथ चलती है
मैं अब तनहा नहीं चलता दवा भी साथ चलती है
अभी ज़िंदा है मां मेरी मुझे कुछ भी नहीं होगा
मैं जब घर से निकालता हूँ दुआ भी साथ चलती है

मुनव्वर राना इस समय मुशायरों के सुपरहिट शायर हैं। पूरी दुनिया में उनके प्रशंसक मौजूद हैं। शायद इसलिए कि वे हर उम्र और हर वर्ग के आदमी को अपनी शायरी का किरदार बना लेते हैं। बुज़ुर्गों की शान में उनके फ़न का कमाल देखिए-

हम सायादार पेड़ ज़माने के काम आए
जब सूखने लगे तो जलाने के काम आए
तलवार की मियान कभी फेंकना नहीं
मुमकिन है दुश्मनों को डराने के काम आए

एक अच्छा शायर कहीं न कहीं अपने फ़न के ज़रिए अपनी शाख्सियत से भी रुबरु होता है । राना साहब भी कहते हैं-

ख़ुश ख़ुश दिखाई देता हूँ बीमार मैं भी हूँ
दुनिया को क्या पता कि अदाकार मैं भी हूँ
करता रहा हूँ अपने मसाइल से रोज़ जंग
छोटे से इक कबीले का सरदार मैं भी हूँ


उनके कुछ प्रशंसकों का कहना है कि राना साहब तो फ़कीर हैं। वैसे उनकी शायरी मैं फ़कीराना अदा भी दिखाई देती है –


आए हो तो इक मुहरे-गदागर भी लगा दो
इस चांद से माथे पे ये झूमर भी लगा दो
अजदाद की ख़ुशबू मुझे जाने नहीं देगी
इस पेड़ के नीचे मेरा बिस्तर भी लगा दो

सीधे साधे लफ़्ज़ों में गहरी बात कह देना शायरी में बहुत बड़ा हुनर माना जाता है। मुनव्वर राना इस हुनर के बाकमाल शायर हैं –

कलंदर संगमरमर के मकानों में नहीं मिलता
मैं असली घी हूँ बनियों की दुकानों में नहीं मिलता

ग़ज़ल में कैसे कैसे रुख निकाले हैं मुनव्वर ने
किसी भी शेर को पढ़िए तो तहदारी निकलती है


कमाल का ये हुनर हासिल कैसे होता है ? एक जगह मुनव्वर राना ने इज़हारे-ख़याल किया है –

ख़ुद से चलके नहीं ये तर्ज़े-सुख़न आया है
पांव दाबे हैं बुज़ुर्गो के तो ये फ़न आया है


मानी की गहराई, एहसास की ऊँचाई और अल्फाज़ की नरमाई के चलते मुनव्वर राना अक्सर ऐसे शेर कह जाते हैं जो सुनने-पढ़ने वालों को एक बार में ही याद होकर उनके वजूद का हिस्सा बन जाते हैं,मसलन -
भुला पाना बहुत मुश्किल है सब कुछ याद रहता है
मोहब्बत करने वाला इस लिए बरबाद रहता है

बहुत दिन से तुम्हें देखा नहीं है
ये आंखों के लिए अच्छा नहीं है

मोहब्बत में तुम्हें आँसू बहाना तक नहीं आया
बनारस में रहे और पान खाना तक नहीं आया


एक अच्छा शायर अगर अच्छा इंसान भी हो तो सोने में सुहागा। राना साहब अच्छे, विनम्र और मिलनसार इंसान हैं। वे हमेशा ख़ुश रहते हैं और दूसरों को भी ख़ुश देखना चाहते हैं।अगर उनके साथ दो-चार दोस्त भी हों तो प्रति मिनट एक ठहाके की गारंटी है। आइए मिलकर दुआ करें कि ऊपर वाला ऐसे नेक इंसान और उम्दा शायर को लम्बी उम्र बख़्शे। राना साहब का ही शेर है-

मौला ये तमन्ना है कि जब जान से जाऊँ
जिस शान से आया हूँ उसी शान से जाऊँ

पेश हैं मुहाजिरनामा से चंद अशआर-

मुहाजिर हैं मगर हम एक दुनिया छोड़ आए हैं
तुम्हारे पास जितना है हम उतना छोड़ आए हैं

कई आँखें अभी तक ये शिकायत करती रहती हैं
कि हम बहते हुए काजल का दरिया छोड़ आए हैं

कहानी का ये हिस्सा आज तक सब से छुपाया है
कि हम मिट्टी की ख़ातिर अपना सोना छोड़ आए हैं

नई दुनिया बसा लेने की इक कमज़ोर चाहत में
पुराने घर की दहलीज़ों को सूना छोड़ आए हैं

अक़ीदत से कलाई पर जो इक बच्ची ने बाँधी थी
वो राखी छोड़ आए हैं वो रिश्ता छोड़ आए हैं

किसी की आरज़ू के पाँवों में ज़ंजीर डाली थी
किसी की ऊन की तीली में फंदा छोड़ आए हैं

पकाकर रोटियाँ रखती थी माँ जिसमें सलीक़े से
निकलते वक़्त वो रोटी की डलिया छोड़ आए हैं

जो इक पतली सड़क उन्नाव से मोहान जाती है
वहीं हसरत के ख़्वाबों को भटकता छोड़ आए हैं

यक़ीं आता नहीं, लगता है कच्ची नींद में शायद
हम अपना घर गली अपना मोहल्ला छोड़ आए हैं

हमारे लौट आने की दुआएँ करता रहता है
हम अपनी छत पे जो चिड़ियों का जत्था छोड़ आए हैं
हमें हिजरत की इस अन्धी गुफ़ा में याद आता है
अजन्ता छोड़ आए हैं एलोरा छोड़ आए हैं

सभी त्योहार मिलजुल कर मनाते थे वहाँ जब थे
दिवाली छोड़ आए हैं दशहरा छोड़ आए हैं

हमें सूरज की किरनें इस लिए तक़लीफ़ देती हैं
अवध की शाम काशी का सवेरा छोड़ आए हैं

गले मिलती हुई नदियाँ गले मिलते हुए मज़हब
इलाहाबाद में कैसा नज़ारा छोड़ आए हैं

हम अपने साथ तस्वीरें तो ले आए हैं शादी की
किसी शायर ने लिक्खा था जो सेहरा छोड़ आए हैं

वज़ारत भी हमारे वास्ते कम मरतबा होगी
हम अपनी माँ के हथों में निवाला छोड़ आए हैं

अगर लिखने पे आ जाएं तो स्याही ख़त्म हो जाए
कि तेरे पास आए हैं तो क्या क्या छोड़ आए हैं

आपका-

देवमणि पांडेय : बी-103, दिव्य स्तुति, 
कन्या पाडा, गोकुलधाम, फ़िल्म सिटी रोड, 
गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210 82126 

मौत से आगे सोच के आना : अब्दुल अहद साज़



शायर अब्दुल अहद साज़ 

16 अक्तूबर 1950 को मुम्बई में जन्मे अब्दुल अहद ‘साज़’ इस दौर के नुमाइंदा शायर हैं। वे ख़ूबसूरत ग़ज़लें कहते हैं तो असरदार नज़्में भी। देश- विदेश की उर्दू और हिन्दी पत्रिकाओं में उनकी कविताएं और लेख प्रकाशित हो चुके हैं। ऑल इंडिया तथा अंतर्राष्ट्रीय मुशायरों में वे शिरकत कर चुके हैं। फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की सदारत में पाकिस्तान के मुशायरे में शिरकत करने वाले साज़ ने फ़ैज़ साहब से भी अपने ख़ूबसूरत कलाम के लिए दाद वसूल की। दूरदर्शन तथा अन्य चैनलों और रेडियो कार्यक्रमों में कवि और संचालक के तौर पर शिरकत करने वाले साज़ ने तनक़ीद (आलोचना) के इलाक़े में ऐसे कारनामे अंजाम दिए हैं कि अहले-उर्दू उन्हें अपने अदब की आबरू समझते हैं। उनकी शायरी की दो किताबें मंज़रे-आम पर आ चुके हैं- ख़ामोशी बोल उठी है और सरगोशियां ज़मानों की। उन्हें बिहार उर्दू अकादमी अवार्ड, पश्चिम बंगाल उर्दू अकादमी, जेमिनी अकादमी (हरियाणा) और महाराष्ट्र उर्दू साहित्य अकादमी अवार्ड से नवाजा जा चुका है। साज़ बाल कविताएं लिखने का नेक काम भी करते हैं। महाराष्ट्र स्टेट बोर्ड की युवा भारती तथा बाल भारती के पाठ्यक्रम में उनकी कविताएं शामिल हैं। 

सम्पर्क : +91-98337-10207/ 022- 2342 7824


अब्दुल अहद साज़ की पाँच ग़ज़लें
(1)

मौत से आगे सोच के आना फिर जी लेना
छोटी छोटी बातों में दिलचस्पी लेना

जज़्बों के दो घूँट अक़ीदों के दो लुक़मे
आगे सोच का सेहरा है, कुछ खा-पी लेना

नर्म नज़र से छूना मंज़र की सख़्ती को
तुन्द हवा से चेहरे की शादाबी लेना

आवाज़ों के शहर से बाबा ! क्या मिलना है
अपने अपने हिस्से की ख़ामोशी लेना

महंगे सस्ते दाम , हज़ारों नाम थे जीवन
सोच समझ कर चीज़ कोई अच्छी सी लेना

दिल पर सौ राहें खोलीं इनकार ने जिसके
‘साज़’ अब उस का नाम तशक्कुर से ही लेना

अक़ीदों : श्रद्धाओं , लुक़मे : निवाले , सेहरा : रेगिस्तान, शादाबी : ताज़गी , तशक्कुर : शुक्रिया/धन्यावाद

(2)
मैं ने कब चाहा कि मैं उस की तमन्ना हो जाऊँ
ये भी क्या कम है अगर उस को गवारा हो जाऊँ

मुझ को ऊँचाई से गिरना भी है मंज़ूर, अगर
उस की पलकों से जो टूटे, वो सितारा हो जाऊँ

लेकर इक अज़्म उठूं रोज़ नई भीड़ के साथ
फिर वही भीड़ छटे और मैं तनहा हो जाऊँ

जब तलक महवे-नज़र हूँ , मैं तमाशाई हूँ
टुक निगाहें जो हटा लूं तो तमाशा हो जाऊँ

मैं वो बेकार सा पल हूँ, न कोइ शब्द, न सुर
वह अगर मुझ को रचाले तो ‘हमेशा’ हो जाऊँ

आगही मेरा मरज़ भी है, मुदावा भी है ‘साज़’
‘जिस से मरता हूँ, उसी ज़हर से अच्छा हो जाऊँ

अज्म़ : पक्का इरादा , महवे-नज़र : देखने में मगन,तमाशाई : दर्शक, आगही : ज्ञान , मरज़ : बीमारी
(3)


ख़ुद को औरों की तवज्जुह का तमाशा न करो
आइना देख लो, अहबाब से पूछा न करो

वह जिलाएंगे तुम्हें शर्त बस इतनी है कि तुम
सिर्फ जीते रहो, जीने की तमन्ना न करो

जाने कब कोई हवा आ के गिरा दे इन को
पंछियो ! टूटती शाख़ों पे बसेरा न करो

आगही बंद नहीं चंद कुतुब-ख़ानों में
राह चलते हुए लोगों से भी याराना करो

चारागर ! छोड़ भी दो अपने मरज़ पर हम को
तुम को अच्छा जो न करना है, तो अच्छा न करो

शेर अच्छे भी कहो, सच भी कहो, कम भी कहो
दर्द की दौलते-नायाब को रुसवा न करो
तवज्जुह : ध्यान देना, अहबाब : दोस्तों, आगही : ज्ञान, कुतुब-ख़ानों : पुस्तकालय , चारागर : चिकित्सक, दौलते-नायाब : अमूल्य दौलत

(4)

दूर से शहरे-फ़िक्र सुहाना लगता है
दाख़िल होते ही हरजाना लगता है

सांस की हर आमद लौटानी पड़ती है
जीना भी महसूल चुकाना लगता है

बीच नगर, दिन चढ़ते वहशत बढ़ती है
शाम तलक हर सू वीराना लगता है

उम्र, ज़माना, शहर, समंदर, घर, आकाश
ज़हन को इक झटका रोज़ाना लगता है

बे-मक़सद चलते रहना भी सहल नहीं
क़दम क़दम पर एक बहाना लगता है

क्या असलूब चुनें, किस ढब इज़हार करें
टीस नई है, दर्द पुराना लगता है

होंट के ख़म से दिल के पेच मिलाना ‘साज़’
कहते कहते बात ज़माना लगता है
शहरे-फ़िक्र : ज्ञान का नगर, महसूल: टेक्स,ज़हन : दिमाग़, बे-मक़सद : बिना लक्ष्य के, असलूब : अंदाज़, ख़म : मोड़
(5)
जागती रात अकेली सी लगे
ज़िंदगी एक पहेली सी लगे

रुप का रंग-महल, ये दुनिया
एक दिन सूनी हवेली सी लगे

हम-कलामी तेरी ख़ुश आए उसे
शायरी तेरी सहेली सी लगे

मेरी इक उम्र की साथी ये ग़ज़ल
मुझ को हर रात नवेली सी लगे

रातरानी सी वो महके ख़ामोशी
मुस्कुरादे तो चमेली सी लगे

फ़न की महकी हुई मेंहदी से रची
ये बयाज़ उस की हथेली सी लगे
हम-कलामी : एक दूसरे से बात करना, ख़ुश आना : पंसद आना, फ़न : कला, बयाज़ : कापी / डायरी


आपका-
देवमणि पांडेय : बी-103, दिव्य स्तुति, 
कन्या पाडा, गोकुलधाम, फ़िल्म सिटी रोड, 
गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210 82126