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गुरुवार, 25 जून 2020

हिंदुस्तान में सूफ़ीवाद यानी मुहब्बतों का पैग़ाम


सूफ़ीवाद यानी मुहब्बतों का पैग़ाम

सूफ़ी संतों और सूफ़ी शायरों ने पूरी दुनिया को मुहब्बत का पैग़ाम दिया। इन दीवानों ने अपने रब के साथ ऐसा पाक और रुहानी रिश्ता जोड़ा कि उन्हें अपने दिल के आईने में पूरी दुनिया का अक्स नज़र आने लगा। सूफ़ी शायरी और सूफ़ी संगीत के ज़रिए दिल से दिल के तार जोड़ने का यह सिलसिला आज भी जारी है।

सूफ़ीवाद का आग़ाज़
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कहा जाता है कि आठ सौ साल पहले ईरान में इमाम ग़ज़ाली के ज़रिए सूफ़ीवाद का आग़ाज़ हुआ। वहाँ से तुर्की होते हुए इसकी ख़ुशबू हिंदुस्तान पहुंच गई। फ़ारसी शायर जलालुद्दीन रूमी और हाफ़िज़ शीराजी ने सूफ़ीवाद को अपने कलाम के ज़रिए दूर दूर पहुंचाया। आज भी लोग मौलाना रूमी से इतनी मुहब्बत करते हैं कि सन् 2007 को पूरी दुनिया में ‘इयर ऑफ दि रूमी’ के नाम से मनाया गया था। यह उनकी 800वीं बरसी थी। 

मौलाना मुहम्मद जलालुद्दीन रूमी का जन्म अफ़गानिस्तान के बल्ख में 30 सितम्बर 1207 को हुआ। रूमी ने अपना जीवन तुर्की में बिताया। 17 दिसम्बर 1273 को तुर्की के कोन्या में उनका इंतक़ाल हुआ। वे फ़ारसी के महत्वपूर्ण लेखक थे। शायर शम्स तबरीज़ी से मिलने के बाद रूमी की शायरी में मस्ताना रंग आया था। इनके काव्य संग्रह का नाम है दीवान ए शम्स। रूमी ने सूफ़ीवाद में दरवेश परंपरा को आगे बढ़ाया। रूमी की मज़ार पर सैकड़ों सालों से सालाना आयोजन होते रहे हैं।

बारहवीं सदी में कई सूफ़ी फ़कीर हिंदुस्तान आए। ख्वाजा अब्दुल चिश्ती ने हेरात में  'चिश्ती धर्म संघ' की स्थापना की थी। सन् 1192 ई. में ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती हिंदुस्तान आए। उन्होंने यहाँ चिश्ती परम्परा की शुरुआत की। उनकी गतिविधियों का मुख्य केन्द्र अजमेर था। इन्हें ग़रीब नवाज़ कहा जाता है। प्रमुख सूफ़ी सन्तों में बाबा फ़रीद, ख्वाजा बख़्तियार काकी एवं शेख़ बुरहानुद्दीन ग़रीब का नाम लिया जाता है। सुल्तान इल्तुतमिश के समकालीन ख्वाजा बख़्तियार काकी ने फ़रीद को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। बाबा फ़रीद का आम लोगों से  बहुत लगाव था। उनकी अनेक रचनाएं 'गुरुग्रंथ साहिब' में शामिल हैं। बाबा फ़रीद को ग़यासुद्दीन बलबन का दामाद बताया जाता है।

बाबा फ़रीद के शागिर्द
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बाबा फ़रीद के दो महत्त्वपूर्ण शागिर्द हजरत निज़ामुद्दीन औलिया एवं हजरत अलाउद्दीन साबिर थे। शेख़ निज़ामुद्दीन औलिया ने सात सुल्तानों का कार्यकाल देखा। मगर उन्होंने किसी सुल्तान की परवाह नहीं की। शेख़ निज़ामुद्दीन औलिया को महबूब-ए-इलाही कहा गया। निज़ामुद्दीन औलिया के प्रमुख शागिर्द शेख़ सलीम चिश्ती थे। हिंदुस्तान में निज़ामुद्दीन औलिया के शागिर्द अमीर ख़ुसरो के कलाम के ज़रिए सूफ़ीवाद ने अवाम के साथ अपना रिश्ता जोड़ लिया। ख़ुदा से मेल होने के बाद आदमी अपनी दुनियावी पहचान से आज़ाद होकर एक अलग ही दुनिया में पहुंच जाता है। अमीर ख़ुसरो लिखते हैं- छाप तिलक सब छीनी रे, मोसे नैना मिलाइ के...

बुतख़ाने के परदे में काबा
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सूफ़ीवाद मुहब्बत के दयार में फ़कीर की तरह घूमने-फिरने की आज़ादी है। ऐसा माना जाता है कि क़तरे से लेकर समंदर तक, ज़र्रे से लेकर आसमान तक अल्लाह हर चीज़ में है। अगर अल्लाह हर चीज़ में है तो वह बुत में भी है। एक सूफ़ी शायर ने अपने कलाम के ज़रिए सूफ़ीवाद को इस तरह परिभाषित किया है-

बुत में भी तेरा या रब जलवा नज़र आता है
बुतख़ाने के परदे में काबा नज़र आता है

माशूक के रुतबे को महशर में कोई देखे
अल्लाह भी मजनूँ को लैला नज़र आता है

इक क़तरा-ए-मय जब से साक़ी ने पिलाई है
उस रोज़ से हर क़तरा दरिया नज़र आता है

साक़ी की मुहब्बत में दिल साफ़ हुआ इतना
जब सर को झुकाता हूँ शीशा नज़र आता है

दिल और कहीं ले चल ये दैरो-हरम छूटे
इन दोनों मकानों में झगड़ा नज़र आता है

अल्लाह को पाने के लिए जोगी बनना ज़रूरी नहीं है। घर-गृहस्थी में रहकर भी अल्लाह तक पहुँचा जा सकता है। बीवी से मुहब्बत है तो अल्लाह से भी प्रेम हो सकता है। सूफी संत नूर मुहम्मद फ़रमाते हैं-

नूर मुहम्मद यह कथा, है तो प्रेम की बात
जेहि मन कोई प्रेम रस, पढ़े सोई दिन रात

सूफ़ी होने का मक़सद
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सूफ़ी लोग सूफ़ यानी ऊन का लबादा पहनते थे। सूफ़ी होने का मक़सद है फ़कीर होना। मुहब्बत, सादगी और इंसानियत ही इनका मज़हब है। धन-दौलत से इन्हें कुछ मतलब नहीं। सूफ़ी और संत पूरी दुनिया को अपना घर समझते हैं। सूफ़ियों ने मज़हब की पाबंदियों से बाहर निकलकर पूरी दुनिया की भलाई के लिए मुहब्बत और इंसानियत पर ज़ोर दिया। 

सूफ़ियों में दिलों को जोड़ने की भावना थी। उन्होंने किसी भी भेदभाव से ऊपर उठकर इंसान के दिलों को जोड़ने का काम हमेशा किया। सूफ़ियों की तरह हमारे देश के संत कवियों ने भी जात-पांत, धर्म और सम्प्रदाय से ऊपर उठकर, प्रेम के धागे से लोगों के दिलों को जोड़ने का काम बड़ी ख़ूबसूरती से किया। जो इंसान इस प्रेम को पा लेता है उसे किसी और चीज़ की ज़रुरत नहीं रह जाती। कबीर ने लिखा है-

कबिरा प्याला प्रेम का, अंतर लिया लगाय
रोम रोम में रमि रहा, और अमल कोउ नाय

सूफ़ीवाद और संतवाणी का तसव्वुर एक ही है। दोनों मज़हब और धर्म में नहीं बंटे। यूनीवर्सल बने रहे। दोनों ने अपना रिश्ता अल्लाह से और ईश्वर से जोड़ा। पूरी दुनिया को अपना परिवार और सभी को एक जैसा माना। सूफ़ियों और संतों ने दुनिया के सभी इंसानों के लिए मुहब्बत का पैग़ाम दिया। उन्हें इंसानियत का रास्ता दिखाया। ख़ुदा से मुहब्बत यानी परमात्मा से आत्मा का मिलन ही इनकी ज़िंदगी और इनकी शायरी का मक़सद था। 

हिंदुस्तान में सूफ़ी परम्परा
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रामानंद के शिष्य कबीर को कुछ लोग सूफ़ी संत शेख़ तकी का शागिर्द बताते हैं। कबीर पर सूफ़ियों का काफ़ी असर दिखाई देता है-

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय 
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय

हिंदुस्तान में मलिक मुहम्मद जायसी, कुतुबन, मंझन, नूर मुहम्मद आदि कई ऐसे रचनाकार हुए जिन्हें सूफ़ी परम्परा को आगे बढ़ाने वाला माना जाता है। जायसी ने पदमावत, अखरावट, और कान्हावत जैसे महाकाव्य लिखकर सूफ़ी साहित्य में इज़ाफ़ा किया। सूफ़ियाना आशिक़ में तड़प, क़सक और दर्द का होना ज़रूरी है। जायसी के पदमावत में इन भावनाओं की गहराई दिखाई देती है। इस प्रेम कथा में रानी पदमावती को परमात्मा और राजा रत्नसेन को आत्मा के रूप में पेश किया गया है। 

ख़ास बात यह है कि हिंदुस्तान के सूफ़ी कवियों और शायरों ने प्रेम काव्य लिखने के लिए सारे अफ़साने हिंदू मैथोलॉजी से लिए। सूफ़ी कवि यहाँ के जीवन, लोकाचार और लोक संस्कृति से भली भांति वाक़िफ़ थे। रानी नागमती के जुदाई के दर्द को सामने लाने के लिए जायसी ने बारहमासा लिखा जो लोक जीवन की झांकी का बेजोड़ नमूना है।

पिय से कहेउ संदेसड़ा, हे भौंरा! हे काग! 
सों धनि बिरह जरि मुई, तेहिके धुँआ हम लाग

सूफ़ीवाद की ख़ुशबू पंजाब की संतवाणी में भी नुमायां है। गुरुनानक, बुल्ले शाह, वारिस शाह और बाबा फ़रीद के सूफ़ी कलाम से मुहब्बतों की ऐसी बारिश हुई जिसमें समूचा हिंदुस्तान तरबतर हो गया। गुरुनानक ने दिलों को रोशन करने का काम किया।

अव्वल अल्ला नूर उपाया, क़ुदरत ते सब बंदे 
एक नूर ते सब जग उपज्यां , कौन भले कौन मंदे

शायरी की रिवायत में महबूब को ख़ुदा का दर्जा हासिल है। शायरी की ख़ूबसूरती इसी फ़न में है कि उसे इशारों में बयां किया जाए। यानी चाहे उसे ख़ुदा के लिए समझिए या महबूब के लिए। सच्चा सूफ़ी ख़ुशी में रक्स करता है और दुख में हँसता है। यानी जब वो ख़ुदा से अपना रिश्ता जोड़ लेता है तो उसके लिए ग़म और ख़ुशी में फ़र्क़ नहीं रह जाता। तसव्वुफ़ के इस सफ़र में पूरी दुनिया उसे अपना ही घर लगने लगती है। तब वह पूरी दुनिया को वसुधैव कुटुम्बकम का पाठ पढ़ाता है और लोगों के दिल और ज़ह़न को रोशन करके उन्हें इंसान होने का मतलब समझाता है।

ये मसाइल-ए-तसव्वुफ़ ये तेरा बयान ग़ालिब
तुझे हम वली समझते, जो न बादा-ख़्वार होता

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आपका-
देवमणि पाण्डेय 

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाड़ा, गोकुलधाम,
फ़िल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063
M : 98210-82126 
Devmanipandey.blogspot.com
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रविवार, 18 जुलाई 2010

कौन बसंती धो गई नदी में अपने गाल : ज़फ़र गोराखपुरी


दोहे पर विचार-विमर्श


हिंदी में ‘ग़ज़ल’ और उर्दू में ‘दोहा’ कभी-कभी विवाद का विषय बन जाते हैं। इस मुद्दे पर बहस, तकरार और झड़पें हो चुकी हैं। मुझे लगा कि क्यों न इस मुद्दे पर बुज़ुर्गों की राय ले ली जाए। मुंबई में ज़फ़र गोरखपुरी और नक़्श लायलपुरी का शुमार सबसे वरिष्ठ शायरों में किया जाता हैं। दोहे पर इनकी राय पेश करते हुए मैं सभी पाठकों, कवियों और शायरों से अनुरोध करता हूं कि कृपया मिलजुल कर इस चर्चा को आगे बढ़ाएं। मगर इसके लिए अपनी उत्तेजना पर क़ाबू रखते हुए सह्रदयता, विनम्रता और धीरज से काम लें ताकि रचनात्मकता का भला हो सके।

दोहे में दोहे का अनुशासन ज़रुरी है -ज़फ़र गोराखपुरी


हिंदुस्तान में कबीर, रहीम, मीरां, तुलसी आदि के दोहों की एक समृद्ध परंपरा है । अमीर खुसरो ने भी दोहे लिखे हैं मसलन-

गोरी सोवे सेज पर ,मुख पर डारे केस ।
चल खुसरो घर आपने रैन हुई चहुं देस ।।



दोहे का छंद तेरह और ग्यारह मात्राओं में बंटा हुआ है। अगर इसमें एक भी मात्रा कम या ज़्यादा होती है तो वह दोहा नहीं रह जाता। पाकिस्तान में शायरों ने दोहा लिखने के लिए अलग बहर ( छंद) का इस्तेमाल किया। उसमें तेरह और ग्यारह मात्राओं का अनुशासन नहीं है हिंदुस्तान में भी कई शायरों ने उनका अनुकरण किया। मगर वैसी रचनाओं को ‘दोहा’ घोषित कर देने से उन्हें ‘दोहा’ नहीं माना जा सकता। उन्हें दोहा घोषित करने के बजाय मतला, मुखड़ा, मिनीकविता या मुक्तक जैसा ही कोई नाम देना ठीक होगा।

दोहा बहुत ख़ूबसूरत विधा है। हमें इसकी शुद्धता बरकरार रखनी चाहिए। दोहे में छंद के अनुशासन के साथ ही प्रभावशाली कथ्य और आम फहम भाषा का भी होना ज़रुरी है। अरबी, फ़ारसी या संस्कृत के कठिन शब्दों में दोहा लिखना दोहे के साथ अन्याय करना है। सहजता, सरलता और तर्क संगत बात दोहे में ज़रुरी है और यह बात तेरह- ग्यारह मात्राओं की बंदिश के साथ होनी चाहिए ।

ज़फ़र गोरखपुरी के दोहे

कौन बसंती धो गई, नदी में अपने गाल ।
तट ख़ुशबू से भर गया, सारा पानी लाल ।।

मेंहदी ऐसी रच सखी, आज हथेली थाम ।
लाल लकीरें जब मिलें, उभरे पी का नाम ।।

पी ने भीगी रैन में, आज छुआ यूं अंग ।
नैनों में खिल खिल गए, धनक के सातों रंग ।।

साजन को जल्दी सखी,मन है कि उमड़ा आय ।
कांटा समय के पांव में, काश कोई चुभ जाय ।।

आंगन चंचल नंद-सा, घर है ससुर समान ।
भीत अंदर दो खिड़कियां, ज्यों देवरान जेठान ।।

जन गणना के काम से, अफ़सर आया गांव ।
लाज आए लूं किस तरह, सखी मैं उनका नांव ।।

रैन सखी बरसात की, निंदिया उड़ उड़ जाय ।
थमें ज़रा जो बूंदिया, चूड़ी शोर मचाय ।।

साजन ने तन यूं हुआ, जैसे कोई चोर ।
सुन पाई न मैं सखी, सांसों का भी शोर ।।

मन में पिय के नेह का, चुभा ये कैसा तीर ।
मैके जाने की घड़ी, और आंखों में नीर ।।

गुज़रा घर के पास से, कौन सजिल सुकुमार ।
बिन होली के दूर तक,रंगों की बौछार ।।


दोहे पर बंदिश परवाज़ को रोकने की कोशिश है -नक्श़ लायल पुरी

दोहा हिंदी की देन है जिसमें तेरह और ग्यारह मात्राएं होती हैं। मैंने जानबूझकर इस रवायत से अलग हटकर नई बहर में दोहे लिखे। ग़ज़ल में भी जो रवायती बहरें हैं लोगों ने उनसे अलग नई बहरें ईजाद करके ग़ज़लें कहीं और उन्हें स्वीकार किया गया। दोहा नई बहर में भी हो सकता है मगर दोहे में मौलिकता का ध्यान रखना ज़रुरी है । उसमें ग़ज़ल की ज़बान और ग़ज़ल का कंटेंट नहीं चलता ।

शायर किसी बंदिश को तस्लीम नहीं करता। क़ाफ़िया-रदीफ़ की बंदिश तो हुनर है। शायर किसी विधा के लिए नई बहरें क्यों नहीं तराश सकता ? दोहे को इस दौर में तेरह-ग्यारह की बंदिश में बांधना शायरी की परवाज़ को रोकने की कोशिश है। ग़ज़ल फ़ारसी से आई मगर हिंदुस्तान में जल्दी लोकप्रिय हुई क्यों कि यहां दोहे में यानी दो मिसरों में बात कहने की ट्रैडीशन मौजूद थी । पुरानी ट्रैडीशन में विकास लाने के लिए बदलाव ज़रुरी है। मैंने फ़िल्मों के पारंपरिक मुखड़े को भी बदलने की कोशिश की और यह कोशिश कामयाब हुई । मसलन मेरे दो गीत के मुखड़े हैं-


न जाने क्या हुआ, जो तूने छू लिया 
खिला गुलाब की तरह मेरा बदन

चांदनी रात में इक बार तुझे देखा है
ख़ुद पे इतराते हुए, खुद से शरमाते हुए 


इन मुखड़ों में पारंपरिक तुकबंदी नहीं है। समय आ गया है कि हम नई बहर में दोहे लिखें और विकास का रास्ता रोशन करें।

नक़्श लायलपुरी के दोहे

अपना तो इक पल न बीते, हाथ पे धर के हाथ
दिन मेहनत मज़दूरी का हैं, सैंयाजी की रात

नैनों में सपनों की छाया, हर सपना अनमोल
साजन के संग सभी बहारें,कहूं बजाकर ढोल

आशा बिन जीवन है सूना, ज्यूं बाती बिन दीप
सीप है जीवन, आशा मोती, क्या मोती बिन सीप

आंखों देखी कान सुनी से, धोका भी हो जाए
सच का शोर मचाने वाला, क्या अपना झूठ छुपाए

पेड़ों से पत्ते झड़ जाएं, पेड़ न खोएं धीर
धूप सहें, सर्दी में सिकुड़े, खड़े रहें गंभीर

आंखों को लगते हैं प्यारे प्रेम के सारे रुप
प्रेम चैत की कभी चांदनी, कभी जेठ की धूप

दर्द न जब तक छेदे,दिल में छेद न होने पाए
छेद न हो तो कैसे मोती, कोई पिरोया जाए

तेरे हाथ में देखी मैंने, अपनी जीवन रेखा
मैंने अपना हर सपना, तेरी आंखों से देखा


किसी की पूजा निष्फल जाए, किसी का पाप फूले
हाथ किसी के चांद को नोचें, कोई हाथ मले

धन दौलत,बरसात,जवानी,चार दिनों का खेल
प्रेम की जोत सदा जलती है,बिन बाती बिन तेल



आपका-

देवमणि पांडेय : बी-103, दिव्य स्तुति, 
कन्या पाडा, गोकुलधाम, फ़िल्म सिटी रोड, 
गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210 82126