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बुधवार, 20 मई 2015

कवि देवमणि पाण्डेय को त्रिसुगंधि साहित्य रत्न सम्मान



त्रिसुगंधि शिवचंद ओझा ओसियां स्मृति सम्मान समारोह 

त्रिसुगंधि साहित्य, कला एवं संस्कृति संस्थान पाली राजस्थान के तत्वावधान में आयोजित श्री शिवचंद ओझा ओसियां स्मृति सम्मान समारोह एवं दो दिवसीय राष्ट्रीय साहित्यकार सम्मलेन का 7 मई 2014 को पिण्डवाडा, जिला सिरोही, राजस्थान में भव्य आगाज़ हुआ । उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि थे वरिष्ठ साहित्यकार एवं राजस्थान उच्चतर न्यायिक सेवा से सेवानिवृत मुरलीधर वैष्णव साहब। देहरादून से पधारे जाने-माने गीतकार डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र ने अध्यक्षता की। विशिष्ट अतिथि थे दुनिया इन दिनों (भोपाल) के प्रधान संपादक-साहित्यकार डॉ.सुधीर सक्सेना, साहित्यकार सुरेखा शर्मा (हरियाणा) व विश्वगाथा के संपादक-लेखक पंकज त्रिवेदी (गुजरात), और प्रकाश कोठारी (जलगांव)। कार्यक्रम की शु्रूआत आदर्श विधामंदिर स्कूल वनवासी कल्याण परिषद की छात्राओं द्वारा माँ सरस्वती वंदना से हुई। तत्पश्चात संस्था अध्यक्ष आशा पाण्डेय ओझा द्वारा विषय प्रवेश व स्वागत उद्बोधन के साथ ही इसी स्कूल की छात्राओं ने राजस्थानी लोक गीत" मोरियो रे झट चौमासो लाग्यो" पर शानदार नृत्य की प्रस्तुती दी। भीलवाड़ा राजस्थान से पधारे जाने-माने कवि प्रह्लाद पारिक ने इस सत्र का शानदार संचालन किया।

कार्यक्रम का दूसरा सत्र सांय 6 बजे प्रारम्भ हुआ। आशा पाण्डेय ओझा आशा के काव्य संग्रह ‘वक़्त की शाख़ से’का विमोचन गीतकार डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र एवं समारोह अध्यक्ष वरिष्ठ बाल साहित्यकार डॉ. गोविन्द शर्मा संगरिया ने किया। वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. विमला भंडारी (सलूम्बर), वरिष्ठ साहित्यकार एवं राजस्थानी व हिंदी के समान रूप से लेखन करने वाले डॉ. रवि पुरोहित (बीकानेर), वरिष्ठ पत्रकार संजय सिंह (राष्ट्रीय सहारा दिल्ली), प्रकाश दीवान (दिल्ली),साहित्यकार मोनिका गौड़ (बीकानेर), साहित्यकार दिनेश माली (उड़ीसा), ने पुस्तक पर अपने विचार प्रस्तुत किये । इसी सत्र में वरिष्ठ साहित्यकार व नवगीत के सशक्त हस्ताक्षर बुद्धिनाथ मिश्र जी का साहित्य में उनके समग्र योगदान के लिए संस्था द्वारा अभिनंदन किया गया। बांसवाडा (राजस्थान) के जाने-माने कवि साहित्यकार डॉ. सतीश आचार्य ने मंच संचालन किया। 

रात 9 बजे काव्य गोष्ठी व मुशायरे का आगाज़ हुआ मुम्बई से पधारे फिल्म गीतकार व जाने-माने शायर देवमणि पाण्डेय साहब के मुख्य आतिथ्य में। सुपरिचित कवि दिनेश सिंदल (जोधपुर) अध्यक्षता की। विशिष्ट अतिथि थे पटियाला पंजाब से पधारे शायर सागर सूद। कवि प्रहलाद पारीक (भीलवाडा), कवि डॉ.सतीश आचार्य (बांसवाडा), सोम प्रसाद साहिल (शिवगंज), कवि विवेक पारीक (झूंझनू), अब्दुल समद राही (सोजत), समी शम्स वारसी (आबूरोड) आदि जाने-माने कवियों व शायरों ने एक से बढ़कर एक प्रस्तुती देकर रात दो बजे तक श्रोताओं को बांधे रखा। कार्यक्रम में नवगीत के सुपरिचित हस्ताक्षर डॉ.बुद्धिनाथ मिश्र के गीतों ने इतनी मिठास घोली की श्रोता मंत्रमुग्ध हो उठे। डॉ.राम अकेला (पीपाड़) ने अद्भुत संचालन से सबका मन मोह लिया। 



कार्यक्रम के दूसरे दिन आठ मई को सुबह 9 बजे पहले सत्र में ‘समकालीन कविता में स्त्री विमर्श’ विषय पर चर्चा हुई। कार्यक्रम की मुख्य अतिथि जेल अधीक्षक व लेखिका प्रीता भार्गव थी। कहानीकार माधव नागदा, साहित्यकार डॉ.विमला भंडारी, और डॉ.नवीन नंदवाना ने चर्चा में भाग लिया। वरिष्ठ साहित्यकार डॉ.सुधीर सक्सेना ने अध्यक्षता की। संचालन किया कवि प्रहलाद पारीक ने।

कार्यक्रम के दूसरे सत्र में ‘समकालीन कहानी में आंचलिकता का प्रभाव’ विषय पर चर्चा हुई। मुख्य अतिथि लेखक पंकज त्रिवेदी। जाने-माने कहानीकार दिनेश पंचाल ने अध्यक्षता की। डॉ. दिनेश चारण और रीना मेनारिया ने प्रमुख वक्ता के तौर पर अपनी बात रखी। कार्यक्रम का संचालन कवयित्री शकुंतला सरूपरिया ने किया। 

अंतिम सत्र में सम्मान समारोह हुआ। श्री शिवचंद ओझा साहित्य शिरोमणि पुरस्कार डॉ.नन्द भरद्वाज को उनके समग्र लेखन व साहित्य सेवाओं के लिए प्रदान किया गया। कला क्षेत्र का कला शिरोमणि सम्मान अब तक दस से अधिक देशों में व हिंदुस्तान भर में अपने कथक नृत्य की प्रस्तुती दे चुकीं ग्वालियर की नृत्यांगना डॉ समीक्षा शर्मा को प्रदान किया गया। समग्र लेखन एवं साहित्य सेवाओं के लिए सुधीर सक्सेना (भोपाल), देवमणि पाण्डेय (मुम्बई), दिनेश माली (उड़ीसा), सुरेखा शर्मा (गुडगाँव), पंकज त्रिवेदी (गुजरात), सागर सूद (पटियाला,पंजाब), और मोनिका गौड़ (बीकानेर) को त्रिसुगंधि साहित्य रत्न सम्मान प्रदान किया गया । कला एवं संस्कृति में विशिष्ट योगदान के लिए डॉ.महासिंह पूनिया (कुरुक्षेत्र हरियाणा) को कला व संस्कृति रत्न सम्मान प्रदान किया गया । डॉ.नवीन नंदवाना (उदयपुर), डॉ.शकुंतला सरूपरिया (उदयपुर) व डॉ.दिनेश चारण (आबू रोड) व आदर्श विधा मंदिर विद्यालय वनवासी कल्याण परिषद पिण्डवाडा का अभिनन्दन किया गया। सारे अतिथियों व प्रतिभागियों को उपरणा,स्मृति चिन्ह व प्रमाण पत्र प्रदान किये गए। सम्मान समारोह के मुख्य अतिथि थे डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र व अध्यक्षता की वरिष्ठ साहित्यकार मुरलीधर वैष्णव ने। कार्यक्रम का संचालन किया कवि विवेक पारीक ने। अंत में संस्था अध्यक्ष आशा पाण्डेय ओझा ने सभी पधारे हुए साहित्यकारों व अतिथियों का आभार व्यक्त किया। 

प्रस्तुति : विवेक पारीक

रविवार, 16 नवंबर 2014

कवि नरेंद्र मोदी का काव्य संग्रह : आँख ये धन्य है


कविता में कवि नरेंद्र मोदी का रचनात्मक सफ़र

सन 2005 में कवि नरेंद्र मोदी का काव्य संग्रह गुजराती में प्रकाशित हुआ था। डॉ. अंजना संधीर ने इसे आँख ये धन्य है नाम से हिंदी में रूपांतरित किया है। विकल्प प्रकाशन (दिल्ली) ने इसे प्रकाशित किया है। ख़ास बात यह है कि मोदी जी का यह काव्य संकलन ऐसे समय में हमारे सामने आया है जब वे हिंदुस्तान के प्रधानमंत्री के रूप में देश और दुनिया में कामयाबी का नया अध्याय लिख रहे हैं।

अनुवादिका अंजना संधीर स्वयं एक लब्ध-प्रतिष्ठित रचनाकार हैं। वे कई साल अमेरिका में रही हैं। वहाँ उन्होंने हिंदी भाषा और साहित्य के प्रसार के लिए उल्लेखनीय काम किए। उनके अनुभव और दृष्टि की व्यापकता का लाभ इस संग्रह को भी प्राप्त हुआ है। अंजना जी ने इतनी सहजता,सरलता और आत्मीयता से अनुवाद कार्य किया है कि कवि नरेंद्र मोदी की यह अनूदित काव्यकृति हिंदी का मौलिक काव्यसंग्रह प्रतीत होता है। एक काव्यांश देखिए-

पर्वत की तरह अचल रहूँ, और नदी के बहाव सा निर्मल
श्रृँगारित शब्द नहीं मेरे,नाभि से प्रकटी वाणी हूँ
करता हूँ इस धरती से प्रीत
ख़ामोशी का आनंद लेते हुए गाता हूँ गीत

इस संग्रह में 67 कविताएं हैं। इन कविताओं में से कुछ के शीर्षक देखिए - सम्पूर्ण विश्व, उठो लाल ! विजय स्वीकारो, एकाध आँसू, ऐसे मनुष्य, कारगिल, स्वाभिमान, गरबा, बोले बसंत, नर्मदा, तितली, प्रेम, माँ मुझे दैवत्व देना, वंदे मातरम़, सपनों के बीज, मल्लाह आदि। इन काव्य शीर्षकों से आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि मोदीजी की इन कविताओं में देश,दुनिया और समाज समाया हुआ है-

तुम्हारे पास सपने हों या न हों
परंतु सपनों के बीज मैं,
अपनी धरती पर बीजता हूँ
और प्रतीक्षा करता हूँ, पसीना बहाकर
कि वे अँकुरित हों और उनका वृक्ष बने
फिर किसी विराट पुरुष की बाँहों समान
उनकी शाखाएँ फैलें
पक्षी उन पर घोंसले बनायें
और आकाश को छूने लगें
उनके कण्ठ से नदी की कल-कल की
ध्वनि समान ईश्वरीय गीतों के स्वर लहरायें, (पृष्ठ-95)

हिंदी के एक प्रतिष्ठित कवि की पंक्तियां हैं- वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान / निकलकर नैनोँ से चुपचाप बही होगी कविता अनजान। संग्रह की कई कविताओं को पढ़ते हुए लगता है कि वे बरबस हृदय की गहराइयों से छलक पड़ी हैं। इन कविताओं का कवि कहीं कठोर है, कहीं कोमल हैं और कहीं वह इतना भाव विह्वल हो जाता हैं कि आँख से आँसू छलक पड़ते हैं-

अपने काग़ज़ पर सूरज बनाता हूँ
और बनाता हूँ पूनम का चाँद
मेरे काग़ज़ पर लहराता वृक्ष है
और वृक्ष पर हरियाले पत्ते
स्वजन की याद जैसी छोड़ी चट्टान
उसे झरने का गीलापन जगाए, ((पृष्ठ-47)

कवि में साहस है, स्वाभिमान है, देश और समाज के लिए कुछ करने की ललक है और जो कुछ अपने पास विरासत है उस पर गर्व भी है। उसकी नज़र तितली, फूल और कारगिल पर जाती है तो वह उन उत्सवों में भी नए रंग घोलता है जिनसे हमारा सांस्कृतिक ताना-बाना मजबूत होता है। इन कविताओं में तड़प है, बेचैनी है और दूसरों का दुख बाँट लेने की छटपटाहट भी है। कवि के पास शब्द है, शिल्प है और अपनी बात कहने का सलीका़ भी है। इस लिए ये कविताएं सावनी फुहार की तरह हम तक पहुँचती है और हमें भिगोकर हराभरा कर देती हैं-

कोई पंथ नहीं, ना ही सम्प्रदाय / मानव तो बस है मानव,
उजाले में क्या फ़र्क पड़ता है / दीपक हो या लालटेन , (पृष्ठ-26)

बिना प्रेम पंगु बन मानव, लाचार / पराधीन-सा जीता है
अभाव की एक डोरी ले / पल को पल से सीता है, (पृष्ठ-30)

ईश्वर की छत्र-छाया में हर रोज़ सीखता हूँ
मैं तो हूँ एक छात्र
सफल हुआ तो ईर्ष्या का पात्र,
असफल हुआ तो दया का पात्र (पृष्ठ-52)

ये कविताएं किसी भी दुरूहता, जटिलता और बौद्दिकता से मुक्त हृदय की सहज निर्झरिणी हैं। इस लिए ये निर्बाध तरीके से पाठकों तक पहुँचती हैं और उन्हें अपने आगोश में ले लेती हैं। इन कविताओं में सोच की सहज प्रक्रिया के साथ ही विचारों की संतुलित उड़ान है। प्रकृति प्रेम से लेकर देश प्रेम की झाँकी हैं। समाज के सवालों से लेकर परम्परा और संस्कृति की अमूल्य थाती है। रिश्तों-नातों की मोहक गलियाँ है, भावनाओं की बदलियाँ हैं। गरबा का संगीत है, आगे बढ़ने का गीत है, गर्व करने लायक अतीत है। इसलिए ये कविताएं एक ख़ूबसूरत एहसास की तरह हमारे दिल में उतरती हैं और हम में ऊर्जा का संचार करती हैं। इन कविताओं में वह रोशनी है जो भटके हुए लोगों को रास्ता दिखाती है। निराश लोगों में आशा का संचार करती है और मन मे आगे बढ़ने की प्रेरणा जगती है। इस किताब के हर पन्ने पर ज़िंदगी मुस्कराती है। हम दुआ है कि कवि नरेंद्र मोदी का यह रचनात्मक सफ़र आगे भी जारी रहे।

देवमणि पाण्डेय 
बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाड़ा, 
गोकुल धाम, फ़िल्मसिटी रोड, गोरेगांव, मुम्बई-400063
 M : 98210-82126 

बुधवार, 28 मई 2014

घनश्यामदास सराफ साहित्य पुरस्कार

चित्र : बाएं से  नीला संघवी, प्रकाश कुलकर्णी, अशोक सराफ, श्रीकांत डालमिया,विश्वनाथ सचदेव, देवमणि पाण्डेय,
कुमार महादेव व्यास, सुशील कुमार व्यास

 घनश्यामदास सराफ साहित्य पुरस्कार 2014


मुम्बई की सौ साल पुरानी संस्था मारवाड़ी सम्मेलन की ओर से शनिवार 3 मई 2014 की शाम को दुर्गादेवी सराफ हाल, घनश्यामदास सराफ कॉलेज, मालाड (प), मुम्बई में आयोजित एक पुरस्कार समारोह में ‘घनश्यामदास सराफ साहित्य पुरस्कार’ प्रदान किए गए। पुरस्कार से सम्मानित साहित्यकारों के नाम हैं- देवमणि पाण्डेय (हिंदी), प्रकाश कुलकर्णी (मराठी), नीला संघवी (गुजराती) और कुमार महादेव व्यास (राजस्थानी)। जाने-माने समाजसेवी श्री महावीरप्रसाद सराफ द्वारा अपने पिता श्री घनश्यामदास सराफ की स्मृति में स्थापित इस पुरस्कार के तहत प्रत्येक रचनाकार को शाल, श्रीफल और प्रशस्ति पत्र के साथ 21000/- इक्कीस हज़ार रूपए नकद धनराशि भेंट की गई। वरिष्ठ पत्रकार एवं नवनीत के सम्पादक विश्वनाथ सचदेव ने समारोह की अध्यक्षता की। जाने-माने उद्योगपति अशोक सराफ मुख्य अतिथि थे। संस्था अध्यक्ष श्रीकांत डालमिया ने रचनाकारों और अतिथियों का स्वागत किया। महामंत्री सुशील कुमार व्यास ने आभार व्यक्त किया। समारोह में मुम्बई महानगर के कई लेखक, पत्रकार और गणमान्य लोग उपस्थित थे।


चित्र : (बाएं से दाएं)- श्रीकांत डालमिया,अशोक सराफ, देवमणि पाण्डेय, विश्वनाथ सचदेव

लोगों की फ़रमाइश पर देवमणि पांडेय ने कुछ गज़लें पेश कीं-

जो मिल गया है उससे भी बेहतर तलाश कर
क़तरे में भी छुपा है समंदर तलाश कर

हाथों की इन लकीरों ने मुझसे यही कहा
कोशिश से अपनी, अपना मुक़द्दर तलाश कर

दिल तो दिल है दिल की बातें समझ सको तो बेहतर है
दुनिया की इस भीड़ में सबसे जुदा रहो तो बेहतर है

ख़ामोशी भी एक सदा है अकसर बातें करती है
तुम भी इसको तनहाई में सुना करो तो बेहतर है

ज़माने में कहाँ कब,कौन,किसका साथ देता है
जो अपना है वही ग़म की हमें सौग़ात देता है

तू उसका शुक्र कर ऐ दिल कि वो पत्थर के सीने को
कभी धड़कन कभी नग़मा, कभी जज़्बात देता है

देवमणि पाण्डेय : 98210-82126

सोमवार, 30 अप्रैल 2012

शायर ज़फ़र गोरखपुरी की किताब : मिट्टी को हँसाना है

चित्र में [L to R] डॉ.कलीम ज़िया, अब्दुल अहद साज़, देवमणि पाण्डेय, सलमा सिद्दीक़ी, जावेद सिद्दीक़ी,
ज़फ़र गोरखपुरी, ज़मीर काज़मी, वरिष्ठ पत्रकार लाजपत राय और बेबी फ़िज़ा (mumbai 26.05.2012)

रोटी बासी लगती है स्टील की थाली में

ज़फ़र गोरखपुरी के दोहे मिट्टी के कुल्लहड़ में पेश की गई चाय की तरह हैं। इस चाय में मिट्टी की जो सोंधी गंध घुली होती है वही गंध ज़फ़र साहब के दोहों में भी है। ऐसे दोहे वही लिख सकता है जिसने किसान बनकर हल की नोंक से धरती को गुदगुदाया हो, मिट्टी को हँसाया हो।'' इन ख़यालों का इज़हार जाने-माने रंगकर्मी एवं फ़िल्म लेखक जावेद सिद्दीक़ी ने किया। शायर ज़फ़र गोरखपुरी के गीतों और दोहों की किताब 'मिट्टी को हँसाना है' के रिलीज़ के मौक़े पर अपनी राय ज़ाहिर करते हुए उन्हों ने आगे कहा- ज़फ़र साहब के दोहे हमारी सोच में ऐसे दाख़िल होते हैं जैसे साँसो में लोबान के धुँए की ख़ुशबू-

वो दिल जिसमें दर्द है उसकी ये पहचान
जल जाए तो दीप है, सुलगे तो लोबान

मरहूम कथाकार कृश्न चंदर की शरीके-हयात मोहतरमा सलमा सिद्दीक़ी ने अपने मुबारक हाथों से शायर ज़फ़र गोरखपुरी की किताब 'मिट्टी को हँसाना है' का लोकार्पण शनिवार 26 मई 2012 को भवंस कल्चरल सेंटर अंधेरी, मुम्बई में किया। सलमा आपा ने कहा- कोई इंसान अपने बीवी-बच्चों को हँसाना चाहता है तो कोई अपने यार-दोस्तों को। मगर ज़फ़र साहब ऐसे इंसान हैं जो मिट्टी को हँसाना चाहते हैं। इससे ज़फ़र साहब के रचनात्मक सरोकार का पता चलता है। प्रगतिशील लेखक संघ के मूमेंट में ज़फ़र साहब की भागीदारी की तारीफ़ करते हुए सलमा आपा ने कहा कि ज़फ़र साहब ऐसे शायर हैं जिन्होंने क़लम के तेशा से मुश्किलों के पहाड़ों को काटकर शायरी के लिए रास्ता बनाया।

मा'रूफ़ शायर अब्दुल अहद साज़ ने कहा कि ज़फ़र साहब के गीत और दोहे हिंदुस्तान के रिवायती और जदीद समाज का आईना हैं। उनके यहाँ निजी एहसास की नर्मी भी है और सामाजिक सरोकार की आग भी है। वे ज़मीन पर खड़े होकर मानवीयत का परचम लहराते हैं। मशहूर शायर देवमणि पाण्डेय ने कहा---कुछ लोगों का मानना है कि उर्दू में गीत को और हिंदी में ग़ज़ल को अभी तक वो मुक़ाम हासिल नहीं हुआ है जिसके वो हक़दार हैं। लेकिन ज़फ़र गोरखपुरी साहब ने अपने गीतों को कामयाबी की मंज़िल तक पहुँचाकर आने वाली पीढ़ी के लिए एक नायाब मिसाल पेश की है। उनके गीत दिलों को छूते हैं क्योंकि उसमें अपनी मिट्टी की ख़ुशबू, एहसास की शिद्दत और रिश्तों की सुगंध है। मिसाल के तौर पर एक गीत की चंद लाइनें देखिए-

सखी उन्होंने लिक्खा था पिछली दीवाली में
बुन रखना इक डलिया सावन की हरियाली में
रोटी बासी लगती है स्टील की थाली में
साजन खा न सकें जी भर के क्या ये ठीक लगे
ओ री सखी! ये डलिया बुनना कैसा नीक लगे 

मुशायरे में ज़मीर काज़मी, देवमणि पाण्डेय, अयाज़ गोरखपुरी, ज़फ़र गोरखपुरी, 
अब्दुल अहद साज़, दीप्ति मिश्र, सिकंदर मिर्ज़ा और प्रज्ञा विकास (mumbai 26.05.2012) 

ज़फ़र गोरखपुरी की रचनात्मकता की तारीफ़ करते हुए पांडेय जी ने कहा कि ज़िंदगी की असरदार और सच्ची तस्वीर पेश करने वाले ज़फ़र गोरखपुरी के गीत और दोहे पढ़ने-सुनने वालों के साथ फ़ौरन अपना एक नज़दीकी रिश्ता क़ायम कर लेते हैं। उर्दू-हिंदी के ख़ज़ाने में ज़फ़र गोरखपुरी के गीत एक क़ीमती इज़ाफ़ा हैं। बल्कि यूँ कहा जाए कि ये गीत ऐसे मोड़ का पता देते हैं जहाँ से गीतों का एक नया क़ाफ़िला आगे की ओर रवाना होगा। उनके दोहों में आज के दौर की दास्तान होने के साथ-साथ देहाती ज़िंदगी का उल्लास भी है और दर्द भी है-

घरवाली को रात दिन मनिआर्डर की आस
माता अपने लाल की चिट्ठी बिना उदास

डॉ.कलीम ज़िया, विधायक नवाब मलिक, समाजसेविका रेहाना उंद्रे, कवयित्री माया गोविंद, उर्दू फाउंडेशन के अध्यक्ष मीर साहब हसन और समारोह अध्यक्ष डॉ.शेख़ अबदुल्ला ने भी ज़फ़र साहब को मुबारकवार दी। बुक रिलीज़ के बाद तिर्याक़ (उर्दू मंथली) के एडीटर शायर ज़मीर काज़मी की सदारत और हिंदी-उर्दू के मशहूर शायर देवमणि पांडेय की निज़ामत में एक मुशायरा हुआ जिसे सामयीन ने बहुत पसंद किया। इसमें अयाज़ गोरखपुरी, दीप्ति मिश्र, प्रज्ञा विकास, अब्दुल अहद साज़, सिकंदर मिर्ज़ा, डॉ.कलीम ज़िया, देवमणि पांडेय, ज़मीर काज़मी और ख़ुद ज़फ़र गोरखपुरी ने ग़ज़ल-गीत-दोहे सुनाकर समाँ बाँध दिया। 

शायरा दीप्ति मिश्र ने आधुनिक रिश्तों की तरजुमानी इस तरह पेश की- 

दुखती रग पर उंगली रखकर पूछ रहे हो कैसी हो 
तुमसे ये उम्मीद नहीं थी , दुनिया चाहे जैसी हो

तुम्हे किसने कहा था, तुम मुझे चाहो, बताओ तो 
जो दम भरते हो चाहत का, तो फिर उसको निभाओ तो 

जदीदियत के रंग में ढली शायरा प्रज्ञा विकास की शायरी को सामयीन ने भरपूर दाद से नवाज़ा- 

किसी की याद की सिगरेट जलाके रोई थी
धुँए की बाँह पे सर रखके रात सोई थी

अपने सीने से लगा के मुझको बहलाती रही
घर की इक दीवार सारी रात समझाती रही

शायर देवमणि पांडेय ने उर्दू ज़बान का शुक्रिया इस तरह अदा किया-

जो मिल गया है उससे भी बेहतर तलाश कर 
क़तरे में भी छुपा है समंदर तलाश कर 

हाथों की इन लकीरों ने मुझसे यही कहा 
अपनी लगन से अपना मुक़द्दर तलाश कर

ज़फ़र गोरखपुरी ने कुछ दोहे और गीत सुनाकर रंग जमा दिया-

कच्ची, सोंधी-सोंधी मिट्टी, नीम की ठंडी छाँव
जाने उनसे कब मिलना हो, कब आना हो गाँव
मन की झोली में दुख सेरों, आशा एक छटाँक
गाड़ी धीरे-धीरे हाँक…
मेरे भैया गाड़ीवान, गाड़ी धीरे-धीरे हाँक…

जनता की फ़रमाइश पर ज़फ़र साहब ने चंद शे'र भी सुनाए-

वक़्त होठों से मेरे वो भी खुरचकर ले गया
एक तबस्सुम जो था दुनिया को दिखाने के लिए

देर तक हंसता रहा उन पर हमारा बचपना
तजरुबे आए थे संजीदा बनाने के लिए

अब्दुल अहद ‘साज़’ की ग़ज़लों में नयापन और ताज़गी थी-

मौत से आगे सोच के आना फिर जी लेना
छोटी छोटी बातों में दिलचस्पी लेना

आवाज़ों के शहर से बाबा ! क्या मिलना है
अपने अपने हिस्से की ख़ामोशी लेना 

कुल मिलाकर यह एक ऐसा बेहतरीन प्रोग्राम था जिसे सुनने वाले बरसों याद रखेंगे। इस समारोह का आयोजन उर्दू फाउंडेशन एवं भवंस कल्चर सेंटर अंधेरी (मुम्बई) की जानिब से किया गया।


आपका- 
देवमणिपांडेय 

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, 
गोकुलधाम, निकट महाराजा टावर, फिल्मसिटी रोड, 
गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210 82126

गुरुवार, 4 अगस्त 2011

चार गीत : ये है अपना हिंदुस्तान : देवमणि पाण्डेय


देवमणि पाण्डेय के चार गीत

(1) ये है अपना हिंदुस्तान

खिले हैं कैसे कैसे रंग
एक हैं सपने, एक उमंग
देखके तेवर दुनिया दंग
निराला सबसे इसका ढंग
निराली सबसे इसकी शान
ये है अपना हिंदुस्तान.....ये है इंडिया

हाकी, टेनिस, तीरंदाज़ी सबमें रंग जमाया
दिया घुमाके जब क्रिकेट में हाथ वर्ल्ड कप आया
हिम्मत और साहस के दम पर मिली नई पहचान
ये है अपना हिंदुस्तान.....ये है इंडिया

हमने सबको प्यार सिखाया शांतिदूत कहलाए
धूल चटा दें पल में उसको जो हमसे टकराए
यूँ ही तो दुनिया से हमको मिला नहीं सम्मान
ये है अपना हिंदुस्तान.....ये है इंडिया

उम्मीदों का थाम के दामन आगे बढ़ते जाएं
भ्रष्टाचार का नाम मिटा दें भारत नया बनाएं
नेकी का परचम लहराए, सच का हो गुणगान
ये है अपना हिंदुस्तान.....ये है इंडिया



(2) आगे रहेगा हिंदुस्तान

आँधी आए या तूफ़ान... आगे रहेगा हिंदुस्तान
हो चाहे कोई मैदान... आगे रहेगा हिंदुस्तान

सिर्फ़ हवाई बातों से
कुछ न होगा वादों से
लिख देंगे तक़दीर नई
अपने नए इरादों से

रिश्वत, चोरी, भ्रष्टाचार
नहीं रहेगा अत्याचार
आओ अपनी ठोकर से
तोड़ दें नफ़रत की दीवार

सूरज नया उगाएंगे
मिलकर क़दम बढ़ाएंगे
जो भी अब तक नींद में हैं
उनको हमीं जगाएंगे



(3) जो हो जाते कुर्बान

देश की ख़ातिर सरहद पर जो हो जाते क़ुर्बान
ऐसे वीरों से बढ़ती है इस धरती की शान
चलो हम उनको नमन करें
चलो हम उनको याद करें

दुर्गम राहों में भी जिनके क़दम नहीं रुकते
कभी किसी के आगे जिनके शीश नहीं झुकते
वतन की इज़्ज़त की ख़ातिर जो दे देते हैं जान
चलो हम उनको नमन करें
चलो हम उनको याद करें

बोल हिंद की जय दुश्मन से लोहा लेते हैं
भूखे-प्यासे रहकर भी सीमा पर लड़ते हैं
वार झेलते संगीनों के हँसकर सीना तान
चलो हम उनको नमन करें
चलो हम उनको याद करें

इस मिट्टी को माँ समझा है, इससे प्यार किया
जब जब देश पर संकट आया, सबकुछ वार दिया
मातृभुमि को सबसे बढ़कर देते जो सम्मान
चलो हम उनको नमन करें
चलो हम उनको याद करें


(4) मेरी शान है वतन
 


तू मेरी आन-बान मेरी शान है वतन
तुझ पर तो मेरी जान भी क़ुर्बान है वतन

तेरी हरेक चीज़ से हम सबको प्यार है
तू है तो दिल में स्वाभिमान बेशुमार है
हम सबका तू ही धर्म है, ईमान है वतन
तुझ पर तो मेरी जान भी क़ुर्बान है वतन

सुख है यहाँ समृद्दि है, किस शै की है कमी
सबकी नज़र इसीलिए तो तुझपे है जमी
ख़ुशियों से जगमगाता इक जहान है वतन
तुझ पर तो मेरी जान भी क़ुर्बान है वतन

जिस वक़्त तूने दी है सदा हम निकल पड़े
बर्फ़ीली चोटियों पे भी दुश्मन से लड़ पड़े
नज़रों में मेरी सबसे तू महान है वतन
तुझ पर तो मेरी जान भी क़ुर्बान है वतन


शनिवार, 1 जनवरी 2011

हिंदी पत्रकारिता पर पाँच किताबों का लोकार्पण


(बाएं से दाएं) मरुधरा के उपाध्यक्ष रामस्वरूप अग्रवाल, सकाल टाइम्स के विशेष संवाददाता मृत्युंजय बोस. जनसंपर्ककर्मी संजीव निगम , जी न्यूज के प्रोड्यूसर सुभाष दवे, वरिष्ठ पत्रकार-कवि और नवनीत के संपादक विश्वनाथ सचदेव, आकाशवाणी के सेंट्रल सेल्स डायरेक्टर तथा वरिष्ठ ब्रॉडकास्ट मीडियाकार मुकेश शर्मा, मरुधरा के अध्यक्ष सुरेन्द्र गाडिया, नवभारत टाइम्स, मुम्बई के वरिष्ठ पत्रकार भुवेन्द्र त्यागी, कवि-गीतकार देवमणि पाण्डेय

पत्रकारिता पर आधारित पाँच किताबों का लोकार्पण

मुम्बई की साहित्यिक सांस्कृतिक संस्था मरुधरा और सौम्य प्रकाशन द्वारा मुम्बई के प्रेसक्लब में आयोजित एक कार्यक्रम में पत्रकारिता पर आधारित पाँच किताबों का लोकार्पण आकाशवाणी के सेंट्रल सेल्स डायरेक्टर तथा वरिष्ठ ब्रॉडकास्ट मीडियाकार मुकेश शर्मा ने किया। इन किताबों के नाम हैं- बिजनेस जर्नलिज्म, जनसंपर्क, फील्ड रिपोर्टिंग गाइड, स्पेशल रिपोर्ट और फिल्मी स्कूप। इन किताबों पर अपनी राय का इज़हार करते हुए उन्होंने कहा, 'पत्रकारिता किताबें पढ़कर नहीं सीखी जा सकती। लेकिन मीडिया पर इस तरह की सारगर्भित और व्यावहारिक किताबें नये तथा युवा पत्रकारों का मार्गदर्शन कर सकती हैं। ये उन्हें ऐसे मानकों के अक्स दिखा सकती हैं, जिनसे पत्रकारिता जनता की नज़रों में पवित्र और विश्वसनीय बनती है।

प्रेसक्लब का सभागार युवा पत्रकारों से इस क़दर खचाखच भरा था कि कई वरिष्ठ पत्रकारों को बैठने के लिए सीटें कम पड़ गईं। मुकेश शर्मा ने युवा पीढ़ी की तारीफ़ करते हुए कहा, 'आज के युवा पत्रकार स्मार्ट हैं। उनके पास सूचनाओं के तमाम साधन मौजूद हैं। सूचनाएं प्राप्त करने में उन्हें कोई बाधा नहीं है। बस, जरूरत इस बात की है कि उन्हें इन सूचनाओं का अच्छी तरह से, जनोपयोगी रूप से इस्तेमाल करना आना चाहिए। मीडिया के सामने चाहे जो भी संकट आये, युवा पत्रकारों की अगर तैयारी अच्छी है, तो वे उससे पार पा सकते हैं।

कार्यक्रम का संचालन कवि-गीतकार देवमणि पांडेय ने किया। उन्होंने शुरुआत में इन किताबों के लेखकों का परिचय कराया और एक शेर के ज़रिए इनके लेखन कौशल की तारीफ़ की-

कुछ भी लिखना सरल नहीं है पूछो हम फ़नकारों से
हम सब लोहा काट रहे हैं का़गज़ की तलवरों से !


कार्यक्रम के अध्यक्ष वरिष्ठ पत्रकार-कवि और नवनीत के संपादक विश्वनाथ सचदेव ने आज की पत्रकारिता पर विचार व्यक्त करते हुए कहा- ‘आज फिर मिशनरी पत्रकारिता की जरूरत है। कोई भी अखबारी तंत्र या बाजार पत्रकारों से कुछ खास खबरें लाने या न लाने को कह सकता है, पर जन सरोकारों से जुड़ी सीधी-सच्ची खबरें लाने से कोई मना नहीं करता’। उन्होंने इस मुद्दे को आगे बढ़ाते हुए कहा, 'आज 24 घंटे के ख़बरिया चैनलों पर खबरें कितने घंटे आती हैं? जब भी टीवी खोलो, इन चैनलों पर राजू के चुटकुले, शीला की जवानी और बिग बॉस की कहानी ही दिखती है। क्या ये खबरें हैं? न्यूज चैनल ये सब परोसकर इंटरटेनमेंट चैनलों में बदल गये हैं। ख़बरों के लिए दूरदर्शन लगाना पड़ता है। बेशक उसकी खबरों में सरकारी पुट होता है, पर वे ख़बरें तो होती हैं। मरहूम शायर क़ैसर-उल-जाफ़री के एक शेर के ज़रिए विश्वनाथ जी ने युवा पीढ़ी को पत्रकारिता के धर्म की याद दिलाई-

हम आईने हैं दिखाएंगे दाग़ चेहरों के
जिसे ख़राब लगे सामने से हट जाए!


श्रोता समुदाय में अगली पंक्ति में (बाएं से दाएं)-अमर उजाला के ब्यूरो प्रमुख हरि मृदुल, सौम्य प्रकाशन की निदेशक रीना त्यागी, अमर उजाला के एसोसिएट एडीटर सुमंत मिश्र और नवभारत टाइम्स मुम्बई की उपसम्पादक कंचन श्रीवास्तव।

जी न्यूज के प्रोड्यूसर सुभाष दवे ने अपनी किताब ‘बिजनेस जर्नलिज्म’ का परिचय देते हुए कहा, 'यह एक नीरस और शुष्क विषय माना जाता है। लेकिन मैंने इसे पंचतंत्र की कहानियों की तरह एक कहानी के रूप में पेश करके सरस बनाने की कोशिश की हैं’।

वरिष्ठ जनसंपर्ककर्मी संजीव निगम ने अपनी किताब ‘जनसंपर्क’ का परिचय देते हुए कहा, 'आज जीवन के हर क्षेत्र में जनसंपर्क की जरूरत है। वह जनसंपर्क कैसा हो, किस तरह किया जाये, उसके टूल्स क्या हों, इन सभी का विवरण मैंने दिया। और अनेक केस स्टडी के साथ व्यावहारिक तरीके से दिया है।

सकाल टाइम्स के विशेष संवाददाता मृत्युंजय बोस ने अपनी किताब ‘फील्ड रिपोर्टिंग गाइड’ के बारे में बताया, 'यह युवा पत्रकारों के लिए एक मैन्युअल के रूप में है। रिपोर्टिंग करते समय ध्यान में रखी जाने वाली बातों को तो मैंने बताया ही है, तरह-तरह की खबरों के लिखने की शैली के उदाहरण भी दिये हैं।
नवभारत टाइम्स, मुम्बई के वरिष्ठ पत्रकार भुवेन्द्र त्यागी ने अपनी दो किताबें ‘स्पेशल रिपोर्ट’ और ‘फिल्मी स्कूप’ का परिचय दिया।

‘स्पेशल रिपोर्ट’ में जावेद इकबाल (फ्रीलांसर), जितेंद्र दीक्षित (स्टार न्यूज) मनोज जोशी (ए 2 जेड चैनल), नीता कोल्हाटकर (डीएनए), प्रबल प्रताप सिंह (आईबीएन 7), प्रभात शुंगलू (आईबीएन 7), प्रकाश दुबे (दैनिक भास्कर), स्वर्गीय प्रमोद भागवत (महाराष्ट्र टाइम्स), रामबहादुर राय (प्रथम प्रवक्ता के पूर्व संपादक), रवीश कुमार (एनडीटीवी), रवि शंकर रवि (नई दुनिया), शेखर देशमुख (फ्रीलांसर) और उमाशंकर सिंह (एनडीटीवी) के करियर की बेहतरीन रिपोर्ट हैं।

‘फिल्मी स्कूप’ में चंद्रकांत शिंदे (नई दुनिया), इम्तियाज अजीम (राष्ट्रीय सहारा), रूपेश कुमार गुप्ता (जी न्यूज), संदीप सिंह (महुआ), शिवानी त्रिवेदी (स्टार न्यूज), सुमंत मिश्र (अमर उजाला), विद्योत्तमा शर्मा, (बॉम्बे टाइम्स की पूर्व असिस्टेंट एडिटर) और विनोद तिवारी (फिल्मफेयर के पूर्व संपादक) के कैरियर की अनोखी एक्सक्लूसिव स्टोरीज हैं।

मरुधरा के अध्यक्ष सुरेन्द्र गाडिया ने मुख्य अतिथियों को पुष्पगुच्छ भेंट किया। संस्था के उपाध्यक्ष रामस्वरूप अग्रवाल व महामंत्री राकेश मोरारका ने लेखकों का स्वागत किया। सौम्य प्रकाशन की निदेशक रीना त्यागी ने पुष्पगुच्छ देकर इन पाँच पुस्तकों के कवर डिज़ाइनर संजय खडपे और शिव पाण्डेय का सम्मान किया तथा सबके प्रति आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम में मुम्बई के कई गणमान्य पत्रकार व लेखक मौजूद थे। मुम्बई में यह आयोजन शुक्रवार 24 दिसम्बर 2010 की शाम को सम्पन्न हुआ।



आपका
देवमणिपांडेय

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति,
कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड,
गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210-82126

गुरुवार, 1 जुलाई 2010

हम पंडितों के इश्क़ में बरबाद हो गए : मुनव्वर राना


नए मौसम के फूल के लोकार्पण समारोह में पत्रकार उपेंद्र राय, शायर मुनव्वर राना, सहारा इंडिया परिवार के डिप्टी एम.डी.ओ.पी. श्रीवास्तव, प्रकाशक नीरज अरोड़ा और शायर-संचालक देवमणि पाण्डेय (मुम्बई 21 मार्च 2009)

नए मौसम के फूल : मुनव्वर राना

बादशाहों को सिखाया है कलंदर होना

आप आसान समझते हैं मुनव्वर होना

मुनव्वर राना की शायरी में पारिवारिक रिश्तों की एक मोहक ख़ुशबू है। लफ़्ज़ों को बरतने का एक ख़ूबसूरत सलीक़ा है। अपने तजुर्बात को पेश करने का एक लासानी अंदाज है। यही ख़ासियतें उन्हें अलग और पुख़्ता पहचान देती हैं। वे अपनी मिट्टी,पानी और हवा से जुड़े हस्सास शायर हैं। वे तर्के- तआल्लुक़ात के इस दौर में भी संयुक्त परिवार का परचम लहराते हुए दिखाई पड़ते हैं – वो भी मुख़्तलिफ़ अंदाज़ में-

न कमरा जान पाता है न अँगनाई समझती है
कहां देवर का दिल अटका है भौजाई समझती है

मुनव्वर राणा का ख़ानदान विभाजन के वक़्त पाकिस्तान चला गया था। उनके पिता पं.जवाहरलाल नेहरू के आग्रह पर यहीं रह गए। इस मौज़ू पर उनका एक शेर है-

हिजरत को भूल-भालकर आबाद हो गए
हम पंडितों के इश्क़ में बरबाद हो गए

भारत-पाक विभाजन के दर्द पर मुनव्वर राणा ने एक ग़ज़ल कही है-

मुहाजिर हैं मगर हम एक दुनिया छोड़ आए हैं
तुम्हारे पास जितना है हम उतना छोड़ आए हैं

इसके ज़रिए उन्होंने एक नया रिकार्ड कायम किया है। इस ग़ज़ल में पाँच सौ शेर हैं। यानी इसे एक लम्बी नज़्म भी कह सकते हैं। कुछ दिनों पहले उन्होंने बताया कि यह तवील ग़ज़ल एक किताब की शक़्ल में ‘मुहाजिरनामा’ नाम से शाया हो गई है। इस आलेख के आख़िर में ‘मुहाजिरनामा’ से चंद अशआर आपके लिए पेश किए गए हैं।

हमारे सीनियर शायर जब हमें किताबें भेंट करते हैं तो अच्छा लगता है। शायर मुनव्वर राना ने मुझे अपनी किताब ‘घर अकेला हो गया’ दिनांक 24-11-04 को भेंट की। किताब के इस नाम के पीछे एक एहसास छुपा हुआ है। भाई राना की पांच बेटियां हैं। इनमें चार की शादी हो चुकी है। चौथी बेटी की शादी पटना (बिहार) में हुई है। एक दिन इस बेटी ने उनको एक एसएमएस भेजा ‘पापा ! आप और मम्मी सोचते होंगे कि हमारी शादी करके आप अपनी ज़िम्मेदारियों से मुक्त हो गए। मगर हम ये सोचते हैं कि अगर कुछ दिन और मम्मी-पापा की सेवा कर लेते तो बेहतर होता।’ इसे पढ़कर राना को देर रात तक नींद नहीं आई। फिर उन्होंने बेटी को एक शेर एसएमएस किया-

ऐसा लगता है कि जैसे ख़त्म मेला हो गया
उड़ गईं आंगन से चिड़ियां घर अकेला हो गया

इसी मौज़ू पर लिखा हुआ उनका एक शेर और भी मक़बूल हुआ-

ये बच्ची चाहती है और कुछ दिन मां को ख़ुश रखना
ये कपड़ो की मदत से अपनी लम्बाई छुपाती है

जनवरी में एक दिन राना साहब से बात हुई। बोले- यार सर्दियों में बीवी से रिश्ते बड़े अच्छे हो जाते हैं क्योंकि ज्य़ादातर समय मैं घर पर ही रहता हूँ। वैसे कभी-कभी मुझे सर्दी में भी गर्मी लगती है। एक बार लालक़िले के मुशायरे में जनवरी में कुर्ता-पायजामा पहनकर चला गया। बाक़ी शायर टाई-शूट में या कम्बल ओढ़कर आए थे। मेरे पीछे फुसफुसाहट शुरु हो गई – ‘देखो साला पीकर आया है, इसलिए इसे ठंड नहीं लग रही है।’

पीने से तो नहीं मगर पान पराग ज़्यादा खाने से मुनव्वर राना बीमार पड़ गए। डाक्टर के पास गए। डाक्टर ने कहा-‘अगर जीना चाहते हो तो गुटका (पान पराग) खाना छोड़ दो ।’ राना बोले, डाक्टर साहब ! अभी-अभी एक मतला हुआ है। सुनिए-

ये ज़हर ए जुदाई हमें पीना भी पड़ेगा
क्या सारे नशे छोड़कर जीना भी पड़ेगा

डाक्टर हँसने लगा। यानी दूसरों को हँसाने का हुनर राना साहब को मालूम है। दुष्यंत कुमार ने कहा था - मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूँ, वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूँ । सचमुच राना के लिए ग़ज़ल अब उनका ओढ़ना बिछौना बन गई है । 21 मार्च 2009 को मुंबई के पांच सितारा होटल सहारा स्टार में उनकी नई किताब ‘नए मौसम के फूल’ का लोकार्पण हुआ। उन्होंने बताया- ‘पहले घर से निकालता था तो देखता था – कौन सा शूट रखना है, कौन सा कुर्ता पायज़ामा रखना है । अब घर से बाहर जाता हूँ तो देखता हूँ कौन सी दवा रखनी है, कौन सी टेबलेट लेनी है।’ ज़िंदगी के इस मुकाम को उन्होंने ग़ज़ल में इस तरह दर्ज किया –

हमारे कुछ गुनाहों की सज़ा भी साथ चलती है
मैं अब तनहा नहीं चलता दवा भी साथ चलती है
अभी ज़िंदा है मां मेरी मुझे कुछ भी नहीं होगा
मैं जब घर से निकालता हूँ दुआ भी साथ चलती है

मुनव्वर राना इस समय मुशायरों के सुपरहिट शायर हैं। पूरी दुनिया में उनके प्रशंसक मौजूद हैं। शायद इसलिए कि वे हर उम्र और हर वर्ग के आदमी को अपनी शायरी का किरदार बना लेते हैं। बुज़ुर्गों की शान में उनके फ़न का कमाल देखिए-

हम सायादार पेड़ ज़माने के काम आए
जब सूखने लगे तो जलाने के काम आए
तलवार की मियान कभी फेंकना नहीं
मुमकिन है दुश्मनों को डराने के काम आए

एक अच्छा शायर कहीं न कहीं अपने फ़न के ज़रिए अपनी शाख्सियत से भी रुबरु होता है । राना साहब भी कहते हैं-

ख़ुश ख़ुश दिखाई देता हूँ बीमार मैं भी हूँ
दुनिया को क्या पता कि अदाकार मैं भी हूँ
करता रहा हूँ अपने मसाइल से रोज़ जंग
छोटे से इक कबीले का सरदार मैं भी हूँ


उनके कुछ प्रशंसकों का कहना है कि राना साहब तो फ़कीर हैं। वैसे उनकी शायरी मैं फ़कीराना अदा भी दिखाई देती है –


आए हो तो इक मुहरे-गदागर भी लगा दो
इस चांद से माथे पे ये झूमर भी लगा दो
अजदाद की ख़ुशबू मुझे जाने नहीं देगी
इस पेड़ के नीचे मेरा बिस्तर भी लगा दो

सीधे साधे लफ़्ज़ों में गहरी बात कह देना शायरी में बहुत बड़ा हुनर माना जाता है। मुनव्वर राना इस हुनर के बाकमाल शायर हैं –

कलंदर संगमरमर के मकानों में नहीं मिलता
मैं असली घी हूँ बनियों की दुकानों में नहीं मिलता

ग़ज़ल में कैसे कैसे रुख निकाले हैं मुनव्वर ने
किसी भी शेर को पढ़िए तो तहदारी निकलती है


कमाल का ये हुनर हासिल कैसे होता है ? एक जगह मुनव्वर राना ने इज़हारे-ख़याल किया है –

ख़ुद से चलके नहीं ये तर्ज़े-सुख़न आया है
पांव दाबे हैं बुज़ुर्गो के तो ये फ़न आया है


मानी की गहराई, एहसास की ऊँचाई और अल्फाज़ की नरमाई के चलते मुनव्वर राना अक्सर ऐसे शेर कह जाते हैं जो सुनने-पढ़ने वालों को एक बार में ही याद होकर उनके वजूद का हिस्सा बन जाते हैं,मसलन -
भुला पाना बहुत मुश्किल है सब कुछ याद रहता है
मोहब्बत करने वाला इस लिए बरबाद रहता है

बहुत दिन से तुम्हें देखा नहीं है
ये आंखों के लिए अच्छा नहीं है

मोहब्बत में तुम्हें आँसू बहाना तक नहीं आया
बनारस में रहे और पान खाना तक नहीं आया


एक अच्छा शायर अगर अच्छा इंसान भी हो तो सोने में सुहागा। राना साहब अच्छे, विनम्र और मिलनसार इंसान हैं। वे हमेशा ख़ुश रहते हैं और दूसरों को भी ख़ुश देखना चाहते हैं।अगर उनके साथ दो-चार दोस्त भी हों तो प्रति मिनट एक ठहाके की गारंटी है। आइए मिलकर दुआ करें कि ऊपर वाला ऐसे नेक इंसान और उम्दा शायर को लम्बी उम्र बख़्शे। राना साहब का ही शेर है-

मौला ये तमन्ना है कि जब जान से जाऊँ
जिस शान से आया हूँ उसी शान से जाऊँ

पेश हैं मुहाजिरनामा से चंद अशआर-

मुहाजिर हैं मगर हम एक दुनिया छोड़ आए हैं
तुम्हारे पास जितना है हम उतना छोड़ आए हैं

कई आँखें अभी तक ये शिकायत करती रहती हैं
कि हम बहते हुए काजल का दरिया छोड़ आए हैं

कहानी का ये हिस्सा आज तक सब से छुपाया है
कि हम मिट्टी की ख़ातिर अपना सोना छोड़ आए हैं

नई दुनिया बसा लेने की इक कमज़ोर चाहत में
पुराने घर की दहलीज़ों को सूना छोड़ आए हैं

अक़ीदत से कलाई पर जो इक बच्ची ने बाँधी थी
वो राखी छोड़ आए हैं वो रिश्ता छोड़ आए हैं

किसी की आरज़ू के पाँवों में ज़ंजीर डाली थी
किसी की ऊन की तीली में फंदा छोड़ आए हैं

पकाकर रोटियाँ रखती थी माँ जिसमें सलीक़े से
निकलते वक़्त वो रोटी की डलिया छोड़ आए हैं

जो इक पतली सड़क उन्नाव से मोहान जाती है
वहीं हसरत के ख़्वाबों को भटकता छोड़ आए हैं

यक़ीं आता नहीं, लगता है कच्ची नींद में शायद
हम अपना घर गली अपना मोहल्ला छोड़ आए हैं

हमारे लौट आने की दुआएँ करता रहता है
हम अपनी छत पे जो चिड़ियों का जत्था छोड़ आए हैं
हमें हिजरत की इस अन्धी गुफ़ा में याद आता है
अजन्ता छोड़ आए हैं एलोरा छोड़ आए हैं

सभी त्योहार मिलजुल कर मनाते थे वहाँ जब थे
दिवाली छोड़ आए हैं दशहरा छोड़ आए हैं

हमें सूरज की किरनें इस लिए तक़लीफ़ देती हैं
अवध की शाम काशी का सवेरा छोड़ आए हैं

गले मिलती हुई नदियाँ गले मिलते हुए मज़हब
इलाहाबाद में कैसा नज़ारा छोड़ आए हैं

हम अपने साथ तस्वीरें तो ले आए हैं शादी की
किसी शायर ने लिक्खा था जो सेहरा छोड़ आए हैं

वज़ारत भी हमारे वास्ते कम मरतबा होगी
हम अपनी माँ के हथों में निवाला छोड़ आए हैं

अगर लिखने पे आ जाएं तो स्याही ख़त्म हो जाए
कि तेरे पास आए हैं तो क्या क्या छोड़ आए हैं

आपका-

देवमणि पांडेय : बी-103, दिव्य स्तुति, 
कन्या पाडा, गोकुलधाम, फ़िल्म सिटी रोड, 
गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210 82126 

मंगलवार, 1 जून 2010

कथाकार आबिद सुरती उर्फ़ ढब्बूजी पचहत्तर के हुए

देवमणि पाण्डेय, आर.के.पालीवाल, आबिद सुरती, दिनकर जोशी, साजिद रशीद, प्रतिमा जोशी, सुधा अरोड़ा


आबिद सुरती का सम्मान समारोह 

नमक-काली मिर्च जैसे खिचड़ी बाल, बेतरतीब दाढ़ी, आदिदास या नाइकी छाप एक 'हेप' टीशर्ट या टॉप, कमर पर कसी चौड़ी बेल्ट में अटका सनग्लास का वॉलेट, घिसी फेडेड जीन्स और एक खूबसूरत सा झोला लिए पीठ बिल्कुल सीधी रखकर अठारह साल के लड़के के अंदाज़ में झूमता हुआ चलता सत्तर पार का एक लहीम सहीम, कोई हरफनमौला शख्स नज़र आ जाए तो समझ लें कि वह आबिद सुरती है जिनके भीतर का ढब्बू जी हमेशा उनके साथ साथ इतराता चलता है। आबिदजी का यह हुलिया बयान किया कथाकर सुधा अरोड़ा ने। आबिद सुरती के 75 वें जन्म दिन के अवसर पर आबिद सुरती का सम्मान समारोह और उन्हीं पर केंद्रित शब्दयोग के विशेषांक का लोकार्पण हिन्दुस्तानी प्रचार सभा मुम्बई के सभागार में 28 मई 2010 को आयोजित हुआ। इस अवसर पर समाज सेवी संस्था ‘योगदान’ के सचिव आर.के.अग्रवाल ने आबिद सुरती की पानी बचाओ मुहिम के लिये दस हजार रुपये का चेक भेंट किया। सम्मान स्वरूप उन्हें शाल और श्रीफल के बजाय उनके व्यक्तित्व के अनुरूप कैपरीन (बरमूडा) और रंगीन टी शर्ट भेंट किया गया। आबिद ने पूछा- इसे पहनाएगा कौन ? तो श्रोता मुक्त भाव से हँस पड़े। संचालक देवमणि पांडेय ने जवाब दिया- बच्चे बड़े हो जाते हैं तो अपने कपड़े ख़ुद पहनते हैं ! सभागार में ठहाका फूट पड़ा।

कार्यक्रम की शुरुआत में आर.के.पालीवाल की आबिद सुरती पर लिखी लम्बी कविता ‘आबिद और मैं’ का पाठ फिल्म अभिनेत्री एडीना वाडीवाला ने किया। बीस-बाईस साल की दिखने वाली इस अभिनेत्री ने जब 75 साल के आबिद को ‘आबिद भाई’ कहकर सम्बोधित किया तो श्रोताओं में हँसी फूट पड़ी। एडीना की टूटी-फूटी हिंदी में ऐसी मासूमियत घुली थी कि सुनने वालों को काफ़ी मज़ा आया। सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार शरद जोशी की एक चर्चित रचना ‘मैं, आबिद और ब्लैक आउट’ का पाठ उनकी सुपुत्री एवं सुपरिचित अभिनेत्री नेहा शरद ने स्वर्गीय शरद जोशी के अंदाज़ में प्रस्तुत करके हास्य-व्यंग्य का अदभुत महौल रच दिया।


आर.के.पालीवाल और आबिद सुरती

संचालक देवमणि पांडेय ने आबिद सुरती को घुमक्कड़, फक्कड़ और हरफ़नमौला रचनाकार बताते हुए निदा फ़ाज़ली के एक शेर के हवाले से उनकी शख़्सियत को रेखांकित किया-

हर आदमी मे होते हैं दस बीस आदमी
जिसको भी देखना हो कई बार देखना


समाज सेवी संस्था ‘योगदान’ की त्रैमासिक पत्रिका शब्दयोग के इस विषेशांक का परिचय कराते हुए इस अंक के संयोजक प्रतिष्ठित कथाकार आर. के. पालीवाल ने कहा कि आबिद सुरती बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। कथाकार और व्यंग्यकार होने के साथ ही उन्होंने कार्टून विधा में महारत हासिल की है, पेंटिंग मे नाम कमाया है, फिल्म लेखन किया है और ग़ज़ल विधा में भी हाथ आजमाये हैं। ‘धर्मयुग’ जैसी कालजयी पत्रिका में 30 साल तक लगातार ‘कार्टून कोना ढब्बूजी’ पेश करके रिकार्ड बनाया है। इसीलिये इस अंक का संयोजन करने में भी काफी मशक्कत करनी पड़ी है क्योंकि आबिद सुरती को समग्रता मे प्रस्तुत करने के लिये उनके सभी पक्षों का समायोजन करना ज़रूरी था।

आबिद सुरती से सवाल पूछते हुए वरिष्ठ गुजराती साहित्यकार दिनकर जोशी

हिंदी साहित्यकार श्रीमती सुधा अरोड़ा ने आबिद सुरती से जुड़े कुछ रोचक संस्मरण सुनाये। उन्होंने ‘हंस’ में छपी आबिद जी की चर्चित एवम् विवादास्पद कहानी ‘कोरा कैनवास’ की आलोचना करते हुए कहा कि आबिद जैसी नेक शख़्सियत से ऐसी घटिया कहानी की उम्मीद नही थी। उर्दू साहित्यकार साजिद रशीद और मराठी साहित्यकार श्रीमती प्रतिमा जोशी ने भी आबिद जी की शख़्सियत पर प्रकाश डाला। वरिष्ठ गुजराती साहित्यकार दिनकर जोशी ने आबिद सुरती के साथ बिताये लम्बे साहित्य सहवास को याद करते हुए कहा कि आबिद पिछले कई सालों से अपने निराले अंदाज में लेखन मे सक्रिय हैं। यही उनके स्वास्थ्य एवम बच्चों जैसी चंचलता और सक्रियता का भी राज़ है।
श्रोताओं के प्रश्नों का उत्तर देते हुए आबिद सुरती


श्रोताओं के प्रश्नों का उत्तर देते हुए आबिद सुरती ने कहा कि मेरे सामने हमेशा एक सवाल रहता है कि मुझे पढ़ने के बाद पाठक क्या हासिल करेंगे। इसलिए मैं संदेश और उपदेश नहीं देता। आजकल मैं केवल प्रकाशक के लिए किताब नहीं लिखता और महज बेचने के लिए चित्र नहीं बनाता। मेरी पेंटिंग और मेरा लेखन मेरे आत्मसंतोष के लिए है। भविष्य में जो लिखूंगा अपनी प्रतिबद्धता (कमिटमेंट) के साथ लिखूंगा। श्रोताओं की फरमाइश पर आबिद जी ने अपनी एक ग़ज़ल का पाठ किया-

साथ तेरे है वक़्त भी तो ग़म नहीं
दिन कभी तो रात मेरी जेब में है
है न रोटी दो वक़्त की आबिद मगर
जहां सारा आज तेरी जेब में है


सुनकर सभागार में सन्नाटा छा गया। न कोई वाह हुई और न कोई आह हुई। इस सन्नाटे को तोड़ते हुए संचालक देवमणि पांडेय ने कहा कि आबिद जी की ग़ज़ल सुनकर मुनव्वर राना का शेर याद आ गया –

ग़ज़ल तो फूल से बच्चों की मीठी मुस्कराहट है
ग़ज़ल के साथ इतनी रुस्तमी अच्छी नहीं होती


और सन्नाटा ठहाकों की गूँज में खो गया।
इस आयोजन में आबिद सुरती के बहुत से पाठकों एवम् प्रशंसकों के साथ मुंबई के साहित्य जगत से कथाकार ऊषा भटनागर, कथाकार कमलेश बख्शी, कथाकार सूरज प्रकाश , कवि ह्रदयेश मयंक, कवि रमेश यादव, कवि बसंत आर्य, हिंदी सेवी जितेंद्र जैन (जर्मनी), डॉ.रत्ना झा, ए.एम.अत्तार और चित्रकार जैन कमल मौजूद थे। प्रदीप पंडित (संपादक: शुक्रवार), डॉ. सुशील गुप्ता (संपादक: हिंदुस्तानी ज़बान), मनहर चौहान (संपादक: दमख़म), डॉ. राजम नटराजन पिल्लै (संपादक: क़ुतुबनुमा), दिव्या जैन (संपादक: अंतरंग संगिनी), मीनू जैन (सह संपादक: डिग्निटी डाइजेस्ट) ने भी अपनी उपस्थिति से कार्यक्रम की गरिमा बढ़ाई ।


आपका-

देवमणि पांडेय

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, 
कन्या पाडा, गोकुलधाम, फ़िल्म सिटी रोड, 
गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210 82126 

रविवार, 21 मार्च 2010

शायरी की एक शाम : डॉ.रचना आशा के नाम

डॉ.रचना आशा, कवि देवमणि पाण्डेय, सहारा इंडिया के डीएमडी ओ.पी. श्रीवास्तव, शायर मुनव्वर राना

डॉ.रचना आशा का जन्मदिन 21 मार्च को है। डॉ.रचना के जीवनसाथी उपेन्द्र राय सहारा समय (दिल्ली) में न्यूज़ डायरेक्टर हैं। मित्र उपेंद्र के जीवन का मूलमंत्र है- ‘बड़े लोग बड़ा काम नहीं करते, वे हर काम को अलग ढंग से करते हैं’। इसी नज़रिए के चलते उपेंद्र ने पिछले साल अपनी जीवन संगिनी डॉ.रचना का जन्मदिन अलग ढंग से मनाया। उन्होंने अपनी शरीक-ए-हयात को एक नायाब तोहफा दिया। ‘शायरी की एक शाम’ डॉ.रचना के नाम कर दी। उनकी तीन वर्षीय बेटी ऊर्जा अक्षरा ने जन्मदिन का केट काटकर ‘माँ’ लफ़्ज़ को सार्थकता प्रदान की । ‘माँ’ पर शायरी लिखकर पूरी दुनिया में मशहूर हो चुके शायर मुनव्वर राना को काव्यपाठ के लिए इस मौक़े पर ख़ास तौर से आमंत्रित किया गया था। मुनव्वर राना की रचनाधर्मिता और सरोकारों पर रोशनी डालने की ज़िम्मेदारी उपेंद्र ने मुझे सौंप दी।

मुनव्वर राना का परिचय कराते हुए मैंने कहा कि उनकी शायरी में रिश्तों की एक ऐसी सुगंध है जो हर उम्र और हर वर्ग के आदमी के दिलो दिमाग़ पर छा जाती है । शायरी का पारम्परिक अर्थ है औरत से बातचीत । अधिकतर शायरों ने ‘औरत’ को सिर्फ़ महबूबा समझा । मगर मुनव्वर राना ने औरत को औरत समझा । औरत जो बहन, बेटी और माँ होने के साथ साथ शरीके-हयात भी है । उनकी शायरी में रिश्तों के ये सभी रंग एक साथ मिलकर ज़िंदगी का इंद्रधनुष बनाते हैं । वे हिंदुस्तान के ऐसे अज़ीम-ओ-शान शायर हैं जिसने ‘माँ’ की शख़्सियत को ऐसी बुलंदी दी है जो पूरी दुनिया में बेमिसाल है। अपने डेढ़ घंटे के काव्यपाठ में मुनव्वर राना ने माँ पर कई शेर सुनाए-

ऐ अँधेरे देख ले मुँह तेरा काला हो गया
माँ ने आँखें खोल दीं घर में उजाला हो गया

ये ऐसा क़र्ज़ है जो मैं अदा कर ही नहीं सकता
मैं जब तक घर न लौटूं मेरी माँ सजदे में रहती है

किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकां आई
मैं घर में सबसे छोटा था मेरे हिस्से में माँ आई

इस तरह मेरे गुनाहों को धो देती है
माँ बहुत गुस्से में हो तो रो देती है

मैंने रोते हुए पोंछे थे किसी दिन आँसू
मुद्दतों माँ ने धोया नहीं दुपट्टा अपना

जब भी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती है
माँ दुआ करती हुई ख़्वाब में आ जाती है

अभी ज़िंदा है माँ मेरी मुझे कुछ भी नहीं होगा
मैं घर से जब निकलता हूँ दुआ भी साथ चलती है


पिछले साल जब 21 मार्च 2009 को मुम्बई के पाँच सितारा होटल सहारा स्टार में जब यह आयोजन हुआ तो उपेंद्र राय की इस ख़ुशी में शरीक होने के लिए लखनऊ से सहारा इंडिया के डिप्टी एम.डी. ओ.पी.श्रीवास्तवजी पधारे तो मुम्बई से सहारा इंडिया के डॉयरेक्टर अभिजीत सरकार भी तशरीफ़ लाए। इस कार्यक्रम में उपस्थित कुछ प्रमुख लोगों में कुछ के नाम है- संजीव श्रीवास्तव (सम्पादक : बीबीबीसी इंडिया), अशोक कक्कड़ (ग्रुपप्रेसीडेंट : इंडिया बुल्स), जगदीश चंद्रा (सीईओ : ईटीवी), उमेश कामदार (निदेशक : माई डॉलर्स स्टोर्स), अभिनेत्री पूनम ढिल्लन, अभिनेत्री उर्वशी ढोलकिया, अभिनेत्री हेज़ल, अभिनेता सुशांत सिह, हास्यसम्राट राजू श्रीवास्तव और सुनीलपाल। इनके साथ ही एक दर्जन से अधिक आई.ए.एस. तथा आई.आर.एस. अधिकारी भी उपस्थित थे।

इंदौर में उपेंद्र राय को भरोसा युवा पत्रकार सम्मान

दस साल पहले राष्ट्रीय सहारा (लखनऊ) से अपना कैरियर शुरू करने वाले उपेंद्र राय निरंतर प्रगति के सोपान तय करते हुए आज सहारा मीडिया के सम्पादक समाचार निदेशक हैं । ओशो के चिंतन को पसंद करने वले उपेंद्र राय उनके इस विचार से मुतास्सिर हैं कि कुछ नया करने के लिए जगह नहीं मन बदलने की ज़रूरत है । 11 फरवरी 2010 को हम लोग फिर आमने-सामने थे, यानी- डॉ.रचना, बेटी ऊर्जा अक्षरा, उपेंद्र, मैं और भाई मुनव्वर राणा। इंदौर के अभय प्रशाल स्टेडियम में गोपालदास नीरज, बेकल उत्साही और अनवर जलालपुरी जैसे वरिष्ठ शायरों तथा लगभग दस हज़ार लोगों की मौज़ूदगी में उपेंद्र राय को भरोसा युवा पत्रकार सम्मान से नवाज़ा गया । समारोह संचालन की ज़िम्मेदारी मुझे सौंपी गई। मंच पर चार केंद्रीय मंत्री उपस्थिति थे- बलराम जाखड़, फ़ारूक अब्दुल्ला, सलमान ख़ुर्शीद और सत्यप्रकाश जायसवाल। मेरा तवारूफ़ कराते हुए शायर मुनव्वर राणा ने पब्लिक के सामने कह दिया- देवमणि पाण्डेय मेरे अज़ीज़ दोस्त होने के साथ ही मेरे रिश्तेदार भी हैं क्योंकि इनके ज़िले सुलतानपुर में मेरा समधियाना है। इसी मंच पर भरोसा सम्मान वरिष्ठ शायर जावेद अख़्तर को और भरोसा युवा शायर सम्मान डॉ.तारिक क़मर (लखनऊ) को प्रदान किया गया। इसकी चर्चा फिर कभी। फिलहाल आईआईटी मुम्बई से बॉयोटेक्नॉलाजी में एमएससी एवं पीएचडी तथा जेआईआईटी (नोएडा) में बॉयोटेक्नॉलाजी की असिस्टेंट प्रोफेसर और संवेदनशील कवयित्री डॉ.रचना को जन्मदिन की बहुत-बहुत बधाई।

आपका
देवमणिपांडेय

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति,
कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड,

गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210-82126

बुधवार, 10 मार्च 2010

कवयित्री रेखा मैत्र यूएस के सम्मान में मुम्बई में काव्य संध्या

राम गोविंद, अरविंद राही , डॉ बोधिसत्व, अरुण अस्थाना, रेखा मैत्र, माया गोविंद, हैदर नज़्मी, देवमणि पाण्डेय

अमेरिका से रेखा मैत्र ने मेल किया- आपसे मिलने मुम्बई आ रही हूँ। मैंने वरिष्ठ कवयित्री माया गोविंद जी को फोन लगाया। माया जी जोश में आ गईं- मेरे घर पर शनिवार को एक गोष्ठी रख लो। कई दिन से मेरी तबियत ठीक नहीं है। तुम लोगों की कविताएं सुनकर मेरी तबियत सुधर जाएगी।  कवयित्री रेखा मैत्र के सम्मान में जीवंती फाउंडेशन की ओर से जुहू में माया गोविंद जी के आवास पर एक काव्य संध्या का आयोजन हुआ। बनारस (उ.प्र.) में जन्मीं रेखा मैत्र की उच्च शिक्षा सागर (म.प्र.) में हुई। मुम्बई में कुछ साल अध्यापन करने के बाद मेरीलैण्ड (अमेरिका) में बस गईं। यहाँ भाषा के प्रचार-प्रसार से जुड़ी संस्था ‘उन्मेष’ के साथ सक्रिय हैं। रेखा जी के अब तक दस कविता संकलन प्रकाशित हो चुके हैं।यह हमारी पहली मुलाक़ात थी। रेखाजी उमंग, ऊर्जा और जोश से भरपूर हैं। उन्होंने अपने जीवंत व्यहार और संवेदनशील कविताओं से सबको मंत्रमुग्ध कर दिया।
उनकी एक कविता चिड़िया देखिए-

इस मटियाली इमारत में
चिड़िया भी सहमी सहमी घूम रही है !
गोया इसे भी डर है कि
कहीं इसे भी क़ैद न कर लिया जाए !
अपने पंखों का अहसास भूल ही गई है शायद !

श्रीमती बॉबी, सुमीता केशवा, रेखा मैत्र, माया गोविंद, कविता गुप्ता, उमा अरोड़ा

अस्वस्थ होने के बावजूद माया गोविंद ने तरन्नुम में ग़ज़ल सुनाकर सबको भावविभोर कर दिया-

सूनी आँखों में जली देखीं बत्तियाँ हमने
जैसे घाटी में छुपी देखीं बस्तियाँ हमने
अब भटकते हैं य़ूँ सहरा में प्यास लब पे लिए
हाय क्यूँ बेच दी सावन की बदलियाँ हमने


समकालीन हिंदी कविता के जाने-माने हस्ताक्षर डॉ.बोधिसत्व ने ‘तमाशा’ कविता का पाठ किया।कुछ पंक्तियाँ देखिए-


तमाशा हो रहा है
और हम ताली बजा रहे हैं
मदारी साँप को दूध पिला रहा हैं
हम ताली बजा रहे हैं
अपने जमूरे का गला काट कर
मदारी कह रहा है-'ताली बजाओ जोर से'
और हम ताली बजा रहे हैं



कई बड़ी फ़िल्में और धारावाहिक लिख चुके प्रतिष्ठित फ़िल्म लेखक राम गोविंद शायर भी हैं, इस बात को सिर्फ़ उनके यार-दोस्त ही जानते हैं। लीजिए उनका शायराना अंदाज़ देखिए-

वो समझते थे दिल की जाँ सा है
क्या पता था कि वो जहाँ सा है
आह की हमसे बड़ी भूल हुई
वो समझते थे बेज़ुबाँ सा है

टाइम्स म्यूज़िक द्वारा जारी सूफ़ी अलबम ‘रूबरू’ से लोक प्रिय हुए युवा शायर हैदर नज़्मी ने एक बेहतर नज़्म पेश करने के साथ ही ग़ज़ल सुनाकर समाँ बाँधा-

तुम्हें इस दिल ने जब सोचा बहुत है
हँसा तो है मगर रोया बहुत है
मुझे अब ज़िंदगी भर जागना है
कि मुझपे ख़्वाब का क़र्ज़ा बहुत है

कवि-गीतकार देवमणि पाण्डेय ने भी ग़ज़ल सुनाकर इस ख़ूबसूरत सिलसिले को आगे बढ़ाया-

इस ग़म का क्या करें हम तनहाई किससे बाँटें
जो भी मिली है तुमसे रुसवाई किससे बाँटें
तेरी मेरी ज़मीं तो हिस्सों में बँट गई है
यह दर्द की विरासत मेरे भाई किससे बाँटें


कथाकार अरुण अस्थाना ने सामयिक कविता का पाठ किया। श्रीमती सुमीता केशवा ने औरत के अस्तित्व पर और कविता गुप्ता ने तितलियों के तितलाने पर कविता सुनाई। अनंत श्रीमाली ने व्यंग्य कविता और अरविंद राही ने ब्रजभाषा के छंद सुनाए। जीवंती फाउंडेशन की ओर से श्रीमती बॉबी ने रेखा मैत्र का पुष्पगुच्छ से स्वागत किया। श्रीमती माया गोविंद ने रेखा जी को अपना काव्य संकलन भेंट किया। इस अवसर पर श्रीमती उमा अरोड़ा और श्रीमती कुमकुम मिश्रा अतिथि के रूप में मौजूद थीं।सॉरी ! इस बार भी मैं अपने प्रिय मित्र नीरज गोस्वामी और चंद्रकांत जोशी को आमंत्रित करना भूल गया।आशा है हमेशा की तरह इस बार भी ये लोग मुझे माफ़ कर देंगे।

आपका
देवमणिपांडेय

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति,
कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड,
गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210-82126

गुरुवार, 24 दिसंबर 2009

नए साल की शुभकामनाएं : देवमणिपांडेय



नए साल की शुभकामनाएं !


आंखों में अपनी हैं आशा की किरणें
चाहत के सुर धड़कनों में सजाएं
इक दिन मिलेगी वो सपनों की दुनिया
जादू उमंगों का दिल में जगाएं

बादल में बिजली है, सूरज में आभा
हिम्मत हवाओं में सागर में लहरें
मुश्किल नहीं कुछ अगर ज़िद है मन में
चलतें रहें बस कहीं भी ना ठहरें

नज़रों में झिलमिल सितारे सजाकर
नई रोशनी से गगन जगमगाएं

हम कौन हैं ! क्या है हसरत हमारी
लाज़िम है खु़द को भी पहचान लें हम
अगर हौसला है रगों में हमारी
तो मंज़िल पे पहु्चेंगे, ये जान लें हम

कड़ी धूप हो, पर न पीछे हटेंगें
ये एहसास हम रास्तों को दिलाएं

नए साल की शुभकामनाएं !



आपका-

देवमणिपांडेय

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति,
कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड, 
गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210-82126