सोमवार, 8 जून 2020

अंकित चहल का मुक्तक संग्रह इंसान बिकता है


अगर तुम साथ हो तो ज़िंदगी आसान होती है

हिंदी काव्य मंच के लोकप्रिय कवि अंकित चहल विशेष के मुक्तक संग्रह का नाम है- "इंसान बिकता है"। मुक्तक एक बेहद लोकप्रिय काव्य विधा है। चार लाइन की इस कविता को सुनकर श्रोता और पढ़कर कवि बहुत जल्दी मुक्त हो जाते हैं मगर इसका असर दिलो-दिमाग़ पर बहुत देर तक रहता है। यह काव्यात्मक अभिव्यक्ति का एक ऐसा तोहफ़ा है जिसकी एक-एक बूंद में समंदर समाया रहता है-

ज़रा सी ख्व़ाहिशों में डूबकर इंसान बिकता है 
तरक्की ख़ून रोती है यहां ईमान बिकता है 
ग़ुलामी भोगती हैं आने वाली पीढ़ियां उसकी, 
अगर गद्दी की ख़ातिर मुल्क का सुल्तान बिकता है

मुक्तक में प्रायः पहली, दूसरी और चौथी पंक्ति तुकांत होती है। आप जो भी कहना चाहते हैं, पहली और दूसरी पंक्ति में उसकी भूमिका पेश की जाती है। तीसरी पंक्ति में किसी बड़े सत्य या रहस्य की तरफ़ इशारा किया जाता है। चौथी पंक्ति में जैसे ही यह रहस्य खुलता है, सुनने वाला उछल पड़़ता है। काव्य मंचों पर भी मुक्तक को भरपूर दाद मिलती है कवि अंकित चहल ने अपने मुक्तकों के सृजन में इसी शैली का असरदार इस्तेमाल किया है -

मनोहर कल्पनाओं के नए प्रतिमान गढ़ बैठे 
ज़रा दर्पण निहारा और हम भगवान गढ़ बैठे 
ये घर दौलत धमक रुतबा ये सब मेरी बदौलत है, 
ये ऐसा झूठ है जिस पर सभी अभिमान गढ़ बैठे 

अंकित चहल के मुक्तकों का जो संसार है, उसमें घर परिवार है। रिश्ते-नातों की बदलती दुनिया है, भूख है, ग़रीबी है, तबाही है और सरहद पर तैनात सिपाही है -

किसी के पांव जलते हैं किसी के पांव गलते हैं 
वतन के वास्ते लेकिन बिना ठहरे वो चलते हैं 
उन्हीं के दम से ही ऊंचा रहा है भाल भारत का, 
असंभव कुछ नहीं रहता सिपाही जब निकलते हैं 

अंकित चहल के मुक्तकों में मुहब्बत की एक ऐसी दुनिया है  जिसमें दर्द, तड़प, बेचैनी है। बिछड़ने की कसक है, मिलने की उम्मीद है और भुलाए जाने का शिकवा भी है-

निशां अश्कों के, गालों से मिटाए क्यों नहीं जाते 
तड़प के, दर्द के क़िस्से सुनाए क्यों नहीं जाते 
जो मुझको भूलकर ख़ुश हैं उन्हें मालूम हो कैसे 
वो बरबस याद आते हैं भुलाए क्यों नहीं जाते

अंकित चहल के यहां घर-आंगन है, महावर, चूड़ियां, कंगन है, अपने त्याग, प्रेम और समर्पण के साथ नारी है, घर को सजाने वाली पत्नी है मगर एक ऐसी ख़ुद्दार औरत की मौजूदगी भी है जिसके साथ चलने से मर्द की ज़िन्दगी आसान हो जाती है-

ये सच है आदमी की औरत से ही पहचान होती है
ये औरत त्याग की मूरत, गुणों की ख़ान होती है
मैं तुमसे कह नहीं सकता मगर महसूस कर लेना,
अगर तुम साथ हो तो ज़िंदगी आसान होती है

आज हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहां राजनीतिक हलचल का असर हर जगह देखने को मिलता है। अंकित चहल के मुक्तक भी इससे अछूते नहीं हैं। उनके यहां राजनीति की शतरंज है, सियासत की चालाकियां है मगर इन सबसे ऊपर राधा कृष्ण की झांकियां हैं-

तन से राधा रही मन हुआ श्याम सा 
प्रेम वालों को गोकुल लगा धाम सा 
कुंज की हर गली जप रही है यही, 
नाम दूजा नहीं कृष्ण के नाम सा 

अंकित चहल ने काव्य परंपरा से प्राप्त शैली का इन मुक्तकों के लेखन में भरपूर ईमानदारी से इस्तेमाल किया है। उनके यहां कथ्य है, कहानी है और अभिव्यक्ति में रवानी है। इसलिए उनके मुक्तक बरबस पाठकों का ध्यान खींचते हैं और उनके साथ अपना एक आत्मीय रिश्ता कायम कर लेते हैं। इस सुंदर किताब के लिए मैं कवि अंकित चहल विशेष को हार्दिक बधाई देता हूं। मांडवी प्रकाशन, दिल्ली गेट, ग़ाज़ियाबाद से प्रकाशित इस किताब का मूल्य है ₹150 मात्र। यह किताब अमेजॉन और फ्लिपकार्ट पर भी उपलब्ध है।

देवमणि पांडेय :
बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाड़ा, गोकुलधाम,
फ़िल्म सिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुंबई- 400063, 98210-82126
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रविवार, 7 जून 2020

कवयित्री हेमा चंदानी : ख़ाली रह गई अंजुली

ख़ाली अंजुली में सपनों की दास्तान

हेमा चंदानी अंजुलि के काव्य संग्रह का नाम है- "ख़ाली रह गई अंजुली"। इसी काव्य संग्रह से पेश है एक कविता- 

अगर मिलता साथ तुम्हारा 
तो कुछ लम्हे मैं भी जी लेती
तुम जो कहते तो 
बटोर लाती तुम्हारे लिए सूरज से उजाले 
चुरा लेती फूलों से ख़ुशबू 
ले लेती चंदा से चांदनी उधार 
मांग लेती धरती से एक टुकड़ा आंगन 
और सजा देती उसे अपने प्रेम से 
बसा लेती मैं भी एक दुनिया 
अगर मिलता साथ तुम्हारा

कविताओं के इस दयार में अधूरे सपनों से बार-बार सामना होता है। कई जगह उनके टूटने-बिखरने की अनुगूंज भी सुनाई देती है। मगर उम्मीद की रोशनी क़ायम है। बुलंद हौसले सफ़र पर आमादा हैं। एक ऐसी मंज़िल की जुस्तजू है जो ज़िंदगी की धूप-छांव से गुज़रने के बाद हासिल होती है।

कविता ख़ुद में एक ऐसी निजी अभिव्यक्ति है जिसमें लिखने वाले के दुख-दर्द, उम्मीद, आकांक्षा संघर्ष और सपनों की दास्तान होती है। कविता की सार्थकता इसी बात में है कि वह अपनी निजता से ऊपर उठकर बहुत सारे पाठकों की सोच के साथ अपना एक रिश्ता कायम कर ले। हेमा अंजुलि की कविताएं भी यही करती हैं। ऊपर से देखने में उनके सुख-दुख बेहद निजी लगते हैं। लेकिन उनमें निहित सम्वेदना दूसरों के साथ जुड़ जाने और उन्हें अपने साथ जोड़ लेने की सामर्थ्य रखती है।

इस संग्रह की कविताओं में घर, आंगन, दहलीज, की जानी पहचानी दुनिया है जिसमें मां-बाप, भाई-बहन की आत्मीय मौजूदगी है। उनके साझा सुख-दुख हैं, हर्ष-विषाद हैं। मगर इससे आगे कवयित्री की निगाह भूख, ग़रीबी, चिड़िया और लड़कियों पर भी जाती है। कुछ कविताओं में स्त्री विमर्श का मुखर स्वर भी है। कुल मिलाकर उनकी निगाह अपने समय के सवालों पर जाती है और उनकी कविता के आईने में यह विविधरंगी विषय अपनी मौजूदगी का एहसास कराते हैं।

हेमा चंदानी अंजुलि सम्वेदनशील कवयित्री होने के साथ एक समर्थ अभिनेत्री भी हैं। उन्होंने राजस्थान विश्वविद्यालय से शास्त्रीय गायन और कत्थक नृत्य का प्रशिक्षण प्राप्त किया है। कई धारावाहिकों का लेखन कर चुकी हैं। रंगकर्म से भी जुड़ी हैं। यह सारी कलाएं उनके काव्य व्यक्तित्व को सशक्त बनाने का काम करती हैं। यह भी स्वागत योग्य बात है कि उन्होंने अब गीत, ग़ज़ल को भी अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया है और उसमें भी नाम कमाया है।

पी वी प्रकाशन कांदिवली पश्चिम द्वारा प्रकाशित इस किताब का मूल्य है ₹150/- इस काव्य संग्रह के लिए मैं उन्हें हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं देता हूं और उम्मीद करता हूं कि उनकी रचनात्मकता का यह सफ़र इसी तरह कामयाबी की ओर अग्रसर रहेगा।
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देवमणि पांडेय :
बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाड़ा, गोकुलधाम,
फ़िल्म सिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुंबई- 400063, 98210-82126
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शनिवार, 6 जून 2020

नंदलाल पाठक : ग़ज़लों ने लिखा मुझको

ज़रूरी तो नहीं 
गृहलक्ष्मी का उर्वशी होना 
वरिष्ठ ग़ज़लकार प्रो.नंदलाल पाठक ने हिंदी ग़ज़ल को जीवंत भाषा और धारदार अभिव्यक्ति के साथ ऐसे संस्कार दिए हैं जो धार्मिकता के आवरण से मुक्त हैं और हिंदुस्तानी समाज की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं। उनकी सृजनात्मकता के दायरे में राम भी हैं और राधेश्याम भी हैं, मगर ये लोकप्रिय चरित्र अपनी सांस्कृतिक मर्यादा में भारतीय जन-मानस को उन मूल्यों की दीक्षा देते नज़र आते हैं जिन मूल्यों पर हमारा भारतीय समाज टिका हुआ है। वस्तुत: ये सरोकार हिंदी ग़ज़ल के स्वास्थ्य और समृद्धि के लिए ज़रूरी हैं। 
हिंदी ग़ज़ल की विकास यात्रा पर अगर निगाह डालें तो यह भारतेंदु हरिश्चंद्र, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, शमशेर बहादुर सिंह और सर्वेश्वर दयाल सक्सेना आदि से होती हुई दुष्यंत कुमार तक पहुँची। यह एक ऐसा मुकाम था जहाँ हिंदी ग़ज़ल को असीम लोकप्रियता हासिल हुई। ग़ज़ल की लोकप्रियता को देखते हुए इसके रचनाकारों और पाठकों की संख्या में लगातार इज़ाफ़ा हुआ।
दुष्यंत कुमार के पास राजनीतिक समझ, प्रतिरोध का स्वर और अपनी बात को असरदार तरीक़े से कहने का सलीक़ा था। उनके इस हुनर ने काफ़ी ग़ज़लकारों को आकर्षित किया और उन्होंने दुष्यंत कुमार की ही ग़ज़ल परम्परा को आगे बढ़ाने की कोशिश की। मगर दुष्यंत कुमार जिस मुकाम तक ग़ज़ल को ले गए थे वहां ये ज़रूरी था कि हिंदी ग़ज़ल को हिंदी काव्य परम्परा से जोड़कर इस काव्य परम्परा को आगे बढ़ाया जाय। जिन लोगों ने ऐसा किया उन्हें पहचान और प्रतिष्ठा प्राप्त हुई।

ज़िंदगी कर दी निछावर तब कहीं पाई ग़ज़ल

कुछ मिलन की देन है तो कुछ है तनहाई ग़ज़ल

प्रो.नंदलाल पाठक इसी काव्य परम्परा के एक समर्थ वाहक हैं। वे हिंदी ग़ज़ल को समकालीन हिंदी कविता का अंग मानते हैं। उन्होंने अपने समय के उन सवालों औऱ समस्याओं को ग़ज़ल की विधा में बख़ूबी ढालकर प्रस्तुत किया जो समकालीन हिंदी कविता में अभिव्यक्त होते हैं। इस फ़न और हुनर के चलते उनकी रचनात्मक में ग़ज़ब का आत्मविश्वास दिखाई देता है-

एक यह भी कमाल कर देखें
ख़ुद को जलती मशाल कर देखें
लोग कैसे न घर से निकलेंगे
अपनी अर्थी निकालकर देखें
पाठक जी के पास एक अर्जित काव्य भाषा है जो हिंदी समाज के दुख-दर्द, संघर्ष जिजीविषा और सपनों को अभिव्यक्त करने में सक्षम है। उनकी अभिव्यक्ति में कहीं भी फ़ारसी व्याकरण या फ़ारसी तरक़ीब की बैशाख़ी नज़र नहीं आती। उनके पास एक संचित काव्य परम्परा है जो उन्हें हिंदी साहित्य के अध्ययन, मनन और विश्लेषण से प्राप्त हुई हैं। यही कारण है कि पाठक जी की ग़ज़लों में कबीर का फ़क्कड़पन, तुलसी की प्रतिबद्धता, सूर का समर्पण, मीरा का माधुर्य और दिनकर का ओज सहजभाव से अभिव्यक्त होते हैं। उनके पास विचार और चिंतन की पूंजी है। इसी लिए वे हिंदी काव्य परम्परा में अपनी ग़ज़लों के ज़रिए एक मज़बूत कड़ी जोड़ने में कामयाब हुए हैं।
ग़ज़ल की लोकप्रियता की सबसे बड़ी कसौटी है उसकी लयात्मकता। इसी लयात्मक के चलते ग़ज़ल के शेर जनमानस की स्मृति का हिस्सा बन जाते हैं। उद्धरणीयता छंदबद्द कविता की एक अनिवार्य शर्त है। इसी के ज़रिए कविता लोक जीवन में यात्रा करती है। मुझे भी पाठक जी के कई शेर ज़बानी याद हैं जिन्हें मैं सार्वजनिक मंचों से अक्सर उद्धरित करता हूँ। मिसाल के लिए उनके चंद शेर देखिए-

कल तितलियां दिखीं तो मेरे हाथ बढ़ गए
मुझको गुमान था मेरा बचपन गुज़र गया
ज़रूरत आपको कुछ भी नहीं सजने-सँवरने की
किसी हिरणी की आँखों में कभी काजल नहीं होता
भरोसा नाव से ज़्यादा मुझे दो बाज़ुओं पर है
कहो तो नाव से मैं बीच धारा में उतर जाऊँ
क़दम-क़दम पर है फूलमाला, जगह-जगह है प्रचार पहले
मरेगा फ़ुर्सत से मरने वाला, बना दिया है मज़ार पहले 
एक अच्छा कवि अपनी अभिव्याक्ति में हमेशा प्रगतिशील होता। वक़्त के साथ क़दम बढ़ाते हुए वह ऐसे तथ्यों को रेखांकित करता है जिसमें समाज का अक्स ख़ुद-बख़ुद उभर आता है। ये ख़ूबियां पाठक जी की ग़ज़लों में शामिल हैं। मिसाल के तौर पर उनके कुछ शेर देखिए

आंगन में तब सारा नभ था
अब छोटी सी बालकनी है
हम निवासी महानगर के हैं
उम्र सारी क़तार में बीती
सारी दुनिया है दौड़ में,सबको
सबसे आगे यहाँ निकलना है
ठहाके हैं, हँसी है एक परदा
कोई तूफ़ान भीतर चल रहा है
चीथड़ों में भी ग़ज़ब के लोग थे
जब कभी मिलना हुआ खुलकर मिले
खेत की ओर ले चलो दिल्ली
गाँव वालों को राजधानी दो
ज़माने भर से ख़बरें आ रही हैं तेज़ बारिश की
मैं प्यासा रह गया, बादल नहीं कोई इधर आया
घर में जिनकी ज़िंदगी ख़तरे में थी
उनको जेलों में सुरक्षित घर मिले
कल करिश्मा था जो अब है खेल बाएं हाथ का
सीढ़ियों पर मैं खड़ा था सीढ़ियाँ चलती रहीं
आज जो हिंदी ग़ज़ल लिखी जा रही है उसमें राजनीतिक मुद्दों और व्यवस्था विरोध पर बेशक़ ज़ोर है मगर जीवन के कई ऐसे पहलू भी हैं जिन्हें रेखांकित करने की आवश्यकता है। इसमें एक पहलू है दाम्पत्य जीवन। प्रो. नंदलाल पाठक के पास एक ऐसी समृद्ध दृष्टि है जो ऐसे नाज़ुक और ज़रूरी मुद्दों को भी अपनी अभिव्यक्ति में पर्याप्त महत्व देती है-

वो पति की प्रेरणा, सुख दुख की साथी हो, सुभाषी हो
ज़रूरी तो नहीं गृहलक्ष्मी का उर्वशी होना
जनम संतान को देकर भी जो मां बन नहीं पाती
बहुत सी औरतों के भाग्य में है देवकी होना
हिंदी ग़ज़लकारों के सामने आज भी एक अहम सवाल है कि ग़ज़ल का चेहरा कैसा होना चाहिए, उसका रूप-रंग कैसा होना चाहिए। ‘जहां पतझर नहीं होता’’ ‘फिर हरी होगी धरा’ और ग़ज़लों ने लिखा मुझको’ में शामिल ग़ज़लों के ज़रिए प्रो.पाठक ने इस सवाल का जवाब पेश कर दिया है। हिंदी ग़ज़ल का कथ्य क्या होना चाहिए और हिंदी ग़ज़ल की भाषा कैसी होनी चाहिए इसका साफ़-सुथरा आईना हैं पाठकजी की ग़ज़लें-

अब अच्छे बुरे की सही पहचान नहीं है
इंसान बने रहना अब आसान नहीं है
दुनिया को लूटकर लहू दुखियों का चूसकर
जो दान दिया जाता है, वह दान नहीं है
कथ्य की मर्यादा को क़ायम रखने के लिए फ़िराक़ गोरखपुरी साहब ने बहर में कई जगह आज़ादी भी ली थी। ग़ज़ल के समालोचकों ने इन ख़ामियों को उजागर भी किया है। इस तरह की ख़ामियां पाठक जी में भी मिल सकती हैं क्योंकि उन्होंने भी अपनी अभिव्यक्ति में कथ्य की गरिमा का विशेष ध्यान रखा है। फ़ारसी छंद की परम्परा में पाठक जी की ग़ज़लों की ‘तक्तीअ’ करने वालों को मायूसी ही हाथ लगेगी।
कथ्य, अभिव्यक्ति और भाषा के मानदंडों पर खरी उतरने वाली पाठक जी की हिंदी ग़ज़लें अपने वक़्त का अहम दस्तावेज़ हैं। इनके माध्यम से हिंदुस्तानी समाज का एक मुकम्मल चेहरा सामने आता है और साबित करता है कि फ़ारसी व्याकरण, तरक़ीब, उपमान और प्रतीकों से मुक्त होने के बाद हिंदी ग़ज़ल का व्यक्तित्व कितना ख़ूबसूरत और असरदार लगता है, उसकी ये ग़ज़लें जीवंत मिसाल हैं। पाठक जी की ये ग़ज़लें पठनीयता, गेयता और उद्धरणीयता से समृद्ध हैं। इसलिए ये ग़ज़ल प्रेमियों को बहुत आत्मीय लगती हैं। मुझे पूरी उम्मीद है कि ये ग़ज़लें नई पीढ़ी के लिए एक पथ-प्रदर्शक का काम करेंगी।
ग़ज़लों ने लिखा मुझको 
ग़ज़लकार प्रो नंदलाल पाठक 
वाणी प्रकाशन नई दिल्ली 
मूल्य ₹250 रूपए


देवमणि पांडेय :
बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाड़ा, गोकुलधाम,
फ़िल्म सिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुंबई- 400063, 98210-82126

शुक्रवार, 5 जून 2020

विनोद प्रकाश गुप्ता शलभ : नई सहर का नया शम्स रोक लें


पुस्तक समीक्षा : आओ नई सहर का नया शम्स रोक लें

एक जाने-माने समालोचक का कहना है- "ग़ज़ल में  मुहब्बत कम हो गई है और पत्रकारिता ज़्यादा हो गई है"। ग़ज़लकार विनोद प्रकाश गुप्ता 'शलभ' के यहां मुहब्बत ही मुहब्बत है। उनके ग़ज़ल संग्रह का नाम है- "आओ नई सहर का नया शम्स रोक लें"। इस संग्रह के ज़रिए उन्होंने साबित किया है कि शायर का दिल हमेशा जवान रहता है-

ये मुमकिन है कि मुझसे कुछ तो वो रूठा हुआ होगा 
मगर बिछड़े जहां थे हम, वहीं ठहरा हुआ होगा
सिकंदर से हमें यह सीख आख़िर क्यों नहीं मिलती
जो जग को जीतता है ख़ुद से वो हारा हुआ होगा

जो आदमी मुहब्बत के दयार से गुज़रता है, वही मुहब्बत में अपने दिल के हाथों पराजित भी होता है। यही इस रिश्ते का दस्तूर है-

उसके आंचल की हवाएं छू गईं जिस पल मुझे
प्यास और पानी के मंज़र एक जैसे हो गए

मुहब्बत के दरिया से अब तक न जाने कितना पानी बह चुका है। इस पानी में नए कंवल खिलाना बड़ा मुश्किल काम है। शलभ जी अपनी सोच, अपने तेवर और अपने एहसास के ज़रिए अपनी ग़ज़ल में नई कहानी ले आते हैं-

कोई पोखर नहीं सूखे, कोई दरिया नहीं सूखे 
हमारे बीच अपनेपन का ये सोता नहीं सूखे 
मुझे तामीर करनी है मेरे रंगों की वो बग़िया 
जहां बेवक़्त कोई फूल क्या, पत्ता नहीं सूखे

ग़ज़ल अगर लिरिकल हो यानी उसमें गेयता हो तो वह पाठकों के साथ बड़ी जल्दी अपना एक दोस्ताना रिश्ता कायम कर लेती है। शलभ जी की ग़ज़लों में ये गेयता मौजूद है। अगर आप उनकी ग़ज़लों को गुनगुना कर पढेंगे तो और ज़्यादा अच्छी लगेंगी- 

हदें पार करनी हैं अब दायरों की 
ख़ुदा लाज रखना मेरे हौसलों की 
हैं अनमोल नज़दीकियां उनकी लेकिन 
न कम आंकना क़ीमतें फ़ासलों की

यहां तक कि जब वे जीवन के स्याह मंज़र को चित्रित करते हैं तब भी उनके यहां गेयता और गुनगुनाहट मौजूद रहती है-

उखड़ने लगे लोकशाही के तंबू 
ये क्या रंग लाई हवा नफरतों की 
फ़लक छू न पाओगे एड़ी उठाकर 
पड़ेगी ज़रूरत तुम्हें सीढ़ियों की

छोटी बहर में अपनी सोच को अभिव्यक्त करना मुश्किल काम होता है। शलभ जी ने इस चुनौती का सामना भी बख़ूबी किया है। छोटी बहर में भी उनके यहां एहसास की रवानी है और मुहब्बत की कहानी है-

फ़न है फ़नकारी की ख़ातिर 
उसको तुम हथियार न करना 
इश्क़ शलभ से तुमको, है क्या 
है तो फिर, इन्कार न करना

संग्रह की कुछ ग़ज़लों में शलभ जी ने प्रकृति का चित्रण भी सराहनीय तरीक़े से किया है। मिसाल के तौर पर उनकी एक ग़ज़ल के दो शेर देखिए-

हवाओं की पत्तों से ये छेड़ देखो 
हैं अठखेलियां भी, मधुर रागिनी भी 
उसी झील में अब उतरता है सूरज 
जहां शब  मचलती रही चांदनी भी 

एक सराहनीय बात यह भी है कि शलभ जी ने अपने कई शेरों में नए बिम्ब और नए प्रतीक लाने की कामयाब कोशिश की है-

तू अगर केसर कली है, हम स्वयं कश्मीर हैं 
रंग अपने इश्क़ का भी, ज़ा'फ़रानी है बहुत

शलभ जी ने कई जगह उर्दू के भारी-भरकम शब्दों का इस्तेमाल किया है और उनका शब्दार्थ भी दे दिया है। मगर अधिकतर ग़ज़लें उस आम फहम ज़बान में कहीं हैं जो ज़बान गलियों, चौराहों और नुक्कड़ पर बोली जाती है। इसलिए उनकी इन ग़ज़लों में  संप्रेषणीयता बहुत अच्छी है-  

बिना इश्क़ मेरा गुज़ारा नहीं था  
ज़माने को बस ये गंवारा नहीं था 
नज़र तो तुम्हारी निगहबां थी लेकिन 
मगर साफ़ कोई इशारा नहीं था

शलभ जी के कथ्य में परंपरा और आधुनिकता का अच्छा तालमेल है। वे ख़ुद को शास्त्रीय ग़ज़ल की परंपरा से भी जोड़ लेते हैं और जदीद ग़ज़ल की रिवायत से भी अपना रिश्ता क़ायम कर लेते हैं। अपनी ग़ज़लों में नयापन और ताज़गी लाने की उन्होंने सराहनीय कोशिश की है।

एक शायर के लिए यह तय करना बहुत ज़रूरी है कि एक ग़ज़ल में कितने शेर रखें जाएं। शलभ जी ने कई गजलों में दस-बारह शेर भी रखे हैं। अगर वे इन्हें संपादित करके छ:-सात तक सीमित रखते तो पाठकों को और ज़्यादा सुकून हासिल होता। इस सुंदर किताब के लिए डॉ विनोद प्रकाश गुप्ता 'शलभ' को मैं बधाई देता हूं और यह उम्मीद करता हूं आगे भी वे अपनी गजलों में यह रवानी और रोचकता बरकरार रखेंगें।

डॉ विनोद प्रकाश गुप्ता 'शलभ' का संपर्क नंबर : 98111-69069 और 98160-69069

के.बी.एस. प्रकाशन, सराय रोहिल्ला, दिल्ली-110007 से प्रकाशित इस ग़ज़ल संग्रह का मूल्य है ₹280 रूपए।

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देवमणि पांडेय : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाड़ा, गोकुलधाम,
फ़िल्म सिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुंबई- 400063, 98210-82126 
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गुरुवार, 4 जून 2020

कमलेश भट्ट कमल : परिंदों को नहीं तालीम दी जाती


शिखरों के सोपान : पुस्तक समीक्षा

विश्वविद्यालय प्रकाशन वाराणसी से हिंदी के प्रतिष्ठित ग़ज़लकार कमलेश भट्ट कमल का चौथा ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित हुआ है - शिखरों के सोपान। हिंदी ग़ज़ल में दुष्यंत कुमार को मील का पत्थर माना जाता है। दुष्यंत कुमार के बाद जिन ग़ज़लकारों ने हिंदी ग़ज़ल को आगे ले जाने की सराहनीय कोशिश की है उनमें कमलेश भट्ट कमल का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। कमलेशजी के पास एक आधुनिक दृष्टि है। चीज़ों के आर पार देखने का हुनर है। इसलिए वह अपनी रचनात्मक अभिव्यक्ति के लिए ऐसे ऐसे नए कथ्य तलाश लेते हैं जिन पर अक्सर दूसरों की नज़र नहीं जाती। बयान की यही नवीनता उन्हें अलग पहचान देती है।


परिंदों को नहीं तालीम दी जाती उड़ानों की
वो खु़द ही जान लेते हैं बुलंदी आसमानों की


नएपन को अपनी अभिव्यक्त में शामिल करने वाले कई ग़ज़लकारों के शेर प्रायः पत्रकारिता में ढल जाते हैं मगर कमलेशजी अपने बाकमाल हुनर से ऐसे मौजू को जब शेर की शक्ल देते हैं तो उसमें शेरियत का सलीक़ा भी शामिल होता है - 

जंगल से बाहर आए तो अरसा बीत गया 
इंसानों में फिर भी बाक़ी कितना जंगल है 
जाने कैसे उग आते हैं कांटे उस दिल में 
जो दिल अपनी संरचना में बेहद कोमल है 

कमलेशजी के नए ग़ज़ल संग्रह में 108 ग़ज़लें शामिल हैं। ये ग़ज़लें कथ्य की नवीनता, अभिव्यक्त की ताज़गी, हिंदी की नई शब्दावली, लहजे की सादगी और बयान की शालीनता से समृद्ध हैं। उनकी सामाजिक पक्षधरता हमेशा उनके साथ चलती है। उनके तीखे सवाल पाठकों को विचलित कर देने का सामर्थ्य भी रखते हैं - 

चले रुक रुक के कोई तो भी मंजिल पास आती है 
मगर यह मुल्क कुछ चलता दिखाई क्यों नहीं देता 
ये क्यों होता है डालर रोज़ आकर रौंद जाता है 
कभी तनकर खड़ा रुपया दिखाई क्यों नहीं देता 

हिंदी ग़ज़ल आज ऐसे मुकाम पर पहुंच गई है कि उसके झरोखे से वक़्त के सारे सवाल, ज़िंदगी के सारे ख़्वाब और समाज के सारे मसाईल झांकते नज़र आते हैं। ऐसे चुनौतीपूर्ण माहौल में भी कमलेशजी अभिव्यक्ति के नए पहलू तलाश कर लेते हैं - 

वो जो फुटपाथ है उसको हिकारत से नहीं देखो 
वो अपने साथ ही बेबस कई बेघर समेटे है 
कभी कुछ देर बैठो पास तो ख़ुद जान जाओगे 
स्वयं में कितनी बेचैनी कोई सागर समेटे है 

हमारे आसपास के माहौल से बाहर निकलकर कमलेश जी कभी-कभी आध्यात्मिकता के आसमान में भी ऊंची उड़ान भरते हैं - 

हजा़रों कर्मफल प्रारब्ध सारे इसमें सिंचित हैं 
हमारी देह ख़ुद में जन्म - जन्मांतर समेटे है 
अमर है आत्मा और देह नश्वर है ये कहते हैं 
मगर उस आत्मा को देह यह नश्वर समेटे है 

दुष्यंत कुमार ने हिंदी ग़ज़ल को व्यवस्था विरोध और सामाजिक पक्ष धरता का एक नया तेवर दिया। इस रिवायत को आगे बढ़ाने का काम कमलेशजी जैसे सजग रचनाकार बख़ूबी कर रहे हैं। ख़ास बात यह है कि ऐसे सरोकारों को सामने लाते हुए वे कभी बड़बोलेपन का शिकार नहीं होते बल्कि अपनी शालीनता और साफ़गोई बरकरार रखते हैं - 

कहीं मज़हब कहीं पर जाति की पाबंदियां लिख दीं
ये किसने बंदिशें इतनी दिलों के दरमियां लिख दीं
दलित है कौन पंडित कौन यादव कौन ठाकुर है
सियासत ने सभी चेहरों पर उनकी जातियां लिख दीं 

मुझे लगता है कि दुष्यंत कुमार ने हिंदी ग़ज़ल को जिस मुकाम तक पहुंचाया था कमलेश भट्ट कमल ने उस मुकाम से आगे ले जाने की कामयाब कोशिश की है। इधर हिंदी ग़ज़ल में एक ठहराव और जड़ता दिखाई देती है। लक्षणा और व्यंजना की बजाय अभिधा से ज़्यादा काम लिया जा रहा है। सपाट बयानी का भी फ़ैशन बढ़ा है। कमलेशजी इन ख़ामियों से ख़ुद को बचाते हुए उस ग़ज़ल के हमराही बने हैं जो मीरो- ग़ालिब की सुदीर्घ परंपरा से हमको प्राप्त हुई है। वे अपनी फ़िक्र को अपनी अभिव्यक्ति के आईने में इस तरह उतारते हैं कि उसमें दौरे-हाज़िर का मुकम्मल चेहरा नज़र आता है। अपनी रचनात्मकता से उन्होंने हिंदी ग़ज़ल को लगातार समृद्ध करने का सराहनीय कार्य किया है। मेरी दिली ख़्वाहिश है कि वे इसी तरह ग़ज़ल रचते रहें और सृजनात्मकता के आसमान पर कामयाबी का परचम लहराते रहें। 

देवमणि पांडेय : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम,
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 जनवरी 2019