शनिवार, 9 मई 2020

हसरत जयपुरी : तुम मुझे यूं भुला न पाओगे


बॉलीवुड में गीतकार हसरत जयपुरी

नौजवान शायर हसरत जयपुरी ने अपने दिल के कैनवास पर ख़्वाबों में बसी एक तस्वीर बनाई। अपनी मुहब्बत का इज़हार करने के लिए उन्होंने एक कविता लिखी- "ये मेरा प्रेमपत्र पढ़कर, के तुम नाराज़ ना होना।...पड़ोस की उस लड़की का नाम था 'राधा'। वे इस पत्र को कभी उसको नहीं दे पाए जिसके लिए उन्होंने लिखा था। नौकरी की तलाश में सन् 1940 में हसरत मुंबई आए। बेस्ट में बस कंडक्टर बन गए। आठ साल की नौकरी के बाद मुशायरों में उनकी लोकप्रियता ने राज कपूर के दरवाज़े पर दस्तक दी। हसरत ने अपना प्रेम पत्र राज कपूर को सौंप दिया।

मेहरबां लिखूं, हसीना लिखूं या दिलरुबा लिखूं
हैरान हूं के आप को इस ख़त में क्या लिखूं ? 
ये मेरा प्रेम पत्र पढ़कर, के तुम नाराज़ ना होना
के तुम मेरी ज़िंदगी हो, के तुम मेरी बंदगी हो

राज कपूर ने फ़िल्म 'संगम' (1964) में हसरत जयपुरी के प्रेम पत्र को शामिल किया। अपनी नायिका का नाम रख दिया- 'राधा'। फ़िल्म 'संगम' की कहानी सुनने के बाद राधा (वैजयंती माला) चेन्नई चली गई। एक सप्ताह तक उसका जवाब नहीं आया। राज कपूर ने टेलीग्राम भेजा- "बोल राधा बोल, संगम होगा कि नहीं"। वैजयंती माला ने जवाबी टेलीग्राम भेजा- "होगा होगा होगा।" ये शब्द एक ख़ूबसूरत गीत के एहसास का हिस्सा बन गए।

जिया बेकरार है छाई बहार है 
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फ़िल्म बरसात (1949) संगीतकार शंकर जयकिशन, गीतकार हसरत जयपुरी और गीतकार शैलेंद्र की पहली फ़िल्म थी। गायक मुकेश भी इस टीम का हिस्सा बन गए। इस टीम के ज़रिए राज कपूर ने हिंदी सिनेमा के इतिहास में कामयाबी का एक नया अध्याय लिखा। शुरू में शैलेंद्र ने यह कह कर राज कपूर को मना कर दिया था कि मैं पैसों के लिए गीत नहीं लिखता। बीवी मां बनने वाली थी उसे झांसी (मायके) भेजने के लिए शैलेंद्र के पास पैसे नहीं थे। राज कपूर ने मदद की। शैलेंद्र ने फ़िल्म 'बरसात' का शीर्षक गीत लिख दिया- "बरसात में, हमसे मिले तुम सजन"। उनका दूसरा गीत था- तिरछी नज़र है, पतली कमर है।

गीतकार हसरत जयपुरी के लिए संगीतकार शंकर जयकिशन ने जो धुन बनाई उसके डमी शब्द थे- 

अमवा का पेड़ है ऊंची मुंडेर है 
आजा मेरे बालमा काहे की देर है 

इस धुन पर हसरत जयपुरी ने लिखा- 

जिया बेकरार है छाई बहार है 
आजा मेरे बालमा तेरा इंतज़ार है 

फ़िल्म 'बरसात' के साथ पैसों की ऐसी बारिश हुई कि शैलेंद्र और हसरत ने मुंबई में अपना घर ख़रीद लिया।

दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई
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सन् 1966 में शैलेंद्र, 1971 में जयकिशन, 1976 में मुकेश और 1988 में राज कपूर का स्वर्गवास हो गया। 15 फरवरी 1989 में हसरत जयपुरी से मेरी मुलाक़ात हुई। एसवी रोड खार में कनारा बैंक के ऊपर अपने घर में इन साथियों को याद करके उनकी आंखें नम हो गईं। हसरत साहब बोले- "बिना टीम के फ़िल्म जगत में टिकना मुश्किल है। घर परिवार बच्चे यही हैं, नहीं तो मैं मुंबई छोड़कर चला जाता। नौशाद साहब को देखिए आज कितने अकेले हैं।"


बहारों फूल बरसाओ (1967) और ज़िंदगी इक सफ़र है सुहाना (1972) गीतों के लिए हसरत जयपुरी को दो बार फ़िल्मफेयर अवार्ड से नवाज़ा गया। सुनहरे दिनों में झांकते हुए हसरत बोले- आदमी में जब प्यार की भावना जागती है तभी वह कवि बनता है, किताबें पढ़कर नहीं। प्रेम ही प्रेरणा है। प्रेम की कोई ज़ात नहीं। प्रेम किसी से भी हो सकता है। राज कपूर तो पूरी दुनिया से प्रेम करते थे। वे फुटपाथ पर बैठे उस मोची से भी प्यार करते थे जिससे जूता पालिश कराते थे। अपनी फ़िल्मों के ज़रिए उन्होंने न जाने कितने लोगों की ज़िंदगी संवार दी। शैलेंद्र मुझे इतना प्यार करता था कि उसने अपनी फ़िल्म 'तीसरी कसम' में मुझसे दो गीत लिखवाए- "मारे गए गुलफ़ाम" और "दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई।"

शैलेंद्र को याद करते हुए हसरत जयपुरी यादों में खो गए। शैलेंद्र ने सोचा था चार-पांच लाख ख़र्च होंगे और सात-आठ महीने में  'तीसरी क़सम' बन जाएगी। काम जल्दी हो इसलिए उन्होंने फणीश्वर नाथ रेणु को भी मुंबई बुला लिया था। 'तीसरी कसम' को बनने में पांच साल लग गए। बजट पांच गुना ज़्यादा बढ़ गया। क़र्ज़ के बोझ ने शैलेंद्र की नींद उड़ा दी। राज कपूर 'मेरा नाम जोकर' बनाने में उलझे हुए थे। शैलेंद्र की कौन मदद करता! अंततः अपनी जान देकर उन्हें अपनी इस ख़्वाब की क़ीमत चुकानी पड़ी।

सुन साहिबा सुन प्यार की धुन
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जय किशन की मौत के बाद राज कपूर की फ़िल्मों के संगीतकार बदले। गीतकार भी बदल गए। राज कपूर अपने साले प्रेमनाथ को प्यार से साहिबा कहकर बुलाते थे। फ़िल्म 'बॉबी' के समय एक दिन जैसे ही जाने के लिए प्रेमनाथ अपनी कार में बैठे उसी समय राज कपूर को कोई काम याद आ गया। उन्होंने ज़ोर से आवाज़ लगाई- "सुन साहिबा सुन" उनके जाने के बाद राज कपूर ने "सुन साहिबा सुन" को गुनगुना कर देखा। अच्छा लगा। फ़िल्म 'राम तेरी गंगा मैली' में उन्होंने इसी को मुखड़ा बनाया। हसरत जयपुरी से गीत लिखवाया- 

सुन साहिबा सुन, प्यार की धुन
मैंने तुझे चुन लिया, तू भी मुझे चुन

बदलते दौर के संगीत पर अफ़सोस ज़ाहिर करते हुए हसरत जयपुरी ने कहा- अब कला और प्रतिभा की अवहेलना हो रही है। दुनिया संवारने वाले साहिर, शकील और शैलेंद्र नहीं रहे। सिनेमा में गंदगी बढ़ेगी तो साहित्य ख़त्म हो जाएगा। पहले के गीतकार अदब और साहित्य से जुड़े थे। आज संगीतकार को गीतकार नहीं ऐसे चमचों की तलाश रहती है जो फूहड़ गीत लिख सकें। गीत, संगीत और प्रेम कहानी हिंदुस्तानी सिनेमा के नायक हैं। अगर ये हैं तो नए कलाकारों के साथ भी फ़िल्म चल सकती है। बिना कहानी के कविता कैसे लिखी जाएगी। अब फ़िल्म की कहानी में बदलाव आ गया है। सेक्स, हिंसा और तस्करी वाली फ़िल्मों में गीत की सिचुएशन ही नहीं बनती।

नए संगीतकारों से नाराज़ थे हसरत
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हसरत जयपुरी नए संगीतकारों से काफ़ी नाराज़ लगे। बोले- अनु मलिक मेरा भांजा है। मुझे यह बताते हुए शर्म आती है कि वह संगीत की चोरी करता है। आज संगीतकार ख़ुद गाने लिख रहे हैं। धुन की चोरी कर रहे हैं। जिन्हें संगीत की तमीज़ नहीं है ऐसे नए संगीतकार बीच बाज़ार में निर्माता की कार के बोनट पर ताल बजा कर, मुखड़ा सुनाकर संगीतकार बनने की भीख मांगते हैं। हम भूखों मर जाएंगे मगर इस तरह अपनी इज्ज़त नहीं बेचेंगे। गीत, संगीत और सिनेमा में भारतीयता होना बहुत ज़रूरी है। तभी यह टिकेंगे। राज कपूर को इसकी अच्छी समझ थी। वह गीतों की भाव भूमि के बारे में बता कर गीतकार का काम आसान कर देते थे। उनकी फ़िल्मों में बहुत अच्छे अच्छे गीत लिखे गए।

तेरी प्यारी प्यारी सूरत को 
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हसरत जयपुरी के फ़िल्म गीतों की एक किताब प्रकाशित हो चुकी है - 'चश्मे बद्दूर'। गायक अहमद हुसैन मुहम्मद हुसैन के संगीत अल्बम में उनकी कई ग़ज़लें शामिल हैं। उन्होंने बताया कि ग़ैर फ़िल्मी रचनाओं की दो पांडुलिपि तैयार हैं- 'रूबरू' और 'आफ़सारे-ग़ज़ल'। कोशिश कर रहा हूं कि ये दोनों किताबें जल्दी प्रकाशित हो जाएं।

गीतकार शैलेंद्र 'इप्टा' से जुड़े हुए थे। जीवन दर्शन और वामपंथी नज़रिए के गीत की सिचुएशन बनती तो राज साहब उन्हें गीत सौंप देते। प्यार-मुहब्बत के जज़्बात होते तो वे गीत हसरत के हिस्से में आते। हसरत जयपुरी ने अपने गीतों में आम बोलचाल की भाषा का इस्तेमाल किया। उनके गीत अवाम में लोकप्रिय हुए। उनके कुछ लोकप्रिय गीतों की झलक देखिए-

दिल के झरोखे में तुझको बिठाकर। 
रात और दिन दिया जले। 
बदन पे सितारे लपेटे हुए। 
पंख होते तो उड़ आती रे। 
तेरी प्यारी प्यारी सूरत को। 
अजीब दास्तां है यह। 
छोड़ गए बालम। 
फूलों की रानी बहारों की मलिका। 
तेरे घर के सामने एक घर बनाऊंगा।

तुम मुझे यूं भुला न पाओगे 
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हसरत जयपुरी के गीतों में छेड़खानी है, शरारत है। जुदाई की कसक है। मिलन की ख़ुशी है। ख़्वाबों की ख़ुशबू है। तमन्नाओं के गुलशन हैं। गीतों में फूल मुस्कुराते हैं इसलिए उनके गीत इज़हार ए मुहब्बत के काम आते हैं। आज भी उनके गीत सुनकर लोगों के क़दम रुक जाते हैं। दिलों की धड़कन बढ़ जाती है। फ़िल्मी गीत के लफ़्ज़ों में उन्होंने शायरी की सुगंध घोल दी। उनके गीत सुनने वालों को एक ख़ूबसूरत एहसास से तरबतर कर जाते हैं।

15 अप्रैल 1922 को जयपुर में जन्मे हसरत जयपुरी का इंतक़ाल 17 सितंबर 1999 को मुंबई में हुआ। उन्होंने कई ऐसे गीत लिखे हैं जो आज भी फ़िज़ाओं में गूंज रहे हैं और उनकी मौजूदगी का एहसास करा रहे हैं। आइए हम भी उनका एक गीत गुन गुनाएं-

तेरी प्यारी प्यारी सूरत को किसी की नज़र ना लगे
चश्मे बद्दूर...
मुखड़े को छुपा लो आँचल में कहीं मेरी नज़र ना लगे
चश्मे बद्दूर…

यूँ ना अकेले फिरा करो सबकी नज़र से डरा करो
फूल से ज़्यादा नाज़ुक हो तुम चाल संभलकर चला करो
ज़ुल्फ़ों को गिरा लो गालों पर मौसम की नज़र ना लगे
चश्मे बद्दूर…

एक झलक जो पाता है राही वहीं रुक जाता है
देख के तेरा रूप सलोना चाँद भी सर को झुकाता है
देखा ना करो तुम आईना कहीं ख़ुद की नज़र ना लगे
चश्मे बद्दूर...

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आपका-
देवमणि पांडेय

Devmani Pandey : B-103, Divya Stuti, 
Kanya Pada, Gokuldham, Film City Road,
Goregaon East, Mumbai-400063, M : 98210-82126

शुक्रवार, 8 मई 2020

राही मासूम रज़ा : महाभारत' के गंगापुत्र

मुम्बई के बॉलीवुड में फ़िल्म लेखक राही मासूम रज़ा





हिंदुस्तान के घर घर में 'महाभारत' की धूम मची हुई थी। इस धारावाहिक के पटकथा-संवाद लेखक थे डॉ राही मासूम रज़ा। एक दिन मैंने उन्हें फ़ोन किया- मेरे दोस्त कथाकार धीरेंद्र अस्थाना आपको अपना कहानी संग्रह भेंट करना चाहते हैं। वे ख़ुश हो गए। उन्होंने हम दोनों को घर बुलाया। गपशप हुई और वे धीरेंद्र अस्थाना के कहानी संग्रह 'जो मारे जाएंगे' का लोकार्पण करने के लिए तैयार हो गए।







लोकार्पण के दिन 12 जनवरी 1991 को 4:00 बजे मैं उनके घर पहुंचा। वे शेरवानी पहन कर तैयार थे। घर से बाहर निकलते समय वह हमेशा शेरवानी पहनते थे। उन्होंने चाय पिलाई और चलने के लिए खड़े हो गए। मैंने कहा- थोड़ी देर बाद चलें नहीं तो समय से पहले पहुंच जाएंगे। वे बोले- समय से पहले पहुंच जाएंगे तो बेहतर होगा। आप जैसे नौजवानों के साथ बैठकर गुफ़्तगू करेंगे।

बांद्रा बैंड स्टैंड के उनके निवास 'देवदूत' से उनकी कार जैसे ही आगे बढ़ी उन्होंने पूछा- तुम्हें 'महाभारत' कैसा लग रहा है। मैंने कहा- मुझे तो अच्छा लग रहा है। कुछ लोगों को शिकायत है कि आपने कुछ पात्रों को उभरने का अवसर नहीं दिया जैसे कि कर्ण। वे बोले- उसे तो हमने संवार कर और सुधार कर ही पेश किया है। हम मूल कृति के हिसाब से चलते तो दर्शकों की भारी नाराज़गी मोल लेनी पड़ती। मूल कृति में उसकी उतनी आदर्श छवि नहीं है जितनी लोगों के दिलों में है। हमें जन भावनाओं का ख़याल रखना पड़ता है।

साहित्यिक कृतियों पर धारावाहिक
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साहित्यिक कृतियों पर बनने वाले धारावाहिकों पर मैंने उनकी राय पूछी। रज़ा साहब बोले- कृति और कृतिकार का नाम भुनाना ग़लत बात है। मुझे ऐसे सीरियल देखकर काफ़ी दुख हुआ। दूसरी भाषाओं के लोगों ने सुन रखा है कि 'मैला आंचल' हिंदी साहित्य का मास्टर पीस है। उस पर सीरियल देखने के बाद क्या दूसरी भाषाओं के लोग उसे पढ़ने की ज़रूरत महसूस करेंगे। यह अपने ही साहित्य को दूसरों की नज़रों में गिराने की हिमाक़त है। गोविंद निहलानी ने 'तमस' को अच्छे तरीक़े से पेश किया। साहित्य की मशहूर कृतियों को ईमानदारी के साथ फ़िल्माना चाहिए। यह ज़रूरी है कि सीरियल देखने के बाद दर्शकों में उसे पढ़ने की जिज्ञासा उत्पन्न हो और पढ़ने के बाद उन्हें निराशा न महसूस हो।

चंद फॉर्मूलों पर खड़ीं हिंदी फिल्में
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आप जैसे अच्छे लेखकों के बावजूद हिंदी फ़िल्में चंद फार्मूलों पर ही क्यों बनती हैं? मेरे इस सवाल पर वे मुस्कुराए- यह सुरक्षित और आसान रास्ता है। सेंसर भी जल्दी पास कर देता है। पब्लिक को भी शिकायत नहीं होती। अगर निर्माता को दस बार अदालत जाना पड़े तो उसकी कमर ही टूट जाएगी। इसलिए वह किसी नए विषय पर फ़िल्म बनाने का ख़तरा नहीं उठाना चाहता। यह डर भी रहता है कि अगर नए विषय को दर्शकों ने पसंद नहीं किया तो निर्माता डूब जाएगा। मैंने फ़िल्म 'अंधा क़ानून' में लीक से हटकर कुछ संवाद लिख दिए थे। उस पर लोगों ने चार मुक़दमे ठोक दिए। मुझे कई बार अदालतों के चक्कर लगाने पड़े। मैं मुंबई में हूं लेकिन मुक़दमा लखनऊ और देवरिया में दाख़िल कर दिया गया। निर्माता की फ़िल्म के साथ ऐसा हो जाए तो वह बेचारा ज़िंदा कैसे रहेगा। यही कारण है कि जोख़िम उठाने के बजाय वे उसी बंधी बंधाई लीक पर चलना ज़्यादा पसंद करते हैं।

रज़ा साहब ने बताया- फ़िल्म जगत में आज भी लेखक की स्थिति अच्छी नहीं है। वह अपनी मर्ज़ी से मनचाहा काम नहीं कर सकता। दूसरों का दख़ल बहुत ज़्यादा है। एक लेखक ने जो स्क्रिप्ट लिखी है उसे निर्माता की बीवी, उसका नौकर या उसका ड्राइवर कोई भी बदलने का सुझाव दे सकता है और उसे उनकी बात माननी पड़ती है।

गालियों वाला उपन्यास 'आधा गांव'
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रज़ा साहब ने कहा- मुझे रूढ़ियों के बजाय नया रास्ता अख़्तियार करना ज़्यादा अच्छा लगता है। मैंने 'आधा गांव' लिखा तो कोई प्रकाशक छापने को तैयार नहीं था। वे कहते इसमें तो गाली है। फिर एक रास्ता निकाला गया। पुस्तक के आवरण पर एक पट्टी लगाई गई- "जो लोग गालियों को अश्लील नहीं मानते वही इसे पढ़ें"। 'टोपी शुक्ला' पर भी विवाद हुआ मगर रज़ा साहब रूढ़िवादियों से कभी नहीं डरे। समाज की कुरीतियों और संकीर्ण मानसिकता का पर्दाफ़ाश करने में उन्हें कभी हिचक नहीं महसूस हुई।

जब देश के बड़े बड़े साहित्यकार अयोध्या मसले पर अपनी राय व्यक्त करने से क़तरा रहे थे तब रज़ा साहब ने बयान दिया- "उस जगह को राष्ट्रीय स्मारक घोषित कर दिया जाए"। राही मासूम रज़ा ग़लतियों के लिए कबीर की तरह हिंदुओं को भी डांटते थे और मुसलमानों को भी। उर्दू और हिंदी को उन्होंने कभी अलग करके नहीं देखा। अपने भारतीय होने पर उन्हें गर्व था। इसलिए विभाजन की तकलीफ़ झेलकर भी उन्होंने पलायन नहीं किया। इसी ज़मीन पर उन्होंने अपना बसेरा बनाया और आखिरी सांस भी यहीं की हवा में ली।

एक स्कूल मास्टर की दुर्भाग्य कथा
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रज़ा साहब की कार में जब हम लोग चर्चगेट पहुंचने वाले थे तो मैंने पूछा- इन दिनों आप क्या लिख रहे हैं? उन्होंने बताया- एक स्कूल मास्टर पर उपन्यास लिखना तय किया है। एक स्कूल मास्टर बच्चों को कितने साल पढ़ाता है। सिखाता है। किशोर होते ही यही बच्चे राजनीति के मुहरे बन जाते हैं। देश को जोड़ने के बजाय तोड़ने का कार्य शुरू कर देते हैं। ऐसी स्थितियों के चित्रण के साथ मेरी यह किताब एक स्कूल मास्टर की दुर्भाग्य कथा होगी। 

रज़ा साहब को जैसे कुछ याद आ गया हो, वे बोले- मैं कुछ दिन पहले दिल्ली गया था। आडवाणी जी से मुलाक़ात हुई। गपशप हुई। मैंने कहा- आडवाणी जी, जब से देश आज़ाद हुआ तब से हमारे मुल्क में कितने सांप्रदायिक दंगे हुए? वे सोच में पड़ गए। मैंने कहा- अंदाज़ से ही बताइए। वे बोले- यही कोई तक़रीबन तीन हज़ार। मैंने कहा- आडवाणी जी, सिंध में एक दंगा हुआ और आप वतन छोड़कर चले आए। मैं तो तीन हज़ार दंगे झेलने के बाद भी यहीं टिका हुआ हूँ। अब आप लोगों को राष्ट्रीयता का पाठ पढ़ा रहे हैं। आडवाणी जी एकदम ख़ामोश हो गए। यह कहकर रज़ा साहब ने उन्मुक्त भाव से एक ठहाका लगाया।

साहित्य हवा में ज़िंदा नहीं रह सकता
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हम लोग एसएनडीटी के कान्फ्रेंस हाल में पहुंचे। धीरेंद्र अस्थाना के कहानी संग्रह 'जो मारे जाएंगे' के लोकार्पण समारोह में कथाकार गोविंद मिश्र और कथाकार शैलेश मटियानी की मौजूदगी में रज़ा साहब ने कहा- "कहानी हो या कविता, साहित्य की हर विधा की जड़ें ज़मीन में होती हैं। साहित्य हवा में ज़िंदा नहीं रह सकता।" अपने जीवन और अपनी रचना में रज़ा साहब ज़मीन से जुड़े भारतीय साहित्यकार थे। इसलिए वे हमारी स्मृतियों में हमेशा ज़िंदा रहेंगे। मेरी इच्छा थी कि किसी दिन उनसे लंबी बातचीत करूंगा। मगर अगले साल 15 मार्च 1992 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।

1 सितंबर 1927 को उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ीपुर ज़िले के गंगौली गांव में जन्मे राही मासूम रज़ा ख़ुद को गंगापुत्र कहते थे। उन्होंने अलीगढ़ विश्वविद्यालय से उर्दू में एम ए और पीएचडी किया। दो साल अलीगढ़ विश्वविद्यालय में उर्दू के प्राध्यापक रहे। मगर उन्होंने 'आधा गांव', 'दिल एक सादा काग़ज़', 'ओस की बूंद' 'टोपी शुक्ला' और 'हिम्मत जौनपुरी' आदि... अपनी सभी किताबें हिंदी में प्रकाशित कराईं। डॉ राही मासूम रज़ा को बचपन में पोलियो का शिकार बनना पड़ा। इसलिए वे एक पैर से थोड़ा लंगड़ाकर चलते थे। ग्यारह साल की उम्र में उन्हें टीबी हो गयी थी। पढ़ाई छोड़ कर उन्हें तीन साल घर में बिताने पड़े। बाद में उन्होंने पढ़ाई पूरी की। 

पद्मभूषण रज़ा को फ़िल्म फेयर अवार्ड
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सन् 1968 में रज़ा साहब मुंबई आ गए थे। उन्होंने फ़िल्म जगत को और फ़िल्म जगत ने उन्हें अपना लिया। आलाप, लमहे, गोलमाल, कर्ज़, आईना, मिली, परम्परा और अंधा क़ानून जैसी कई फिल्मों में उन्होंने संवाद लेखन का जलवा दिखाया। 'मैं तुलसी तेरे आंगन की' फ़िल्म के लिए सन् 1979 में उन्हें फ़िल्म फेयर अवार्ड मिला। भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री और पद्मभूषण से सम्मानित किया। 

रज़ा साहब शायर पहले थे लेखक बाद में बने। शायर अपना तख़ल्लुस नाम के बाद में लगाते हैं। मासूम रज़ा ने अपना तख़ल्लुस 'राही' नाम के पहले लगाया। उनका ग़ज़ल संग्रह 'ग़रीब ए शहर' प्रकाशित हुआ। उनकी एक ग़ज़ल चित्रा और जगजीत सिंह की आवा्ज़ में बेहद लोकप्रिय हुई-

हम तो हैं परदेस में, देस में निकला होगा चांद
अपनी रात की छत पर कितना तनहा होगा चांद

क़िस्सा महाभारत के संवाद लेखन का
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'महाभारत' धारावाहिक के संवाद लेखन के लिए जब बीआर चोपड़ा ने डॉ राही मासूम रज़ा से संपर्क किया तो रज़ा साहब ने मना कर दिया। पता नहीं कैसे यह ख़बर मीडिया में चली गई। कई अख़बारों में समाचार छप गया कि 'महाभारत' के संवाद डॉ राही मासूम रज़ा लिखेंगे। इसके बाद बीआर चोपड़ा के पास ढेर सारे पत्र आए। कई पत्रों में यह लिखा था कि क्या सारे हिंदू लेखक मर गए हैं जो आप एक मुस्लिम लेखक से महाभारत के संवाद लिखा रहे हैं। बीआर चोपड़ा ने सारे पत्र डॉ राही मासूम रज़ा के पास भिजवा दिए। उन्हें पढ़कर रज़ा साहब ने ख़ुद चोपड़ा साहब को फ़ोन करके कहा- मैं गंगापुत्र हूँ। मैं ही 'महाभारत' के संवाद लिखूंगा। इतना ही नहीं उन्होंने छोटे पर्दे के इस सबसे लोकप्रिय धारावाहिक की पटकथा भी लिखी।

सशक्त संवादों के ज़रिए चरित्रों को कैसे जीवंत किया जाता है यह रज़ा साहब ने 'महाभारत' धारावाहिक में साबित कर दिया। उनके बेहतरीन संवादों के लिए पूरे हिंदुस्तान ने कृतज्ञता महसूस की। हर धर्म, हर मज़हब के लोगों ने मुक्त कंठ से उनकी तारीफ़ की। 'महाभारत' धारावाहिक के दिवंगत गीतकार पं नरेंद्र शर्मा की याद में राही मासूम रज़ा ने एक कविता लिखी थी- 'वह पान भरी मुस्कान'।

वह पान भरी मुस्कान
न जाने कहाँ गई ?
जो दफ्तर में,
इक लाल गदेली कुर्सी पर,
धोती बाँधे,
इक सभ्य सिल्क के कुर्ते पर,
मर्यादा की बण्डी पहने,
आराम से बैठा करती थी,

वह पान भरी मुस्कान तो
उठकर चली गई !
पर दफ्तर में,
वो लाल गदेली कुर्सी
अब तक रक्खी है,
जिस पर हर दिन,
अब कोई न कोई
आकर बैठ जाता है

खुद मैं भी अक्सर बैठा हूँ
कुछ मुझसे बड़े भी बैठे हैं,
मुझसे छोटे भी बैठे हैँ
पर मुझको ऐसा लगता है
वह कुरसी लगभग
एक बरस से ख़ाली है !

रज़ा साहब पान और मिठाई के बेहद शौक़ीन थे। डॉ धर्मवीर भारती और कथाकार कमलेश्वर से उनकी अच्छी दोस्ती थी। 'धर्मयुग' और 'सारिका' में उनकी कई कहानियां प्रकाशित हुईं। शुरुआती दौर में उन्होंने छद्म नाम से कई जासूसी उपन्यास भी लिखे थे। मुंबई में बसने के बावजूद उन्होंने अपने गांव से रिश्ता बनाए रखा। कहा जाता है कि उन्होंने ग्रामीण इलाकों में कई स्कूल खुलवाए। गाँव में छोटे-छोटे कई पुल बनवाए। ग़रीब परिवार की लड़कियों की शादी में आर्थिक सहयोग दिया। 

यह हमारी ख़ुशक़िस्मती है कि कोरोना लॉक डाउन के दौर में इस गंगापुत्र के संवाद फिर से घर घर में गूंज रहे हैं। सबको सुकून और सम्बल दे रहे हैं।

राही मासूम रज़ा की एक ग़ज़ल
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अजनबी शहर के अजनबी रास्ते, मेरी तन्हाई पर मुस्कुराते रहे
मैं बहुत देर तक यूं ही चलता रहा, तुम बहुत देर तक याद आते रहे

ज़हर मिलता रहा ज़हर पीते रहे, रोज़ मरते रहे रोज़ जीते रहे
ज़िंदगी भी हमें आज़माती रही, और हम भी उसे आज़माते रहे

ज़ख़्म जब भी कोई ज़ह्न-ओ-दिल पे लगा, ज़िंदगी की तरफ़ इक दरीचा खुला
हम भी गोया किसी साज़ के तार हैं, चोट खाते रहे गुनगुनाते रहे

कल कुछ ऐसा हुआ मैं बहुत थक गया, इसलिए सुन के भी अनसुनी कर गया
इतनी यादों के भटके हुए कारवाँ, दिल के ज़ख़्मों के दर खटखटाते रहे

सख़्त हालात के तेज़ तूफ़ान में, घिर गया था हमारा जुनूने-वफ़ा
हम चराग़े-तमन्ना जलाते रहे, वो चराग़े-तमन्ना बुझाते रहे

🍁

आपका-
देवमणि पांडेय

Devmani Pandey : B-103, Divya Stuti, 
Kanya Pada, Gokuldham, Film City Road,
Goregaon East, Mumbai-400063
M : 98210-82126


बुधवार, 15 अगस्त 2018

देवमणि पांडेय की ग़ज़ल अँधेरे अभी आशियानों में हैं


देवमणि पांडेय की ग़ज़ल

अँधेरे अभी आशियानों में हैं
उदासी के मंज़र मकानों में हैं 
    
ज़ुबां वाले भी काश समझें कभी 
वो दुःख-दर्द जो बेज़ुबानों में हैं

परिंदों की परवाज़ कायम रहे 
कई ख़्वाब शामिल उड़ानों में हैं

घरों में हैं महरूमियों के निशां
कि अब रौनक़ें बस दुकानों में हैं

कहाँ गुम है मंज़िल पता ही नहीं
निगाहें मगर आसमानों में हैं

मुहब्बत को मौसम ने आवाज़ दी 

दिलों की पतंगें उड़ानों में हैं


Contact : 98210-82126 

देवमणि पांडेय ग़ज़ल : इक फूल मुहब्बत का




देवमणि पांडेय ग़ज़ल

इक फूल मुहब्बत का फिर दिल में खिले कोई
इस शहर की गलियों में अपना तो मिले कोई

आ जाए मुहब्बत का इस सिम्त कोई झोंका
उम्मीद की शाख़ों पे पत्ता तो हिले कोई

आँखों में उतर आए चेहरा वो ग़ज़ल जैसा
फिर नींद मेरी महके,फिर ख़्वाब खिले कोई

उजड़े हुए इस दिल की बस इतनी तमन्ना है
फिर टूट के पहले-सा एक बार मिले कोई

होंठों से नहीं कहता क्या मुझसे शिकायत है
ख़ामोश निगाहों से करता है गिले कोई



Contact : 98210-82126 

मंगलवार, 16 मई 2017

देवमणि पांडेय की ग़ज़ल : हर फ़िक्र हर ख़याल को







  देवमणि पांडेय ग़ज़ल

हर फ़िक्र हर ख़याल को बेहतर बना दिया
मुझको मुहब्बतों ने सुख़नवर बना दिया

रुख़सत किया था मैंने उसे ख़ुशदिली के साथ
आँखों को उसने मेरी समंदर बना दिया

सादा पड़ा हुआ था मेरे दिल का कैनवास
इक चेहरा था निगाह में उसपर बना दिया

सूरज का हाथ थाम के जब शाम आ गई
बच्चे ने गीली रेत पर इक घर बना दिया

शीशे के जिस्म वालों से ये पूछिए कभी
दिल आईना था क्यूँ उसे पत्थर बना दिया

कोई किसी के इश्क़ में बेदाम बिक गया
तक़दीर ने किसी को सिकंदर बना दिया

Contact : 98210-82126

बुधवार, 25 जनवरी 2017

देवमणि पांडेय की ग़ज़ल : परवाज़ की तलब




देवमणि पांडेय की ग़ज़ल 

परवाज़ की तलब है अगर आसमान में
ख़्वाबों को साथ लीजिए अपनी उड़ान में

मोबाइलों से खेलते बच्चों को क्या पता
बैठे हैं क्यूँ उदास खिलौने दुकान में

ये धूप चाहती है कि कुछ गुफ़्तगू करे
आने तो दीजिए उसे अपने मकान में

लफ़्ज़ों से आप लीजिए मत पत्थरों का काम
थोड़ी मिठास घोलिए अपनी ज़ुबान में

जो कुछ मुझे मिला है वो मेहनत से ही मिला
मैं ख़ुश बड़ा हूँ दोस्तो छोटे मकान में

हम सबके सामने जिसे अपना तो कह सकें
क्या हमको वो मिलेगा कभी इस जहान में

उससे बिछड़के ऐसा लगा जान ही गई
वो आया जान आ गई है फिर से जान में




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गुरुवार, 19 मई 2016

देवमणि पांडेय की ग़ज़ल : दीन-धरम बस यही है अपना



देवमणि पांडेय की ग़ज़ल


दीन-धरम बस यही है अपना साथ इसी के जीना है 
प्यार छुपा है जिस दिल में वो काशी और मदीना है 

मोल-भाव की इस नगरी में सबके अपने-अपने दाम 
मगर है क़ीमत जिसकी ज़्यादा समझो वही नगीना है 

गुज़रा है यह साल भी जैसे कोई तपता रेगिस्तान 
साथ सफ़र में रहने वाला अपना ख़ून-पसीना है 

नफ़रत का इक चढ़ता दरिया प्यार का साहिल कोसों दूर 
वक़्त के हाथों में पतवारें, डाँवाडोल सफ़ीना है 

गंगा, यमुना और गोमती सबके चेहरे स्याह हुए 
ज़हर घुला है दरियाओं में फिर भी हमको पीना है 




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