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बुधवार, 15 अगस्त 2018

देवमणि पांडेय ग़ज़ल : इक फूल मुहब्बत का




देवमणि पांडेय ग़ज़ल

इक फूल मुहब्बत का फिर दिल में खिले कोई
इस शहर की गलियों में अपना तो मिले कोई

आ जाए मुहब्बत का इस सिम्त कोई झोंका
उम्मीद की शाख़ों पे पत्ता तो हिले कोई

आँखों में उतर आए चेहरा वो ग़ज़ल जैसा
फिर नींद मेरी महके,फिर ख़्वाब खिले कोई

उजड़े हुए इस दिल की बस इतनी तमन्ना है
फिर टूट के पहले-सा एक बार मिले कोई

होंठों से नहीं कहता क्या मुझसे शिकायत है
ख़ामोश निगाहों से करता है गिले कोई



Contact : 98210-82126 

शुक्रवार, 17 जनवरी 2014

देवमणि पांडेय ग़ज़ल : ये चाह कब है मुझे





देवमणि पांडेय ग़ज़ल

ये चाह कब है मुझे सब का सब जहान मिले 
मुझे तो मेरी ज़मीं, मेरा आसमान मिले 

कमी नहीं है सजावट की इन मकानों में 
सुकून भी तो कभी इनके दरमियान मिले 
   
ये मेरा शहर या ख़्वाबों का कोई मक़्तल है 
क़दम-क़दम पे लहू के यहाँ निशान मिले 

हर इक ज़ुबां पे है तारी अजब-सी ख़ामोशी 
हर इक नज़र में मगर अनगिनत बयान मिले 

जवां हैं ख़्वाब क़फ़स में भी जिन परिंदों के 
मेरी दुआ है उन्हें फिर से आसमान मिले

हो जिसमें प्यार की ख़ुशबू, मिठास चाहत की
हमारे दौर को ऐसी भी इक ज़बान मिले  
  

रवि 2 फरवरी 2014 की शाम को रवींद्र नाट्य भवन इंदौर में संगीतकार राजेश रोशन  और मंच पर संचालक देवमणि पांडेय


शुक्रवार, 10 जनवरी 2014

देवमणि पांडेय ग़ज़ल : ये दुनिया है यहाँ कब कौन



             देवमणि पांडेय ग़ज़ल

ये दुनिया है यहाँ कब,कौन,किसका साथ देता है
जिसे अपना बनाओ, ग़म की वो सौग़ात देता है

अनोखे मोड़ आते हैं नज़र के खेल में उस पल
हमारा दिल हमें ही जब अचानक मात देता है

अजब है इश्क़ का बादल कि वो प्यासी निगाहों को
कभी तो ख़्वाब देता है, कभी बरसात देता है

ये ख़ुशियाँ फेर लेती हैं निगाहें दो क़दम चलकर
मगर ग़म तो हमारा ज़िंदगी भर साथ देता है
 
यही तो इश्क़ है साहब कि जो पत्थर के सीने में
कभी धड़कन, कभी नग़मा, कभी जज़्बात देता है

उज्जैन की गायिकाओं के साथ संयोजक केशव राय, संचालक देवमणि पांडेय और संगीतकार राजेश रोशन

देवमणि पांडेय : 98210-82126

शुक्रवार, 20 दिसंबर 2013

देवमणि पांडेय ग़ज़ल : यूँ बज़ाहिर देखिए तो फ़ासला




देवमणि पांडेय ग़ज़ल

यूँ बज़ाहिर देखिए तो फ़ासला कोई नहीं
पर किसी के दिल के अंदर झाँकता कोई नहीं

मुस्कराके तुम तो रुख़सत हो गए हमसे मगर
दिल पे क्या गुज़री हमारे जानता कोई नहीं

सोचता हूँ क्यूँ सभी को अजनबी लगता हूँ मैं
क्यूँ मु्झे मेरे सिवा पहचानता कोई नहीं

चंद वादों में सिमट कर रह गई है आशिक़ी
टूटकर अब क्यूँ किसी को चाहता कोई नहीं

एक ही कमरे में दोनों रह रहे हैं साथ-साथ
फिरभी उनके दिल जुदा हैं राब्ता कोई नहीं

मुस्कराकर उसने पूछा हम-सा देखा है कोई
हमने उससे कह दिया बेसाख़्ता कोई नहीं 

मुम्बई की जहाँगीर आर्ट गैलरी में बिजूका सीरीज़ की पेंटिंग प्रदर्शिनी के उदघाटन समारोह में लेखक-अभिनेता अतुल तिवारी, कवि देवमणि पांडेय, चित्रकार अवधेश मिश्रा, फ़िल्मकार श्याम बेनेगल और एक महिला चित्रकार। 25.05.2011