शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

हम तो सूरज हैं सर्द मुल्कों के : सूर्यभानु गुप्त की ग़ज़लें

परिचय : कवि सूर्यभानु गुप्त 

जन्म : 22 सितम्बर, 1940, नाथूखेड़ा (बिंदकी), जिला : फ़तेहपुर ( .प्र.) बचपन से ही मुंबई में 12 वर्ष की उम्र से कविता लेखन।

प्रकाशन : पिछले 50 वर्षो के बीच विभिन्न काव्य-विधाओं में 600 से अधिक रचनाओं के अतिरिक्त 200 बालोपयोगी कविताएँ प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। समवेत काव्य-संग्रहों में संकलित एवं गुजराती, पंजाबी, अंग्रेजी में अनूदित

फ़िल्म गीत-लेखन : ‘गोधूलि’ (निर्देशक गिरीश कर्नाड ) एवंआक्रोशतथासंशोधन’ (निर्देशक गोविन्द निहलानी ) जैसी प्रयोगधर्मा फ़िल्मों के अतिरिक्त कुछ नाटकों तथा आधा दर्जन दूरदर्शन- धारवाहिकों में गीत शामिल।
प्रथम काव्य-संकलन : एक हाथ की ताली (1997), वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली – 110 002
​​पुरस्कार : 1. भारतीय बाल-कल्याण संस्थान, कानपुर , 2. परिवार पुरस्कार (1995), मुम्बई
पेशा : 1961 से 1993 तक विभिन्न नौकरियाँ सम्प्रति स्वतंत्र लेखन

सम्पर्क : 2, मनकू मेंशन, सदानन्द मोहन जाधव मार्ग, दादर ( पूर्व ), मुम्बई- 40001,
दूरभाष : 099694-71516 / 022-2413-7570


सूर्यभानु गुप्त की ग़ज़लें

(1)


पहाड़ों के क़दों की खाइयाँ हैं
बुलन्दी पर बहुत नीचाइयाँ हैं

ऐसी तेज़ रफ़्तारी का आलम
कि लोग अपनी ही ख़ुद परछाइयाँ हैं

गले मिलिए तो कट जाती हैं जेबें
बड़ी उथली यहाँ गहराइयाँ हैं

हवा बिजली के पंखे बाँटते हैं
मुलाज़िम झूठ की सच्चाइयाँ हैं

बिके पानी समन्दर के किनारे
हक़ीक़त पर्वतों की राइयाँ हैं

गगन-छूते मकां भी, झोपड़े भी
अजब इस शहर की रानाइयाँ हैं

दिलों की बात ओंठों तक आए
कसी यूँ गर्दनों पर टाइय़ाँ हैं

नगर की बिल्डिंगें बाँहों की सूरत
बशर टूटी हुई अँगड़ाइयाँ हैं

जिधर देखो उधर पछुआ का जादू
सलीबों पर चढ़ीं पुरवाइयाँ हैं

नई तहज़ीब ने ये गुल खिलाए
घरों से लापता अँगनाइयाँ हैं

असर में लोग यूँ हैं रोटियों के
ख़यालों तक गईं गोलाइयाँ हैं

यहाँ रद्दी में बिक जाते हैं शाइर
गगन ने छोड़ दी ऊँचाइयाँ हैं

कथा हर ज़िंदगी की द्रोपदी-सी
बड़ी इज़्ज़त-भरी रुस्वाइयाँ हैं

जो ग़ालिब आज होते तो समझत
ग़ज़ल कहने में क्या कठिनाइयाँ हैं

( 2)

अपने घर में ही अजनबी की तरह
मैं सुराही में इक नदी की तरह

एक ग्वाले तलक गया कर्फ़्यू
ले के सड़कों को बन्सरी की तरह

किससे हारा मैं, ये मेरे अन्दर
कौन रहता है ब्रूस ली की तरह

उसकी सोचों में मैं उतरता हूँ
चाँद पर पहले आदमी की तरह

अपनी तनहाइयों में रखता है
मुझको इक शख़्स डायरी की तरह

मैंने उसको छुपा के रक्खा है
ब्लैक आउट में रोशनी की तरह

टूटे बुत रात भर जगाते हैं
सुख परीशां है गज़नवी की तरह

बर्फ़ गिरती है मेरे चेहरे पर
उसकी यादें हैं जनवरी की तरह

वक़्त-सा है अनन्त इक चेहरा
और मैं रेत की घड़ी की तरह

(3)
हर लम्हा ज़िन्दगी के पसीने से तंग हूँ
मैं भी किसी क़मीज़ के कॉलर का रंग हूँ

मोहरा सियासतों का, मेरा नाम आदमी
मेरा वुजूद क्या है, ख़लाओं की जंग हूँ

रिश्ते गुज़र रहे हैं लिये दिन में बत्तियाँ
मैं बीसवीं सदी की अँधेरी सुरंग हूँ

निकला हूँ इक नदी-सा समन्दर को ढूँढ़ने
कुछ दूर कश्तियों के अभी संग-संग हूँ

माँझा कोई यक़ीन के क़ाबिल नहीं रहा
तनहाइयों के पेड़ से अटकी पतंग हूँ

ये किसका दस्तख़त है, बताए कोई मुझे
मैं अपना नाम लिख के अँगूठे -सा दंग हूँ

(4)

सुबह लगे यूँ प्यारा दिन
जैसे नाम तुम्हारा दिन

पाला हुआ कबूतर है
उड़, लौटे दोबारा दिन

दुनिया की हर चीज़ बही
चढ़ी नदी का धारा दिन

कमरे तक एहसास रहा
हुआ सड़क पर नारा दिन

थर्मामीटर कानों के
आवाज़ो का पारा दिन

पेड़ों-जैसे लोग कटे
गुज़रा आरा-आरा दिन

उम्मीदों ने टाई-सा
देखी शाम, उतारा दिन

चेहरा-चेहरा राम-भजन
जोगी का इकतारा दिन

रिश्ते आकर लौट गए
हम-सा रहा कुँवारा दिन

बाँधे-बँधा दुनिया के
जन्मों का बन्जारा दिन

अक्ल़मन्द को काफ़ी है
साहब ! एक इशारा दिन

(5)


जिनके अंदर चिराग जलते हैं
घर से बाहर वही निकलते हैं

बर्फ़ गिरती है जिन इलाकों में
धूप के कारोबार चलते हैं

दिन पहाड़ों की तरह कटते हैं
तब कहीं रास्ते निकलते हैं

ऐसी काई है अब मकानों पर
धूप के पाँव भी फिसलते हैं

खुदरसी उम्र भर भटकती है
लोग इतने पते बदलते हैं

हम तो सूरज हैं सर्द मुल्कों के
मूड आता है तब निकलते हैं

(6)

दिल में ऐसे उतर गया कोई
जैसे अपने ही घर गया कोई

एक रिमझिम में बस, घड़ी भर की
दूर तक तर--तर गया कोई

आम रस्ता नहीं था मैं, फिर भी
मुझसे हो कर गुज़र गया कोई
दिन किसी तरह कट गया लेकिन
शाम आई तो मर गया कोई

इतने खाए थे रात से धोखे
चाँद निकला कि डर गया कोई

किसको जीना था छूट कर तुझसे
फ़लसफ़ा काम कर गया कोई

मूरतें कुछ निकाल ही लाया
पत्थरों तक अगर गया कोई

मैं अमावस की रात था, मुझमें
दीप ही दीप धर गया कोई

इश़्क भी क्या अजीब दरिया है
मैं जो डूबा, उभर गया कोई

(7)

दिल लगाने की भूल थे पहले
अब जो पत्थर हैं फूल थे पहले

तुझसे मिलकर हुए हैं पुरमानी
चाँद तारे फिजूल थे पहले

अन्नदाता हैं अब गुलाबों के
जितने सूखे बबूल थे पहले

लोग गिरते नहीं थे नज़रों से
इश्क के कुछ उसूल थे पहले

जिनके नामों पे आज रस्ते हैं
वे ही रस्तों की धूल थे पहले

आपका-
देवमणि पांडेय

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति,
कन्या पाडा, गोकुलधाम, फ़िल्म सिटी रोड,
गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210 82126

रविवार, 18 अप्रैल 2010

आए थे हँसते खेलते मयख़ाने में फ़िराक़


हज़ार बार ज़माना इधर से गुज़रा है
-------------------------------------------------------------

अब अकसर चुप चुप से रहे हैं यूं ही कभू लब खोले हैं
पहले फ़िराक़ को देखा होता, अब तो बहुत कम बोले हैं


इलाहाबाद के एक मुशायरे में फ़िराक़ गोरखपुरी जब ग़ज़ल पढ़ने के लिए खड़े हुए तो श्रोताओं में ज़रा सी फुसफुसाहट हुई फिर शोर मच गया । श्रोतागण ज़ोर ज़ोर से हँसने लगे । फ़िराक़ साहब भड़क गए – लगता है आज मूंगफली बेचने वालों ने अपनी औलादों को मुशायरा सुनने भेज दिया है । मंच पर बैठे शायरों की निगाह फ़िराक़ साहब की तरफ़ गई तो पता चला कि शेरवानी के नीचे से उनका नाड़ा लटक रहा है । और पब्लिक उसे ही देखकर हँस रही है । मगर किसकी मजाल कि फ़िराक़ साहब को आगाह करे। अचानक शायर कैफ़ी आज़मी उठकर फ़िराक़ साहब के पास गए । उनकी शेरवानी उठाकर लटकते नाड़े को कमर में खोंस दिया और वापस अपनी जगह बैठ गए । फिर पब्लिक की हँसी थम गई और फ़िराक़ साहब ने अपने निराले अंदाज में ग़ज़ल पढ़ी -

किसी का यूँ तो हुआ कौन उम्र भर फिर भी
ये हुस्नो-इश्क़ तो धोखा है सब मगर फिर भी
हज़ार बार ज़माना इधर से गुज़रा है
नई-नई सी है कुछ तेरी रहगुज़र फिर भी

यह आंखों देखा हाल बताया मुंबई के वरिष्ठ शायर ज़फ़र गोरखपुरी ने। वे भी मंच पर मौजूद थे। भारतीय ज्ञानपीठ की तरफ़ से 1971 में साहित्य का सर्वोच्च सम्मान ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ मिलने के बाद एक इंटरव्यू में फ़िराक़ साहब ने कह दिया कि उर्दू ग़ज़ल को हिंदुस्तान में आए अर्सा हो गया । लेकिन हैरत की बात है कि इसमें यहां के खेत-खलिहान, समाज, संस्कृति, गंगा-यमुना और हिमालय क्यों नहीं दिखाई पड़ते। इन कमियों को ख़ुद फ़िराक़ साहब ने दूर करने की कोशिश की । सूरदास के कृष्ण की परम्परा में उनकी एक रुबाई देखिए -

आंगन में ठुनक रहा ज़िदयाया है
बालक तो भई चांद पे ललचाया है,
दरपन उसे दे के कह रही है मां
देख, आईने में चांद उतर आया है


यहां तक कि फ़िराक़ साहब ने उर्दू शायरी के ऐंद्रिक सौंदर्य को सांस्कृतिक लिबास पहना कर उसे पाकीज़गी तक पहुँचाने का नेक काम भी किया –

लहरों में खिला कंवल नहाए जैसे
दोशीज़ा -ए -सुब्ह गुनगुनाए जैसे
ये रुप, ये लोच, ये तरन्नुम, ये निखार
बच्चा सोते में मुस्कराए जैसे


ऐसा माना जाता है कि जब हम किसी बड़ी शख़्सियत या कलाकार से मिलते हैं तो उसकी प्रतिभा का कुछ अंश हमें भी प्राप्त हो जाता है और हम भीतर से ख़ुद को समृद्ध महसूस करने लगते हैं। इस बारे में ज़रा फ़िराक़ साहब के फ़िक्र की उड़ान तो देखिए –

ज़रा विसाल के बाद आईना तो देख ऐ दोस्त
तेरे जमाल की दोशीज़गी निखर आई


फ़िराक़ साहब कितने ख़ुद्दार आदमी थे, इसे आप एक घटना से समझ सकते हैं। एक बार इलाहाबाद के एक मुशायरे में फ़िराक़ साहब ने ग़ज़ल पढ़ना शुरु किया- ‘कभी पाबंदियों से छुटके भी ’ मिसरा पूरा होने से पहले ही पीछे से एक आवाज़ आई - वाह वाह ! फ़िराक़ साहब उखड़ गए - कौन बदतमीज़ है यह । इसे बाहर निकालो तभी मैं पढूंगा। इतना कहकर वे अपनी जगह पर वापस जाकर बैठ गए । हाल में सन्नाटा छा गया । मुशायरे पर ब्रेक लग गया । आयोजकों ने ढूंढ़कर उस आदमी को हाल से बाहर निकाला तब फ़िराक़ साहब वापस माइक पर गए और ग़ज़ल को आगे बढ़ाया –

कभी पाबंदियों से छुटके भी दम घुटने लगता है
दरो-दीवार हों जिसमें वही ज़िंदाँ नहीं होता
हमारा ये तजुर्बा है कि ख़ुश होना मुहब्बत में
कभी मुश्किल नहीं होता कभी आसां नहीं होता


फ़िराक़ साहब मानते थे कि ग़ज़ल ज़िंदगी से बातचीत है। इस लिए तरक़्क़ीपसंद या जदीदियत की परवाह किए बिना उन्होंने हमेशा ज़िंदगी का साथ दिया। उनके चंद अशआर देखिए-

शामें किसी को मांगती हैं आज भी फ़िराक़
गो ज़िंदगी में यूं मुझे कोई कमी नहीं

काफी दिनों जिया हूं किसी दोस्त के बगैर
अब तुम भी साथ छोड़ने को कह रहे हो, ख़ैर

आए थे हँसते खेलते मयख़ाने में फ़िराक़
जब पी चुके शराब तो संजीदा हो गए

यह भी कहा जाता है कि हर दौर का अच्छा शायर हमेशा प्रगतिशील होता है।शायद इसी लिए जाने माने आलोचक कालिदास गुप्ता ‘रिज़ा’ कहते थे – फ़िराक़ साहब बींसवी सदी के सबसे बड़े शायर थे। फ़िराक़ साहब के ग़ज़ल संग्रह ‘सरगम’ की भूमिका में रमेशचंद्र द्विवेदी ने लिखा है - फ़िराक़ की शायरी में जो गूँज और प्रतिध्वनियां हमें मिलती हैं उनमें एक अद्वितीय सुहानापन है, भारत की धरती की सुगंध है, भारतीय संस्कृति के मातृत्व का स्पर्श है। ऐसा लगता है कि ग़ज़ल एक देवी के रूप में सोलहों सिंगार के साथ बाल संवारे, केश छिटकाए सामने आकर खड़ी हो जाती है और हमारे आँसुओं को अपने चुम्बन से पोंछ देती है। यह सांत्वना प्रदायिनी विशेषता उर्दू में शायद ही कहीं और मिलती हो। करुण रस और शांत रस का ऐसा संगम फ़िराक़ से पहले उर्दू कविता में बहुत कम देखा गया था। यह गुण हिंदू-कल्चर की देन है –



छिड़ गए साज़े-इश्क़ के गाने 
खुल गए ज़िंदगी के मयख़ाने
हासिले-हुस्नो-इश्क़ बस इतना 
आदमी आदमी को पहचाने

यह सच किसी से छुपा नहीं है कि फ़िराक़ साहब की ज़िंदगी दुख का समंदर थी। सन 1914 में एक साज़िश के तहत जिस लड़की से उनका विवाह हुआ वह बेहद कुरूप और अनपढ़ थी। उनके एक बेटा भी था। नवीं कक्षा में बार-बार फेल हो जाने और सहपाठियों के निर्दय मज़ाक के कारण इस लड़के ने अठारह-उन्नीस वर्ष की उम्र में ही आत्महत्या कर ली। फ़िराक़ साहब के तख़लीक के सफ़र में ग़म हमेशा हमसफ़र रहा -

मौत का भी इलाज हो शायद
ज़िंदगी का कोई इलाज नहीं
हम तो कहते हैं वो ख़ुशी ही नहीं
जिस में कुछ ग़म का इम्तिज़ाज नहीं

छियासी वर्ष की उम्र में 3 मार्च 1982 को दिल्ली में इस महान शायर का स्वर्गवास हुआ। आज भी उनकी शायरी की ख़ुशबू से पूरी दुनिया का ज़हन महक रहा है।

आपका-
देवमणि पांडेय

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, 
कन्या पाडा, गोकुलधाम, फ़िल्म सिटी रोड, 
गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210 82126 

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

दुनिया के क़ाबिल बनो बेटा सूरजभान


लोकप्रियता के मुकाम पर कवि सूर्यभानु गुप्त 

कवि सूर्यभानु गुप्त ने ज़िंदगी और समाज की समस्याओं के बरक्स हिंदी ग़ज़ल को भाषा, भाव, शैली और अभिव्यक्ति का नया तेवर दिया। उन्होंने ग़ज़ल को लोकप्रियता के उस मुकाम पर पहँचाया जो किसी शायर का ख़्वाब होता है। यह हक़ीक़त कम लोगों को ही पता है कि स्व.दुष्यंत कुमार का संकलन आने से पहले ही सूर्यभानु गुप्त की ग़ज़लें धर्मयुग में छपकर मशहूर हो चुकी थीं। उनकी प्रयोगधर्मिता और जदीदियत की चर्चा दूर तक होती थी। उस ज़माने के उनके दो शेर देखिए-

ज़िंदगी हम अदीबों की मजबूर है और मजबूर है सालहा साल से
जैसे कश्मीर फूलों का रिसता हुआ एक नासूर है सालहा साल से

हर लम्हा ज़िंदगी के पसीने से तंग हूँ
मैं भी किसी कमीज़ के कॉलर का रंग हूँ

22 जनवरी 1998 को सूर्यभान गुप्त ने मुझे अपना काव्यसंकलन एक हाथ की ताली भेंट किया था। हस्ताक्षर के साथ उन्होंने लिखा- साहित्यनामची श्री देवमणि जी को नववर्ष की शुभकानाओं के साथ। मैंने मुम्बई के सबसे लोकप्रिय सांध्यदैनिक संझा जनसत्ता’ में अपने साप्ताहिक स्तम्भ साहित्यनामचा में सूर्यभान गुप्त पर एक लेख लिखा। सुबह के अख़बार जनसत्ता में उसकी झलक छपी - आज साहित्यनामचा में पढ़िए… दुनिया के क़ाबिल बनो बेटा सूरजभान उनके पास कई लोगों के फ़ोन आए कि आपके प्रिय मित्र पांडेय जी ने तो आपकी खटिया ही खड़ी कर दी। आपको बेटा बना दिया । लेकिन वे यह सब सुनकर बस मुस्कराते रहे। उन्हें पता था कि मैंने यह शीर्षक उनके एक दोहे से लिया है। उनकी   प्रयोगधर्मिता की तारीफ़ करते हुए मैंने उनके कुछ दोहे कोट किए थे

दुनिया को मत दोष दो, टूटे जो अरमान
दुनिया के क़ाबिल बनो, बेटा सूरजभान

मुहब्बत में जब दिल जलता है तो आँखें बरसकर ठंडी हो जाती हैं। ऐसे संवेदनशील मंज़र को दोहे में ढालने का हुनर सूर्यभान गुप्त में ही है-

क्या बतलाएं, क्या लिखें, तुमको अपना हाल
दिल तो राजस्थान है , आंखें नैनीताल

दरअसल  सत्तर के दशक में उनके दोहे धर्मयुग में छपकर मशहूर हो चुके थे। जब 1995 में उन्हें काव्य साहित्य में उल्लेखनीय योगदान के लिए परिवार पुरस्कार मिला तो उस समारोह में शायर जावेद अख़्तर ने उनकी तारीफ़ करते हुए उनके कुछ दोहे ज़बानी सुना दिए तो ख़ूब तालियां बजीं


सपने मुर्दा मछलियाँ, आंखें सूखी झील
हर चेहरे के ठूँठ पर, बैठी है इक चील

सचमुच की कितनी बड़ी हमने तुमने भूल
इन आंखों में खोलकर सपनों के स्कूल

मुझे लगता है कि अगर उनका ग़ज़ल संग्रह वक़्त पर प्रकाशित हो जाता तो उसकी लोकप्रियता बेमिसाल होती। विडम्बना देखिए कि उनका पहला काव्य संकलन एक हाथ की ताली’ (वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली) तब आया जब उनको लिखते हुए 40 साल हो गए थे । आपातकाल से पहले भी सूर्यभान गुप्त की ग़ज़लें नएपन और ताज़गी का परचम लहरा रही थीं-

मुझको उदास करने की ज़िद पर तुली हुई
क्या चीज़ है ये मेरे लहू में घुली हुई

कुछ बूढ़े मेरे गांव के संजीदा हो गए
फेंकी जो मैंने शहर की भाषा धुली हुई

मुंबई महानगर में सूर्यभानु गुप्त और जावेद अख़्तर ने अपना सफ़र साथ-साथ शुरु किया था। जावेद को मंज़िलें मिलीं। सूर्यभानु गुप्त को साल 2018 में जावेद अख़्तर अवार्ड मिला। उनका सफ़र जारी है। शायर बनना कितना मुश्किल काम है, इसे बताने के लिए मैं अपने संचालन में प्राय: सूर्यभानु गुप्त की ये पंक्तियां कोट करता हूँ

रात रोने से कब घटी साहब
बर्फ़ धागे से कब कटी साहब
सिर्फ़ शायर वही हुए जिनकी
ज़िंदगी से नहीं पटी साहब

आपने गुलज़ार साहब की त्रिवेणियों का ज़िक्र ज़रूर सुना होगा। सूर्यभानु गुप्त तो चालीस साल पहले ही त्रिपदी यानी त्रिवेणी लिख चुके थे-

शाख़ कुछ यूँ गुलाब देती है
जैसे नज़रें झुकाके लड़के को,
कोई लड़की जवाब देती है

आपात काल के बाद जनता पार्टी की सरकार बनने पर उन्होंने दूसरी आज़ादी शीर्षक से त्रिपदियों की एक सीरीज़ लिखी थी। तत्कालीन सरकार में उस वक़्त कोई पद न लेने वाले लोकनायक जयप्रकाश नारायण की क्या स्थिति थी इसे आप सूर्यभानु गुप्त की एक त्रिपदी से समझ सकते हैं-

धूल ही धूल हर गली बाबा !
चोर सारे सवार घोड़ों पर,
और पैदल इधर अलीबाबा

आपातकाल के बाद हुए आम चुनाव में श्रीमती इंदिरा गाँधी की पराजय का दृश्य देखिए-

जमत-जमते पिघल गया सब कुछ
ऐसे झुमका गिरा बरेली में,
एक पल में बदल गया सब कुछ

आदरणीय नीरज से एक बार मैंने हिंदी ग़ज़लकारों के बारे में उनकी राय पूछी। उनका कहना था कि वैसे तो हिंदी के हज़ारों कवि ग़ज़ल लिख रहे हैं मगर तग़ज़्ज़ुल दो-चार लोगों के ही पास है। उनमें सूर्यभानु गुप्त का नाम पहला है। सूर्यभानु गुप्त की अभी तक सौ ग़ज़लें भी सामने नहीं आई हैं। वे ग़ज़ल तभी लिखते हैं जब लिखने का मूड होता है। उनका एक शेर है -

हम तो सूरज हैं सर्द मुल्कों के
मूड आता है तब निकलते हैं


सूर्यभानु गुप्त ने गीत, ग़ज़ल, नज़्म, दोहा, त्रिपदी,चतुष्पदी, हाइकू आदि कई काव्य विधाओं में सार्थक और सराहनीय लेखन किया। आज भी उनका ख़ामोश सफ़र जारी है। अंत में उनका एक दोहा सुनिए

भर्ती के कवि हर गली, करते निज निजघोष
जिनकी कविता बोलती, वे रहते खामोश

सम्पर्क :
आपका-
देवमणि पांडेय

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, 
कन्या पाडा, गोकुलधाम, फ़िल्म सिटी रोड, 
गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210 82126 

सूर्यभानु गुप्त, 2, मनकू मेंशन, सदानन्द मोहन जाधव मार्ग, 
दादर (पूर्व), मुम्बई 400014, दूरभाष : 022-24137570

गुरुवार, 25 मार्च 2010

उम्मीद-ए-रोशनी क़ायम है लेकिन भाई गाँधी से

कवि देवमणि पाण्डेय, कथाकार आर.के.पालीवाल, न्यायमूर्ति श्री चन्द्रशेखर धर्माधिकारी, डॉ. सुशीला गुप्ता


गांधी जी की प्रसिद्ध कृति हिन्द स्वराज पर संगोष्ठी 

महात्मा गांधी से पूछा गया- क्या आप तमाम यंत्रों के ख़िलाफ़ हैं ? उन्होंने उत्तर दिया- मैं यंत्रों के ख़िलाफ़ नहीं हूँ मगर यंत्रों के उपयोग के पीछे जो प्रेरक कारण है वह श्रम की बचत नहीं है, बल्कि धन का लोभ है। इस लिए यंत्रों को मुझे परखना होगा। सिंगर की सीने की मशीन का मैं स्वागत करूँगा। उसकी खोज के पीछे एक अदभुत इतिहास है। सिंगर ने अपनी पत्नी को सीने और बखिया लगाने का उकताने वाला काम करते देखा। पत्नी के प्रति उसके प्रेम ने, ग़ैर ज़रूरी मेहनत से उसे बचाने के लिए, सिंगर को ऐसी मशीन बनाने की प्रेरणा दी। ऐसी खोज करके सिंगर ने न सिर्फ़ अपनी पत्नी का ही श्रम बचाया, बल्कि जो भी ऐसी सीने की मशीन ख़रीद सकते हैं, उन सबको हाथ से सीने के उबाने वाले श्रम से छुड़ाया। सिंगर मशीन के पीछे प्रेम था, इस लिए मानव सुख का विचार मुख्य था। यंत्र का उद्देश्य है- मानव श्रम की बचत। उसका इस्तेमाल करने के पीछे मकसद धन के लोभ का नहीं होना चाहिए।

यह रोचक प्रसंग महात्मा गांधी की चर्चित पुस्तक ‘हिंद स्वराज’ का है जिसे प्रकाशित हुए सौ वर्ष हो गए हैं और अब पूरी दुनिया में इसके पुनर्मूल्यांकन का दौर चल रहा है। सुभाष पंत के सम्पादन में निकलने वाली दिल्ली की साहित्यिक पत्रिका शब्दयोग और मुम्बई की संस्था हिन्दुस्तानी प्रचार सभा के संयुक्त तत्वावधान मे हिन्द स्वराज की समकालीन प्रासंगिकता पर एक संगोष्ठी हिन्दुस्तानी प्रचार सभा के सभागार में सोमवार २२ मार्च २०१० को आयोजित की गई जिसकी अध्यक्षता न्यायमूर्ति श्री चन्द्रशेखर धर्माधिकारी ने की। एक समर्पित गाँधीवादी होने के साथ-साथ धर्माधिकारीजी ने दस सालों तक महात्मा गांधी के साथ आज़ादी के आंदोलन में सक्रिय भागीदारी भी की थी। महात्मा गांधी के ‘हिन्द स्वराज’ पर केंद्रित समाज सेवी संस्था योगदान की त्रैमासिक पत्रिका शब्दयोग के इस विषेशांक का परिचय कराते हुए संगोष्ठी के संचालक देवमणि पाण्डेय ने महात्मा गांधी के योगदान को अकबर इलाहाबादी के शब्दों में इस तरह रेखांकित किया-

बुझी जाती थी शम्मा मशरिकी, मगरिब की आँधी से
उम्मीद-ए-रोशनी क़ायम है लेकिन भाई गाँधी


कथाकार डॉ. सूर्यबाला, कवयित्री रेखा मैत्र ( अमेरिका ), हिंदीसेवी डॉ.रत्ना झा, कथाकार कमलेश बख्शी, गाँधीवादी हंसाबेन

शब्दयोग के अतिथि सम्पादक प्रतिष्ठित कथाकार आर.के.पालीवाल ने इस अंक की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए कहा कि महात्मा गांधी के गुरु श्री गोपालकृष्ण गोखले ने ‘हिंद स्वराज’ को ‘पागलपन के किन्हीं क्षणों में लिखी किताब’ कहकर खारिज़ कर दिया था मगर विश्व प्रसिद्ध लेखक टॉलस्टाय को इसमें ‘क्रांतिकारों विचारों का पुंज’ दिखाई पड़ा और उन्होंने इसकी तारीफ़ करते हुए कहा कि यह एक ऐसी किताब है जिसे हर आदमी को पढ़ना चाहिए । पालीवालजी ने बताया कि ‘हिंद स्वराज’ के ज़रिए गाँधीजी ने पुस्तक लेखन में एक नया प्रयोग किया है। प्रश्नोत्तर शैली में लिखी गई इस पुस्तक में उन्होंने अपने विचारों से असहमति जताने वाले सभी लोगों को ‘पाठक’ के प्रश्नों में प्रतिनिधित्व दिया है। इस तरह उन्होंने उन सब संशयों, विरोधों और असहमति के स्वरों को एक साथ अपने उत्तरों से संतुष्ट करने की पुरज़ोर कोशिश की है जो गाँधीजी के समर्थकों, विरोधियों या स्वयं गाँधीजी के मन में उपजे थे । कवि शैलेश सिंह ने हिंद स्वराज के प्रमुख अंशों का पाठ किया । हिंदुस्तानी प्रचार सभा की मानद निदेशक डॉ. सुशीला गुप्ता ने अपने आलेख में हिंद स्वराज के प्रमुख बिंदुओं पर रोशनी डाली ।

न्यायमूर्ति चन्द्रशेखर धर्माधिकारी ने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि दुनिया के कई देशों में हिंद स्वराज की सौवीं जयंती मनाई जा रही है। अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा से लेकर कई देशों के राष्ट्राध्यक्ष हिंद स्वराज में अपनी आस्था व्यक्त कर चुके हैं । मेरे विचार से हर हिंदुस्तानी को महात्मा गांधी की इस किताब को अवश्य पढ़ना चाहिए और इस पर चिंतन करना चाहिए । गांधी जी ने अगर मशीनों, वकीलों और डॉक्टरों के खिलाफ़ लिखा तो उनके पास इसके लिए तर्कसंगत आधार भी था ।

कार्यक्रम की शुरुआत में सुश्री चंद्रिका पटेल ने गांधी जी का प्रिय भजन ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए’ प्रस्तुत किया । हिंदुस्तानी प्रचार सभा के संयुक्त मानद सचिव सुनील कोठारे ने आभार व्यक्त किया । इस आयोजन में मुंबई के साहित्य जगत से कथाकार डॉ. सूर्यबाला, कथाकार कमलेश बख्शी, कवि अनिल मिश्र, कथाकार ओमा शर्मा, कवि तुषार धवल सिंह, कवि ह्रदयेश मयंक, कवि हरि मदुल, कवि रमेश यादव, डॉ. रत्ना झा और महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी के कार्यकारी अध्यक्ष श्री नंदकिशोर नौटियाल मौजूद थे । अमेरिका से पधारी कवयित्री रेखा मैत्र और मुख्य आयकर आयुक्त द्वय श्री बी.पी. गौड़ और श्री एन.सी. जोशी ने भी अपनी उपस्थिति से कार्यक्रम की गरिमा बढ़ाई । कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान से हुआ। अंत में संगोष्ठी के संचालक कवि देवमणि पाण्डेय ने महात्मा गाँधी पर लिखी मुम्बई के वरिष्ठ कवि प्रो.नंदलाल पाठक की कविता की कुछ लाइनें उद्धरित कीं-

महामानव ! तुम्हें जो देवता का रूप देने पर उतारू हैं
कदाचित वे यहाँ कुछ भूल करते हैं
तरसते देवता जिसकी मनुजता को , उसे हम देवता बनने नहीं देंगे

न जब तक सीख लेता विश्व जीने की कला तुमसे
तुम्हें जीना पड़ेगा आदमी बनकर महामानव


एक उल्लेखनीय बात यह भी है कि गांधीजी की दुर्लभ पुस्तक ‘हिंद स्वराज’ को शब्दयोग ने अपने इस विशेषांक में पूरा प्रकाशित कर दिया है। शब्दयोग का संकल्प है कि ‘हिंद स्वराज’ को कम से कम दो हज़ार विद्यार्थियों तक ज़रूर पहुँचाया जाए।

आपका
देवमणिपांडेय

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति,
कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड,

गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210-82126

रविवार, 21 मार्च 2010

शायरी की एक शाम : डॉ.रचना आशा के नाम

डॉ.रचना आशा, कवि देवमणि पाण्डेय, सहारा इंडिया के डीएमडी ओ.पी. श्रीवास्तव, शायर मुनव्वर राना

डॉ.रचना आशा का जन्मदिन 21 मार्च को है। डॉ.रचना के जीवनसाथी उपेन्द्र राय सहारा समय (दिल्ली) में न्यूज़ डायरेक्टर हैं। मित्र उपेंद्र के जीवन का मूलमंत्र है- ‘बड़े लोग बड़ा काम नहीं करते, वे हर काम को अलग ढंग से करते हैं’। इसी नज़रिए के चलते उपेंद्र ने पिछले साल अपनी जीवन संगिनी डॉ.रचना का जन्मदिन अलग ढंग से मनाया। उन्होंने अपनी शरीक-ए-हयात को एक नायाब तोहफा दिया। ‘शायरी की एक शाम’ डॉ.रचना के नाम कर दी। उनकी तीन वर्षीय बेटी ऊर्जा अक्षरा ने जन्मदिन का केट काटकर ‘माँ’ लफ़्ज़ को सार्थकता प्रदान की । ‘माँ’ पर शायरी लिखकर पूरी दुनिया में मशहूर हो चुके शायर मुनव्वर राना को काव्यपाठ के लिए इस मौक़े पर ख़ास तौर से आमंत्रित किया गया था। मुनव्वर राना की रचनाधर्मिता और सरोकारों पर रोशनी डालने की ज़िम्मेदारी उपेंद्र ने मुझे सौंप दी।

मुनव्वर राना का परिचय कराते हुए मैंने कहा कि उनकी शायरी में रिश्तों की एक ऐसी सुगंध है जो हर उम्र और हर वर्ग के आदमी के दिलो दिमाग़ पर छा जाती है । शायरी का पारम्परिक अर्थ है औरत से बातचीत । अधिकतर शायरों ने ‘औरत’ को सिर्फ़ महबूबा समझा । मगर मुनव्वर राना ने औरत को औरत समझा । औरत जो बहन, बेटी और माँ होने के साथ साथ शरीके-हयात भी है । उनकी शायरी में रिश्तों के ये सभी रंग एक साथ मिलकर ज़िंदगी का इंद्रधनुष बनाते हैं । वे हिंदुस्तान के ऐसे अज़ीम-ओ-शान शायर हैं जिसने ‘माँ’ की शख़्सियत को ऐसी बुलंदी दी है जो पूरी दुनिया में बेमिसाल है। अपने डेढ़ घंटे के काव्यपाठ में मुनव्वर राना ने माँ पर कई शेर सुनाए-

ऐ अँधेरे देख ले मुँह तेरा काला हो गया
माँ ने आँखें खोल दीं घर में उजाला हो गया

ये ऐसा क़र्ज़ है जो मैं अदा कर ही नहीं सकता
मैं जब तक घर न लौटूं मेरी माँ सजदे में रहती है

किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकां आई
मैं घर में सबसे छोटा था मेरे हिस्से में माँ आई

इस तरह मेरे गुनाहों को धो देती है
माँ बहुत गुस्से में हो तो रो देती है

मैंने रोते हुए पोंछे थे किसी दिन आँसू
मुद्दतों माँ ने धोया नहीं दुपट्टा अपना

जब भी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती है
माँ दुआ करती हुई ख़्वाब में आ जाती है

अभी ज़िंदा है माँ मेरी मुझे कुछ भी नहीं होगा
मैं घर से जब निकलता हूँ दुआ भी साथ चलती है


पिछले साल जब 21 मार्च 2009 को मुम्बई के पाँच सितारा होटल सहारा स्टार में जब यह आयोजन हुआ तो उपेंद्र राय की इस ख़ुशी में शरीक होने के लिए लखनऊ से सहारा इंडिया के डिप्टी एम.डी. ओ.पी.श्रीवास्तवजी पधारे तो मुम्बई से सहारा इंडिया के डॉयरेक्टर अभिजीत सरकार भी तशरीफ़ लाए। इस कार्यक्रम में उपस्थित कुछ प्रमुख लोगों में कुछ के नाम है- संजीव श्रीवास्तव (सम्पादक : बीबीबीसी इंडिया), अशोक कक्कड़ (ग्रुपप्रेसीडेंट : इंडिया बुल्स), जगदीश चंद्रा (सीईओ : ईटीवी), उमेश कामदार (निदेशक : माई डॉलर्स स्टोर्स), अभिनेत्री पूनम ढिल्लन, अभिनेत्री उर्वशी ढोलकिया, अभिनेत्री हेज़ल, अभिनेता सुशांत सिह, हास्यसम्राट राजू श्रीवास्तव और सुनीलपाल। इनके साथ ही एक दर्जन से अधिक आई.ए.एस. तथा आई.आर.एस. अधिकारी भी उपस्थित थे।

इंदौर में उपेंद्र राय को भरोसा युवा पत्रकार सम्मान

दस साल पहले राष्ट्रीय सहारा (लखनऊ) से अपना कैरियर शुरू करने वाले उपेंद्र राय निरंतर प्रगति के सोपान तय करते हुए आज सहारा मीडिया के सम्पादक समाचार निदेशक हैं । ओशो के चिंतन को पसंद करने वले उपेंद्र राय उनके इस विचार से मुतास्सिर हैं कि कुछ नया करने के लिए जगह नहीं मन बदलने की ज़रूरत है । 11 फरवरी 2010 को हम लोग फिर आमने-सामने थे, यानी- डॉ.रचना, बेटी ऊर्जा अक्षरा, उपेंद्र, मैं और भाई मुनव्वर राणा। इंदौर के अभय प्रशाल स्टेडियम में गोपालदास नीरज, बेकल उत्साही और अनवर जलालपुरी जैसे वरिष्ठ शायरों तथा लगभग दस हज़ार लोगों की मौज़ूदगी में उपेंद्र राय को भरोसा युवा पत्रकार सम्मान से नवाज़ा गया । समारोह संचालन की ज़िम्मेदारी मुझे सौंपी गई। मंच पर चार केंद्रीय मंत्री उपस्थिति थे- बलराम जाखड़, फ़ारूक अब्दुल्ला, सलमान ख़ुर्शीद और सत्यप्रकाश जायसवाल। मेरा तवारूफ़ कराते हुए शायर मुनव्वर राणा ने पब्लिक के सामने कह दिया- देवमणि पाण्डेय मेरे अज़ीज़ दोस्त होने के साथ ही मेरे रिश्तेदार भी हैं क्योंकि इनके ज़िले सुलतानपुर में मेरा समधियाना है। इसी मंच पर भरोसा सम्मान वरिष्ठ शायर जावेद अख़्तर को और भरोसा युवा शायर सम्मान डॉ.तारिक क़मर (लखनऊ) को प्रदान किया गया। इसकी चर्चा फिर कभी। फिलहाल आईआईटी मुम्बई से बॉयोटेक्नॉलाजी में एमएससी एवं पीएचडी तथा जेआईआईटी (नोएडा) में बॉयोटेक्नॉलाजी की असिस्टेंट प्रोफेसर और संवेदनशील कवयित्री डॉ.रचना को जन्मदिन की बहुत-बहुत बधाई।

आपका
देवमणिपांडेय

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति,
कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड,

गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210-82126

मंगलवार, 16 मार्च 2010

आने वाली नस्लें तुम पर फ़ख़्र करेंगी हमअसरो


बगलिया गया हूँ मैं : फ़िराक़ गोरखपुरी 

एक दिन ज़फ़र गोरखपुरी से बात हुई। वे बड़े ख़ुश थे। कहने लगे कि मुलुक से ख़बर आई है कि गोरखपुर में फ़िराक़ गोरखपुरी के नाम से एयरपोर्ट बन रहा है। यह वाकई उनकी क़लम का सम्मान है। अब वह दिन दूर नहीं जब हम लोग हवाई जहाज़ से अपने गाँव जाया करेंगे।

एक दिन एक ग़ज़ल कहने की कोशिश कर रहा था। एक मिसरा उछलकर सामने आ गया- ‘साबुत है सच अपना अब तक वार मगर भरपूर हुए’। मन में एक शंका ने सर उठाया कि यहाँ साबुत होना चाहिए या सालिम। शंका के समाधान के लिए मैंने शायर ज़फ़र गोरखपुरी को फ़ोन किया। उन्होंने बताया कि सच के साथ सालिम ठीक रहेगा। सालिम पत्थर की तरह ठोस होता है। साबुत का मतलब है कि जो टूटा-फूटा न हो। 


उन्होंने एक संस्मरण सुनाया। एक मुशायरे में ज़फ़र गोरखपुरी ने जो ग़ज़ल पढ़ी उसमें फ़ारसी का एक लफ़्ज़ था- दरख़्शाँ। रात में एक बजे मुशायरा समाप्त हुआ तो एक उर्दू टीचर उनके पास आया। उसने कहा- दरख़्शाँ लफ़्ज़ ग़लत है। सही लफ़्ज़ है दुरख़्शाँ। ज़फ़र साहब को रात भर नींद नहीं आई। सुबह छ: बजे ही सरदार जाफ़री के यहाँ पहुँच गए। सरदार ने बताया – दरख़्शाँ और दुरख़्शाँ दोनों सही हैं। जैसे किनारा को कुछ लोग कनारा, मुसर्रत को मसर्रत या रिज़ा को रज़ा कहते हैं।

बात आगे बढ़ी तो फ़िराक़ साहब का ज़िक्र आ गया। ज़फ़र साहब ने बताया कि फ़िराक़ साहब जानबूझकर कभी-कभी ऐसे लफ़्जों का इस्तेमाल कर देते थे कि सुनने वाले हैरान-परेशान हो जाते थे। एक बार उन्होंने एक शेर कह दिया जो शायद कुछ इस तरह का था -

नहीं मिले तो नहीं मिले
मिले तो अदबदाकर मिले


कई लोगों ने ऐतराज़ किया मगर फ़िराक़ साहब ‘अदबदाकर’ बदलने को तैयार नहीं हुए। इसी तरह एक बार एक मुशायरे में उन्होंने सुनाया-

ऐ याद-ए-यार तुझसे सर-ए-राह-ए-ज़िंदगी
अक्सर मिला हूँ और बगलिया गया हूँ मैं

बगलिया गया
सुनकर कई लोग जलभुन गए मगर फ़िराक़ साहब बदलने को तैयार नहीं हुए। ज़फ़र साहब का कहना है कि फ़िराक़ गोरखपुरी बीसवीं सदी के सबसे बड़े और सबसे पढ़े-लिखे शायर थे। एक बार फ़िराक़ साहब मुम्बई तशरीफ़ लाए तो उन्हें देखने के लिए कई हज़ार लोग इकट्ठे हो गए। उनका स्वागत कर रहे उस समय के सबसे बड़े समालोचक ज़ोय अंसारी ने श्रोताओं को ललकारते हुए कहा- हमअसरो फ़िराक़ साहब को आँख भरकर देख लो ताकि आने वाली नस्लों को ये बता सको कि तुमने फ़िराक़ साहब को देखा है। फ़िराक़ साहब ने अपना बहुचर्चित शेर सुनाया-

आने वाली नस्लें तुम पर फ़ख़्र करेंगी हमअसरो
जब उनको मालूम ये होगा तुमने फ़िराक़ को देखा


ज़फ़र गोरखपुरी
ज़फ़र गोरखपुरी ने 22 साल की उम्र में फ़िराक़ साहब की सदारत में इलाहाबाद के एक मुशायरे में शिरकत की थी। वहाँ दस हज़ार लोगों के सामने माइक पर फ़िराक़ साहब ने कह दिया था- यह नौजवान आगे चलकर बहुत बड़ा शायर बनेगा। उनकी बात सच हुई। आज उर्दू अदब में ज़फ़र गोरखपुरी का एक अच्छा मुकाम है। ज़फ़र गोरखपुरी की शायरी की पहली किताब ‘तेशा’ 1962 में प्रकाशित हुई। फ़िराक़ साहब ने ख़ुश होकर इस पर एक समीक्षात्मक लेख लिखा। ज़फ़र के लिए यह बहुत बड़ा इनआम था। उस समय इंक़लाबी शेर कहना और फ़ारसी के भारी भरकम लफ़्जों का इस्तेमाल करना एक फैशन था। फ़िराक़ साहब ने उन्हें डाँटा- मियाँ शायरी का मतलब इंक़लाब नहीं, ज़िंदगी से बातचीत होता है। फ़ारसी में नहीं उर्दू में शायरी करो। मेरा शेर देखो-


बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं
तुझे ऐ ज़िंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं

फ़िराक़ साहब के मशवरे पर अमल किया तो ज़फ़र की शायरी का रंग ऐसे निखर गया-


उठाकर अपनी शम्ओं का उजाला दे दिया मैंने
हवा बरसों की भूखी थी निवाला दे दिया मैंने
मैं बादल था मुझे तो धज्जियाँ होना था वैसे भी
ज़मीं तुझको तो सब्ज़े का दुशाला दे दिया


सन 1996 में गोरखपुर में ज़फ़र को फ़िराक़ गोरखपुरी सम्मान से सम्मानित किया गया। जाने माने नक़्क़ाद शमसुर्रहमान फ़ारुक़ी के हाथों से उन्हें यह सम्मान प्राप्त हुआ। 

आपका
देवमणिपांडेय

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति,
कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड,
गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210-82126

बुधवार, 10 मार्च 2010

कवयित्री रेखा मैत्र यूएस के सम्मान में मुम्बई में काव्य संध्या

राम गोविंद, अरविंद राही , डॉ बोधिसत्व, अरुण अस्थाना, रेखा मैत्र, माया गोविंद, हैदर नज़्मी, देवमणि पाण्डेय

अमेरिका से रेखा मैत्र ने मेल किया- आपसे मिलने मुम्बई आ रही हूँ। मैंने वरिष्ठ कवयित्री माया गोविंद जी को फोन लगाया। माया जी जोश में आ गईं- मेरे घर पर शनिवार को एक गोष्ठी रख लो। कई दिन से मेरी तबियत ठीक नहीं है। तुम लोगों की कविताएं सुनकर मेरी तबियत सुधर जाएगी।  कवयित्री रेखा मैत्र के सम्मान में जीवंती फाउंडेशन की ओर से जुहू में माया गोविंद जी के आवास पर एक काव्य संध्या का आयोजन हुआ। बनारस (उ.प्र.) में जन्मीं रेखा मैत्र की उच्च शिक्षा सागर (म.प्र.) में हुई। मुम्बई में कुछ साल अध्यापन करने के बाद मेरीलैण्ड (अमेरिका) में बस गईं। यहाँ भाषा के प्रचार-प्रसार से जुड़ी संस्था ‘उन्मेष’ के साथ सक्रिय हैं। रेखा जी के अब तक दस कविता संकलन प्रकाशित हो चुके हैं।यह हमारी पहली मुलाक़ात थी। रेखाजी उमंग, ऊर्जा और जोश से भरपूर हैं। उन्होंने अपने जीवंत व्यहार और संवेदनशील कविताओं से सबको मंत्रमुग्ध कर दिया।
उनकी एक कविता चिड़िया देखिए-

इस मटियाली इमारत में
चिड़िया भी सहमी सहमी घूम रही है !
गोया इसे भी डर है कि
कहीं इसे भी क़ैद न कर लिया जाए !
अपने पंखों का अहसास भूल ही गई है शायद !

श्रीमती बॉबी, सुमीता केशवा, रेखा मैत्र, माया गोविंद, कविता गुप्ता, उमा अरोड़ा

अस्वस्थ होने के बावजूद माया गोविंद ने तरन्नुम में ग़ज़ल सुनाकर सबको भावविभोर कर दिया-

सूनी आँखों में जली देखीं बत्तियाँ हमने
जैसे घाटी में छुपी देखीं बस्तियाँ हमने
अब भटकते हैं य़ूँ सहरा में प्यास लब पे लिए
हाय क्यूँ बेच दी सावन की बदलियाँ हमने


समकालीन हिंदी कविता के जाने-माने हस्ताक्षर डॉ.बोधिसत्व ने ‘तमाशा’ कविता का पाठ किया।कुछ पंक्तियाँ देखिए-


तमाशा हो रहा है
और हम ताली बजा रहे हैं
मदारी साँप को दूध पिला रहा हैं
हम ताली बजा रहे हैं
अपने जमूरे का गला काट कर
मदारी कह रहा है-'ताली बजाओ जोर से'
और हम ताली बजा रहे हैं



कई बड़ी फ़िल्में और धारावाहिक लिख चुके प्रतिष्ठित फ़िल्म लेखक राम गोविंद शायर भी हैं, इस बात को सिर्फ़ उनके यार-दोस्त ही जानते हैं। लीजिए उनका शायराना अंदाज़ देखिए-

वो समझते थे दिल की जाँ सा है
क्या पता था कि वो जहाँ सा है
आह की हमसे बड़ी भूल हुई
वो समझते थे बेज़ुबाँ सा है

टाइम्स म्यूज़िक द्वारा जारी सूफ़ी अलबम ‘रूबरू’ से लोक प्रिय हुए युवा शायर हैदर नज़्मी ने एक बेहतर नज़्म पेश करने के साथ ही ग़ज़ल सुनाकर समाँ बाँधा-

तुम्हें इस दिल ने जब सोचा बहुत है
हँसा तो है मगर रोया बहुत है
मुझे अब ज़िंदगी भर जागना है
कि मुझपे ख़्वाब का क़र्ज़ा बहुत है

कवि-गीतकार देवमणि पाण्डेय ने भी ग़ज़ल सुनाकर इस ख़ूबसूरत सिलसिले को आगे बढ़ाया-

इस ग़म का क्या करें हम तनहाई किससे बाँटें
जो भी मिली है तुमसे रुसवाई किससे बाँटें
तेरी मेरी ज़मीं तो हिस्सों में बँट गई है
यह दर्द की विरासत मेरे भाई किससे बाँटें


कथाकार अरुण अस्थाना ने सामयिक कविता का पाठ किया। श्रीमती सुमीता केशवा ने औरत के अस्तित्व पर और कविता गुप्ता ने तितलियों के तितलाने पर कविता सुनाई। अनंत श्रीमाली ने व्यंग्य कविता और अरविंद राही ने ब्रजभाषा के छंद सुनाए। जीवंती फाउंडेशन की ओर से श्रीमती बॉबी ने रेखा मैत्र का पुष्पगुच्छ से स्वागत किया। श्रीमती माया गोविंद ने रेखा जी को अपना काव्य संकलन भेंट किया। इस अवसर पर श्रीमती उमा अरोड़ा और श्रीमती कुमकुम मिश्रा अतिथि के रूप में मौजूद थीं।सॉरी ! इस बार भी मैं अपने प्रिय मित्र नीरज गोस्वामी और चंद्रकांत जोशी को आमंत्रित करना भूल गया।आशा है हमेशा की तरह इस बार भी ये लोग मुझे माफ़ कर देंगे।

आपका
देवमणिपांडेय

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति,
कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड,
गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210-82126

रविवार, 7 मार्च 2010

कुरार गाँव की औरतें : देवमणि पांडेय की कविता


कुरार गाँव की औरतें : कविता

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस (8 मार्च) का ज़िक्र होते ही मुझे कुरार गाँव की औरतों का ध्यान आता है। मुम्बई के उपनगर मालाड (पूर्व) में ईस्टर्न हायवे से सटी हुई विशाल बस्ती का नाम है ‘कुरार गाँव’। दूर तक इस बस्ती के सिर पर बस सीमेंट की छतें नज़र आती हैं।बीस साल पहले जब मैंने वहाँ एक चाल में अपना रैन बसेरा बनाया था तो यहाँ छ: पार्षद थे यानी लगभग 6 लाख की आबादी थी। बहुत कुछ बदला मगर न तो ‘कुरार गाँव की औरतें’ बदलीं और न ही उनकी ज़िंदगी बदली । उनका सोच-विचार और व्यवहार आज भी वैसा ही है। मुझे उस समय किंचित आश्चर्य हुआ था कि मेरे पड़ोसी टिम्बर मर्चेंट कासिम की बीवी ही नहीं जवान बेटी भी अनपढ़ है। सर पर डिब्बा लादकर इडली बेचने वाले अन्ना की पत्नी अनपढ़ है तो सिक्योरिटी गार्ड तिवारी की पत्नी भी अनपढ़ है। कुल मिलाकर उस गाँव में अनपढ़ औरतों की संख्या काफी थी। जब मैं अपने बीवी-बच्चों के साथ उनकी दुनिया में दाखिल हो गया तो मैंने उन पर एक कविता लिखी-‘कुरार गाँव की औरतें’

उस समय मुम्बई में राहुलदेव के सम्पादन में ‘जनसत्ता’ लोकप्रियता के शिखर पर था। नगर पत्रिका ‘जनसत्ता सबरंग’ के सम्पादन के लिए कथाकार धीरेंद्र अस्थाना दिल्ली से मुम्बई आ चुके थे। लोकल ट्रेन के सफ़र में मैंने यह कविता उन्हें पढ़ने के लिए दी। उन्होंने कहा- मैं इसे छापूंगा। रविवार 20 जनवरी 1991 को जब ‘जनसत्ता सबरंग’ में यह कविता प्रकाशित हुई तो मुम्बई के साहित्य जगत में धूम मच गई।

सबसे पहले मुम्बई में समकालीन कविता के बहुचर्चित कवि विजय कुमार ने फोन पर बधाई दी। ‘धर्मयुग’ और ‘नवभारत टाइम्स’ के मित्रों ने तारीफ़ की। विनोद तिवारी के सम्पादन में हिंदी की सबसे सुरुचिपूर्ण फ़िल्म पत्रिका ‘माधुरी’ हिंदी की ‘फ़िल्मफेयर’ बन गई थी। उसमें कार्यरत पत्रकार मिथिलेश सिन्हा ने कहा- मैंने अपनी अब तक की ज़िंदगी में कभी अतुकांत कविता नहीं पढ़ी। मगर इसका शीर्षक देखकर मैं ख़ुद को पढ़ने से रोक नहीं पाया। मुझे यह कविता बहुत अच्छी लगी। मुम्बई के साहित्य जगत में में टीका-टिप्पणी का भी दौर चला। किसी ने कहा कि यह तो बाबा नागार्जुन की एक कविता की नक़ल है तो किसी ने कहा कि यह तो आलोक धन्वा की ‘ब्रूनों की बेटियों’ से प्रभावित है। कुल मिलाकर यह कविता इतनी लोक प्रिय हुई कि कई लोग मुझे ‘कुरार गाँव का कवि’ कहने लगे।

सबसे दिलचस्प बात यह हुई कि सुबह 10 बजे क़रीब 20 अनपढ़ औरतों का एक समूह मेरे पड़ोस में रहने वाली एक स्कूल शिक्षिका के पास गया। उन्होंने उसके सामने ‘जनसत्ता सबरंग’ रखकर कहा कि बताओ- इसमें हमारे बारे में छपा क्या है ? स्कूल शिक्षिका ने उनके सामने पूरी कविता का पाठ किया। कुरार गाँव की औरतों ने कहा- हमारे बारे में जो भी छपा है वह सच है। एक कवि के लिए इससे बड़ा प्रमाणपत्र क्या हो सकता है ! शाम को कई लोग मिलने आए। उनमें एक बंगाली व्यवसायी थे आनंदजी। उन्होंने मुझे एक चाभी सौंपते हुए कहा- मैंने दो निजी शौचालय बनवाए हैं।उनमें से एक आपका हुआ। अब आप सरकारी शौचालय की लाइन में नहीं खड़े होंगे। एक कविता के लिए इससे बड़ा पुरस्कार और क्या हो सकता है !

6 दिसम्बर 1992 को अयोध्या काण्ड की प्रतिक्रिया में मुम्बई में दंगे शुरू हो गए। सम्पादक राहुलदेव जी ने सुझाव दिया कि साम्प्रदायिक सदभावना का संदेश जनसत्ता के पाठकों तक पहुँचाने के लिए मैं कुछ बुद्धिजीवियों से बात कर लूँ। मैंने सबसे पहले डॉ.धर्मवीर भारती को फोन किया। वे लाइन पर आए तो मैंने कहा - सर मेरा नाम देवमणि पाण्डेय है। वे तपाक से बोले- अरे भाई मैं तुम्हें जानता हूँ। तुम्हारी वो कविता मैंने पढ़ी थी- ‘कुरार गाँव की औरतें’। बहुत अच्छी लगी। मैं चाहता हूँ कि तुम एक दिन मेरे घर आओ और मुझे अपनी कविताएं सुनाओ। मैं एक दिन भारती जी के घर गया। उन्होंने बड़े प्रेम से मेरी कविताएं सुनीं। आज भारती जी हमारे बीच नहीं हैं। लेकिन ‘कुरार गाँव की औरतों’ का असर कुछ ऐसा है कि आज भी मेरे सर पर श्रीमती पुष्पा भारती का वरदहस्त है। आइए आपको भी इन औरतों से मिलाएं-

कुरार गाँव की औरतें
(1)
कुरार गाँव की औरतें ऑफिस नहीं जातीं
वे ऑफिस गए पतियों और
स्कूल गए बच्चों का करती हैं इंतज़ार
बतियाती हैं अड़ोस पड़ोस की औरतों से
या खोल देती हैं कोई क़िस्सा कहानी

उनके क़िस्सों में ज़्यादातर होती हैं औरतें
कि किस औरत का भारी है पैर
कौन पिटती है पति से
या कौन लड़ती है किससे
वे इस बात में रखती हैं काफ़ी दिलचस्पी
कि कल किसकी बेटी
बाहर से कितनी लेट आई
और किस लड़की ने
अपने माँ बाप की डाँट खाई

खाना - पानी, कपड़े - बच्चे
सिलाई - कढ़ाई - लड़ाई
और न जाने कितने कामों के बावजूद
किसी ख़ालीपन का एहसास
भर जाता है उनमें
बेचैनी, ऊब और झल्लाहट
और वे बुदबुदाती हैं
समय की सुस्त रफ़्तार के खिलाफ़

(2)
कुरार गाँव की औरतें
टीवी पर राम और सीता को देखकर
झुकाती हैं शीश
कृष्ण की लीलाएं देखकर
हो जाती हैं धन्य
और परदे पर झगड़ने वाली औरत को
बड़ी आसानी से समझ लेती हैं बुरी औरत

वे पुस्तकें नहीं पढ़तीं
वे अख़बार नहीं पढ़तीं
लेकिन चाहती हैं जानना
कि उनमें छपा क्या है !
घर से भागी हुई लड़की के लिए
ग़ायब हुए बच्चे के लिए
या स्टोव से जली हुई गृहणी के लिए
वे बराबर जताती हैं अफ़सोस

उनकी गली ही उनकी दुनिया है
जहाँ हँसते-बोलते, लड़ते-झगड़ते
साल दर साल गुज़रते चले जाते हैं
और वक़्त बड़ी जल्दी
घोल देता है उनके बालों में चाँदी

(3)
कुरार गाँव की औरतें
अच्छी तरह जानती हैं कि
किस वर्ष बरसात से
उनकी गली में बाढ़ आई
किसके बेटे-बेटियों ने शादी रचाई
किस औरत को
कब कौन सा बच्चा हुआ
और कब कौन उनकी गली छोड़कर
कहीं और चला गया

लेकिन उन्हें नहीं पता कि तब से
यह शहर कितना बदल गया
कब कौन सा फैशन आया और चला गया
और अब तक समय
उनकी कितनी उम्र निगल गया

अपनी छोटी दुनिया में
छोटी झोंपड़ी और छोटी गली में
कितनी ख़ुश -
कितनी संतुष्ट हैं औरतें
सचमुच महानगर के लिए
चुनौती हैं ये औरतें

(4)
कुरार गाँव की औरतें
तेज़ धूप में अक्सर
पसीने से लथपथ
खड़ी रहती हैं राशन की लाइनों में
देर रात गए उनींदी आँखों से
करती हैं पतियों का इंतज़ार
मनाती हैं मनौतियां
रखती हैं व्रत उपवास
और कितनी ख़ुश हो जाती हैं
एक सस्ती सी साड़ी पाकर
भूल जाती हैं सारी शिकायतें

वे इस क़दर आदतों में हो गईं हैं शुमार
कि लोग भूल गए हैं
वे कुछ कहना चाहती हैं
बांटना चाहती हैं अपना सुख-दुख

देर रात को अक्सर
दरवाज़े पर देते हुए दस्तक
सहम उठते हैं हाथ
किसी दिन अगर
औरतों ने तोड़ दी अपनी चुप्पी
तो कितना मुश्किल हो जाएगा
इस महानगर में जीना

***


आपका
देवमणिपांडेय

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति,
कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड,
गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210-82126