
बगलिया गया हूँ मैं : फ़िराक़ गोरखपुरी
एक दिन एक ग़ज़ल कहने की कोशिश कर रहा था। एक मिसरा उछलकर सामने आ गया- ‘साबुत है सच अपना अब तक वार मगर भरपूर हुए’। मन में एक शंका ने सर उठाया कि यहाँ साबुत होना चाहिए या सालिम। शंका के समाधान के लिए मैंने शायर ज़फ़र गोरखपुरी को फ़ोन किया। उन्होंने बताया कि सच के साथ सालिम ठीक रहेगा। सालिम पत्थर की तरह ठोस होता है। साबुत का मतलब है कि जो टूटा-फूटा न हो।
उन्होंने एक संस्मरण सुनाया। एक मुशायरे में ज़फ़र गोरखपुरी ने जो ग़ज़ल पढ़ी उसमें फ़ारसी का एक लफ़्ज़ था- दरख़्शाँ। रात में एक बजे मुशायरा समाप्त हुआ तो एक उर्दू टीचर उनके पास आया। उसने कहा- दरख़्शाँ लफ़्ज़ ग़लत है। सही लफ़्ज़ है दुरख़्शाँ। ज़फ़र साहब को रात भर नींद नहीं आई। सुबह छ: बजे ही सरदार जाफ़री के यहाँ पहुँच गए। सरदार ने बताया – दरख़्शाँ और दुरख़्शाँ दोनों सही हैं। जैसे किनारा को कुछ लोग कनारा, मुसर्रत को मसर्रत या रिज़ा को रज़ा कहते हैं।
बात आगे बढ़ी तो फ़िराक़ साहब का ज़िक्र आ गया। ज़फ़र साहब ने बताया कि फ़िराक़ साहब जानबूझकर कभी-कभी ऐसे लफ़्जों का इस्तेमाल कर देते थे कि सुनने वाले हैरान-परेशान हो जाते थे। एक बार उन्होंने एक शेर कह दिया जो शायद कुछ इस तरह का था -
नहीं मिले तो नहीं मिले
मिले तो अदबदाकर मिले
कई लोगों ने ऐतराज़ किया मगर फ़िराक़ साहब ‘अदबदाकर’ बदलने को तैयार नहीं हुए। इसी तरह एक बार एक मुशायरे में उन्होंने सुनाया-
ऐ याद-ए-यार तुझसे सर-ए-राह-ए-ज़िंदगी
अक्सर मिला हूँ और बगलिया गया हूँ मैं
बगलिया गया सुनकर कई लोग जलभुन गए मगर फ़िराक़ साहब बदलने को तैयार नहीं हुए। ज़फ़र साहब का कहना है कि फ़िराक़ गोरखपुरी बीसवीं सदी के सबसे बड़े और सबसे पढ़े-लिखे शायर थे। एक बार फ़िराक़ साहब मुम्बई तशरीफ़ लाए तो उन्हें देखने के लिए कई हज़ार लोग इकट्ठे हो गए। उनका स्वागत कर रहे उस समय के सबसे बड़े समालोचक ज़ोय अंसारी ने श्रोताओं को ललकारते हुए कहा- हमअसरो फ़िराक़ साहब को आँख भरकर देख लो ताकि आने वाली नस्लों को ये बता सको कि तुमने फ़िराक़ साहब को देखा है। फ़िराक़ साहब ने अपना बहुचर्चित शेर सुनाया-
आने वाली नस्लें तुम पर फ़ख़्र करेंगी हमअसरो
जब उनको मालूम ये होगा तुमने फ़िराक़ को देखा

ज़फ़र गोरखपुरी
ज़फ़र गोरखपुरी ने 22 साल की उम्र में फ़िराक़ साहब की सदारत में इलाहाबाद के एक मुशायरे में शिरकत की थी। वहाँ दस हज़ार लोगों के सामने माइक पर फ़िराक़ साहब ने कह दिया था- यह नौजवान आगे चलकर बहुत बड़ा शायर बनेगा। उनकी बात सच हुई। आज उर्दू अदब में ज़फ़र गोरखपुरी का एक अच्छा मुकाम है। ज़फ़र गोरखपुरी की शायरी की पहली किताब ‘तेशा’ 1962 में प्रकाशित हुई। फ़िराक़ साहब ने ख़ुश होकर इस पर एक समीक्षात्मक लेख लिखा। ज़फ़र के लिए यह बहुत बड़ा इनआम था। उस समय इंक़लाबी शेर कहना और फ़ारसी के भारी भरकम लफ़्जों का इस्तेमाल करना एक फैशन था। फ़िराक़ साहब ने उन्हें डाँटा- मियाँ शायरी का मतलब इंक़लाब नहीं, ज़िंदगी से बातचीत होता है। फ़ारसी में नहीं उर्दू में शायरी करो। मेरा शेर देखो-
बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं
तुझे ऐ ज़िंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं
उठाकर अपनी शम्ओं का उजाला दे दिया मैंने
हवा बरसों की भूखी थी निवाला दे दिया मैंने
मैं बादल था मुझे तो धज्जियाँ होना था वैसे भी
ज़मीं तुझको तो सब्ज़े का दुशाला दे दिया
सन 1996 में गोरखपुर में ज़फ़र को फ़िराक़ गोरखपुरी सम्मान से सम्मानित किया गया। जाने माने नक़्क़ाद शमसुर्रहमान फ़ारुक़ी के हाथों से उन्हें यह सम्मान प्राप्त हुआ।
आपका
देवमणिपांडेय
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6 टिप्पणियां:
उठाकर अपनी शम्ओं का उजाला दे दिया मैंने
हवा बरसों की भूखी थी निवाला दे दिया मैंने
मैं बादल था मुझे तो धज्जियाँ होना था वैसे भी
ज़मीं तुझको तो सब्ज़े का दुशाला दे दिया
wah!! kya khoob ab inkaur kalaam paRne ki laalsaa baRh gayi.
aur firaq sahab ke qisse to bahut mash'hoor haiN.
ab aap jafar saahab ki aur ghazaleN jalad paRhwaiye.
shukria
फ़िराक और ज़फर साहब के बारे में जानकारी बढ़ाने का शुक्रिया...ज़फर साहब की किताब कहीं मिली तो ज़रूर पढेंगे....
नीरज
सुभानाल्लाह .......!!
आप तो गज़ब के हुनरमंद हैं .....खुशबू की लकीरों में ही तो दिल की बातें होती हैं ........कविता क़ोश में तो पढ़ ही लेंगे कुछ ब्लॉग में भी डालिए .......!!
बहुत बढिया देवमणि जी। हालां कि ज़फ़र गोरखपुरी के जद्दोजहद पर भी कुछ लिखना चाहिए था। कि कैसे तो उसी मुंबई में उन्हों ने मज़दूरी भी की है। मिट्टी तक ढोया है, प्राइमरी स्कूल में मास्टरी तक की है। और कि शायरी के अलावा फ़िल्मों में कुछ बेहतरीन कौव्वालियां, गाने भी लिखे हैं। वगैरह-वगैरह। हमें तो फ़ख्र है कि ज़फ़र साहब हमारे ज़िले गोरखपुर और कि हमारी तहसील बांसगांव के हैं। और कि अभी भी उन का रिश्ता अपनी ज़मीन से छूटा नहीं है।
-दयानंद पांडेय
मुम्बई के वरिष्ठ पत्रकार कुमार प्रशांत ने मेल किया-
Bhai Devmaniji,
Yah prasang bahut accha ban pada hai ! Yah baat samjhane ki hai ki Phirak Saheb jin shabdon ko badalne ke liye tayaar nahi huye, vo mahaz jid nahi thi; ve dono shabad jo bayan karte hain vo dusare shabad kar hi nahi sakte. Ve dono shabad unki mitti me se nikale hain.
Ek baat aur - Gujarish hai ki Phirak saheb ke nam per hawaee adde ka nam rakha jaye to ise unka samman manane ka bachpana hum na karen. Yah hamare samaj ka vinash hai jise vikash bataya ja raha hai. Kalmkar isase door hi rahen to khair hai.
Regards, Kumar Prashant.
ऐसी शख्सियतों के बारे में पढ़ते हैं तो इतनी शर्म आती है कि हम लिखते ही क्यूँ है जब कि हमे तो अभी कलम पकड़ना तक नहीं आया ... फिर सोचते हैं कि कोशिश ही तो ज़िन्दगी है ... शायद कभी एक-आध अक्षर लिखना आ जाये ...
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