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मंगलवार, 16 मार्च 2010

आने वाली नस्लें तुम पर फ़ख़्र करेंगी हमअसरो


बगलिया गया हूँ मैं : फ़िराक़ गोरखपुरी 

एक दिन ज़फ़र गोरखपुरी से बात हुई। वे बड़े ख़ुश थे। कहने लगे कि मुलुक से ख़बर आई है कि गोरखपुर में फ़िराक़ गोरखपुरी के नाम से एयरपोर्ट बन रहा है। यह वाकई उनकी क़लम का सम्मान है। अब वह दिन दूर नहीं जब हम लोग हवाई जहाज़ से अपने गाँव जाया करेंगे।

एक दिन एक ग़ज़ल कहने की कोशिश कर रहा था। एक मिसरा उछलकर सामने आ गया- ‘साबुत है सच अपना अब तक वार मगर भरपूर हुए’। मन में एक शंका ने सर उठाया कि यहाँ साबुत होना चाहिए या सालिम। शंका के समाधान के लिए मैंने शायर ज़फ़र गोरखपुरी को फ़ोन किया। उन्होंने बताया कि सच के साथ सालिम ठीक रहेगा। सालिम पत्थर की तरह ठोस होता है। साबुत का मतलब है कि जो टूटा-फूटा न हो। 


उन्होंने एक संस्मरण सुनाया। एक मुशायरे में ज़फ़र गोरखपुरी ने जो ग़ज़ल पढ़ी उसमें फ़ारसी का एक लफ़्ज़ था- दरख़्शाँ। रात में एक बजे मुशायरा समाप्त हुआ तो एक उर्दू टीचर उनके पास आया। उसने कहा- दरख़्शाँ लफ़्ज़ ग़लत है। सही लफ़्ज़ है दुरख़्शाँ। ज़फ़र साहब को रात भर नींद नहीं आई। सुबह छ: बजे ही सरदार जाफ़री के यहाँ पहुँच गए। सरदार ने बताया – दरख़्शाँ और दुरख़्शाँ दोनों सही हैं। जैसे किनारा को कुछ लोग कनारा, मुसर्रत को मसर्रत या रिज़ा को रज़ा कहते हैं।

बात आगे बढ़ी तो फ़िराक़ साहब का ज़िक्र आ गया। ज़फ़र साहब ने बताया कि फ़िराक़ साहब जानबूझकर कभी-कभी ऐसे लफ़्जों का इस्तेमाल कर देते थे कि सुनने वाले हैरान-परेशान हो जाते थे। एक बार उन्होंने एक शेर कह दिया जो शायद कुछ इस तरह का था -

नहीं मिले तो नहीं मिले
मिले तो अदबदाकर मिले


कई लोगों ने ऐतराज़ किया मगर फ़िराक़ साहब ‘अदबदाकर’ बदलने को तैयार नहीं हुए। इसी तरह एक बार एक मुशायरे में उन्होंने सुनाया-

ऐ याद-ए-यार तुझसे सर-ए-राह-ए-ज़िंदगी
अक्सर मिला हूँ और बगलिया गया हूँ मैं

बगलिया गया
सुनकर कई लोग जलभुन गए मगर फ़िराक़ साहब बदलने को तैयार नहीं हुए। ज़फ़र साहब का कहना है कि फ़िराक़ गोरखपुरी बीसवीं सदी के सबसे बड़े और सबसे पढ़े-लिखे शायर थे। एक बार फ़िराक़ साहब मुम्बई तशरीफ़ लाए तो उन्हें देखने के लिए कई हज़ार लोग इकट्ठे हो गए। उनका स्वागत कर रहे उस समय के सबसे बड़े समालोचक ज़ोय अंसारी ने श्रोताओं को ललकारते हुए कहा- हमअसरो फ़िराक़ साहब को आँख भरकर देख लो ताकि आने वाली नस्लों को ये बता सको कि तुमने फ़िराक़ साहब को देखा है। फ़िराक़ साहब ने अपना बहुचर्चित शेर सुनाया-

आने वाली नस्लें तुम पर फ़ख़्र करेंगी हमअसरो
जब उनको मालूम ये होगा तुमने फ़िराक़ को देखा


ज़फ़र गोरखपुरी
ज़फ़र गोरखपुरी ने 22 साल की उम्र में फ़िराक़ साहब की सदारत में इलाहाबाद के एक मुशायरे में शिरकत की थी। वहाँ दस हज़ार लोगों के सामने माइक पर फ़िराक़ साहब ने कह दिया था- यह नौजवान आगे चलकर बहुत बड़ा शायर बनेगा। उनकी बात सच हुई। आज उर्दू अदब में ज़फ़र गोरखपुरी का एक अच्छा मुकाम है। ज़फ़र गोरखपुरी की शायरी की पहली किताब ‘तेशा’ 1962 में प्रकाशित हुई। फ़िराक़ साहब ने ख़ुश होकर इस पर एक समीक्षात्मक लेख लिखा। ज़फ़र के लिए यह बहुत बड़ा इनआम था। उस समय इंक़लाबी शेर कहना और फ़ारसी के भारी भरकम लफ़्जों का इस्तेमाल करना एक फैशन था। फ़िराक़ साहब ने उन्हें डाँटा- मियाँ शायरी का मतलब इंक़लाब नहीं, ज़िंदगी से बातचीत होता है। फ़ारसी में नहीं उर्दू में शायरी करो। मेरा शेर देखो-


बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं
तुझे ऐ ज़िंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं

फ़िराक़ साहब के मशवरे पर अमल किया तो ज़फ़र की शायरी का रंग ऐसे निखर गया-


उठाकर अपनी शम्ओं का उजाला दे दिया मैंने
हवा बरसों की भूखी थी निवाला दे दिया मैंने
मैं बादल था मुझे तो धज्जियाँ होना था वैसे भी
ज़मीं तुझको तो सब्ज़े का दुशाला दे दिया


सन 1996 में गोरखपुर में ज़फ़र को फ़िराक़ गोरखपुरी सम्मान से सम्मानित किया गया। जाने माने नक़्क़ाद शमसुर्रहमान फ़ारुक़ी के हाथों से उन्हें यह सम्मान प्राप्त हुआ। 

आपका
देवमणिपांडेय

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति,
कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड,
गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210-82126