सोमवार, 23 फ़रवरी 2015

देवमणि पांडेय की ग़ज़ल : दुःख की लम्बी राहों में भी



          देवमणि पांडेय की ग़ज़ल

दुःख की लम्बी राहों में भी सुख की थोड़ी आस रहे
फिर ख़ुशियों के पल आएँगे दिल में ये एहसास रहे

इस दुनिया की भीड़ में अकसर चेहरे गुम हो जाते हैं
रखनी है पहचान तो अपना चेहरा अपने पास रहे

आदर्शों को ढोते-ढोते ख़ुद से दूर निकल आए
और न जाने कितने दिन तक देखो ये वनवास रहे

लफ़्ज़ अगर पत्थर हो जाएँ रिश्ते टूट भी सकते हैं
बेहतर है लहजे में अपने फूलों-सी बू-बास रहे

कहीं भी जाएं दिल का मौसम इक जैसा ही रहता है
अपने दिल के दरपन में इक चेहरा बारो-मास रहे

यात्री रंग समूह के खुलामंच-6 में कला, साहित्य और संगीत से जुड़े कलाकार : फ़िल्म निर्देशक अदीप टंडन, वरिष्ठ रंगकर्मी ओम कटारे, समाज सेवी विश्वनाथ शर्मा, शायर देवमणि पांडेय, कवि निलय उपाध्याय, रंगकर्मी धर्मेंद्र पांडेय, गायक विनोद गवार, संगीतकार गायक आशुतोष सिंह, गायक नवतेज, कवि बसंत आर्य, गीतकार क़ैस जौनपुरी, कवयित्री स्वाति, अभिनेत्री ऐश्वर्या, रंगकर्मी अशोक शर्मा, कवि पंकज दुबे और अभिनेता विजय गायकवाड़ आदि (मुम्बई 8.2.2015)




देवमणि पांडेय : 98210-82126

शुक्रवार, 30 जनवरी 2015

देवमणि पांडेय की ग़ज़ल : ढली शाम फिर आज ढलते हुए





        देवमणि पांडेय की ग़ज़ल  


ढली शाम फिर आज ढलते हुए
बुझे दिल चिराग़ों-से जलते हुए

कहाँ खो गए कुछ पता ही नहीं
मेरी आँख में ख़्वाब पलते हुए

कभी कम न होगी ग़मों की तपिश
ये कहते हैं आँसू उबलते हुए

बदलते हुए मौसमों की तरह
तुम्हें हमने देखा बदलते हुए

हमें ज़िंदगी ने सभी कुछ दिया
मगर हम गए हाथ मलते हुए

मुझे साथ अपने बहा ले गई
थी इक मौज आई मचलते हुए



यात्री रंग समूह के खुला मंच़ कार्यक्रम में वरिष्ठ रंगकर्मी नवीन कुमार,  ओम कटारे,  अशोक शर्मा, निवेदिता बौंथियाल, पारमिता चटर्जी, समाजसेवी के.के.मित्तल, शायर देवमणि पांडेय, कवि पुनीत कुमार पांडेय तथा इप्टा और पूर्वाभ्यास के रंगकर्मी, रचनाकार एवं कलाकार  (मुम्बई 4 अक्टूबर 2014) 



देवमणि पांडेय : 98210-82126
  

मंगलवार, 20 जनवरी 2015

देवमणि पांडेय की ग़ज़ल : साहिल पर जो खड़े हुए थे





         देवमणि पांडेय की ग़ज़ल 

साहिल पर जो खड़े हुए थे डूब गए हैरानी में
मोती उसके हाथ लगे जो उतरा गहरे पानी में 
 
दुख और ग़म के बीच ज़िंदगी कितनी प्यारी लगती है
जैसे कोई फूल खिला हो काँटों की निगरानी में 

दुनिया जिसको दिन कहती है तुम कहते हो रात उसे 
कुछ सच की गुंजाइश रक्खो अपनी साफ़बयानी में

जिसको देखो ढूँढ रहा है काश ज़िंदगी मिल जाए
जाने कैसी कशिश छुपी है इस पगली दीवानी में
   
हुशियारी और चालाकी में डूब गई है ये दुनिया

फिर भी सारा ज्ञान छुपा है बच्चों की नादानी में

चित्र (बाएं से दाएं): यात्री रंग समूह के खुला मंच़ कार्यक्रम में कवि संतोष कुमार झा, फ़िल्म निर्देशक अदीप चंदन, अभिनेत्री दिव्या जगदले, रंगकर्मी पारमिता चटर्जी, रंगकर्मी अशोक शर्मा, संगीतकार कुलदीप सिंह, रंगकर्मी ओम कटारे, शायर देवमणि पांडेय और कवि पुनीत कुमार पांडेय (मुम्बई 6 सितम्बर 2014)



देवमणि पांडेय : 98210-82126



शुक्रवार, 16 जनवरी 2015

कवयित्री माया गोविंद : गीतों में प्रणय की अभिव्यक्ति


कवि देवमणि पांडेय, फ़िल्मलेखक रामगोविंद और कवयित्री माया गोविंद 

आँसू ही पहचान मेरी मैं आँसू की संतान हूँ 

कवयित्री माया गोविंद 17 जनवरी 2015 को 75 साल की हो गईं। वे पिछले पाँच दशकों से हिंदी काव्यमंचों की सर्वाधिक लोकप्रिय कवयित्री हैं। सन् 1959 में लाल क़िले के कवि सम्मेलन से अपनी काव्य यात्रा की शुरूआत करने वाली इस कवयित्री को देश-विदेश में जो यश और प्रतिष्ठा प्राप्त हुई वह दुर्लभ है। एक तरफ़ उन्हें रामधारी सिंह दिनकर जैसे राष्ट्रकवि ने सराहा दूसरी तरफ़ उनकी श्रेष्ठ रचनाओं के लिए उन्हें दिल्ली का ठिठोली पुरस्कार, मद्रास का सर्वश्रेष्ठ कवि पुरस्कार और राष्ट्रभाषा परिषद मुंबई का महादेवी वर्मा पुरस्कार प्राप्त हुआ। विश्व हिंदी समिति वाशिंगटन जैसी प्रतिष्ठित संस्था के अंतराष्टीय मंच पर माया गोविंद को सन 1991 में हिंदी दिवस के अवसर पर दशक की सर्वश्रेष्ठ कवयित्री के रूप में सम्मानित किया गया।

मंचों पर लगातार सक्रियता के बावजूद कवयित्री माया गोविंद हमेशा अपनी रचनाओं के संकलन के प्रति भी सतर्क रहीं। उनके गीतों का संकलन ‘सुरभि के संकेत’ और ग़ज़लों-नज़्मों का संकलन ‘तुम्हें मेरी क़सम’ नाम से प्रकाशित हुआ। ब्रजभाषा पर उनके अधिकार को ‘कृष्णमयी’ संकलन में देखा जा सकता है।‘छंदरस माधुरी’ में भी ब्रजभाषा और अवधी के छंदों की छटा छाई हुई है। उन्होंने अपने निजी अनुभवों को मुक्त छंद में ‘चांदनी की आग’ संकलन के ज़रिए उदघाटित किया। हाल ही में प्रकाशित उनके नए काव्य संकलन का नाम है- 'नीली झील के दरपन में।' इसमें विविधरंगी समकालीन कविताएं हैं।

कवयित्री माया गोविंद के चुनिंदा लोकप्रिय गीतों का संकलन ‘दर्द का अनुवाद’ नाम से सामने आया। प्रतिष्ठित कवि रामेश्वर अशांत के मत से माया गोविंद के गीतों में कबीर का बैराग्य, मीरा की विरह वेदना तथा प्रसाद और महादेवी के छायावाद का संगम है। उनके गीत स्वयं ही उनके इस रचनात्मक लगाव का संकेत देते हैं-

दर्द का पनघट,दर्द का मरघट दर्द का उन्वान हूँ
आँसू ही पहचान मेरी, मैं आँसू की संतान हूँ

कवयित्री माया गोविंद और कवि देवमणि पांडेय
माया गोविंद के गीतों के मूल में प्रेम की अविरल धारा प्रवाहित होती है- ‘दिल के खाते पे हर दुनियादारी लिखो / एक पन्ना मगर प्यार का भी लिखो।’ श्रृंगार के दोनों पक्षों- संयोग और वियोग की तीव्र अनुभूति ही इन गीतों की शक्ति है। संयोग में जहाँ कवयित्री को समाज में अपनी भूमिका और ज़िम्मेदारियों का एहसास रहता है, वहीं वियोग में वह कई छायावादी कवियों की तरह आँसुओं के समुद्र में डुबकर निस्पंद नहीं हो जाती। उस स्थिति में भी उसे अपने अलावा औरों के भी दर्द का एहसास रहता है। यही कारण है कि खु़द काँटों से ज़ख़्मी होकर भी वह औरों के लिए खु़शबू बांटने वाला गुलाब बन जाती है-

हमने डाले बीज प्यार के उसने कांटे बोए
उन काँटों से लिपट-लिपट हम रात-रात भर रोए
दुनिया भर के दर्दों का जवाब हो गए 
काँटे सहते-सहते हम गुलाब हो गए

यह स्वाभाविक है कि इंसान जीवन में प्रेम के संयोग पक्ष की कामना अधिक करता है। लेकिन इस कवयित्री का मानना है कि जीवन में संयोग की सुगंध जितनी ज़रूरी है, उतनी ही ज़रूरी है वियोग के काँटों की चुभन भी-

माना मैंने फूलों में सुगंध है भरी
माना मैंने फूलों में सुंदरता है बड़ी
काँटे अपने रूप से रिझाते नहीं हैं 
लेकिन काँटे धूप में मुरझाते नहीं हैँ
फूल सदा इनके हवाले होते हैं 
काँटे ही तो इनके रखवाले होते हैं

सर्दियों के आगोश में जैसे धूप और बदली के दामन में जैसे बूँद पनाह लेती है, उसी तरह कवयित्री माया गोविंद के दिल में प्रेम की पीर बसी हुई है। यह पीर उनकी भाग्य रेखा पर लालिमा की तरह उपस्थित है-

जैसे कोई सर्दियों में धूप को छुपा ले 
जैसे कोई बदली से बूँद को चुरा ले
वैसे मैंने भी चुरा ली प्यार की ये पीर 
सेंदुर-सेंदुर हो गई मेरे भाग्य की लकीर 

कवयित्री माया गोविंद 
कवयित्री माया गोविंद के गीतों में लोकप्रियता के ऐसे तत्व हैं जो पढ़ने और सुनने वालों को सहज ही अपना बना लेते हैं। जा़हिर है इसके पीछे काव्य मंचों पर सक्रियता का योगदान होगा। मंच पर श्रृंगारिक रचनाओं की माँग प्राय: अधिक रहती है। कवयित्री माया गोविंद के यहाँ भी प्रेम गीतों का वैभव है। ख़ास बात यह है कि उनके गीतों में प्रणय की अभिव्यक्ति स्वाभाविक और श्रृंगार की प्रस्तुति सहज है। उनके गीतों में निजी अनुभव की मुखरता है। ये गीत अपनी सरलता,सहजता, प्रवाह और अनुभूतियों की तीव्रता में आज के नए गीतकारों के लिए चुनौती हैं। साहित्यिकता की शाल ओढने वाले लोग प्राय: मंचीय रचनाकारों में दिलचस्पी नहीं लेते। अगर कवयित्री माया गोविंद के गीतों को गंभीरता से परखा जाए तो इनमें सृजनात्मकता के कई नए आयाम नज़र आएंगे।

डॉ.धर्मवीर भारती के अनुसार- जीवन के कुछ संवेदन ऐसे हैं जिन्हें नारी ही महसूस कर पाती है,नारी ही अपनी बोली में व्यक्त कर पाती है। ऐसे विशिष्ट नारीसुलभ संवेदनों और काव्य उपकरणों ने भक्तिकाल में, रीतिकाल में तथा छायावादी युग में हिंदी कविता को समृद्ध बनाया है। माया गोविंद की काव्य रचना में वे तत्व बीज रूप में हैं। भारती जी की राय में माया गोविंद की कविताओं का मूल ढांचा तो कवि सम्मेंलनों में प्रचलित लोकप्रिय गीतों का ही है लेकिन उनकी कविताओं के अनेक बिंब, अनेक उपमाएं बिलकुल उनकी अपनी हैं।

कवयित्री माया गोविंद के लिए प्रेम भले ही मोक्ष का मार्ग हो लेकिन उन्होंने समय-समय पर उठने वाले सामाजिक प्रश्रों को अनदेखा नहीं किया है। ‘डाकिए ने द्वार खटखटाया। अनबाँचा पत्र लौट आया’… क्या किसी नवगीत से कम है ? ‘जीवन के सौदागर बोल / मिट्टी का क्या होगा मोल’ और ‘हिंदू मरा है न मुसलमान मरा है / इंसानियत की लाश पे इंसान मरा है’ तथा ‘हमें पानी चाहिए’, ‘सूरज बुझा दूंगी मैं’, ‘जीवन तो गिरवी है मौत की तिजोरी में’, ‘नैना जलें नीर जल जाए सपना जले नहीं’ आदि गीतों में कवयित्री ने जीवन और समाज के अहम प्रश्रों का भी जवाब ढूँढ़ने की सराहनीय कोशिश की है।

अपनी भाषा और अभिव्याक्ति में कवयित्री माया गोविंद के गीत एक ताज़गी भरी कोशिश हैं। इनमें न तो नवगीतों की दुरूहता, जटिलता और अनगढ़पन है और न सतही गीतकारों जैसी कोरी भावुकता। इनकी गेयता और संगीतात्मकता भी इनकी शक्ति है। कवयित्री माया गोविंद ने अपने गीतों के ज़रिए सस्ती मंचीय लोकप्रियता और छद्म बौद्धिकता के लोभ से बचकर एक सहज रास्ता बनाया है। आशा है ये रास्ता अन्य मंचीय प्रतिभाओं के लिए भी दीपस्तंभ साबित होगा।

आपका-
देवमणि पाण्डेय : 
सम्पर्क : 98210-82126 

माया गोविंद : 2 शेल्टन, रोड नं.-10, जुहू, मुम्बई - 400 049, M : 97731-12268 

रविवार, 16 नवंबर 2014

कवि नरेंद्र मोदी का काव्य संग्रह : आँख ये धन्य है


कविता में कवि नरेंद्र मोदी का रचनात्मक सफ़र

सन 2005 में कवि नरेंद्र मोदी का काव्य संग्रह गुजराती में प्रकाशित हुआ था। डॉ. अंजना संधीर ने इसे आँख ये धन्य है नाम से हिंदी में रूपांतरित किया है। विकल्प प्रकाशन (दिल्ली) ने इसे प्रकाशित किया है। ख़ास बात यह है कि मोदी जी का यह काव्य संकलन ऐसे समय में हमारे सामने आया है जब वे हिंदुस्तान के प्रधानमंत्री के रूप में देश और दुनिया में कामयाबी का नया अध्याय लिख रहे हैं।

अनुवादिका अंजना संधीर स्वयं एक लब्ध-प्रतिष्ठित रचनाकार हैं। वे कई साल अमेरिका में रही हैं। वहाँ उन्होंने हिंदी भाषा और साहित्य के प्रसार के लिए उल्लेखनीय काम किए। उनके अनुभव और दृष्टि की व्यापकता का लाभ इस संग्रह को भी प्राप्त हुआ है। अंजना जी ने इतनी सहजता,सरलता और आत्मीयता से अनुवाद कार्य किया है कि कवि नरेंद्र मोदी की यह अनूदित काव्यकृति हिंदी का मौलिक काव्यसंग्रह प्रतीत होता है। एक काव्यांश देखिए-

पर्वत की तरह अचल रहूँ, और नदी के बहाव सा निर्मल
श्रृँगारित शब्द नहीं मेरे,नाभि से प्रकटी वाणी हूँ
करता हूँ इस धरती से प्रीत
ख़ामोशी का आनंद लेते हुए गाता हूँ गीत

इस संग्रह में 67 कविताएं हैं। इन कविताओं में से कुछ के शीर्षक देखिए - सम्पूर्ण विश्व, उठो लाल ! विजय स्वीकारो, एकाध आँसू, ऐसे मनुष्य, कारगिल, स्वाभिमान, गरबा, बोले बसंत, नर्मदा, तितली, प्रेम, माँ मुझे दैवत्व देना, वंदे मातरम़, सपनों के बीज, मल्लाह आदि। इन काव्य शीर्षकों से आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि मोदीजी की इन कविताओं में देश,दुनिया और समाज समाया हुआ है-

तुम्हारे पास सपने हों या न हों
परंतु सपनों के बीज मैं,
अपनी धरती पर बीजता हूँ
और प्रतीक्षा करता हूँ, पसीना बहाकर
कि वे अँकुरित हों और उनका वृक्ष बने
फिर किसी विराट पुरुष की बाँहों समान
उनकी शाखाएँ फैलें
पक्षी उन पर घोंसले बनायें
और आकाश को छूने लगें
उनके कण्ठ से नदी की कल-कल की
ध्वनि समान ईश्वरीय गीतों के स्वर लहरायें, (पृष्ठ-95)

हिंदी के एक प्रतिष्ठित कवि की पंक्तियां हैं- वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान / निकलकर नैनोँ से चुपचाप बही होगी कविता अनजान। संग्रह की कई कविताओं को पढ़ते हुए लगता है कि वे बरबस हृदय की गहराइयों से छलक पड़ी हैं। इन कविताओं का कवि कहीं कठोर है, कहीं कोमल हैं और कहीं वह इतना भाव विह्वल हो जाता हैं कि आँख से आँसू छलक पड़ते हैं-

अपने काग़ज़ पर सूरज बनाता हूँ
और बनाता हूँ पूनम का चाँद
मेरे काग़ज़ पर लहराता वृक्ष है
और वृक्ष पर हरियाले पत्ते
स्वजन की याद जैसी छोड़ी चट्टान
उसे झरने का गीलापन जगाए, ((पृष्ठ-47)

कवि में साहस है, स्वाभिमान है, देश और समाज के लिए कुछ करने की ललक है और जो कुछ अपने पास विरासत है उस पर गर्व भी है। उसकी नज़र तितली, फूल और कारगिल पर जाती है तो वह उन उत्सवों में भी नए रंग घोलता है जिनसे हमारा सांस्कृतिक ताना-बाना मजबूत होता है। इन कविताओं में तड़प है, बेचैनी है और दूसरों का दुख बाँट लेने की छटपटाहट भी है। कवि के पास शब्द है, शिल्प है और अपनी बात कहने का सलीका़ भी है। इस लिए ये कविताएं सावनी फुहार की तरह हम तक पहुँचती है और हमें भिगोकर हराभरा कर देती हैं-

कोई पंथ नहीं, ना ही सम्प्रदाय / मानव तो बस है मानव,
उजाले में क्या फ़र्क पड़ता है / दीपक हो या लालटेन , (पृष्ठ-26)

बिना प्रेम पंगु बन मानव, लाचार / पराधीन-सा जीता है
अभाव की एक डोरी ले / पल को पल से सीता है, (पृष्ठ-30)

ईश्वर की छत्र-छाया में हर रोज़ सीखता हूँ
मैं तो हूँ एक छात्र
सफल हुआ तो ईर्ष्या का पात्र,
असफल हुआ तो दया का पात्र (पृष्ठ-52)

ये कविताएं किसी भी दुरूहता, जटिलता और बौद्दिकता से मुक्त हृदय की सहज निर्झरिणी हैं। इस लिए ये निर्बाध तरीके से पाठकों तक पहुँचती हैं और उन्हें अपने आगोश में ले लेती हैं। इन कविताओं में सोच की सहज प्रक्रिया के साथ ही विचारों की संतुलित उड़ान है। प्रकृति प्रेम से लेकर देश प्रेम की झाँकी हैं। समाज के सवालों से लेकर परम्परा और संस्कृति की अमूल्य थाती है। रिश्तों-नातों की मोहक गलियाँ है, भावनाओं की बदलियाँ हैं। गरबा का संगीत है, आगे बढ़ने का गीत है, गर्व करने लायक अतीत है। इसलिए ये कविताएं एक ख़ूबसूरत एहसास की तरह हमारे दिल में उतरती हैं और हम में ऊर्जा का संचार करती हैं। इन कविताओं में वह रोशनी है जो भटके हुए लोगों को रास्ता दिखाती है। निराश लोगों में आशा का संचार करती है और मन मे आगे बढ़ने की प्रेरणा जगती है। इस किताब के हर पन्ने पर ज़िंदगी मुस्कराती है। हम दुआ है कि कवि नरेंद्र मोदी का यह रचनात्मक सफ़र आगे भी जारी रहे।

देवमणि पाण्डेय 
बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाड़ा, 
गोकुल धाम, फ़िल्मसिटी रोड, गोरेगांव, मुम्बई-400063
 M : 98210-82126