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शुक्रवार, 18 सितंबर 2020

स्त्री के प्रेम से वंचित ग़ज़ल के अभागे शायर


हिंदी ग़ज़ल में प्रेम पर पीएचडी

दिल्ली के एक शायर मिर्ज़ा साहब ने मशहूर शायर दाग़ देहलवी से पूछा- आप मुहब्बत की शायरी करते हैं। मैं भी मुहब्बत की शायरी करता हूं। आपको ज़बरदस्त दाद मिलती है। मुझे नहीं मिलती। इसका क्या कारण है ? जवाब में दाग़ देहलवी ने उनसे तीन सवाल किए। 

पहला : क्या आपने किसी की याद में अपनी रातों की नींद हराम की है ? मिर्ज़ा साहब बोले- कभी नहीं। मैं ऐसा सोच भी नहीं सकता। 

दूसरा : क्या आपने उन कोठों पर जाकर घुंघरुओं की झंकार सुनी है जहां शराफ़तें जाने से घबराती हैं ? मिर्ज़ा साहब ने कान पकड़ लिए- लाहौल विला कूवत, मैं शादीशुदा इज़्ज़तदार आदमी हूं। 

तीसरा : क्या आप रोज़ अपनी शाम को जाम से आबाद करते हैं ? मिर्ज़ा साहब बोले- मैं शराब को हाथ भी नहीं लगाता। 

दाग़ देहलवी बोले- मिर्ज़ा साहब, आप बीवी को देखकर शायरी करेंगे तो यही हाल होगा। 

इस लोक कथा से आप समझ गए होंगे कि अच्छे शायर की संरचना में किन महत्वपूर्ण चीज़ों का योगदान होता है। मुहब्बत के इलाक़े में दाग़ साहब ने कैसे कैसे कारनामे किए थे, बस ये दो शेर पढ़कर आप अंदाज़ा लगा सकते हैं-

दिल को थामा उनका दामन थाम के 
हाथ निकले अपने दोनों काम के 

गश खाकर दाग़ यार के क़दमों में गिर पड़ा 
बेहोश ने भी काम किया होशियार का


हिंदी ग़ज़ल में प्रेम पर पीएचडी 

बलरामपुर (उत्तर प्रदेश) में हमारे एक दोस्त हैं डॉ प्रकाश चंद्र गिरि। वे एक कॉलेज में हिंदी विभागाध्यक्ष हैं। अपने एक विद्यार्थी को शोध के लिए उन्होंने विषय दिया- हिंदी ग़ज़ल में प्रेम। एक दिन प्रकाश जी का फ़ोन आया। बोले- पांडेय जी, 'हिंदी ग़ज़ल में प्रेम' विषय पर पीएचडी करवाने के लिए मैंने 40 हिंदी ग़ज़लकारों की किताबें ख़रीदीं। हैरत की बात यह है कि कई शायरों के यहां प्यार मुहब्बत पर दो शेर भी नहीं मिले। अचानक मुझे आपकी किताब मिल गई- 'अपना तो मिले कोई'। यह देख कर मैं बहुत खुश हूं कि आपके यहां तो 50% से भी अधिक ग़ज़लें प्यार मुहब्बत की हैं। 

मैंने कहा प्रकाश जी मैंने मुहब्बत की है। इसलिए मैं मुहब्बत पर लिखता हूं। जिस परम्परा से हमें ग़ज़ल हासिल हुई है उसमें कहा जाता है कि बिना मुहब्बत के शायरी कैसी। मीर ओ ग़ालिब से लेकर फ़ैज़ और फ़िराक़ जैसे बड़े बड़े शायरों ने मुहब्बत पर शायरी करके हमारे सामने एक मिसाल क़ायम की। 


फ़िराक़ गोरखपुरी की मुहब्बत

फ़िराक़ साहब इलाहाबाद के सिविल अस्पताल में रोग शय्या पर पड़े हुए थे। एक दिन मुस्कुराहटों का कारवां लिए हुए कोई आया और उसने उनका मिज़ाज पूछा। फ़िराक़ साहब को ज़िंदगी मिल गई। उन्होंने उसी दिन बिस्तर पर लेटे लेटे 'शाम ए अयादत' नज़्म कही- 

यह कौन आंख पड़ रही है मुझ पर इतने प्यार से
वह भूल सी, वह याद सी कहानियां लिए हुए

यह किसकी महकी-महकी सांसें ताज़ा कर गईं दिमाग़
शबों से राज़ शबनमों की नरमियां लिए हुए

यह किन निगाहों ने मेरे गले में बाहें डाल दी
जहान भर के दु:ख से, दर्द से अमां लिए हुए

निगाह-ए-यार दे गई मुझे सकून-ए-बे-करां
वह बे कही वफ़ाओं की गवाहियां लिए हुए 

फ़िराक़ साहब ने अपनी किताब 'रूह ए कायनात' की भूमिका में लिखा है- सन् 1941 में मेरा जीवन एक नई घटना से परिचित हुआ। यह वह समय है कि जब मेरे जीवन में एक ऐसी विभूति प्रविष्ट हुई जिसके सामीप्य ने सन् 1942 के अंत में एक घनिष्ठ प्रेम का रूप धारण कर लिया। फ़िराक़ साहब ने अपनी यह किताब उसे समर्पित करते हुए एक और नज़्म लिखी- 'महबूब ए शाम ए अयादत'। 

इस नज़्म में उन्होंने अदभुत क़ाफ़ियों का इस्तेमाल किया। कुछ पंक्तियाँ देखिए-

सरस नर्म संगीत इक इक अदा में
सितारों की पिछले पहर गुनगुनाहट

झलक रूप की शबनमी पैरहन में
हज़ारों चराग़ों की यह जगमगाहट

वो हर आन अंगड़ाई आई हुई सी
वह हर लहज़ कुछ जिस्म में कसमसाहट

पसे ख़्वाब पहलू ए आशिक़ से उठना
धुले सादा जोड़े की वो मलगजाहट

इन अशआर में देख ले अक्स अपना
वो हर मिसरा ए तर में है रसमसाहट

मिर्ज़ा गालिब तो प्रेम में इतने उतावले थे कि अपना राज़ ए मुहब्बत बता कर अपने दोस्त को अपना रक़ीब बना डाला- 

ज़िक्र उस परीवश का और फिर बयां अपना 
बन गया रक़ीब आख़िर जो था राज़दां अपना 

कविता और कहानी से ग़ायब होता प्रेम 

एक बार मशहूर जनवादी कवि शील जी मुंबई आए थे। उन्होंने इस बात पर अफ़सोस ज़ाहिर किया कि जनवादी कविता और कहानी से प्रेम ग़ायब हो गया है। कुछ साल पहले उर्दू के मशहूर आलोचक गोपीचंद नारंग ने भी कहा था- ग़ज़ल में पत्रकारिता बहुत आ गई है और प्रेम ग़ायब हो गया है। 

स्त्री तो सृष्टि की अनुपम और जीवंत कलाकृति है। उसके सम्मान में सृजन करना फ़न और हुनर की कसौटी है। हिंदी ग़ज़ल के नाम पर क्रांति करने वालों को यह सोचना चाहिए कि क्या साहित्य में प्रेम को जगह नहीं है। स्त्री के पावन सौंदर्य को उदघाटित करने वाले तीन शायरों की लाजवाब मंज़रकशी देखिए- 

निखर गए हैं पसीने में भीग कर आरिज़ 
गुलों ने और भी शबनम से ताज़गी पाई - (गुलाम रब्बानी ताबां) 

भरी दोपहर में खिला फूल है 
पसीने में लड़की नहाई हुई - (डॉ बशीर बद्र) 

किसी को क्या पता था इस अदा पर मर मिटेंगे हम 
किसी का हाथ उट्ठा है और अलकों तक चला आया - (दुष्यंत कुमार)

पत्नी को बेहद प्रेम करने वाले तुलसीदास ने 'रघुनाथ गाथा' स्वांतः सुखाय लिखी थी। उसे साहित्य में एक महाकाव्य का दर्जा मिला। ज़रूरी यही है कि अपनी ग़ज़ल पहले अपने लिए लिखी जाए। अगर उसमें कशिश होगी तो पूरी दुनिया उसे स्वीकार करेगी। नया ज्ञानोदय के संपादक रवींद्र कालिया ने ग़ज़ल पर केंद्रित 'प्रेम विशेषांक' निकाला था। उसकी रिकॉर्ड बिक्री हुई थी। इसका मतलब यह हुआ कि साहित्य का पाठक प्रेम को पसंद करता है। प्रेम से दूर भागने की बजाय ग़ज़लकारों को चाहिए कि प्रेम को अपने जीवन में उतारें। 

अंत में आप सबके लिए पेश है कॉलेज की स्मृतियों के आधार पर लिखी गई मेरी यह ग़ज़ल। 

उसने मुझको हँसकर देखा और तनिक शरमाई भी 
लूट लिया दिल शोख़ अदा ने वो मेरे मनभाई भी 

पलक झपकते हुआ करिश्मा ख़ुशबू जागी आंखों में 
साथ हमारे महक उठी है आज बहुत पुरवाई भी 

ये रिश्ता है नाज़ुक रिश्ता इसके हैं आदाब अलग 
ख़्वाब उसी के देख रहा हूँ जिसने नींद उड़ाई भी 

छलनी दिल को जैसे तैसे हमने आख़िर रफ़ू किया 
मगर अभी तक कुछ ज़ख़्मों की बाक़ी है तुरपाई भी 

प्यार-मुहब्बत की राहों पर चलकर ये महसूस हुआ 
परछाईं बनकर चलती है साथ-साथ रुसवाई भी 

उसकी यादों की ख़ुशबू से दिल कुछ यूं आबाद रहा 
मैं भी ख़ुश हूं मेरे घर में और मेरी तनहाई भी 

आपका- 

देवमणि पांडेय : बी-103, दिव्य स्तुति, 
कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड, 
गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210 82126

शुक्रवार, 14 अगस्त 2020

डॉ राहत इंदौरी : सख़्त राहों में भी आसान सफ़र

शायर राहत इंदौरी के साथ शायर देवमणि पांडेय

रास्ते के पत्थरों से ख़ैरियत मालूम कर


उजाला बांटने वालों पे क्या गुज़रती है 
किसी चराग़ की मानिंद जलके देखूंगा

डॉ राहत इंदौरी पिछले पचास सालों से अपनी शायरी के ज़रिए ज़िंदगी की तारीकियों में रोशनी की लकीर खींचने का काम कर रहे थे। उन्होंने ग़ज़ल प्रेमियों को एहसास में भिगोया, हंसाया और उस मुक़ाम तक पहुंचाया जहां से लुत्फ़ और सुकून का दरवाज़ा खुलता है। डॉ राहत ने ग़ज़ल के हुस्न को बरकरार रखते हुए अदायगी के  पुरअसर अंदाज़ से ऐसा करिश्मा किया कि देश विदेश में उनके चाहने वालों की तादाद बढ़ती चली गई । जो लोग बाज़ौक हैं, शायरी में दिलचस्पी रखते हैं उनको राहत के दो चार शेर ज़रूर याद होंगे। राहत इंदौरी की शायरी के गुलशन में एक तरफ़ मुहब्बत के फूल खिलते हैं तो दूसरी तरफ़ वो सच्चाइयां मौजूद हैं जिनसे ज़िंदगी रोज़ रूबरू होती है।

मुंतज़िर हूं कि सितारों की ज़रा आंख लगे 
चांद को छत पे बुला लूंगा इशारा करके

ज़िंदगी को ज़ख़्म की लज़्ज़त से मत महरूम कर
रास्ते के पत्थरों से ख़ैरियत मालूम कर

डॉ राहत इंदौरी और मुशायरे

मुशायरे की अपनी ज़रूरतें होती हैं। मुशायरे में कामयाबी की शर्त है सामयीन यानी श्रोताओं से दाद वसूल करना और तालियां बजवाना। यह दोनों कारनामे डॉ राहत इंदौरी ने बख़ूबी अंजाम दिए। वे अक्सर कहते थे- मुझे पता है ग़ज़ल क्या होती है और मैं यह भी जानता हूं कि मुशायरा क्या है। डॉ राहत के पास मुशायरों में ग़ज़ल पेश करने का परफार्मिंग आर्ट था। इसके लिए वे बेहद मशहूर हुए। मगर उनकी कामयाबी में कंटेंट की अहमियत और इज़हार ए बयां का सलीक़ा भी शामिल है। ज़िंदगी, समाज और सियासत के मसाइल पर उनकी अच्छी पकड़ थी। कई बार उनके शेर बहस और विवाद का मुद्दा भी बने। दिलों को बांटने वाली सियासत पर उनके कुछ शेर ऐसे हैं जिनका मतलब लोग अपने अपने तरीक़े से निकालते हैं। किसी को ये  शेर अच्छे लगते हैं और कोई इनसे ख़फ़ा है- 

मुहब्बतों का सबक़ दे रहे हैं दुनिया को 
जो ईद अपने सगे भाई से नहीं मिलते

सभी का ख़ून शामिल है यहां की मिट्टी में 
किसी के बाप का हिंदोस्तान थोड़ी है

डॉ राहत ने अपने इज़हार के लिए जिस ज़बान को अपनाया वो गली, मुहल्लों और चौराहों पर बोली जाने वाली ज़बान है। इस हिंदुस्तानी ज़बान को आम आदमी भी समझता है और पढ़े लिखे लोग भी पसंद करते हैं। आम आदमी की तरह उन्होंने भी सपने देखे। डॉ राहत की शायरी में सपनों की ताबीर कम है और ख़्वाबों के टूटने की गूंज ज़्यादा हैं। फिर भी वे इतने सीधे-साधे लहजे में बात करते हैं कि उनके कई शेर एक बार सुनते ही श्रोताओं को याद हो जाते हैं।

अफ़वाह थी कि मेरी तबीयत ख़राब है 
लोगों ने पूछ पूछ कर बीमार कर दिया 

लोग हर मोड़ पर रुक रुक के संभलते क्यों हैं
इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यों हैं

शाखों से टूट जाएं वो पत्ते नहीं हैं हम 
आंधी से कोई कह दे कि औक़ात में रहे

ज़िंदगी क्या है ख़ुद ही समझ जाओगे 
बारिशों में पतंगें उड़ाया करो

पढ़े लिखे शायर डॉ राहत इंदौरी

डॉ राहत इंदौरी पढ़े लिखे शायर थे। उर्दू में एम ए और पीएचडी थे। इंदौर विश्वविद्यालय में उन्होंने 16 साल उर्दू साहित्य पढ़ाया। दस साल तक अदबी पत्रिका 'शाख़ें' का संपादन किया। हिंदुस्तान में मुशायरों के इतिहास पर पीएचडी हासिल की। डॉ राहत को यह पता था कि मुशायरों की शायरी का फ़न अलग है। इसलिए उन्होंने मुशायरों में मशहूरियत और कामयाबी का जमकर लुत्फ़ उठाया। मगर अदब का दामन भी नहीं छोड़ा। यही कारण है कि उर्दू में उनकी 6 किताबें प्रकाशित हुईं। हिंदी में भी उनकी एक किताब मंज़रे आम पर आई- 'चांद पागल है'।

रोज़ तारों को नुमाइश में ख़लल पड़ता है 
चांद पागल है अंधेरे में निकल पड़ता है 
उसकी याद आई है सांसों ज़रा आहिस्ता चलो
धड़कनों से भी इबादत में ख़लल पड़ता है

राहत साहब के साथ कई बार मुझे भी कविता पाठ का अवसर मिला। कुछ साल पहले दक्षिण मुंबई के एक बैंक में वे कविता पाठ के लिए आए। बोले- यार मेरी हालत ख़राब है। डॉक्टर ने नॉनवेज खाने और शराब पीने के लिए मना कर दिया है। मैं एक साथ चालीस मिनट नहीं पढ़ पाऊंगा। आप मुझे थोड़ा थोड़ा दो बार पढ़वाइए। उस कार्यक्रम में कवि प्रदीप चौबे भी थे। हम तीनों के कविता पाठ के तीन दौर हो गए। डॉ राहत ने वहां कुछ ऐसे भी अशआर पेश किए जो आमतौर पर वे मुशायरों में नहीं पढ़ते।

नौजवां बेटों को शहरों के तमाशे ले उड़े 
गांव की झोली में कुछ मजबूर माँएँ रह गईं
एक-इक करके हुए रुख़सत मेरे कुनबे के लोग 
घर के सन्नाटे से टकराती हवाएं रह गईं

अपना तो मिले कोई 

मैंने कुरियर से राहत इंदौरी को अपना ग़ज़ल संग्रह 'अपना तो मिले कोई' भेजा। तीसरे दिन मैंने फ़ोन किया। उन्होंने कहा नहीं मिला। चौथे पांचवें दिन भी जवाब था- नहीं मिला। मेरे कुरियर वाले ने इंदौर के कुरियर वाले को फ़ोन किया। उसने बताया कि किताब को एक मैडम ने रिसीव किया है। थोड़ी देर बाद डॉ राहत का फ़ोन आया। उन्होंने ठहाका लगाया। बोले- यार आपकी किताब को मेरी बेगम ने रिसीव किया था। उनको किताब की डिजाइन ख़ूबसूरत लगी तो पन्ने पलटने शुरू किए। शायरी अच्छी लगी तो उन्होंने आपकी किताब को अपने तकिए के नीचे रख लिया। एक हफ़्ते से वही पढ़ रही हैं।

डॉ राहत इंदौरी इस दौर के मुशायरों के सबसे लोकप्रिय शायर थे। उनके नाम से मुशायरों में भीड़ जुटती थी। वे पूरी तैयारी के साथ मुशायरों में जाते थे। उन्होंने कभी आयोजकों को निराश नहीं किया। उनके पास लिखने का फ़न और हुनर था। मंच पर कलाम पेश करने की जो अदा थी वह किसी और शायर के पास नहीं है। इसलिए उनकी कमी लोगों को हमेशा महसूस होती रहेगी।

न जाने कौन सी मजबूरियों का क़ैदी हो 
वो साथ छोड़ गया है तो बेवफ़ा न कहो 
हमारे ऐब हमें उंगलियों पे गिनवाओ 
हमारी पीठ के पीछे हमें बुरा न कहो

डॉ राहत इंदौरी की ग़ज़लें संगीत के कई अल्बम में शामिल हुईं। मुम्बई के गायक जसविंदर सिंह की आवाज़ में उनकी एक ग़ज़ल काफ़ी मशहूर हुई।

सख़्त राहों में भी आसान सफ़र लगता है 
ये मेरी माँ की दुआओं का असर लगता है
एक वीराना जहाँ उम्र गुज़ारी मैंने
तेरी तस्वीर लगा दी है तो घर लगता है
    
डॉ राहत इंदौरी के गीत कई फ़िल्मों में रिकॉर्ड हुए। पेश हैं उनके चंद सिने गीत जो काफ़ी पसंद किए गए-

1.कोई जाए तो ले जाए (घातक) 
2.नींद चुराई मेरी (इश्क़) 
3.देखो देखो जानम हम (इश्क़) 
4.देख ले आंखों में आंखें डाल (मुन्ना भाई एमबीबीएस) 
5.तुमसा कोई प्यारा कोई मासूम नहीं है (ख़ुद्दार)
6.ज़िंदगी नाम को हमारी है (आशियां)
7.धुंआ धुआं ... (मिशन कश्मीर)

डॉ राहत इंदौरी का जन्म इंदौर में 1 जनवरी 1950 को हुआ। उनका इंतक़ाल 70 साल की उम्र में 11 अगस्त 2020 को हुआ। इंग्लैंड और अमेरिका से लेकर उन्होंने कई देशों की यात्राएं कीं और अपनी शायरी से श्रोताओं का भरपूर मनोरंजन  किया। राहत इंदौरी के गुज़रने के बाद कवियों और शायरों की निष्ठा पर भी बात शुरू हो गई है। हमारे कुछ दोस्तों का कहना है कि कवियों और शायरों को यह ध्यान रखना चाहिए कि वे सबके हैं और उनका रचनाकर्म सबके लिए होना चाहिए। 

सबसे ज़्यादा ऐतराज़ राहत इंदौरी के एक शेर के इस मिसरे पर हो रहा है कि "किसी के बाप का हिंदोस्तान थोड़ी है।" यह शेर काफ़ी पुराना है। मुंबई में जब शिवसेना का ख़ौफ़ था तो हिंदी समाज के लोग यह शेर सुनकर ख़ूब तालियां बजाते थे। जब मनसे का ख़ौफ़ हुआ तो उन लोगों ने भी ख़ूब तालियां बजाईं थीं जो आज इस शेर पर ऐतराज़ कर रहे हैं। इससे लगता है कि देश और काल के अनुसार शेर के मानी बदलते रहते हैं। 'बाप का हिंदुस्तान' या "बाप की जागीर" एक मुहावरा है। हमें इस मुहावरे का भी ध्यान रखना चाहिए।

पंडित नेहरू के दोस्त शायर जोश मलीहाबादी पाकिस्तान जाकर पछताए थे। फिर भी नेहरू जी की कृपा से वो हर साल मुंबई के सालाना मुशायरे में भाग लेने के लिए आते थे और कई कई दिन रुकते थे।

राहत इंदौरी ने पाकिस्तान के एक मुशायरे में एक शेर पढ़ा था। इससे देश के प्रति उनकी भावना ज़ाहिर होती है। 

वो अब पानी को तरसेंगे जो गंगा छोड़ आए हैं
हरे झंडे के चक्कर में तिरंगा छोड़ आए हैं

हक़ीक़त यह है कि मुशायरा और कवि सम्मेलन साहित्य नहीं होता। वहां तालियां बजवाने के लिए मंचीय कवि और शायर जनता की भावनाओं का नाज़ायज़ फ़ायदा उठाते हैं। राजनीतिक हस्तियों का मज़ाक उड़ाते हैं। इसके लिए इतिहास में झांकें तो कई कवियों की पिटाई भी हो चुकी है। हमारे हिंदी कवियों ने भी आदरणीय अटल जी के घुटने और कुंवारेपन का कम मज़ाक नहीं उड़ाया है।

मेरे ख़याल से एक रचनाकार का नज़रिया स्वस्थ होना चाहिए। उसे अभिव्यक्ति में संतुलन रखना चाहिए। निदा फ़ाज़ली ने आडवाणी जी की रथ यात्रा पर नज़्म लिखी थी। अयोध्या विवाद पर कैफ़ी आज़मी ने 'दूसरा बनवास' कविता लिखी थी। दोनों ने इन रचनाओं का कई बार सार्वजनिक पाठ किया। दोनों को हिंदी जगत ने भी पसंद किया। यही रचनात्मकता है। हम सब रचनाकारों को मंच पर भी अभिव्यक्ति की आज़ादी और लेखन की मर्यादा का ध्यान रखना चाहिए। हिंदी काव्य मंचों पर फूहड़ नोकझोंक करने वाली कवित्रियों को और संचालकों को जो लोग लाखों रुपए का भुगतान कर रहे हैं वे भी समाज के दुश्मन हैं। ऐसे लोग हमारे संस्कारों में ज़हर घोल रहे हैं। उनसे सावधान रहने की ज़रूरत है। 

शायर राहत इंदौरी के बेटे सतलज इंदौरी ने राहत साहब की आख़िरी ग़ज़ल हमसे साझा की। पेश है वही ग़ज़ल।

नए सफ़र का जो ऐलान भी नहीं होता
तो ज़िंदा रहने का अरमान भी नहीं होता

तमाम फूल वही लोग तोड़ लेते हैं
जिनके कमरों में गुलदान भी नहीं होता

ख़ामोशी ओढ़ के सोई हैं मस्ज़िदें सारी
किसी की मौत का ऐलान भी नहीं होता

वबा ने काश हमें भी बुला लिया होता
तो हम पर मौत का अहसान भी नहीं होता  (वबा = महामारी)

***
आपका-
देवमणि पांडेय

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, 
कन्या पाडा, गोकुलधाम, फ़िल्मसिटी रोड, 
गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210 82126
devmanipandey.blogspot.Com


शुक्रवार, 16 जनवरी 2015

कवयित्री माया गोविंद : गीतों में प्रणय की अभिव्यक्ति


कवि देवमणि पांडेय, फ़िल्मलेखक रामगोविंद और कवयित्री माया गोविंद 

आँसू ही पहचान मेरी मैं आँसू की संतान हूँ 

कवयित्री माया गोविंद 17 जनवरी 2015 को 75 साल की हो गईं। वे पिछले पाँच दशकों से हिंदी काव्यमंचों की सर्वाधिक लोकप्रिय कवयित्री हैं। सन् 1959 में लाल क़िले के कवि सम्मेलन से अपनी काव्य यात्रा की शुरूआत करने वाली इस कवयित्री को देश-विदेश में जो यश और प्रतिष्ठा प्राप्त हुई वह दुर्लभ है। एक तरफ़ उन्हें रामधारी सिंह दिनकर जैसे राष्ट्रकवि ने सराहा दूसरी तरफ़ उनकी श्रेष्ठ रचनाओं के लिए उन्हें दिल्ली का ठिठोली पुरस्कार, मद्रास का सर्वश्रेष्ठ कवि पुरस्कार और राष्ट्रभाषा परिषद मुंबई का महादेवी वर्मा पुरस्कार प्राप्त हुआ। विश्व हिंदी समिति वाशिंगटन जैसी प्रतिष्ठित संस्था के अंतराष्टीय मंच पर माया गोविंद को सन 1991 में हिंदी दिवस के अवसर पर दशक की सर्वश्रेष्ठ कवयित्री के रूप में सम्मानित किया गया।

मंचों पर लगातार सक्रियता के बावजूद कवयित्री माया गोविंद हमेशा अपनी रचनाओं के संकलन के प्रति भी सतर्क रहीं। उनके गीतों का संकलन ‘सुरभि के संकेत’ और ग़ज़लों-नज़्मों का संकलन ‘तुम्हें मेरी क़सम’ नाम से प्रकाशित हुआ। ब्रजभाषा पर उनके अधिकार को ‘कृष्णमयी’ संकलन में देखा जा सकता है।‘छंदरस माधुरी’ में भी ब्रजभाषा और अवधी के छंदों की छटा छाई हुई है। उन्होंने अपने निजी अनुभवों को मुक्त छंद में ‘चांदनी की आग’ संकलन के ज़रिए उदघाटित किया। हाल ही में प्रकाशित उनके नए काव्य संकलन का नाम है- 'नीली झील के दरपन में।' इसमें विविधरंगी समकालीन कविताएं हैं।

कवयित्री माया गोविंद के चुनिंदा लोकप्रिय गीतों का संकलन ‘दर्द का अनुवाद’ नाम से सामने आया। प्रतिष्ठित कवि रामेश्वर अशांत के मत से माया गोविंद के गीतों में कबीर का बैराग्य, मीरा की विरह वेदना तथा प्रसाद और महादेवी के छायावाद का संगम है। उनके गीत स्वयं ही उनके इस रचनात्मक लगाव का संकेत देते हैं-

दर्द का पनघट,दर्द का मरघट दर्द का उन्वान हूँ
आँसू ही पहचान मेरी, मैं आँसू की संतान हूँ

कवयित्री माया गोविंद और कवि देवमणि पांडेय
माया गोविंद के गीतों के मूल में प्रेम की अविरल धारा प्रवाहित होती है- ‘दिल के खाते पे हर दुनियादारी लिखो / एक पन्ना मगर प्यार का भी लिखो।’ श्रृंगार के दोनों पक्षों- संयोग और वियोग की तीव्र अनुभूति ही इन गीतों की शक्ति है। संयोग में जहाँ कवयित्री को समाज में अपनी भूमिका और ज़िम्मेदारियों का एहसास रहता है, वहीं वियोग में वह कई छायावादी कवियों की तरह आँसुओं के समुद्र में डुबकर निस्पंद नहीं हो जाती। उस स्थिति में भी उसे अपने अलावा औरों के भी दर्द का एहसास रहता है। यही कारण है कि खु़द काँटों से ज़ख़्मी होकर भी वह औरों के लिए खु़शबू बांटने वाला गुलाब बन जाती है-

हमने डाले बीज प्यार के उसने कांटे बोए
उन काँटों से लिपट-लिपट हम रात-रात भर रोए
दुनिया भर के दर्दों का जवाब हो गए 
काँटे सहते-सहते हम गुलाब हो गए

यह स्वाभाविक है कि इंसान जीवन में प्रेम के संयोग पक्ष की कामना अधिक करता है। लेकिन इस कवयित्री का मानना है कि जीवन में संयोग की सुगंध जितनी ज़रूरी है, उतनी ही ज़रूरी है वियोग के काँटों की चुभन भी-

माना मैंने फूलों में सुगंध है भरी
माना मैंने फूलों में सुंदरता है बड़ी
काँटे अपने रूप से रिझाते नहीं हैं 
लेकिन काँटे धूप में मुरझाते नहीं हैँ
फूल सदा इनके हवाले होते हैं 
काँटे ही तो इनके रखवाले होते हैं

सर्दियों के आगोश में जैसे धूप और बदली के दामन में जैसे बूँद पनाह लेती है, उसी तरह कवयित्री माया गोविंद के दिल में प्रेम की पीर बसी हुई है। यह पीर उनकी भाग्य रेखा पर लालिमा की तरह उपस्थित है-

जैसे कोई सर्दियों में धूप को छुपा ले 
जैसे कोई बदली से बूँद को चुरा ले
वैसे मैंने भी चुरा ली प्यार की ये पीर 
सेंदुर-सेंदुर हो गई मेरे भाग्य की लकीर 

कवयित्री माया गोविंद 
कवयित्री माया गोविंद के गीतों में लोकप्रियता के ऐसे तत्व हैं जो पढ़ने और सुनने वालों को सहज ही अपना बना लेते हैं। जा़हिर है इसके पीछे काव्य मंचों पर सक्रियता का योगदान होगा। मंच पर श्रृंगारिक रचनाओं की माँग प्राय: अधिक रहती है। कवयित्री माया गोविंद के यहाँ भी प्रेम गीतों का वैभव है। ख़ास बात यह है कि उनके गीतों में प्रणय की अभिव्यक्ति स्वाभाविक और श्रृंगार की प्रस्तुति सहज है। उनके गीतों में निजी अनुभव की मुखरता है। ये गीत अपनी सरलता,सहजता, प्रवाह और अनुभूतियों की तीव्रता में आज के नए गीतकारों के लिए चुनौती हैं। साहित्यिकता की शाल ओढने वाले लोग प्राय: मंचीय रचनाकारों में दिलचस्पी नहीं लेते। अगर कवयित्री माया गोविंद के गीतों को गंभीरता से परखा जाए तो इनमें सृजनात्मकता के कई नए आयाम नज़र आएंगे।

डॉ.धर्मवीर भारती के अनुसार- जीवन के कुछ संवेदन ऐसे हैं जिन्हें नारी ही महसूस कर पाती है,नारी ही अपनी बोली में व्यक्त कर पाती है। ऐसे विशिष्ट नारीसुलभ संवेदनों और काव्य उपकरणों ने भक्तिकाल में, रीतिकाल में तथा छायावादी युग में हिंदी कविता को समृद्ध बनाया है। माया गोविंद की काव्य रचना में वे तत्व बीज रूप में हैं। भारती जी की राय में माया गोविंद की कविताओं का मूल ढांचा तो कवि सम्मेंलनों में प्रचलित लोकप्रिय गीतों का ही है लेकिन उनकी कविताओं के अनेक बिंब, अनेक उपमाएं बिलकुल उनकी अपनी हैं।

कवयित्री माया गोविंद के लिए प्रेम भले ही मोक्ष का मार्ग हो लेकिन उन्होंने समय-समय पर उठने वाले सामाजिक प्रश्रों को अनदेखा नहीं किया है। ‘डाकिए ने द्वार खटखटाया। अनबाँचा पत्र लौट आया’… क्या किसी नवगीत से कम है ? ‘जीवन के सौदागर बोल / मिट्टी का क्या होगा मोल’ और ‘हिंदू मरा है न मुसलमान मरा है / इंसानियत की लाश पे इंसान मरा है’ तथा ‘हमें पानी चाहिए’, ‘सूरज बुझा दूंगी मैं’, ‘जीवन तो गिरवी है मौत की तिजोरी में’, ‘नैना जलें नीर जल जाए सपना जले नहीं’ आदि गीतों में कवयित्री ने जीवन और समाज के अहम प्रश्रों का भी जवाब ढूँढ़ने की सराहनीय कोशिश की है।

अपनी भाषा और अभिव्याक्ति में कवयित्री माया गोविंद के गीत एक ताज़गी भरी कोशिश हैं। इनमें न तो नवगीतों की दुरूहता, जटिलता और अनगढ़पन है और न सतही गीतकारों जैसी कोरी भावुकता। इनकी गेयता और संगीतात्मकता भी इनकी शक्ति है। कवयित्री माया गोविंद ने अपने गीतों के ज़रिए सस्ती मंचीय लोकप्रियता और छद्म बौद्धिकता के लोभ से बचकर एक सहज रास्ता बनाया है। आशा है ये रास्ता अन्य मंचीय प्रतिभाओं के लिए भी दीपस्तंभ साबित होगा।

आपका-
देवमणि पाण्डेय : 
सम्पर्क : 98210-82126 

माया गोविंद : 2 शेल्टन, रोड नं.-10, जुहू, मुम्बई - 400 049, M : 97731-12268 

बुधवार, 28 मई 2014

मुम्बई में संस्‍कृति संगम का लोकार्पण


चित्र : (बाएं से दाएं)- प्रो.सत्‍यदेव त्रिपाठी, शायर नंदलाल पाठक, फिल्‍म लेखक कमलेश पाण्‍डेय, शायर देवमणि पांडेय, रंगकर्मी प्रीता माथुर और डॉ. अनंत श्रीमाली (मुम्बई 11मई 2014)

मुम्बई में संस्‍कृति संगम का लोकार्पण
 
शायर देवमणि पांडेय के संपादन में प्रकाशित मुम्बई महानगर की सांस्कृतिक निर्देशिका 'संस्‍कृति संगम' के 5वें अंक का लोकार्पण 11 मई 2014 को ‘रंग दे बसंती’ फेम फिल्‍म लेखक कमलेश पाण्‍डेय ने किया। 'बतरस' एवं केंद्रीय मात्स्यिकी शिक्षा संस्‍थान द्वारा फिशरीज़ यूनिवर्सिटी सभागार में आयोजित इस समारोह में रंगकर्मी प्रीता माथुर, प्रो.सत्‍यदेव त्रिपाठी और वरिष्‍ठ शायर प्रो. नंदलाल पाठक ने शिरकत की।

संस्‍कृति संगम में साहित्य, पत्रकारिता, संगीत, रंगमंच, आदि क्षेत्रों में सक्रिय प्रमुख हस्तियों के सम्पर्क सूत्र उपलब्ध हैं। लोकार्पण के पश्‍चात व्‍यंग्‍यकार डॉ. अनंत श्रीमाली के संचालन में कवि सम्‍मेलन हुआ जिसमें विनोद दुबे, प्रमोद कुश, अर्चना जौहरी, प्रज्ञा विकास, शायर ओबेद आजम आजमी, नवीन चतुर्वेदी, डॉ. राजेश्‍वर उनियाल, हास्‍य कवि आसकरण अटल एवं सुभाष काबरा आदि ने रचना पाठ किया।

विश्‍व मातृ दिवस के उपलक्ष्‍य में शुरूआत अधिवक्ता पुनीत चतुर्वेदी की 'मॉं' रचना से हुई। समारोह में मुंबई महानगर के वरिष्‍ठ साहित्यकार-कार्टूनिस्ट आबिद सुरती, लोक गायिका श्रीमती इंदु पांडेय, कवयित्री सुषमासेन गुप्ता, चित्रकार जैन कमल, शायर हस्‍तीमल हस्‍ती, 'दाल रोटी' के संपादक अक्षय जैन, गीतकार पुनीत विनायक एवं हरिश्चंद्र, हास्‍य कवि रोहित शर्मा, गिरीश सेटिया के अलावा नार्वे से पधारी चित्रकार कवयित्री अभिलाषा वाल विशेष रूप से उपस्थित थीं।

मुम्बई की सांस्कृतिक निर्देशिका संस्कृति संगम में हिन्दी रचनाकारों, पत्रकारों, रंगकर्मियों, फ़िल्म लेखकों, गायक कलाकारों, गीतकारों, शायरों, दैनिक समाचारपत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं के साथ ही अखिल भारतीय प्रमुख साहित्यकारों, मंच पर सक्रिय अखिल भारतीय कवियों एवं विदेशों में बसे प्रमुख हिन्दी रचनाकारों के नाम, पते, दूरभाष नं. एवं ईमेल शामिल हैं। संस्कृति संगम ने अपने पाँच संस्करणों के ज़रिए साहित्य, संगीत, सिनेमा, पत्रकारिता, रंगमंच आदि क्षेत्रों में सक्रिय रचनाकर्मियों को एकजुट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 

महक कलियों की फूलों की हँसी अच्छी नहीं लगती
मुहब्बत के बिना ये ज़िंदगी अच्छी नहीं लगती 

कभी तो अब्र बनकर झूमकर निकलो कहीं बरसों
कि हर मौसम में ये संजीदगी अच्छी नहीं लगती

कुछ ख़्वाब सजाने से, कुछ ज़ख़्म छुपाने से 
रिश्ता तो मुहब्बत का निभता है निभाने से

रस्मों को बदलने की ज़िद मँहगी पड़ी लेकिन
जीने का मज़ा आया टकराके ज़माने से

....देवमणि पांडेय : 98210-82126

मंगलवार, 12 फ़रवरी 2013

लखनऊ में लोकार्पण : देवमणि पांडेय का ग़ज़ल संग्रह

कवि देवमणि पांडेय, पूर्व सांसद-साहित्यकार उदय प्रताप सिंह और शायर अनवर जलालपुरी

अपना तो मिले कोई का लोकार्पण लखनऊ में

मुम्बई के शायर देवमणि पांडेय के ग़ज़ल संग्रह ‘अपना तो मिले कोई’ का लोकार्पण पूर्व सांसद, साहित्यकार एवं उ.प्र. हिंदी संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष श्री उदय प्रताप सिंह ने किया। हिंदी संस्थान, हज़रतगंज, लखनऊ के प्रेमचंद सभागार में 9 फरवरी 2013 की शाम को आयोजित इस कार्यक्रम में प्रमुख अतिथि के रूप में बोलते हुए उदय प्रताप सिंह ने कहा कि हिंदी और उर्दू दरअसल एक ही भाषाएं हैं। राज दरबारों में बोली जाने वाली ज़बान को उर्दू नाम दिया गया जब कि समाज में बोली जाने वाली भाषा को हिंदी कहा गया। कवि देवमणि पांडेय की ग़ज़लों की ज़बान भी यही है। इसे आप चाहे हिंदी, चाहे उर्दू कह सकते हैं। इसी आम फ़हम ज़बान में पांडेयजी ने अपने समय और समाज की सच्चाइयों को असरदार तरीके़ से अभिव्यक्त किया है। 

कार्यक्रम के अध्यक्ष जाने-माने शायर जनाब अनवर जलालपुरी ने कहा कि देवमणि पांडेय की ग़ज़लों में एक तरफ़ तो गाँव की ज़िंदगी मुस्कराती है तो दूसरी तरफ़ शहरों का अजा़ब (दर्द) भी चहलकदमी करता दिखाई देता है। उन्होंने आगे कहा कि उर्दू के अधिकतर शायरों ने हिंदी में लिखना-पढ़ना सीख लिया है। अगर हिंदी के 25 प्रतिशत शायर भी उर्दू स्क्रिप्ट सीख लें तो दोनों ज़बानों में बहुत अच्छा तालमेल हो जाएगा और दोनों की तरक़्की़ होगी। देवमणि पांडेय ने उर्दू सीखकर इस दिशा में क़ाबिले-तारीफ़ काम किया है। 

डॉ.हारून रशीद, देवमणि पांडेय, अनवर जलालपुरी, हसन काज़मी, रशीद क़ुरेशी
कार्यक्रम की शुरूआत में कवयित्री नीतू सिंह ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की। नीतू जी ने देवमणि पांडेय की एक ग़ज़ल भी तरन्नुम में पेश की -

जो मिल गया है उससे भी बेहतर तलाश कर 
क़तरे में भी छुपा है समंदर तलाश कर

हाथों की इन लकीरों ने मुझसे यही कहा
अपनी लगन से अपना मुक़द्दर तलाश कर

शायर आमिर मुख़्तार ने भी देवमणि पांडेय की एक ग़ज़ल तरन्नुम में पेश की -

प्यासी ज़मीं थी और मैं बादल नहीं हुआ
इक ख़्वाब था मगर वो मुकम्मल नहीं हुआ

ख़ुशबू मेरी निगाह की तुझसे लिपट गई
क्या बात है कि दिल तेरा संदल नहीं हुआ

उर्दू माहनामा ला-रैब के सम्पादक जनाब रशीद कु़रेशी ने ‘अपना तो मिले कोई’ पर इज़हारे ख़याल करते हुए कहा कि देवमणि पांडेय की ग़ज़लें ऊपर से देखने में बेहद सरल और आसान लगती हैं लेकिन उनके भीतर गहरा अर्थ छुपा होता है। सहारा समय न्यूज़ चैनल के पत्रकार व शायर हसन काज़मी ने कहा कि देवमणि पांडेय की ग़ज़लें दिल से निकली हुई ग़ज़लें हैं और दिल को छूती हैं। । कथाकार दयानंद पांडेय, व्यंग्यकार सूर्यकुमार पांडेय और ईटीवी के वरिष्ठ सम्पादक-शायर तारिक़ क़मर ने भी कवि देवमणि पांडेय को बधाई दी। 

इस अवसर पर आयोजित कवि सम्मेलन-मुशायरे में हिंदी-उर्दू के प्रमुख कवियों-शायरों ने शिरकत की। प्रमुख अतिथि उदय प्रताप सिंह ने चुनिंदा शेर सुनाए- 

न मेरा है न तेरा है, ये हिंदोस्तान सबका है
नहीं समझी गई ये बात तो नुकसा़न सबका है

श्रोताओं की माँग पर देवमणि पांडेय को कई ग़ज़लें पेश करनी पड़ी। दो शेर देखिए-

सजा है इक नया सपना हमारे मन की आँखों में 
कि जैसे भोर की किरणें किसी आँगन की आँखो में

सुलगती है कहीं कैसे कोई भीगी हुई लकड़ी
दिखाई देगा ये मंज़र तुम्हें बिरहन की आँखों में

शायर अनवर जलालपुरी, रशीद क़ुरेशी, डॉ. मेराज साहिल, इमरान अनवारवी, आमिर मुख़्तार, इस्लाम फ़ैसल, अहमद फ़राज़, सलमान ज़फ़र, ओ.पी. तिवारी, मनोज श्रीवास्तव, जनेश्वर तिवारी और नीतू सिंह के कविता पाठ का श्रोताओं ने जमकर लुत्फ़ उठाया। सहारा समय न्यूज़ चैनल से जुड़े पत्रकार-शायर हसन काज़मी ने तरन्नुम में अपनी लोकप्रिय ग़ज़ल पेश की-

खू़बसूरत हैं आखें तेरी रातों को जागना छोड़ दे
खु़द बखु़द नींद आ जाएगी तू मुझे सोचना छोड़ दे

डॉ.हारून रशीद ने कार्यक्रम का रोचक संचालन किया। संयोजन वीरेंद्र नारायण सिंह ने और नराकास (लखनऊ) के अध्यक्ष संजय पांडेय ने आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम में अच्छी तादाद में लखनऊ महानगर के रचनाकार-पत्रकार और गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे। 

देवमणि पांडेय : 98210-82126

शनिवार, 14 जनवरी 2012

अपना तो मिले कोई : ग़ज़ल संग्रह का लोकार्पण

प्रज्ञा विकास, शायर देवमणि पांडेय, शायर ज़फ़र गोरखपुरी, गायिका डॉ. शैलेश श्रीवास्तव, 
शायरा दीप्ति मिश्र, कवयित्री माया गोविंद, चित्रकार जैन कमल

ग़ज़ल संग्रह अपना तो मिले कोई का लोकार्पण

शायर देवमणि पाण्डेय के ग़ज़ल संग्रह अपना तो मिले कोई का विमोचन 12 फरवरी 2012 को भवंस कल्चरल सेंटर, मुम्बई के एसपी जैन सभागार में धूमधाम से सम्पन्न हुआ। इस मौके पर सभागार में कई महत्वपूर्ण शायर, कवि, पत्रकार और कलाकार मौजूद थे। किताब का लोकार्पण करते हुए मशहूर शायर ज़फ़र गोरखपुरी ने कहा कि इस किताब के बाद देवमणि पांडेय ने अपने अदबी सफर का पहला पड़ाव पार कर लिया है। इस किताब को पढ़ते हुए कई शेरों पर उंगली ठहर गई और कई शेर चमकते हुए दिखे। देवमणि ने अपनी मेहनत से पाठकों का एतबार हासिल किया है। उन्होने देवमणि पाण्डेय के कुछ शेर भी पढ़े। मसलन-

दिल में मेरे पल रही है ये तमन्ना आज भी
इक समंदर पी चुकूँ और तिश्नगी बाक़ी रहे

ज़फ़र गोरखपुरी ने आगे कहा कि मेरी नज़र में अच्छी शायरी वो है जो अपने पाठकों के ज़ौक़ पर पूरी उतरे, उन्हें ज़हनी सुकून और रूहानी मसर्रत अता करे। जो पाठकों को मायूस न करे बल्कि उनमें ज़िदगी से लड़ने का हौसला पैदा करे। मुझे ख़ुशी है कि देवमणि पांडेय की ग़ज़लों में ये ख़ासियत मौजूद है। मेरी दुआ है कि देवमणि पांडेय का ये शेरी मजमुआ हिंदी और उर्दू दोनों ज़बानों में मक़बूल हो। दिल की बातें और ख़ुशबू की लकीरें के बाद देवमणि पांडेय की यह तीसरी किताब है। इस किताब में सौ ग़ज़लें शामिल हैं।

इस किताब पर अपनी राय जाहिर करते हुए जाने-माने शायर शमीम तारिक़ ने कहा कि देवमणि पांडेय की ग़ज़लें ग़ज़ल के मिजाज़ से और उसकी तहज़ीब से बहुत ख़ूबसूरत रिश्ता रखती हैं। यही रिश्ता उनके कामयाब ग़ज़लगो होने की ज़मानत है। ग़ज़ल अरबी से फारसी में, फारसी से उर्दू में और उर्दू से दीगर भारतीय भाषाओं में सफ़र करती हुई मक़बूल हो रही है। अब ग़ज़ल पर देवमणि पांडेय का भी उतना ही हक़ है जितना किसी उर्दू शायर का। मैं न केवल उनको मुबारकवाद पेश करता हूँ बल्कि पूरे यक़ीन से ऐलान करता हूँ कि एक अच्छे ग़ज़लगो के तौर पर देवमणि पांडेय मक़बूल होंगे।

मशहूर शायर और अदीब अब्दुल अहद साज़ ने कहा कि हिंदी ग़ज़ल से उर्दू शायरी की तरफ़ आने वालों में देवमणि पांडेय का नाम अलग मुकाम रखता है। यूँ तो देवमणि पाण्डेय के कलाम में कई पहलू हैं मगर दो पहलू ज़्यादा साफ़ हैं। एक तो उनका तज़रुब-ए-इश्क़ (प्रेम-अनुभव) और दूसरा आज के समाज के बीच बसर करते हुए सामान्य आदमी का कर्ब और घुटन! उन्होंने अपने पैरो चली ज़मीन और अपने सर पर लदे हुए आसमान को अपने क़लम से ब-ख़ूबी दर्शाया है। देवमणि पाण्डेय का यह काव्य संकलन ‘अपना तो मिले कोई’ पढ़ते हुए आपको ये अंदाज़ा बख़ूबी हो सकेगा कि उर्दू के आसमान पर हिंदी के सितारे कितनी ख़ूबसूरती से टाँके जा सकते हैं और हिंदी के गुलशन में उर्दू के फूल कितने प्यार से खिलाए जा सकते हैं। मशहूर फॉक सिंगर डॉ. शैलेश श्रीवास्तव ने तरन्नुम में देवमणि पाण्डेय की एक ग़ज़ल सुनाकर मुशायरे का आगाज किया-

ये दुनिया है यहाँ कब कौन किसका साथ देता है
जो अपना है वही ग़म की हमें सौग़ात देता है
चित्रकार जैन कमल, शायर देवमणि पांडेय,  ज़फ़र गोरखपुरी,  नक़्श लायलपुरी, कवयित्री माया गोविंद, 
शायरा दीप्ति मिश्र, लोक गायिका डॉ. शैलेश श्रीवास्तव, शायर ज़मीर काज़मी

युवा शायर युसूफ दीवान ने दमदार आवाज में ग़ज़लें पेश की- कीजिए सबको ख़बरदार न समझा जाए / मंजिले इश्क को हमवार न समझा जाए। नई नस्ल के मारूफ़ शायर हैदर नज्मी ने देवमणि पाण्डेय को उनकी इस किताब के लिए मुबारक बाद देते हुए अपने ताजा कलाम पेश किए-

तुम्हारा नाम अगर लूँ तो झूठ बोलूँगा 
मुझे तो गम मेरा परवरदिगार देता है 

शायरा दीप्ति मिश्र ने अपने चुनिंदा कलाम पेश किए। उनकी शायरी को लोगों ने खूब सराहा-

दुखती रग पे उंगली रख कर पूछ रहे हो कैसी हो
तुमसे ये उम्मीद नहीं थी, दुनिया चाह जैसी हो

अब्दुल अहद साज ने अपना कलाम यूँ पेश किया-राहे जहन्नम के राही, हम करम नगर के वासी हैं। इसके बाद ज़मीर काजमी ने कई उम्दा शेर पेश किए- मताए उम्र की गठरी मैं ले जाऊँ, कहाँ रखूँ / गुजरने वाला हर लम्हा ये दौलत लूट जाता है। फ़िल्म लेखक राम गोविंद अतहर ने भी बेहतर शेर सुनाकर दाद वसूल की-

पत्थरों को कोई ढोता नहीं है
ख़ाक बन जा फिर हवा ले जाएगी

शायर शमीम तारिक़ ने ग़ज़ल पेश की - सहर सर पर खड़ी है और सारी बात बाक़ी है। इसके बाद नामचीन शायर ज़फ़र गोरखपुरी ने निराले अंदाज में अपने कलाम पढ़े-

मेरी एक छोटी सी कोशिश तुझको पाने के लिए 
बन गई है मसअला सारे जमाने के लिए
मैं ज़फ़र ताज़िंदगी बिकता रहा परदेश में 
अपनी घरवाली को इक कंगन दिलने के लिए

सभागार में ज़फ़र साहब की शरीके-हयात किताबुन्निसा जी भी मौजूद थीं। देवमणि पांडेय ने शाल और गुलदस्ता भेंट करके उनका इस्तकबाल किया। समारोह अध्यक्ष नक़्श लायलपुरी साहब के उम्दा शेर सामयीन ने दिल लगाकर सुने और भरपूर दाद दी -

एक आँसू गिरा सोचते-सोचते 
याद क्या आ गया सोचते-सोचते
जैसे तस्वीर लटकी हो दीवार पे 
हाल ये हो गया सोचते-सोचते 

देवमणि पाण्डेय ने अपनी तख़लीक़ी सफ़र पर इज़हारे-ख़याल करते हुए मजरूह सुल्तानपुरी को याद किया और बोले कि मेरा परिचय यही है कि मैं मजरूह साहब के नगर सुल्तानपुर का हूँ। उन्होंने कुछ ग़ज़लें पेश कीं तो सामयीन ने उन्हें सराहा और दिल खोलकर दाद दी-

कुछ तीरगी में गुज़री, उजालों में कट गई
इक ज़िंदगी मिली थी, सवालों में कट गई
कितनी अजीब होती है शायर की ज़िंदगी
लफ़्जों की जुस्तजू में रिसालों में कट गई


कवयित्री माया गोविंद ने देवमणि पांडेय को उनकी लगनशीलता और लेखन की तारीफ करते हुए इस तरह बधाई दी-

अपना तो मिले कोई’ कृति ये जो तुम्हारी है
हर दिल में उतर जाए आशीष हमारी है
बज़्में अदब में छाए यह है दुआ हमारी
हर दिल अज़ीज़ होगी हर इक ग़ज़ल तुम्हारी
तेरे सुख़न का ऐ देव अंदाज़ है निराला
घायल के लिए मरहम प्यासों के लिए प्याला

लोकार्पण समारोह में किताब के डिजायनर जैन कमल ने अपनी बात रखी और एक जैनमुनि की ओर से देवमणि पांडेय को मोतियों की माला भेट की। समारोह के आरम्भ में वरिष्ठ शायर नंदलाल पाठक के हाथों शाल भेंट करके शायरों का सम्मान किया गया। समारोह का संचालन कवयित्री प्रज्ञा विकास ने किया। उन्होंने भी अपने कलाम पढ़े। आभार प्रदर्शन समकालीन हिंदी कविता के चर्चित कवि डॉ. बोधिसत्व ने किया। इस मौक़े पर साहित्य, संगीत और सिने जगत से कुमार प्रशांत, यज्ञ शर्मा, डॉ.सत्यदेव त्रिपाठी, हृदयेश मयंक, डॉ.सुषमा सेन, कविता गुप्ता, खन्ना मुज़फ्फरपुरी, रेखा रोशनी, बसंत आर्य, अनंत श्रीमाली, रासबिहारी पांडेय, शास्त्रीय गायक डॉ. परमानंद, ग़ज़ल गायक राजकुमार रिज़वी, संगीतकार विवेक प्रकाश, गायिका रश्मिश्री, उदघोषिका प्रीति गौड़ और वीर सावरकर फेम अभिनेता शैलेंद्र गौड़ उपस्थित थे।

आपका-
देवमणिपांडेय

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, 
गोकुलधाम, निकट महाराजा टावर, फिल्मसिटी रोड,
 गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210 82126