गुरुवार, 4 नवंबर 2010

गायक राजेंद्र नीना मेहता : जब आँचल रात का लहराए

(बाएं से-) समाजसेवी विनोद टिबड़ेवाला, उदघोषक देवमणि पाण्डेय, पत्रकार नंदकिशोर नौटियाल, सिंगर राजेंद्र नीना मेहता, कवयित्री माया गोविंद, कथाकार आर.के.पालीवाल और गुरु अरविंदजी
 राजेंद्र नीना मेहता को जीवंती कला सम्मान

मौसम बारिश का था। मगर चारों तरफ आग बरस रही थी। सन 1947 के अगस्त माह के आख़िरी दिन थे। देश को आज़ादी मिली। मगर आज़ादी की खुशियां बंटवारे की कोख़ से जन्मे दंगों की ट्रेजडी में तब्दील हो गईं। जलते मकानों, उजड़ी दुकानों और सड़क पर पानी की तरह बहते इंसानी ख़ून के ख़ौफ़नाक मंज़र ! इनसे तमाम माहौल में रुह को थर्रा देने वाली दहशत फैल गई थी। सन्नाटे को चीरता हुआ फ़ौज का एक ट्रक लाहौर में एक मकान के सामने रुका। धडधड़ाकर दस-बारह जवान नीचे कूदे। दरवाजे पर दस्तक दी। सामने एक ख़ौफ़ज़दा औरत और नौ साल का सहमा हुआ बच्चा खड़ा था। बच्चे का बाप कारोबार के सिलसिले में बाहर गया था। उन्हें हुक्म मिला- कोई भी एक संदूक उठा लो । हम तुम्हें कैंम्प तक छोड़ देंगे। फिर हमारी ज़िम्मेदारी ख़त्म। जवाब का इंतज़ार किए बिना झट से एक फ़ौजी ने कोने में रखा संदूक उठाया। पलक-झपकते मां-बेटे को ट्रक में चढ़ाया और डीएवी कालेज के मुहाजिर कैम्प में लाकर डाल दिया। बीस दिनों के बाद बिछड़ा हुआ बाप आकर अपने बेटे से मिला। मुसीबतों का दरिया पार करने के बाद जब ये परिवार हिंदुस्तान की सरहद में दाख़िल हुआ तो संदूक खोला गया। उस संदूक में एक हारमोनियम था। कई शहरों की ख़ाक छानने के बाद आख़िरकार वो बच्चा उस हारमोनियम के साथ आर्ट और फ़न की नगरी मुंबई पहुंचा। मुंबई ने उसे और उसने मुंबई को अपना लिया। आज उस बच्चे को लोग ग़ज़ल सिंगर राजेंद्र मेहता के नाम से जानते हैं। 

शनिवार 30 अक्टूबर 2010 को भवंस कल्चर सेंटर अंधेरी (मुम्बई) में जाने माने ग़ज़ल सिंगर राजेंद्र-नीना मेहता को जीवंती फाउंडेशन की ओर से जीवंती कला सम्मान से विभूषित किया गया। वरिष्ठ पत्रकार नंदकिशोर नौटियाल, प्रतिष्ठित कथाकार-आयकर आयुक्त आर.के.पालीवाल,समाजसेवी विनोद टिबड़ेवाला और संस्थाध्यक्ष कवयित्री माया गोविंद ने उन्हें यह सम्मान भेंट किया। कवि देवमणि पाण्डेय ने राजेंद्र मेहता से उनके फ़न और शख़्सियत के बारे में चर्चा की। राजेंद्र मेहता ने अपनी ग़ज़लों की अदायगी से श्रोताओं को अभिभूत कर दिया। श्रोताओं की माँग पर उन्होंने अपना लोकप्रिय नग़मा भी पेश किया-

जब आंचल रात का लहराए और सारा आलम सो जाए 
तुम मुझसे मिलने शमा जलाकर ताजमहल में आ जाना

ग़ज़ल के मंच की पहली जोड़ी 

वर्ष था 1963 और तारीख थी 5 अगस्त। आकाशवाणी मुंबई में जमालसेन के म्यूज़िकल ड्रामा ‘मीरा’ की रिकार्डिंग थी। राजेंद्र ने राणा के लिए और नीना ने मीरा के लिए अपना स्वर दिया। राजेंद्र का असरदार गायन सुनकर नीना के दिल के तार झंकृत हो उठे। राजेंद्र की पलकों पर भी ख़्वाब रोशन हो गए।उस ज़माने में इंटरकास्ट मैरिज आसान नहीं थी। राजेंद्र ने यह भी कहा था- हम छुपकर या घर से भागकर शादी नहीं करेंगे। हम तुम्हारे मां-बाप की रज़ामंदी से ही शादी करेंगे। नीना जी के मां-बाप का रुख़ इस मामले में काफी सख़्त था। तीन साल के कड़े इम्तहान के बाद अक्तूबर 1966 में दोनों की मंगनी हुई और जनवरी 1967 में नीना और राजेंद्र मेहता विवाह सूत्र में बंध गए। 

सन् 1967 में ‘सुरसिंगार संसद’ के प्रोग्राम में राजेंद्र और नीना ने एक साथ मिलकर ग़ज़ल गाई। यानी ग़ज़ल के मंच की पहली जोड़ी के रूप में सामने आए और दोनों ने और शोहरत के आसमान पर अपनी कामयाबी का परचम लहरा दिया। ग़ज़ल का रवायती मानी ‘औरत से बातचीत’ लिया जाता है। अगर औरत ग़ज़ल गएगी तो वह किससे बात करेगी ? इस मुद्दे पर अख़बारों में बहस छिड़ गई। बहरहाल मेल और फीमेल को एक साथ ग़ज़ल गाते देखकर संगीत प्रेमी सामयीन हैरत में पड़ गए। मगर इस तरह ग़ज़ल गायिकी में एक नया ट्रेंड कायम हो चुका था। दो साल बाद जब चित्रा और जगजीत सिंह साथ-साथ मंच पर आए तो इस ट्रेंड को पसंद करने वालों की तादाद बुलंदी पर पहुँच चुकी थी।

राजेंद्र मेहता के साथ में हैं श्रीधर चारी (तबला), उदघोषक देवमणि पाण्डेय और सुनीलकांत गुप्ता (बाँसुरी)
फेमिली बैक ग्राउंड

वक़्त भी क्या दिन दिखाता है। राजेंद्र मेहता के बाबा लाहौर के बाइज़्ज़त ज़मींदार थे। पिता की अच्छी-ख़ासी चाय की कंपनी थी। सरकार की तरफ़ से नाना ने पहली जंगे-अज़ीम में और मामा ने दूसरी जंगे-अज़ीम में हिस्सा लिया था। मगर राजेंद्र मेहता को लखनऊ में ख़ुद को गुरबत से बचाने के लिए एक होटल में पर्ची काटने की नौकरी करनी पड़ी। उस समय वे नवीं जमात के तालिबे-इल्म थे। पढ़ाई के साथ नौकरी का यह सिलसिला बारहवीं जमात तक चला। इंटरमीडिएट पास करने पर उन्हें ‘बांबे म्युचुअल इश्योरेंस कंपनी’ में नौकरी मिल गई। 1957 में उन्होंने बीए पास कर लिया। राजेंद्र मेहता की मां को गाने का शौक़ था। बचपन में ही उन्होंने मां से गाना सीखना शुरु कर दिया था। लखनऊ में पुरुषोत्तमदास जलोटा के गुरुभाई भूषण मेहता उनके पड़ोसी थे। उनको सुनकर फिर से गाने के शौक़ ने सिर उठाया। बाक्स में रखा हुआ हारमोनियम बाहर निकल आया। राजेंद्र मेहता ने उर्दू की भी पढ़ाई की। शायर मजाज़ लखनवी और गायिका बेग़म अख़्तर की भी सोहबतें मिलीं। 1960 में उनका तबादला मुंबई हो गया।

ग़ालिब से गुलज़ार तक 

मुंबई आने से पहले ही राजेंद्र मेहता आकाशवाणी कलाकार बन चुके थे। लखनऊ यूनीवर्सिटी के संगीत मुक़ाबले का ख़िताब जीत चुके थे। कुंदनलाल सहगल की याद में मुम्बई में हुए संगीत मुक़ाबले में राजेंद्र मेहता ने अव्वल मुक़ाम हासिल किया। मरहूम पी.एम.मोरारजी देसाई के हाथों वे ‘मिस्टर गोल्डन वायस ऑफ इंडिया’ अवार्ड से नवाज़े गए। मार्च 1962 में ‘सुर सिंगार संसद’ ने सुगम संगीत को पहली बार अपने प्रोग्राम में शामिल किया। उसमें गाने से पहचान और पुख़्ता हुई। मशहूर संगीत कंपनी एचएमवी ने ‘स्टार्स आफ टुमारो’ के तहत 1963 में राजेंद्र मेहता का पहला रिकार्ड जारी किया। 1965 में जगजीत सिंह से दोस्ती हुई। 1968 में दोनों ने मिलकर करीब बीस शायरों की ग़ज़लें चुनकर ‘ग़ालिब से गुलज़ार तक’ लाजवाब प्रोग्राम पेश किया। इस मौक़े पर उस्ताद अमीर खां, जयदेव, ख़य्याम और सज्जाद हुसैन जैसे कई नामी कलाकर बतौर मेहमान तशरीफ़ लाए थे। इस नए तजुर्बे ने संगीत जगत में धूम मचा दी।

मेंहदी हसन का पब्लिक शो 

जब राजेंद्र और नीना मेहता ग़ज़ल की दुनिया में आए, उस समय ग़ज़ल गायिकी में पैसा नहीं था। मगर 1978 में अचानक एक करिश्मा हुआ और सारा मंज़र बदल गया। पाकिस्तानी दूतावास की ओर से 1978 में ‘इक़बाल दिवस’ के सिलसिले में मेंहदी हसन मुंबई आए। उनकी प्रेस कांफ्रेंस में लता मंगेशकर, नौशाद और दिलीप कुमार जैसी हस्तियां मौजूद थीं। बिरला मातुश्री सभागार में मेंहदी हसन का पब्लिक शो हुआ। पांच सौ रुपए के टिकट थे मगर सभागार में एक भी सीट ख़ाली नहीं थी। षड़मुखानंद हाल में भी यही आलम रहा। देश के कुछ और शहरों में भी ग़ज़ल के शो हुए और देखते ही देखते मेंहदी हसन ने टिकट ख़रीदकर ग़ज़ल सुनने वाला एक क्लास खड़ा कर दिया। इस बदलते माहौल में ग़ज़ल गायकों को पैसा मिलने लगा। सिर्फ़ गायिकी से रोज़ी-रोटी चलने की उम्मीद बंध गई। लोगों को लगा कि अगर ‘किशोर कुमार नाइट’ हो सकती है तो ‘जगजीत सिंह नाइट’ भी हो सकती है। संगीत कंपनियों ने भी ग़ज़ल कार्यक्रम आयोजित करने शुरु कर दिए।

जब आंचल रात का लहराए 

राजेंद्र मेहता को शोहरत और दौलत की भूक कभी नहीं रही। वे हमेशा मध्यम रफ़्तार से चले। उनके चुनिंदा अलबम आए और मंच पर भी उनके चुनिंदा प्रोग्राम हुए। ग़ज़लों को पेश करने के अपने बेमिसाल अंदाज़ से उन्होंने अपना एक ख़ास तबक़ा तैयार किया। उनकी ग़ज़लों में प्रेम की सतरंगी धनक के साथ ही समाज और सियासत के काले धब्बे भी नज़र आते हैं। मरहूम शायर प्रेमबार बर्टनी के मुहब्बत भरे एक नग़मे ‘जब आंचल रात का लहराए' को दिल को छू लेने वाले अंदाज़ में पेश करके राजेंद्र और नीना मेहता ने हमेशा के लिए ग़ज़लप्रेमियों के दिलों पर अपना नाम लिख दिया। संगीत के मंच पर राजेंद्र और नीना मेहता की जोड़ी को 44 साल हो चुके हैं। अपने अब तक के सफ़र से बेहद ख़ुश है। वे कहते हैं-ऊपरवाले ने हमें इतना कुछ दिया जिसके हम बिलकुल हक़दार नहीं थे। अक्सर राजेंद्र मेहता वे पंक्तियां सुनाते हैं जिसे उस्ताद अमीर खां सुनाया करते थे-

गुंचे ! तेरी क़िस्मत पे दिल हिलता है
सिर्फ़ इक तबस्सुम के लिए खिलता है
गुंचे ने कहा - बाबा ! ये इक तबस्सुम भी किसे मिलता है 

आपका
देवमणिपांडेय

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति,
कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड,
गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210-82126

रविवार, 31 अक्टूबर 2010

स्वानंद किरकिरे के साथ सिंगल स्क्रीन सिनेमा में ‘दबंग’

उज्जैन के शिप्रा होटल के गार्डेन में नेशनल अवार्ड से सम्मानित 'थ्री ईडिएट' फेम गीतकार स्वानंद किरकिरे,
मशहूर टीवी ऐंकर गायत्री शर्मा और शायर देवमणि पाण्डेय (12 सितम्बर 2010)

श्री मध्यभारत हिंदी समिति इंदौर में महात्मा गाँधी

श्री मध्यभारत हिंदी समिति, इंदौर के सभागार में महात्मा गाँधी की अदभुत युवा तस्वीर दिखाई पड़ी- बंद गले का कोट और शानदार पगड़ी। तस्वीर के नीचे अंकित है- काठियावाड़ी वेशभूषा में गाँधीजी। अगर यह इबारत न होती तो हम पहचान ही नहीं पाते कि यह गाँधीजी हैं। सौ साल पहले 1910 में ख़ुद गाँधीजी ने श्री मध्यभारत हिंदी समिति की स्थापना की थी।यहाँ से उन्होंने दक्षिण में हिंदी सिखाने के लिए दस हिंदीसेवियों का एक जत्था भी रवाना किया था। सोमवार 13 सितम्बर 2010 को शाम 6 बजे श्री मध्यभारत हिंदी समिति के सभागार में ईटीवी के सीईओ जगदीश चंद्रा, फ़िल्म थ्री ईडियट के गीतकार स्वानंद किरकिरे ,भड़ास फॉर मीडिया के सम्पादक यशवंत सिंह और मेरा सम्मान किया गया। 

जोश और उमंग से लबालब युवा उदघोषक अमित राठौड़ ने हमें कवितापाठ के लिए आमंत्रित किया। श्रोताओं की माँग पर स्वानंद ने फ़िल्म ‘हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी’ का गीत ‘बावरा मन’ ऐसा डूबकर गाया कि लोग भाव विभोर हो गए। मैंने ग़ज़लें सुनाईं। श्रोताओं में लेखकों-पत्रकारों की तादाद काफी थी। दूसरी ग़ज़ल पूरी होते ही पीछे से आवाज़ आई- 'कभी कभी' सुनाइए। मैंने यह ग़ज़ल भी सुना दी। मंच से नीचे उतरा तो वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश हिंदुस्तानी ने गर्मजोशी से हाथ मिलाया और कहा तीसरी गज़ल मुझे बहुत पसंद आई। सामने चार बुज़ुर्ग खड़े थे- हास्यव्यंग्य के वरिष्ठ कवि सरोज कुमार, वरिष्ठ गीतकार चंद्रसेन विराट, प्रतिष्ठित ग़ज़लकार चंद्रभान भारद्वाज और जाने-माने कथाकार शरद पगारे। इन बुज़ुर्गों ने अपने आशीर्वाद और स्नेह से ऐसा नहलाया कि आज भी तन-मन तरबतर है।
वेबदुनिया कार्यालय इंदौर में मराठी फीचर इंचार्ज स्मिता जोशी, हिन्दी फीचर इंचार्ज स्मृति जोशी, शायर देवमणि पांडेय, असिसटंट मैनेजर भीका शर्मा, उपसंपादक  शराफत खान, उपसंपादक रूपाली बर्वे, गुजराती फीचर इंचार्ज कल्याणी देशमुख

दोपहर को हमने इंदौर के मशहूर फ़िल्म वितरक आर.डी. जैन के यहाँ आदिवासी भोजन किया। केले के पत्ती की सब्जी और पके छिलकेदार केले की मसालेदार भाजी साथ में दाल बाटी। अदभुत स्वाद। जब हम 11 सितम्बर को इंदौर पहुँचे थे तो यही जैन साहब हमें और स्वानंद किरकिरे को एयरपोर्ट से सीधे ओल्ड पलासिया ले गए था। हमने विजय चाट हाउस में आलू चाट और मधुरम में मक्के की कचौरी खाई।अदभुत स्वाद ज़िंदगी का।क्या आपने कभी खाई। स्वानंद किरकिरे की फ़रमाइश पर रात के आख़िरी शो में हमने रीगल के सिंगल स्क्रीन सिनेमा में ‘दबंग’ फ़िल्म देखी। शो हाउसफुल था और क्या सीटियाँ बज रहीं थीं। सुबह इंदौर दूरदर्शन में हम लेखक-चित्रकार प्रभु जोशी के मेहमान थे। लोकप्रिय ऐंकर गायत्री शर्मा ने मेरा और स्वानंद का आधे-आधे घंटे का इंटरव्यू किया। असरदार शख़्सियत और बहुत मीठा बोलने वाली इस लड़की के हाथ में कोई काग़ज़ नहीं था मगर इसने बहुत जमकर हमारी ख़बर ली। यह भी अच्छा लगा कि गायत्री ने मेरे ही एक शेर से इंटरव्यू की शुरुआत की-



परवाज़ की तलब है अगर आसमान में
ख़्वाबों को साथ लीजिए अपनी उड़ान में


गायत्री ने मुझसे पूछा- शायरी में मुहब्बत की क्या भूमिका होती है
मैंने उन्हें क़तील शिफ़ाई का शेर सुना दिया-

कैसे न दूँ क़तील दुआ उसके हुस्न को
मैं जिसपे शेर कहकर सुख़नवर बना रहा

14 सितम्बर २०१० को प्रथम हिंदी पोर्टल वेब दुनिया के असिसटंट मैनेजर भीका शर्मा मुझे अपने कार्यालय ले गए। वहाँ कान्फेंस हाल में मैनेजर संदीप सिसोदिया के साथ मराठी फीचर इंचार्ज स्मिता जोशी, हिन्दी फीचर इंचार्ज स्मृति जोशी, उपसंपादक (खेल) शराफ़त ख़ान, उपसंपादक रूपाली बर्वे, और गुजराती फीचर इंचार्ज कल्याणी देशमुख के साथ जमकर साहित्य चर्चा हुई। इन लोगों के अनुरोध पर यहां भी मैंने ग़ज़लें सुनाईं। कुल मिला कर इंदौर-उज्जैन की यह यात्रा ज़िंदगी की किताब में एक सुनहरे अध्याय के रूप में दर्ज हो चुकी है।

आपका
देवमणिपांडेय

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति,
कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड,
गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210-82126

शनिवार, 23 अक्टूबर 2010

अगर किसी पर दिल आ जाए : कथाकार महुआ मांझी

डॉ. शैलेन्द्रकुमार शर्मा, गायिका कविता सेठ, गीतकार स्वानंद किरकिरे, सम्पादक विश्वनाथ सचदेव,  डीआईजी पवन जैन, अभिनेत्री नेहा शरद, सम्पादक राजुलकर राज,  संस्थाध्यक्ष केशव राय और कवि उदघोषक देवमणि पाण्डेय
अगर किसी पर दिल आ जाए
शायरी के बारे में कहा जाता है- पसंद अपनी-अपनी। कभी-कभी जिस शेर को हम बहुत साधारण समझते हैं वह दूसरे इंसान को बहुत अच्छा लगता है। अगर शेर को पसंद करने वाला इंसान ख़ुद आपसे इज़हारे-ख़याल कर दे तो इससे बड़ा पुरस्कार क्या हो सकता है ! कुछ ऐसा ही पुरस्कार मुझे उस वक्त मिला जब मैंने कालिदास अकादमी (उज्जैन) के सभागार में रविवार 12 सितम्बर 2010 को आयोजित काव्यसंध्या में दो ग़ज़लें सुनाईं। कार्यक्रम की समाप्ति पर सबसे पहले समारोहाध्यक्ष विश्वनाथ सचदेव [सम्पादक नवनीत,मुंबई] ने बधाई दी- यार, तुम इतनी बढ़िया ग़ज़लें कहते हो यह मुझे आज पता चला। फिर डॉ.अन्जना संधीर [यूएसए] ने मुक्तकंठ से तारीफ़ की। सामने श्रोताओं में बैठे हुए वरिष्ठ कथाकार एस आर हरनोट [शिमला] सीधे मंच पर आ गए और हाथ मिलाकर मुबारकवाद दी। मंच से नीचे उतरते ही देखा-सामने हाथ में क़लम-काग़ज़ लिए चर्चित कथाकार डॉ.महुआ मांझी [रांची] मुस्करा रहीं थी।बोली- मेरे लिए मर जाने वाला शेर लिख दीजिए। मैंने उनकी नोटबुक में लिख दिया। वो शेर यूँ था-

अगर किसी पर दिल आ जाए इसमें दिल का दोष नहीं
अच्छा चेहरा देखके हम भी मर जाते हैं कभी

उल्लेखनीय है कि एस आर हरनोट और डॉ.महुआ मांझी दोनों बहुत अच्छे कथाकार माने जाते हैं और दोनों को बर्मिंघम पैलेस (लंदन) में अंतर्राष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान से नवाज़ा जा चुका है।फिलहाल आगे बढ़ने से पहले पूरी ग़ज़ल का लुत्फ़ उठाइए-

ख़्वाब सुहाने दिल को घायल कर जाते हैं कभी कभी
अश्कों से आँखों के प्याले भर जाते हैं कभी कभी

पल पल इनके साथ रहो तुम इन्हें अकेला मत छोड़ो
अपने साए से भी बच्चे डर जाते हैं कभी कभी

खेतों को चिड़ियां चुग जातीं बीते कल की बात हुई
अब तो मौसम भी फ़सलों को चर जाते हैं कभी कभी

आँख मूँदकर यहाँ किसी पर कभी भरोसा मत करना
यार-दोस्त भी सर पे तोहमत धर जाते हैं कभी कभी

मेरे शहर में मिल जाते हैं ऐसे भी कुछ दीवाने
रात-रात भर सड़कें नापें घर जाते हैं कभी कभी

दुनिया जिनके फ़न को अकसर अनदेखा कर देती है
वे ही इस दुनिया को रोशन कर जाते हैं कभी कभी

अगर किसी पर दिल आ जाए इसमें दिल का दोष नहीं
अच्छा चेहरा देखके हम भी मर जाते हैं कभी कभी

ना पीने की आदत हमको ना परहेज़ है पीने से
हम भी जाते हैं मयख़ाने पर जाते हैं कभी कभी

उज्जैन में विश्व हिंदी सेवा सम्मान

दिवस के उपलक्ष्य में 12 सितम्बर 2010 को कालिदास संस्कृत अकादमी (उज्जैन) में अंतर्राष्ट्रीय परिसंवाद और विश्व हिंदी सेवा सम्मान समारोह एवं काव्य संध्या का आयोजन हुआ। काव्य संध्या में डॉ.अन्जना संधीर [यूएसए], कवि विश्वनाथ सचदेव [मुंबई], गीतकार स्वानन्द किरकिरे [मुंबई] ,यशवंत सिंह [दिल्ली ], सुश्री नेहा शरद, [मुंबई], डॉ.शिव चौरसिया [मालवा], पवन जैन [इंदौर], शायर देवमणि पाण्डेय [मुंबई], डॉ.पिलकेन्द्र अरोरा आदि ने अपनी रचनाओं से का पाठ किया। ‘आल इज वेल’ फेम ‘स्वानंद किरकिरे का ‘बावरा मन’, मीठी आवाज, और सहज-सरल व्यक्तित्व बहुतों को भाया। वे लोगों के बीच आकर्षण का केंद्र बने रहे। । थ्री इडियट के इस गीतकार को दो दिन बाद ‘बहती है हवा’ गीत के लिए नेशनल अवार्ड घोषित हो गया। शरद जोशी की पुत्री व अभिनेत्री नेहा शरद ने स्व.शरद जोशी की याद ताजा़ करा दी। शरद जी की एक रचना का निराले अंदाज़ में पाठ कर उन्होंने बहुतों को अतीत की दुनिया में पहुंचा दिया। उज्जैन संभाग के डीआईजी पवन जैन ने भी काव्य संध्या में कविता पाठ किया। लोगों को यह अच्छा लगा कि पुलिस वाला होते हुए भी वे बेहद संवेदनशील, सरल व साहित्यिक व्यक्तित्व से लैस हैं। 

उज्जैन में पधारें हिन्दी सेवियों का एक समूह चित्र
 
इस मौके़ पर उत्कृष्ट हिंदी सेवा के लिए देश-विदेश के अनेक साहित्यकार,संस्कृतिकर्मी और हिंदीसेवियों को विश्व हिंदी सेवा सम्मान से विभूषित किया गया। यहाँ सम्मानित हुये लोगों में अपने पहले ही उपन्यास ‘मैं बोरिशाइल्ला’ से चर्चा में आयीं डॉ.महुआ मांझी [रांची], कथाकार एस आर हरनोट [शिमला], विदेश में हिन्दी की ध्वजा फहराने वाली लेखिका डॉ.अन्जना संधीर [यूएसए], वरिष्ठ साहित्यकार प्रो.नन्दलाल पाठक [मुंबई], नवनीत के सम्पादक विश्वनाथ सचदेव [मुंबई], फ़िल्म थ्री ईडियट के गीतकार स्वानंद किरकिरे [मुंबई], सिनेजगत की मशहूर गायिका कविता सेठ [मुंबई], कवि-उदघोषक देवमणि पाण्डेय [मुंबई], डॉ त्रिभुवननाथ शुक्ल [भोपाल], ऐतिहासिक उपन्यासकार डॉ.शरद पगारे [इंदौर],गीतकार चंद्रसेन विराट [इंदौर],वेब पत्रिका भड़ास फॉर मीडिया के सम्पादक यशवंत सिंह [दिल्ली],सम्पादक राजुलकर राज, समीक्षक डॉ.शैलेन्द्रकुमार शर्मा [उज्जैन], युवा पत्रकार सुबोध खंडेलवाल [इंदौर], समालोचक डॉ.करुणाशंकर उपाध्याय [मुंबई], हिंदी दैनिक नई दुनिया इंदौर की युवा पत्रकार गायत्री शर्मा, प्रथम हिंदी पोर्टल वेब दुनिया इंदौर के सहायक प्रबंधक भीका शर्मा, लेखक जवाहर कर्नावट [अहमदाबाद] आदि शामिल हैं।

अमेरिका की डा.अंजना संधीर ने अपने देश प्रेम व हिंदी प्रेम के जज्बे की ऐसी आत्मीय जानकारी दी कि उसे सुनकर हर एक शख़्सका दिल उनके प्रति सम्मान से भर उठा। डा.अंजना ने अमेरिका में हिंदी के लिए अपने संघर्ष की गाथा सुनाई और स्वीकार किया कि देश प्रेम का यह जज़्बा ही उन्हें दुबारा अमेरिका से भारत खींच लाया है और वे बच्चों सहित फिर से अहमदाबाद में रहने लगी हैं। डा.अंजना संधीर के बहुआयामी व्यक्तित्व की झलक इस आयोजन के जरिए मिली। बतौर टीचर, बतौर गायिका, बतौर कवयित्री, बतौर एक ह्यूमन बीइंग, बतौर महिला... वे हर मोर्चे पर श्रेष्ठ दिखीं। रांची से चलकर आईं युवा लेखिका डॉ.महुआ मांझी, और शिमला से पधारे कथाकार एस आर हरनोट ने बड़े असरदार ढंग से अपनी रचना यात्रा के बारे में जानकारी दी। जहाँ कम उम्र में ही उत्कृष्ट उपन्यास की रचना कर डॉ.महुआ मांझी न सिर्फ लोकप्रिय हुई हैं बल्कि लाखों लोगों की पसंदीदा लेखिका भी बन चुकी हैं वहीं पहाड़ी जीवन की अदभुत कथाएं लिखकर एस आर हरनोट ने कई पुरस्कार, सम्मान और प्रतिष्ठा अर्जित करके एक कीर्तिमान बनाया।

दोपहर में सभी अतिथियों ने उज्जैन शहर से करीब 15 किमी दूर विकलांग व बेसहारा लोगों के लिए बने आश्रम में जाकर पंगत में बैठकर भोजन किया और आश्रम की गतिविधियों के बारे में समाजसेवी सुधीर गोयल से जानकारी हासिल की। सभी ने सुधीर गोयल के प्रयासों की भूरि-भूरि प्रशंसा की और इसे अपनी उज्जैन यात्रा की विशिष्ट उपलब्धि के रूप में रेखांकित किया।

वक्ताओं ने मालवा रंगमंच समिति, उज्जैन के संस्थापक-अध्यक्ष केशव राय की इसलिए जमकर तारीफ की कि उन्होंने निजी प्रयासों से अंतरराष्ट्रीय स्तर का आयोजन किया और हिंदी क्षेत्र के प्रतिभाशाली लोगों को एक मंच पर बिठाकर बहुत कुछ रचने-कहने-जानने का मौका प्रदान किया। सरकारी फंड के जरिए हिंदी दिवस पर औपचारिकता पूरी करने वाले सरकारी विभागों व सरकारों को केशव राय से प्रेरणा लेनी चाहिए कि आखिर किस तरह एक व्यक्ति अपने दम पर एक सफल आयोजन कर हिंदी के उत्थान में अभूतपूर्व योगदान दे रहा है। अगले दिन श्री मध्यभारत हिंदी समिति, इंदौर में और प्रथम हिंदी पोर्टल वेब दुनिया के कार्यालय में हमारा सम्मान और कविता पाठ हुआ। 

आपका
देवमणिपांडेय
सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति,
कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड,
गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210-82126

शनिवार, 9 अक्टूबर 2010

सजा है इक नया सपना : देवमणि पांडेय की ग़ज़ल


देवमणि पांडेय की ग़ज़ल  

सजा है इक नया सपना हमारे मन की आँखों में
कि जैसे भोर की किरनें किसी आँगन की आँखों में

शरारत है, अदा है और भोलेपन की ख़ुशबू है
कभी संजीदगी मत ढूँढिए बचपन की आँखों में

कहीं झूला, कहीं कजली, कहीं रिमझिम फुहारें हैं
खिले हैं रंग कितने देखिए सावन की आँखों में

जो इसके सामने आए सँवर जाता है वो इंसां
छुपा है कौन-सा जादू भला दरपन की आँखों में

सुलगती है कहीं कैसे कोई भीगी हुई लकड़ी
दिखाई देगा ये मंज़र किसी बिरहन की आँखों में

फ़क़ीरी है, अमीरी है, मुहब्बत है, इबादत है
नज़र आई है इक दुनिया मुझे जोगन की आँखों में

देवमणि पाण्डेय 1988 (छायाकार स्व.बादल) 


आपका
देवमणिपांडेय
सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति,
कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड,
गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210-82126

रविवार, 26 सितंबर 2010

उदासी में न डूबे दिल किसी का : देवमणि पांडेय की ग़ज़ल


  देवमणि पांडेय की ग़ज़ल  

उदासी में न डूबे दिल किसी का 
छुपा है अश्क में चेहरा ख़ुशी का
   
तुम्हारा साथ जब छूटा तो जाना 
यहाँ होता नहीं कोई किसी का

न जाने कब छुड़ा ले हाथ अपना 
भरोसा क्या करें इस ज़िंदगी का
  
अभी तक ये भरम टूटा नहीं है 
समंदर साथ देगा तिश्नगी का

भला किस आस पर ज़िंदा रहेगा 
अगर हर ख़्वाब टूटे आदमी का

लबों से मुस्कराहट छिन गई है 
ये है अंजाम अपनी सादगी का
बाएं से - धनपत जैन, डॉ राजेंद्र सिंह, अभय नारायण त्रिपाठी (IFS), पत्रकार नंदकिशोर नौटियाल, राजनेता कृपाशंकर सिंह, पत्रकार विश्वनाथ सचदेव, नवभारत टाइम्स के सम्पादक शचींद्र त्रिपाठी, पूर्व निर्वाचन आयुक्त नंदलाल जी, संस्थाध्यक्ष चित्रसेन सिंह, सूचना आयुक्त रामानंद त्रिपाठी, समारोह संचालक कवि देवमणि पाण्डेय।
नवभारत टाइम्स के सम्पादक शचींद्र त्रिपाठी का सम्मान

शचींद्र त्रिपाठी का परिचय कराते हुए कवि-गीतकार देवमणि पाण्डेय ने कहा कि श्री त्रिपाठी एक विनम्र, मृदुभाषी और प्यारे आदमी होने के साथ-साथ एक श्रेष्ठ पत्रकार और सुयोग्य सम्पादक हैं। पत्रकारिता शचींद्र त्रिपाठी को विरासत में मिली है। उनके पिता योगेंद्रपति त्रिपाठी ने सिर्फ़ 31 साल की उम्र में ‘स्वतंत्र भारत’ लखनऊ के प्रधान सम्पादक की ज़िम्मेदारी सँभाल कर एक रिकार्ड कायम किया था। सन् 1971 में उनके स्वर्गवास के बाद प्रबंधकों के अनुरोध पर ‘स्वतंत्र भारत’ लखनऊ से ही शचींद्र त्रिपाठी ने पत्रकारिता की गौरवशाली शु्रुआत की। शचींद्र त्रिपाठी ने पत्रकारिता में अपने पिता से प्राप्त संस्कारों की रक्षा की। गोरखपुर में 01 जनवरी 1952 को जन्मे शचींद्र त्रिपाठी आज भी अपनी मिट्टी-पानी-हवा से जुड़े हुए हैं।

आपका
देवमणिपांडेय
सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति,
कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड,
गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210-82126


शनिवार, 4 सितंबर 2010

मजरुह : मैं अकेला ही चला था जानिब ए मंज़िल मगर


संस्कृति संगम के विमोचन समारोह में बाएं से- चित्रकार आबिद सुरती, सेक्सोलॉजिस्ट डॉ.प्रकाश कोठारी, कवि-राजनेता डॉ.राममनोहर त्रिपाठी, शायर मजरूह सुलतानपुरी (माइक पर), उद्योगपति महावीर सराफ, केंद्रीय साहित्य अकादमी के क्षेत्रीय सचिव प्रकाश भातम्ब्रेकर, कथाकार विभारानी और कवि देवमणि पाण्डेय (मुम्बई 1997) 
मजरुह सुलतानपुरी से देवमणि पांडेय की बातचीत

सबको मारा जिगर के शेरों ने, और जिगर को शराब ने मारा। इस हक़ीक़त को जीने वाले जिगर मुरादाबादी ज़िंदगी के अंतिम दिनों में जब गम्भीर रूप से बीमार पड़े तो मुम्बई में थे और एक साधारण से होटल में ठहरे हुए थे। एक पत्रकार ने उनका इंटरव्यू किया। उसने एक सवाल किया-‘जिगर साहब, आपने अपनी शायरी के अलावा इस दुनिया को क्या दिया है’ ? जिगर साहब ने फ़ौरन जवाब दिया- ‘मैंने इस दुनिया को मजरूह सुलतानपुरी दिया है’। दूसरे दिन एक उर्दू अख़बार में यह चर्चित इंटरव्यू प्रकाशित हुआ। मजरूह साहब अपने उस्ताद के पास गए। उन्हें एक अच्छे अस्पताल में दाख़िल कराया। ज़रा स्वस्थ हुए तो उन्हें ले जाकर कुछ दिनों अपने घर पर रखकर तीमारदारी की। पूरी तरह स्वस्थ होकर जिगर साहब अपने उस्ताद असगर गोंडवी के शहर गोंडा चले गए। वहाँ फिर से बीमार पड़े और हमेशा के लिए उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। आज जिगर साहब की कोई बात किसी को याद हो या न याद हो मगर मुम्बई के पुराने शायरों को उनका यह जुमला आज भी याद है- ‘मैंने इस दुनिया को मजरूह सुलतानपुरी दिया है’। 

मजरूह सुलतानपुरी उर्फ़ असरार हुसैन ख़ान का जन्म सन् 1919 में उत्तर प्रदेश के सुलतानपुर ज़िले की एक रियासत कुड़वार के पास गँजेड़ी गाँव में हुआ। 25 मई 2000 को उनका इंतकाल हो गया। सन् 1994 में मजरूह साहब को जब दादा साहब फाल्के अवार्ड मिला तो मैंने हिंदी दैनिक ‘जनसत्ता’ (मुम्बई) की नगर पत्रिका 'सबरंग' के लिए उनका इंटरव्यू किया था। अब वही धरोहर मैं आपके लिए पेश कर रहा हूँ। मुझे उम्मीद है कि मजरूह साहब की साफ़गोई आपको ज़रूर पसंद आएगी। 

आपको ‘फाल्के’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। पुरस्कारों के बारे में आपकी क्या राय है ? 

पुरस्कार तो अक्सर अपनों को ही दिए जाते हैं। फ़िल्मफ़ेयर से लेकर नोबल तक यही होता है। मैं तो चुपचाप लिखने वाला आदमी हूं। इसलिए जब मुझे सूचना मिली कि ‘फाल्के’ पुरस्कार मिलेगा तो एकबारगी विश्वास हीनहीं हुआ। अब तो पुरस्कार ख़रीदे जाते हैं। मैंने एक गीत लिखा था- ‘हम बेख़ुदी में तुमको पुकारे चले गए / साग़र को ज़िंदगी में उतारे चले गए।’ 

इसको ‘फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार’ नहीं मिला। शैलेन्द्र के गीत ‘ये मेरा दीवानापन था’ को मिल गया। काफ़ी लोगों ने मुझसे कहा था कि मजरुह साहब, आपका गीत ज़्य़ादा अच्छा था। युवा जब कॉलेज से निकलता है तो उसे नहीं मालूम होती। इस स्थिति को दर्शाने वाला गीत मैंने लिखा- ‘पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा’। भारी लोकप्रियता के बावजूद इसे पुरस्कार नहीं मिला और गुलज़ार के जाने किस गीत को मिल गया। गुलज़ार के गीत ‘यारा सिली सिली’ को भी पुरस्कार मिला। जबकि मेंहदी हसन ने मुझे बताया था कि यह गीत रेशमा का है। पुरस्कारों का सच यही है। 

एक गीतकार के रुप में आज आप खुद को कहाँ पाते हैं ? 

मैं हमेशा दो नावों पर सवार रहा- साहित्य और सिनेमा। जगह दोनों में मिली, लेकिन खुल के किसी के सिर पर नहीं बैठ सका। यानी न इधर के रहे न उधर के। सर्मपण के बावजूद मैं हमेशा नंबर दो पर रहा। राजेन्द्र कृष्ण के ज़माने में भी और आनंद बख़्शी के दौर में भी। आज समीर नंबर वन है तो भी मैं नंबर दो पर मौजूद हूँ। मैं हमेशा विभाजित रहा। लेकिन शायरी को मैंने पहले स्थान पर रखा, क्योंकि फ़िल्म गीत रोटी देता है मगर शायरी सुकून देती है। 

शायरी में प्रतिष्ठा के बावजूद किन कारणों से आपको फ़िल्म जगत में आना पड़ा ? 

फ़िल्म के लिए मेरे मन में कभी क्रेज़ नहीं रहा। आना नहीं चाहता था, संयोगवश आ गया। सन् 1940 में जब मैंने सुलतानपुर के पलटन बाज़ार में एक हकीम के रुप में दवाख़ाना खोला था तो उसी समय अचानक शेर कहना शुरुकिया। उस वक़्त अवध में मुशायरे बहुत होते थे। लोगों ने सर-आँखों पर उठा लिया, तो हकीमी छोड़कर मैं शायरीमें डूब गया। सन् 1945 में जिगर मुरादाबादी मुम्बई के एक मुशायरे में मुझे लेकर आए। मुशायरा बहुत बड़ा था।फ़िल्म जगत के तमाम लोग वहाँ उपस्थित थे। मैं नया था, लेकिन जम गया। बस फ़ौरन कारदार साहब का बुलावा आ गया। 

इस तरह मैं फ़िल्म लाइन में आ गया, पहले कोई इरादा नहीं था। उस वक्त एक डिप्टी कलेक्टर को ढाई सौ रुपये वेतन मिलता था। मैं मुशायरों से तीन-साढ़े तीन सौ कमा लेता था। इसलिए पहले तो मैंने इंकार कर दिया। जिगर साहब ने तब मुझे समझाया कि अभी तुमने न घर बनाया न शादी की। बीमार पड़ गये तो क्या करोगे ? आफ़र स्वीकार कर लो। पसंद न आए तो बाद में छोड़ देना। तब मैं तैयार हो गया। पाँच सौ रुपये मेरा वेतन निश्चित हुआ और कारदार साहब की फ़िल्म ‘शाहजहाँ’ के गीत मैंने लिखे। गीत तो सभी पसंद किए गए, लेकिन एक गीत को सहगल साहब ने लीजेंड बना दिया। गीत था – ‘जब दिल ही टूट गया, हम जीकर क्या करेंगे ?’ यह फ़िल्म 1947 मेंआई। इसके बाद विभाजन के कारण छह-सात महीने तक फ़िल्म उद्योग बंद ही रहा। 1949 में मैंने महबूब खान की फ़िल्म ‘अंदाज़’ के गीत लिखे। वे भी कामयाब हुए। 

सुना है उस दौरान आपको जेल भी हो गई थी ? 

हाँ, सही बात है। मुम्बई के परेल इलाक़े में मज़दूरों की एक सभा थी। मुझे वहां गीत पढ़ने के लिए बुलाया गया। मुझसे कहा गया कि मैं इतना सरल गीत पढूं कि अनपढ़ मज़दूरों की समझ में भी वह आ जाए। मैंने बहुत सरल भाषा में गीत लिखा, लेकिन बात वही थी, जो मैं कहना चाहता था। गीत के बोल थे – 

अमन का झंडा इस धरती पर 
किसने कहा लहराने न पाए 
ये भी है कोई हिटलर का चेला 
मार ले साथी जाने न पाए 

उस वक़्त कामनवेल्थ का काफी ज़ोर था। मैंने उसकी भी ख़बर गीत में ली थी। कुछ लोगों ने गलत ढंग से उसमें नेहरु का नाम जोड़कर प्रचारित कर दिया कि मैंने नेहरु को मारने की बात की है। अदालत में मेरी पेशी हुई। डिटेंशन ऐक्ट लगाया गया। मुझसे कहा गया कि आपने नेहरु को मारने के लिए भीड़ को उकसाया। माफ़ी मांगिए। मैं ठहरा स्वाभिमानी आदमी। माफ़ी मांगने का मतलब था अपनी ज़हनी सोच को नकारना। मैंने इंकार किया तो डेढ़ साल की कै़द सुनाई गई। आर्थर रोड जेल में बंद कर दिया गया। उसी दौरान ‘अंदाज’ फ़िल्म रिलीज़ हो गई। गाने लोकप्रिय हुए तो काम भी मिला। कमाल अमरोही ने फ़िल्म ‘दायरा’ और गुरुदत्त ने ‘बाज़’, ‘जाल’ आदि फ़िल्मों के गीत लिखवाए। 

फ़िल्म जगत के पुराने गीतकारों और आज के गीतकारों के बारे में आपकी क्या राय है ? 

मैं जब यहाँ आया तो फ़िल्म जगत में ख़ुमार बाराबंकवी, शकील बदायूंनी, साहिर लुधियानवी, कैफ़ी आज़मी, अली सरदार जाफ़री, राजेन्द्र कृष्ण जैसे गीतकार मौजूद थे। हम सब जो गीत लिखते थे, उसकी भाषा अच्छी होती थी। वह व्याकरण की दृष्टि से भी शुध्द होता था और उसके भावों में एक ख़ूबसूरती होती थी। एक ख़ास बात यह थी कि हम सब मिल बैठकर आमने-सामने एक दूसरे के गीतों को क्रिटिसाइज़ करते थे। मैंने फ़िल्म ‘दिल्ली का ठग’ में एक गीत लिखा था - ‘सी ए टी कैट, कैट माने बिल्ली, दिल है तेरे पंजे में तो क्या हुआ’। 

तब हमारे गीतकार मित्रों ने इसकी ख़ूब आलोचना की। मैंने उनसे कहा कि यह गीत किशोर कुमार जैसे उछल-कूद वाले अभिनेता के लिए लिखा गया है और सिचुएशन के अनुसार इसका कन्टेन्ट भी ठीक है तो मित्रगण सहमत हुए। क्योंकि शेक्सपियर भी अपने ‘क्लाउन’ के लिए कुछ अलग तरह के ही संवाद लिखते हैं, लेकिन वहां भी भाषा की एक मर्यादा होती है। अब कंसेप्शन बदल गया है। आज गीत में शायरी ऐब मानी जाती है। 

अब तो अर्थहीन शब्द चलते हैं। गीत का सोर्स तो ‘फ़ोक’ होता है लेकिन अब वह नहीं रहा। गीत में बहुत बड़ी बात कही जा सकती है, लेकिन अब पहले जैसी सादगी और गहराई नहीं रही। अब तो गीतों में बहुत वल्गराइजेशन आ गया है। ग़लत भाषा में लिखना और ‘गिमिक’ प्रस्तुत करना फैशन बन गया है। बहुत दुखी हूं मैं इससे। कभी-कभी तो रोने को जी चाहता है। 

पहले के अच्छे गीतकारों की प्रतिभा का आज उचित उपयोग नहीं हो रहा है। इस स्थिति को आप किस रुप में देखते हैं? 

अच्छी प्रतिभा के उपयोग की आज गुंजाइश ही कहाँ रही ? क्योंकि लेखन में एक गिरावट आ गई है। और मैं भी तो इसी में शामिल हूँ। जी बहुत चाहता है कि हमारे अनुभवी लेखक भाषा का सम्मान करें, लेकिन सिर्फ़ मेरे सोचने से क्या होता है। हर बदमाशी के लिए आदमी कोई दर्शन गढ़ लेता है। ‘कमोडिटी’ बन गया है आज सब कुछ। और मेरा भी हाल यह है कि –तूले ग़मे-हयात से घबरा रहा हूं मैं / घबरा रहा हूं और चला जा रहा हूं मैं। 

आपके गीत अपने नएपन, ताज़गी और अंदाज़ में अलग ही नज़र आते हैं। इसके लिए आपने किन बातों पर ध्यान दिया ? 

मैं चरित्रों के व्यक्तित्व, व्यवहार और बोलचाल को ध्यान में रखकर ही गीत लिखता हूँ। एक तरफ़ मैंने लिखा-‘गम दिए मुस्तकिल’, तो दूसरी तरफ़ लिखा-‘कभी आर कभी पार लागा तीरे नज़र’। तीसरी तरफ़ ‘छोड़ दो आंचल ज़माना क्या कहेगा’ जैसे गीत लिखकर मैंने रोमांटिक कामेडी गीतों के लिए एक नई राह बनाई। फ़िल्म क्षेत्र में सक्रियता के बावजूद मैंने मुशायरों में जाना बंद नहीं किया। सन् 1983 में मैं एक मुशायरे में अमेरिका गया। जगह-जगह लोग मुझे सुनना चाहते थे। साढ़े चार महीना मुझे रुकना पड़ गया। लौटकर आया तो देखा मेरी जगह कोई और बैठ गया था। फ़िल्म ‘क़यामत से क़यामत तक’ के ज़रिए मेरी वापसी हुई। 

आज की फ़िल्में आपको कैसी लगती है ? 

अब नान-प्रोफेशनल प्रोड्यूसरों की बाढ़ आ गई है। पहले लोग सामाजिक ज़िम्मेदारी महसूस करते थे और ऐसी फ़िल्में बनाते थे, जो सपरिवार देखी जा सकें। सन् 1994-95 से प्रोड्यूसरों की जो भीड़ आई है उसे समाज की कोई चिंता नहीं है। पहले तवायफ़ के परिवार से नायिकाएं आती थीं, मगर इनका पहनावा शरीफ़ घरों की औरतों की तरह होता था। आज की अभिनेत्रियां अच्छे घरों से आती हैं मगर इनका पहनावा तवायफ़ों से भी गया-बीता है। अमरीकी बनना चाहते हैं। लेकिन न अमरीकी बन पाते है और न भारतीय। तीतर-बटेर बनकर रह जाते हैं। इन्हें लड़के-लड़कियों के बिगड़ने की चिंता नहीं है। समाज के मूल्यों का ध्यान नहीं है। अब अधकचरा लेखन चल रहा है। गीत के नाम पर अर्थहीन शब्द चलते हैं। 

क्या अच्छे गीतों का जमाना कभी फिर लौटेगा ? 

नौशाद आदि के ज़माने में गीतों का जो स्तर था, वह अब वापस नहीं आने वाला। बच्चों में भी अब वैसी साहित्यिक और सांस्कृतिक समझ नहीं है। प्राइमरी में ही उन्हें दस-दस विषय पढ़ने पड़ते हैं। फलस्वरुप वे ‘जैक ऑफ आल’ और मास्टर ऑफ नन’ बनते हैं। उनका मानसिक स्तर काफ़ी नीचे होता है। आज गीतों में शायरी ऐब मानी जाती है। कई बार मुझे फ़िल्म में लेकर भी छोड़ दिया गया। उनको लगा कि मेरे गीतों में शायरी ज़्यादा है। पब्लिक की भी पसंद सस्ती होती जा रही है। उन्हें लगता है,यही अच्छे गीत हैं। मुझसे लिखवाने वाले अब बहुत थोड़े रह गये हैं। गीत और कविता का फ़र्क़ हर ज़माने में रहा है। गीत, कविता का ज़्यादा बोझ नहीं उठा पाता। ‘कितनी अकेली कितनी तनहा मैं लगी तुझसे मिलने के बाद’ या ‘वादियां मेरा दामन रास्ते मेरी बांहे’ अथवा ‘रहे न रहें हम, महका करेंगे’ जैसे काव्यात्मक गहराई वाले गीत अब नई पीढ़ी के पल्ले नहीं पड़ते। ऊँचे स्तर से वे घबरा जाते हैं। 

अपने बाद की पीढ़ी के गीतकारों के बारे में आपकी क्या राय है ? 

अब तो नया ज़माना आ गया है इसलिए शैली भी बदल गई है। आज के गीतकार के लिए ज़रुरी हो गया है कि वह कैबरे, कामेडी, भजन, ग़ज़ल, प्रेमगीत सब कुछ लिख सके। सभी पर उसकी कमांड होनी चाहिए। मेरे बाद की पीढ़ी में आनंद बख़्शी, फ़ारुक़ क़ैसर, एस.एच.बिहारी आदि ने अच्छे गीत लिखे। अनजान भी कभी-कभी अच्छा लिखते हैं। जावेद अख्त़र और हसन कमाल में बहुत अच्छी प्रतिभा है। निदा फ़ाज़ली क़तार में हैं। लेकिन मुझे लगता है उन्होंने अभी तक कुछ भी उल्लेखनीय नहीं लिखा है। 

साहित्य का इक़बाल सम्मान मिलने पर आपने कैसा महसूस किया था ? 

अच्छा लगा था। तीन साल से इसके लिए मेरा नाम लिया जाता था और हटा दिया जाता था। मेरे पहले यह जस्टिस आनन्द नारायण मुल्ला को मिला। वे अच्छे शायर हैं, सीनियर हैं। लेकिन शायरी ही देखी जाए तो मुझे उनसे पहले मिल जाना चाहिए था। मैंने प्रगतिशील ग़ज़लें लिखकर एक नई राह निकाली। 

लोग प्रगतिशील ग़ज़लों के लिए फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ को पहला श्रेय देते हैं ? 

बात बिल्कुल साफ़ है, मैं 1945 में प्रलेस (P.W.A.) से ज़ुडा। 1947 में मेरे कई प्रगतिशील शेर लोगों की ज़बान पर चढ़ चुके थे। फ़ैज़ का प्रगतिशील ग़ज़लों का संग्रह ‘दस्त-ए-सबा’ 1953 में आया। लोग इससे पहले उनकी प्रगतिशील ग़ज़लों से वाक़िफ़ नहीं थे। प्रगतिशील होते हुए भी फ़ैज़ हमेशा रोमांटिक बने रहे। बग़ैर माशूक़ के वे बात ही नहीं करते। असमानता, शोषण और जु़ल्म की बात भी वे माशूक़ के गले में बाहें डालकर ही करते हैं। उनकी ‘मुझसे पहले सी मुहब्बत मेरी महबूब न मांग’ तथा ‘चन्द रोज़ और मेरी जान’ आदि रचनाएं उस संदर्भ में देखी जा सकती हैं। मेरी ग़ज़लों का चरित्र हमेशा आंदोलनात्मक रहा। 

अभी आपने अपनी प्रगतिशील ग़ज़लों का ज़िक्र किया। इसके बारे में ज़रा और खुलासा करें ? 

कविता की तमाम आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए अपने समय की सबसे ज़्यादा चुभने वाली चीज़ों को साथ लेकर जो बातें कही जाती हैं, वही प्रगतिशील हैं। पहले तो ‘महबूब’ ही ग़ज़ल की मंज़िल थी, लेकिन बाद में इसमें बदलाव आया। उदाहरण के लिए मैं अपनी कुछ प्रगतिशील रचनाओं के मुखड़े सुना रहा हूं- 

मैं अकेला ही चला था जानिबे-मंज़िल मगर
लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया

सर पर हवाएं जु़ल्म चलें सौ जतन के साथ 
अपनी कुलाह कज है उसी बांकपन के साथ

देख ज़िंदां से परे रंग-ए-चमन जोशे बहार
रक़्स करना है तो फिर पांव की ज़ंजीर न देख
 
हम भी हमेशा क़त्ल हुए हैं और तुमने भी देखा दूर से लेकिन, 
ये न समझना हमको हुआ है जान का नुक़्सां तुमसे ज़ियादा

ये बातें मैंने बहुत पहले कही थीं, लेकिन इनकी प्रासंगिकता हमेशा रहेगी। इसलिए ये चीजें शाश्वत हैं। फ़ैज़ की प्रगतिशील ग़ज़लों का संग्रह ‘दस्त-ए-सबा’ सन् 1953 में देखा गया, जबकि मैंने ये ग़ज़लें 1945 में लिखीं थीं। इसीलिए मैं कहता हूं कि प्रगतिशील ग़ज़लों की शुरुआत मैंने की। फ़ैज़ और मजाज़ मुझसे सीनियर थे और बड़ी ख़ूबसूरत ग़ज़लें लिखते थे। उनके सामने मुझे अपनी ग़ज़लें काफी खुरदुरी लगती थी। मैंने फ़ैज़ और मजाज़ से बहुत कुछ सीखा। फ़ैज़ ग़ज़लों में हमेशा मीठा ही बोलते रहे। मैं समझता हूं कि यह भी एक प्रकार का ऐब है। कभी-कभी कड़वा बोलना भी बहुत ज़रुरी होता है, लेकिन फ़ैज़ का हाल तो यह था कि- 

ग़मे-जहां हो, रुख़े-यार हो कि दस्ते-अदू 
सुलूक जिससे किया हमने आशिक़ाना किया 

शांति के ज़माने में दुश्मनों को माफ़ करना तो ठीक है लेकिन जंग के मैदान में दुश्मन से आशिक़ाना व्यवहार कैसे हो सकता है ? इसके बावजूद फ़ैज़ से हमने सीखा है, वे हमारे बड़े शायर हैं। 

जिस शायर (इक़बाल) के नाम से आपको सम्मान दिया गया, उनकी शायरी आपको कैसी लगती है ? 

इक़बाल उर्दू शायरी की सर्वोच्च शैली के कवि हैं। वे बीसवीं सदी के सबसे बड़े शायर हैं। कुछ लोग उनके साथ फ़ैज़ का नाम रख देते हैं। मुक़ाबला वैसा ही है जैसे बड़े गु़लाम अली खां और मोहम्मद रफ़ी। मोहम्मद रफ़ी की नक़ल करने वाले बहुत मिलेंगे क्योंकि ऐसा करना आसान है। फ़ैज़ की शायरी इक़बाल से बहुत सस्ती है। इक़बाल के साथ जोश मलीहाबादी का ही नाम लिया जा सकता है। 

लेकिन आप यह भी स्वीकार करते हैं कि आपने ख़ुद फ़ैज़ से बहुत कुछ सीखा है ? 

हां, सही बात है। बाद में आने वाला शायर अपने सीनियर से सीखता है। मैंने फ़ैज़ से रसीला अंदाज़ सीखा। मैं चाहता था कि मेरे बयान में तनतना, जोश और ज़लज़ला के साथ ही रस हो, मिठास हो। मैंने ऐसा लिखा भी।‘साथी’ को ‘महबूब’ माना। एक शेर देखिए – 

मुझे सहल हो गईं मंज़िलें वो हवा के रुख़ भी बदल गए 
तेरा हाथ, हाथ में आया गया कि चराग़ राह में जल गए 

मैंने मजाज़ से भी बहुत कुछ सीखा। मजाज़ ने उर्दू नज्म़ में सबसे पहले नई राह बनाई। फ़ैज़ भी उनके पीछे चले। मजाज़ की ‘ख़्वाब-ए-शहर’ तथा ‘रात और रेल’ जैसी नज़्में पहले नहीं लिखी गईं थीं। मजाज़ की ग़ज़लों में भी ऐसे प्रगतिशील शेर थे कि मुझे आगे बढ़ने की राह मिली। फ़ैज़ का लहजा धीमा था। पर यह धीमा लहजा गंभीर भी था। 

फ़िराक़ गोरखपुरी का लबो-लहजा आपको कैसा लगता है ? 

फिराक़ का लबो-लहजा बिलकुल नया है। उन्होंने संस्कृत, अंग्रेज़ी और फ़ारसी से फा़यदा उठाकर बात कही। पहले ग़ज़ल का बैक ग्राउंड ‘तसव्वुर’ था। उन्होंने हिन्दू दर्शन के अनुसार सेक्स को इबादत का रुप देकर ग़ज़ल के पसमंज़र को तसव्वुर से आज़ाद करके यथार्थवादी आधार दिया। मतलब उन्होंने परंपरा की पृष्ठभूमि को बदला। लेकिन सेक्स के ज़रिए इबादत को लाना सबके वश का नहीं है। यह बहुत बड़े शायर का काम है। इससे ग़ज़ल ज़मीन पर आकर खड़ी हो गई। मगर इक़बाल तो खु़द में एक पहाड़ हैं। उनके सामने फ़िराक़ नहीं खड़े किए जा सकते। हाँ,फ़िराक़ ने उर्दू ग़ज़ल को एक नया लबो-लहजा दिया। इससे ग़ज़ल का काफ़ी फ़ायदा हुआ। 

बंबई (मुम्बई) में आपको सबसे अच्छा शायर कौन लगता है ? 

अगर गीतकार के रुप में देखें तो पहले स्थान पर जावेद अख़्तर, दूसरे स्थान पर हसन कमाल और तीसरे स्थान पर निदा फ़ाज़ली को रखा जा सकता है। लेकिन शायर के रुप में मुझे निदा फ़ाज़ली सबसे बेहतर लगता है। पता नहीं क्यों वह मेरी मुख़ालिफ़त भी करता है। निदा ने परंपरा से हटकर कुछ कहने की कोशिश की और अच्छा कहा। उसकी शायरी की ज़बान बहुत अच्छी है। उसे मामूली आदमी भी समझ लेता है। इनकी कमी यह है कि ये तीनों लोग अंग्रेज़ी और फ्रेंच साहित्य से प्रभावित हैं। इनकी बुनियाद बाहर से जुड़ी है। 

उर्दू में गीत को और हिन्दी में ग़ज़ल को उचित सम्मान क्यों नहीं मिला ? 

हिंदी की जड़ें ज़मीन में हैं। उर्दू इस मामले में पीछे है। ग़ज़ल महफ़िल से जुड़ी रही है। गीत में धरती की बात आएगी तो हिन्दी मे अच्छा लगेगा। हिन्दी जितनी नेशनल है, उर्दू उतनी नहीं। उर्दू का मिज़ाज उतना भारतीय नहीं है, जितना होना चाहिए। इधर कई भाषाओं में ग़ज़लें कही जा रही हैं। लेकिन मुझे गुजराती ग़ज़लें उर्दू के अधिक क़रीब लगती हैं। ग़ज़ल और नज़्म की शैली अलग है। ग़ज़ल की शैली ही हिन्दी वालों की पकड़ में नहीं आई। ग़ज़ल हर लफ़्ज़ का बोझ नहीं उठा सकती।

आपका
देवमणिपांडेय
सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति,
कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड,
गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210-82126