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रविवार, 12 जुलाई 2020

डॉ उर्मिलेश : आत्मीय लहजे के लोकप्रिय ग़ज़लकार



आत्मीय लहजे के ग़ज़लकार डॉ उर्मिलेश

हिंदी काव्य विधा में ग़ज़ल कलात्मक अभिव्यक्ति का सबसे प्रभावशाली सलीक़ा है। अपने सोच की अभिव्यक्ति के लिए दुष्यंत कुमार ने इसका कारगर इस्तेमाल किया। दुष्यंत को हिंदी ग़ज़ल में मील का पत्थर माना जाता है। ग़ज़ल की भाषा कैसी हो, कथ्य क्या हो और लहजा कैसा हो इसका निर्धारण दुष्यंत कुमार की ग़ज़लों ने कर दिया। दुष्यंत कुमार ने हिंदी ग़ज़ल को ज़बान, फ़िक्र और बयान का जो तोहफ़ा दिया उससे बाद के ग़ज़लकारों को आगे बढ़ने के लिए एक राजमार्ग मिल गया। डॉ उर्मिलेश ग़ज़ल के इसी राजमार्ग पर चलने वाले ऐसे समर्थ रचनाकार हैं जो अपने अलग तेवर से पहचाने जाते हैं-

सब उसको देख देख के बाहर चले गए
वो आईना था घर में अकेला खड़ा रहा

ग़ज़ल के राजमार्ग पर चलते हुए हिंदी के जिन ग़ज़लकारों ने दुष्यंत कुमार के सिलसिले को ख़ूबसूरती से आगे बढ़ाया उनमें डॉ उर्मिलेश का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। डॉ उर्मिलेश के पास सामाजिक सरोकार की अभिव्यक्ति के लिए ख़ास नज़रिया और जीवंत भाषा के साथ एक लिरिकल लहजा है। इस लहजे के कारण उनकी ग़ज़लें पढ़ने सुनने वालों को अपने बहुत क़रीब लगती हैं।

कल न बदला वो आज बदलेगा
वक़्त अपना मिज़ाज बदलेगा

आदमी की यहाँ तलाश करो
आदमी ही समाज बदलेगा

दुष्यंत कुमार ने ग़ज़लों को सत्ता और व्यवस्था के गलियारों तक पहुंचाया। अदम गोंडवी ने ग़ज़ल को खेतों खलिहानों और मेहनतकशों तक पहुंचाया। हिंदी ग़ज़ल के इस सफ़र को आगे बढ़ाते हुए डॉ उर्मिलेश ने उसे घर आंगन की दहलीज़ में हंसते-मुस्कुराते, सुख-दुख में एक साथ सांस लेते रिश्ते-नातों तक पहुंचा दिया। 

पहले दस से पांच तक नौकर थे दफ़्तर के पिता
अब बिना पैसे के पूरे दिन के नौकर हैं पिता

मेरे बच्चे जब पिता कहते हैं ख़ुश होता हूँ मैं
इसका मतलब है कि अब भी मेरे भीतर हैं पिता

रिश्तों की इस दुनिया में वे सारे किरदार शामिल हैं जो ज़िंदगी और समाज को ख़ूबसूरत बनाते हैं। इनके साथ वक़्त का बदलता हुआ चेहरा है जिसे डॉ उर्मिलेश आईना दिखाते हैं-

अपनी तहज़ीब के जामे में रहा करते थे
हम भी बेटे कभी कॉलेज में पढ़ा करते थे

पहले ट्यूशन की दुकानें भी नहीं होती थीं
फिर भी हैरत है कि हम टॉप किया करते थे

ग़ज़ल धीमे सुर में बात करने वाली काव्यात्मक अभिव्यक्ति की एक कलात्मक विधा है। अपने रदीफ़, क़ाफ़िए और बहर के साथ ग़ज़ल हमें एक ऐसे मुक़ाम पर ले जाती है जहां से आम आदमी के स्वप्न, संघर्ष, एहसास और जज़्बात की तस्वीर नज़र आती है। आम आदमी ऐसे माहौल में ज़िंदगी बसर करता है जहाँ सत्ता है और सत्ता की राजनीति है। धर्म, मज़हब और साम्प्रदायिकता के ख़तरों से उसे आगाह करना डॉ उर्मिलेश अपना कर्तव्य समझते हैं-

बाँटकर जिस्मों को अब वो बाँटने निकले हैं दिल
फ़ैसला वो भी ग़लत था, फ़ैसला ये भी ग़लत

इस सियासत ने हमें हिन्दू - मुसलमां मानकर
तब छला वो भी ग़लत था, अब छला ये भी ग़लत

जिस दौर में आज हम जी रहे हैं उस दौर का सच आकर्षक भी हो सकता है और बदरंग भी। छोटा भी हो सकता है और बड़ा भी। डॉ उर्मिलेश की ग़ज़लों में सच को सच कहने की ईमानदारी है। इस दौर के सच की सहज अभिव्यक्ति है। बड़े से बड़े सच को ग़ज़ल में अभिव्यक्त करते हुए वे कभी लाउड नहीं होते-

हादसों पर फ़िदा हो गई
ज़िन्दगी क्या से क्या हो गई

एक सच हमने क्या कह दिया
सारी दुनिया ख़फ़ा हो गई

ग़ज़ल हमें मीरो-ग़ालिब से यानी उर्दू काव्य पम्परा से हासिल हुई है। डॉ उर्मिलेश ने अपनी ग़ज़लों को उर्दू की पुरानी तरक़ीबों और प्रतीकों से बचाया है। उसे हिंदुस्तानी रंग और लिबास से सजाया है। उर्दू शायरी में दूसरी औरत से इजहारे-इश्क़ किया जाता है। डॉ उर्मेलेश की ग़ज़लों में नज़र आने वाली औरत दाम्पत्य प्रेम की प्रतीक हिंदुस्तानी औरत है। अपना घर-आँगन सजाने वाली घरेलू औरत है- 

उसकी चूड़ी, उसकी बेंदी, उसकी चूनर से अलग
मैं सफ़र में भी न हो पाया कभी घर से अलग

पत्रिकाएं उसके पढ़ने को मैं लाया था कई
फिर भी उसने कुछ न देखा मेरे स्वेटर से अलग

अपने सोच और सरोकार को सामने लाने के लिए डॉ उर्मिलेश हमेशा ग़ज़ल के इजहार के कौशल को बरकरार रखते हैं। उनके यहाँ कोई उलझन या जटिलता दिखाई नहीं देती। सम्प्रेषणीयता उनकी ग़ज़लों का ख़ास गुण है। यही कारण है कि उनकी ग़ज़लें पाठकों में बहुत लोकप्रिय हैं। उनके कई शेर आवाम की सोच का हिस्सा बन चुके हैं। डॉ उर्मिलेश ने हिंदी ग़ज़ल को जीवंत भाषा, सामयिक सोच और आत्मीय लहजे से समृद्ध किया। ग़ज़ल की राह पर आने वाली नई नस्लों का पथ प्रशस्त करके लिए उन्होंने बेहद सराहनीय कार्य किया है। अपनी इस रचनात्मक उपलब्धि के लिए वे हमेशा याद किए जाएंगे।

आपका-
देवमणि पांडेय

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, 
कन्या पाड़ा, गोकुलधाम, फ़िल्म सिटी रोड, 
गोरेगांव पूर्व, मुंबई- 400063, 98210-82126
devmanipandey.blogspot.com
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मंगलवार, 9 जून 2020

शैलजा नरहरि का ग़ज़ल संग्रह बुझा चिराग हूं


II उससे कह दो किसी का हो जाए II

जो भी होना है आज हो जाए
दिल हमारा रहे या खो जाए 
वो न मेरा हुआ न अपना ही
उससे कह दो किसी का हो जाए

मुहब्बत को इस अंदाज़ मैं पेश करने वाली कवयित्री का नाम है शैलजा नरहरि। हिंदी काव्य मंचों की प्रतिष्ठित गीतकार  शैलजा नरहरि का हाल ही में "बुझा चिराग हूं" ग़ज़ल संग्रह मंज़रे आम पर आया है। संग्रह की पहली गजल है-

मीर ओ ग़ालिब ज़बान वाले थे 
फ़र्श पर आसमान वाले थे 
क्या तसव्वुर में रोशनाई थी 
हर्फ़ सारे बयान वाले थे

कवयित्री शैलजा नरहरि अपनी काव्य यात्रा में उसी रिवायत की हमसफ़र हैं जो हमें मीर ओ ग़ालिब से हासिल हुई है। उनके पास गीत विधा से प्राप्त कोमल शब्दावली है। बिंब और प्रतीक हैं। ज़िन्दगी से गुफ्त़गू करने का अपना एक नज़रिया है। शैलजा नरहरि अपनी ग़ज़लगोई में इन सारी अमानतों का ख़ूबसूरत इस्तेमाल करती हैं-

कह सकें तो बात दिल की अब नहीं मिलते वो लोग 
जो ज़रूरत ही न समझे दोस्ती को क्या कहें
हम समझते थे हमेशा ये सफ़र आसान है
रास्ते के पेचो-ख़म को, बेरुख़ी को क्या कहें

शैलजा जी के यहां ग़ज़ल के कैनवास पर आसान लफ़्ज़ों और सादा रंगों में ज़िंदगी की जो तस्वीर नुमाया होती है वह बहुत असरदार है-

आदमी का मिज़ाज क्या रखना 
दिन हैं दो-चार ताज क्या रखना 
जब मुसलसल सफ़र पे चलना है
सोच में कल औ आज क्या रखना 

शैलजा नरहरि की इन ग़ज़लों में ज़िन्दगी के उतार-चढ़ाव हैं, दौरे-हाज़िर के सवाल हैं और मुहब्बत की दास्तान भी है। मुहब्बत की दास्तान को वे एक नए ज़ाविए से पेश करती हैं-

उम्र से गुज़ारिश है कुछ दिनों तो जीने दे 
बहते आबशारों से घूंट भर तो पीने दे 
जिसकी हम तमन्ना थे वो न जाने किसका है 
ज़ख्म़ सारे ढक लेंगे पैरहन तो सीने दे


अपनी सोच को अभिव्यक्त करने के लिए शैलजा जी ने अधिकतर छोटी बहरों का इस्तेमाल किया है। कहा जाता है कि छोटी बहर में बड़ी बात कहना मुश्किल काम है। ऐसे लोगों के लिए रहमत अमरोहवी ने कभी कहा था-

ग़ज़ल और तंग दामानी का शिकवा
सलीक़ा हो तो गुंजाइश बड़ी है 

शैलजा नरहरि में यह सलीक़ा नज़र आता है। वे छोटी बहर में भी अपनी बात को इस क़रीने से रखती हैं कि उनके अशआर पढ़ने वालों के दिल के तार झंकृत कर देते हैं-

ज़िंदगी ने जो दिया है कम नहीं
मुस्कराने के बहाने चाहिए
है ज़रूरी शायरी को फ़िक्रो-फ़न
शे'र लेकिन कम सुनाने चाहिए

इशारों में बात करने की ग़ज़ल की जो रिवायत है उस हुनर का शैलजा नरहरि ने अपनी तख़लीक़ में बहुत उम्दा इस्तेमाल किया है-

शजर उदास परिंदों की वापसी न हुई
हरी थी शाख़ मगर फिर भी ज़िंदगी न हुई

शैलजा नरहरि के यहां फ़िक्र की आंच भी है और एहसास की शिद्दत भी। उनकी ग़ज़लों में एक ख़ास किस्म की साफ़गोई है जो कथ्य को भरपूर संवेदना के साथ पढ़ने वालों तक संप्रेषित कर देती है-

बुझा चराग़ हूं अब मेरी ज़िन्दगी क्या है
कोई न मुझसे ये पूछे कि रोशनी क्या है

शैलजा नरहरि कई ऐसे शेर लिखने में कामयाब हुई हैं जो पाठकों के ज़हन में महफूज़ रह जाते हैं। आम फहम भाषा में लिखी गईं इन ग़ज़लों में जज़्बा, तजुर्बा और एहसास का ख़ूबसूरत संगम है। ये ग़ज़लें हमारी ग़ज़ल परंपरा को समृद्ध करने का क़ाबिले-तारीफ़ काम करती हैं। शैलजा नरहरि की ग़ज़लों में एक कशिश है। अगर आप इन्हें एक बार पढ़ेंगे तो दोबारा पढ़ने का मन होगा। इन ग़ज़लों के चयन और संपादन के लिए मशहूर शायर दीक्षित दनकौरी को बहुत-बहुत बधाई।

प्रकाशक : ग्रंथ अकादमी, भवन संख्या 19, पहली मंज़िल, 2 अंसारी रोड,
दरियागंज, नई दिल्ली 110002, मूल्य : ₹150
(17 फरवरी 2020)

देवमणि पांडेय :
बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम,
फिल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, M : 98210 82126
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बुधवार, 30 मई 2012

ग़ज़ल : दूसरों की ज़मीन पर अपनी खेती : कमेंट्स


ग़ज़ल : दूसरों की ज़मीन पर अपनी खेती : कमेंट्स

पहली किश्त पढ़कर लंदन से शायर प्राण शर्मा ने रोचक जानकारी दी। फ़िल्म उमराव जान में ज्ञानपीठ अवार्ड से सम्मानित शायर शहरयार की ग़ज़ल का मतला है -दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिये / बस एक बार मेरा कहा मान लीजिये। इस मतला के दोनो मिसरे बिहार के शायर बिस्मिल अज़ीमाबादी की ग़ज़ल से उठाये गए थे। उनकी उस ग़ज़ल के दो शेर देखिए-

दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिये 
खंजर को अपने और ज़रा तान लीजिये 

बेशक़ न मानियेगा किसी दूसरे की बात 
बस एक बार मेरा कहा मान लीजिये 

इस लेख पर बहुत अच्छे-अच्छे कमेंट आए और एक महत्वपूर्ण चर्चा के लिए रास्ता खुला।नीरज गोस्वामी के अनुसार हर शेर चाहे वो किसी और के कहे जैसा क्यूँ न लगे अपनी महक अलग ही रखता है...ये बात ही शायरी को आज तक जिंदा रखे हुए है और जिंदा रखेगी। तिलक राज कपूर ने कहा- पूर्ण मौलिकता मिलना शायद कठिन हो लेकिन अगर शेर में कुछ भी नया है तो उसे समग्र मूल्‍यांकन में मौलिक माना जाना चाहिये। सतपाल ख़याल ने फ़रमाया- ग़ज़ल में बहुत दोहराव है। आप चराग और हवा पर अगर शेर खोजेंगे तो हैरान रह जायेंगे कि हर शायर चरागों को जलाता बुझाता रहता है। कोई शाम होते ही बुझा देता है तो कोई सुबह होते ही जला लेता है। नीलम अंशु का कहना है- पहली बार पता चला कि ग़ज़ल में भी ज़मीन झगड़े की वजह बनती है। ऐसे कमेंट्स के आधार पर दूसरे किश्त तैयार हुई है। तो आइए इसका भी लुत्फ़ उठाइए और चर्चा को आगे बढ़ाइए…
 
नीरज गोस्वामी : (रायगढ़, महाराष्ट्र)

सदियों से वही इंसान हैं और वही उनकी खुशियाँ दुःख समस्याएं... कुछ भी तो नहीं बदला सिवा समय के...न इंसानी फितरत न सोच...तो फिर नया ख़याल आएगा कहाँ से...बड़े बड़े शायर जो पहले कह गए उन्होंने कोई बात नयों के लिए छोड़ी ही नहीं...लेकिन मजे की बात है शायरी अब भी वो ही बात करती है जो पहले करती थी लेकिन उसके बदलते अंदाज़ ने उसे अब तक दिलचस्प बनाये रखा है...हर शायर उन्हीं घिसी पिटी बातों को अपने दिलचस्प अंदाज़े बयां से सुनने लायक बना देता है....यादगार बना देता है...लगता था ग़ालिब के बाद कोई क्या लिखेगा लेकिन साहब उनके बाद भी शायरी परवान चढ़ी और क्या खूब चढ़ी...ये सिलसिला कहीं थमने वाला नहीं...जैसे हर इंसान दो हाथ दो पैर वाला है लेकिन अपने आप में अनूठा है वैसे ही हर शेर चाहे वो किसी और के कहे जैसा क्यूँ न लगे अपनी महक अलग ही रखता है...ये बात ही शायरी को आज तक जिंदा रखे हुए है और जिंदा रखेगी...कुमार पाशी साहब ने इसी बात को क्या खूब कहा है:-

जो शे'र भी कहा वो पुराना लगा मुझे 
जिस लफ्ज़ को छुआ वही बरता हुआ लगा 


शायर तिलक राज कपूर : (भोपाल, म.प्र.)

मुझे याद आ रहे हैं मरहूम मोहसिन रतलामी जिन्‍होंने मुझे यह बात कुछ अलग तरह से कही थी। हुआ यह कि 'दिल के अरमॉं ऑंसुओं में बह गये' के हर शेर पर मैंने उलटी बात कही, मसलन: 'शायद उनका आखिरी हो ये सितम / हर सितम ये सोच कर हम सह गये'। इस पर मैनें कहा- 'सह लिया पहला सितम तुमने अगर / तो सितम सारी उमर ढायेंगे'। मोहसिन साहब बोले कि ये तो आपने ज़मीन उठा ली। मैनें आसमॉं उठाते तो सुना था मगर मेरे लिये ये नयी बात थी। बहरहाल बात समझ में आई तो मैनें कहा- हुजूर ज़मीन छोडि़ये, तेवर तो देखिये। 

मुझे लगता है कि हमें पूर्ण मौलिकता और समग्र मौलिकता में भेद करने की जरूरत है। आपकी प्रस्‍तुति के नज़रिये से देखें तो पूर्ण मौलिकता मिलना शायद कठिन हो लेकिन अगर शेर में कुछ भी नया है तो उसे समग्र मूल्‍यांकन में मौलिक माना जाना चाहिये। पूर्ण मौलिकता तो शायद अन्‍य काव्‍य में भी नहीं मिलेगी। एक और स्थिति हो सकती है मात्र संयोग की। एक ही ज़मीन पर कई-कई शेर कहने वाले कई शायर मिल जायेंगे। मुझे इसमें कुछ अजूबा नहीं लगता। हॉं, शब्‍दश: उठाये हुए शेर अलग दिख जाते हैं। तरही ग़ज़ल में तो एक पूरा मिसरा उठाना ही पड़ता है, मेरा मानना है कि ऐसे गिरह के शेर शायर को अपनी ग़ज़ल से खुद-ब-खुद खारिज कर देने चाहिये। 

आलोक श्रीवास्तव और मुनव्वर राना साहब के अशआर की स्थिति जरूर थोड़ा विचलित करती हैं। किसने पहले कहा ये तो मैं नहीं जानता लेकिन यहॉं जो समानता है वह आपत्तिजनक है। मीर और ग़ालिब के अशआर में तो अंतर की बहुत गुँजाइश है। 'चल अकेला' पर मुझे नहीं लगता कि किसी ओर से आपत्ति उठाई गयी हो। अभी आपने काव्‍य से काव्‍य का संदर्भ उठाया है ज़मीन की दृष्टि से। बहुत सा काव्‍य ऐसा मिल जायेगा जो किसी कहानी, उपन्‍यास या यहॉं तक कि यात्रा-वृतान्‍त से उठाया गया है। अगर तुलना में कहीं भेद की गुँजाईश है तो उसे महत्‍व दिया जाना चाहिये। यह भेद, शब्‍द, भाव, काल या अन्‍य किसी भी स्‍वरूप का हो सकता है। शायर के साथ यह समस्‍या अक्‍सर रहती होगी लेकिन कुछ तो होता ही है जो उसके कहे शेर को अलग पहचान देता है। नीरज भाई की टिप्‍पणी में कुमार पाशी साहब के शेर पर कहता हूँ कि:

अहसास, लफ़्ज़, बह्र, नया कुछ न जब मिला 
सोचा बहुत… कहूँ, न कहूँ, फिर भी कह गया


कवि वीनस केशरी : (इलाहाबाद, उ.प्र.)

देवमणि जी, अच्छी जानकारी दी है। शायर के साथ यह समस्‍या अक्‍सर रहती होगी लेकिन कुछ तो होता ही है जो उसके कहे शेर को अलग पहचान देता है। 

जनाब रामपाल अर्शी का शे'र -

कफ़न कांधे पे लेकर घूमता हूं इसलिये अर्शी
न जाने किस गली में जिंदगी का शाम हो जाये
 
शायर तिलक राज कपूर (भोपाल, म.प्र.)

वीनस के उदाहरण के संदर्भ में: 

कफ़न कांधे पे लेकर घूमता हूं इसलिये अर्शी
न जाने किस गली में जिंदगी का शाम हो जाये 

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाये…

दो खूबसूरत शेर सामने हैं लेकिन बात है नज़रिये की। समालोचक की दृष्टि से देखूँ तो सब ठीक ठाक है लेकिन कुछ देर को आलोचक होने का दुस्‍साहस करूँ तो बहुत से दिलों को चोट पहुँचेगी फिर भी एक बात देखने की है कि शाम वृद्धावस्‍था की स्थिति है मृत्‍यु-काल की नहीं। और यहीं दोनों अशआर में मिसरों का परस्‍पर संबंध समाप्‍त हो जाता है। पहले शेर में जो बात कही गयी है वह सर पर कफ़न बॉंधे घूमने के अधिक करीब है और इसमें शाम होना न होना महत्‍व नहीं रखता। दूसरे शेर में जो उजाले की बात आई है वह अंधकार से तो संबंध रख सकती है लेकिन शाम के धुँधलके के लिये उपयुक्‍त नहीं कही जा सकती है। अगर मेरे कथन से किसी की भावनायें आहत हों तो पूर्ण विनम्रता से मेरी क्षमा प्रार्थना पूर्व से ही प्रस्‍तुत मानें। 

शायर सतपाल ख़याल : (सोलन, हि.प्र.)

लेख बहुत ही महत्वपूर्ण है। ग़ज़ल में भी ज़मीनों का झगड़ा है और यह सही है कि न सिर्फ़ नये बल्कि सफ़ल गज़लकार भी पुराने शायरों के मिसरों को किसी भी तरह इस्तेमाल करते हैं। ग़ज़ल में एक दोष ये है कि बहुत शे'र कहे जा चुके हैं और मसाईल एक जैसे हैं और ग़ज़ल में तो दुहराव बहुत है। आप चराग और हवा पर अगर शे'र खोजेंगे तो हैरान रह जायेंगे कि हर शायर चरागों को जलाता बुझाता रहता है। कोई शाम होते ही बुझा देता है तो कोई सुबह होते ही जला लेता है। ग़ज़ल में बहुत दोहराव है लेकिन ताज़गी भी बहुत है जिसका उदाहरण मुनव्वर राणा साहब हैं। कितने नये और सफ़ल प्रयोग किये हैं। मेरे ख़याल से महत्वपूर्ण ये नहीं है कि आप क्या कहते हैं लेकिन ग़ज़ल में महत्वपूर्ण यह है कि आप कितनी नज़ाकत और कैसे अंदाज़ में कहते है, यही हुनर है शायरी का जिसका उदाहरण है-

तुम मेरे पास होते हो गोया
जब कोई दूसरा नहीं होता

नीलम अंशु : (कोलकाता, प.बंगाल)

बेहद महत्वपूर्ण जानकारी है। सचमुच पहली बार पता चला कि ग़ज़ल में भी ज़मीन झगड़े की वजह बनती है। ऐसा भी तो हो सकता है कि जिसने बाद में लिखा, उसने संयोगवश कभी पहले वाले शायर को पढ़ा ही न हो क्योंकि हरेक रचनाकार की हर रचना हर किसी ने पढ़ ही रखी हो ये भी तो ज़रूरी नहीं।

Yuvraj Shrimal (Sr. Correspondent, DNA Newspaper, Jaipur, Raj.)

Pandey Ji, I read your article, Ghazal Yani Dusron Ki Zameen Par Apni Kheti, uploaded on Bhadas4media. Your analysis is really truth revealing and bringing forth a concept that nothing is original. But, i would like to say that i have read and listen the creations by these Shayars. All these creations might be using same words, but their spirits are variant. They are masterpieces that sooth the minds. If they are copies up to some extent then what's wrong in this as 'copies are copies of the copies'.

कथाकार सुधा अरोड़ा : (मुम्बई) 

देवमणि ! कथायात्रा 1978 में एक गज़लकार दिनेशकुमार शुक्ल ने अपनी पूरी ग़ज़ल के बीच यह एक शेर लिखा था- 

मेरी कुटिया के मुकाबिल आठ मंजि़ल का मकां,
तुम मेरे हिस्से की शायद धूप भी खा जाओगे !

पच्चीस साल बाद जावेद अख्तर की किताब 'तरकश'में यह एक पृष्ठ पर था-!

ऊँची इमारतों से मकां मेरा घिर गया
कुछ लोग मेरे हिस्से का सूरज भी खा गये !

शायर तिलक राज कपूर : (भोपाल, म.प्र.) 

पहले सुधा जी द्वारा दिये गये उदाहरण की बात ! जब कुटिया के मुकाबिल आठ मंजि़ल का मकां खड़ा हो गया तो शायद कहॉं बचा, फिर भी प्रतीकात्‍मक दृष्टि से देखें तो दिनेश जी ने एक आशंका भर व्‍यक्‍त की थी अपने शेर में। जबकि इस बीच चरित्र इतना गिर गया है कि वह आशंका जावेद साहब के शेर तक आते आते यर्थाथ में तब्‍दील हो गयी। यह उदाहरण बहुत ही रुचिकर है, दोनों काल-संदर्भ में तत्‍समय के चरित्र की बात कर रहे हैं और अपने-अपने काल संदर्भ में दो अलग शेर हैं। युवराज जी की बात पर आऊँ तो मेरा मानना है कि नकल नहीं यहॉं सुदृढ़ता का महत्‍व है। किसी समय विशेष में कहा गया कोई शेर जब किसी शायर को कमज़ोर लगता है तो वह अपने तरह से उसे मज़बूत कर प्रस्‍तुत करने का प्रयास करता है। यह मज़बूती सुनने वालों को पसंद आती है तो शेर चल निकलता है वरना दफ़्न हो जाता है एक नकल के रूप में। बशीर बद्र साहब ने जब '...शाम हो जाये' वाला शेर कहा तो वह लोगों को पसंद आया और इतना आया कि उनके नाम का पर्याय बन गया, बस यही शायरी है। जो शेर चल निकला वो चल निकला नहीं तो दीवान के दीवान दफ़्न हैं जो अदबी दायरे से बाहर ही नहीं निकल पाते। आम श्रोता तक पहुँच ही नहीं पाते। फिर भी- शाम हो जाये' जैसी स्थिति में शायर का कर्तव्‍य तो बनता है कि वह प्रस्‍तुत करते समय लोगों को बताये कि मिसरा कहॉं से उठाया है। मिसरा उठाना गुनाह तो नहीं हॉं यह छुपाना गुनाह है कि कहॉं से उठाया।

शायर प्राण शर्मा : (लंदन, यूके)

प्रिय देवमणि जी! आपका लेख पसंद आया।मैंने यह शेर पहले कहीं पढ़ा था -मेरी कुटिया के मुक़ाबिल आठ मंजिल का मकां / तुम मेरे हिस्से की शायद धूप भी खा जाओगे। मुझे शेर के रचयिता के नाम का पता नहीं था। दाद देनी पड़ेगी हिन्दी की प्रसिद्ध कहानीकार और कवयित्री सुधा अरोरा जी को, उन्हें तीन दशक पहले कहा गया गया शेर और शायर का नाम अब भी याद है। उर्दू में एक ख़याल के अनेक मिसरे हैं जिनको इस्तेमाल करने में उस्ताद शायरों ने भी गुरेज़ नहीं किया है। देखिए उनके कहे एक ख़याल के मिसरे और अशआर -

हम वहाँ हैं जहाँ से हमको भी 
कुछ हमारी खबर नहीं आती - ग़ालिब 

कुछ तुम्हारा पता नहीं चलता 
कुछ हमारी खबर नहीं आती - अदम

कुछ गम-ए- इश्क भी कर देता है मजनून `अदम`
और कुछ लोग भी दीवाना बना देते हैं - अदम 

कुछ तो होते हैं मुहब्बत में जुनूं के आसार
और कुछ लोग भी दीवाना बना देते हैं - ज़हीर देहलवी 

मुहब्बत का दरिया, जवानी की लहरें 
यहीं डूब जाने को जी चाहता है - अमजद नज्मी 

हसीं तेरी आँखें, हसीं तेरे आंसूं 
यहीं डूब जाने को जी चाहता है - जिगर मुरादाबादी 

उमराव जान में शहरयार की ग़ज़ल का मतला है -

दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिये 
बस एक बार मेरा कहा मान लीजिये 

इस मतला ने शहरयार को रातों-रात मशहूरियों की बुलंदी पर पहुँचा दिया था। मतला के दोनो मिसरे बिस्मिल अज़ीमाबादी की ग़ज़ल से उठाये गए थे। उनकी चार शेरों की ये ग़ज़ल पढ़ कर देखिए -

दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिये 
खंजर को अपने और ज़रा तान लीजिये 

बेशक़ न मानियेगा किसी दूसरे की बात
बस एक बार मेरा कहा मान लीजिये 

मर जायेंगे मिट जायेंगे हम कौम के लिए 
मिटने न देंगे मुल्क, ये ऐलान लीजिये

बिस्मिल` ये दिल हुआ है अभी कौम पर फ़िदा 
अहल-ए-वतन का दर्द भी पहचान लीजिये 

आपके जानकारी भरे लेख की एक बार और तारीफ़ करता हूँ।--- प्राण शर्मा

शायर तिलक राज कपूर : (भोपाल, म.प्र.)

प्राण साहब के उदाहरणों को देखें तो एक बात तो स्‍पष्‍ट है कि पूरा मिसरा ले लेना भी स्‍वीकार किया गया है बशर्ते कि कहन में बदलाव हो। ग़ालिब साहब के शेर में स्‍पष्‍ट बेखुदी है और अदम साहब का शेर मैं अभी समझने का प्रयास ही कर रहा हूँ कि यह भी बेखुदी ही है या उसके आस-पास भटकता कोई और भाव। मुझे ग़ालिब साहब का शेर कुछ यूँ याद था: हम वहॉं हैं जहॉं से खुद हमको / आप अपनी खबर नहीं आती। अदम साहब और ज़हीर देहलवी के शेर में भाव पक्ष एक ही है। मेरे मत में किसी और के पूर्व में कहे मिसरे को पूर्व शेर के भाव में ही बॉंधना तो यह कहता है कि पहले वाला शायर कुछ दमदार शेर नहीं कह सका, मैं अब दमदार शेर दे रहा हूँ। अमजद नज्मी साहब और जिगर मुरादाबादी साहब के शेर एक ही भाव रखते हुए भी अलग-अलग मंज़र पर हैं इसलिये इनमें तो कोई समस्‍या नज़र नहीं आती। राम प्रसाद `बिस्मिल` के नाम से जो अशआर बताये गये हैं उनको लेकर मुझे शंका है, लगता है किसी मूवी में लिये गये शेर हैं ये जो मूल ग़ज़ल से हट के होंगे। मेरी शंका का कारण पहले शेर का भाव है। अब एक प्रश्‍न: शिकवा, शिकायतें, न गिला कीजिये अभी / बस एक बार मेरा कहा मान लीजिये'। मैं अगर खुलकर स्‍वीकार करूँ कि दूसरी पंक्ति पूरी की पूरी किसी अन्‍य शायर के शेर से ली गई है जिसका नाम मुझे ज्ञात नहीं तो क्‍या यह शेर अपना वज़ूद खो देगा। मुझे तो नहीं लगता।

शायर देवमणि पाण्डेय : (मुम्बई)

मुझे लगता है कि 'ख़ुदाए-सुख़न मीर' से मिर्ज़ा ग़ालिब काफ़ी प्रभावित थे। उन पर मीर का यह असर साफ़-साफ़ दिखाई देता है। मिसाल के तौर पर दोनों के दो-दो शेर देखिए-

तेज़ यूँ ही न थी शब आतिशे-शौक़
थी ख़बर गर्म उनके आने की -मीर तकी मीर

थी ख़बर गर्म उनके आने की 
आज ही घर में बोरिया न हुआ -मिर्ज़ा ग़ालिब

होता है याँ जहां में हर रोज़ो-शब तमाशा
देखा जो ख़ूब तो है दुनिया अजब तमाशा -मीर तकी मीर 

बाज़ी-चा-अतफ़ाल है दुनिया मेरे आगे 
होता है शबो-रोज़ तमाशा मेरे आगे -मिर्ज़ा ग़ालिब

शायर तिलक राज कपूर : (भोपाल, म.प्र.)

मीर का शेर पहली बात तो ग़ालिब के शेर के मुकाबिल उँचे दर्जे का है, और दोनों शेर अलग-अलग स्थिति के हैं। दूसरे दोनों शेर एक ही बात तो कहते हैं मगर अलग-अलग तरह से बॉंधे गये हैं। अभिव्‍यक्ति एक है लेकिन मार्ग अलग।

शायर प्राण शर्मा (लंदन, यूके)

प्रिय देवमणि जी ! आपकी जानकारी बहुत है। इतनी जानकारी तो किसी उर्दू के उस्ताद शायर की भी नहीं होगी। बिस्मिल के दूसरे शेर में रदीफ़ की ग़लती हो गई थी। सही मिसरा यूँ है -` मिटने न देंगे मुल्क ये ऐलान लीजिये'। बिस्मिल अज़ीमाबादी के कुछेक शेरों या मिसरों को काई शायरों ने ज्यों का त्यों उठाया है। जिगर मुरादाबादी का मशहूर शेर है -

ये इश्क नहीं आसां बस इतना समझ लीजे 
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है 

बिस्मिल अज़ीमाबादी के मक़्ता पर गौर फरमाईयेगा -

'बिस्मिल` ऐ वतन तेरी इस राह-ए-मुहब्बत में 
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है 

निदा फाज़ली इस शेर से पहचाने जाते हैं -

दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है
खो जाये तो मिट्टी है मिल जाये तो सोना है 

निदा फाज़ली के शेर पर बिस्मिल अज़ीमाबादी' के इस शेर की पूरी झलक है -

सब वक़्त की बातें हैं सब खेल है किस्मत का 
बिंध जाये तो मोती है रह जाये तो दाना है 

जिन शेरों या मिसरों से 'बिस्मिल' को ख्याति मिलनी चाहिए थी वो अन्य शायर लूट कर ले गए। उनके दो- तीन अशआर सुनियेगा -

आता है याद हमको गुज़रा हुआ ज़माना 
वो झाड़ियाँ चमन की वो मेरा आशियाना 

वो प्यारी-प्यारी सूरत वो मोहनी सी मूरत 
आबाद जिसके दम से था मेरा आशियाना 

आज़ादियाँ कहाँ वो अब मेरे घोंसले की 
अपनी खुशी से आना अपनी खुशी से जाना

शुभ कामनाओं के साथ- प्राण शर्मा 

आपका-
देवमणिपांडेय

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, 
गोकुलधाम, निकट महाराजा टावर, फिल्मसिटी रोड, 
गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063 
98210 82126