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मंगलवार, 22 फ़रवरी 2011

मुम्बई में अखिल भारतीय अवधी सम्मेलन


मुम्बई में अखिल भारतीय अवधी सम्मेलन 

मुंबई : ठाणे के येऊर हिल्स स्थित स्वानंद बाबा आश्रम में प्रेम शुक्ल के नेतृत्व में आयोजित अखिल भारतीय अवधी सम्मेलन में देश के कोने-कोने से आए अवधी विद्वानों की गंभीर चर्चा, सृजन संवाद व कवियों की लोककाव्य फुहारों ने गत रविवार १३ फरवरी को पूरे दिन तकरीबन 2 हजार भाषाप्रेमियों को अवधीमय कर दिया। इस आयोजन को अंतरर्राष्ट्रीय छठा देने के लिए चाड गणतंत्र के हिंदी व भारतप्रेमी अदुम इदरीस अदुम व अदम महमत येस्केइमी तथा नेपाल में अवधी को प्रचारित करनेवाले लोकनाथ वर्मा राहुल विशेष रूप से उपस्थित रहे। इसमें यूपी भाजपा के पूर्व अध्यक्ष डॉ. रमापति राम त्रिपाठी ने भी सहभागिता की।

मैं आ गया हूं बहुत दूर
लेकिन नहीं हूं मजबूर
महसूस हुआ मुझे 
पूरे हिंदुस्तान में हैं फूल
इसे मैंने हमेशा के लिए कर लिया कुबूल
चाहे दूर रहूं या नज़दीक
मैं हमेशा रहूंगा उनके क़रीब 

यह प्यारी भावना सात समंदर पार के हिंदी-हिंदुस्तान प्रेमी अदम महमत येस्केइमी की है। येस्केइमी भले ही चाड गणतंत्र (दक्षिणा अफ्रीका) के नागरिक हैं, पर उनका दिल हिंदुस्तानी है। उनका यह दिल ठाणे (मुम्बई) के येऊर स्थित स्वानंद बाबा आश्रम में आयोजित अखिल भारतीय अवधी सम्मेलन में एकदम अवधी रंग में रंग गया। गोस्वामी तुलसीदास, अमीर खुसरो, मलिक मोहम्मद जायसी, मुल्ला दाउद, रहीम, कबीर, कुतुबन व मंझन की भाषा अवधी के कुछ शब्दों का उच्चारण कर येस्केइमी ने वहां पर मौजूद लगभग 2000 भाषा प्रेमियों को मोहित कर दिया।

चाड गणतंत्र के एक अन्य हिंदी प्रेमी कवि अदुम इदरीस अदुम की कविता में प्यार, सपने, जानेमन, तमन्ना व दुल्हन की बात थी- जाने मन तुम हमेशा मेरे ख्यालों में आती हो, मेरी यादों में आती हो/ मेरी तमन्ना है कि तुम्हें जीवनसाथी बनाऊं/ तुम्हें अपनी दुल्हन बनाऊं। याराना एसोसिएशन के ज़रिए हिंदुस्तान-चाड गणतंत्र के बीच सांस्कृतिक भाषागत संबंध मजबूत कर रहे इदरीस भी मन से पक्के हिंदुस्तानी हैं तो नेपाल से पधारे लोकनाथ वर्मा राहुल अवधी संस्कृति में रचे बसे नज़र आए। इसी तरह ठाणे (मुम्बई के येऊर हिल्स पर अवधी ने अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को लांघते हुए सारे दिलों को एक कर दिया।

दीप प्रज्जवलन के बाद अशोक टाटंबरी (फैजाबाद) की सरस्वती वंदना से सम्मेलन प्रारंभ हुआ। प.पू. स्वानंद बाबा सेवा न्यास के मुख्य न्यासी प्रेम शुक्ल ने अतिथियों का स्वागत करते हुए अवधी के संरक्षण, संवर्द्धन हेतु भरसक प्रयास करने का वचन दिया। अवधी की चुनौतियां पर परिचर्चा के अध्यक्ष के रूप में मुम्बई वि.वि. के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. रामजी तिवारी ने कहा कि अवधी भाषा की ताक़त पहले ही साबित हो चुकी है। गोस्वामी तुलसीदास ने अवधी को समृद्ध भाषा का दर्जा दिया था। अवधी अकादमी के अध्यक्ष जगदीश पीयूष ने कहा कि 1976 में अमेठी स्थित मलिक मोहम्मद जायसी की मजार से शुरू हुआ अवधी जागरण आंदोलन देश-विदेश भ्रमण करते हुए 36 साल बाद ठाणे (मुम्बई) के स्वानंद आश्रम तक आ पहुचा है। इस प्रकार के आंदोलनों ने काफी शक्ति मुहैया कराई है। उन्होंने यह भी कहा कि मेरे विचार से प्रेम शुक्ल को विश्व अवधी सम्मेलन का नेतृत्व भी करना चाहिए।

अवध ज्योति के संपादक डॉ.राम बहादुर मिश्र ने अवधी गद्य के सूने कोने को चुनौती मानते हुए अपनी थाती को संभालने की बात कही। अवधी विकास संस्थान के अध्यक्ष एड. विनोद ने कहा कि आज कई अवधी सीरियल आ रहे हैं। भाषा संस्कृति नहीं बचेगी तो देश कैसे बचेगा। इसलिए सभी को मिलजुल कर प्रयास करना है। प्रवासी संसार के संपादक राकेश पांडेय ने सवाल उठाया कि अवधी माटी के कलाकार अवधी का खाते हैं पर गाते हैं भोजपुरी की। क्यों वे अपनी बोली व गायन को अवधी कहने में शर्म महसूस करते हैं? सुप्रसिद्ध अवधी विद्वान डॉ. आद्या प्रसाद सिंह प्रदीप ने कहा कि हजारों साल से अवधी देश की साहित्यिक-सांस्कृतिक चेतना की प्रतीक रही है। अवध क्षेत्र के ही महावीर प्रसाद द्विवेदी व निराला सरीखे साहित्यकारों ने ही हिंदी के वर्तमान स्वरूप का निर्माण किया था।

उर्दू रोज़नामा हिंदुस्तान के संपादक सरफराज आरजू ने अवधी को गंगा-जमुनी संस्कृति का प्रतीक बताया तो नई दुनिया के रीजनल एडीटर पंकज शुक्ल ने कहा कि आज का जमाना इंटरनेट का है, इसलिए अवधी के समग्र साहित्य को इंटरनेट पर लाना होगा, तभी यह समाज में अपनी जड़ें तेजी से जमा पाएगी। परिचर्चा में नवनीत के पूर्व संपादक डॉ. गिरिजा शंकर त्रिवेदी, साहित्यकार, डॉ. आशारानी लाल, अभियान के अध्यक्ष अमरजीत मिश्र व दोपहर के संपादक निजामुद्दीन राइन व सिटी चैनल (कानपुर) के प्रमुख संवाददाता सौरभ ओमर ने भी शिरकत की। सम्मेलन में यूपी भाजपा के पूर्व अध्यक्ष डॉ. रमापति राम त्रिपाठी ने भी सहभागिता की। कार्यक्रम का संचालन अवधी सम्मेलन, मुंबई के संयोजक राजेश विक्रांत ने किया।

लोक काव्य संध्या में देवमणि पांडेय के संचालन में द्वारिका प्रसाद त्रिपाठी बृजनाथ, डॉ. अशोक गुलशन (बहराइच), डॉ. रजनीकांत मिश्र, मुरलीधर पांडेय, राम प्यारे सिंह रघुवंशी, कमलेश पांडेय तरूण, उबैद आज़म आज़मी, देवराज मिश्रा, आशीष पांडेय, लक्ष्मी यादव, रास बिहारी पांडेय, जवाहर लाल निर्झर, रुस्तम घायल, शीतल नागपुरी व रवि यादव ने अपनी विविध रचनाएं प्रस्तुत की।

कार्यक्रम में विकलांग की पुकार के अभय मिश्र के अतिथि संपादन में प्रकाशित अवधी गौरव विशेषांक तथा अनिल गलगली संपादित अग्निशिला मासिक पत्रिका के नए अंक का विमोचन प.पू. स्वानंद बाबा सेवा न्यास के प्रमुख पं. दुर्गा प्रसाद पाठक द्वारा किया गया।

इसमें राष्ट्रीय सहारा (लखनऊ) के प्रमुख संवाददाता के.बख्श सिंह, सुवर्णस्पर्श जेम्स एंड ज्वेलरी के पार्टनर विमल पटेल, मुंबई कांग्रेस के महासचिव जाकिर अहमद, अर्थकाम डॉट काम के संपादक अनिल सिंह, मेट्रोकार्ड्स एंड हालिडेज के ऑलिवर स्टेंस, मुंबई मित्र-वृत्त मित्र समाचार पत्र के संपादक अभिजीत राणे, उद्योगपति बबलू पांडेय, लेखिका डॉ. कृष्णा खत्री, पत्रकार रवि कुमार राठौर (दैनिक सवेरा), लाइव इंडिया के रवि तिवारी, लोकप्रिय गायक रवि त्रिपाठी, प्रभाकर कश्यप, पत्रकार शेषनारायण त्रिपाठी, श्रीश उपाध्याय, उदयभान पांडेय, संगीतकार शिवम् पांडेय, एनडी टीवी के वरिष्ठ पत्रकार सुनील सिंह, सिद्धि विनायक मंदिर के पूर्व ट्रस्टी उदय प्रताप सिंह, नवभारत टाइम्स की पत्रकार कंचन श्रीवास्तव व रीना पारीक, वीमेंस वेल्फेयर फाउंडेशन की अध्यक्ष सुश्री अर्चना मिश्र (पुणे), विकलांग की पुकार के संपादक सरताज मेहदी, डॉ. रमाकांत क्षितिज, डॉ. वेद प्रकाश दुबे, पत्रकारिता कोश के संपादक आफताब आलम, लेखिका-उद्घोषिका सलमा सैयद, साहित्यप्रेमी महेश शर्मा, अमरदेव मिश्रा, जगदंबा प्रसाद पाठक समेत साहित्य, पत्रकारिता, समाजसेवा व कला क्षेत्र के अनेक महानुभाव उपस्थित रहे।

ज़माने गुज़र जाते हैं, सदियाँ बीत जाती हैं, पर कहते हैं कि अपनी बोली बानी की खुशबू कभी नहीं बदलती। अपनी संस्कृति की सुगंध हमेशा बढ़ती जाती है। धर्म के साथ जब भाषा, कविता व संस्कृति का संगम होता है तब अखिल भारतीय अवधी सम्मेलन सरीखे ऐसे कार्यक्रम आयोजित होते हैं जो सदा हमको अपनी बोली-बानी की याद दिलाते रहते हैं।

आपका
देवमणिपांडेय

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति,
कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड,
गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210-82126

सोमवार, 15 फ़रवरी 2010

हे प्रभो आनंददाता : लोक कवि पं.रामनरेश त्रिपाठी


सुलतानपुर के लोक कवि पं.रामनरेश त्रिपाठी 

 अवध के गौरव पं.रामनरेश त्रिपाठी का जन्म मेरे ज़िले सुलतानपुर उ.प्र. के कोइरीपुर गांव में 4 मार्च 1890 को हुआ था। स्वर्गवास 16 जनवरी 1962 को हुआ। पं.रामनरेश त्रिपाठी के निधन पर देश के प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरु ने कहा- वे एक बड़े कवि थे और हमारी स्वराज्य की लड़ाई में एक आला सिपाही थे। सुलतानपुर शहर में केश कुमारी कन्या महाविद्यालय के सामने उनकी याद में बने सभागार का नाम है पं.रामनरेश त्रिपाठी सभागार। पं.रामनरेश त्रिपाठी अवधी भाषा में लोक जीवन की अदभुत झाँकी प्रस्तुत करने वाले लोक कवि थे। अवधी के सपूत पं.रामनरेश त्रिपाठी का बिरला परिवार में बहुत सम्मान था। उद्योगापति बसंत कुमार बिरला ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि एक दिन वे हमारे घर पधारे तो घनश्याम दास बिरला ने उनसे निवेदन किया कि त्रिपाठी जी आप कोई ऐसी प्रार्थना लिख दीजिए जिसे मैं और मेरे बच्चे रोज़ सुबह गाएं । पं.रामनरेश त्रिपाठी ने तत्काल प्रार्थना लिख दी- 

हे प्रभो आनंददाता ज्ञान हमको दीजिए 
शीघ्र सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिए 

यह प्रार्थना इतनी लोकप्रिय हुई कि सारा हिंदुस्तान गाने लगा । लोक कवि पं.रामनरेश त्रिपाठी ने 1925 और 1930 के बीच अवध के गाँव-गाँव में घूम करके 15 हज़ार से भी अधिक लोकगीतों का संग्रह किया था । इसी के आधार पर उन्होंने ‘कविता कौमुदी’ किताब लिखी । सन् 1928 के अंत में प्रकाशित इस पुस्तक की प्रथम प्रति महात्मा गाँधी को भेंट की गई थी और उन्होंने मुक्त कंठ से इस प्रयास की सराहना की थी। कविता कौमुदी पढ़कर विश्वकवि रवींद्रनाथ ठाकुर ने उन्हें पत्र में लिखा था- आपनार संकलित कविता कौमुदी ग्रंथखानि पाठ करिया परितृप्ति लाभ करियाछि । हिंद कवितार ए रूप सुंदर एवं धारावाहिक संग्रह आमि आर कोथाओ देखा नाईं। अपनी एई कवितागुलि प्रकाश करिया भारतीय साहित्यानुरागी व्यक्तिमात्र केइ चिरकृतज्ञता पाशे आबद्ध करियाछेन। 

महात्मा गाँधी और पं जवाहर लाल नेहरू का सानिध्य


पं.रामनरेश त्रिपाठी ने अपने 72 वर्ष के जीवन काल में कविता, कहानी, उपन्यास, जीवनी, संस्मरण और बाल साहित्य की सौ किताबें लिखीं। ग्राम गीतों का संकलन करने वाले वे हिंदी के प्रथम कवि थे जिसे 'कविता कौमुदी' के नाम से जाना जाता है। इसके लिए उन्होंने इक्के और तांगों से लेकर पैदल लम्बी लम्बी यात्राएं कीं। गांव-गांव जाकर अनपढ़ महिलाओं के साथ बैठकर लोकगीत, संस्कार गीत, सोहर, कजरी, बिरहा एवं विवाह गीतों को सुना और लिपिबद्ध किया। उनको महात्मा गाँधी और पं जवाहर लाल नेहरू का स्नेह प्राप्त था। प्रयाग में कांग्रेस के एक सम्मेलन में महात्मा गाँधी ने कविता कौमुदी का लोकार्पण किया था। महात्मा गांधी के अनुरोध पर वे हिन्दी साहित्य सम्मेलन के प्रचार मंत्री के रूप में हिन्दी के प्रचार प्रसार के लिए दक्षिण भारत गए थे। वे देशभक्त और राष्ट्र सेवक थे। उन्होंने स्वाधीनता संग्राम और किसान आन्दोलनों में भागीदारी की और जेल भी गए।

कई साल ढूंढने के बाद मुझे कविता कौमुदी मित्र अरविंद राही के सौजन्य से प्राप्त हुई। वे यह पुस्तक पं.रामनरेश त्रिपाठी जी के परिवार के किसी सदस्य से माँगकर लाए। इसे पढ़ते हुए मुझे महसूस हुआ कि अवधी लोककाव्य में एक तरफ उमंग और उल्लास की मधुर छवियाँ हैं तो दूसरी तरफ़ दुख और अभाव के त्रासद चित्र भी हैं-

मन तोरा अदहन, तन तोरा चाउर, नैना मूँग कै दालि 
अपने बलम का जेंवना जेंवतिउ, बिनु लकड़ी बिनु आगि 

मँहगी के मारे बिरहा बिसरिगा, भूलि गइ कजरी कबीर 
देखि क गोरी क मोहिनी सुरति अब, उठै न करेजवा मँ पीर

कविता कौमुदी में लोककाव्य के विविध रूपों- सोहर, कजरी, बिरहा, होरी, मेला गीत, विवाह गीत, विदाई गीत आदि शामिल हैं। इसमें अहीर,कहार, तेली, गड़रिया, धोबी और चमारों के गीतों का भी अदभुत संग्रह है। पं.रामनरेश त्रिपाठी का जुनून देखिए कि लोकगीतों की तलाश में उन्होंने बंगाल, पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र, दक्षिण भारत और कश्मीर से लेकर नेपाल तक की यात्राएं की थीं । प्रांतीय भाषाओं के गीतों की झलक भी इस पुस्तक की अलग उपलब्धि है।

बड़ निक लागै मेहरी क कोरवा


अवध में ज़मींदार और बड़े किसान अहीर के लड़कों को चरवाहे का काम देते थे। ये नौजवान चरवाहे अँगोछे में बासी रोटी बाँधकर सुबह गाय-भैसों के साथ जंगल में चले जाते थे और शाम ढलने पर वापस लौटते थे। अपना समय काटने के लिए मौज-मस्ती में या प्रिय जनों के विरह (याद) में ये लोग जो गीत गाते थे उसे ‘बिरहा’ कहा गया । अब तो बिरहा दुर्लभ हो गया है मगर सन् 1970 के पहले शादी-व्याह के अवसर पर अहीरों के नाच में बड़े मज़ेदार बिरहे सुनने को मिलते थे –

बड़ निक लागै गाय चरवहिया भुइयाँ जो परती होय 
बड़ निक लागै मेहरी क कोरवा जबले लरिकवा न होय 

दोहे में भी लोकजीवन की अदभुत छटा दिखाई देती है। सुंदर स्त्री से हर कोई बात करना चाहता है। मगर वह किसको-किसको ख़ुश करे! उसकी व्यथा देखिए -

जोबन गयो तो भल भयो, तन से गई बलाय 
जने जने का रूठना, मोसे सहा न जाय 

गाँवों के हृदय में सुख का प्रकाश है। सुख न होता तो गाँव के लोग अनंत दुखों का भार कैसे उठा लेते। अपने प्राणधन के साथ दुख में भी सुख का अनुभव करने वाली एक पति-वल्लभा का हृदयोदगार देखिए-

टूटी खाट घर टपकत टटियो टूटि
पिय कै बाँह सिरहनवा सुख कै लूटि

मुम्बई में 22 जनवरी 2010 को अवधी सम्मेलन हुआ। अवधी सम्मेलन के संयोजक थे पत्रकार राजेश विक्रांत। अवधी अकादमी के अध्यक्ष व बोली बानी के संपादक जगदीश पीयूष ने बताया कि अवधी भाषा उ.प्र. के 24, बिहार के 2 तथा नेपाल के 8 जिलों में लगभग 12 करोड़ लोगों की भाषा है। तुलसीदास, अमीर खुसरो, मलिक मोहम्मद जायसी, मुल्ला दाउद, कबीर, कुतुबन, मंझन और रहीम सरीखे महाकवियों ने अवधी में काव्य रचना करके इस लोकभाषा को गौरव प्रदान किया। अवधी सम्मेलन में मुम्बई की धरती पर सर्वप्रथम रामलीला का आयोजन करने वाले स्व. शोभनाथ मिश्र के सुपुत्र तथा श्री महाराष्ट्र रामलीला मंडल के महामंत्री द्वारिकानाथ मिश्र का सम्मान किया गया।

यह भी ग़ौरतलब है कि हिंदी फ़िल्मों में जो पात्र अवधी बोलते हैं उन्हें भोजपुरी कहकर प्रचारित किआ जाता है। फ़िल्म गंगा जमुना के सम्वाद अवधी भाषा में हैं। मुंबई में उत्तर भारतीयों के तौर पर सिर्फ़ पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों का ही नाम लिया जाता है, जबकि मुंबई में अवधी जानने और बोलने वालों की बहुत बड़ी आबादी है। अवधी भाषियों को जोड़ने और अवधी को उसकी खोई पहचान दिलाने के लिए अवधी सम्मेलन ज़रूरी हैं।  

पं.रामनरेश त्रिपाठी की प्रार्थना


हे प्रभु आनंद-दाता ज्ञान हमको दीजिये
शीघ्र सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिए

लीजिये हमको शरण में, हम सदाचारी बनें ब्रह्मचारी धर्म रक्षक वीर व्रत धारी बनें

निंदा किसी की हम किसी से भूल कर भी ना करें ईर्ष्या कभी भी हम किसी से भूल कर भी ना करें

सत्य बोलें, झूठ त्यागें, मेल आपस में करें दिव्य जीवन हो हमारा, यश तेरा गाया करें 

जाए हमारी आयु हे प्रभु लोक के उपकार में
हाथ डालें हम कभी न भूल कर अपकार में

कीजिए हम पर कृपा ऐसी हे परमात्मा
मोह मद मत्सर रहित होवे हमारी आत्मा

प्रेम से हम गुरु जनों की नित्य ही सेवा करें
प्रेम से हम संस्कृति की नित्य ही सेवा करें 

योग विद्या ब्रह्म विद्या हो अधिक प्यारी हमें
ब्रह्म निष्ठा प्राप्त कर के सर्व हितकारी बनें 

हे प्रभु आनंद-दाता ज्ञान हमको दीजिये
शीघ्र सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिए


अवधी सम्मेलन में संयोजक राजेश विक्रांत, कवि देवमणि पांडेय, प्रमुख अतिथि जगदीश पीयूष, अर्चना मिश्र, एड. विजय सिंह, अध्यक्ष डॉ. रामजी तिवारी, संपादक प्रेम शुक्ल, पं. किरण मिश्र, कवि ओमप्रकाश तिवारी, पत्रकार अनुराग त्रिपाठी (मुम्बई 2010)

आपका-
देवमणिपांडेय

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति,
कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड, 
गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210-82126