बुधवार, 26 जून 2013

सूर्यभानु गुप्त : मिट्टी में मिली मिट्टी पानी में मिला पानी

कवि सूर्यभानु गुप्त


मुम्बई के वरिष्ठ रचनाकार सूर्यभानु गुप्त एक प्रयोगधर्मी ग़ज़लकार हैं। मगर उनका हर प्रयोग काव्य की गरिमा से समृद्ध होता है। वे हमेशा कथ्य, ज़बान और लहजे की ख़ूबसूरती की एक मिसाल पेश करते हैं। उनकी इस ग़ज़ल में ‘पानी’ सिर्फ़ रदीफ़ ही नहीं है बल्कि वही हर शेर का केंद्रीय भाव भी है। इस भाव में सार्थकता, विस्तार, विविधता, गहराई और ऊँचाई है। बरसात के इस सुहाने मौसम में आप डूबकर पानीदार ग़ज़ल पढ़िए और अपनी राय हमें भेजिए। पिछली बार इसमें 23 शे'र थे। बारिश की तबाही ने इसे अब 42 शे'र की ग़ज़ल बना दिया है।  - देवमणि पांडेय
 

सूर्यभानु गुप्त की ग़ज़ल


आँखों में पड़े छाले, छालों से बहा पानी
इस दौर के सहरा में, ढूँढ़े न मिला पानी।1

दुनिया ने कसौटी पर, ता उम्र कसा पानी,
बनवास से लौटा तो शोलों पे चला पानी।2

शोलों से गुज़र कर भी सूली पे टँगा पानी
बनवास से आकर फिर बनवास गया पानी।3।

गुज़रे हुए पुरखों को जिसने भी दिया पानी
उस शख़्स के हथों का मश्कूर1 हुआ पानी।4।

पर्वत के ज़ुबां फूटी, इक शोर उठा, पानी !
मन्ज़र पे बना मन्ज़र, पानी पे गिरा पानी।5

आकाश फटा ऐसा धरती ने भरा पानी
बरखा ने हदें तोड़ीं, पानी पे चढ़ा पानी।6।

सागर से बग़ावत पर जब ज़िद पे अड़ा पानी
उस वक़्त सुनामी के पैकर2 में ढला पानी।7।

लोगों ने कभी ऐसा, देखा न सुना पानी,
पानी में बही बस्ती, बस्ती में बहा पानी।8

सागर की जगह घेरी पत्थर के मकानों ने
बारिश में नहीं अपने आपे में रहा पानी।9

सैलाब ने हर घर की सूरत ही बदल डाली,
रुकने को किसी घर में, पल भर न रुका पानी।10

दरिया से जुदा होकर बाज़ार में आ पहुँचा
बादल न जो बन पाया बोतल में बिका पानी ।11

मन्दिर हो कि मस्जिद हो, गिरिजा हो कि गुरुद्वारा
आजाद़ रहे जब तक, लगता है भला पानी।12

बन्दे से ख़ुदा बनते, देखा है उन्हें हमने
जो लोग कराते हैं, पानी से जुदा पानी।13

लेने लगी फूलों से अब काम बमों का भी
इस दर्जा सियासत की आँखों का मरा पानी।14।

तहज़ीब की आँखों से दिन-रात लहू छलका
पत्थर की हवेली में यूँ लुटता रहा पानी।15।

देखा है जिन आँखों ने जलते हुए जंगल को,
रहता है उन आँखों में, हर वक्त़ हरा पानी।16

ऐ दश्ते-जुनूं3 तेरे सूखे हुए काँटों पर
हमने तो लहू छिड़का, दुनिया ने कहा पानी।17।

बेआब4 न थे इतने हम दौरे-ग़ुलामी में,
बतलाए कोई जोषी किस देश गया पानी।18

संसार में पानी से महरूम5 रहे प्यासे
कमज़र्फ़ों6 के क़ब्ज़े में हर युग में रहा पानी।19।

हर सिम्त7 मुक़ाबिल8 थीं बस धूप की तलवारें,
पर आख़िरी क़तरे तक सहरा में लड़ा पानी।20।

ख़ामोशी से हर युग में सूली पे चढ़े हँसकर
अल्लाह के बंदों का देता है पता पानी।21।

देखा न कोई प्यासा फिर इब्ने अली9 जैसा
और प्यास भी कुछ कि ऐसी क़ुर्बान गया पानी।22।

जब प्यास अँधेरों के घर बैठ गई जाकर
जलते हैं दीये जैसे सहरा में जला पानी।23।

आ जाए है पानी पे चलने का हुनर जिसको
मूसा10 की तरह उसको देता है जगा पानी।24।

दुनिया में नहीं मुमकिन पानी के बिना जीना
दुनिया के लिए जैसे हो माँ की दुआ पानी।25।

पानी न मिला जिस दिन रोएगी लहू दुनिया
हर सिम्त से उट्ठेगी बस एक सदा पानी।26।

अब जंग अगर होगी, पानी के लिए होगी
हर शख़्स से माँगेगा अब ख़ूनबहा11 पानी।27।

उस पार हर इक युग में महीवाल का डेरा था,
कच्चा था घड़ा जिसका काटे न कटा पानी।28।

हर लफ़्ज़ का मानी से रिश्ता है बहुत गहरा,
हमने तो लिखा बादल और उसने पढ़ा पानी।29।

दस्तक दी दरे-दिल12 पर बरसात के मौसम ने
दो शख़्स मिले ऐसे जैसे कि हवा-पानी।30।

अँगनाई से तन-मन तक कुछ भी न बचा कोरा
इस बार के सावन में य़ूँ जम के गिरा पानी।31

हम जब भी मिले उससे, हर बार हुए ताज़ा
बहते हुए दरिया में हर पल है नया पानी।32।

वीरान हम इतने थे, जंगल न कोई होगा
इक शाम पहनने को यादों ने बुना पानी।33।

घर छोड़के निकलें तो संसार के काम आएँ
कब धूप को पहने बिन बनता है घटा पानी।34।

इस दुनिया में रहकर भी दुनिया में नहीं रहना
जिस दिन ये हुनर आया, तारीख़13 बना पानी।35।

लोगों को महाभारत देता है यही इब्रत14
जो हक़15 पे चला उसका दुनिया में रहा पानी।36।

क़द्रों16 के लिए जीना, क़द्रों के लिए मरना
रखता है वक़ार17 अपना सहरा में सदा पानी।37।

इक मोम के चोले में धागे का सफ़र दुनिया,
अपने ही गले लग कर रोने की सज़ा पानी।38।

जन्नत थी मगर हमको झुक कर न उठानी थी,
काँधों पे रहा चेहरा, चेहरे पे रहा पानी ।39।

इक हूक-सी उट्ठे है धरती के कलेजे से
बेटे-सा हुआ जब भी धरती से जुदा पानी।40।

जिस दिन मैं गुज़र जाऊँ दरिया में बहा देना
मिट्टी की पसंदीदा पोशाक सदा पानी।41।

हर एक सिकन्दर का अन्जाम यही देखा
मिट्टी में मिली मिट्टी, पानी में मिला पानी।42

1-आभारी 2-रूप या आकार 3-उन्माद का वन 4-निस्तेज 5-वंचित 6-अधम या कुपात्र 7-दिशा 8-सामने 9-इस्लाम धर्म के अंतिम पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद के नाती व ख़लीफ़ा अली के सुपुत्र इमाम हुसैन साहब जो ईराक के कर्बला नामक स्थान पर निर्दयी शासक यज़ीद की फ़ौजों के हाथों दस दिनों के भीषण युद्ध के बाद प्यासे लड़ते हुए शहीद हुए। 10-मिस्रवासी पैग़म्बर हज़रत मोज़ेस 11-प्राणों का मूल्य 12-हृदय द्वार 13-इतिहास 14-सीख 15-सत्य 16-जीवन-मूल्य 17-मान-प्रतिष्ठा


परिचय : कवि सूर्यभानु गुप्त

जन्म  :  22 सितम्बर, 1940, नाथूखेड़ा (बिंदकी), जिला : फ़तेहपुर ( उ.प्र.)। बचपन से ही मुंबई में । 12 वर्ष की उम्र से कविता लेखन।
प्रकाशन  : पिछले 50 वर्षो के बीच विभिन्न काव्य-विधाओं में 600 से अधिक रचनाओं के अतिरिक्त 200 बालोपयोगी कविताएँ प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। समवेत काव्य-संग्रहों  में संकलित एवं गुजराती, पंजाबी, अंग्रेजी में अनूदित ।
फ़िल्म गीत-लेखन : गोधूलि (निर्देशक गिरीश कर्नाड ) एवं आक्रोश तथा संशोधन (निर्देशक गोविन्द निहलानी ) जैसी प्रयोगधर्मा फ़िल्मों के अतिरिक्त कुछ नाटकों तथा आधा दर्जन दूरदर्शन- धारवाहिकों में गीत शामिल।
प्रथम काव्य-संकलन : एक हाथ की ताली (1997), वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली 110 002
पुरस्कार : 1.भारतीय बाल-कल्याण संस्थान, कानपुर, 2.परिवार पुरस्कार (1995), मुम्बई
पेशा : 1961 से 1993 तक विभिन्न नौकरियाँ । सम्प्रति स्वतंत्र लेखन ।
सम्पर्क : 2, मनकू मेंशन, सदानन्द मोहन जाधव मार्ग, दादर ( पूर्व ), मुम्बई- 40001,
दूरभाष : 090227-42711  /  022-2413-7570

मंगलवार, 12 फ़रवरी 2013

लखनऊ में लोकार्पण : देवमणि पांडेय का ग़ज़ल संग्रह

कवि देवमणि पांडेय, पूर्व सांसद-साहित्यकार उदय प्रताप सिंह और शायर अनवर जलालपुरी

अपना तो मिले कोई का लोकार्पण लखनऊ में

मुम्बई के शायर देवमणि पांडेय के ग़ज़ल संग्रह ‘अपना तो मिले कोई’ का लोकार्पण पूर्व सांसद, साहित्यकार एवं उ.प्र. हिंदी संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष श्री उदय प्रताप सिंह ने किया। हिंदी संस्थान, हज़रतगंज, लखनऊ के प्रेमचंद सभागार में 9 फरवरी 2013 की शाम को आयोजित इस कार्यक्रम में प्रमुख अतिथि के रूप में बोलते हुए उदय प्रताप सिंह ने कहा कि हिंदी और उर्दू दरअसल एक ही भाषाएं हैं। राज दरबारों में बोली जाने वाली ज़बान को उर्दू नाम दिया गया जब कि समाज में बोली जाने वाली भाषा को हिंदी कहा गया। कवि देवमणि पांडेय की ग़ज़लों की ज़बान भी यही है। इसे आप चाहे हिंदी, चाहे उर्दू कह सकते हैं। इसी आम फ़हम ज़बान में पांडेयजी ने अपने समय और समाज की सच्चाइयों को असरदार तरीके़ से अभिव्यक्त किया है। 

कार्यक्रम के अध्यक्ष जाने-माने शायर जनाब अनवर जलालपुरी ने कहा कि देवमणि पांडेय की ग़ज़लों में एक तरफ़ तो गाँव की ज़िंदगी मुस्कराती है तो दूसरी तरफ़ शहरों का अजा़ब (दर्द) भी चहलकदमी करता दिखाई देता है। उन्होंने आगे कहा कि उर्दू के अधिकतर शायरों ने हिंदी में लिखना-पढ़ना सीख लिया है। अगर हिंदी के 25 प्रतिशत शायर भी उर्दू स्क्रिप्ट सीख लें तो दोनों ज़बानों में बहुत अच्छा तालमेल हो जाएगा और दोनों की तरक़्की़ होगी। देवमणि पांडेय ने उर्दू सीखकर इस दिशा में क़ाबिले-तारीफ़ काम किया है। 

डॉ.हारून रशीद, देवमणि पांडेय, अनवर जलालपुरी, हसन काज़मी, रशीद क़ुरेशी
कार्यक्रम की शुरूआत में कवयित्री नीतू सिंह ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की। नीतू जी ने देवमणि पांडेय की एक ग़ज़ल भी तरन्नुम में पेश की -

जो मिल गया है उससे भी बेहतर तलाश कर 
क़तरे में भी छुपा है समंदर तलाश कर

हाथों की इन लकीरों ने मुझसे यही कहा
अपनी लगन से अपना मुक़द्दर तलाश कर

शायर आमिर मुख़्तार ने भी देवमणि पांडेय की एक ग़ज़ल तरन्नुम में पेश की -

प्यासी ज़मीं थी और मैं बादल नहीं हुआ
इक ख़्वाब था मगर वो मुकम्मल नहीं हुआ

ख़ुशबू मेरी निगाह की तुझसे लिपट गई
क्या बात है कि दिल तेरा संदल नहीं हुआ

उर्दू माहनामा ला-रैब के सम्पादक जनाब रशीद कु़रेशी ने ‘अपना तो मिले कोई’ पर इज़हारे ख़याल करते हुए कहा कि देवमणि पांडेय की ग़ज़लें ऊपर से देखने में बेहद सरल और आसान लगती हैं लेकिन उनके भीतर गहरा अर्थ छुपा होता है। सहारा समय न्यूज़ चैनल के पत्रकार व शायर हसन काज़मी ने कहा कि देवमणि पांडेय की ग़ज़लें दिल से निकली हुई ग़ज़लें हैं और दिल को छूती हैं। । कथाकार दयानंद पांडेय, व्यंग्यकार सूर्यकुमार पांडेय और ईटीवी के वरिष्ठ सम्पादक-शायर तारिक़ क़मर ने भी कवि देवमणि पांडेय को बधाई दी। 

इस अवसर पर आयोजित कवि सम्मेलन-मुशायरे में हिंदी-उर्दू के प्रमुख कवियों-शायरों ने शिरकत की। प्रमुख अतिथि उदय प्रताप सिंह ने चुनिंदा शेर सुनाए- 

न मेरा है न तेरा है, ये हिंदोस्तान सबका है
नहीं समझी गई ये बात तो नुकसा़न सबका है

श्रोताओं की माँग पर देवमणि पांडेय को कई ग़ज़लें पेश करनी पड़ी। दो शेर देखिए-

सजा है इक नया सपना हमारे मन की आँखों में 
कि जैसे भोर की किरणें किसी आँगन की आँखो में

सुलगती है कहीं कैसे कोई भीगी हुई लकड़ी
दिखाई देगा ये मंज़र तुम्हें बिरहन की आँखों में

शायर अनवर जलालपुरी, रशीद क़ुरेशी, डॉ. मेराज साहिल, इमरान अनवारवी, आमिर मुख़्तार, इस्लाम फ़ैसल, अहमद फ़राज़, सलमान ज़फ़र, ओ.पी. तिवारी, मनोज श्रीवास्तव, जनेश्वर तिवारी और नीतू सिंह के कविता पाठ का श्रोताओं ने जमकर लुत्फ़ उठाया। सहारा समय न्यूज़ चैनल से जुड़े पत्रकार-शायर हसन काज़मी ने तरन्नुम में अपनी लोकप्रिय ग़ज़ल पेश की-

खू़बसूरत हैं आखें तेरी रातों को जागना छोड़ दे
खु़द बखु़द नींद आ जाएगी तू मुझे सोचना छोड़ दे

डॉ.हारून रशीद ने कार्यक्रम का रोचक संचालन किया। संयोजन वीरेंद्र नारायण सिंह ने और नराकास (लखनऊ) के अध्यक्ष संजय पांडेय ने आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम में अच्छी तादाद में लखनऊ महानगर के रचनाकार-पत्रकार और गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे। 

देवमणि पांडेय : 98210-82126

शनिवार, 12 जनवरी 2013

कवि विनोद कुमार शुक्ल को मुम्बई में परिवार पुरस्कार


परिवार काव्य उत्सव में कवि हरिओम पवार, तेजनारायण शर्मा, सुरेश नीरव, देवमणि पाण्डेय, डॉ. अनु सपन 

कविता को असाधारण और मर्मिक बना देती है करूणा 
मुंबई में शुक्रवार 4 जनवरी 2013 को आयोजित एक साहित्य संगम में जाने माने कवि विनोद कुमार शुक्ल को साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था 'परिवार' द्वारा परिवार पुरस्कार -2012 से नवाज़ा गया। शुक्लजी को यह पुरस्कार समारोह के अध्यक्ष श्री विष्णु खरे के हाथों प्रदान किया किया गया। पुरस्कार स्वरुप श्री शुक्ल को शाल, श्रीफल, स्मृतिचिन्ह के साथ एक लाख रूपये की धनराशि भेंट की गयी। वैसे तो इस समारोह में कई जाने माने साहित्यकार उपस्थित थे परंतु एक ही मंच पर साहित्य क्षेत्र की दो महान हस्तियों- विष्णु खरे और विनोद कुमार शुक्ल को एक साथ देखना वाकई एक सुखद अनुभव था। इस अवसर पर अपने विचार प्रकट करते हुए विष्णु खरे ने कहा कि कवि विनोद कुमार शुक्ल की यथार्थवादी दृष्टि में करूणा कुछ इस तरह प्रवाहित है कि वह इनकी कविता को असाधारण और मर्मिक बना देती है। उनके बिम्ब और भाषा हमारे समय की विसंगतियों को बहुत गहराई से सामने लाती है। इनकी रचनाओं मे निम्न मध्यवर्ग की त्रासदी, दुःख, यातना और हास्य बोध बहुत असरदार तरीके से अभिव्यक्त हुए हैं । 

परिवार पुरस्कार समारोह में शायर देवमणि पांडेय, कवि सुंदरचंद ठाकुर (सम्पादक नवभारत टाइम्स मुंबई), कवि विश्वनाथ सचदेव (सम्पादक नवनीत), कवि विष्णु खरे, कवि विनोद कुमार शुक्ल, संस्थाध्यक्ष रामस्वरूप गाडिया, उपाध्यक्ष निर्मल झुंझनूवाला,कवि नंदलाल पाठक और कथाकार धीरेंद्र अस्थाना (Photo : Manmohan Chaumal) 
सम्मान के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कवि विनोद कुमार शुक्ल ने कहा कि पुरस्कारों के रास्ते बहुत ऊबड़ -खाबड़ होते हैं लेकिन श्री विष्णु खरे के मार्ग प्रशस्त कर देने से मुझ जैसे छिप कर रहने वाले कवि को परिवार पुरस्कार से सम्मानित होने का अवसर प्राप्त हुआ। इस अवसर पर श्री विनोद कुमार शुक्ल ने अपनी चुनिंदा कवितायें सुना कर श्रोताओं को भाव विभोर कर दिया। प्रारंभ में निर्णायक मंडल के प्रतिनिधि के रूप में श्री नंद लाल पाठक ने कहा कि श्री विनोद कुमार शुक्ल अपनी कविता में व्यक्ति की स्वतंत्रता और महत्ता को कुशलता से रेखांकित करते हैं। इस अवसर पर संस्था के महामंत्री श्री सुरेशचन्द्र शर्मा के संपादन में प्रकाशित `परिवार काव्य स्मारिका` का विमोचन नवभारत टाइम्स के संपादक श्री सुंदर चंद ठाकुर ने किया। 

वरिष्ठ पत्रकार श्री विश्वनाथ सचदेव ने श्री विनोद कुमार शुक्ल की सादगी से गहरी बात कहने वाली कविताओं की प्रशंसा करते हुए इस बात को रेखांकित किया कि उन्होंने अपने दौर की कविता को परिभाषित किया। इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार एवं कथाकार श्री धीरेन्द्र अस्थाना विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित थे। परिवार के संस्थापक अध्यक्ष श्री राम स्वररूप गाड़िया ने आभार व्यक्त किया। सोमा बनर्जी द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना से कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। समारोह का संचालन श्री देवमणि पाण्डेय ने किया। कवि एवं पत्रकार श्री हरि मृदुल ने सत्कार मूर्ति विनोद कुमार शुक्ल के कृतृत्व पर आलेख प्रस्तुत किया। श्री निर्मल झुनझुनूवाला, श्री सुरेन्द्र गाड़िया, श्री राकेश मुरारका, श्री अशोक अग्रवाल श्री राजेन्द्र शाह और श्री राजीव नौटियाल ने अतिथियों का स्वागत किया ।समारोह में मुम्बई महानगर के प्रमुख लेखक, कवि, पत्रकार और गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

परिवार काव्य उत्सव 

मुंबई की कला, साहित्य और संस्कृति की प्रतिनिधि संस्था परिवार की ओर से शनिवार 5 जनवरी 2013 को काव्य उत्सव का आयोजन किया गया। बिरला मातुश्री सभागार में आयोजित इस कार्यक्रम में कवियों ने विविधतापूर्ण रचनाएं पेश की। इनके माध्यम से समाज में व्याप्त दिक्कतों पर हमला किया गया। हरिओम पंवार (मेरठ), तेजनारायण शर्मा बेचैन (मुरैना), सुरेश नीरव (ग़ाज़ियाबाद), देवमणि पाण्डेय (मुंबई) और डॉ. अनु सपन (भोपाल) ने गीत-ग़ज़ल, हास्य-व्यंग्य और समसामयिक कविताओं का पाठ किया। श्रोताओं ने देर रात तक इस कवि सम्मलेन का लुत्फ़ उठाया। काव्य उत्सव का संचालन देवमणि पाण्डेय ने किया।

देवमणि पांडेय : 98210-82126