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शुक्रवार, 26 जून 2020

संगीतकार नौशाद : मनवा मा कसक हुइबे करी


मुम्बई के बॉलीवुड में संगीतकार नौशाद 

संगीतकार नौशाद ऐसे ख़ुशनसीब इंसान थे जिन्होंने अपने कारनामों को ख़ुद इतिहास के पन्नों पर दर्ज होते देखा था। सन् 1940 की फ़िल्म ‘प्रेमनगर’ से लेकर सन् 2005 की 'ताजमहल' तक उन्होंने सिर्फ़ 66 फ़िल्मों में संगीत दिया। उनकी इन फ़िल्मों में से 4 हीरक जयंती, 7 स्वर्ण जयंती और 23 रजत जयंती मना चुकी हैं। 

सन् 1954 में फ़िल्म फेयर अवार्ड की शुरुआत हुई। पहला फ़िल्म फेयर अवार्ड नौशाद को फ़िल्म 'बैजू बावरा' के गीत "तू गंगा की मौज मैं जमुना का धारा" के लिए मिला। संगीतकार नौशाद की मुग़ल-ए-आज़म, मदर इंडिया, गंगा जमुना, राम और श्याम जैसी कई सुपर हिट संगीतमय फ़िल्मों ने लोकप्रियता का कीर्तिमान क़ायम किया। मगर नौशाद को दुबारा कोई फ़िल्म फेयर अवार्ड नहीं मिला। यह हैरत की बात है। इसकी ख़लिश नौशाद साहब के दिल ने भी महसूस की थी। मगर विदेश में उन्हें कई अवार्ड और सम्मान मिले।

जनवरी 2001 में मुंबई के 'परिवार काव्य उत्सव' में संगीतकार नौशाद मुख्य अतिथि थे। उन्हें लेने के लिए मैं कार्टर रोड बांद्रा स्थिति उनके आवास पर गया। उनकी कार में गपशप करते हुए हम लोग मरीन लाइंस के बिरला मातुश्री सभागार पहुंचे। इस सफ़र के दौरान संगीतकार नौशाद ने गुज़रे हुए दिनों को याद किया। संगीत के गिरते स्तर पर लगातार चिंता ज़ाहिर की।

गंगा जमुना में 
अवधी भाषा का कमाल 
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फ़िल्म 'गंगा जमुना' (1961) की कहानी के बैकग्राउंड को देखते हुए नौशाद ने तय किया कि गीतों की भाषा अवध की लोक भाषा पुरबिया रखी जाए। संगीत तैयार करते हुए उन्हें यह महसूस हुआ कि अगर फ़िल्म के संवाद भी पुरबिया ज़बान में रखे जाएं तो यह प्रयोग फ़िल्म की कामयाबी में अहम् रोल अदा कर सकता है। निर्देशक नितिन बोस ने उनकी बात मान ली। इस काम की ज़िम्मेदारी नौशाद के ही कंधों पर डाली गई। नौशाद ने बनारस से अपने एक पंडित दोस्त को बुलाया। पंडित जी की देखरेख में दिलीप कुमार और वैजयंती माला को पुरबिया ज़बान बोलने का अभ्यास कराया गया। इस फ़िल्म का गीत संगीत बेहद लोकप्रिय हुआ। दूसरी तरफ़ पुरबिया ज़बान के संवादों ने भी कामयाबी का अध्याय रच दिया। इस फ़िल्म में बेस्ट डायलॉग के लिए वजाहत मिर्ज़ा को, बेस्ट एक्ट्रेस के लिए वैजयंती माला को और बेस्ट सिनेमैटोग्राफी के लिए बाबा साहब को फ़िल्म फेयर अवार्ड मिला।

संगीत में सुर और 
शायरी का कमाल
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संगीतकार नौशाद अली ने हिन्दी सिनेमा को अविस्मरणीय संगीत से समृद्ध किया। हिंदुस्तानी सिने संगीत को लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचाने वालों में नौशाद का नाम बहुत आदर से लिया जाता है। अपने सात दशक के कैरियर में संगीत की चार पीढ़ियों के साथ काम करने वाले नौशाद ने सुर, शब्द और शायरी के मेल से ऐसे गीतों की रचना की जिनकी आभा से हिंदुस्तानी संगीत का ख़ज़ाना पूरी दुनिया में जगमगा उठा। 

नौशाद के संगीत में शास्त्रीय संगीत और लोक संगीत का अदभुत संगम है। वे अपनी तरह के अकेले ऐसे संगीतकार हैं जिनके नाम से फ़िल्में बिकती थीं। 'मुग़ल ए आज़म' हो या 'मदर इंडिया' नौशाद की हर फ़िल्म के पोस्टर पर बतौर संगीतकार उनका नाम नज़र आता था। फ़िल्म की कहानी सुनने के बाद ही नौशाद साहब संगीत देने का फ़ैसला करते थे। उन्होंने ख़ुद कई कहानियां भी लिखीं। फ़िल्म 'दीदार' नौशाद की कहानी पर बनी थीं।

नौशाद साहब ख़ुद शायर भी थे। अपने इसी हुनर के चलते उन्होंने अपनी फ़िल्मों में कभी दोयम दर्जे की रचनाएं नहीं लीं। उन्होंने अपनी फ़िल्मों में शकील बदायूंनी और मजरुह सुल्तानपुरी जैसे अच्छे शायरों से ही गीत लिखवाए। संगीतकार नौशाद के साहबज़ादे  रहमान नौशाद ने बताया  कि नौशाद साहब अपने गीतकार को कभी भी रेडीमेड ट्यून नहीं देते थे क्योंकि वे गीतकार को किसी बंदिश में क़ैद करना नहीं चाहते थे। "मेरे महबूब तुझे मेरी मोहब्बत की क़सम" नज़्म को लिखने के लिए उन्होंने शकील बदायूंनी को कई दिन का समय दिया। इसे एक शायर की तरह ख़ूबसूरती से पेश करने के लिए मो.रफ़ी को कई दिन रिहर्सल कराया।



नौशाद के नए प्रयोग
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फ़िल्म ‘गंगा जमुना’ (1961) में संगीतकार नौशाद ने पहली बार अवधी भाषा में गीत लिखवाने का जोख़िम उठाया। इस फ़िल्म का गीत ‘नैन लड़ि जइहैं तो मनवा मा कसक हुइबे करी’ बेहद लोकप्रिय हुआ। हिन्दी फ़िल्मों में बैकग्राउंड संगीत का जादू जगाने का श्रेय नौशाद को जाता है। इसके लिए उनकी ‘राम और श्याम’, ‘पाकीज़ा’, ‘मुगले आज़म’ आदि फ़िल्में देखी जा सकती हैं। सन् 1968 में ग़ुलाम मुहम्मद के इंतक़ाल के बाद कमाल अमरोही की गुज़ारिश पर फ़िल्म 'पाकीज़ा' का बैकग्राउंड म्यूजिक नौशाद ने तैयार किया था।

‘पाकीज़ा’ (1972) में कई जगह बैकग्राउंड में एक ख़ास धुन के साथ रेल की सीटी की आवाज़ उभरती है। इसका नायिका के दिमाग़ पर गहरा असर दिखाई देता है। बैकग्राउंड संगीत के ज़रिये लखनऊ का असरदार माहौल भी उभारा गया। फ़िल्म ‘मुगले आज़म’ (1960) का वह सीन याद कीजिए जिसमें दिलीप कुमार और मधुबाला एक-दूसरे में खोये हुए हैं। अचानक पृथ्वीराज कपूर की इंट्री होती है। नायक-नायिका दोनों दो दिशाओं में भागते हैं। इस सीन में जो बैकग्राउंड म्यूज़िक बजता है वह बेमिसाल है। फ़िल्म ‘राम और श्याम’ (1967) में जहां कहीं भी खलनायक प्राण की ‘एंट्री’ होती है वहीं बैकग्राउंड में सिहरन पैदा करने वाला संगीत उभरता है।



अपने संगीत में नया प्रयोग करने में नौशाद कभी नहीं हिचकिचाए। राजकपूर हमेशा मुकेश की आवाज़ को अपनी आवाज़ कहते रहे। संगीतकार नौशाद ने इसके उलट उनके लिए मो.रफी की आवाज़ का उपयोग किया। फ़िल्म ‘अंदाज़’ (1949) में दिलीप कुमार के लिए सारे गाने मुकेश ने गाए। मगर राजकपूर का इकलौता गीत मो.रफी की आवाज़ में रिकार्ड किया गया। गीत को पसंद किया गया। फ़िल्म ‘आन’ (1952) में सौ वादकों के आर्केस्ट्रा का पहली बार नौशाद ने ही प्रयोग किया। मगर 'मेरे महबूब तुझे…' नज़्म के लिए उन्होंने सिर्फ़ चार म्यजीशियन का उपयोग किया। फ़िल्म मुग़ल ए आज़म के गीत 'ऐ मोहब्बत तू ज़िंदाबाद' गीत के लिए नौशाद ने समूह गान यानी कोरस के लिए सौ आवाज़ों का उपयोग किया। ‘सुहानी रात ढल चुकी’ जैसे कई गीतों में उन्होंने घड़े की सुमधुर आवाज़ का जैसा ख़ूबसूरत इस्तेमाल किया वह अपने आप में बेमिसाल है। 



बॉलीवुड में 

लखनऊ के नौशाद 
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लखनऊ में उस्ताद हुरमत अली की वाद्य यंत्रों की दुकान थी। दुकान खुलने से पहले नौशाद यहां साफ़ सफ़ाई का काम करते थे। एक दिन उस्ताद दुकान पर पहुंचे तो उन्हें हारमोनियम की आवाज़ सुनाई पड़ी। नौजवान नौशाद को हारमोनियम बजाता देखकर वे दंग रह गए। मगर वे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने नौशाद को एक हारमोनियम भेंट किया।

वह मूक फ़िल्मों का ज़माना था। फ़िल्म शुरू होने से पहले और फ़िल्म के सीन के अनुसार साजिंदों का समूह सिनेमा हॉल के परदे के पीछे संगीत पेश करता था। लखनऊ के एक सिनेमा हॉल में उस्ताद लड्डन खां के ग्रुप के साथ नौशाद ने हारमोनियम बजाना शुरू कर दिया। वालिद को पता चला तो बेहद नाराज़ हुए। घर से निकालने की धमकी दी। नौशाद के अंदर संगीत की ऐसी दीवानगी थी कि सन् 1937 में वे महज 18 साल की उम्र में अकेले मुंबई चले आए। 


दादर में ब्रॉडवे सिनेमा के सामने फुटपाथ पर एक पान की दुकान थी। पानवाला रात में दुकान बंद करके  घर चला जाता था। नौशाद वहीं पान वाले के बाकड़े पर अपना बिस्तर लगा लेते। इसी तरह वे कई दिन फुटपाथ पर सोए। एक दिन गीतकार डी एन मधोक उनको कारदार स्टूडियो ले गए। कारदार साहब ने कहा- ये नौजवान तो कमसिन है। संगीत कैसे देगा! अगली फ़िल्म में देखेंगे। डी एन मधोक तैश में आ गए। बोले- आप मेरे गीत, पटकथा और संवाद के पैसे गिरवी रख लीजिए मगर इस नौजवान को काम दीजिए। 



नौशाद को करदार स्टूडियो में काम मिल गया। उन्होंने अपनी पहली फ़िल्म 'प्रेम नगर' (1940) में संगीत दिया। निर्माता जैमिनी की फ़िल्म 'रतन' (1944) में नौशाद ने लोक संगीत और शास्त्रीय संगीत के मेल से ऐसा सुरीला संगीत तैयार किया कि पूरे हिंदुस्तान में धूम मच गई। इस फ़िल्म में ज़ोहरा बाई अम्बाले वाली, अमीर बाई कर्नाटकी, करन दीवान और श्याम कुमार के गाए गीत बेहद लोकप्रिय हुए। इसके बाद नौशाद ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने लगातार कामयाबी का सफ़र तय किया।

मुग़ल ए आज़म के तानसेन
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फ़िल्म 'मुग़ल ए आज़म' (1960) के निर्देशक के आसिफ़ ने संगीतकार नौशाद से कहा कि दिलीप कुमार और मधुबाला के प्रेम को दर्शाने के लिए दो गाने रिकॉर्ड करने हैं। इनका फिल्मांकन मियां तानसेन पर किया जाएगा। कोई ऐसा गायक चाहिए जो गीत के शब्दों में जान डाल दे। नौशाद साहब बोले- आज के तानसेन तो बड़े ग़ुलाम अली खां हैं मगर वे फ़िल्मों के लिए नहीं गाते। के आसिफ़ ने कहा- मैं उन्हें मना लूंगा। दोनों बड़े ग़ुलाम अली खां के पास गए। खां साहब ने फ़रमाया- मैं एक गीत गाने के लिए 25 हज़ार मुआवज़ा लेता हूं। के आसिफ़ ने जेब से 25 हज़ार रूपये की गड्डी निकाली। बोले- खां साहब, यह एक गाने का एडवांस है। आपको दो गीत गाने हैं। खां साहब तैयार हो गए। 'प्रेम जोगन बनके' और 'शुभ दिन आयो' गीत ने बड़े ग़ुलाम अली खां की आवाज़ में फ़िल्म मुग़ल ए आज़म के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया। नौशाद साहब के बड़े बेटे रहमान नौशाद ने बताया कि उस समय लता मंगेशकर और मो.रफ़ी जैसे बड़े-बड़े गायकों को पांच सौ रूपये भी नहीं मिलते थे। 

नौशाद से जुड़े 
कुछ रोचक क़िस्से
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(1)
बारह साल की उम्र में नौशाद अपने मामू की के साथ बाराबंकी के देवा शरीफ़ के सालाना उर्स (मेले) में गए थे। मामू ने हिदायत दी थी कि एक पल के लिए भी साथ नहीं छोड़ना। हजारों की भीड़ है। मेले में खो जाओगे तो मैं तुम्हारे वालिद को क्या जवाब दूंगा। रात बारह बजे बांसुरी की सुरीली धुन सुनकर नौशाद अपनी सुधबुध खो बैठे। बेख़ुदी में चलते हुए वे दरगाह के दरवाज़े पर पहुंच गए। वहां एक बुज़ुर्ग बांसुरी बजा रहे थे। गाल पर मामू का थप्पड़ पड़ा तो उन्हें होश आया। यहीं से संगीत के साथ नौशाद का रूहानी रिश्ता जुड़ गया।

(2)
नौशाद के वालिद वाहिद अली साहब को गाना बजाना नापसंद नहीं था। संगीतकार नौशाद ने  फ़िल्मों में काम शुरू किया तो अपनी मां को अपना राज़दार बनाया। एक दिन मां का ख़त आया कि सूफ़ी ख़ानदान की एक लड़की से नौशाद का रिश्ता जोड़ दिया गया है। वे लोग गाना बजाना पसंद नहीं करते। इसलिए लड़की के घरवालों को बताया गया है कि लड़के की बम्बई में दर्ज़ी की दुकान है। बारात के समय जब नौशाद साहब घोड़ी पर बैठे तो बैंडबाजा वाले फ़िल्म ‘रतन’ का उन्हीं का गीत बजा रहे थे- "अखियां मिला के, जिया भरमा के, चले नहीं जाना"। इस गीत पर लड़के लड़कियां नाचने लगे तो नौशाद साहब के वालिद ने ग़ुस्से में कहा- किस कमबख़्त ने ये गाना बनाया है जो लड़के लड़कियों को बरबाद कर रहा है।


(3)
कुंदनलाल सहगल बिना शराब पिये नहीं गाते थे। नौशाद ने फ़िल्म ‘शाहजहां’ (1946) के गीत ‘जब दिल ही टूट गया’ को सहगल से बिना शराब पिए गवाया। सहगल ने गीत सुना तो उनकी आंखों में आंसू गये। उन्होंने कहा, ‘नौशाद तुम मुझे कुछ साल पहले क्यों नहीं मिले ? अगर तुम पहले मिल गये होते तो मैं कुछ साल और जी लेता’। सहगल को यह गीत इतना अधिक पसंद था कि उन्होंने वसीयत कर दी थी कि मेरे जनाज़े के साथ यह गीत ज़रुर बजाया जाए।

(4)
फ़िल्म 'बैजू बावरा' (1952) के गाने ‘ओ दुनिया के रखवाले' ने पूरे हिंदुस्तान में धूम मचा दी। नौशाद साहब ने इस गाने के लिए मो.रफ़ी से इतनी मशक्क़त करवाई थी कि उनका गला बैठ गया। इसके बाद मो. रफ़ी ने कई दिनों तक कोई गीत नहीं गाया।

फ़िल्म संगीत की 
बदलती फ़िज़ा
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संगीतकार नौशाद कभी भी फ़िल्मों के पीछे नहीं भागे। वह एक साल में एक-दो से ज़्यादा फ़िल्मों में संगीत नहीं देते थे। इसका फ़ायदा यह हुआ कि उन्हें अपना हुनर दिखाने का पूरा समय मिला। वे फ़िल्म के दृश्य के अनुसार पहले राग चुनते थे बाद में धुन बनाते थे। उन्होंने कभी किसी की नकल नहीं की। 

नौशाद के संगीत निर्देशन में सुरैया, शमशाद बेगम, लता मंगेशकर, आशा भोसले, मो.रफी, मुकेश, महेन्द्र कपूर के.एल. सहगल जैसे कई गायक-गायिकाओं ने अपने कैरियर के बेहतरीन गीत गाये। नौशाद के पांच सहायक थे। कैरियर के सुनहरे मोड़ पर नौशाद अपने प्रमुख सहायक ग़ुलाम मुहम्मद की मौत से कहीं भीतर तक हिल गये। इस हादसे का असर उनके संगीत पर भी हुआ।



उस दौर में नौशाद की ‘गंवार’, ‘तांगेवाला’, ‘आईना’, ‘धरम कांटा’, ‘लव एंड गॉड’ जैसी कई फ़िल्में प्रदर्शित हुईं। इन फ़िल्मों का संगीत पहले की तरह लोकप्रिय नहीं हुआ। टीवी सीरियल ‘दि सोर्ड अॉफ टीपू सुल्तान’ और 'अकबर दि ग्रेट' में उनकी निजी शैली की छाप ज़रुर दिखायी दी। सन् 2005 में नौशाद ने अकबर ख़ान की फ़िल्म ''ताजमहल : ए इटरनल लव स्टोरी'' के लिए संगीत दिया। गीतकार थे नक़्श लायलपुरी। इसमें भी उनका पहले वाला जादू नहीं दिखाई पड़ा।

धीरे धीरे फ़िल्म संगीत की फ़िज़ा इतनी बदल गई कि उसमें नौशाद जैसे हुनरमंद संगीतकारों की ज़रुरत समाप्त होने लगी। यह मंज़र देखते हुए नौशाद साहब ने ख़ुद ही अपने संगीत का जाल समेट लिया। उनकी सक्रियता समारोहों तक सीमित रह गयी जहां वे अपने भाषणों में संगीत की गिरावट पर चिंता ज़ाहिर करते रहे और गीतों की फूहड़ शब्दावली की निंदा करते रहे। संगीतकार नौशाद ने उस दिन के समारोह में कहा था- हर चीज़ का अपना समय होता है। हमेशा बुरे समय के बाद अच्छा समय भी आता है। मुझे विश्वास है कि अच्छे गीत संगीत का ज़माना फिर लौटेगा। उन्होंने अपने इन अशआर के साथ अपनी बात पूरी की थी-

अभी साज़ ए दिल में तराने बहुत हैं
अभी ज़िंदगी के बहाने बहुत हैं

दर ए ग़ैर पर भीक मांगो न फ़न की 
जब अपने ही घर में ख़ज़ाने बहुत हैं 

नए गीत पैदा हुए हैं उन्हीं से,
जो पुरसोज़ नग़मे पुराने बहुत हैं 

हैं दिन बदमज़ाकी के नौशाद लेकिन 
अभी तेरे फ़न के दीवाने बहुत हैं


नौशाद साहब एक हस्सास शायर भी थे। उनका शेरी मज्मूआ 'आठवां सुर' नाम से प्रकाशित हुआ। कभी कभी वे मुशायरों में भी शिरकत करते थे। उनकी यह ग़ज़ल मुशायरों में काफ़ी पसंद की गई -

आबादियों में दश्त का मंज़र भी आएगा 
गुज़रोगे के इस गली से तो मेरा घर भी आएगा

दादा साहब फाल्के अवार्ड (1981) से सम्मानित पद्मभूषण संगीतकार नौशाद का जन्म 26 दिसंबर 1919 को लखनऊ में हुआ था। 5 मई 2006 को मुंबई में उनका इंतक़ाल हुआ। अपने पीछे नौशाद संगीत का ऐसा ख़ज़ाना छोड़ गए हैं जो हमेशा हमारे दिलों को सुकून पहुंचाता रहेगा। हमारी धड़कनों में धड़कता रहेगा। हमारी सांसों में ज़िंदा रहेगा।

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आपका-
देवमणि पाण्डेय 

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, 
कन्या पाड़ा, गोकुलधाम,
फ़िल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व,
मुम्बई-400063, M : 98210-82126 
devmanipandey.blogspot.com
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सोमवार, 22 जून 2020

गायक भूपेंद्र मीताली : शम्मा जलाए रखना



मुम्बई में 
भूपेंद्र मीताली 
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संगीतकार मदन मोहन ने दिल्ली की एक घरेलू महफ़िल में एक नौजवान को गिटार बजाते और गाते देखा था। सन् 1964 में चेतन आनंद की फ़िल्म ;हक़ीक़त' का एक गीत गाने के लिए उन्होंने इस नौजवान को मुंबई बुलाया। इसे एक आश्चर्यजनक घटना के रूप में देखा गया। मदन मोहन को इस नौजवान की प्रतिभा पर यक़ीन था। मो. रफ़ी के साथ इस नौजवान ने गीत गाया- होके मजबूर मुझे उसने भुलाया होगा। रातों रात यह नौजवान बॉलीवुड में भूपेंद्र सिंह के नाम से मशहूर हो गया। भूपेंद्र वापस दिल्ली लौट गए। फ़िल्म 'हक़ीक़त' का यह गीत लोकप्रिय हो गया। दोस्तों ने दबाव डाला कि उन्हें अपनी प्रतिभा के उचित इस्तेमाल के लिए मुंबई जाना चाहिए। आख़िर भूपेंद्र मुंबई वापस लौटे। 

मुम्बई में म्यूज़िकल हीरो भूपेंद्र
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भूपेंद्र की शख़्सियत से चेतन आनंद इतने प्रभावित थे कि उन्होंने फ़िल्म 'आख़िरी ख़त' में भूपेंद्र को एक म्यूज़िकल हीरो के रूप में काम करने का प्रस्ताव दिया। भूपेंद्र को लगा कि वे सिर्फ़ संगीत के लिए बने हैं। अभिनय का प्रस्ताव उन्होंने विनम्रता से अस्वीकार कर दिया। फ़िल्म  'आख़िरी  ख़त' में  संगीतकार ख़य्याम ने उनसे सोलो गीत गवाया- "रुत जवां जवां रात मेहरबां"।  चेतन आनंद ने कैफ़ी आज़मी के लिखे इस गीत को भूपेंद्र पर फ़िल्माया।  दुबले-पतले, लम्बे नौजवान गायक भूपेंद्र को गिटार बजाकर एक पार्टी में इस पार्टी सांग को गाते हुए देखना बड़ा मज़ेदार लगता है।  इसके साथ ही भूपेंद्र ने मुंबई को और मुंबई ने उनको हमेशा के लिए अपना बना लिया।

भूपेंद्र को हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के साथ ही पाश्चात्य संगीत की गहरी समझ है। दोनों के तालमेल से अपनी गायिकी और संगीत रचना में उन्होंने अद्भुत असर पैदा किया। सोज़, सुर और शोख़ी में भीगी हुई उनकी आवाज़ फ़ौरन दिल की गहराइयों में उतर जाती है। 

भूपेंद्र को वाद्य यंत्रों की भी अच्छी जानकारी है। कैरियर की शुरुआत में उन्होंने गिटार और वायलिन से फ़िल्म संगीत को सजाया। उन्हें एक बेहद मुश्किल वाद्य 'रबाब' बजाने के लिए बुलाया जाता था। संगीतकार कुलदीप सिंह के अनुसार भूपेंद्र ने 'रबाब' को बहुत ऊंचे स्तर पर पहुंचा दिया। उनके बाद दूसरा कोई उस स्तर को नहीं छू पाया तो फ़िल्म संगीत में 'रबाब' का बजना ही बंद हो गया। एक गायक के रूप में कामयाब होने के बाद भूपेंद्र ने वाद्य यंत्रों से विदा ले ली। जिन गीतों में उनके गिटार की तरंग है उसे सुनकर आज भी दिल के तार झंकृत हो जाते हैं ऐसे चंद गीत हैं- 

दम मारो दम (हरे रामा हरे कृष्णा) 
वादियां मेरा दामन (अभिलाषा) 
चुरा लिया है तुमने (यादों की बारात)
चिंगारी कोई भड़के (अमर प्रेम)
महबूबा ओ महबूबा (शोले) 
तुम जो मिल गए हो (हंसते ज़ख़्म)

 मेरी आवाज़ ही पहचान है
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भूपेंद्र की आवाज़ का जादू आज भी बरकरार है। उनकी आवाज़ में वह 'ख़रज़' है जिससे श्रेष्ठ गायकी का आधार माना जाता है। ज़बरदस्त रियाज़ से भूपेंद्र ने अपनी आवाज़ को इस तरह ढाला है कि एक बार सुनने के बाद उनकी आवाज़ हमेशा के लिए याद रह जाती है। यह कहा जाता है कि उनकी आवाज़ ही उनकी पहचान है। भूपेंद्र एक ऐसे बहुआयामी गायक हैं जिनसे किसी भी रंग के गीत गवाए जा सकते हैं।

भूपेंद्र का जन्म अमृतसर में 6 फरवरी 1940 को हुआ। पिता प्रो नत्था सिंह मशहूर गायक थे। वे पंजाबी क्लासिकल गाते थे। भूपेंद्र को संगीत की प्रारंभिक शिक्षा पिताजी से मिली। बचपन दिल्ली में बीता। शिक्षा भी यहीं हुई। यहां उन्होंने उस्ताद के एल तहीन से शास्त्रीय संगीत सीखा। भूपेंद्र बचपन से ही गिटार बजाते थे। अपने छात्र जीवन में वे दिल्ली और आसपास के इलाक़ों में गिटार वादक के रूप में बहुत लोकप्रिय थे। मंच पर गिटार बजाने के साथ ही वे शास्त्रीय गायन भी करते थे। बचपन से ही उनको संगीत रचना का भी शौक़ था। भूपेंद्र के दिलों दिमाग़ पर संगीत का ऐसा असर हुआ कि उन्होंने मैट्रिक के बाद पढ़ाई छोड़ दी। पूरी तरह संगीत के होकर रह गए। मगर उनके मन में व्यवसायिकता नहीं थी। वे मंचों पर निशुल्क कार्यक्रम देते थे। 

किसी नज़र को तेरा इंतज़ार
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भूपेंद्र के पास प्रतिभा और आत्मविश्वास का ख़ज़ाना था। इसलिए कभी उनके पांव में संघर्ष के छाले नहीं पड़े। उनके गिटार और वायलिन का फ़िल्म संगीत ने तहे दिल से स्वागत किया। एक मशहूर शख़्सियत बनने में उन्हें ज़्यादा समय नहीं लगा। उस समय की एकमात्र संगीत कंपनी एचएमवी ने 1967 से 1974 के दौरान उनके तीन ईपी रिकॉर्ड जारी किए। सन् 1975 में एचएमवी ने उनका पहला एलपी रिकॉर्ड जारी किया- विद लव फ्रॉम भूपेंद्र। इस रिकॉर्ड ने संगीत प्रेमियों के दिल के तार उनकी गायकी से जोड़ दिए। संगीत के क्षितिज पर भूपेंद्र नाम का एक सितारा रोशन हो गया।

फ़िल्म जगत के संगीतकारों ने बड़ी जल्दी परख लिया कि भूपेंद्र सिंह के रूप में उन्हें एक हीरा मिल गया है। बॉलीवुड के सुरुचि संपन्न संगीतकारों ने इस प्रतिभा का उपयोग किया। परिचय, किनारा, मौसम, गृह प्रवेश, आख़िरी ख़त, घरौंदा, दूरियां, बाज़ार आदि फ़िल्मों के ज़रिए यह कशिश भरी आवाज़ माहौल पर जादू बन कर छा गई। युवा संगीतकार बप्पी लहरी ने फ़िल्म 'एतबार' में इस आवाज़ के इस्तेमाल से ज़बरदस्त लोकप्रियता हासिल की- "किसी नज़र को तेरा इंतज़ार आज भी है"। 

पंचम दा यानी आरडी बर्मन से भूपेंद्र की गहरी दोस्ती थी। पंचम दा के साथ उन्होंने इतना ज़्यादा काम किया कि दूसरों के साथ काम करने का समय बहुत कम मिला। भूपेंद्र का कहना है कि मदन मोहन ने गायक के रूप में उनको जन्म दिया। पंचम दा ने परवरिश की। नौशाद, ख़य्याम, जयदेव, राम लक्ष्मण और सपन जगमोहन ने उन्हें संवारा निखारा और बड़ा किया।

राहों पे नज़र रखना 
होठों पे दुआ रखना
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भूपेंद्र ग़ज़ल को निहायत व्यक्तिगत चीज़ मानते हैं। इसलिए सार्वजनिक मंच पर ग़ज़ल गाने का इरादा नहीं था। सन् 1983 में मीताली को उन्होंने जीवन साथी बनाया। मीताली कई साल से ग़ज़ल गाती थीं। वे भूपेंद्र को मंच पर ले आईं। देखते ही देखते इस ख़ूबसूरत जोड़ी ने ग़ज़ल के कैनवास पर नया शोख़ रंग भर दिया। भूपेंद्र और मीताली की आवाज़ में शायर क़तील राजस्थानी की ग़ज़ल ने अपार लोकप्रियता हासिल की।

राहों पे नज़र रखना, होठों पे दुआ रखना
आ जाए कोई शायद दरवाज़ा खुला रखना 

मीताली की आवाज़ में क़तील राजस्थानी की एक और दर्दभरी ग़ज़ल बेहद पसंद की गई। मीताली की गायिकी में कितनी कशिश है इसका अंदाज़ा इसे सुनने के बाद लगाया जा सकता है।
  
आ जाए किसी दिन तू ऐसा भी नहीं लगता
लेकिन वो तेरा वादा झूठा भी नहीं लगता
मिलता है सुकूं दिल को बस यार के कूचे में
हर रोज़ मगर जाना अच्छा भी नहीं लगता

'दरवाज़ा खुला रखना' और 'आ जाए किसी दिन तू' दोनों ग़ज़लों का मीटर एक है। यानी दोनों ग़ज़लें एक ही धुन में गाई जा सकती हैं। मगर ग़ज़लों के मूड के हिसाब से भूपेंद्र ने दोनों की अलग-अलग धुनें बनाईं। दोनों में अलग-अलग रिदम का इस्तेमाल किया। अलग वाद्य यंत्रों का संयोजन किया। अपने इस ख़ूबसूरत कारनामे से भूपेंद्र ने साबित किया कि वे एक अच्छे गायक होने के साथ-साथ एक अच्छे कंपोज़र भी हैं।

भूपेंद्र अपना अलग अंदाज़ लेकर आए थे। उन्होंने कभी किसी का अनुकरण नहीं किया। उन्होंने संजीदा ग़ज़लें गाईं मगर श्रोताओं की पसंद को देखते हुए ऐसी ग़ज़लें भी पेश कीं जिनमें शोख़ी़, शरारत और मुहब्बत थी। मंच पर मीताली के साथ उन्होंने ग़ज़ल की जो दास्तान बयां की उसने उन्हें देश विदेश में लोकप्रिय बना दिया। भूपेंद्र को हमेशा यह फ़िक्र रही कि जो इंसान पैसा ख़र्च करके उन्हें सुनने आता है उसे ख़ुश करना उनकी ज़िम्मेदारी है। पूरी दुनिया में संगीतरसिक प्यार-मुहब्बत और छेड़छाड़ वाली ग़ज़लें बहुत पसंद करते हैं।

भूपेंद्र मीताली की प्रेम कथा
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मीताली बांग्लादेश की हैं। उनके घर का माहौल बहुत संगीतमय था। सारे भाई बहन गाते थे। दूसरों के गायन को बहुत उदात्त भावना से सुनते थे। मीताली ने पहली बार 1976 में रेडियो पर भूपेंद्र को एक बंगाली गीत गाते हुए सुना। उन्होंने इतनी अलग क़िस्म की आवाज़ पहले कभी नहीं सुनी थी। वह आवाज़ उनके दिल में उतर गई। मीताली उस आवाज़ की फैन हो गईं। मीताली ने सोचा नहीं था कि वे कभी मुंबई जाएंगी और भूपेंद्र से मुलाक़ात होगी। मीताली को संगीत की स्कॉलरशिप मिली। संगीत में एम ए करने के लिए वे बड़ोदा गईं। वहां सहपाठियों में संगीत चर्चा होती तो गिने-चुने अच्छे गायकों में अक्सर भूपेंद्र का नाम सामने आ जाता।

हॉस्टल की वार्डन उर्मिला ढोलकिया के साथ सन् 1978 में मीताली मुंबई घूमने आईं। यहां दूरदर्शन में उन्होंने आरोही कार्यक्रम में भाग लिया। उसी दौरान उनका एक शो तेजपाल हाल में हुआ। वहां संगीतकार जयदेव और गायक भूपेंद्र सिंह मुख्य अतिथि थे। मीताली को यक़ीन नहीं हो रहा था कि भूपेंद्र के सामने वे मंच पर गा रहीं हैं। भूपेंद्र को इस सांवली सलोनी बंगाली बाला का गाना पसंद आया। अहमदाबाद में मीताली के कई कार्यक्रम हुए। कभी-कभी वहां भी भूपेंद्र अतिथि के रूप में मौजूद रहते। मीताली जब मुंबई आतीं तो वे भूपेंद्र से मुलाक़ात करतीं। धीरे धीरे ये मुलाक़ातें मुहब्बत में बदल गईं।

पति के रूप में इतने प्रतिष्ठित गायक को पाना मीताली अपना सौभाग्य मानती हैं। एक गृहिणी की ज़िम्मेदारी संभालने में उन्हें परेशानियां भी हुईं। भूपेंद्र ने हमेशा उनका साथ निभाया। उन्हें हौसला दिया कि तुम कुछ भी करो मगर दिमाग़ में गाना होना चाहिए। मीताली को लगता था कि वे कभी कंपोजीशन नहीं कर सकतीं। भूपेंद्र के प्रोत्साहन से उन्होंने कई गीतों का संगीत तैयार किया। ख़ुद उनकी संगीत रचना में उनका एक बंगाली अलबम जारी हुआ। मीताली ने बताया- भूपेंद्र बहुत अच्छे प्रेमी साबित हुए। दोनों में कभी-कभी नोंक झोंक भी हो जाती है क्योंकि यह ज़िंदगी का ज़रूरी हिस्सा है। भूपेंद्र सबके बारे में सोचते हैं। सबकी परेशानी बाँटते हैं। भूपेंद्र में कमाल का आत्मविश्वास है। कितना भी गला ख़राब हो मगर माइक के सामने खड़े होते ही उनका गला खुल जाता है।

शम्मा जलाए रखना 
जब तक कि मैं न आऊं
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दर्द भरी ग़ज़लों में रिदम धीमा होता है। दूसरे रंग की ग़ज़लों में भूपेंद्र रिदम का अंदाज़ बदल देते हैं। उन्हें पता है कि श्रोताओं के लिए ग़ज़ल मनोरंजन है। इसलिए भूपेंद्र ने शराब  पर भी ग़ज़लें गाईं। मगर वे सुरुचि का हमेशा ध्यान रखते हैं। अच्छी शायरी और अच्छी गायकी के प्रति पूरी तरह समर्पित हैं। देश विदेश के मंचो पर भूपेंद्र मीताली की जोड़ी को बेहद लोकप्रियता हासिल हुई। श्रोता जो सोचते हैं, जो पसंद करते हैं, भूपेंद्र मीताली वही गाते हैं। उनकी ग़ज़लों में श्रोताओं के दिलों की धड़कनें शामिल होती है। मंच पर वे श्रोताओं के साथ बहुत आत्मीयता से पेश आते हैं। श्रोता भी उनको अपना दोस्त समझते हैं। कार्यक्रम के बाद वे श्रोताओं से मिलते हैं। उनसे बात करते हैं। दो-तीन बार ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं कि भूपेंद्र मीताली को सुनने के बाद पति पत्नी ने तलाक़ का विचार त्याग दिया। शायर सईद राही की लिखी ग़ज़ल को पति पत्नी बेहद पसंद करते हैं-

शम्मा जलाए रखना जब तक कि मैं न आऊं
ख़ुद को बचाए रखना जब तक कि मैं न आऊं
हम तुम मिलेंगे ऐसे ... जैसे जुदा नहीं थे 
सांसे बचाए रखना जब तक कि मैं न आऊं

ग़ज़ल का आकर्षण न कभी कम हुआ और न होगा। भूपेंद्र ने हमेशा अपनी पसंद की ही ग़ज़लों का चयन किया। इसलिए उनके हर अलबम में दो तीन नए शायर मिल जाएंगे। वे मानते हैं कि फ़िल्मी गाना हक़ीक़त से दूर हो सकता है मगर ग़ज़ल ज़िंदगी की असलियत है। ग़ज़ल में पुख़्ता शायरी होती है। ग़ज़ल हमारी संस्कृति का हिस्सा है। इसलिए ज़िंदा है। ग़ज़ल आने वाली सदियों तक ज़िंदा रहेगी। शास्त्रीय संगीत की ही तरह ग़ज़ल भी शाश्वत है। उसका रिश्ता दिलों से है। वह जज़्बात भरे दिलों में हमेशा ज़िंदा रहेगी।

गीतकार गुलज़ार के कई सिने गीत भूपेंद्र की आवाज़ में बेहद लोकप्रिय हुए। गुलज़ार के साथ उनकी बहुत अच्छी दोस्ती है। भूपेंद्र ने गुलज़ार का एक सोलो अलबम भी रिकॉर्ड किया- 'अक्सर'। इसमें उन्होंने मीताली के साथ उनकी ग़ज़लें और नज़्में गाईं। भूपेंद्र का कहना है- "जहां से दूसरे लोग सोचना बंद कर देते हैं वहां से गुलज़ार साहब सोचना शुरू करते हैं।" विदेशों में लोग उनसे अभी भी गुलज़ार के इस गीत की फ़रमाइश करते हैं- 

एक अकेला इस शहर में रात में और दोपहर में
आबोदाना ढूंढ़ता है आशियाना ढूंढता है

कल आज और कल का संगीत 
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पहले स्टूडियो में गीत की लाइव रिकॉर्डिंग होती थी। सारे म्यूजीशियंस हॉल में एक साथ बैठते थे। कभी-कभी उनकी संख्या सौ तक हो जाती थी।  भूपेंद्र का कहना है कि वे बहुत ध्यान से बजाते थे। उनकी क्वालिटी बहुत अच्छी होती थी। उनके सामने खड़े होकर गाने में गायक को बहुत आनंद आता था। उस रिकॉर्डिंग में फीलिंग बहुत ज़्यादा थी। अब एक छोटे से कमरे में रिकॉर्डिंग होती है। म्यूजीशियन अपना पीस बजा कर चला जाता है। उसे पता ही नहीं होता कि गाने के बोल क्या हैं। गायक कौन है। इसलिए पहले जैसी फीलिंग आज नहीं आ पाती।

भूपेंद्र के अनुसार टीवी चैनलों पर ऐसा संगीत नहीं है जो नई पीढ़ी में अच्छे संगीत के प्रति लगाव पैदा कर सके। ऐसा संगीत आज दुर्लभ है जो नई पीढ़ी को अपने पैरों पर खड़ा होने का आधार दे सके। मगर जब तक गायकों में अच्छा गाने की लगन है और श्रोताओं में अच्छा सुनने का शौक़ है तब तक संगीत हमेशा जिंदा रहेगा। भूपेंद्र मीताली के कार्यक्रम में 50 प्रतिशत किशोर और युवा होते हैं। जब वे संजीदा ग़ज़लों की फ़रमाइश करते हैं तो भूपेंद्र हैरान हो जाते हैं। वे हल्की और गंभीर ग़ज़लों के बीच का फ़र्क समझते हैं। अच्छी शायरी में नई पीढ़ी का चरित्र निर्माण करने की ताक़त है।

ज़िंदगी में भूपेंद्र को कभी अफ़सोस नहीं हुआ। वे कहते हैं- अफ़सोस उनको होता है जिनके पास प्रतिभा नहीं होती। ज़िंदगी उन्हें ने सब कुछ दिया। हमेशा उन्होंने गुरु नानक की बात मानी- 'ना ख़ुशी में ख़ुशी ना ग़म में ग़म'। वे कहते हैं- मैं साधारण आदमी हूँ। साधारण इच्छाएं हैं। इसलिए कभी निराश नहीं होता। 

तीन साल पहले नेहरू सेंटर में आयोजित भूपेंद्र मीताली के कार्यक्रम में एक दोस्त के साथ मैं मौजूद था। टिकट शो था। सभागार लगभग हाउस फुल था। संगीत प्रेमी झूम झूम कर जिस तरह इस जोड़ी को दाद दे रहे थे उससे यह साबित हुआ कि इस सितारे की चमक अभी कम नहीं हुई है। भूपेंद्र और मीताली के प्रति श्रोताओं की दीवानगी अभी बरकरार है।

भूपेंद्र के चंद लोकप्रिय गीत
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(1) होके मजबूर मुझे (हक़ीक़त)
(2) बीती ना बिताई रैना (परिचय)
(3) दिल ढूंढता है फिर वही (मौसम)
(4) किसी नज़र को तेरा (एतबार)
(5) करोगे याद तो हर बात (बाज़ार)
(6) एक अकेला इस शहर में (घरौंदा)
(7) ज़िंदगी मेरे घर आना (दूरियां)
(8) नाम गुम जाएगा (किनारा)
(9) मीठे बोल बोले (किनारा)
(10) हुज़ूर इस क़दर भी (मासूम)
(11) आज बिछड़े हैं (थोड़ी सी बेवफ़ाई)
(12) कभी किसी को मुकम्मल (आहिस्ता आहिस्ता)

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आपका-
देवमणि पांडेय

सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, 
गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व,
मुम्बई-400063, M: 98210-82126
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