मंगलवार, 13 जनवरी 2026

'कहाँ मंज़िलें कहाँ ठिकाना' : आकलन : गरिमा सक्सेना





'कहाँ मंज़िलें कहाँ ठिकाना' : देवमणि पांडेय का ग़ज़ल संग्रह

आकलन : गरिमा सक्सेना

देवमणि पाण्डेय जी का ग़ज़ल-संग्रह 'कहाँ मंज़िलें कहाँ ठिकाना' एक प्रश्नानुभूति के साथ मेरे सामने है। एक तरफ़ ऐसा प्रतीत होता है कि यह शीर्षक अनभिज्ञता से जुड़ा हुआ है वहीं दूसरी तरफ जब हम इसके भीतर प्रवेश करते हैं तो पाते हैं कि यह जीवन रूपी निरंतर यात्रा के अनिश्चित पड़ावों की ओर भले ही संकेत कर रहा हो लेकिन ठहराव की बात नहीं करता है। ऐसा मैं इसलिए कह रही हूँ क्योंकि जब मैं इस संग्रह से गुज़री तो मेरा सामना ऐसे अनेक एहसासों से हुआ जो साधारण भाषा शैली और कथ्य के साथ संवेदनशील हृदय को उद्वेलित करने वाले थे।


इस संग्रह की सबसे बड़ी शक्ति इसका सकारात्मक दृष्टिकोण और संघर्ष करने का जज़्बा है। आज के दौर में जब हताशा बहुत जल्दी युवाओं और समाज को घेर लेती है, पांडेय जी की ग़ज़लें एक उम्मीद की किरण बनकर आती है। वे आकाश में उड़ने की बात करते हैं, लेकिन ज़मीन से जुड़े रहकर। संग्रह के आरंभ में ही वे घोषणा करतें हैं कि

परवाज़ की तलब है अगर आसमान में,

ख़्वाबों को साथ लीजिए अपनी उड़ान में।

यह सफलता का मूल मंत्र है, जो कहता है कि बिना सपनों के ऊँची उड़ान संभव नहीं है। उनका मानना है कि महत्वाकांक्षा रखना गलत नहीं है, लेकिन उस महत्वाकांक्षा के साथ सपनों का होना अनिवार्य है। यह शेर पाठकों को प्रेरित करता है कि वे अपनी सीमाओं को लांघकर असीम संभावनाओं की ओर देखें। आत्मविश्वास इस संग्रह का एक और प्रमुख स्वर है। जब वे कहते हैं


मेरा यक़ीन हौसला किरदार देखकर

मंजिल क़रीब आ गई रफ़्तार देखकर

तो स्पष्ट हो जाता है कि सफलता बाहरी साधनों से नहीं, बल्कि आंतरिक चरित्र और आत्मविश्वास से मिलती है। यहाँ रफ़्तार केवल गति नहीं है, बल्कि जीवन जीने का उत्साह है। जब आपका किरदार मज़बूत होता है, तो मंज़िलें स्वयं आपके पास चलकर आती हैं।


लेकिन यह भी सच है कि असफलता और गिरना जीवन का हिस्सा है, लेकिन गिरकर सँभलना ही वास्तविक जीवन है। पाण्डेय जी कहते हैं-

हम जब गिरे तो हमको सँभलना सिखा दिया,

कुछ ठोकरों ने राह पर चलना सिखा दिया।

ठोकर को गुरु की भूमिका में लाने वाला यह शेर हमें बताता है कि कठिनाइयाँ हमारे रास्ते का पत्थर नहीं, बल्कि सीढ़ियाँ हैं। इसी क्रम में वे आगे कहते हैं-

ख़्वाबों के कुछ परिंदों ने आकाश छू लिया

और ज़िंदगी ने दुख में बहलना सिखा दिया

यही तो जीवन का द्वंद्व है। एक तरफ आकाश छूने की ललक है, तो दूसरी तरफ दुख के साथ समझौता करने की कला। यही संतुलन एक सफल जीवन का आधार है।

पाण्डेय जी का आशावाद कल्पनाओं पर आधारित नहीं है। वह यथार्थ की भट्ठी में तपकर निकला है।

आशावाद के पंख लगाकर उड़ती देवमणि पांडेय जी की ग़ज़लों की आत्मा उनके गाँव में बसती है। जैसे-जैसे हम आधुनिकता की ओर बढ़ रहे हैं, हमारे भीतर का गाँव मरता जा रहा है। इस संग्रह में गाँव के प्रति पाण्डेय जी का जो मोह है, वह केवल भावुकता नहीं है, बल्कि एक सांस्कृतिक चेतावनी है। जब वे कहते हैं-


काग़ज़ों में है सलामत अब भी नक़्शा गाँव का,

पर नजर आता नहीं पीपल पुराना गाँव का।


तो वे विकास के नाम पर हो रहे विनाश को रेखांकित करते हैं। नक्शे में गाँव तो है, यानी भूगोल जीवित है, लेकिन पुराना पीपल जो गाँव की संस्कृति, छाँव और साझा जीवन का प्रतीक था, वह ग़ायब हो चुका है। यह शहरीकरण की अंधी दौड़ पर एक करारा व्यंग्य है। गाँव का बदलना केवल भौतिक बदलाव नहीं है, बल्कि भावनात्मक भी है। "


बूढ़ीं आँखें मुंतज़िर हैं पर वो आख़िर क्या करें,

नौजवां तो भूल ही बैठे हैं रस्ता गाँव का।


कहकर पाण्डेय जी पलायन की उस त्रासदी को बयां करते हैं, जिसने भारत के गाँवों को वृद्धाश्रमों में बदल दिया है। युवा शहर जाकर वापस नहीं लौटना चाहते और गाँव अपनी संतानों की राह देखते-देखते बूढ़ा हो रहा है।


पहले कितने ही परिंदे आते थे परदेस से,

अब नहीं भाता किसी को आशियाना गाँव का।


यह शेर ऊपर कहे गये शेर का ही विस्तार है। जो परिदों का रूपक गढ़कर उन प्रवासियों के लिए अपनी बात कह रहा है, जो पहले त्यौहारों पर लौटते थे, लेकिन अब शहरों की चकाचौंध में अपनी जड़ों से कटते जा रहे हैं। पाण्डेय जी ने गाँव के उजड़ने का जो चित्र खींचा है, वह अत्यंत मार्मिक है।


सावन की पुरवइया ग़ायब,

पोखर, ताल-तलइया ग़ायब


कट गए सारे पेड़ गाँव के,

कोयल औ' गोरइया ग़ायब।


यह केवल गाँव का बदलना नहीं है, बल्कि पर्यावरण का विनाश भी है। गौरैया और कोयल का ग़ायब होना एक पारिस्थितिकीय संकट की ओर भी इशारा करता है। पाण्डेय जी उन लोक-परंपराओं को भी याद करते हैं जो अब विलुप्त हो रही हैं-


सोहर, कजरी, फगुआ भूले,

बिरहा, नाच-नचइया ग़ायब।


यह सांस्कृतिक विस्मृति केवल चीज़ों को भूलने का बोध पैदा नहीं कर रही बल्कि वैश्वीकरण के दौर में हमारी पहचान को मिटा रही है। आधुनिकता ने गाँव के अर्थशास्त्र और सामाजिक ताने-बाने को कैसे बदला है, इसे भी पाण्डेय जी ने बड़ी बारीकी से पकड़ा है-


नोट निकलते ए टी एम से,

पैसा, आना, पइया ग़ायब


और


दरवाजे पर कार खड़ी है,

बैल-भैंस और गइया ग़ायब।


गाँव की यह पीड़ा तब और गहरी हो जाती है जब पाण्डेय जी कहते हैं-

वक़्त ने क्या दिन दिखाए चंद पैसों के लिए,

बन गया मज़दूर इक छोटा-सा बच्चा गाँव का।


बाल मजदूरी और ग़रीबी की यह तस्वीर दिल को झकझोर देती है।


ग़ज़लों में समय की तस्वीर उतारने वाले देवमणि पाण्डेय

सामाजिक विसंगतियों और राजनीतिक पाखंड पर भी तीखे प्रहार किये हैं। देवमणि पांडेय एक सजग रचनाकार हैं जो अपने समय की नब्ज़ पहचानते हैं।


शिक्षा और रोज़गार के बीच के द्वंद्व को पाण्डेय जी ने बहुत ही व्यंग्यात्मक ढंग से प्रस्तुत किया है-


पढ़-लिखकर क्या करेंगे आख़िर राम, श्याम, रहमान वग़ैरह, ये भी इक दिन बन जाएँगे चपरासी, दरबान वग़ैरह।


यह शेर भारत की शिक्षा व्यवस्था और बेरोज़गारी की समस्या पर एक कड़वा सच है। डिग्री लेने के बाद भी युवाओं का चपरासी या दरबान बनने को मजबूर होना एक राष्ट्रीय त्रासदी है। वहीं अगले शेर में वे कहते हैं-


रोजी-रोटी के चक्कर में हमने ख़ुद को गँवा दिया है,

कहाँ गया अपना वो तेवर, खुद्दारी, पहचान वग़ैरह


यह उस मध्यवर्गीय आदमी की व्यथा है जो आजीविका कमाने की दौड़ में अपने स्वाभिमान और मूल स्वभाव से समझौता कर लेता है।


राजनीति पर कटाक्ष करते हुए देवमणि पाण्डेय जी कहते हैं-


दूर-दूर तक आदर्शों से रिश्ता नहीं सियासत का जब,

इनमें कहाँ नज़र आएँगे सच्चाई, ईमान वग़ैरह।


सांप्रदायिकता और दंगे भड़काने वाली राजनीति पर भी पाण्डेय अपनी बात कहने से नहीं कतराते हैं। वे स्पष्ट रूप से देख रहे हैं कि सत्ता के लिए किस तरह समाज को बांटा जाता है-


ख़ुद को कहते हैं वो मुल्क का रहनुमा,

रोटियाँ सेंकते हैं फ़सादात पर।


किसानों की दुर्दशा भी उनकी आँखों से छिपी नहीं है। गाँवों से उनका जुड़ाव उन्हें किसानों की यथास्थिति के और क़रीब ले जाता है-


मौसम ने क़हर ढाया दहशत है किसानों में,

दम तोड़ती हैं फ़सलें खेतों खलिहानों में


और


धरती की गुज़ारिश पर बरसे ही नहीं बादल,

तब्दील हुई मिट्टी खेतों की चटानों में।


यह सूखा और प्राकृतिक आपदा की मार झेलते अन्नदाता का दर्द है। लेकिन इससे भी बड़ा दर्द है सत्ता की संवेदनहीनता का-


क्यूँ कैसे मरा कोई क्या फ़िक्र सियासत को,

पत्थर की तरह नेता बैठे हैं मकानों में।


पाण्डेय जी की ग़ज़लों में आधुनिकता, रिश्तों की ऊष्मा और उनकी टूटती कड़ियाँ पर भी कई शेर मिलते हैं। परिवार, जो भारतीय समाज की रीढ़ रहा है, अब कैसे बिखर रहा है, इसे पांडेय जी ने बहुत गहराई से महसूस किया है-


अपने ही जब ग़ैर हुए तो वो वृद्धाश्रम चले गए,

ख़ुश है बेटा, बहू के सर पे अब कोई जंजाल नहीं।


आधुनिक समाज के मुँह पर व्यंग्य का तमाचा मारता हुआ यह शेर कितना मर्मस्पर्शी है। माता-पिता को जंजाल समझना और उन्हें वृद्धाश्रम भेजना उस नैतिक पतन की पराकाष्ठा है, जिसकी ओर हम बढ़ रहे हैं। पाण्डेय जी इंतज़ार और अकेलेपन के उस दर्द को भी शब्दायित कर रहे हैं जो दीवारों के भीतर घुटता रहता है। एक तरफ बुज़ुर्गों की उपेक्षा है, तो दूसरी तरफ़ बच्चों का खोता बचपन। कुछ भी उनकी आँखों से अछूता नहीं है-

क्या-क्या नहीं दिया बचपन को इंटरनेट की दुनिया ने,

बच्चों के अफ़सानों में क्यूँ वो बूढ़ा बेताल नहीं।


इंटरनेट और मोबाइल ने बच्चों से उनकी कल्पनाशीलता, उनकी परियों और बेताल की कहानियाँ छीन ली हैं। वह मासूमियत, वह काग़ज़ की नाव, वह बारिश का आनंद - सब डिजिटल स्क्रीन के पीछे खो गया है-


बच्चों के हाथों में जब से ये मोबाइल आया है,

बहते पानी में काग़ज़ की नाव चलाना भूल गए।


ऐसा नहीं है कि उन्होंने सारा दोष मोबाइल या उत्तर आधुनिकता को देकर पल्ला झाड़ लिया है। वे शिक्षा के भारी बस्ते के द्वारा बच्चों के बचपन का कुचला जाना भी महसूस कर रहे हैं-


बचपन की पीठ पर है किताबों का एक बोझ,

बच्चों को खेलकूद की मोहलत नहीं रही।


संयुक्त परिवारों के विघटन को पाण्डेय जी ने एक ही शेर में समेट दिया है-


जब फ़ासले हुए हैं तो रोई है माँ बहुत,

बेटों के दिल के दरमियां दीवार देखकर।


घर का बँटवारा केवल दीवारों का बँटवारा नहीं होता, वह माँ के दिल का बँटवारा होता है। इसी तरह, आधुनिक दांपत्य जीवन की विडंबना देखिए-


एक ही कमरे में दोनों रह रहे हैं साथ-साथ,

फिर भी उनके दिल जुदा हैं राब्ता कोई नहीं।


शारीरिक निकटता के बावजूद भावनात्मक दूरी आज के रिश्तों की सच्चाई है। जिसे पाण्डेय जी ने बहुत ख़ूबसूरती के साथ अभिव्यक्त किया है।


जीवन की विडंबनाओं, सामयिक विसंगतियों और विद्रूपताओं को शब्दायित करते हुए भी पाण्डेय जी ग़ज़ल के पारम्परिक परिपाटी को अर्थात् प्रेम को अभिव्यक्त करना नहीं भूले हैं। उन्होंने इस परंपरा को भी बखूबी निभाया है। उनके प्रेमिल शेरों में एक शालीनता है, एक ठहराव है। यथा-


जी ये चाहे उम्र भर मैं उसको ही पढ़ता रहूँ,

याद की खिड़की पे बैठी इक कहानी मिल गई।


इस शेर में प्रेमिका ग़ज़लकार के लिए एक 'कहानी' बन गयी है, जिसे वह बार-बार पढ़ना चाहता है।


इतना ही नहीं वे प्रेम में एक ऐसी अनुभूति की बात करते हैं, जहाँ प्रेमी और ईश्वर का स्थान एक जैसा प्रतित होता है-


कहीं भी ढूँढ़ो कहाँ नहीं है,

कोई भी उसके सिवा नहीं है


वो बादलों में, वो बिजलियों में

निहां है फूलों में उसकी खुशबू।


पाण्डेय जी की ग़ज़लों में विरह के क्षणों का चित्रण भी अद्भुत है। वे बिम्बों में विरह का चित्र गढ़ रहे हैं-


सुलगती है कहीं कैसे कोई भीगी हुई लकड़ी

दिखाई देगा ये मंज़र किसी विरहन की आंखों में


रिश्ता भी ख़ुद में होता है स्वेटर ही की तरह,

उधड़ा जो एक बार, उधड़ता चला गया।


यह उपमा कितनी बेमिसाल है। रिश्तों का उधड़ना और उन्हें फिर से न जोड़ पाना; यह एक ऐसी टीस है, जिसे हर वो व्यक्ति समझ सकता है जिसने कभी किसी को खोया है।


अबके कभी वो आया तो आएगा ख़्वाब में,

आँखों के सामने से तो कब का चला गया।


प्रेम में शिकायतें भी हैं और समर्पण भी-


जो हमसफ़र थे आपसे आगे निकल गए,

धीमी बहुत है आपकी रफ़्तार क्या करें।


प्रेम की बात करते हुए पाण्डेय जी का कहन एक अलग तरह की ख़ूबसूरती और सहजता को जीने लगता है। ऐसे तो उनके अन्य शेरों का भी अंदाज़ अलग सा है पर प्रेम की तो बात ही कुछ और है। शेर देखें-


चेहरे से आपके भी झलकने लगा है इश्क़,

जी खुश हुआ है आपको बीमार देखकर।


यहाँ बीमार होना एक व्यंग्य नहीं, बल्कि प्रेम में पड़ने का सुखद संकेत है।


देवमणि पांडेय जी की ग़ज़लों में एक अंतर्धारा आध्यात्मिकता की भी बहती है। वे ईश्वर को मंदिर-मस्जिद में नहीं, बल्कि कण-कण में देखते हैं-


नफ़स-नफ़स में है उसकी आहट,

उसी से क़ायम है दिल की धड़कन।


या

दीन-धरम बस यही है अपना साथ इसी के जीना है,

प्यार छुपा है जिस दिल में वो काशी और मदीना है।


देवमणि पांडेय जी की ग़ज़लों की भाषाई विविधता और शिल्प की बात करें तो वे सरल, सहज और आम-समझ की ग़ज़लें लिखने वाले ग़ज़लकार हैं, जिसमें उर्दू मिश्रित आम बोलचाल की हिन्दुस्तानी भाषा का प्रयोग किया गया है। लेकिन उनका कथ्य बिल्कुल सपाट नहीं है। उनके बिंब और प्रतीक बहुत ही ताज़ा और मौलिक हैं। उनके पास ऐसे उपमान हैं, जो हमारी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी से उठाये गये हैं। उन्होंने ग़ज़ल के पारंपरिक रूप को बनाए रखते हुए उसमें आधुनिक संवेदनाओं को पिरोया है। उनके पास कहने को बहुत कुछ है। ऐसा लगता है जैसे एक ग़ज़ल कहते हुए वे विभिन्न भावों को गीत की तरह बांधते चले जाते हैं। उनका यह प्रवाह जितना व्यापक है उतना ही हक़ीक़त से जुड़ा हुआ। वे कहते भी हैं-


सपनों को पालने की रिवायत न तोड़िए,

लेकिन जनाब! इनको हक़ीक़त से जोड़िए।


यही इस पुस्तक का सार है और यही जीवन का सत्य भी।

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गरिमा सक्सेना : मकान संख्या- 212 ए-ब्लाॅक, सेंचुरी सरस अपार्टमेंट, अनंतपुरा रोड, यलहंका, बैंगलोर, कर्नाटक-560064+

Mob : +917694928448

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शुक्रवार, 28 नवंबर 2025

आरजे प्रीति गौड़ की अंतिम यात्रा



अलविदा प्रीति गौड़

रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई

तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई 

 में रचनाकार, कलाकार, इष्टमित्र और पारिवारिक सदस्य अच्छी तादाद में मौजूद थे। गोरेगांव के शिवधाम शमशान गृह में सभी ने नम आँखों से उन्हें अंतिम विदाई दी। वे कैंसर से पीड़ित थीं। 28 नवम्बर 2025 को सुबह 10:25 बजे मुम्बई के ऑस्कर हॉस्पिटल में उनका आकस्मिक निधन हुआ। 

प्रीति के जीवन साथी शैलेंद्र गौड़ के आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। उन्होंने बताया कि पिछले चार साल से प्रीति का इलाज चल रहा था। उसने किसी को बताने से मना किया था। पिछले दो साल में प्रीति कई बार चित्रनगरी संवाद मंच के कार्यक्रमों में आईं। उन्होंने कई कार्यक्रमों में हंसते मुस्कुराते हुए शिरकत की। अपने रोचक क़िस्सों से ठहाके लगवाए। मगर कभी उनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं दिखाई पड़ी। 


साल भर पहले मेरे जन्मदिन पर शैलेंद्र के साथ प्रीति गौड़ मेरे घर आईं। वहां भी उन्होंने धूम मचाई। वे एक बेहतरीन उदघोषक होने के साथ ही अच्छी अभिनेत्री भी थीं। जब वे अभिनय के साथ कामवाली बाइयों की बातचीत सुनातीं तो लोग हंसते-हंसते लोटपोट हो जाते थे। प्रीति गौड़ को एक ज़िंदादिल, विनम्र और मिलनसार इंसान के रूप में में हमेशा याद किया जाएगा। 


मौत को स्वीकार करना ज़िंदगी की सच्चाई है। लेकिन जिस तरह प्रीति ने हंसते-हंसते मौत का सामना किया वह हम सबके लिए प्रेरणा स्रोत है।  आपके साथ कुछ तस्वीरें साझा कर रहा हूं। ये प्रीति गौड़ के हंसते खिलखिलाते जीवन की साक्षी हैं। ऐसी मधुर स्मृतियों में वह हमेशा हम सबके साथ मौजूद रहेगी। वह जहां भी रहे सुकून से रहे, हम सब की यही दुआएं हैं। 



आपका : देवमणि पांडेय

सम्पर्क : 98210 82126 

गुरुवार, 27 नवंबर 2025

गरिमा सक्सेना का ग़ज़ल संग्रह 'रोशनी के पक्ष में'


रोशनी के पक्ष में : गरिमा सक्सेना का ग़ज़ल संग्रह

ग़ज़ल के दरिया में अब तक न जाने कितना पानी बह चुका है। इसी के साथ ही रचनात्मकता के इस क़ाफ़िले में नए विचार, नए कथ्य और नए दृश्य शामिल हुए। अभिव्यक्ति की यही नवीनता ग़ज़ल की पूंजी है जो उसे और समृद्ध बनाती है। आज के दौर में ग़ज़ल की इन्हीं ख़ूबियों की साक्षी हैं गरिमा सक्सेना। श्वेतवर्णा प्रकाशन नोएडा से प्रकाशित उनके ग़ज़ल संग्रह का नाम है “रोशनी के पक्ष में”। वे अपनी ग़ज़ल के वितान में ऐसे चिंतन, मनन और अनुभव को शामिल करती हैं जो उनकी रचनात्मकता को एक नई ऊर्जा से संपन्न करते हैं। 

जो किसी को दे उजाला, उस ख़ुशी के पक्ष में, 
इस अंधेरे वक़्त में हूं रोशनी के पक्ष में। 

कभी रंगीन परदों से, कभी दिलकश नज़ारों से,
हमारा सच छुपाया जा रहा है इश्तहारों से। 

आज हम जिस आधुनिक समय में जी रहे हैं वहां ऐसी चीज़ों को अनदेखा नहीं कर सकते जो हमारे दिन प्रतिदिन के व्यवहार में दखल रखती हैं। यही कारण है कि गरिमा की ग़ज़लों में मोबाइल से लेकर इंस्टाग्राम तक शामिल हैं। सोशल मीडिया उनके यहां एक रचनात्मक ज़रूरत के तहत मौजूद है। 

उत्सव का असली मतलब अब शेष बचा क्या? 
सेल्फ़ी लेने तक ही बस मुस्काते उत्सव। 

हमारे आसपास की दुनिया में स्याह रंग अधिक हैं। बेशक़ उनकी अभिव्यक्ति होनी चाहिए मगर ज़िंदगी के कैनवास पर मुहब्बत की तस्वीर भी ज़रूरी है। गरिमा सक्सेना की ग़ज़लों में कभी-कभार दिलों के तार झंकृत करने वाले अशआर भी नज़र आते हैं। हौसलों की उड़ान और रिश्तों की गर्माहट भी दस्तक देती है- 

बाग़ में उड़ती हुई इन तितलियों को देखकर, 
एक लड़की हो गई तैयार उड़ने के लिए। 

मेरे सिर में तो दर्द है लेकिन, 
कब अकेले मैं चाय पीती हूं। 

गरिमा सक्सेना गीत, नवगीत और दोहे लिखने में सिद्धहस्त हैं। इस रचनात्मक कौशल का फ़ायदा उनकी ग़ज़लों को भी मिला है। एक तरफ़ उनकी ग़ज़लों के कथ्य में ताज़गी और सामयिकता है तो दूसरी तरफ़ अभिव्यक्ति में व्यंजना और भाषा में जीवंतता है। सृजनात्मकता के यही तेवर उन्हें विशिष्ट पहचान देते हैं। वे जिस तरह अपनी ग़ज़लों में वे समय और समाज को दर्ज करती हैं वह कौशल सराहनीय है। उदाहरण के तौर पर उनके चंद शेर देखिए- 

कहीं पे चीड़, कहीं पे चिनार रोते हैं, 
पहाड़ मर रहे हैं, देवदार रोते हैं। 

गांव से हम तो निकल आए हैं लेकिन, 
गांव निकला ही नहीं मन से हमारे। 

यह खुले बाज़ार हैं केवल कमाई के लिए, 
मौत भी बिकती यहां पर ज़िंदगी की शक्ल में। 

ज़िंदगी की विविधरंगी छवियों को क़लम बंद करने के साथ ही गरिमा मानव मन की धूप छांव को भी अपनी रचनात्मकता के दायरे में लाती हैं - 

चार बच्चों का पिता भी अपनी मां को देखकर, 
खिल उठा है फूल जैसा एक बच्चे की तरह। 

हर एक हाल या सूरत में काम आते हैं, 
जो दोस्त हैं वो ज़रूरत में काम आते हैं। 

गरिमा सक्सेना ने अपने आसमान, अपनी ज़मीन और अपनी आंखों से देखी हुई दुनिया को अपनी अभिव्यक्ति का हमसफ़र बनाया है। उसे अपनी सोच और सरोकारों से सजाया है। आम आदमी के सुख-दुख, हिम्मत और हौसले को आज़माया है। उनकी ग़ज़लें ख़ुद अपनी रोशनी से जगमगाती हैं। इस उथल-पुथल भरे समय में उम्मीद की किरण की तरह नज़र आती हैं। 

आंखों में ख़्वाब, पांवों में छालों को पालकर, 
लाई हूं मैं अंधेरे से सूरज निकाल कर। 

इस ख़ूबसूरत ग़ज़ल संग्रह के ज़रिए गरिमा सक्सेना ने बेहतर संभावनाओं का संकेत दिया है। मुझे पूरी उम्मीद है कि अपनी प्रतिभा और लगन से वे ग़ज़लों के गुलशन में कुछ नए फूल खिलाने में कामयाब होंगी। उन्हें ढेर सारी शुभकामनाएं। 


देवमणि पांडेय : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फ़िल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210 82126

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सोमवार, 3 नवंबर 2025

उद्भ्रांत की आत्मकथा काली रात का मुसाफ़िर

 


चित्रनगरी संवाद मंच मुम्बई में पुस्तक चर्चा 

दिल्ली के प्रतिष्ठित कवि उद्भ्रांत की आत्मकथा "मैंने जो जिया" का तीसरा भाग 'काली रात का मुसाफ़िर' नाम से प्रकाशित हुआ है। रविवार 2 नवम्बर 2025 को चित्रनगरी संवाद मंच मुम्बई की ओर से मृणालताई हाल, केशव गोरे स्मारक ट्रस्ट, गोरेगांव में इस पुस्तक पर चर्चा का आयोजन किया गया। कवि रमाकांत शर्मा उद्भ्रांत ने इस पुस्तक के कुछ अंशों का पाठ किया। पुस्तक की रचना प्रक्रिया पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि यह आत्मकथा ख़ुद को थर्ड पर्सन में रख कर लिखी गई है। आत्मकथा लेखन में ऐसा पहली बार हुआ है। उनके इस प्रयोग को सराहा गया। 


प्रस्तावना पेश करते हुए कार्यक्रम के संयोजक कवि देवमणि पांडेय ने कहा- "सरस भाषा में लिखी हुई इस आत्मकथा में घटनाओं को रोचक तरीके से पेश किया गया है। हमेशा यह उत्सुकता बनी रहती है कि आगे क्या हुआ। सूक्ष्म विवरणों को भी उद्भ्रांत जी ने जिस कौशल के साथ दर्ज किया है वह सराहनीय है। इस कृति में कई महत्वपूर्ण रचनाकारों से संबंधित घटनाओं का उल्लेख किया गया है। इस तरह यह अपने समय का महत्वपूर्ण दस्तावेज़ बन जाती है। इस आत्मकथा में साहित्य, पत्रकारिता, शिक्षा, सिने जगत और सरकारी तंत्र मौजूद है। यानी एक दुनिया में कई दुनियां शामिल हैं। उद्भ्रांत जी ने साहस के साथ सच का सामना किया है और उसको उजागर किया है। उन्होंने लोगों की नाराज़गी और अपनी इमेज की परवाह नहीं की है। कुल मिलाकर यह आत्मकथा एक महत्वपूर्ण और रोचक कृति के रूप में याद की जाएगी।"


देवमणि जी ने प्रस्तावना में इस पुस्तक पर नामवर सिंह, ज्ञानरंजन, कर्ण सिंह चौहान और यश मालवीय की टिप्पणियों के अंश भी उद्धरित किए गए। इन विद्वानों ने कवि उद्भ्रांत के प्रमाणिक कथ्य, प्रवाहमयी भाषा और अभिव्यक्ति कौशल की तारीफ़ की है।

इस अवसर पर कवयित्री अभिनेत्री दीप्ति मिश्र ने एक सवाल उठाया कि इस आत्मकथा में दृश्य और किरदार तो मौजूद हैं  लेकिन लेखक की सोच सामने नहीं आती। कुछ विद्वानों के उद्धरण के हवाले से इस सवाल का जवाब देते हुए कवि उद्भ्रांत ने कहा कि उन्होंने तटस्थ भाव से आत्मकथा का लेखन किया है। 


कार्यक्रम की शुरूआत में शुक्रवार 31 अक्टूबर 2025 को दिवंगत दिल्ली के प्रतिष्ठित साहित्यकार रामदरश मिश्र को याद किया गया गया। धरोहर के अंतर्गत मधुबाला शुक्ल ने उनकी लोकप्रिय ग़ज़ल "बनाया है मैंने ये घर धीरे-धीरे" का पाठ किया। कविता पाठ के सत्र में तूलिका सनाढ्य, गुलशन मदान, प्रदीप गुप्ता, दीप्ति मिश्र, असीमा भट्ट, अम्बिका झा, क़मर हाजीपुरी और महेश साहू ने काव्य पाठ किया। कवि रमाकांत शर्मा उद्भ्रांत ने अपनी दो ग़ज़लें सुनाकर कार्यक्रम को पूर्णता प्रदान की। 



उद्भ्रात की आत्मकथा काली रात का मुसाफ़िर के बारे में नामवर सिंह कहते हैं कि यह गद्य नहीं, कविता है।

ज्ञानरंजन उनकी आत्मकथा की तुलना उग्र की आत्मकथा 'अपनी खबर' से करते हैं। सच भी है। उद्भ्रांत ने अपने जीवन की कड़वी सच्चाइयों को अपनी लेखनी से जिस तरह उघारा है यह मिलना मुश्किल है। 

कर्ण सिंह चौहान ने उनकी आत्मकथा की तुलना गांधी की आत्मकथा से की है। वे लिखते हैं कि उद्भ्रांत की आत्मकथा की खूबी यह है कि उसने अपने जीवन से जुड़ी किसी भी बात को छिपाया नहीं है, न उसे अपने पक्ष में गौरवान्वित करने का प्रयास किया है और कमाल की बात यह है कि इतने विस्तृत ब्यौरों के बाद भी उसमें कोई उबाऊपन और नीरसता नहीं है। 

से रा यात्री जी का कहना है कि कवि के लिए गद्य एक कसौटी है और बच्चन व उद्भ्रांत के अतिरिक्त कोई अन्य इस पर खरा नहीं उतरता। राजेन्द्र राव एवं देवेन्द्र चौबे जैसे कुछ और प्रतिष्ठित साहित्यकारों ने भी उनके लेखन को उल्लेखनीय बताया है।

यश मालवीय के अनुसार यह एक मानक आत्मकथा है, जिसमें लेखक ने एक बड़ा कालखंड समेटा है। वृत्तांत में वेगवती नदी का सा प्रवाह है, भाषा भी उतनी ही पानीदार है। यह एक न भूलने वाला दस्तावेज़ है, जिसके लिए कवि उद्भ्रांत याद किए जाएंगे क्योंकि उन्होंने विस्मरण के इस घनघोर समय में स्मरण की गंगा बहा दी है। बेशक इसे पाण्डेय बेचन शर्मा उग्र की अपनी ख़बर और बच्चन जी की आत्मकथाओं के सभी खण्डों की परंपरा में रखकर देखा जा सकता है।


 देवमणि पाण्डेय : 98210 82126              

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बुधवार, 29 अक्टूबर 2025

साहित्यायन फाउंडेशन मुम्बई का प्रथम साहित्य समारोह

दीक्षित दनकौरी को नंदलाल पाठक साहित्य पुरस्कार 

भिषेक सिंह को नंदलाल पाठक प्रतिभा पुरस्कार


मुम्बई ऐसा शहर है जहाँ प्रतिदिन सैकड़ों आयोजन पाँचसितारा होटलों से लेकर छोटे मोटे स्थानों पर होते है। लेकिन कुछ आयोजन ऐसे होते हैं जो यादगार होने के साथ ही अपनी एक अलग छाप छोड़ जाते है। आज जब मुंबई के बड़े कॉर्पोरेट घराने विभिन्न आयोजनों के नाम पर पश्चिमी सभ्यता को पोसने वाले कार्यक्रम कर करोड़ो रुपये खर्च कर देते हैं वहीँ बिड़ला उद्योग समूह की श्रीमती राजश्री बिड़ला ने हिंदी कवियों और हिंदी पुस्तक को समर्पित एक ऐसा आयोजन किया जिसकी सुरभि हिंदी साहित्य जगत को बरसों तक महकाती करती रहेगी। सबसे बड़ी बात ये है कि इस कार्यक्रम में श्रीमती राजश्री बिड़ला, उनके पुत्र कुमार मंगलम बिड़ला और उनका परिवार पूरे समय मौजूद रहा। यह अपने आप में एक दुर्लभ दृश्य था कि हिंदी साहित्य के किसी कार्यक्रम में देश के इतने बड़े उद्योगपति का परिवार इतने सम्मान और भाव से पूरे समय उपस्थित रहे।

समारोह अध्यक्ष पद्मभूषण राजश्री बिरला ने अपने वक्तव्य के ज़रिए साबित किया कि उन्हें कला, साहित्य और संस्कृति से गहरा अनुराग है। 97 वर्ष के ग़ज़लकार नंदलाल पाठक ने पुरस्कार के औचित्य पर प्रकाश डाला। सभागार में नंदलाल पाठक के कई चुनिंदा शेरों को ख़ूबसूरत पेंटिंग की तरह पेश किया गया था।  कार्यक्रम की भव्यता किसी कॉर्पोरेट कंपनी के आयोजन जैसी थी मगर रचनात्मकता किसी साहित्य उत्सव जैसी थी।

इस कार्यक्रम के माध्यम से दो नए पुरस्कारों की शुरुआत के साथ मुंबई में एक नए रचनात्मक माहौल का आगाज़ हुआ। दीपावली अवकाश और छठ उत्सव की दस्तक के बावजूद जिस उमंग और उत्साह के साथ इस पुरस्कार समारोह में श्रोताओं ने अपनी मौजूदगी दर्ज कराई वह अविस्मरणीय है। इनमें कला, साहित्य और व्यवसाय से जुड़े प्रमुख लोग थे यानी हर श्रोता अपने आप में विशिष्ट था। बिड़ला उद्योग समूह की श्रीमती राजश्री बिड़ला की प्रेरणा से स्थापित  साहित्यायन फाउंडेशन मुंबई का यह प्रथम आयोजन था। हिंदी काव्य साहित्य में विशिष्ट योगदान के लिए वरिष्ठ ग़ज़लकार दीक्षित दनकौरी को नंदलाल पाठक साहित्य पुरस्कार (₹ पांच लाख) और युवा ग़ज़लकार अभिषेक कुमार सिंह को नंदलाल पाठक प्रतिभा पुरस्कार (₹ एक लाख) मुम्बई में आयोजित एक साहित्य समारोह में मुख्य अतिथि सुधांशु त्रिवेदी (सांसद) ने दोनों रचनाकारों को पुरस्कार प्रदान करके सम्मानित किया।

ग़ज़लकार दीक्षित दनकौरी ने “ग़ज़ल दुष्यंत के बाद” (चार खंड) संकलन का संपादन किया है जिसमें एक हज़ार से अधिक ग़ज़लकार शामिल हैं। यह एक महत्वपूर्ण कार्य है। दूसरी तरफ़ पिछले 16 सालों से लगातार ग़ज़ल कुंभ का आयोजन करके उन्होंने ग़ज़ल के पक्ष में अच्छा माहौल बनाया है। अपने वक्तव्य में उन्होंने कहा कि वे पुरस्कार राशि का उपयोग निजी हित के लिए नहीं बल्कि ग़ज़ल के हित के लिए करेंगे।

अपने दो ग़ज़ल संग्रहों के ज़रिए ग़ज़लकार अभिषेक ने बेहतर संभावनाओं का संकेत दिया है। फ़िलहाल हम जिन वैश्विक चुनौतियों, वैचारिक संक्रीणताओं, धार्मिक उन्माद और प्रकृति के प्रकोप का सामना कर रहे हैं उनका प्रतिबिंब अभिषेक की ग़ज़लों में दिखाई देता है। अभिषेक ने इस बात पर ज़ोर दिया कि ग़ज़ल के विकास के लिए सामूहिक प्रयास की ज़रूरत है।

इस अवसर पर पाठक जी का ग़ज़ल संग्रह “जीवन एक ग़ज़ल है” का भी लोकार्पण  हुआ जिसके लिए वाणी प्रकाशन के मुखिया अरुण माहेश्वरी भी मौजूद थे। कार्यक्रम के समपान के बाद पाठकजी की पुस्तक की खरीदी के लिए उमड़ी भीड़ से ऐहसास हुआ कि पाठकजी और उनका रचनाकर्म मुंबई के साहित्यप्रेमियों के लिए क्या महत्व रखता है।

 श्री नंदलाल पाठक ने कहा कि देश में बिड़ला परिवार ने साहित्य संस्कृति, धर्म और परोपकार की ऐसी मिसालें कायम की है जिसका लाभ कई  पीढ़ियों से लोगों को मिल रहा है। उन्होंने कहा कि बिड़ला परिवार जो मंदिर बनवाता है उसमें देवता की मूर्ति का पता तो तब चलता है जब कोई मंदिर तक पहुँचता है लेकिन दूर से देखने वाले उसे बिड़ला मंदिर ही कहते हैं, कोई समाज किसी उद्योगपति को ऐसा सम्मान दे तो समझा जा सकता है कि उस उद्योगपति का समाज के प्रति क्या भाव है।

वर्ली, मुम्बई के फोर सीज़न्स होटल के बैंक्वेट हाल में आयोजित इस भव्य व गरिमामयी कार्यक्रम में हिंदी ग़ज़ल न सिर्फ़ दिखाई दी बल्कि सुनाई भी दी। इसे साहित्य की छोटी मोटी घटना मान कर अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए। बिड़ला परिवार शीर्ष व्यवसायी होने  के  साथ ही  स्वतन्त्रता   आंदोलन से लेकर धर्म, संस्कृति और शिक्षा के क्षेत्र में जो योगदान है उसी क्रम में श्रीमती राजश्री बिड़ला ने एक अध्याय साहित्य का भी जोड़ दिया है और अपने गुरू और हिंदी के जानेमाने ग़ज़लकार नंदलाल पाठक के नाम से सम्मान और पुरस्कार का सिलसिला शुरू किया है।

बीजेपी के फायरब्रांड प्रवक्ता  व कार्यक्रम के मुख्य अतिथि सांसद सुधांशु त्रिवेदी के रूप में उद्बोधन में एक अलग ही अंदाज़ में नज़र आए. सारगर्भित बात करके ताली बटोर कर ले गए। उन्होंने अपनी प्रत्युत्पन्नमति, संस्कृत श्लोकों, हिंदी कविताओं और गजलों से ऐसा समाँ बांधा कि उपस्थित श्रोता मंत्रमुग्ध होकर उन्हें सुनते रहे। अपने सुदीर्घ वक्तव्य में आचार्य मम्मट, वाल्मीकि, सुमित्रानंदन पंत, अटल बिहारी वाजपेई और नंदलाल पाठक की काव्य पंक्तियों को उद्धृत किया- “ज़हर पीता हुआ हर आदमी शंकर नहीं होता/ न जब तक आदमी इंसान हो शायर नहीं होता।”

सुधांशु जी को -” राष्ट्रीयता के आयाम” पर अपने विचार व्यक्त करना थे। अपने वक्तव्य को पूर्णता प्रदान करते हुए उन्होंने इस विचार को रेखांकित किया कि राष्ट्र जीवंत चेतना का प्रतीक होता है जिसे न काटा जा सकता है और न बांटा जा सकता है। उन्होंने ऐतिहासिक व आज के मौजूद प्रमाणों के साथ कहा कि पूरी दुनिया में चीन से लेकर कंबोडिया और इंडोनेशिया व जापान तक हिंदू संस्कृति के चिन्ह आज भी जीवित हैं और हम दावे से कह सकते हैं कि ये देश हमारी संस्कृति के अंग हैं।


साहित्यायन फाउंडेशन के इस प्रथम साहित्य समारोह में प्रो नंदलाल पाठक के ग़ज़ल संग्रह “जीवन एक ग़ज़ल है” का लोकार्पण किया गया। बात संचालन की की जाए तो देवमणि पाण्डेय ने अपने अभिनव अंदाज व सटीक ग़ज़लों के माध्यम से पूरे कार्यक्रम को एक रसभरी शाम में बदल दिया।

इस अवसर पर आयोजित ग़ज़ल संध्या में सुश्री पूनम विश्वकर्मा, सुमन जैन, अभिषेक कुमार सिंह, देवमणि पांडेय, दीक्षित दनकौरी और नंदलाल पाठक ने अपनी ग़ज़लों का पाठ किया। प्रतिष्ठित गायिका वृषाली बियानी ने नंदलाल पाठक की दो ग़ज़लों की संगीतमय प्रस्तुति की। अंत में वाणी प्रकाशन के निदेशक अरुण माहेश्वरी ने आभार व्यक्त किया। इस ग़ज़ल पाठ के श्रोताओं में मुम्बई महानगर के कई लेखकों, पत्रकारों और कलाकारों के साथ उद्योगपति कुमार मंगलम बिरला, उद्योगपति सुश्री किरण बजाज और सांसद सुधांशु त्रिवेदी भी मौजूद थे।

साभार : HINDIMEDIA.IN
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सोमवार, 29 सितंबर 2025

उजालों के आसपास : अभिषेक सिंह का ग़ज़ल संग्रह


उजालों के आसपास:अभिषेक सिंह का ग़ज़ल संग्रह 

हिंदी काव्य साहित्य की लोकप्रिय विधा ग़ज़ल एक लंबा सफ़र तय कर चुकी है। अब इसमें प्रेम, प्रकृति, प्रतिरोध और पर्यावरण से लेकर वे तमाम चिंताएं शामिल हैं जो मौजूद समय और समाज के लिए महत्वपूर्ण हैं। अभिषेक कुमार सिंह की ग़ज़लों में भी यही विषय वैविध्य दिखाई पड़ता है। अपने प्रथम ग़ज़ल संग्रह “वीथियों के बीच” से अभिषेक ने बेहतर संभावनाओं का संकेत दिया था। हाल ही में श्वेत वर्णा प्रकाशन (नोएडा) से उनका दूसरा ग़ज़ल संग्रह आया है- “उजालों के आसपास।” अपने प्रथम संग्रह से उन्होंने जो उम्मीदें जगाई थीं उसे उन्होंने दूसरे संग्रह में भी क़ायम रखा है। 


अभिषेक जन सरोकार के कवि हैं। आज के कठिन दौर में हम जिन सामाजिक-आर्थिक सवालों, वैश्विक चुनौतियों, वैचारिक संक्रीणताओं, धार्मिक उन्माद और प्रकृति के प्रकोप का सामना कर रहे हैं उनका प्रतिबिंब अभिषेक की ग़ज़लों में दिखाई देता है। 


अजीब घोड़े हैं चाबुक की मार सहकर भी 

सलाम करते हैं मालिक को हिनहिनाते हुए 


संगठित जो भीड़ है बलवाइयों के वेश में 

साथ मेरे चल रही है राहियों के वेश में 


दिहाड़ी भीड़ तो छँट जाएगी इक दिन इशारे से

हटाने कौन आएगा मगर अंजाम का पत्थर 


जैसे ही धर्म मुद्दा बना इक विवाद का 

बोतल से जिन्न आया निकल लव जिहाद का 


कथ्य की यही समृद्धि उन्हें अपने समकालीनों में विशिष्ट बनाती है। अभिषेक बड़ी से बड़ी बात कहने के लिए ग़ज़ल के रूप में सुगम रास्ता ढूंढ़ लेते हैं। उनकी अभिव्यक्ति में इतनी सहजता है कि वे बिना किसी उलझन के अपनी बात कहने में कामयाब होते हैं। 


है मनाही तर्क के टीले पर चढ़ने की 

इस जगह से सच का सिग्नल रीच होता है 


स्वर्ग का राजा भी आकर जोड़ता है हाथ 

जब तपस्वी में कोई दाधीच होता है 


हमारे आसपास क्या घटित हो रहा है एक सजग शायर उस पर अपनी निगाह रखता है। अभिषेक भी यह काम बख़ूबी करते हैं- “दौड़ रहे सब धन के पीछे/ जैसे राम हिरन के पीछे।” कभी-कभी वे अपने आसपास का कोई दृश्य इस सलीक़े से सामने रख देते हैं कि देखने वाला विस्मित हो जाता है- 


सुस्ता रहे हैं धूप की डोली के सब कहार 

सड़कों पे बिछ गया है बिछौना पलाश का 


अभिषेक की ग़ज़लों में अनुभव और भावनाओं की असरदार अभिव्यक्ति है। वे ज़िंदगी के सूक्ष्म अनुभवों को भी बड़ी संजीदगी और कलात्मकता से रचनात्मकता के दायरे में लाते हैं। समय और समाज के ज़रूरी मुद्दों को सांकेतिक शैली में पेश करना उनकी ख़ासियत है। वे धर्म और राजनीति पर बेबाक टिप्पणी करते हैं। उनकी ग़ज़लों में आज के समाज की सोच और आम आदमी की पीड़ा शामिल है। कभी-कभी अपनी अभिव्यक्ति में वे व्यंग्य की धारदार शैली का भी बढ़िया इस्तेमाल करते हैं। वे अपने पास उपलब्ध रंगों से विविधरंगी छवियां बनाते हैं। इन छवियों में समाज के सुख-दुख भी हैं और ज़िंदगी की धूप छांव भी है। यह कारण है कि उनकी ग़ज़लें पाठकों की हमसफ़र बन जाती हैं। 


लज़ीज़ व्यंजनों में घुल चुके नमक की तरह 

ग़ज़ल है जीस्त की मिट्टी में उर्वरक की तरह


इस नये ग़ज़ल संग्रह के लिए मैं अभिषेक को दिल से बधाई देता हूं और उम्मीद करता हूं कि वे रचनात्मकता के नए आयाम रचते हुए ग़ज़ल के इसी राजमार्ग पर गतिशील रहेंगे।

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आपका : देवमणि पांडेय

सम्पर्क : 98210 82126 

मोलियर के प्रसिद्ध नाटक कंजूस का मंचन

  मोलियर के प्रसिद्ध नाटक कंजूस का मंचन

हंसी ठहाकों के बीच चित्रनगरी संवाद मंच मुंबई में मोलियर के मशहूर नाटक 'कंजूस' का मंचन हुआ। बारिश की आशंका के बावजूद 'कंजूस' के कारनामों पर ठहाका लगाने के लिए अच्छी तादाद में दर्शक पधारे और उन्होंने इस कॉमेडी नाटक का जमकर लुत्फ़ उठाया। ख़ुशी की बात यह है कि दशकों में कुछ बच्चे भी मौजूद थे और उन्हें भी इस प्रस्तुति में भरपूर आनंद आया। केशव गोरे स्मारक ट्रस्ट गोरेगांव के मृणालताई हाल में मंचित इस नाटक में रंगगर्मी विजय कुमार और उनके साथी कलाकारों का अभिनय ज़बरदस्त रहा। 


'कंजूस' की कहानी मिर्ज़ा शखावत बेग़ (विजय कुमार) नामक एक अमीर, लेकिन अत्यंत लालची बुज़ुर्ग के इर्द-गिर्द घूमती है। वह अपने पैसे से बहुत प्यार करता है। उसका लालच इतना बढ़ जाता है कि वह अपने बच्चों की ख़ुशी, प्यार और भविष्य की भी परवाह नहीं करता। वह अपने बेटे फारूक़ की प्रेमिका मरियम से ख़ुद शादी करना चाहता है और अपनी बेटी अज़रा का विवाह एक अमीर लेकिन बुज़ुर्ग व्यक्ति से कराना चाहता है।


कहानी में तब अद्भुत मोड़ आता है जब मिर्ज़ा बेग़ का छुपा हुआ धन चोरी हो जाता है, जिससे वह पागलों की तरह व्यवहार करने लगता है। बी.एम. शाह द्वारा निर्देशित कंजूसी और लालच जैसे गंभीर विषय पर आधारित इस क्लासिक कॉमेडी को रंगकर्मी विजय कुमार ने हास्य के माध्यम से जिस पुरलुत्फ़ तरीक़े से पेश किया है वह बेहद क़ाबिले तारीफ़ है। मिर्ज़ा बेग़ के चरित्र की सनक, उनके संवाद और ख़ासकर नौकरों के साथ उनकी नोंक-झोंक दर्शकों को ख़ूब हँसाती है। 


मिर्ज़ा बेग़ (कंजूस) का चरित्र सबसे मज़ेदार और चुनौतीपूर्ण है जो दर्शकों को बाँधे रखता है। विजय कुमार ने इसके लिए बॉडी लैंग्वेज़ का ज़बरदस्त इस्तेमाल किया है। कई बार उनकी देह भाषा दर्शकों से ताली बजवाती है। नाटक के बाक़ी सभी पात्रों ने अपनी अपनी भूमिका को सराहनीय ढंग से अंजाम तक पहुंचाया है। 

कुल मिलाकर, 'कंजूस' फ्रांसीसी नाटककार मोलियर के कालजयी नाटक का एक सफल हिंदी रूपांतरण है। कहा जाता है कि सन् 1963 में हज़रत आवारा ने इसका हिंदी रूपांतरण किया था। यह नाटक आज भी हास्य और व्यंग्य के माध्यम से लोभ-लालच के बुरे प्रभावों पर प्रकाश डालता है। मनोरंजक प्रस्तुति के कारण दर्शकों ने इसे ख़ूब पसंद किया। नाटक के अंत में विजय कुमार ने श्रोताओं से संवाद किया और अपना 'मन बसिया' गीत भी सुनाया। 


28 सितंबर स्वर कोकिला लता मंगेशकर का जन्मदिन है। दशकों ने उन्हें आदर के साथ याद किया। गायिका नाज़नीन ने उनकी पावन स्मृति में उनकी गाई हुई एक ग़ज़ल सुनाई जिसे मजरुह सुलतानपुरी ने लिखा है। अंत में डॉ मधुबाला शुक्ल ने आभार व्यक्त किया। 


इस अवसर पर दर्शकों में कई प्रतिष्ठित रंगकर्मी मौजूद थे। इनमें जयंत जी, हरीश जी, राजेश जादव, प्रमोद सचान, सोनू पाहूजा, राजकुमार कनौजिया और शाइस्ता ख़ान शामिल थे। रचनाकार जगत से आभा बोधिसत्व, अंबिका झा, मंजू शर्मा, अनिल गौड़, हेमंत शर्मा, राजू मिश्र कविरा और अनुज वर्मा उपस्थित थे। 


आपका : देवमणि पांडेयस

सम्पर्क : 98210 82126 

बुधवार, 25 दिसंबर 2024

लखनऊ यात्रा की मधुर यादें

 

(1) सुख़नवरी साझा ग़ज़ल संग्रह 

रचनात्मकता को नया आयाम देने वाले कुछ कार्य ऐसे होते हैं जो वक़्त का शिलालेख बन जाते हैं। ‘महकते जज़्बात परिवार’ की ख़ूबसूरत पेशकश ‘सुख़नवरी’ एक ऐसा ही अहम दस्तावेज़ है। ‘महकते जज़्बात परिवार’ के संस्थापक अध्यक्ष शायर मंजुल मंज़र लखनवी द्वारा सम्पादित इस सामूहिक ग़ज़ल संग्रह में देश के 51 महत्वपूर्ण ग़ज़लकार शामिल हैं। अपने अंदर सभी रंगों को समेटे हुए यह संग्रह सृजनात्मकता के क्षितिज पर इंद्रधनुष की तरह उपस्थित है। यह संग्रह इन ग़ज़लकारों को एक ऐसा प्लेटफार्म उपलब्ध कराता है जहां से उनकी पहचान को एक नया आसमान मिलता है। मंजुल मंज़र लखनवी की पारखी नज़रों ने कमाल का संपादन किया है। ग़ज़लों के इस ख़ूबसूरत गुलदस्ते में ज़िंदगी की विविधरंगी तस्वीरें हैं। इनमें जदीदियत का हुस्न है तो रिवायात की दिलकशी भी है। इन ग़ज़लों में एहसासात और जज़्बात के साथ देश एवं समाज के हालात और वक़्त के सवालात शामिल हैं। कुल मिलाकर आज के दौर को जानने समझने के लिए और ग़ज़ल की परवाज़ को देखने के लिए यह संग्रह बेहद महत्वपूर्ण है। उर्दू अकादमी लखनऊ के लोकार्पण-समारोह एवं मुशायरे में शनिवार 7 दिसंबर 2024 को इस साझा ग़ज़ल संग्रह का लोकार्पण हुआ।  ‘सुख़नवरी’ में शामिल सभी ग़ज़लकारों को मैं दिल से बधाई देता हूं और उम्मीद करता हूं कि ग़ज़ल प्रेमियों की दुनिया में इस गुलदस्ते का भरपूर स्वागत होगा। 

(2) अलका त्रिपाठी का ग़ज़ल संग्रह 

उर्दू अकादमी लखनऊ के लोकार्पण-समारोह में सम्वेदनशील कवयित्री अलका त्रिपाठी ने मुझे अपने दो ग़ज़ल संग्रह भेंट किए - 'लफ़्ज़ों से परे' और 'हमसफ़र'। दोनों से गुज़रते हुए यह महसूस हुआ कि अलका त्रिपाठी की ग़ज़लें इस तथ्य को रेखांकित करती हैं कि ग़ज़ल कोमल भावनाओं की नाज़ुक अभिव्यक्ति है। सरल सहज भाषा में कही गईं ये दिलकश ग़ज़लें भावनाओं की झील पर किसी कश्ती की मानिंद गुज़रती हैं।

तुम सा सुंदर यहाँ का नज़ारा नहीं
तुमको जी भर अभी तो निहारा नहीं
संग ले के सनम तुमको डूबेंगे हम
चाहतों के भंवर में किनारा नहीं

यह भी अच्छी बात है कि अलका जी की अभिव्यक्ति में कहीं कोई गति अवरोधक नहीं है। बिना किसी लाग लपेट के वे अपनी बात साफ़ साफ़ कह देतीं हैं। इन ग़ज़लों में गेयता है। संगीत की लयात्मकता है। ये ग़ज़लें दिल से निकली हैं और दिल तक पहुंचती हैं।

धड़कनों की लय पे हमने गीत गाए हैं सदा
अश्क जब मोती हुए तो मुस्कराए हैं सदा

अलका त्रिपाठी की अभिव्यक्ति में ऐसी सादगी और आत्मीयता है कि ये ग़ज़लें पाठकों को अपने दिल के बहुत क़रीब महसूस होंगी। वस्तुतः यही उनकी रचनात्मक उपलब्धि है। मुझे उम्मीद है कि इन दिलकश ग़ज़लों के ज़रिए वे रचनाकार जगत में अपनी विशिष्ट पहचान बनाएंगी। निरंतर प्रगति की शुभकामनाएं।

(3) डॉ इंदु अग्रवाल का ग़ज़ल संग्रह 

उर्दू अकादमी लखनऊ के भव्य समारोह में शनिवार 7 दिसम्बर 2024 को देहरादून की वरिष्ठ कवयित्री डॉ इंदु अग्रवाल के ग़ज़ल संग्रह 'दीवान-ए-इंदु' का लोकार्पण हुआ। बेहद आकर्षक साज-सज्जा के साथ प्रकाशित यह ग़ज़ल संग्रह ख़ुद में एक नायाब तोहफ़ा है। दीवान प्रकाशित कराना आसान काम नहीं है। वर्णमाला के सभी अक्षरों को रदीफ़ में शामिल करके ग़ज़लें कहनी पड़तीं हैं। इंदु जी ने इस परम्परा का पालन सराहनीय ढंग से किया है। उनका दीवान बेहतरीन ग़ज़लों का ख़ूबसूरत गुलदस्ता है। तकनीकी ज़रूरतों को पूरा करने के साथ ही उन्होंने सरल सहज भाषा में ज़िंदगी के जो रंग, जज़्बात और एहसासात ग़ज़लों में पिरोए हैं वे दिल के तार झंकृत कर देते हैं-

बेटा-बेटी सब प्यारे
दोनों में लें किसका पक्ष
आज सभी के घर में हो
दादा-दादी का भी कक्ष

देखती रात भर रहीं आँखें
ख़्वाब जो भी मिले विरासत में

गाँव के गाँव ख़ाली हुए
मुर्दनी झाँकती हर तरफ़

जब बुलंदी न हो उसकी क़िस्मत में तो
चाहिए आदमी सब्र से काम ले

ग़ज़ल में लफ़्ज़ों को बरतने का सलीक़ा और भावनाओं के इज़हार का तरीक़ा देखने के लिए ख़ुद में यह कृति एक दस्तावेज़ है। इस रचनात्मक उपलब्धि के लिए डॉ इंदु अग्रवाल को बहुत-बहुत बधाई। मेरी दिली कामना है कि वे इसी तरह अपनी सोच और सरोकार से रचनात्मकता के गुलशन को आबाद करती रहें। ढेर सारी शुभकामनाएं।

(4) लखनऊ के फोनिक्स प्लासियो मॉल में कॉफ़ी

कवयित्री नीतू सिंह ने मुझे गोमती नगर, लखनऊ के फोनिक्स प्लासियो मॉल में कॉफ़ी के लिए आमंत्रित दिया। उनके साथ गपशप में आनंद आया। प्लासियो मॉल बहुत भव्य और शानदार है। यह माल इतना बड़ा है कि चारों दिशाओं में इसके प्रवेश द्वार हैं।

कवयित्री नीतू सिंह गोमती नगर के पुलिस मुख्यालय में सब इंस्पेक्टर हैं। वे बेहतरीन गायिकी हैं। उन्होंने संगीत विशारद किया है। सन् 2012 में मेरे ग़ज़ल संग्रह 'अपना तो मिले कोई' का लोकार्पण हज़रतगंज, लखनऊ में हुआ था। उस आयोजन में नीतू सिंह ने मेरी एक ग़ज़ल गाई थी' "जो मिल गया है उससे भी बेहतर तलाश कर / क़तरे में भी छुपा है समंदर तलाश कर"। उनके गायन की काफ़ी तारीफ़ हुई थी। नीतू सिंह के जीवनसाथी परमदेव पेशे से शिक्षक हैं।। उनसे मिलकर अच्छा लगा। नीतू की 6 साल की बेटी प्रक्षालिका भी बहुत प्यारी है। शाम को नीतू सिंह ने मेरे साथ निराला नगर में आयोजित काव्य संध्या में शिरकत की। कुल मिलाकर लखनऊ की यात्रा बहुत सुखद और यादगार रही।
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आपका : देवमणि पांडेय मुम्बई 





 

सोमवार, 29 जुलाई 2024

मुकेश जयंती पर मुम्बई में संगीत समारोह


 
मुकेश जयंती पर मुम्बई में संगीत समारोह 


बेमिसाल गायक मुकेश ने वक़्त के कैनवास पर अपनी आवाज़ के रंगों से कामयाबी की एक ऐसी इबारत लिखी जिसकी चमक आज भी बरकरार है। वे लफ़्ज़ों की रोशनाई में अपने दिल की सम्वेदना घोल देते थे। इसलिए उनके गीत आज भी श्रोताओं की धड़कनों के साथ एक आत्मीय रिश्ता क़ायम कर लेते हैं। 


आज भी गायक मुकेश की रूहानी आवाज़ उदासियों के अंधेरों में रोशनी की लकीर खींच देती है। हालांकि उन्होंने उमंग और उल्लास के भी कई गीत गाए, लेकिन उनकी इमोशनल आवाज़ दर्द  की जागीर बन गई है। उनके ऐसे गीतों ने प्यार करने वालों की कई-कई बेचैन पीढ़ियों को सुकून अता किया है। कहा जाता है कि मुकेश ने अपने 35 साल के कैरियर में 525 हिन्दी फ़िल्मों में 900 गीत ही गाये मगर मुकेश के गीतों की लोकप्रियता इतनी ज़्यादा रही कि अक्सर लोग यही समझते हैं कि मुकेश ने भी हज़ारों गीत गाये होंगे। उन्होंने अपने दौर के सभी प्रमुख अभिनेताओं के लिए गाया। राज कपूर उन्हें अपनी आवाज़ कहते थे। 



दक्षिण मुंबई में जहां नेपियन सी रोड और भूलाभाई देसाई रोड का मिलन होता है उसका नाम है मुकेश चौक। इसी मोहल्ले की सरकारी कॉलोनी हैदराबाद इस्टेट में मैं तेरह साल तक रहा। थोड़ी ही दूर पर कमला नेहरू पार्क यानी हैंगिंग गार्डन है। फ़िल्म पत्रिका माधुरी के संपादक अरविंद कुमार जी ने बताया था कि इस पार्क में रोज़ सुबह मॉर्निंग वॉक के लिए गायक मुकेश आते थे। कोई भी उनसे मुलाक़ात कर सकता था। बात कर सकता था। मगर अब समय बदल गया है। हैदराबाद इस्टेट के सामने प्रियदर्शनी पार्क है। एक दिन शाम को इसी पार्क में घूमते हुए मुकेश जी के पौत्र नील नितिन मुकेश से सामना हो गया। उनके दाएं बाएं दो बॉडीगार्ड थे। एक नौकर तौलिया लेकर पीछे पीछे चल रहा था। यानी उनसे संवाद का कोई रास्ता नहीं था। 



दिल्ली के मुकेशचंद्र माथुर का जन्म 22 जुलाई 1923 को हुआ। उन्होंने दसवीं तक पढ़ाई करके सार्वजनिक निर्माण विभाग में नौकरी शुरू की लेकिन क़िस्मत ने उन्हें दिल्ली से मुंबई पहुंचा दिया। इसका श्रेय अभिनेता मोतीलाल को दिया जाता है। फ़िल्म 'निर्दोष' (1941) में मुकेश को गाने और अभिनय का काम मिला। बतौर पार्श्व गायक सन् 1945 में फ़िल्म 'पहली नज़र' से पहचान मिली। गीत था - "दिल जलता है तो जलने दे "। मुकेश के आदर्श गायक कुंदनलाल सहगल का प्रभाव इस पर स्पष्ट दिखाई देता है। संगीतकार नौशाद के साथ मुकेश ने अपनी पार्श्व गायन शैली विकसित की। 



चालीस के दशक में दिलीप कुमार के लिए सबसे ज़्यादा गीत गाने वाले मुकेश को पचास के दशक में एक नयी पहचान मिली। उन्हें राज कपूर की आवाज़ कहा जाने लगा। ख़ुद राज कपूर ने स्वीकार किया - "मैं तो बस शरीर हूँ मेरी आत्मा तो मुकेश है।" बतौर पार्श्व गायक लोकप्रियता हासिल करने के बाद एक दिन मुकेश फ़िल्म निर्माता बन गये। सन् 1951 में फ़िल्म ‘मल्हार’ और 1956 में ‘अनुराग’ निर्मित की। दोनों फ़िल्में फ्लॉप रहीं। कहा जाता है कि मुकेश को बचपन से ही अभिनय का शौक था। फ़िल्म ‘अनुराग’ और ‘माशूक़ा’ में वे हीरो बनकर आये। लेकिन जनता ने उन्हें पसंद नहीं किया। वे फिर से गायिकी की दुनिया में लौट आये। यहूदी, मधुमती, अनाड़ी और जिस देश में गंगा बहती है जैसी फ़िल्मों ने उनकी गायकी को एक नयी पहचान दी। 



▪️गायक मुकेश को अपनी बेमिसाल गायिकी के लिए चार बार फ़िल्म फेयर अवार्ड मिला।▪️ 


(1) सन् 1959 में अनाड़ी  फ़िल्म के गीत ‘सब कुछ सीखा हमने न सीखी होशियारी’ के लिए। ऋषिकेश मुखर्जी की फ़िल्म 'अनाड़ी' में मुकेश के जिगरी दोस्त राज कपूर को भी पहला फ़िल्म फेयर अवॉर्ड मिला। 


(2) सन् 1970 में मनोज कुमार की फ़िल्म 'पहचान' के गीत "सबसे बड़ा नादान" के लिए। 


(3) सन् 1972 में मनोज कुमार की ही फ़िल्म 'बेईमान' के गीत "जय बोलो बेईमान की" के लिए। 


(उपरोक्त तीनों फ़िल्मों के संगीतकार शंकर जयकिशन थे) 


(4) सन् 1976 में यश चोपड़ा की फ़िल्म ''कभी कभी  के शीर्षक गीत के लिए मुकेश को चौथा फ़िल्म फेयर अवॉर्ड मिला। (संगीतकार ख़य्याम) 


साल 1974 में फ़िल्म ''रजनीगंधा'' के गाने "कई बार यूं भी देखा है" के लिए मुकेश को राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। 


सत्तर के दशक में धरम करम, आनन्द, अमर अकबर अ‍ॅन्थनी आदि फिल्मों में मुकेश ने सुपरहिट गाने दिये। मुकेश ने अपने कैरियर का आखिरी गाना अपने दोस्त राज कपूर की फ़िल्म सत्यम शिवम् सुंदरम के लिए गाया- “चंचल शीतल निर्मल कोमल”। लेकिन 1978 में इस फ़िल्म के रिलीज होने से दो साल पहले ही 27 अगस्त 1976 को मुकेश ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। 


मुकेश का परिवार : 

घर वालों की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ अपने जन्मदिन 22 जुलाई 1946 को गुजराती लड़की सरल त्रिवेदी से मुकेश ने प्रेम विवाह किया था। वे तीन बच्चों के पिता बने। बेटे का नाम नितिन मुकेश और बेटियों का रीटा और नलिनी है। 


मुकेश के बेटे गायक नितिन मुकेश ने भी कई फ़िल्मों में अपनी आवाज़ दी है। नितिन मुकेश के बेटे यानी मुकेश के पौत्र नील नितिन मुकेश बॉलीवुड के चर्चित अभिनेता हैं। 


गीतकार हरिश्चंद्र दास गायक मुकेश के परम भक्त हैं। वे पिछले सैंतीस सालों से गायक मुकेश के जन्मदिन पर मुकेश जयंती समारोह आयोजित करते हैं। इस बार यह संगीत समारोह 27 जुलाई 2024 को कांदिवली, मुम्बई के निर्वाण सभागृह में आयोजित किया गया जिसमें कई बेहतरीन गायकों ने शिरकत की। इनमें सुधाकर स्नेह, सुरेशानंद, नारायण आहूजा, संजीव झा, कमल धमाली, दामोदर राव, श्रीरंजनी अय्यर, दर्शना कदम, श्रुति झा, रेखा राव, ममता राव और स्वयं हरिश्चंद्र दास शामिल थे। इस संगीत संध्या के संचालन में मुझे भी भरपूर आनंद आया। मेरे दोस्तों- पुष्पा वर्मा, अर्चना जौहरी, रतिका जौहरी, प्रतिमा सिन्हा, क़मर हाजीपुरी और ताज मोहम्मद सिद्दीकी ने अपनी मौजूदगी से आयोजन की गरिमा बढ़ाई।


हिंदी सिनेमा के महान गायक मुकेश की जयंती पर उनकी स्मृतियों को सादर नमन ! आइए हम भी मुकेश की आवाज में गुनगुनाएं .... 


किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार 

किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार 

किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार 

जीना इसी का नाम है ... 


रिश्ता दिल से दिल के ऐतबार का 

ज़िन्दा है हमीं से नाम प्यार का

कि मर के भी किसी को याद आयेंगे 

किसी के आँसुओं में मुस्कुरायेंगे 

कहेगा फूल हर कली से बार बार 

जीना इसी का नाम है... 


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आपका - देवमणि_पांडेय

सम्पर्क : 98210 82126