मंगलवार, 13 जनवरी 2026
'कहाँ मंज़िलें कहाँ ठिकाना' : आकलन : गरिमा सक्सेना
शुक्रवार, 28 नवंबर 2025
आरजे प्रीति गौड़ की अंतिम यात्रा
रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई
तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई
में रचनाकार, कलाकार, इष्टमित्र और पारिवारिक सदस्य अच्छी तादाद में मौजूद थे। गोरेगांव के शिवधाम शमशान गृह में सभी ने नम आँखों से उन्हें अंतिम विदाई दी। वे कैंसर से पीड़ित थीं। 28 नवम्बर 2025 को सुबह 10:25 बजे मुम्बई के ऑस्कर हॉस्पिटल में उनका आकस्मिक निधन हुआ।
प्रीति के जीवन साथी शैलेंद्र गौड़ के आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। उन्होंने बताया कि पिछले चार साल से प्रीति का इलाज चल रहा था। उसने किसी को बताने से मना किया था। पिछले दो साल में प्रीति कई बार चित्रनगरी संवाद मंच के कार्यक्रमों में आईं। उन्होंने कई कार्यक्रमों में हंसते मुस्कुराते हुए शिरकत की। अपने रोचक क़िस्सों से ठहाके लगवाए। मगर कभी उनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं दिखाई पड़ी।
साल भर पहले मेरे जन्मदिन पर शैलेंद्र के साथ प्रीति गौड़ मेरे घर आईं। वहां भी उन्होंने धूम मचाई। वे एक बेहतरीन उदघोषक होने के साथ ही अच्छी अभिनेत्री भी थीं। जब वे अभिनय के साथ कामवाली बाइयों की बातचीत सुनातीं तो लोग हंसते-हंसते लोटपोट हो जाते थे। प्रीति गौड़ को एक ज़िंदादिल, विनम्र और मिलनसार इंसान के रूप में में हमेशा याद किया जाएगा।
मौत को स्वीकार करना ज़िंदगी की सच्चाई है। लेकिन जिस तरह प्रीति ने हंसते-हंसते मौत का सामना किया वह हम सबके लिए प्रेरणा स्रोत है। आपके साथ कुछ तस्वीरें साझा कर रहा हूं। ये प्रीति गौड़ के हंसते खिलखिलाते जीवन की साक्षी हैं। ऐसी मधुर स्मृतियों में वह हमेशा हम सबके साथ मौजूद रहेगी। वह जहां भी रहे सुकून से रहे, हम सब की यही दुआएं हैं।
आपका : देवमणि पांडेय
सम्पर्क : 98210 82126
गुरुवार, 27 नवंबर 2025
गरिमा सक्सेना का ग़ज़ल संग्रह 'रोशनी के पक्ष में'
सोमवार, 3 नवंबर 2025
उद्भ्रांत की आत्मकथा काली रात का मुसाफ़िर
चित्रनगरी संवाद मंच मुम्बई में पुस्तक चर्चा
दिल्ली के प्रतिष्ठित कवि उद्भ्रांत की आत्मकथा "मैंने जो जिया" का तीसरा भाग 'काली रात का मुसाफ़िर' नाम से प्रकाशित हुआ है। रविवार 2 नवम्बर 2025 को चित्रनगरी संवाद मंच मुम्बई की ओर से मृणालताई हाल, केशव गोरे स्मारक ट्रस्ट, गोरेगांव में इस पुस्तक पर चर्चा का आयोजन किया गया। कवि रमाकांत शर्मा उद्भ्रांत ने इस पुस्तक के कुछ अंशों का पाठ किया। पुस्तक की रचना प्रक्रिया पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि यह आत्मकथा ख़ुद को थर्ड पर्सन में रख कर लिखी गई है। आत्मकथा लेखन में ऐसा पहली बार हुआ है। उनके इस प्रयोग को सराहा गया।
प्रस्तावना पेश करते हुए कार्यक्रम के संयोजक कवि देवमणि पांडेय ने कहा- "सरस भाषा में लिखी हुई इस आत्मकथा में घटनाओं को रोचक तरीके से पेश किया गया है। हमेशा यह उत्सुकता बनी रहती है कि आगे क्या हुआ। सूक्ष्म विवरणों को भी उद्भ्रांत जी ने जिस कौशल के साथ दर्ज किया है वह सराहनीय है। इस कृति में कई महत्वपूर्ण रचनाकारों से संबंधित घटनाओं का उल्लेख किया गया है। इस तरह यह अपने समय का महत्वपूर्ण दस्तावेज़ बन जाती है। इस आत्मकथा में साहित्य, पत्रकारिता, शिक्षा, सिने जगत और सरकारी तंत्र मौजूद है। यानी एक दुनिया में कई दुनियां शामिल हैं। उद्भ्रांत जी ने साहस के साथ सच का सामना किया है और उसको उजागर किया है। उन्होंने लोगों की नाराज़गी और अपनी इमेज की परवाह नहीं की है। कुल मिलाकर यह आत्मकथा एक महत्वपूर्ण और रोचक कृति के रूप में याद की जाएगी।"
देवमणि जी ने प्रस्तावना में इस पुस्तक पर नामवर सिंह, ज्ञानरंजन, कर्ण सिंह चौहान और यश मालवीय की टिप्पणियों के अंश भी उद्धरित किए गए। इन विद्वानों ने कवि उद्भ्रांत के प्रमाणिक कथ्य, प्रवाहमयी भाषा और अभिव्यक्ति कौशल की तारीफ़ की है।
इस अवसर पर कवयित्री अभिनेत्री दीप्ति मिश्र ने एक सवाल उठाया कि इस आत्मकथा में दृश्य और किरदार तो मौजूद हैं लेकिन लेखक की सोच सामने नहीं आती। कुछ विद्वानों के उद्धरण के हवाले से इस सवाल का जवाब देते हुए कवि उद्भ्रांत ने कहा कि उन्होंने तटस्थ भाव से आत्मकथा का लेखन किया है।
कार्यक्रम की शुरूआत में शुक्रवार 31 अक्टूबर 2025 को दिवंगत दिल्ली के प्रतिष्ठित साहित्यकार रामदरश मिश्र को याद किया गया गया। धरोहर के अंतर्गत मधुबाला शुक्ल ने उनकी लोकप्रिय ग़ज़ल "बनाया है मैंने ये घर धीरे-धीरे" का पाठ किया। कविता पाठ के सत्र में तूलिका सनाढ्य, गुलशन मदान, प्रदीप गुप्ता, दीप्ति मिश्र, असीमा भट्ट, अम्बिका झा, क़मर हाजीपुरी और महेश साहू ने काव्य पाठ किया। कवि रमाकांत शर्मा उद्भ्रांत ने अपनी दो ग़ज़लें सुनाकर कार्यक्रम को पूर्णता प्रदान की।
उद्भ्रात की आत्मकथा काली रात का मुसाफ़िर के बारे में नामवर सिंह कहते हैं कि यह गद्य नहीं, कविता है।
ज्ञानरंजन उनकी आत्मकथा की तुलना उग्र की आत्मकथा 'अपनी खबर' से करते हैं। सच भी है। उद्भ्रांत ने अपने जीवन की कड़वी सच्चाइयों को अपनी लेखनी से जिस तरह उघारा है यह मिलना मुश्किल है।
कर्ण सिंह चौहान ने उनकी आत्मकथा की तुलना गांधी की आत्मकथा से की है। वे लिखते हैं कि उद्भ्रांत की आत्मकथा की खूबी यह है कि उसने अपने जीवन से जुड़ी किसी भी बात को छिपाया नहीं है, न उसे अपने पक्ष में गौरवान्वित करने का प्रयास किया है और कमाल की बात यह है कि इतने विस्तृत ब्यौरों के बाद भी उसमें कोई उबाऊपन और नीरसता नहीं है।
से रा यात्री जी का कहना है कि कवि के लिए गद्य एक कसौटी है और बच्चन व उद्भ्रांत के अतिरिक्त कोई अन्य इस पर खरा नहीं उतरता। राजेन्द्र राव एवं देवेन्द्र चौबे जैसे कुछ और प्रतिष्ठित साहित्यकारों ने भी उनके लेखन को उल्लेखनीय बताया है।
यश मालवीय के अनुसार यह एक मानक आत्मकथा है, जिसमें लेखक ने एक बड़ा कालखंड समेटा है। वृत्तांत में वेगवती नदी का सा प्रवाह है, भाषा भी उतनी ही पानीदार है। यह एक न भूलने वाला दस्तावेज़ है, जिसके लिए कवि उद्भ्रांत याद किए जाएंगे क्योंकि उन्होंने विस्मरण के इस घनघोर समय में स्मरण की गंगा बहा दी है। बेशक इसे पाण्डेय बेचन शर्मा उग्र की अपनी ख़बर और बच्चन जी की आत्मकथाओं के सभी खण्डों की परंपरा में रखकर देखा जा सकता है।
देवमणि पाण्डेय : 98210 82126
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बुधवार, 29 अक्टूबर 2025
साहित्यायन फाउंडेशन मुम्बई का प्रथम साहित्य समारोह
दीक्षित दनकौरी को नंदलाल पाठक साहित्य पुरस्कार
अभिषेक सिंह को नंदलाल पाठक प्रतिभा पुरस्कार
सोमवार, 29 सितंबर 2025
उजालों के आसपास : अभिषेक सिंह का ग़ज़ल संग्रह
उजालों के आसपास:अभिषेक सिंह का ग़ज़ल संग्रह
हिंदी काव्य साहित्य की लोकप्रिय विधा ग़ज़ल एक लंबा सफ़र तय कर चुकी है। अब इसमें प्रेम, प्रकृति, प्रतिरोध और पर्यावरण से लेकर वे तमाम चिंताएं शामिल हैं जो मौजूद समय और समाज के लिए महत्वपूर्ण हैं। अभिषेक कुमार सिंह की ग़ज़लों में भी यही विषय वैविध्य दिखाई पड़ता है। अपने प्रथम ग़ज़ल संग्रह “वीथियों के बीच” से अभिषेक ने बेहतर संभावनाओं का संकेत दिया था। हाल ही में श्वेत वर्णा प्रकाशन (नोएडा) से उनका दूसरा ग़ज़ल संग्रह आया है- “उजालों के आसपास।” अपने प्रथम संग्रह से उन्होंने जो उम्मीदें जगाई थीं उसे उन्होंने दूसरे संग्रह में भी क़ायम रखा है।
अभिषेक जन सरोकार के कवि हैं। आज के कठिन दौर में हम जिन सामाजिक-आर्थिक सवालों, वैश्विक चुनौतियों, वैचारिक संक्रीणताओं, धार्मिक उन्माद और प्रकृति के प्रकोप का सामना कर रहे हैं उनका प्रतिबिंब अभिषेक की ग़ज़लों में दिखाई देता है।
अजीब घोड़े हैं चाबुक की मार सहकर भी
सलाम करते हैं मालिक को हिनहिनाते हुए
संगठित जो भीड़ है बलवाइयों के वेश में
साथ मेरे चल रही है राहियों के वेश में
दिहाड़ी भीड़ तो छँट जाएगी इक दिन इशारे से
हटाने कौन आएगा मगर अंजाम का पत्थर
जैसे ही धर्म मुद्दा बना इक विवाद का
बोतल से जिन्न आया निकल लव जिहाद का
कथ्य की यही समृद्धि उन्हें अपने समकालीनों में विशिष्ट बनाती है। अभिषेक बड़ी से बड़ी बात कहने के लिए ग़ज़ल के रूप में सुगम रास्ता ढूंढ़ लेते हैं। उनकी अभिव्यक्ति में इतनी सहजता है कि वे बिना किसी उलझन के अपनी बात कहने में कामयाब होते हैं।
है मनाही तर्क के टीले पर चढ़ने की
इस जगह से सच का सिग्नल रीच होता है
स्वर्ग का राजा भी आकर जोड़ता है हाथ
जब तपस्वी में कोई दाधीच होता है
हमारे आसपास क्या घटित हो रहा है एक सजग शायर उस पर अपनी निगाह रखता है। अभिषेक भी यह काम बख़ूबी करते हैं- “दौड़ रहे सब धन के पीछे/ जैसे राम हिरन के पीछे।” कभी-कभी वे अपने आसपास का कोई दृश्य इस सलीक़े से सामने रख देते हैं कि देखने वाला विस्मित हो जाता है-
सुस्ता रहे हैं धूप की डोली के सब कहार
सड़कों पे बिछ गया है बिछौना पलाश का
अभिषेक की ग़ज़लों में अनुभव और भावनाओं की असरदार अभिव्यक्ति है। वे ज़िंदगी के सूक्ष्म अनुभवों को भी बड़ी संजीदगी और कलात्मकता से रचनात्मकता के दायरे में लाते हैं। समय और समाज के ज़रूरी मुद्दों को सांकेतिक शैली में पेश करना उनकी ख़ासियत है। वे धर्म और राजनीति पर बेबाक टिप्पणी करते हैं। उनकी ग़ज़लों में आज के समाज की सोच और आम आदमी की पीड़ा शामिल है। कभी-कभी अपनी अभिव्यक्ति में वे व्यंग्य की धारदार शैली का भी बढ़िया इस्तेमाल करते हैं। वे अपने पास उपलब्ध रंगों से विविधरंगी छवियां बनाते हैं। इन छवियों में समाज के सुख-दुख भी हैं और ज़िंदगी की धूप छांव भी है। यह कारण है कि उनकी ग़ज़लें पाठकों की हमसफ़र बन जाती हैं।
लज़ीज़ व्यंजनों में घुल चुके नमक की तरह
ग़ज़ल है जीस्त की मिट्टी में उर्वरक की तरह
इस नये ग़ज़ल संग्रह के लिए मैं अभिषेक को दिल से बधाई देता हूं और उम्मीद करता हूं कि वे रचनात्मकता के नए आयाम रचते हुए ग़ज़ल के इसी राजमार्ग पर गतिशील रहेंगे।
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आपका : देवमणि पांडेय
सम्पर्क : 98210 82126
मोलियर के प्रसिद्ध नाटक कंजूस का मंचन
मोलियर के प्रसिद्ध नाटक कंजूस का मंचन
हंसी ठहाकों के बीच चित्रनगरी संवाद मंच मुंबई में मोलियर के मशहूर नाटक 'कंजूस' का मंचन हुआ। बारिश की आशंका के बावजूद 'कंजूस' के कारनामों पर ठहाका लगाने के लिए अच्छी तादाद में दर्शक पधारे और उन्होंने इस कॉमेडी नाटक का जमकर लुत्फ़ उठाया। ख़ुशी की बात यह है कि दशकों में कुछ बच्चे भी मौजूद थे और उन्हें भी इस प्रस्तुति में भरपूर आनंद आया। केशव गोरे स्मारक ट्रस्ट गोरेगांव के मृणालताई हाल में मंचित इस नाटक में रंगगर्मी विजय कुमार और उनके साथी कलाकारों का अभिनय ज़बरदस्त रहा।

मिर्ज़ा बेग़ (कंजूस) का चरित्र सबसे मज़ेदार और चुनौतीपूर्ण है जो दर्शकों को बाँधे रखता है। विजय कुमार ने इसके लिए बॉडी लैंग्वेज़ का ज़बरदस्त इस्तेमाल किया है। कई बार उनकी देह भाषा दर्शकों से ताली बजवाती है। नाटक के बाक़ी सभी पात्रों ने अपनी अपनी भूमिका को सराहनीय ढंग से अंजाम तक पहुंचाया है।

कुल मिलाकर, 'कंजूस' फ्रांसीसी नाटककार मोलियर के कालजयी नाटक का एक सफल हिंदी रूपांतरण है। कहा जाता है कि सन् 1963 में हज़रत आवारा ने इसका हिंदी रूपांतरण किया था। यह नाटक आज भी हास्य और व्यंग्य के माध्यम से लोभ-लालच के बुरे प्रभावों पर प्रकाश डालता है। मनोरंजक प्रस्तुति के कारण दर्शकों ने इसे ख़ूब पसंद किया। नाटक के अंत में विजय कुमार ने श्रोताओं से संवाद किया और अपना 'मन बसिया' गीत भी सुनाया।
28 सितंबर स्वर कोकिला लता मंगेशकर का जन्मदिन है। दशकों ने उन्हें आदर के साथ याद किया। गायिका नाज़नीन ने उनकी पावन स्मृति में उनकी गाई हुई एक ग़ज़ल सुनाई जिसे मजरुह सुलतानपुरी ने लिखा है। अंत में डॉ मधुबाला शुक्ल ने आभार व्यक्त किया।
इस अवसर पर दर्शकों में कई प्रतिष्ठित रंगकर्मी मौजूद थे। इनमें जयंत जी, हरीश जी, राजेश जादव, प्रमोद सचान, सोनू पाहूजा, राजकुमार कनौजिया और शाइस्ता ख़ान शामिल थे। रचनाकार जगत से आभा बोधिसत्व, अंबिका झा, मंजू शर्मा, अनिल गौड़, हेमंत शर्मा, राजू मिश्र कविरा और अनुज वर्मा उपस्थित थे।
आपका : देवमणि पांडेयस
सम्पर्क : 98210 82126
बुधवार, 25 दिसंबर 2024
लखनऊ यात्रा की मधुर यादें
सोमवार, 29 जुलाई 2024
मुकेश जयंती पर मुम्बई में संगीत समारोह
मुकेश जयंती पर मुम्बई में संगीत समारोह
बेमिसाल गायक मुकेश ने वक़्त के कैनवास पर अपनी आवाज़ के रंगों से कामयाबी की एक ऐसी इबारत लिखी जिसकी चमक आज भी बरकरार है। वे लफ़्ज़ों की रोशनाई में अपने दिल की सम्वेदना घोल देते थे। इसलिए उनके गीत आज भी श्रोताओं की धड़कनों के साथ एक आत्मीय रिश्ता क़ायम कर लेते हैं।
आज भी गायक मुकेश की रूहानी आवाज़ उदासियों के अंधेरों में रोशनी की लकीर खींच देती है। हालांकि उन्होंने उमंग और उल्लास के भी कई गीत गाए, लेकिन उनकी इमोशनल आवाज़ दर्द की जागीर बन गई है। उनके ऐसे गीतों ने प्यार करने वालों की कई-कई बेचैन पीढ़ियों को सुकून अता किया है। कहा जाता है कि मुकेश ने अपने 35 साल के कैरियर में 525 हिन्दी फ़िल्मों में 900 गीत ही गाये मगर मुकेश के गीतों की लोकप्रियता इतनी ज़्यादा रही कि अक्सर लोग यही समझते हैं कि मुकेश ने भी हज़ारों गीत गाये होंगे। उन्होंने अपने दौर के सभी प्रमुख अभिनेताओं के लिए गाया। राज कपूर उन्हें अपनी आवाज़ कहते थे।
दक्षिण मुंबई में जहां नेपियन सी रोड और भूलाभाई देसाई रोड का मिलन होता है उसका नाम है मुकेश चौक। इसी मोहल्ले की सरकारी कॉलोनी हैदराबाद इस्टेट में मैं तेरह साल तक रहा। थोड़ी ही दूर पर कमला नेहरू पार्क यानी हैंगिंग गार्डन है। फ़िल्म पत्रिका माधुरी के संपादक अरविंद कुमार जी ने बताया था कि इस पार्क में रोज़ सुबह मॉर्निंग वॉक के लिए गायक मुकेश आते थे। कोई भी उनसे मुलाक़ात कर सकता था। बात कर सकता था। मगर अब समय बदल गया है। हैदराबाद इस्टेट के सामने प्रियदर्शनी पार्क है। एक दिन शाम को इसी पार्क में घूमते हुए मुकेश जी के पौत्र नील नितिन मुकेश से सामना हो गया। उनके दाएं बाएं दो बॉडीगार्ड थे। एक नौकर तौलिया लेकर पीछे पीछे चल रहा था। यानी उनसे संवाद का कोई रास्ता नहीं था।
दिल्ली के मुकेशचंद्र माथुर का जन्म 22 जुलाई 1923 को हुआ। उन्होंने दसवीं तक पढ़ाई करके सार्वजनिक निर्माण विभाग में नौकरी शुरू की लेकिन क़िस्मत ने उन्हें दिल्ली से मुंबई पहुंचा दिया। इसका श्रेय अभिनेता मोतीलाल को दिया जाता है। फ़िल्म 'निर्दोष' (1941) में मुकेश को गाने और अभिनय का काम मिला। बतौर पार्श्व गायक सन् 1945 में फ़िल्म 'पहली नज़र' से पहचान मिली। गीत था - "दिल जलता है तो जलने दे "। मुकेश के आदर्श गायक कुंदनलाल सहगल का प्रभाव इस पर स्पष्ट दिखाई देता है। संगीतकार नौशाद के साथ मुकेश ने अपनी पार्श्व गायन शैली विकसित की।
चालीस के दशक में दिलीप कुमार के लिए सबसे ज़्यादा गीत गाने वाले मुकेश को पचास के दशक में एक नयी पहचान मिली। उन्हें राज कपूर की आवाज़ कहा जाने लगा। ख़ुद राज कपूर ने स्वीकार किया - "मैं तो बस शरीर हूँ मेरी आत्मा तो मुकेश है।" बतौर पार्श्व गायक लोकप्रियता हासिल करने के बाद एक दिन मुकेश फ़िल्म निर्माता बन गये। सन् 1951 में फ़िल्म ‘मल्हार’ और 1956 में ‘अनुराग’ निर्मित की। दोनों फ़िल्में फ्लॉप रहीं। कहा जाता है कि मुकेश को बचपन से ही अभिनय का शौक था। फ़िल्म ‘अनुराग’ और ‘माशूक़ा’ में वे हीरो बनकर आये। लेकिन जनता ने उन्हें पसंद नहीं किया। वे फिर से गायिकी की दुनिया में लौट आये। यहूदी, मधुमती, अनाड़ी और जिस देश में गंगा बहती है जैसी फ़िल्मों ने उनकी गायकी को एक नयी पहचान दी।
▪️गायक मुकेश को अपनी बेमिसाल गायिकी के लिए चार बार फ़िल्म फेयर अवार्ड मिला।▪️
(1) सन् 1959 में अनाड़ी फ़िल्म के गीत ‘सब कुछ सीखा हमने न सीखी होशियारी’ के लिए। ऋषिकेश मुखर्जी की फ़िल्म 'अनाड़ी' में मुकेश के जिगरी दोस्त राज कपूर को भी पहला फ़िल्म फेयर अवॉर्ड मिला।
(2) सन् 1970 में मनोज कुमार की फ़िल्म 'पहचान' के गीत "सबसे बड़ा नादान" के लिए।
(3) सन् 1972 में मनोज कुमार की ही फ़िल्म 'बेईमान' के गीत "जय बोलो बेईमान की" के लिए।
(उपरोक्त तीनों फ़िल्मों के संगीतकार शंकर जयकिशन थे)
(4) सन् 1976 में यश चोपड़ा की फ़िल्म ''कभी कभी के शीर्षक गीत के लिए मुकेश को चौथा फ़िल्म फेयर अवॉर्ड मिला। (संगीतकार ख़य्याम)
साल 1974 में फ़िल्म ''रजनीगंधा'' के गाने "कई बार यूं भी देखा है" के लिए मुकेश को राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
सत्तर के दशक में धरम करम, आनन्द, अमर अकबर अॅन्थनी आदि फिल्मों में मुकेश ने सुपरहिट गाने दिये। मुकेश ने अपने कैरियर का आखिरी गाना अपने दोस्त राज कपूर की फ़िल्म सत्यम शिवम् सुंदरम के लिए गाया- “चंचल शीतल निर्मल कोमल”। लेकिन 1978 में इस फ़िल्म के रिलीज होने से दो साल पहले ही 27 अगस्त 1976 को मुकेश ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।
मुकेश का परिवार :
घर वालों की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ अपने जन्मदिन 22 जुलाई 1946 को गुजराती लड़की सरल त्रिवेदी से मुकेश ने प्रेम विवाह किया था। वे तीन बच्चों के पिता बने। बेटे का नाम नितिन मुकेश और बेटियों का रीटा और नलिनी है।
मुकेश के बेटे गायक नितिन मुकेश ने भी कई फ़िल्मों में अपनी आवाज़ दी है। नितिन मुकेश के बेटे यानी मुकेश के पौत्र नील नितिन मुकेश बॉलीवुड के चर्चित अभिनेता हैं।
गीतकार हरिश्चंद्र दास गायक मुकेश के परम भक्त हैं। वे पिछले सैंतीस सालों से गायक मुकेश के जन्मदिन पर मुकेश जयंती समारोह आयोजित करते हैं। इस बार यह संगीत समारोह 27 जुलाई 2024 को कांदिवली, मुम्बई के निर्वाण सभागृह में आयोजित किया गया जिसमें कई बेहतरीन गायकों ने शिरकत की। इनमें सुधाकर स्नेह, सुरेशानंद, नारायण आहूजा, संजीव झा, कमल धमाली, दामोदर राव, श्रीरंजनी अय्यर, दर्शना कदम, श्रुति झा, रेखा राव, ममता राव और स्वयं हरिश्चंद्र दास शामिल थे। इस संगीत संध्या के संचालन में मुझे भी भरपूर आनंद आया। मेरे दोस्तों- पुष्पा वर्मा, अर्चना जौहरी, रतिका जौहरी, प्रतिमा सिन्हा, क़मर हाजीपुरी और ताज मोहम्मद सिद्दीकी ने अपनी मौजूदगी से आयोजन की गरिमा बढ़ाई।
हिंदी सिनेमा के महान गायक मुकेश की जयंती पर उनकी स्मृतियों को सादर नमन ! आइए हम भी मुकेश की आवाज में गुनगुनाएं ....
किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार
किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार
किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार
जीना इसी का नाम है ...
रिश्ता दिल से दिल के ऐतबार का
ज़िन्दा है हमीं से नाम प्यार का
कि मर के भी किसी को याद आयेंगे
किसी के आँसुओं में मुस्कुरायेंगे
कहेगा फूल हर कली से बार बार
जीना इसी का नाम है...
* * *
आपका - देवमणि_पांडेय
सम्पर्क : 98210 82126





















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