Recent Posts

Friday, March 18, 2011

बादल उड़े अबीर के, बरसे रंग-गुलाल



मुम्बई में पुस्तक लोकार्पण का समारोह एक दृश्य

फागुन के दोहे

सरसों फूली खेत में, मादक हुई बयार
नैनों में होने लगी, सपनों की बौछार

बादल उड़े अबीर के, बरसे रंग-गुलाल
आँखों से बातें हुई , सुर्ख़ हुए हैं गाल

पुरवाई में प्रेम की , ऐसे निखरा रुप
मुखड़ा गोरी का लगे, ज्यों सर्दी की धूप

मुड़कर देखा है मुझे, हुई शर्म से लाल
एक नज़र में हो गया, मैं तो मालामाल

दिल को भाया है सखी, साजन का यह खेल
मुँह से कुछ कहते नहीं, करते हैं ई मेल

रीत अनोखी प्यार की, और अनोखी राह
दिल के हाथों हो गए , कितने लोग तबाह

होली का गीत

भंग का रंग चढ़ाकर आई दीवानों की टोली
झूम के आओ नाचे गाएँ, बनकर सब हमजोली

उड़ता रंग अबीर गुलाल
चेहरे हुए हैं सबके लाल
छूटी पिचकारी से गोली
भीगी अंगिया चूनर चोली
मस्ती हवा ने दिल में घोली
होली आई रे होली.....

निकली घर से आज चमेली
जैसे दुल्हन नई नवेली
कितनी सुंदर कितनी भोली
होली आई रे होली .....

झाँके खिड़की से अलबेली
भरकर गुब्बारों से झोली
सबसे करती हँसी ठिठोली
होली आई रे होली.....

लड़की दिखती छैल छबीली
संग में कोई नहीं सहेली
लड़के बोल रहे हैं बोली
होली आई रे होली

3 comments:

सुभाष नीरव said...

आपके ये दोहे तो कमाल के हैं। बार बार पढ़ने को मन करता है। बधाई !

pran sharma said...

AAPKE DOHON KE RANGON SE TUN TO
KYA MUN BHEE RANG GAYAA HAI .
KASH , AAPKEE MADHUR VANI MEIN
SUNE HOTE .

सुनील गज्जाणी said...

namaskaar 1
khob surat doho ke liue badhai !
sadhuwad !