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Wednesday, May 30, 2012

ग़ज़ल यानी दूसरों की ज़मीन पर अपनी खेती - दूसरी किश्त

पहली किश्त पढ़कर लंदन से शायर  प्राण शर्मा ने रोचक जानकारी दीफ़िल्म उमराव जान में ज्ञानपीठ अवार्ड से सम्मानित शायर शहरयार की ग़ज़ल का मतला  है -दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिये / बस एक बार मेरा कहा मान लीजिये। इस मतला के दोनो मिसरे क्रांतिकारी शायर राम प्रसाद `बिस्मिल` की ग़ज़ल से उठाये गए थे। उनकी उस ग़ज़ल के दो शेर देखिए-

दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिये 
खंजर को अपने और ज़रा तान लीजिये 

बेशक़ न मानियेगा किसी दूसरे की बात 
बस एक बार मेरा  कहा मान लीजिये 
इस लेख पर बहुत अच्छे-अच्छे कमेंट आए और एक महत्वपूर्ण चर्चा के लिए रास्ता खुला।नीरज गोस्वामी के अनुसार हर शेर चाहे वो किसी और के कहे जैसा क्यूँ न लगे अपनी महक अलग ही रखता है...ये बात ही शायरी को आज तक जिंदा रखे हुए है और जिंदा रखेगी।  तिलक राज कपूर ने कहा- पूर्ण मौलिकता मिलना शायद कठिन हो लेकिन अगर शेर में कुछ भी नया है तो उसे समग्र मूल्‍यांकन में मौलिक माना जाना चाहिये। सतपाल ख़याल ने फ़रमाया- ग़ज़ल में बहुत दोहराव है। आप चराग और हवा पर अगर शेर खोजेंगे तो हैरान रह जायेंगे कि हर शायर चरागों को जलाता बुझाता रहता है। कोई शाम होते ही बुझा देता है तो कोई सुबह होते ही जला लेता है। नीलम अंशु का कहना है- पहली बार पता चला कि ग़ज़ल में भी ज़मीन झगड़े की वजह बनती है। ऐसे कमेंट्स के आधार पर दूसरे किश्त तैयार हुई है। तो आइए इसका भी लुत्फ़ उठाइए और चर्चा को आगे बढ़ाइए


शाय नीरज गोस्वामी : (रायगढ़, महाराष्ट्र)
सदियों से वही इंसान हैं और वही उनकी खुशियाँ दुःख समस्याएं... कुछ भी तो नहीं बदला सिवा समय के...न इंसानी फितरत न सोच...तो फिर नया ख़याल आएगा कहाँ से...बड़े बड़े शायर जो पहले कह गए उन्होंने कोई बात नयों के लिए छोड़ी ही नहीं...लेकिन मजे की बात है शायरी अब भी वो ही बात करती है जो पहले करती थी लेकिन उसके बदलते अंदाज़ ने उसे अब तक दिलचस्प बनाये रखा है...हर शायर उन्हीं घिसी पिटी बातों को अपने दिलचस्प अंदाज़े बयां से सुनने लायक बना देता है....यादगार बना देता है...लगता था ग़ालिब के बाद कोई क्या लिखेगा लेकिन साहब उनके बाद भी शायरी परवान चढ़ी और क्या खूब चढ़ी...ये सिलसिला कहीं थमने वाला नहीं...जैसे हर इंसान दो हाथ दो पैर वाला है लेकिन अपने आप में अनूठा है वैसे ही हर शेर चाहे वो किसी और के कहे जैसा क्यूँ न लगे अपनी महक अलग ही रखता है...ये बात ही शायरी को आज तक जिंदा रखे हुए है और जिंदा रखेगी...कुमार पाशी साहब ने इसी बात को क्या खूब कहा है:-
जो शे'र भी कहा वो पुराना लगा मुझे
जिस लफ्ज़ को छुआ वही बरता हुआ लगा

शायर तिलक राज कपूर : (भोपाल, .प्र.)
मुझे याद आ रहे हैं मरहूम मोहसिन रतलामी जिन्‍होंने मुझे यह बात कुछ अलग तरह से कही थी। हुआ यह कि 'दिल के अरमॉं ऑंसुओं में बह गये' के हर शेर पर मैंने उलटी बात कही, मसलन: 'शायद उनका आखिरी हो ये सितम / हर सितम ये सोच कर हम सह गये'। इस पर मैनें कहा- 'सह लिया पहला सितम तुमने अगर / तो सितम सारी उमर ढायेंगे'। मोहसिन साहब बोले कि ये तो आपने ज़मीन उठा ली। मैनें आसमॉं उठाते तो सुना था मगर मेरे लिये ये नयी बात थी। बहरहाल बात समझ में आई तो मैनें कहा- हुजूर ज़मीन छोडि़ये, तेवर तो देखिये।

मुझे लगता है कि हमें पूर्ण मौलिकता और समग्र मौलिकता में भेद करने की जरूरत है। आपकी प्रस्‍तुति के नज़रिये से देखें तो पूर्ण मौलिकता मिलना शायद कठिन हो लेकिन अगर शेर में कुछ भी नया है तो उसे समग्र मूल्‍यांकन में मौलिक माना जाना चाहिये। पूर्ण मौलिकता तो शायद अन्‍य काव्‍य में भी नहीं मिलेगी। एक और स्थिति हो सकती है मात्र संयोग की। एक ही ज़मीन पर कई-कई शेर कहने वाले कई शायर मिल जायेंगे। मुझे इसमें कुछ अजूबा नहीं लगता। हॉं, शब्‍दश: उठाये हुए शेर अलग दिख जाते हैं। तरही ग़ज़ल में तो एक पूरा मिसरा उठाना ही पड़ता है, मेरा मानना है कि ऐसे गिरह के शेर शायर को अपनी ग़ज़ल से खुद-ब-खुद खारिज कर देने चाहिये।

आलोक श्रीवास्तव और मुनव्वर राना साहब के अशआर की स्थिति जरूर थोड़ा विचलित करती हैं। किसने पहले कहा ये तो मैं नहीं जानता लेकिन यहॉं जो समानता है वह आपत्तिजनक है। मीर और ग़ालिब के अशआर में तो अंतर की बहुत गुँजाइश है। 'चल अकेला' पर मुझे नहीं लगता कि किसी ओर से आपत्ति उठाई गयी हो। अभी आपने काव्‍य से काव्‍य का संदर्भ उठाया है ज़मीन की दृष्टि से। बहुत सा काव्‍य ऐसा मिल जायेगा जो किसी कहानी, उपन्‍यास या यहॉं तक कि यात्रा-वृतान्‍त से उठाया गया है। अगर तुलना में कहीं भेद की गुँजाईश है तो उसे महत्‍व दिया जाना चाहिये। यह भेद, शब्‍द, भाव, काल या अन्‍य किसी भी स्‍वरूप का हो सकता है।

नीरज भाई की टिप्‍पणी में कुमार पाशी साहब के शेर पर कहता हूँ कि:

अहसास, लफ़्ज़, बह्र, नया कुछ न जब मिला
सोचा बहुत कहूँ, न कहूँ, फिर भी कह गया

शायर के साथ यह समस्‍या अक्‍सर रहती होगी लेकिन कुछ तो होता ही है जो उसके कहे शेर को अलग पहचान देता है।



कवि वीनस केशरी : (इलाहाबाद, .प्र.)
देवमणि जी, अच्छी जानकारी दी है इस पोस्ट के सम्बंधित एक 2009 की एक पोस्ट का लिंक दे रहा हूँ, देखिएगा ... http://subeerin.blogspot.in/2009/05/blog-post_23.html
जनाब रामपाल अर्शी का शे'र -

कफ़न कांधे पे लेकर घूमता हूं इसलिये अर्शी
न जाने किस गली में जिंदगी का शाम हो जाये



शायर सतपाल ख़याल : (सोलन, हि.प्र.)
लेख बहुत ही महत्वपूर्ण है। ग़ज़ल में भी ज़मीनों का झगड़ा है और यह सही है कि न सिर्फ़ नये बल्कि सफ़ल गज़लकार भी पुराने शायरों के मिसरों को किसी भी तरह इस्तेमाल करते हैं। ग़ज़ल में एक दोष ये है कि बहुत शे'र कहे जा चुके हैं और मसाईल एक जैसे हैं और ग़ज़ल में तो दुहराव बहुत है। आप चराग और हवा पर अगर शे'र खोजेंगे तो हैरान रह जायेंगे कि हर शायर चरागों को जलाता बुझाता रहता है। कोई शाम होते ही बुझा देता है तो कोई सुबह होते ही जला लेता है। ग़ज़ल में बहुत दोहराव है लेकिन ताज़गी भी बहुत है जिसका उदाहरण मुनव्वर राणा साहब हैं। कितने नये और सफ़ल प्रयोग किये हैं। मेरे ख़याल से महत्वपूर्ण ये नहीं है कि आप क्या कहते हैं लेकिन ग़ज़ल में महत्वपूर्ण यह है कि आप कितनी नज़ाकत और कैसे अंदाज़ में कहते है, यही हुनर है शायरी का जिसका उदाहरण है-

तुम मेरे पास होते हो गोय / जब कोई दूसरा नहीं होता.....Simple , innocent and beautifull..


शायर तिलक राज कपूर (भोपाल, .प्र.)
वीनस के उदाहरण के संदर्भ में:
कफ़न कांधे पे लेकर घूमता हूं इसलिये अर्शी
न जाने किस गली में जिंदगी का शाम हो जाये
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाये

दो खूबसूरत शेर सामने हैं लेकिन बात है नज़रिये की। समालोचक की दृष्टि से देखूँ तो सब ठीक ठाक है लेकिन कुछ देर को आलोचक होने का दुस्‍साहस करूँ तो बहुत से दिलों को चोट पहुँचेगी फिर भी एक बात देखने की है कि शाम वृद्धावस्‍था की स्थिति है मृत्‍यु-काल की नहीं। और यहीं दोनों अशआर में मिसरों का परस्‍पर संबंध समाप्‍त हो जाता है। पहले शेर में जो बात कही गयी है वह सर पर कफ़न बॉंधे घूमने के अधिक करीब है और इसमें शाम होना न होना महत्‍व नहीं रखता। दूसरे शेर में जो उजाले की बात आई है वह अंधकार से तो संबंध रख सकती है लेकिन शाम के धुँधलके के लिये उपयुक्‍त नहीं कही जा सकती है। अगर मेरे कथन से किसी की भावनायें आहत हों तो पूर्ण विनम्रता से मेरी क्षमा प्रार्थना पूर्व से ही प्रस्‍तुत मानें।


नीलम अंशु : (कोलकाता, .बंगाल)
बेहद महत्वपूर्ण जानकारी है। सचमुच पहली बार पता चला कि ग़ज़ल में भी ज़मीन झगड़े की वजह बनती है। ऐसा भी तो हो सकता है कि जिसने बाद में लिखा, उसने संयोगवश कभी पहले वाले शायर को पढ़ा ही न हो क्योंकि हरेक रचनाकार की हर रचना हर किसी ने पढ़ ही रखी हो ये भी तो ज़रूरी नहीं।


Yuvraj Shrimal (Sr. Correspondent, DNA Newspaper, Jaipur, Raj.)
Pandey Ji, I read your article, Ghazal Yani Dusron Ki Zameen Par Apni Kheti, uploaded on Bhadas4media. Your analysis is really truth revealing and bringing forth a concept that nothing is original. But, i would like to say that i have read and listen the creations by these Shayars. All these creations might be using same words, but their spirits are variant. They are masterpieces that sooth the minds. If they are copies up to some extent then what's wrong in this as 'copies are copies of the copies'.
 
कथाकार सुधा अरोड़ा : (मुम्बई) 
देवमणि ! कथायात्रा 1978 में एक गज़लकार दिनेशकुमार शुक्ल ने अपनी पूरी ग़ज़ल के बीच यह एक शेर लिखा था-
मेरी कुटिया के मुकाबिल आठ मंजि़ल का मकां,
तुम मेरे हिस्से की शायद धूप भी खा जाओगे !

पच्चीस साल बाद जावेद अख्तर की किताब 'तरकश'में यह एक पृष्ठ पर था-!
ऊँची इमारतों से मकां मेरा घिर गया
कुछ लोग मेरे हिस्से का सूरज भी खा गये !


शायर तिलक राज कपूर : (भोपाल, .प्र.)
पहले सुधा जी द्वारा दिये गये उदाहरण की बात ! जब कुटिया के मुकाबिल आठ मंजि़ल का मकां खड़ा हो गया तो शायद कहॉं बचा, फिर भी प्रतीकात्‍मक दृष्टि से देखें तो दिनेश जी ने एक आशंका भर व्‍यक्‍त की थी अपने शेर में। जबकि इस बीच चरित्र इतना गिर गया है कि वह आशंका जावेद साहब के शेर तक आते आते यर्थाथ में तब्‍दील हो गयी। यह उदाहरण बहुत ही रुचिकर है, दोनों काल-संदर्भ में तत्‍समय के चरित्र की बात कर रहे हैं और अपने-अपने काल संदर्भ में दो अलग शेर हैं। युवराज जी की बात पर आऊँ तो मेरा मानना है कि नकल नहीं यहॉं सुदृढ़ता का महत्‍व है। किसी समय विशेष में कहा गया कोई शेर जब किसी शायर को कमज़ोर लगता है तो वह अपने तरह से उसे मज़बूत कर प्रस्‍तुत करने का प्रयास करता है। यह मज़बूती सुनने वालों को पसंद आती है तो शेर चल निकलता है वरना दफ़्न हो जाता है एक नकल के रूप में। बशीर बद्र साहब ने जब '...शाम हो जाये' वाला शेर कहा तो वह लोगों को पसंद आया और इतना आया कि उनके नाम का पर्याय बन गया, बस यही शायरी है। जो शेर चल निकला वो चल निकला नहीं तो दीवान के दीवान दफ़्न हैं जो अदबी दायरे से बाहर ही नहीं निकल पाते। आम श्रोता तक पहुँच ही नहीं पाते। फिर भी- शाम हो जाये' जैसी स्थिति में शायर का कर्तव्‍य तो बनता है कि वह प्रस्‍तुत करते समय लोगों को बताये कि मिसरा कहॉं से उठाया है। मिसरा उठाना गुनाह तो नहीं हॉं यह छुपाना गुनाह है कि कहॉं से उठाया।


शायर प्राण शर्मा : (लंदन, यूके)
प्रिय देवमणि जी! आपका लेख पसंद आया।मैंने यह शेर पहले कहीं पढ़ा था -मेरी कुटिया के मुक़ाबिल आठ मंजिल का मकां / तुम मेरे हिस्से की शायद धूप भी खा जाओगे। मुझे शेर के रचयिता के नाम का पता नहीं था। दाद देनी पड़ेगी हिन्दी की प्रसिद्ध कहानीकार और कवयित्री सुधा अरोरा जी को, उन्हें तीन दशक पहले कहा गया गया शेर और शायर का नाम अब भी याद है। उर्दू में एक ख़याल के अनेक मिसरे हैं जिनको इस्तेमाल करने में उस्ताद शायरों ने भी गुरेज़ नहीं किया है। देखिए उनके कहे एक ख़याल के मिसरे और अशआर -

हम वहाँ हैं जहाँ से हमको भी
कुछ हमारी खबर नहीं आती - ग़ालिब

कुछ तुम्हारा पता नहीं चलता
कुछ हमारी खबर नहीं आती - अदम

कुछ गम-- इश्क भी कर देता है मजनून `अदम`
और कुछ लोग भी दीवाना बना देते हैं - अदम

कुछ तो होते हैं मुहब्बत में जुनूं के आसार
और कुछ लोग भी दीवाना बना देते हैं - ज़हीर देहलवी

मुहब्बत का दरिया, जवानी की लहरें
यहीं डूब जाने को जी चाहता है - अमजद नज्मी

हसीं तेरी आँखें, हसीं तेरे आंसूं
यहीं डूब जाने को जी चाहता है - जिगर मुरादाबादी

उमराव जान में शहरयार की ग़ज़ल का मतला है -

दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिये
बस एक बार मेरा कहा मान लीजिये

इस मतला ने शहरयार को रातों-रात मशहूरियों की बुलंदी पर पहुँचा दिया था। मतला के दोनो मिसरे क्रांतिकारी राम प्रसाद 'बिस्मिल ` की ग़ज़ल से उठाये गए थे। उनकी चार शेरों की ये ग़ज़ल पढ़ कर देखिए -

दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिये
खंजर को अपने और ज़रा तान लीजिये

बेशक़ न मानियेगा किसी दूसरे की बात
बस एक बार मेरा कहा मान लीजिये

मर जायेंगे मिट जायेंगे हम कौम के लिए
मिटने न देंगे मुल्क, ये एलान लीजिये
'
बिस्मिल` ये दिल हुआ है अभी कौम पर फ़िदा
अहल--वतन का दर्द भी पहचान लीजिये

आपके जानकारी भरे लेख की एक बार और तारीफ़ करता हूँ।--- प्राण शर्मा


शायर तिलक राज कपूर : (भोपाल, .प्र.)
प्राण साहब के उदाहरणों को देखें तो एक बात तो स्‍पष्‍ट है कि पूरा मिसरा ले लेना भी स्‍वीकार किया गया है बशर्ते कि कहन में बदलाव हो। ग़ालिब साहब के शेर में स्‍पष्‍ट बेखुदी है और अदम साहब का शेर मैं अभी समझने का प्रयास ही कर रहा हूँ कि यह भी बेखुदी ही है या उसके आस-पास भटकता कोई और भाव। मुझे ग़ालिब साहब का शेर कुछ यूँ याद था: हम वहॉं हैं जहॉं से खुद हमको / आप अपनी खबर नहीं आती। अदम साहब और ज़हीर देहलवी के शेर में भाव पक्ष एक ही है। मेरे मत में किसी और के पूर्व में कहे मिसरे को पूर्व शेर के भाव में ही बॉंधना तो यह कहता है कि पहले वाला शायर कुछ दमदार शेर नहीं कह सका, मैं अब दमदार शेर दे रहा हूँ। अमजद नज्मी साहब और जिगर मुरादाबादी साहब के शेर एक ही भाव रखते हुए भी अलग-अलग मंज़र पर हैं इसलिये इनमें तो कोई समस्‍या नज़र नहीं आती। राम प्रसाद `बिस्मिल` के नाम से जो अशआर बताये गये हैं उनको लेकर मुझे शंका है, लगता है किसी मूवी में लिये गये शेर हैं ये जो मूल ग़ज़ल से हट के होंगे। मेरी शंका का कारण पहले शेर का भाव है। अब एक प्रश्‍न: शिकवा, शिकायतें, न गिला कीजिये अभी / बस एक बार मेरा कहा मान लीजिये'। मैं अगर खुलकर स्‍वीकार करूँ कि दूसरी पंक्ति पूरी की पूरी किसी अन्‍य शायर के शेर से ली गई है जिसका नाम मुझे ज्ञात नहीं तो क्‍या यह शेर अपना वज़ूद खो देगा। मुझे तो नहीं लगता।
 


Bloggerशायर देवमणि पाण्डेय : (मुम्बई)
मुझे लगता है कि 'ख़ुदाए-सुख़न मीर' से मिर्ज़ा ग़ालिब काफ़ी प्रभावित थे। उन पर मीर का यह असर साफ़-साफ़ दिखाई देता है। मिसाल के तौर पर दोनों के दो-दो शेर देखिए-

तेज़ यूँ ही न थी शब आतिशे-शौक़
थी ख़बर गर्म उनके आने की -मीर तकी मीर
थी ख़बर गर्म उनके आने की
आज ही घर में बोरिया न हुआ -मिर्ज़ा ग़ालिब

होता है याँ जहां में हर रोज़ो-शब तमाशा
देखा जो ख़ूब तो है दुनिया अजब तमाशा -मीर तकी मीर
बाज़ी-चा-अतफ़ाल है दुनिया मेरे आगे
होता है शबो-रोज़ तमाशा मेरे आगे -मिर्ज़ा ग़ालिब



शायर तिलक राज कपूर : (भोपाल, .प्र.)
मीर का शेर पहली बात तो ग़ालिब के शेर के मुकाबिल उँचे दर्जे का है, और दोनों शेर अलग-अलग स्थिति के हैं। दूसरे दोनों शेर एक ही बात तो कहते हैं मगर अलग-अलग तरह से बॉंधे गये हैं। अभिव्‍यक्ति एक है लेकिन मार्ग अलग।
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शायर प्राण शर्मा (लंदन, यूके)
प्रिय देवमणि जी ! आपकी जानकारी बहुत है। इतनी जानकारी तो किसी उर्दू के उस्ताद शायर की भी नहीं होगी। बिस्मिल के दूसरे शेर में रदीफ़ की ग़लती हो गई थी। सही मिसरा यूँ है -` मिटने न देंगे मुल्क ये ऐलान लीजिये'। राम प्रसाद बिस्मिल के कुछेक शेरों या मिसरों को काई शायरों ने ज्यों का त्यों उठाया है। जिगर मुरादाबादी का मशहूर शेर है -

ये इश्क नहीं आसां बस इतना समझ लीजे
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है

राम प्रसाद बिस्मिल के मक़्ता पर गौर फरमाईयेगा -

'बिस्मिल` ऐ वतन तेरी इस राह-ए-मुहब्बत में
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है

निदा फाज़ली इस शेर से पहचाने जाते हैं -

दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है
खो जाये तो मिट्टी है मिल जाये तो सोना है

निदा फाज़ली के शेर पर राम प्रसाद 'बिस्मिल' के इस शेर की पूरी झलक है -

सब वक़्त की बातें हैं सब खेल है किस्मत का   
बिंध जाये तो मोती है रह जाये तो दाना है

जिन शेरों या मिसरों से राम प्रसाद 'बिस्मिल' को ख्याति मिलनी चाहिए थी वो अन्य शायर लूट कर ले गए। उनके दो- तीन अशआर सुनियेगा -

आता है याद हमको गुज़रा हुआ ज़माना
वो झाड़ियाँ चमन की वो मेरा आशियाना
वो प्यारी-प्यारी सूरत वो मोहनी सी मूरत
आबाद जिसके दम से था मेरा आशियाना
आज़ादियाँ कहाँ वो अब मेरे घोंसले की
अपनी खुशी से आना अपनी खुशी से जाना

शुभ कामनाओं के साथ- प्राण शर्मा

13 comments:

नीरज गोस्वामी said...

देवमणि भाई इस निहायत दिलचस्प और नयी जानकारी से भरी पोस्ट के लिए बधाई स्वीकारें...पामोलिव की तरह "आपका भी जवाब नहीं...":-))

नीरज

Navin C. Chaturvedi said...
This comment has been removed by the author.
तिलक राज कपूर said...

नवीन भाई, वर्तमान चर्चा एक विशेष संदर्भ में है इसलिये आपके टिप्‍पणी यहॉं देना उचित नहीं लग रहा। अगर आपके अश'आर से वही स्थिति बन रही हो जो चर्चा का विषय है तो कुछ बात बने।

देवमणि पाण्डेय said...

प्राण शर्मा (लंदन, यूके)
प्रिय देवमणि जी,

शकील बदायूनी उर्दू के मशहूर शायर हैं। उन्होंने भी दूसरों के मिसरे या शेर उठाने में हर्ज़ नहीं समझा। उनके दो प्रसिद्ध फ़िल्मी गीत हैं -

ये ज़िन्दगी के मेले दुनिया में काम न होंगे
अफ़सोस हम न होंगे ... - ( मेला)

खुशी के साथ दुनिया में हज़ारों ग़म भी होते हैं
जहां बजती है शहनाई वहाँ मातम भी होते हैं
- ( बाबुल)

इन पंक्तियों को उन्होंने कितनी होशियारी से शायर कश्वित और दाग़ देहलवी की निम्नलिखित पक्तियों से उठाया है -

दुनिया के जो मज़े हैं हरगिज़ वे काम न होंगे
चर्चा यही रहेगा अफ़सोस हम न होंगे
- कश्वित

खुशी के साथ दुनिया में हज़ारों ग़म भी होते हैं
जहां बजते हैं नागाड़े वहाँ मातम भी होते हैं
- दाग़ देहलवी

pran sharma said...

MAINE SHAAYAD HEE AESEE CHARCHA KAHEEN AUR PADHEE HAI . BKAUL
NEERAJ GOSWAAMI-`DILCHASP CHARCHA `

निर्मला कपिला said...

mमेरी तो अचानक इस पोस्ट पर नजर पड गयी शायद मेरी खुशकिस्मती है\ बहुत अच्छी जानकारियाँ मिली हैं हम जैसे नये लोगों के लिये तो खास कर काम की बातें हैं। धन्यवाद आपका।

देवमणि पाण्डेय said...

प्राण शर्मा (लंदन, यूके)

प्रिय देवमणि जी ! उर्दू शायरी की एक परम्परा को स्वस्थ कहिये या अस्वस्थ कि किसी अच्छे मिसरे पर अन्य शायरों का अशआर कहने का झुकाव ग़ालिब,दाग़,इक़बाल,वफ़ा,जिगर,शकील इत्यादि कई शायरों ने इस परम्परा में अपनी - अपनी लेखनी चलाई और अन्य शायरों के मिसरों पर शेर कहने में गुरेज़ नहीं किया। इस से एक बड़ा लाभ ये हुआ कि इस बहाने पाठकों को अच्छे से अच्छा शेर पढ़ने को मिला और अलग - अलग शायरों की शैली, अभिव्यक्ति और ऊर्जा देखने को मिली। इसी परम्परा में राम प्रसाद बिस्मिल ने भी कुछ शायरों की पंक्तियों को उठाया है। इक़बाल की मशहूर पंक्तियाँ हैं -

मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना
हिंदी हैं हम , वतन है हिन्दोस्तां हमारा

राम प्रसाद बिस्मिल की पंक्तियों पर गौर फरमाईयेगा -

हिंदू हो या मुसलमां , कह दो मुखालिफों से
हिंदी हैं हम , वतन है हिन्दोस्तां हमारा

ग़ालिब का एक बहुत ही मशहूर शेर है -

उनके आने से जो आ जाती है मुँह पे रौनक
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है

दाग़ देहलवी के इस शेर पर भी नज़र डालिए -

अब पछताएँ नहीं, ज़ोर से तौबा न करें
आपके सर की कसम दाग़ का हाल अच्छा है

मीर तकी मीर का मतला है -

हम हुए, तुम हुए कि मीर हुए / तेरी ज़ुल्फ़ों के सब असीर हुए

लन्दन के शायर सोहन राही ने उक्त मतले को अपने शेर में यूँ ढाल दिया -

सबकी मंजिल तो एक है राही / हम हुए, तुम हुए कि मीर हुए

हिंदी कवियों का ध्यान इस परम्परा की ओर नहीं गया। सम्भव है कि 'मौलिकता ` में ही उनका विश्वास हो और किसी अन्य की पंक्ति को उठाने से वे घबराते हों। फिर भी कुछेक कवियों के मिलते - जुलते शेर मिल ही जाते हैं। दुष्यंत कुमार का एक लोकप्रिय शेर है -

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए

श्याम प्रकाश अग्रवाल इस ख़याल को यूँ कहते हैं -

रोशनी ही रोशनी हो जाये सारे शहर में
इस सिरे से उस सिरे तक आग जलनी चाहिए

इस ख़याल को पहले किस कवि ने शेर में ढाला ये खोज करने की बात है।------प्राण शर्मा

manu said...

क्यूं ख्याल अपने हों फैज़-ओ-मेरे-ग़ालिब से जुदा
या तो वो कुछ और होंगे, या हमीं इन्सां नहीं
:)

manu said...

क्यूं ख्याल अपने हों फैज़-ओ-मेरे-ग़ालिब से जुदा
या तो वो कुछ और होंगे, या हमीं इन्सां नहीं
:)

देवमणि पाण्डेय said...

डॉ. गौतम सचदेव (प्रतिष्ठित हिन्दी साहित्यकार, लंदन)...का ईमेल-
काव्य में मौलिकता का प्रश्न उतना ही पुराना है, जितना पुराना काव्य और उसकी समीक्षा । हज़ारों साल पहले संस्कृत के काव्यशास्त्र में भी इस प्रश्न का विश्लेषण किया गया था और यहाँ तक कहा गया था कि 'नास्ति अचौरो वणिकजनो नास्ति अचौरः कवि जनाः' अर्थात् न कोई व्यापारी अचोर होता है और न ही कवि । दोनों चोरी करते हैं । कवि के सन्दर्भ में इसका अर्थ यह है कि किसी कवि की जिन बातों को हम मौलिक समझते हैं, वे पहले भी संसार के किसी-न-किसी अन्य कवि द्वारा कही जा चुकी हैं, इसलिये प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से वह उसकी चोरी या नक़ल ही तो करता है । अगर वह अपनी भाषा के कवि की नहीं करता, तो जाने-अनजाने किसी अन्य भाषा के कवि की करता है । तब मौलिकता क्या है ? मौलिकता है अभिव्यंजना पद्धति, भाषा-शैली, जिसमें छन्द का चुनाव भी शामिल है और शामिल है कवि का अपने समकालीन जीवन तथा समाज के प्रति व्यक्त विचार या दृष्टिकोण' इसे ग़ालिब के शब्दों में संक्षेप में अन्दाज़े बयाँ भी कह सकते हैं । दरअस्ल आदिम काल से लेकर आज तक मनुष्य के भावों और संवेदनशीलता में कोई मौलिक अन्तर नहीं आया है। वह हमेशा की तरह आज भी सुख में सुखी होता है और दुख में दुखी और अगर वह मनुष्य रहा, तो आगे भी होता रहेगा । संस्कृत काव्यशास्त्र में काव्य के आनन्द को रस नाम देते हुए मनुष्य के तमाम भावों को नौ वर्गों में रखते हुए उन्हें स्थायी भाव कहा गया था (जिनके नाम हैं- रति, हास, शोक, क्रोध, उत्साह, भय, जुगुप्सा, विस्मय और निर्वेद। बाद में वात्सल्य को दसवाँ स्थायी भाव मानते हुए नौ रसों की बजाय दस रसों की परिकल्पना की गई)। आज हम यह नहीं मानते कि हमें काव्य से केवल आनन्द मिलता है या कुछ और । ख़ैर, यह एक अलग विषय है । मौलिकता की दृष्टि से हर कवि इन नौ या दस स्थायी भावों को ही तो व्यक्त करता है, अपनी प्रतिभा, कल्पनाशक्ति, ज्ञान और अभ्यास के आधार पर तथा अपने द्वारा चुने गये अलग-अलग प्रतीकों, बिम्बों, अलंकारों और शब्दों के माध्यम से। बस, उसकी कोशिश यह होनी चाहिये कि वह दूसरे के सिक्के को अपने नाम से न चलाये। दूसरों की इतनी नक़ल न करे कि उसकी रचना पर उसकी अपनी मुहर या छाप न रहे । कवि जो कुछ देखता और महसूस करता है, उसका इंटरनलाइज़ेशन (आभ्यन्तरीकरण) करता है, उसे आत्मसात् करता है और फिर अपनी रचना के रूप में उसका एक्सटरनलाइज़ेशन (बाह्यीकरण) करता है। ऐसा करके वह उस रचना पर अपने व्यक्तित्व की छाप छोड़ता है। अन्त में संक्षेप में समस्यापूर्ति वाली कविता और तरही ग़ज़ल के बारे में इतना और जोड़ना चाहता हूँ कि यदि कोई कवि या शायर अपने से पूर्ववर्ती रचनाकार की किसी रचना से प्रेरित होता है, या उसकी पंक्ति अथवा मिस्रे का प्रयोग करता है, तो उसे मूल रचनाकार को श्रेय देना चाहिये। ऐसा करके वह अपनी और प्रेरक रचना की श्रीवृद्धि करता है। यदि वह ऐसा नहीं करता, तो स्पष्ट है कि वह चोरी करता या अनुकरण। मैंने स्वयं ग़ालिब समेत जिन रचनाकारों और शायरों के मिस्रों को अपनी ग़ज़लों का आधार बनाया है (आप मेरा ग़ज़ल संग्रह 'बूँद-बूँद आकाश' देख सकते हैं,) उन्हें हमेशा श्रेय दिया है ।

तिलक राज कपूर said...

डॉ. गौतम सचदेव ने जो संदर्भ दिये हैं वो इस बात की पुष्टि करते हैं कि अगर पूर्व संदर्भ शायर की जानकारी में हैं तो उसका दायित्‍व बनता है यह कहने का कि मूल विचार कहॉं से लिया गया है।
पिय, मय, साकी, सुराही, मधुशाला के समानार्थी शब्‍दों को सम्मिलित करलें तो यह कहना ग़लत नहीं होगा कि इनके प्रतीकात्‍मक प्रयोग का मूल कहीं तो रहा होगा जो आज शायद किसी को ज्ञात भी न हो लेकिन लगभग हर शायर कभी न कभी इनका उपयोग करता है। अब इन शब्‍दों को सूफ़ी शायरी के संदर्भ में देखें तो बहुतायत में उपयोग किया जाता है ईश्‍वरीय शक्ति से संबंध जोड़ने में। मेरा मानना है कि जो शायर सूफ़ी कलाम कहता है वह चोरी की प्रवृत्ति का हो ऐसी संभावना कम है अन्‍यथा वह उन गहराईयों में डुबकी लगा ही नहीं पाता जहॉं से ऐसे कलाम आते हैं। चोरी से पहले चोरी की भावना पैदा होती है (कारण कुछ भी हो)। चोरी से अच्‍छा कलाम पैदा नहीं किया जा सकता (उन मामलों को छोड़कर जिनमें यथावत् उठा लिया गया हो)। ऐसी स्थिति में यह तो हो सकता है कि कभी सुना गया कोई कलाम अचेतन में पड़ा हो और उठ खड़ा हो और कुछ रूप ले ले। ऐसा करने से जो कुछ प्राप्‍त होगा उसमें मूल से कुछ न कुछ भिन्‍नता अवश्‍य रहेगी।

संजय भास्कर said...

.... प्रशंसनीय बधाई

सुनील गज्जाणी said...

dev sab pranam !
ये शायद नमूना हो सकता है ऐसे ढेरों उदहारण मिल सकते . मुख्तलिफ फनकारों के .,अच्छा लगा .
शुक्रिया