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Wednesday, January 25, 2017

देवमणि पाण्डेय की ग़ज़ल



देवमणि पाण्डेय की ग़ज़ल 

परवाज़ की तलब है अगर आसमान में
ख़्वाबों को साथ लीजिए अपनी उड़ान में

बच्चों के साथ चाहती है धूप खेलना
आने तो दीजिए उसे अपने मकान में

मोबाइलों के खेल में यूँ बच्चे खो गए
बैठे हैं अब उदास खिलौने दुकान में

लफ़्ज़ों से आप लीजिए मत पत्थरों का काम
थोड़ी मिठास घोलिए अपनी ज़ुबान में

हम सबके सामने जिसे अपना तो कह सकें
क्या हमको वो मिलेगा कभी इस जहान में

दिल को मेरे वो तोड़कर शर्मिंदा यूँ हुआ
रहने लगा है फिर इसी उजड़े मकान में

उससे बिछड़के ऐसा लगा जान ही गई

वो आया जान आ गई है फिर से जान में



Thursday, May 19, 2016

मौसम ने क़हर ढाया दहशत है किसानों में



देवमणि पांडेय की ग़ज़ल
 
मौसम ने क़हर ढाया दहशत है किसानों में 
दम तोड़ रहीं फ़सलें खेतों में-सिवानों में
 

धरती की गुज़ारिश पर बरसा ही नहीं पानी
तब्दील हुई मिट्टी खेतों की चटानों में
 

थक हार के कल कोई रस्सी पे जो झूला है
इक ख़ौफ़ हुआ तारी मज़दूर- किसानों में
 

क्यूँ कैसे मरा कोई क्या फ़िक्र हुकूमत को 
पत्थर की तरह नेता बैठे हैं मकानों में
 

अब गाँव की आँखों में बदरंग फ़िज़ाएं हैं 
खिलती है धनक फिरभी शहरों की दुकानों में
 

क्यूँ रूठ गईं कजरी दिल जिसमें धड़कता था 
क्यूँ रंग नहीं कोई अब बिरहा की तानों में
 


देवमणि पांडेय : 98210-82126
devmanipandey@gmail.com 

Monday, May 16, 2016

पानी की अब कमी बहुत है




बादल भूल गए हैं रस्ता

आँख में सबके नमी बहुत है
पानी की अब कमी बहुत है
सूख गई हैं नदियाँ सारी
प्यासी अबके ज़मीं बहुत है

झुलस गई है धूप में मिट्टी
दरक गया धरती का सीना
सूख गए सब पेड़ बेचारे
बहुत कठिन है जल बिन जीना

सोच रही हैं बूढ़ी दादी
दूध से महँगा है अब पानी
प्यासे ही सो गए हैं बच्चे
रूठ गया है दाना-पानी

जल से धरती पर जीवन है
आओ मिलकर इसे बचाएँ
बादल भूल गए हैं रस्ता
दुआ करो ये वापस आएँ


देवमणि पांडेय : 98210-82126
devmanipandey@gmail.com 

काग़ज़ों में है सलामत अब भी नक़्शा गाँव का

DEVMANI PANDEY


देवमणि पांडेय की ग़ज़ल

काग़ज़ों में है सलामत अब भी नक़्शा गाँव का
पर नज़र आता नहीं  पीपल पुराना गाँव का

बूढ़ीं आँखें मुंतज़िर हैं पर वो आख़िर क्या करें
नौजवां तो भूल ही बैठे हैं रस्ता गाँव का

पहले कितने ही परिंदे आते थे परदेस से
अब नहीं भाता किसी को आशियाना गाँव का

छोड़ आए थे जो बचपन वो नज़र आया नहीं
हमने यारो छान मारा चप्पा-चप्पा गाँव का

हो गईं वीरान गलियाँ, खो गई सब रौनक़ें
तीरगी में खो गया सारा उजाला गाँव का

वक़्त ने क्या दिन दिखाए चंद पैसों के लिए
बन गया मज़दूर इक छोटा-सा बच्चा गाँव का

सुख में, दुख में, धूप में जो सर पे आता था नज़र
गुम हुआ जाने कहाँ वो लाल गमछा गाँव का

हर तरफ़ फैली हुई है बेकसी की तेज़ धूप
सबके सर से उठ गया है जैसे साया गाँव का

जो गए परदेस उसको छोड़कर दालान में
राह उनकी देखता है वो बिछौना गाँव का

शाम को चौपाल में क्या गूँजते थे क़हक़हे
सिर्फ़ यादों में बचा है अब वो क़िस्सा गाँव का

ख़ैरियत एक दूसरे की पूछता कोई नहीं
क्या पता अगले बरस क्या हाल होगा गाँव का

सोच में डूबे हुए हैं गाँव के बूढ़े दरख़्त
वाक़ई क्या लुट गया है कुल असासा गाँव का

देवमणि पांडेय : 98210-82126
devmanipandey@gmail.com