शायर प्राण शर्मा : (लंदन, यूके)
प्रिय देवमणि जी! आपका लेख पसंद आया।मैंने यह शेर पहले कहीं पढ़ा था -मेरी कुटिया के मुक़ाबिल आठ मंजिल का मकां / तुम मेरे हिस्से की शायद धूप भी खा जाओगे। मुझे शेर के रचयिता के नाम का पता नहीं था। दाद
देनी पड़ेगी हिन्दी की प्रसिद्ध कहानीकार और कवयित्री सुधा अरोरा जी को, उन्हें तीन दशक पहले कहा गया गया शेर और शायर का नाम
अब भी याद है। उर्दू में एक ख़याल के अनेक मिसरे हैं जिनको इस्तेमाल करने में उस्ताद
शायरों ने भी गुरेज़ नहीं किया है। देखिए उनके कहे एक ख़याल के मिसरे और अशआर -
हम वहाँ हैं जहाँ से हमको
भी
कुछ हमारी खबर नहीं आती - ग़ालिब
कुछ तुम्हारा पता नहीं
चलता
कुछ हमारी खबर नहीं आती - अदम
कुछ गम-ए- इश्क भी कर देता है मजनून `अदम`
और कुछ लोग भी दीवाना बना
देते हैं - अदम
कुछ तो होते हैं मुहब्बत
में जुनूं के आसार
और कुछ लोग भी दीवाना बना
देते हैं - ज़हीर
देहलवी
मुहब्बत का दरिया, जवानी की लहरें
यहीं डूब जाने को जी चाहता
है - अमजद
नज्मी
हसीं तेरी आँखें, हसीं तेरे आंसूं
यहीं डूब जाने को जी चाहता
है - जिगर
मुरादाबादी
उमराव जान में शहरयार की
ग़ज़ल का मतला है -
दिल चीज़ क्या है आप मेरी
जान लीजिये
बस एक बार मेरा कहा मान
लीजिये
इस मतला ने शहरयार को
रातों-रात मशहूरियों की बुलंदी पर पहुँचा
दिया था। मतला के दोनो मिसरे क्रांतिकारी राम प्रसाद 'बिस्मिल ` की ग़ज़ल से उठाये गए थे। उनकी चार शेरों की ये ग़ज़ल
पढ़ कर देखिए -
दिल चीज़ क्या है आप मेरी
जान लीजिये
खंजर को अपने और ज़रा तान
लीजिये
बेशक़ न मानियेगा किसी
दूसरे की बात
बस एक बार मेरा कहा मान
लीजिये
मर जायेंगे मिट जायेंगे हम
कौम के लिए
मिटने न देंगे मुल्क, ये एलान लीजिये
'
बिस्मिल` ये दिल हुआ है अभी कौम पर फ़िदा
अहल-ए-वतन का दर्द भी पहचान लीजिये
आपके जानकारी भरे लेख की
एक बार और तारीफ़ करता हूँ।--- प्राण
शर्मा
शायर तिलक राज कपूर : (भोपाल,
म.प्र.)
प्राण साहब के उदाहरणों को देखें तो एक बात तो स्पष्ट है कि पूरा मिसरा
ले लेना भी स्वीकार किया गया है बशर्ते कि कहन में बदलाव हो। ग़ालिब साहब के शेर
में स्पष्ट बेखुदी है और अदम साहब का शेर मैं अभी समझने का प्रयास ही कर रहा हूँ
कि यह भी बेखुदी ही है या उसके आस-पास भटकता कोई और भाव। मुझे ग़ालिब साहब का शेर
कुछ यूँ याद था: हम वहॉं हैं जहॉं से खुद
हमको / आप अपनी खबर नहीं आती। अदम साहब और ज़हीर देहलवी के शेर में भाव पक्ष एक
ही है। मेरे मत में किसी और के पूर्व में कहे मिसरे को पूर्व शेर के भाव में ही
बॉंधना तो यह कहता है कि पहले वाला शायर कुछ दमदार शेर नहीं कह सका, मैं अब दमदार शेर दे रहा हूँ। अमजद नज्मी साहब और
जिगर मुरादाबादी साहब के शेर एक ही भाव रखते हुए भी अलग-अलग मंज़र पर हैं इसलिये
इनमें तो कोई समस्या नज़र नहीं आती। राम प्रसाद `बिस्मिल` के नाम से जो अशआर बताये गये हैं उनको लेकर मुझे शंका है,
लगता है किसी मूवी में लिये गये शेर हैं ये जो मूल ग़ज़ल से हट के होंगे।
मेरी शंका का कारण पहले शेर का भाव है। अब एक प्रश्न: शिकवा,
शिकायतें, न गिला कीजिये अभी / बस एक बार मेरा कहा मान लीजिये'। मैं अगर खुलकर स्वीकार करूँ कि दूसरी पंक्ति पूरी की पूरी किसी अन्य
शायर के शेर से ली गई है जिसका नाम मुझे ज्ञात नहीं तो क्या यह शेर अपना वज़ूद खो
देगा। मुझे तो नहीं लगता।
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