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Sunday, November 16, 2014

कवि नरेंद्र मोदी का काव्य संग्रह : आँख ये धन्य है


कविता में कवि नरेंद्र मोदी का रचनात्मक सफ़र
सन 2005 में कवि नरेंद्र मोदी का काव्य संग्रह गुजराती में प्रकाशित हुआ था। डॉ. अंजना संधीर ने इसे आँख ये धन्य है नाम से हिंदी में रूपांतरित किया है। विकल्प प्रकाशन (दिल्ली) ने इसे प्रकाशित किया है। ख़ास बात यह है कि मोदी जी का यह काव्य संकलन ऐसे समय में हमारे सामने आया है जब वे हिंदुस्तान के प्रधानमंत्री के रूप में देश और दुनिया में कामयाबी का नया अध्याय लिख रहे हैं।

अनुवादिका अंजना संधीर स्वयं एक लब्ध-प्रतिष्ठित रचनाकार हैं। वे कई साल अमेरिका में रही हैं। वहाँ उन्होंने हिंदी भाषा और साहित्य के प्रसार के लिए उल्लेखनीय काम किए। उनके अनुभव और दृष्टि की व्यापकता का लाभ इस संग्रह को भी प्राप्त हुआ है। अंजना जी ने इतनी सहजता,सरलता और आत्मीयता से अनुवाद कार्य किया है कि कवि नरेंद्र मोदी की यह अनूदित काव्यकृति हिंदी का मौलिक काव्यसंग्रह प्रतीत होता है। एक काव्यांश देखिए-

पर्वत की तरह अचल रहूँ, और नदी के बहाव सा निर्मल
श्रृँगारित शब्द नहीं मेरे,नाभि से प्रकटी वाणी हूँ
करता हूँ इस धरती से प्रीत
ख़ामोशी का आनंद लेते हुए गाता हूँ गीत

इस संग्रह में 67 कविताएं हैं। इन कविताओं में से कुछ के शीर्षक देखिए - सम्पूर्ण विश्व, उठो लाल ! विजय स्वीकारो, एकाध आँसू, ऐसे मनुष्य, कारगिल, स्वाभिमान, गरबा, बोले बसंत, नर्मदा, तितली, प्रेम, माँ मुझे दैवत्व देना, वंदे मातरम़, सपनों के बीज, मल्लाह आदि। इन काव्य शीर्षकों से आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि मोदीजी की इन कविताओं में देश,दुनिया और समाज समाया हुआ है-

तुम्हारे पास सपने हों या न हों
परंतु सपनों के बीज मैं,
अपनी धरती पर बीजता हूँ
और प्रतीक्षा करता हूँ, पसीना बहाकर
कि वे अँकुरित हों और उनका वृक्ष बने
फिर किसी विराट पुरुष की बाँहों समान
उनकी शाखाएँ फैलें
पक्षी उन पर घोंसले बनायें
और आकाश को छूने लगें
उनके कण्ठ से नदी की कल-कल की
ध्वनि समान ईश्वरीय गीतों के स्वर लहरायें, (पृष्ठ-95)

हिंदी के एक प्रतिष्ठित कवि की पंक्तियां हैं- वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान / निकलकर नैनोँ से चुपचाप बही होगी कविता अनजान। संग्रह की कई कविताओं को पढ़ते हुए लगता है कि वे बरबस हृदय की गहराइयों से छलक पड़ी हैं। इन कविताओं का कवि कहीं कठोर है, कहीं कोमल हैं और कहीं वह इतना भाव विह्वल हो जाता हैं कि आँख से आँसू छलक पड़ते हैं-

अपने काग़ज़ पर सूरज बनाता हूँ
और बनाता हूँ पूनम का चाँद
मेरे काग़ज़ पर लहराता वृक्ष है
और वृक्ष पर हरियाले पत्ते
स्वजन की याद जैसी छोड़ी चट्टान
उसे झरने का गीलापन जगाए, ((पृष्ठ-47)

कवि में साहस है, स्वाभिमान है, देश और समाज के लिए कुछ करने की ललक है और जो कुछ अपने पास विरासत है उस पर गर्व भी है। उसकी नज़र तितली, फूल और कारगिल पर जाती है तो वह उन उत्सवों में भी नए रंग घोलता है जिनसे हमारा सांस्कृतिक ताना-बाना मजबूत होता है। इन कविताओं में तड़प है, बेचैनी है और दूसरों का दुख बाँट लेने की छटपटाहट भी है। कवि के पास शब्द है, शिल्प है और अपनी बात कहने का सलीका़ भी है। इस लिए ये कविताएं सावनी फुहार की तरह हम तक पहुँचती है और हमें भिगोकर हराभरा कर देती हैं-

कोई पंथ नहीं, ना ही सम्प्रदाय / मानव तो बस है मानव,
उजाले में क्या फ़र्क पड़ता है / दीपक हो या लालटेन , (पृष्ठ-26)

बिना प्रेम पंगु बन मानव, लाचार / पराधीन-सा जीता है
अभाव की एक डोरी ले / पल को पल से सीता है, (पृष्ठ-30)

ईश्वर की छत्र-छाया में हर रोज़ सीखता हूँ
मैं तो हूँ एक छात्र
सफल हुआ तो ईर्ष्या का पात्र,
असफल हुआ तो दया का पात्र (पृष्ठ-52)

ये कविताएं किसी भी दुरूहता, जटिलता और बौद्दिकता से मुक्त हृदय की सहज निर्झरिणी हैं। इस लिए ये निर्बाध तरीके से पाठकों तक पहुँचती हैं और उन्हें अपने आगोश में ले लेती हैं। इन कविताओं में सोच की सहज प्रक्रिया के साथ ही विचारों की संतुलित उड़ान है। प्रकृति प्रेम से लेकर देश प्रेम की झाँकी हैं। समाज के सवालों से लेकर परम्परा और संस्कृति की अमूल्य थाती है। रिश्तों-नातों की मोहक गलियाँ है, भावनाओं की बदलियाँ हैं। गरबा का संगीत है, आगे बढ़ने का गीत है, गर्व करने लायक अतीत है। इसलिए ये कविताएं एक ख़ूबसूरत एहसास की तरह हमारे दिल में उतरती हैं और हम में ऊर्जा का संचार करती हैं। इन कविताओं में वह रोशनी है जो भटके हुए लोगों को रास्ता दिखाती है। निराश लोगों में आशा का संचार करती है और मन मे आगे बढ़ने की प्रेरणा जगती है। इस किताब के हर पन्ने पर ज़िंदगी मुस्कराती है। हम दुआ है कि कवि नरेंद्र मोदी का यह रचनात्मक सफ़र आगे भी जारी रहे।

देवमणि पाण्डेय : ए-2, हैदराबाद एस्टेट, नेपियन सी रोड, मालाबार हिल,
मुम्बई - 400 036 , M : 98210-82126 devmanipandey@gmail.com

Wednesday, July 30, 2014

सावन आया गाँव में सबका पूछ रहा है हाल




सावन आया गाँव में सबका पूछ रहा है हाल

नाच रही हैं छत पर बूँदें पुरवा ने दी ताल
सावन आया गाँव में सबका पूछ रहा है हाल

मेढक मिलकर बिरहा गाते कोयल कजरी गाए
दुबक के बैठी है गोरैया कौवा शोर मचाए
दादी को लगती है बारिश अब जी का जंजाल

सावन आया गाँव में सबका पूछ रहा है हाल

दिन में बारिश हुई झमाझम पानी बहता जाए
मोबाइल में बिजी है बचपन कश्ती कौन चलाए
टीवी देख रहे सब घर में सूनी है चौपाल

सावन आया गाँव में सबका पूछ रहा है हाल

खेतों में घुटनों तक पानी उफन रहे हैं नाले
दलदल में फँस गया ट्रैक्टर बाहर कौन निकाले
बाँध के रस्सी खींच रहे हैं बैल हुए बेहाल

सावन आया गाँव में सबका पूछ रहा है हाल

महँगू की गिर गई मड़ैया टूट के बरसा पानी
घर में बैठी सोच रही है रामधनी की नानी
कहाँ पड़ेगा झूला कट गई पीपल की वो डाल

सावन आया गाँव में सबका पूछ रहा है हाल

-----देवमणि पांडेय -----98210-82126-----


Friday, June 20, 2014

बदली निगाहें वक़्त की क्या-क्या चला गया

मुम्बई के गुजराती कवियों के साथ देवमणि पाण्डेय (18.5.2014)


देवमणि पाण्डेय की ग़ज़ल

बदली निगाहें वक़्त की क्या-क्या चला गया 
चेहरे के साथ-साथ ही रुतबा चला गया 

मेरी तलब को जिसने समंदर अता किेए
अफ़सोस मेरे दर से वो प्यासा चला गया

अबके कभी वो आया तो आएगा ख़्वाब में
आँखों के सामने से तो कब का चला गया

बचपन को साथ ले गईं घर की ज़रूरतें
सारी किताबें छोड़ के बच्चा चला गया 

रिश्ता भी ख़ुद में होता है स्वेटर की ही तरह
उधड़ा जो एक बार, उधड़ता चला गया

वो बूढ़ी आँखें आज भी रहती हैं मुंतज़िर
जिनको अकेला छोड़ के बेटा चला गया 

अपनी अना को बेचके पछ्ताए हम बहुत
जैसे किसी दरख़्त का साया चला गया






मुम्बई के उर्दू दैनिक इंक़लाब में देवमणि पाण्डेय की ग़ज़ल (29.6.2014)
देवमणि पाण्डेय :  98210-82126