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Monday, February 15, 2010

बड़ निक लागै मेहरी क कोरवा

मेरे ज़िले सुलतानपुर (उत्तर प्रदेश) में एक सभागार का नाम है पं.रामनरेश त्रिपाठी सभागार । पं.रामनरेश त्रिपाठी अवधी भाषा में लोक जीवन की अदभुत झाँकी प्रस्तुत करने वाले लोक कवि थे । अवधी के सपूत पं.रामनरेश त्रिपाठी का इतना सम्मान था कि एक बार उद्योगापति घनश्याम दास बिरला ने उनसे निवेदन किया कि त्रिपाठी जी आप कोई ऐसी वंदना लिख दीजिए जिसे मैं और मेरे बच्चे रोज़ सुबह गाएं । तब उन्होंने लिखकर दिया था -

हे प्रभो आनंददाता ज्ञान हमको दीजिए
शीघ्र सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिए

यह वंदना उस समय इतनी लोकप्रिय हुई कि सारा हिंदुस्तान गाने लगा । लोककवि पं.रामनरेश त्रिपाठी ने 1925 और 1930 के बीच अवध के गाँव-गाँव में घूम करके 15 हज़ार से भी अधिक लोकगीतों का संग्रह किया था । इसी के आधार पर उन्होंने ‘कविता कौमुदी’ किताब लिखी । सन 1928 के अंत में प्रकाशित इस पुस्तक की प्रथम प्रति महात्मा गाँधी को भेंट की गई थी और उन्होंने मुक्त कंठ से इस प्रयास की सराहना की थी । पं.रामनरेश त्रिपाठी का जन्म 4 मार्च 1890 को और स्वर्गवास 16 जनवरी 1962 को हुआ । उनके निधन पर पं. जवाहरलाल नेहरु ने कहा – ‘वे एक बड़े कवि थे और हमारी स्वराज्य की लड़ाई में एक आला सिपाही थे ।’ ‘कविता कौमुदी’ पढ़कर विश्वकवि रवींद्रनाथ ठाकुर ने उन्हें लिखा था – ‘ आपनार संकलित ‘कविता कौमुदी’ ग्रंथखानि पाठ करिया परितृप्ति लाभ करियाछि । हिंद- कवितार ए रूप सुंदर एवं धारावाहिक संग्रह आमि आर कोथाओ देखा नाईं । अपनी, एई कवितागुलि प्रकाश करिया भारतीय साहित्यानुरागी व्यक्तिमात्र केइ चिरकृतज्ञता पाशे आबद्ध करियाछेन ।’

(बाएं से दाएं)- संयोजक राजेश विक्रांत, कवि-गीतकार देवमणि पांडेय, प्रमुख अतिथि जगदीश पीयूष, अर्चना मिश्र, एडवोकेट विजय सिंह, समारोह अध्यक्ष डॉ. रामजी तिवारी, संपादक प्रेम शुक्ल, पं. किरण मिश्र, पत्रकार ओमप्रकाश तिवारी, पत्रकार अनुराग त्रिपाठी

कई साल ढूंढने के बाद मुझे ‘कविता कौमुदी’ गीतकार अरविंद राही के सौजन्य से प्राप्त हुई । वे यह पुस्तक त्रिपाठी जी के परिवार के किसी सदस्य से माँगकर लाए । इसे पढ़ते हुए मुझे महसूस हुआ कि अवधी लोककाव्य में एक तरफ उमंग और उल्लास की मधुर छवियाँ हैं तो दूसरी तरफ़ दुख और अभाव के त्रासद चित्र भी हैं –

मन तोरा अदहन, तन तोरा चाउर, नैना मूँग कै दालि ।
अपने बलम का जेंवना जेंवतिउ, बिनु लकड़ी बिनु आगि ।।

मँहगी के मारे बिरहा बिसरिगा, भूलि गइ कजरी कबीर ।
देखि क गोरी क मोहिनी सुरति अब, उठै न करेजवा मँ पीर ।।

‘कविता कौमुदी’ में लोककाव्य के विविध रूपों – सोहर, कजरी, बिरहा, होरी, मेला गीत, विवाह गीत, विदाई गीत आदि शामिल हैं । इसमें अहीर,कहार, तेली, गड़रिया, धोबी और चमारों के गीतों का भी अदभुत संग्रह है । पं.रामनरेश त्रिपाठी का जुनून देखिए कि लोकगीतों की तलाश में उन्होंने बंगाल, पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र, साउथ और कश्मीर से लेकर नेपाल तक की यात्राएं की थीं । प्रांतीय भाषाओं के गीतों की झलक भी इस पुस्तक की अलग उपलब्धि हैं ।

अवध में बड़े किसान अहीर के लड़कों को चरवाहे का काम देते थे । ये नौजवान चरवाहे अँगोछे में बासी रोटी बाँधकर सुबह गाय-भैसों के साथ जंगल में चले जाते थे और शाम ढलने पर वापस लौटते थे । अपना समय काटने के लिए मौज-मस्ती में या प्रिय जनों के विरह (याद) में ये लोग जो गीत गाते थे उसे ‘बिरहा’ कहा गया । अब तो बिरहा दुर्लभ हो गया है मगर सन 1970 के पहले शादी-व्याह के अवसर पर अहीरों के नाच में बड़े मज़ेदार बिरहे सुनने को मिलते थे –

बड़ निक लागै गाय चरवहिया भुइयाँ जो परती होय ।
बड़ निक लागै मेहरी क कोरवा जबले लरिकवा न होय ।।

दोहे में भी लोकजीवन की अदभुत छटा दिखाई देती है । सुंदर स्त्री से हर कोई बात करना चाहता है । मगर वह किसको-किसको ख़ुश करे ! उसकी व्यथा देखिए –

जोबन गयो तो भल भयो, तन से गई बलाय ।
जने जने का रूठना, मोसे सहा न जाय ।।


गाँवों के हृदय में सुख का प्रकाश है । सुख न होता तो गाँव के लोग अनंत दुखों का भार कैसे उठा लेते ! अपने प्राणधन के साथ दुख में भी सुख का अनुभव करने वाली एक पति-वल्लभा का हृदयोदगार देखिए –

टूटी खाट घर टपकत टटियो टूटि
पिय कै बाँह सिरहनवा सुख कै लूटि


शुक्रवार 22 जनवरी को मुम्बई में अवधी सम्मेलन हुआ । अवधी सम्मेलन के संयोजक थे पत्रकार राजेश विक्रांत । अवधी अकादमी के अध्यक्ष व बोली बानी के संपादक जगदीश पीयूष ने बताया कि अवधी भाषा उ.प्र. के 24, बिहार के 2 तथा नेपाल के 8 जिलों में लगभग 12 करोड़ लोगों की भाषा है । तुलसीदास, अमीर खुसरो, मलिक मोहम्मद जायसी, मुल्ला दाउद, कबीर, कुतुबन, मंझन और रहीम सरीखे महाकवियों ने अवधी में काव्य रचना करके इस लोकभाषा को गौरव प्रदान किया।

इस अवसर पर मुम्बई की धरती पर सर्वप्रथम रामलीला का आयोजन करने वाले स्व.शोभनाथ मिश्र के सुपुत्र तथा "श्री महाराष्ट्र रामलीला मंडल" के महामंत्री द्वारिकानाथ मिश्रा का सम्मान किया गया । मुम्बई में अवधी सम्मेलन को एक सुखद संयोग के रूप में देखा जा रहा है । पत्रकार प्रेम शुक्ल ने घोषणा भी कर दी मुम्बई में शीघ्र ही अवधी महोत्सव का आयोजन किया जाएगा ।

भड़ास4मीडिया डॉट कॉम पर 9 फरवरी को प्रकशित अवधी समारोह पर कुछ पाठकों की प्रतिक्रिया देखें-

शेष नारायण सिंह , February 09, 2010
मुंबई में अवधी जानने वाले लाखों लोग रहते हैं लेकिन वहां अवधी भाषा को वह पहचान नहीं मिलती जो मिलनी चाहिए. जगदीश पीयूष की यह कोशिश निश्चित रूप से सराहनीय है । मंच पर जो विद्वान् और अवधी भाषा के जानकार नज़र आ रहे हैं , उन पर कोई भी समाज गर्व कर सकता है । आशा है मुबई की फ़िल्मी दुनिया में भी अवधी भाषा का मजाक उडाना बंद कराने में इन लोगों को सफलता मिलेगी ।

विवेक तिवारी, February 09, 2010
बिल्कुल्लै सही बात हौ,,अवधी का ऊ सम्मान नाहीं मिला जउन ई भाषा के मिलल चाहीं । हैरानी यहू है कि हिंदी सिनेमा में अवधी भाषा का भोजपुरी बताय बताय कै गुमराहौ किया गवा । मुंबई के अवधी भाइयन के परणाम..बहूतै नीक परयास किहैं वै सब ।

Pankaj Shukla, February 10, 2010
मुंबई में उत्तर भारतीयों के तौर पर बस पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों का ही नाम लिया जाता है, जबकि मुंबई में अवधी जानने और बोलने वालों की बड़ी आबादी है। अवधी भाषियों को जोड़ने और अवधी को उसकी खोई पहचान दिलाने के लिए इस तरह के प्रयास बहुत ज़रूरी हैं। बैठकों, गोष्ठियों और ब्लॉग के जरिए जो भी जितना कर सके, करना चाहिए। ऐसे सम्मेलनों में अवधी के ब्लॉगरों को भी बुलाया जाना चाहिए। http://manjheriakalan.blogspot.com/

3 comments:

rkpaliwal.blogspot.com said...

tripathi ji ke bare me jankari evam kuch achchi lok rachna prakashit karne ke liye dhanyvad.


R.K.Paliwal

pran said...

PT.RAM NARESH TRIPATHI N KEWAL
HINDI BALKI KAEE BHASHAAON KE
GYAATAA THE.SARSHRESHTH KAVI TO
THE HEE.HAR BHASHA SE PREM THAA
UNHEN.HINDI KAVIYON KO SAAVDHAAN
KARTE HUE UNHONNE SHAAYAD KAVYA
KAUMIDEE MEIN LIKHAA THAA KI KYAA
BAAT HAI KI JO KHOOBEE URDU SHAYREE
MEIN HAI VAH HINDI KAVITA MEIN
NAHIN HAI.JO KAAM BHASHA KO MAANJNE
KAA URDU SHAAYRON NE KIYA HAI VAH
KAAM HINDI KAVI NAHIN KAR RAHE HAIN.
AESE NISHPAKSH KAVI KE BAARE MEIN
JAANKAAREE PRAPT KARKE SANTOSH
HUAA.AAPKE KHOJBHARE LEKH KE LIYE
AAPKO BAHUT -BAHUT BADHAAEE.

sumita said...

राम नरेश त्रिपाठी जी की सुंदर रचनाओं के लिये तथा समारोह की जानकारी के लिये आभार/ अवध भाषा के उत्थान के लिये की जा रही कोशिशों के लिये बधाई!