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Thursday, July 12, 2012

ताशकंद में हिंदी कविता का विराट उत्सव

ताशकंद में हिंदी कविता के विराट उत्सव में देवमणि पांडेय, डॉ.धनंजय सिंह,  डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र, मीठेश निर्मोही, एकांत श्रीवास्तव, संतोष श्रीवास्तव तथा डॉ.मुक्ता

सृजन सम्मान (छत्तीसगढ़)की ओर से उज़्बेकिस्तान की राजधानी ताशकंद में आयोजित पांचवे अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन (24 से 30 जून 2012) का मुख्य आकर्षण था कविता पाठ। इस विराट काव्य संध्या की अध्यक्षता की वरिष्ठ कवि डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र ने और विशिष्ट अथिति थे- वागर्थ के संपादक एकांत श्रीवास्तव तथा प्रगतिशील लेखक संघ राजस्थान के उपाध्यक्ष और वरिष्ठ कवि मीठेश निर्मोही। काव्य संध्या में नई कविता, गीत और ग़ज़ल का शानदार संतुलन दिखाई दिया। गीत-नवगीत के सशक्त क़लमकार डॉ.बुद्धिनाथ मिश्र ने प्रेम की पारम्परिक भावनाओं को अपने गीत के माध्यम से नए क्षितिज प्रदान किए-

 तुम इतने समीप आओगे, मैंने कभी नहीं सोचा था !
तुम जो आए पास तो जैसे उतरे शशि जल भरे थाल में
या फिर तीतर पाखी बादल बरसे धरती पर अकाल में
तुम घन बनकर छा जाओगे, मैंने कभी नहीं सोचा था !

वरिष्ठ गीतकार डॉ.धनंजय सिंह ने विदेश की धरती पर घर की याद इस तरह दिलाई-

घर की देहरी पर छूट गए, सम्वाद याद आएंगे
यात्राएं छोड़ बीच में ही,
घर लौटना पड़ेगा, फिर फिर घर

 ताशकंद में हिंदी कविता के विराट उत्सव में देवमणि पांडेय
वरिष्ठ कवि मीठेश निर्मोही, एकांत श्रीवास्तव, लालित्य ललित, अशोक सिंह और डॉ.सविता मोहन ने ने समकालीन कविता का शानदार प्रतिनिधित्व किया। वरिष्ठ शायर मुमताज़, देवमणि पांडेय, रेखा अग्रवाल, सुमन अग्रवाल और राजन मल्होत्रा ने ग़ज़ल की ख़ुशबू से समूचे महौल को तरबतर कर दिया। शायर मुमताज़ का अंदाज़े-बयां देखिए-

पहले इंसान मुकम्मल बने इंसा कोई
फिर उसके बाद बने हिंदू मुसलमां कोई
किसी के घर को जलाना तो बहुत आसां है
जला के देखे भला अपना आशियां कोई

मुम्बई से पधारे शायर देवमणि पांडेय की ग़ज़ल का रंग देखिए-

जिनके फ़न को दुनिया अक्सर अनदेखा कर देती है
वो ही इस दुनिया को रोशन कर जाते हैं कभी-कभी
अगर किसी पर दिल आ जाए इसमें दिल का दोष नहीं
अच्छा चेहरा देखके हम भी मर जाते हैं कभी-कभी

ताशकंद में हिंदी कविता के विराट उत्सव में देवमणि पांडेय, डॉ.धनंजय सिंह,  डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र, मीठेश निर्मोही
 
प्रतिष्ठित गीतकार अनिल खम्परिया ने अपने असरदार तरन्नुम से नदी की व्यथा-कथा को बड़ा मार्मिक स्वर प्रदान किया-

सिर्फ़ चलती, उछलती, मचलती हूँ मैं
लोग कहते हैं मग़रूर हो जाऊँगी
मैं नदी हूँ मुक़द्दर है मेरा यही
एक दिन मैं समंदर में खो जाऊँगी

 ताशकंद में हिंदी कविता का विराट उत्सव

चेन्नई से पधारी शायरा रेखा अग्रवाल ने अपनी भावनाओं का इज़हार इस तरह किया-

कमी कुछ भी नहीं फिर भी कमी महसूस करती हूँ
मैं अक्सर अपनी आँखों में नमी महसूस करती हूँ
कभी रक्खे थे जो हमने किताबों में दबा करके
मैं उन फूलों में अब भी ताज़गी महसूस करती हूँ

चेन्नई से ही तअल्लुक़ रखने वाले ग़ज़लगो सुमन अग्रवाल ने ख़ूबसूरत लहजे में ग़ज़ल पेश की-

मेहरबां यूँ ही नही हैं हम पे सारी महफ़िलें
हम बहुत दिन तक जिए हैं अपनी तनहाई के साथ
मुझको ले जाती हैं घर काँटों भरी पगडंडियाँ
मैं भी ख़ुश हूँ दोस्त अपनी आबलपाई के साथ

 ताशकंद में हिंदी कविता का विराट उत्सव
 
कवितापाठ के इस सत्र में डॉ. महाश्वेता चतुर्वेदी, आशा पांडेय ओझा, उमा बंसल, मनोज कुमार मनोज, तिलकराज मलिक, वंदना दुबे, डॉ. अर्जुन सिसौदिया, मीना कौल, शरद जायसवाल, संजीव ठाकुर, सुनील जाधव, अरविंद मिश्रा, राजश्री झा, देवी प्रसाद चौरसिया, रामकुमार वर्मा, रवीन्द्र उपाध्याय, डॉ. जे. आर. सोनी, तुलसी दास चोपड़ा, श्रीमती चोपड़ा, सरोज गुप्ता, रामकुमार वर्मा, सुषमा शुक्ला, डॉ. अमरेन्द्र नाथ चौधरी, प्रवीण गोधेजा, सेवाशंकर अग्रवाल, विमला भाटिया, आदि ने भिन्न शिल्प, छंद और सरोकारों की कवितायें सुनायीं। अंत में राष्ट्रीय समन्वयक जयप्रकाश मानस ने हिंदी कविता के शिखर स्व.केदारनाथ अग्रवाल की एक कविता सुनाकर आयोजन को पूर्णता प्रदान की। कई घंटो तक चले इस सत्र का संचालन कवि देवमणि पांडेय और शायर मुमताज़ ने बहुत रोचक अंदाज़ में किया। उक्त अवसर पर भारत के 127 साहित्यकार, लेखक, शिक्षक, पत्रकार, ब्लागर्स सहित ताशकंद शहर से बड़ी संख्या में साहित्यिक श्रोता उपस्थित थे ।

और अंत में- (वो तस्वीर खींचती लड़की)
(ताशकंद में आशा पांडेय ओझा पर लिखी हुई प्रवीण भाई की एक कविता)
कभी मस्जिद तो कभी मंदिर
कभी झील तो कभी उसकी गहराई
कभी रोना तो कभी हँसना
जाने क्या क्या
छोटे छोटे बच्चो में अपना बचपन
लोगो में स्नेहभरा आशीर्वाद
शहतूत भरे पेंड़ों में अपनी शरारतें
जाने किन रिश्तों को खोज रही थी 
शायद पिछले जनम का
कोई क़र्ज़ अदा कर रही थी
वो तस्वीर खींचती लड़की ....