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Friday, December 20, 2013

शुक्रिया मेरे शहर सौ बार तेरा शुक्रिया

मुम्बई की जहाँगीर आर्ट गैलरी में बिजूका सीरीज़ की पेंटिंग प्रदर्शिनी के उदघाटन समारोह में लेखक-अभिनेता अतुल तिवारी, कवि देवमणि पांडेय, चित्रकार अवधेश मिश्रा, फ़िल्मकार श्याम बेनेगल और एक महिला चित्रकार। 25.05.2011

मुम्बई शहर को लेकर अलग-अलग समय में मुझे अलग-अलग अनुभव हुए। मैंने इन अनुभवों को चार गीतों में ढालने की कोशिश की है।
आपको ये गीत कैसे लगे ज़रूर बताएं।


(1) शुक्रिया मेरे शहर

ज़िंदगी के नाम पर क्या कुछ नहीं तूने दिया
शुक्रिया मेरे शहर सौ बार तेरा शुक्रिया

क्या ख़बर तुझको कि हमने गाँव छोड़ा किस लिए
झूमती गाती हवा फ़सलों को छोड़ा किस लिए
मिल गया हमको ठिकाना पर कभी भूले नहीं
अपने घर आँगन से रिश्ता हमने तोड़ा किस लिए

आज भी रोशन है दिल में गाँव जैसे इक दिया
शुक्रिया मेरे शहर सौ बार तेरा शुक्रिया

खो गये फूलों के मौसम खो गईं फुलवारियां
खो गये ढोलक मंजीरे खो गईं पिचकारियां
अब कहाँ तुलसी का चौरा और वो पीपल की छाँव
खो गए दादी के क़िस्से खो गईं किलकारियां

लेके होठों से हँसी अश्कों का तोहफ़ा दे दिया
शुक्रिया मेरे शहर सौ बार तेरा शुक्रिया

अजनबी चेहरों का हर पल एक रेला है यहां
हर जगह हर वक़्त जैसे एक मेला है यहां
हर क़दम पर बेकसी लाचारगी ढोता हुआ
भीड़ में भी आदमी बेहद अकेला है यहां

छीनकर गंगा का जल खारा समंदर दे दिया
शुक्रिया मेरे शहर सौ बार तेरा शुक्रिया


(2) सपनों के शहर में

पत्थर हों जिनके सीने में
क्या उनसे मोहब्बत करना
सपनों के शहर में मुश्किल है
सपनों की हिफ़ाज़त करना

इस शहर की तपती सड़कों पर
कोमल तलुवे जल जाते हैं
फूलों से नाज़ुक चहरे भी
दिल को घायल कर जाते हैं

काँटों से भरे इस गुलशन में
ख़ुशबू की चाहत करना

आखों की चमक ही रूठ गई
हसरत न कोई मंसूबा है
किसी और से कुछ मतलब ही नहीं
हर चेहरा ख़ुद में डूबा है

ऐसे लोगों से ठीक नहीं
इज़हारे-शराफ़त करना

मुस्कान लबों से ग़ायब है
हर शख़्स भीड़ का हिस्सा है
इस मायानगरी में सबका
इतना ही फ़साना, क़िस्सा है

इंसान यहाँ भूला हँसना
भूला है शरारत करना

(3) हो शहर में कोई भी मौसम

चेहरे तो रंगे-पुते लेकिन दिल में मुस्कान नहीं होती
होठों पर सजे ठहाकों में थोड़ी भी जान नहीं होती

कंगन-बिंदिया-झुमका गुमसुम, वो पायल की झंकार नहीं
संगीत का शोर-शराबा है, पूजाघर का ऊँकार नहीं

सागर का पानी है खारा, सूरज यूँ लाल नहीं होता
दो जून की रोटी की ख़ातिर, हर जेब में माल नहीं होता

मन की शांति, सुख चैन नहीं, शहरों में प्यार नहीं मिलता
दादा की मीटी फटकारें, दादी का दुलार नहीं मिलता

ठंडे कमरे, मोटे गद्दे, आँखों में नींद नहीं होती
जो दिल को सुकूँ दे शहरों में कुछ ऐसी चीज़ नहीं होती

आँखों में शरम, चेहरे पे हया, बातों में चहक नहीं मिलती
हो शहर में कोई भी मौसम, मिट्टी में महक नहीं मिलती

(4) शहर हमारा जो भी देखे

शहर हमारा जो भी देखे उस पर छाए जादू
हरा समंदर कर देता है हर दिल को बेक़ाबू

ताजमहल में ताज़ा काफ़ी जो भी पीने आए
चर्चगेट की चकाचौंध में वो आशिक़ बन जाए

चौपाटी की चाट चटपटी मन में प्यार जगाती है
भेलपुरी खाते ही दिल की हर खिड़की खुल जाती है

कमला नेहरु पार्क पहुंचकर खो जाता जो फूलों में
प्यार के नग़मे वो गाता है एस्सेल वर्ल्ड के झूलों में

जुहू बीच पर सुबह-शाम जो पानी-पूरी खाए
वही इश्क़ की बाज़ी जीते दुल्हन घर ले आए

नई नवेली दुल्हन जैसी हर पल लगती नई
सबको ऊंचे ख़्वाब दिखाकर खूब लुभाती मुंबई