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Thursday, April 29, 2010

ज़फ़र गोरखपुरी की ग़ज़लें

पचहत्तर के हुए ज़फ़र गोरखपुरी
शहर के अज़ाब, गांव की मासूमियत और ज़िंदगी की वास्तविकताओं को सशक्त ज़ुबान देने वाले शायर ज़फ़र गोरखपुरी 5 मई 2010 को 75 साल के हो जाएंगे। ज़फ़र ऐसे ख़ुशनसीब शायर हैं जिसने फ़िराक़ गोरखपुरी,जोश मलीहाबादी,मजाज़ लखनवी और जिगर मुरादाबादी जैसे शायरों से अपने कलाम के लिए दाद वसूल की है।सिर्फ़ 22 साल की उम्र में उन्होंने मुशायरे में फ़िराक़ साहब के सामने ग़ज़ल पढ़ी थी-
मयक़दा सबका है सब हैं प्यासे यहाँ मय बराबर बटे चारसू दोस्तो
चंद लोगों की ख़ातिर जो मख़सूस हों तोड़ दो ऐसे जामो-सुबू दोस्तो
इसे सुनकर फ़िराक़ साहब ने सरे-आम ऐलान किया था कि ये नौजवान बड़ा शायर बनेगा। उस दौर में ज़फ़र गोरखपुरी प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े हुए थे और उनकी शायरी से शोले बरस रहे थे। फ़िराक़ साहब ने उन्हें समझाया-‘ सच्चे फ़नकारों का कोई संगठन नहीं होता। वे किसी संगठन में फिट ही नहीं हो सकते। अब विज्ञान, तकनीक और दर्शन का युग है। इन्हें पढ़ना होगा। शिक्षितों के युग में कबीर नहीं पैदा हो सकता।वाहवाही से बाहर निकलो।’

गायक राजकुमार रिज़वी, कवि देवमणि पाण्डेय और शायर ज़फ़र गोरखपुरी

फ़िराक़ साहब की नसीहत का ज़फ़र गोरखपुरी पर गहरा असर हुआ। वे संजीदगी से शायरी में जुट गए। वह वक़्त भी आया जब उर्दू की जदीद शायरी के सबसे बड़े आलोचक पद्मश्री डॉ.शमशुर्रहमान फ़ारूक़ी ने लिखा - ‘ज़फ़र गोरखपुरी की बदौलत उर्दू ग़ज़ल में पिछली कई दहाइयों से एक हलकी ठंडी ताज़ा हवा बह रही है। इसके लिए हमें उनका शुक्रिया और ख़ुदा का शुक्र अदा करना चाहिए।’

ज़फ़र गोरखपुरी बहुमुखी प्रतिभा वाले ऐसे महत्वपूर्ण शायर हैं जिसने एक विशिष्ट और आधुनिक अंदाज़ अपनाकर उर्दू ग़ज़ल के क्लासिकल मूड को नया आयाम दिया। उनकी शायरी में विविधरंगी शहरी जीवन के साथ-साथ लोक संस्कृति की महक और गांव के सामाजिक जीवन की मनोरम झांकी है । इसी ताज़गी ने उनकी ग़ज़लों को आम आदमी के बीच लोकप्रिय बनाया । उनकी विविधतापूर्ण शायरी ने एक नई काव्य परम्परा को जन्म दिया । उर्दू के फ्रेम में हिंदी की कविता को उन्होंने बहुत कलात्मक अंदाज में पेश किया।

ज़फ़र गोरखपुरी ने बालसाहित्य के क्षेत्र में भी विशेष योगदान दिया। परियों के काल्पनिक और भूत प्रेतों के डरावने संसार से बाहर निकालकर उन्होंने बालसाहित्य को सच्चाई के धरातल पर खड़ा करके उसे जीवंत,मानवीय और वैज्ञानिक बना दिया ।पिछले 40 सालों से उनकी रचनाएं महराष्ट्र के शैक्षिक पाठ्यक्रम में पहली से लेकर बी.ए.तक के कोर्स में पढाई जाती हैं। अपनी रचनात्मक उपलब्धियों के कारण उन्हें अंतराष्ट्रीय स्तर पर पहचान और प्रशंसा मिली।

ज़फ़र गोरखपुरी का जन्म गोरखपुर ज़िले की बासगांव तहसील के बेदौली बाबू गांव में 5 मई 1935 को हुआ । प्रारंभिक शिक्षा गांव में प्राप्त करने के बाद उन्होंने मुंबई को अपना कर्मक्षेत्र बनाया । सन 1952 में उनकी शायरी की शुरुआत हुई। उर्दू में ज़फ़र गोरखपुरी के अब तक पांच संकलन प्रकाशित हो चुके हैं – (1) तेशा (1962), (2) वादिए-संग (1975), (3) गोखरु के फूल (1986), (4) चिराग़े-चश्मे-तर (1987), (5) हलकी ठंडी ताज़ा हवा(2009)। बच्चों के लिए भी उनकी दो किताबें आ चुकी हैं–‘नाच री गुड़िया’ ( कविताएं 1978 ) तथा ‘सच्चाइयां’ (कहानियां 1979)। हिंदी में उनकी ग़ज़लों का संकलन आर-पार का मंज़र (1997) नाम से प्रकाशित हो चुका है।

गुज़िश्ता 50 सालों से ज़फ़र गोरखपुरी की कई रचनाएं महाराष्ट्र सरकार के स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल हैं जिन्हें लाखों बच्चे रोज़ाना पढ़ते हैं। रचनात्मक उपलब्धियों के लिए ज़फ़र गोरखपुरी को महाराष्ट्र उर्दू आकादमी का राज्य पुरस्कार (1993 ), इम्तियाज़े मीर अवार्ड (लखनऊ ) और युवा-चेतना गोरखपुर द्वारा फ़िराक़ सम्मान (1996) प्राप्त हो चुका है। उन्होंने 1997 में संयुक्त राज्य अमेरिका की यात्रा की और वहां कई अंतर्राष्ट्रीय मुशायरों में हिंदुस्तान का प्रतिनिधित्व किया ।

सम्पर्क : ज़फ़र गोरखपुरी : ए-302, फ्लोरिडा, शास्त्री नगर
अंधेरी (पश्चिम), मुम्बई – 400 053

ज़फ़र गोरखपुरी की ग़ज़लें
(1)

बदन कजला गया तो दिल की ताबानी से निकलूंगा
मै सूरज बनके इक दिन अपनी पेशानी से निकलूंगा

मुझे आंखों में तुम जां के सफ़र की मत इजाज़त दो
अगर उतरा लहू में फिर न आसानी से निकलूंगा

नज़र आ जाऊंगा मैं आंसुओं में जब भी रोओगे
मुझे मिट्टी किया तुमने तो मैं पानी से निकलूंगा

मैं ऐसा ख़ूबसूरत रंग हूँ दीवार का अपनी
अगर निकला तो घरवालों की नादानी से निकलूंगा

ज़मीरे-वक़्त में पैवस्त हूं मैं फांस की सूरत
ज़माना क्या समझता है कि आसानी से निकालूंगा

यही इक शै है जो तनहा कभी होने नहीं देती
ज़फ़र मर जाऊंगा जिस दिन परेशानी से निकलूंगा

(2)

मेरी इक छोटी सी कोशिश तुझको पाने के लिए
बन गई है मसअला सारे ज़माने के लिए

रेत मेरी उम्र, मैं बच्चा, निराले मेरे खेल
मैंने दीवारें उठाई हैं गिराने के लिए

वक़्त होठों से मेरे वो भी खुरचकर ले गया
एक तबस्सुम जो था दुनिया को दिखाने के लिए

देर तक हंसता रहा उन पर हमारा बचपना
तजरुबे आए थे संजीदा बनाने के लिए

यूं बज़ाहिर हम से हम तक फ़ासला कुछ भी न था
लग गई एक उम्र अपने पास आने के लिए

मैं ज़फ़र ता-ज़िंदगी बिकता रहा परदेस में
अपनी घरवाली को एक कंगन दिलाने के लिए

(3)

देखें क़रीब से भी तो अच्छा दिखाई दे
इक आदमी तो शहर में ऐसा दिखाई दे

अब भीक मांगने के तरीक़े बदल गए
लाज़िम नहीं कि हाथ में कासा दिखाई दे

नेज़े पे रखके और मेरा सर बुलंद कर
दुनिया को इक चिराग़ तो जलता दिखाई दे

दिल में तेरे ख़याल की बनती है एक धनक
सूरज सा आइने से गुज़रता दिखाई दे

चल ज़िंदगी की जोत जगाएं, अजब नहीं
लाशों के दरमियां कोई रस्ता दिखाई दे

हर शै मेरे बदन की ज़फ़र क़त्ल हो चुकी
एक दर्द की किरन है कि ज़िंदा दिखाई दे

(4)

इरादा हो अटल तो मोजज़ा ऐसा भी होता है
दिए को ज़िंदा रखती है हव़ा, ऐसा भी होता है

उदासी गीत गाती है मज़े लेती है वीरानी
हमारे घर में साहब रतजगा ऐसा भी होता है

अजब है रब्त की दुनिया ख़बर के दायरे में है
नहीं मिलता कभी अपना पता ऐसा भी होता है

किसी मासूम बच्चे के तबस्सुम में उतर जाओ
तो शायद ये समझ पाओ, ख़ुदा ऐसा भी होता है

ज़बां पर आ गए छाले मगर ये तो खुला हम पर
बहुत मीठे फलों का ज़ायक़ा ऐसा भी होता है

तुम्हारे ही तसव्वुर की किसी सरशार मंज़िल में
तुम्हारा साथ लगता है बुरा, ऐसा भी होता है

1.मोजज़ा = चमत्कार

Friday, April 23, 2010

सूर्यभानु गुप्त की 5 ग़ज़लें


सूर्यभानु गुप्त की ग़ज़लें

(1)

हर लम्हा ज़िन्दगी के पसीने से तंग हूँ
मैं भी किसी क़मीज़ के कॉलर का रंग हूँ

मोहरा सियासतों का, मेरा नाम आदमी
मेरा वुजूद क्या है, ख़लाओं की जंग हूँ

रिश्ते गुज़र रहे हैं लिए दिन में बत्तियाँ
मैं बीसवीं सदी की अँधेरी सुरंग हूँ

निकला हूँ इक नदी-सा समन्दर को ढूँढ़ने
कुछ दूर कश्तियों के अभी संग-संग हूँ

माँझा कोई यक़ीन के क़ाबिल नहीं रहा
तनहाइयों के पेड़ से अटकी पतंग हूँ

ये किसका दस्तख़त है, बताए कोई मुझे
मैं अपना नाम लिख के अँगूठे-सा दंग हूँ

(2)

सुबह लगे यूँ प्यारा दिन
जैसे नाम तुम्हारा दिन

पाला हुआ कबूतर है
उड़, लौटे दोबारा दिन

दुनिया की हर चीज़ बही
चढ़ी नदी का धारा दिन

कमरे तक एहसास रहा
हुआ सड़क पर नारा दिन

थर्मामीटर कानों के
आवाज़ो का पारा दिन

पेड़ों-जैसे लोग कटे
गुज़रा आरा-आरा दिन

उम्मीदों ने टाई-सा
देखी शाम, उतारा दिन

चेहरा-चेहरा राम-भजन
जोगी का इकतारा दिन

रिश्ते आकर लौट गए
हम-सा रहा कुँवारा

बाँधे-बँधा न दुनिया के
जन्मों का बन्जारा दिन

अक्ल़मन्द को काफ़ी है
साहब! एक इशारा दिन

(3)

दिल लगाने की भूल थे पहले
अब जो पत्थर हैं फूल थे पहले

तुझसे मिलकर हुए हैं पुरमानी
चाँद तारे फिजूल थे पहले

अन्नदाता हैं अब गुलाबों के
जितने सूखे बबूल थे पहले

लोग गिरते नहीं थे नज़रों से
इश्क के कुछ उसूल थे पहले

जिनके नामों पे आज रस्ते हैं
वे ही रस्तों की धूल थे पहले

(4)

दिल में ऐसे उतर गया कोई
जैसे अपने ही घर गया कोई

एक रिमझिम में बस, घड़ी भर की
दूर तक तर-ब-तर गया कोई

आम रस्ता नहीं था मैं, फिर भी
मुझसे हो कर गुज़र गया कोई

दिन किसी तरह कट गया लेकिन
शाम आई तो मर गया कोई

इतने खाए थे रात से धोखे
चाँद निकला कि डर गया कोई

किसको जीना था छूट कर तुझसे
फ़लसफ़ा काम कर गया कोई

मूरतें कुछ निकाल ही लाया
पत्थरों तक अगर गया कोई

मैं अमावस की रात था, मुझमें
दीप ही दीप धर गया कोई

इश़्क भी क्या अजीब दरिया है
मैं जो डूबा, उभर गया कोई

(5)

जिनके अंदर चिराग जलते हैं
घर से बाहर वही निकलते हैं

बर्फ़ गिरती है जिन इलाकों में
धूप के कारोबार चलते हैं

दिन पहाड़ों की तरह कटते हैं
तब कहीं रास्ते निकलते हैं

ऐसी काई है अब मकानों पर
धूप के पाँव भी फिसलते हैं

खुदरसी उम्र भर भटकती है
लोग इतने पते बदलते हैं

हम तो सूरज हैं सर्द मुल्कों के
मूड आता है तब निकलते हैं


Sunday, April 18, 2010

पहले फ़िराक़ को देखा होता

अब अकसर चुप – चुप से रहे हैं यूं ही कभू लब खोले हैं
पहले फ़िराक़ को देखा होता, अब तो बहुत कम बोले हैं


इलाहाबाद के एक मुशायरे में फ़िराक़ साहब जब ग़ज़ल पढ़ने के लिए खड़े हुए तो श्रोताओं में ज़रा सी फुसफुसाहट हुई फिर शोर मच गया । श्रोतागण ज़ोर ज़ोर से हँसने लगे । फ़िराक़ साहब भड़क गए – लगता है आज मूंगफली बेचने वालों ने अपनी औलादों को मुशायरा सुनने भेज दिया है । मंच पर बैठे शायरों की निगाह फ़िराक़ साहब की तरफ़ गई तो पता चला कि शेरवानी के नीचे से उनका नाड़ा लटक रहा है । और पब्लिक उसे ही देखकर हँस रही है । मगर किसकी मजाल कि फ़िराक़ साहब को आगाह करे। अचानक शायर कैफ़ी आज़मी उठकर फ़िराक़ साहब के पास गए । उनकी शेरवानी उठाकर लटकते नाड़े को कमर में खोंस दिया और वापस अपनी जगह बैठ गए । फिर पब्लिक की हँसी थम गई और फ़िराक़ साहब ने अपने निराले अंदाज में ग़ज़ल पढ़ी -

किसी का यूँ तो हुआ कौन उम्र भर फिर भी
ये हुस्नो-इश्क़ तो धोखा है सब मगर फिर भी
हज़ार बार ज़माना इधर से गुज़रा है
नई-नई सी है कुछ तेरी रहगुज़र फिर भी

यह आंखों देखा हाल बताया मुंबई के वरिष्ठ शायर ज़फ़र गोरखपुरी ने। वे भी मंच पर मौजूद थे। भारतीय ज्ञानपीठ की तरफ़ से 1971 में साहित्य का सर्वोच्च सम्मान ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ मिलने के बाद एक इंटरव्यू में फ़िराक़ साहब ने कह दिया कि उर्दू ग़ज़ल को हिंदुस्तान में आए अर्सा हो गया । लेकिन हैरत की बात है कि इसमें यहां के खेत- खलिहान, समाज -संस्कृति, गंगा - यमुना और हिमालय क्यों नहीं दिखाई पड़ते। इन कमियों को ख़ुद फ़िराक़ साहब ने दूर करने की कोशिश की । सूरदास के कृष्ण की परम्परा में उनकी एक रुबाई देखिए –

आंगन में ठुनक रहा ज़िदयाया है
बालक तो भई चांद पे ललचाया है
दरपन उसे दे के कह रही है मां
देख, आईने में चांद उतर आया है


यहां तक कि फ़िराक़ साहब ने उर्दू शायरी के ऐंद्रिक सौंदर्य को सांस्कृतिक लिबास पहना कर उसे पाकीज़गी तक पहुँचाने का नेक काम भी किया –

लहरों में खिला कंवल नहाए जैसे
दोशीज़ा -ए -सुब्ह गुनगुनाए जैसे
ये रुप, ये लोच, ये तरन्नुम, ये निखार
बच्चा सोते में मुस्कराए जैसे


ऐसा माना जाता है कि जब हम किसी बड़ी शख़्सियत या कलाकार से मिलते हैं तो उसकी प्रतिभा का कुछ अंश हमें भी प्राप्त हो जाता है और हम भीतर से ख़ुद को समृद्ध महसूस करने लगते हैं। इस बारे में ज़रा फ़िराक़ साहब के फ़िक्र की उड़ान तो देखिए –

ज़रा विसाल के बाद आईना तो देख ऐ दोस्त
तेरे जमाल की दोशीज़गी निखर आई


फ़िराक़ साहब कितने ख़ुद्दार आदमी थे, इसे आप एक घटना से समझ सकते हैं। एक बार इलाहाबाद के एक मुशायरे में फ़िराक़ साहब ने ग़ज़ल पढ़ना शुरु किया – ‘कभी पाबंदियों से छुटके भी ----’ मिसरा पूरा होने से पहले ही पीछे से एक आवाज़ आई - वाह वाह ! फ़िराक़ साहब उखड़ गए - कौन बदतमीज़ है यह । इसे बाहर निकालो तभी मैं पढूंगा। इतना कहकर वे अपनी जगह पर वापस जाकर बैठ गए । हाल में सन्नाटा छा गया । मुशायरे पर ब्रेक लग गया । आयोजकों ने ढूंढ़कर उस आदमी को हाल से बाहर निकाला तब फ़िराक़ साहब वापस माइक पर गए और ग़ज़ल को आगे बढ़ाया –

कभी पाबंदियों से छुटके भी दम घुटने लगता है
दरो-दीवार हों जिसमें वही ज़िंदाँ नहीं होता
हमारा ये तजुर्बा है कि ख़ुश होना मुहब्बत में
कभी मुश्किल नहीं होता कभी आसां नहीं होता


फ़िराक़ साहब मानते थे कि ग़ज़ल ज़िंदगी से बातचीत है। इस लिए तरक़्क़ीपसंद या जदीदियत की परवाह किए बिना उन्होंने हमेशा ज़िंदगी का साथ दिया। उनके चंद अशआर देखिए-

शामें किसी को मांगती हैं आज भी फ़िराक़
गो ज़िंदगी में यूं मुझे कोई कमी नहीं

काफी दिनों जिया हूं किसी दोस्त के बगैर
अब तुम भी साथ छोड़ने को कह रहे हो, ख़ैर

आए थे हँसते – खेलते मयख़ाने में फ़िराक़
जब पी चुके शराब तो संजीदा हो गए

यह भी कहा जाता है कि हर दौर का अच्छा शायर हमेशा प्रगतिशील होता है।शायद इसी लिए जाने माने आलोचक कालिदास गुप्ता ‘रिज़ा’ कहते थे – फ़िराक़ साहब बींसवी सदी के सबसे बड़े शायर थे। फ़िराक़ साहब के ग़ज़ल संग्रह ‘सरगम’ की भूमिका में रमेशचंद्र द्विवेदी ने लिखा है - फ़िराक़ की शायरी में जो गूँज और प्रतिध्वनियां हमें मिलती हैं उनमें एक अद्वितीय सुहानापन है, भारत की धरती की सुगंध है, भारतीय संस्कृति के मातृत्व का स्पर्श है। ऐसा लगता है कि ग़ज़ल एक देवी के रूप में सोलहों सिंगार के साथ बाल संवारे, केश छिटकाए सामने आकर खड़ी हो जाती है और हमारे आँसुओं को अपने चुम्बन से पोंछ देती है। यह सांत्वना प्रदायिनी विशेषता उर्दू में शायद ही कहीं और मिलती हो। करुण रस और शांत रस का ऐसा संगम फ़िराक़ से पहले उर्दू कविता में बहुत कम देखा गया था। यह गुण हिंदू-कल्चर की देन है –


छिड़ गए साज़े-इश्क़ के गाने / खुल गए ज़िंदगी के मयख़ाने
हासिले-हुस्नो-इश्क़ बस इतना / आदमी आदमी को पहचाने


यह सच किसी से छुपा नहीं है कि फ़िराक़ साहब की ज़िंदगी दुख का समंदर थी। सन 1914 में एक साज़िश के तहत जिस लड़की से उनका विवाह हुआ वह बेहद कुरूप और अनपढ़ थी। उनके एक बेटा भी था। नवीं कक्षा में बार-बार फेल हो जाने और सहपाठियों के निर्दय मज़ाक के कारण इस लड़के ने अठारह-उन्नीस वर्ष की उम्र में ही आत्महत्या कर ली। फ़िराक़ साहब के तख़लीक के सफ़र में ग़म हमेशा हमसफ़र रहा -

मौत का भी इलाज हो शायद / ज़िंदगी का कोई इलाज नहीं
हम तो कहते हैं वो ख़ुशी ही नहीं / जिस में कुछ ग़म का इम्तिज़ाज नहीं


छियासी वर्ष की उम्र में 3 मार्च 1982 को दिल्ली में इस महान शायर का स्वर्गवास हुआ। आज भी उनकी शायरी की ख़ुशबू से पूरी दुनिया का ज़हन महक रहा है।

Friday, April 9, 2010

दिल तो राजस्थान है , आंखें नैनीताल


डॉ.नेहा कल्याणी (नागपुर) ‘हिंदी साहित्य में ग़ज़लों का योगदान’ विषय पर शोध कर रही हैं। उन्होंने मुझसे एक सवाल पूछा- इस वक़्त हिंदी का सर्वश्रेष्ठ ग़ज़लकार कौन है ? मैंने उन्हें जवाब दिया- मेरी नज़र में इस वक़्त कवि सूर्यभानु गुप्त पूरे देश में हिंदी के सर्वश्रेष्ठ ग़ज़लकार हैं। उन्होंने ज़िंदगी और समाज की समस्याओं के बरक्स हिंदी ग़ज़ल को भाषा,भाव,शैली और अभिव्यक्ति का नया तेवर दिया । उनका यह योगदान बेहद सराहनीय है। यह बात कम लोगों को पता है कि स्व.दुष्यंत कुमार का संकलन आने से पहले ही सूर्यभानु गुप्त की ग़ज़लें ‘धर्मयुग’ में छपकर मशहूर हो चुकी थीं। मेरी बात के समर्थन में उनके दो शेर ही काफ़ी हैं-

ज़िंदगी हम अदीबों की मजबूर है और मजबूर है सालहा साल से
जैसे कश्मीर फूलों का रिसता हुआ एक नासूर है सालहा साल से

हर लम्हा ज़िंदगी के पसीने से तंग हूँ
मैं भी किसी कमीज़ के कॉलर का रंग हूँ


22 जनवरी 1998 को सूर्यभान गुप्त ने मुझे अपना काव्यसंकलन ‘एक हाथ की ताली’ भेंट किया था। हस्ताक्षर के साथ उन्होंने लिखा- ‘साहित्यनामची श्री देवमणि जी को नववर्ष की शुभकानाओं के साथ’। तब मैंने मुम्बई के सबसे लोकप्रिय सांध्यदैनिक ‘संझा जनसत्ता’ में अपने साप्ताहिक स्तम्भ ‘साहित्यनामचा’ में सूर्यभान गुप्त पर एक लेख लिखा। सुबह के अख़बार ‘जनसत्ता’ में उसकी झलक छपी - ‘आज साहित्यनामचा में पढ़िए… दुनिया के काबिल बनो बेटा सूरजभान।’ उनके पास कई लोगों के फ़ोन गए कि आपके प्रिय मित्र पांडेय जी ने तो आपकी खटिया ही खड़ी कर दी। आपको बेटा बना दिया । लेकिन वे यह सब सुनकर बस मुस्कराते रहे । उन्हें पता था कि मैंने यह शीर्षक उनके एक दोहे से लिया है । उनकी तारीफ़ करते हुए मैंने उनके कुछ दोहे कोट किए थे –

दुनिया को मत दोष दो, टूटे जो अरमान
दुनिया के क़ाबिल बनो, बेटा सूरजभान


मोहब्बत में जब दिल जलता है तो आँखें बरसकर ठंडी हो जाती हैं। ऐसे संवेदनशील मंज़र को दोहे में ढालने का हुनर सूर्यभान गुप्त में ही था-

क्या बतलाएं, क्या लिखें, तुमको अपना हाल
दिल तो राजस्थान है , आंखें नैनीताल


दरअसल निदा फ़ाज़ली से पहले ही सत्तर के दशक में उनके दोहे ‘धर्मयुग’ में छपकर मशहूर हो चुके थे। जब 1995 में उन्हें काव्य साहित्य में उल्लेखनीय योगदान के लिए ‘परिवार’ पुरस्कार मिला तो उस समारोह में शायर जावेद अख़्तर ने उनकी तारीफ़ करते हुए उनके कुछ दोहे ज़बानी सुना दिए तो ख़ूब तालियां बजीं –

सपने मुर्दा मछलियाँ, आंखें सूखी झील
हर चेहरे के ठूँठ पर, बैठी है इक चील

सचमुच की कितनी बड़ी हमने तुमने भूल
इन आंखों में खोलकर सपनों के स्कूल


कुछ लोगों का कहना है कि अगर उनके पास कमलेश्वर जैसा समर्थ दोस्त होता तो वे लोकप्रियता में दुष्यंत कुमार से भी आगे निकल गए होते। विडम्बना देखिए कि उनका पहला काव्य संकलन ‘एक हाथ की ताली’ (वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली) तब आया जब उनको लिखते हुए 40 साल हो गए थे । जब दुष्यंत कुमार का संकलन ‘साए में धूप’ प्रकाशित नहीं हुआ था उस समय भी सूर्यभान गुप्त की ग़ज़लें नएपन और ताज़गी का परचम लहरा रही थीं-

मुझको उदास करने की ज़िद पर तुली हुई
क्या चीज़ है ये मेरे लहू में घुली हुई

कुछ बूढ़े मेरे गांव के संजीदा हो गए
फेंकी जो मैंने शहर की भाषा धुली हुई


मुंबई महानगर में सूर्यभानु गुप्त और जावेद अख़्तर ने साथ-साथ अपना सफ़र शुरु किया था। जावेद को मंज़िलें मिलीं । सूर्यभानु गुप्त को आज भी मंज़िलों की तलाश है। शायर बनना कितना मुश्किल काम हैं, इसे बताने के लिए मैं अपने संचालन में प्राय : सूर्यभानु गुप्त की ये पंक्तियां कोट करता हूँ –

रात रोने से कब घटी साहब
बर्फ़ धागे से कब कटी साहब
सिर्फ़ शायर वही हुए जिनकी
ज़िंदगी से नहीं पटी साहब

आपने गुलज़ार साहब की त्रिवेणियों का ज़िक्र ज़रूर सुना होगा। सूर्यभानु गुप्त तो तीस साल पहले ही त्रिवेणी यानी त्रिपदी लिख चुके थे-

शाख़ कुछ यूँ गुलाब देती है
जैसे नज़रें झुकाके लड़के को,
कोई लड़की जवाब देती है


आपात काल के बाद जनता पार्टी की सरकार बनने पर उन्होंने ‘दूसरी आज़ादी’ शीर्षक से त्रिपदियों की एक सीरीज़ लिखी थी। तत्कालीन सरकार में उस वक़्त कोई पद न लेने वाले लोकनायक जयप्रकाश नारायण की क्या स्थिति थी इसे आप सूर्यभानु गुप्त की एक त्रिपदी से समझ सकते हैं-

धूल ही धूल हर गली बाबा !
चोर सारे सवार घोड़ों पर,
और पैदल इधर अलीबाबा


आपातकाल के बाद हुए आम चुनाव में श्रीमती इंदिरा गाँधी की पराजय का दृश्य देखिए-

जमत-जमते पिघल गया सब कुछ
ऐसे झुमका गिरा बरेली में,
एक पल में बदल गया सब कुछ

क्या आपको भी लगता है कवि सूर्यभानु गुप्त पूरे देश में हिंदी के सर्वश्रेष्ठ ग़ज़लकार हैं ! कृपया अपनी राय ज़रूर बताएं। अंत में उनका एक दोहा सुनिए –

भर्ती के कवि हर गली, करते निज निजघोष
जिनकी कविता बोलती, वे रहते खामोश

सम्पर्क :

सूर्यभानु गुप्त, 2, मनकू मेंशन, सदानन्द मोहन जाधव मार्ग, दादर (पूर्व), मुम्बई – 400014, दूरभाष : 022-24137570

Saturday, April 3, 2010

सूर्यभानु गुप्त की छः ग़ज़लें


परिचय : कवि सूर्यभानु गुप्त
जन्म  :  22 सितम्बर, 1940, नाथूखेड़ा (बिंदकी), जिला : फ़तेहपुर ( उ.प्र.)। बचपन से ही मुंबई में । 12 वर्ष की उम्र से कविता लेखन।
प्रकाशन  : पिछले 50 वर्षो के बीच विभिन्न काव्य-विधाओं में 600 से अधिक रचनाओं के अतिरिक्त 200 बालोपयोगी कविताएँ प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। समवेत काव्य-संग्रहों  में संकलित एवं गुजराती, पंजाबी, अंग्रेजी में अनूदित ।
फ़िल्म गीत-लेखन : गोधूलि (निर्देशक गिरीश कर्नाड ) एवं आक्रोश तथा संशोधन (निर्देशक गोविन्द निहलानी ) जैसी प्रयोगधर्मा फ़िल्मों के अतिरिक्त कुछ नाटकों तथा आधा दर्जन दूरदर्शन- धारवाहिकों में गीत शामिल।
प्रथम काव्य-संकलन : एक हाथ की ताली (1997), वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली 110 002
पुरस्कार : 1. भारतीय बाल-कल्याण संस्थान, कानपुर , 2. परिवार पुरस्कार (1995), मुम्बई ।
पेशा : 1961 से 1993 तक विभिन्न नौकरियाँ । सम्प्रति स्वतंत्र लेखन ।
सम्पर्क : 2, मनकू मेंशन, सदानन्द मोहन जाधव मार्ग, दादर ( पूर्व ), मुम्बई- 40001,
दूरभाष : 099694-71516  /  022-2413-7570

सूर्यभानु गुप्त की छः ग़ज़लें  
 
(1)   
पहाड़ों  के  क़दों की खाइयाँ हैं
बुलन्दी पर बहुत नीचाइयाँ हैं

है  ऐसी तेज़ रफ़्तारी का आलम
कि लोग अपनी ही ख़ुद परछाइयाँ हैं

गले मिलिए तो कट जाती हैं जेबें
बड़ी  उथली  यहाँ  गहराइयाँ  हैं

हवा  बिजली  के  पंखे बाँटते  हैं
मुलाज़िम झूठ की सच्चाइयाँ हैं
  
बिके पानी समन्दर के किनारे
हक़ीक़त पर्वतों की राइयाँ हैं

गगन-छूते  मकां  भी, झोपड़े  भी
अजब इस शहर की रानाइयाँ हैं

दिलों की बात ओंठों तक न आए
कसी  यूँ  गर्दनों  पर  टाइय़ाँ  हैं

नगर की बिल्डिंगें बाँहों की सूरत
बशर  टूटी  हुई  अँगड़ाइयाँ   हैं

जिधर देखो उधर पछुआ का जादू
सलीबों पर चढ़ीं पुरवाइयाँ  हैं

नई तहज़ीब ने ये गुल खिलाए
घरों से लापता अँगनाइयाँ   हैं

असर में लोग यूँ हैं रोटियों के
ख़यालों तक गईं गोलाइयाँ हैं

यहाँ रद्दी में बिक जाते हैं शाइर
गगन ने छोड़ दी ऊँचाइयाँ  हैं

कथा हर ज़िंदगी की द्रोपदी-सी
बड़ी इज़्ज़त-भरी रुस्वाइयाँ  हैं

जो ग़ालिब आज होते तो समझते
ग़ज़ल कहने में क्या कठिनाइयाँ हैं
( 2)
अपने घर में ही अजनबी की तरह
मैं  सुराही  में  इक  नदी  की तरह

एक  ग्वाले  तलक  गया  कर्फ़्यू
ले के सड़कों को बन्सरी की तरह

किससे हारा मैं, ये मेरे  अन्दर
कौन रहता है ब्रूस ली की तरह

उसकी सोचों में मैं उतरता हूँ
चाँद पर पहले आदमी की तरह

अपनी तनहाइयों में रखता है
मुझको इक  शख़्स डायरी की तरह

मैंने उसको छुपा के रक्खा है
ब्लैक आउट में रोशनी की तरह

टूटे बुत रात भर जगाते हैं
सुख परीशां है गज़नवी की तरह

बर्फ़ गिरती है मेरे चेहरे पर
उसकी यादें हैं जनवरी की तरह

वक़्त-सा है अनन्त इक चेहरा
और मैं रेत की घड़ी की तरह
   (3)
हर  लम्हा  ज़िन्दगी  के पसीने से  तंग  हूँ
मैं भी किसी क़मीज़ के कॉलर का रंग हूँ

मोहरा  सियासतों  का, मेरा नाम आदमी
मेरा  वुजूद क्या है, ख़लाओं  की जंग हूँ

रिश्ते  गुज़र  रहे हैं लिये दिन में बत्तियाँ
मैं  बीसवीं  सदी  की  अँधेरी  सुरंग  हूँ

निकला हूँ इक नदी-सा समन्दर को ढूँढ़ने
कुछ  दूर कश्तियों  के अभी  संग-संग हूँ

माँझा  कोई  यक़ीन  के क़ाबिल नहीं रहा
तनहाइयों  के  पेड़  से  अटकी  पतंग  हूँ

ये  किसका  दस्तख़त है, बताए कोई मुझे
मैं अपना नाम लिख के अँगूठे -सा दंग हूँ
  (4)
सुबह  लगे यूँ प्यारा दिन
जैसे नाम तुम्हारा दिन

पाला  हुआ  कबूतर   है
उड़,  लौटे  दोबारा  दिन

दुनिया की हर चीज़ बही
चढ़ी  नदी का धारा दिन

कमरे  तक  एहसास रहा
हुआ सड़क पर नारा दिन

थर्मामीटर    कानों    के
आवाज़ो  का  पारा  दिन

पेड़ों-जैसे    लोग    कटे
गुज़रा  आरा-आरा  दिन

उम्मीदों    ने     टाई-सा
देखी शाम,  उतारा दिन

चेहरा-चेहरा राम-भजन
जोगी का इकतारा दिन

रिश्ते  आकर  लौट  गए
हम-सा रहा कुँवारा दिन

बाँधे-बँधा    दुनिया के
जन्मों  का बन्जारा दिन

अक्ल़मन्द  को काफ़ी है
साहब ! एक इशारा दिन
  (5)
जिनके अंदर चिराग जलते हैं
घर से बाहर वही निकलते हैं

बर्फ़ गिरती है जिन इलाकों में
धूप के कारोबार चलते हैं

दिन पहाड़ों की तरह कटते हैं
तब कहीं रास्ते निकलते हैं

ऐसी काई है अब मकानों पर
धूप के पाँव भी फिसलते हैं

खुदरसी उम्र भर भटकती है
लोग इतने पते बदलते हैं

हम तो सूरज हैं सर्द मुल्कों के
मूड आता है तब निकलते हैं
  (6)
दिल   में   ऐसे   उतर   गया  कोई
जैसे  अपने  ही   घर   गया  कोई

एक रिमझिम में बस, घड़ी भर की
दूर  तक   तर-ब-तर   गया  कोई

आम  रस्ता  नहीं  था  मैं, फिर भी
मुझसे  हो  कर  गुज़र  गया कोई

दिन किसी  तरह कट गया लेकिन
शाम   आई   तो  मर  गया    कोई

इतने   खाए   थे   रात   से   धोखे
चाँद  निकला  कि  डर  गया  कोई

किसको  जीना था छूट कर तुझसे
फ़लसफ़ा  काम  कर  गया    कोई

मूरतें   कुछ   निकाल   ही   लाया
पत्थरों   तक   अगर   गया   कोई

मैं  अमावस  की  रात  था, मुझमें
दीप    ही    दीप   धर  गया  कोई

इश़्क   भी  क्या  अजीब दरिया है
मैं   जो   डूबा,   उभर   गया   कोई