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Friday, June 20, 2014

बदली निगाहें वक़्त की क्या-क्या चला गया

मुम्बई के गुजराती कवियों के साथ देवमणि पाण्डेय (18.5.2014)


देवमणि पाण्डेय की ग़ज़ल

बदली निगाहें वक़्त की क्या-क्या चला गया 
चेहरे के साथ-साथ ही रुतबा चला गया 

मेरी तलब को जिसने समंदर अता किेए
अफ़सोस मेरे दर से वो प्यासा चला गया

अबके कभी वो आया तो आएगा ख़्वाब में
आँखों के सामने से तो कब का चला गया

बचपन को साथ ले गईं घर की ज़रूरतें
सारी किताबें छोड़ के बच्चा चला गया 

रिश्ता भी ख़ुद में होता है स्वेटर की ही तरह
उधड़ा जो एक बार, उधड़ता चला गया

वो बूढ़ी आँखें आज भी रहती हैं मुंतज़िर
जिनको अकेला छोड़ के बेटा चला गया 

अपनी अना को बेचके पछ्ताए हम बहुत
जैसे किसी दरख़्त का साया चला गया






मुम्बई के उर्दू दैनिक इंक़लाब में देवमणि पाण्डेय की ग़ज़ल (29.6.2014)
देवमणि पाण्डेय :  98210-82126

Thursday, June 12, 2014

रफ़्ता-रफ़्ता ज़िंदगी के पेंच ढीले हो गए

 इंदौर में संगीतकार राजेश रोशन, अभय जैन और कवि-संचालक देवमणि पांडेय  (1.2.2014)


  देवमणि पांडेय की ग़ज़ल

वक़्त के साँचे में ढल कर हम लचीले हो गए
रफ़्ता-रफ़्ता ज़िंदगी के पेंच ढीले हो गए

इस तरक़्क़ी से भला क्या फ़ायदा हमको हुआ
प्यास तो कुछ बुझ न पाई होंठ गीले हो गए

जी हुज़ूरी की सभी को इस क़दर आदत पड़ी
जो थे परबत कल तलक वो आज टीले हो गए

क्या हुआ क्यूँ घर किसी का आ गया फुटपाथ पर
शायद  उनकी लाडली के हाथ पीले हो गए

आपके बर्ताव में थी सादगी पहले बहुत
जब ज़रा शोहरत मिली तेवर नुकीले हो गए

हक़ बयानी की हमें क़ीमत अदा करनी पड़ी
हमने जब सच कह दिया वो लाल-पीले हो गए

हो मुख़ालिफ़ वक़्त तो मिट जाता है नामो-निशां
इक महाभारत में गुम कितने क़बीले हो गए




मुम्बई के उर्दू दैनिक इंक़लाब में देवमणि पाण्डेय की ग़ज़ल (03.8.2014)
देवमणि पाण्डेय : 98210-82126