Recent Posts

Saturday, December 11, 2010

संगीत सम्मान अवार्डस-2010

सम्मानित हुईं कला व संगीत की महान विभूतियां

नई दिल्ली 2 दिसम्बर 2010। राजधानी के एक सभागार में बृहस्पतिवार को संगीतमयी शाम में कला और संगीत की उन विभूतियों को सम्मानित किया गया जिनकी मौजूदगी से कला व संगीत का क्षेत्र खुद को सम्मानित महसूस करता है। केंद्रीय गृह राज्यमंत्री अजय माकन ने पद्म विभूषण बांसुरी वादक पं. हरिप्रसाद चौरसिया और पद्म भूषण कथक नृत्यांगना उमा शर्मा को भारत के संगीत रत्न अवार्ड से सम्मानित करते हुए कहा कि यह मौका पाकर वह खुद को बेहद सम्मानित महसूस कर रहे है। इंडिया हैबीटेट सेंटर में दि आर्ट एंड कल्चरल ट्रस्ट आफ इंडिया द्वारा आयोजित संगीत सम्मान अवार्डस-2010 का शुभारंभ मुख्य अतिथि गृह राज्य मंत्री अजय माकन ने दीप प्रज्वलित करके किया। इस मौके पर उनके साथ ट्रस्ट के संस्थापक अध्यक्ष ठा. चक्रपाणि सिंह, अध्यक्ष ललित भसीन, सचिव परमजीत कौर, डा. रचना और मुम्बई के कवि-उदघोषक देवमणि पाण्डेय भी मंच पर मौजूद थे।



इस संगीतमयी शाम का शुभारंभ पांच वर्षीय ऊर्जा अक्षरा ने सरस्वती वंदना से किया। मुख्य अतिथि श्री अजय माकन ने भोपाल के ध्रुपद गायक गुंडेचा ब्रदर्स प. उमाकांत एवं प. रमाकांत गुंडेचा को संगीतश्री सम्मान और प्रसिद्ध पखावज वादक प. डालचंद शर्मा को दिल्ली रत्न से सम्मानित किया। इसके अलावा लोक गायिका लक्ष्मी सिंह को भी सम्मानित किया गया। ट्रस्ट की ओर से संस्थापक अध्यक्ष ठा. चक्रपाणि सिंह ने मुख्य अतिथि अजय माकन को स्मृति चिह्न प्रदान किया। इस मौके पर अजय माकन ने कहा कि समाज निर्माण में कलाकारों की अहम भूमिका होती है। श्री माकन ने आर्ट एंड कल्चरल ट्रस्ट आफ इंडिया की स्मारिका का लोकार्पण भी किया। इस संगीतमयी शाम को उमा शर्मा ने अपने कथक नृत्य से सराबोर कर दिया।



ध्रुपद गायक गुंडेचा ब्रदर्स की शास्त्रीय गायकी ने खूब वाह-वाही बटोरी। अपने सम्मान का उत्तर देते हुए प. हरिप्रसाद चौरसिया ने कहा कि वह अब भी विद्यार्थी हैं और सीख रहे हैं। जैसा सम्मान उन्हें आज यहां मिला है, वह अद्भुत है। समारोह के संचालन के लिए ख़ास तौर से मुम्बई के कवि-उदघोषक देवमणि पाण्डेय को आमंत्रित किया गया था। उन्होंने साहित्यिक गरिमा के साथ मंच संचालन किया।

Tuesday, November 23, 2010

सूफी संत, विश्व शांति एवं वसुधैव कुटुम्बकम

सूफी अलबम कबीराना सूफियाना के लोकार्पण समारोह में- एक्सेल इंफोज लि.के एमडी लखमेंद्र खुराना, संगीतकार-गायक विवेक प्रकाश, संगीतकार ख़य्याम, सूफी सिंगर कविता सेठ, कवि नारायण अग्रवाल, कवि-उदघोषक देवमणि पाण्डेय और टाइम्स म्यूज़िक के पूर्व सीईओ अरुण अरोड़ा।
सूफी संत, विश्व शांति एवं वसुधैव कुटुम्बकमदुनिया को सूफीवाद की सबसे बड़ी देन है मुहब्बत। सूफ़ी शायरों ने पूरी दुनिया को मुहब्बत का पैगाम दिया। सूफी शायरों ने अपने सूफ़ियाना कलामों के ज़रिए लोगों को मुहब्बत का ऐसा ख़ूबसूरत पैग़ाम दिया कि दिल के तारों में झनकार पैदा हो गई। लोगों ने ख़ुदा के साथ अपना ऐसा पाक और रुहानी रिश्ता जोड़ा कि उन्हें अपने दिल के आईने में सारी दुनिया का अक्स नज़र आने लगा। इस तरह दिल से दिल के तार जुड़ते चले गए।

हमारे देश के संत कवियों ने भी जात-पांत, धर्म और सम्प्रदाय से ऊपर उठकर, प्रेम के धागे से लोगों के दिलों को जोड़ने का काम बहुत ख़बसूरती से किया। दरअसल हमारे ऋषियों और संतों ने वसुधैव कुटुम्बकम की भावना को पूरी दुनिया में पहुँचाने का नेक काम हमेशा किया। शायद इसी लिए इस्लाम के सूफीमत और हिंदुस्तान की संतवाणी दोनों का तसव्वुर एक ही है। दोनों मज़हब में नहीं बंटे। यूनीवर्सल बने रहे। दोनों ने अपना रिश्ता अल्लाह से और ईश्वर से जोड़ा। सभी को एक जैसा मानने वाले इन सूफियों और संतों ने सभी इंसानों के लिए प्यार का पैग़ाम दिया।

सूफीवाद की ख़ुशबू पंजाब की संतवाणी में भी नुमायां है। गुरुनानक से लेकर बुल्ले शाह, वारिसशाह और बाबा फरीद ने अपनी सूफी कलाम से मुहब्बत की ऐसी बारिश की जिसमें समूचा हिंदुस्तान तरबतर हो गया-


अव्वल अल्ला नूर उपाया, क़ुदरत दे सब वंदे।
एक नूर ते सब जग उपज्यां , कौन भले कौन मंदे।

क़रीब हज़ार साल पहले ईरान में इमाम ग़ज़ाली के ज़रिए सूफीवाद का उदय हुआ। वहां से तुर्की होते हुए इसकी ख़ुशबू हिंदुस्तान पर छा गई। ईरान के सूफी संतों, ख़ास तौर से जलालुद्दीन रुमी और हाफ़िज़ शीराजी ने सूफीवाद को अपने कलाम के ज़रिए बुलंदी पर पहुंचाया। आज भी लोग उनसे इतनी मुहब्बत करते हैं कि वर्ष 2007 को पूरी दुनिया में इयर ऑफ दि रुमी के तौर पर मनाया गया। यह उनकी 800वीं बरसी थी।

हिंदुस्तान में निज़ामुद्दीन औलिया के शागिर्द अमीर ख़ुसरो के कलाम में सूफीवाद का ख़ूबसूरत मंज़र दिखाई देता है। ख़ुदा से मेल होने के बाद आदमी अपनी दुनियावी पहचान से आज़ाद होकर एक अलौकिक दुनिया में पहुंच जाता है। अमीर खुसरो लिखते हैं- छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइ के सूफीवाद की रिवायत के अनुसार उनकी रचनाओं में फीमेल लहजा भी दिखाई देता है । उन्होंने लिखा-
ख़ुसरो रैन सुहाग की जागी पिय के संग।
तन मेरा मन मेरा पीव का दोनों भए एक संग।
सूफीवाद पर चर्चा करते हुए कवि-उदघोषक देवमणि पाण्डेय, सूफी सिंगर कविता सेठ और कवि नारायण अग्रवाल।

सूफीवाद मुहब्बत के दयार में फ़कीर की तरह घूमने-फिरने की आज़ादी है। यह माना जाता है कि अल्लाह हर चीज़ में है। अगर अल्लाह हर चीज़ में है तो वह बुत में भी है। सूफी शायर लिखता है-
बुत में भी तेरा यारब जलवा नज़र आता है
बुतख़ाने के परदे में काबा नज़र आता है

माशूक के रुतबे को महशर में कोई देखे
अल्लाह भी मजनूं को लैला नज़र आता है

इक क़तरा-ए-मय जब से साक़ी ने पिलाई है
उस रोज़ से हर क़तरा दरिया नज़र आता है

साक़ी की मोहब्बत में दिल साफ़ हुआ इतना
जब सर को झुकाता हूं शीशा नज़र आता है

दिल और कहीं ले चल ये दैरो-हरम छूटे
इन दोनों मकानों में झगड़ा नज़र आता है

सूफीवाद कहता है कि अल्लाह एक है। उसके बंदे एक हैं। अल्लाह को पाने के लिए जोगी बनना ज़रूरी नहीं है। घर-गृहस्थी में रहकर भी अल्लाह से रिश्ता जोड़ा जा सकता है। बीवी से प्रेम है तो अल्लाह से भी मुहब्बत हो सकती है। ख़ुदा से मुहब्बत यानी परमात्मा से आत्मा का मिलन ही इनकी ज़िंदगी का मक़सद था।

नूर मोहम्मद यह कथा है तो प्रेम की बात।
जेहि मन कोई प्रेम रस पढ़े सोई दिन रात।


हिंदुस्तान में मलिक मोहम्मद जायसी,कुतुबन,मंझन,नूर मुहम्मद आदि कई ऐसे रचनाकार हुए जिन्हें सूफी रिवायत का आगे बढ़ाने वाला माना जाता है। जायसी ने पदमावत, अखरावट, और कान्हावत जैसे महाकाव्य लिखे। आशिक़ में तड़प,क़सक और दर्द का होना ज़रुरी है। जायसी के पदमावत में इन भावनाओं की बुलंदी दिखाई देती है। इस प्रेम कथा में रानी पदमावती को परमात्मा और राजा रत्नसेन को आत्मा के रुप में चित्रित किया गया है। ख़ास बात यह है कि हिंदुस्तान के सूफी शायरों ने अपने सूफियाना कलाम के लिए सारे अफ़साने हिंदू मैथॉलाजी से लिए। भारत के सूफी शायर यहां के लोक जीवन, लोकाचार और लोक संस्कृति से भली भांति वाक़िफ़ थे। महबूब की जुदाई के इज़हार के लिए जायसी ने बारहमासा लिखा जो लोक जीवन की मंज़रकशी का बेजोड़ नमूना है।

सूफी शायरों ने अपने पराए के दायरे से बाहर निकालकर पूरी दुनिया की भलाई के लिए इंसानियत पर ज़ोर दिया। सूफियों में जोड़ने की ज़बरदस्त भावना थी। उन्होंने किसी भी भेदभाव से ऊपर उठकर इंसान के दिलों को जोड़ने का काम हमेशा किया।

सूफियों के अनुसार प्रेम ही जीवन की सबसे बड़ा सचाई है। जो इंसान इस प्रेम को पा लेता है उसे किसी और चीज़ की ज़रुरत नहीं रह जाती। कबीर ने लिखा है-


कबिरा प्याला प्रेम का अंतर लिया लगाया।
रोम रोम में रमि रहा और अमल कोड नाय।


रामानंद के शिष्य कबीर को कुछ लोग सूफी संत शेख़ तकी का शागिर्द भी बताते हैं। कबीर पर सूफियों का काफी असर दिखाई देता है- कबीर ने कहा है-

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय।

शायरी की रिवायत में महबूब मेल है। इसलिए ऐसी शायरी काफी लिखी गई है जिसमें दोहरे संकेत हैं। यानी चाहे उसे ख़ुदा के लिए समझिए या महबूब के लिए। यह सिलसिला आज भी जारी है। शायर देवमणि पाण्डेय की ग़ज़ल देखिए-
ख़यालों में तुम्हारे जब कभी मैं डूब जाता हूं
जिधर देखूं नज़र के सामने तुमको ही पाता हूं

मुहब्बत दो दिलों में फ़ासला रहने नहीं देती
मैं तुमसे दूर रहकर भी तुम्हें नज़दीक पाता हूं

किसी लम्हा, किसी भी पल ये दिल तनहा नहीं होता
तेरी यादों के फूलों से मैं तनहाई सजाता हूं

तेरी चाहत का जादू चल गया है इस तरह मुझ पर
ख़ुशी में रक्स करता हूं, मैं ग़म में मुसकराता हूं

मेरे दिल पर, मेरे एहसास पर यूं छा गए हो तुम
तुम्हें जब याद करता हूं मैं सब कुछ भूल जाता हूं

सूफी लोग सूफ यानी ऊन का लबादा पहनते थे। सूफी का मक़सद है फ़कीर होना। सादगी ही इनका धर्म है। धन- दौलत से इन्हें कुछ मतलब नहीं।

हर रिश्ते से ले लिया, जबसे हमने जोग ।
घर के से लगने लगे, दुनिया भर के लोग।


पूरी दुनिया को अपना घर-परिवार समझने वाले सूफी शायरों और सूफी संतों ने मुहब्बत की एक ऐसी मशाल रोशन की जिसकी रोशनी में आज भी पूरी दुनिया को अपना रास्ता साफ़-साफ़ दिखाई दे रहा है।

देवमणि पांडेय : 98210-82126
devmanipandey@gmail.com 

Thursday, November 4, 2010

गायक राजेंद्र-नीना मेहता को जीवंती कला सम्मान



(बाएं से दाएं) समाजसेवी विनोद टिबड़ेवाला, कवि-उदघोषक देवमणि पाण्डेय, वरिष्ठ पत्रकार नंदकिशोर नौटियाल, ग़ज़ल सिंगर राजेंद्र-नीना मेहता, संस्थाध्यक्ष कवयित्री माया गोविंद प्रतिष्ठित कथाकार आर.के.पालीवाल, और गुरु अरविंदजी।

ग़ज़ल सिंगर राजेंद्र-नीना मेहता को जीवंती कला सम्मान

मौसम बारिश का था। मगर चारों तरफ आग बरस रही थी। सन 1947 के अगस्त माह के आख़िरी दिन थे। देश को आज़ादी मिली। मगर आज़ादी की खुशियां बंटवारे की कोख़ से जन्मे दंगों की ट्रेजडी में तब्दील हो गईं। जलते मकानों, उजड़ी दुकानों और सड़क पर पानी की तरह बहते इंसानी ख़ून के ख़ौफ़नाक मंज़र ! इनसे तमाम माहौल में रुह को थर्रा देने वाली दहशत फैल गई थी। सन्नाटे को चीरता हुआ फ़ौज का एक ट्रक लाहौर में एक मकान के सामने रुका। धडधड़ाकर दस-बारह जवान नीचे कूदे। दरवाजे पर दस्तक दी। सामने एक ख़ौफ़ज़दा औरत और नौ साल का सहमा हुआ बच्चा खड़ा था। बच्चे का बाप कारोबार के सिलसिले में बाहर गया था। उन्हें हुक्म मिला- कोई भी एक संदूक उठा लो । हम तुम्हें कैंम्प तक छोड़ देंगे। फिर हमारी ज़िम्मेदारी ख़त्म। जवाब का इंतज़ार किए बिना झट से एक फ़ौजी ने कोने में रखा संदूक उठाया। पलक-झपकते मां-बेटे को ट्रक में चढ़ाया और डीएवी कालेज के मुहाजिर कैम्प में लाकर डाल दिया। बीस दिनों के बाद बिछड़ा हुआ बाप आकर अपने बेटे से मिला। मुसीबतों का दरिया पार करने के बाद जब ये परिवार हिंदुस्तान की सरहद में दाख़िल हुआ तो संदूक खोला गया। उस संदूक में एक हारमोनियम था। कई शहरों की ख़ाक छानने के बाद आख़िरकार वो बच्चा उस हारमोनियम के साथ आर्ट और फ़न की नगरी मुंबई पहुंचा। मुंबई ने उसे और उसने मुंबई को अपना लिया। आज उस बच्चे को लोग ग़ज़ल सिंगर राजेंद्र मेहता के नाम से जानते हैं।

शनिवार 30 अक्टूबर 2010 को भवंस कल्चर सेंटर अंधेरी (मुम्बई) में जाने माने ग़ज़ल सिंगर राजेंद्र-नीना मेहता को जीवंती फाउंडेशन की ओर से जीवंती कला सम्मान से विभूषित किया गया। वरिष्ठ पत्रकार नंदकिशोर नौटियाल, प्रतिष्ठित कथाकार-आयकर आयुक्त आर.के.पालीवाल,समाजसेवी विनोद टिबड़ेवाला और संस्थाध्यक्ष कवयित्री माया गोविंद ने उन्हें यह सम्मान भेंट किया। कवि देवमणि पाण्डेय ने राजेंद्र मेहता से उनके फ़न और शख़्सियत के बारे में चर्चा की। राजेंद्र मेहता ने अपनी ग़ज़लों की अदायगी से श्रोताओं को अभिभूत कर दिया। श्रोताओं की माँग पर उन्होंने अपना लोकप्रिय नग़मा भी पेश किया-

जब आंचल रात का लहराए और सारा आलम सो जाए
तुम मुझसे मिलने शमा जलाकर ताजमहल में आ जाना

ग़ज़ल के मंच की पहली जोड़ी
वर्ष था 1963 और तारीख थी 5 अगस्त। आकाशवाणी मुंबई में जमालसेन के म्यूज़िकल ड्रामा ‘मीरा’ की रिकार्डिंग थी। राजेंद्र ने राणा के लिए और नीना ने मीरा के लिए अपना स्वर दिया। राजेंद्र का असरदार गायन सुनकर नीना के दिल के तार झंकृत हो उठे। राजेंद्र की पलकों पर भी ख़्वाब रोशन हो गए।उस ज़माने में इंटरकास्ट मैरिज आसान नहीं थी। राजेंद्र ने यह भी कहा था- हम छुपकर या घर से भागकर शादी नहीं करेंगे। हम तुम्हारे मां-बाप की रज़ामंदी से ही शादी करेंगे। नीना जी के मां-बाप का रुख़ इस मामले में काफी सख़्त था। तीन साल के कड़े इम्तहान के बाद अक्तूबर 1966 में दोनों की मंगनी हुई और जनवरी 1967 में नीना और राजेंद्र मेहता विवाह सूत्र में बंध गए।
सन् 1967 में ‘सुरसिंगार संसद’ के प्रोग्राम में राजेंद्र और नीना ने एक साथ मिलकर ग़ज़ल गाई। यानी ग़ज़ल के मंच की पहली जोड़ी के रूप में सामने आए और दोनों ने और शोहरत के आसमान पर अपनी कामयाबी का परचम लहरा दिया। ग़ज़ल का रवायती मानी ‘औरत से बातचीत’ लिया जाता है। अगर औरत ग़ज़ल गएगी तो वह किससे बात करेगी ? इस मुद्दे पर अख़बारों में बहस छिड़ गई। बहरहाल मेल और फीमेल को एक साथ ग़ज़ल गाते देखकर संगीत प्रेमी सामयीन हैरत में पड़ गए। मगर इस तरह ग़ज़ल गायिकी में एक नया ट्रेंड कायम हो चुका था। दो साल बाद जब चित्रा और जगजीत सिंह साथ-साथ मंच पर आए तो इस ट्रेंड को पसंद करने वालों की तादाद बुलंदी पर पहुँच चुकी थी।




राजेंद्र मेहता ग़ज़ल पेश करते हुए साथ में हैं श्रीधर चारी (तबला), कवि-उदघोषक देवमणि पाण्डेय और सुनीलकांत गुप्ता (बाँसुरी)

फेमिली बैक ग्राउंड
वक़्त भी क्या दिन दिखाता है। राजेंद्र मेहता के बाबा लाहौर के बाइज़्ज़त ज़मींदार थे। पिता की अच्छी-ख़ासी चाय की कंपनी थी। सरकार की तरफ़ से नाना ने पहली जंगे-अज़ीम में और मामा ने दूसरी जंगे-अज़ीम में हिस्सा लिया था। मगर राजेंद्र मेहता को लखनऊ में ख़ुद को गुरबत से बचाने के लिए एक होटल में पर्ची काटने की नौकरी करनी पड़ी। उस समय वे नवीं जमात के तालिबे-इल्म थे। पढ़ाई के साथ नौकरी का यह सिलसिला बारहवीं जमात तक चला। इंटरमीडिएट पास करने पर उन्हें बांबे म्युचुअल इश्योरेंस कंपनी में नौकरी मिल गई। 1957 में उन्होंने बीए पास कर लिया। राजेंद्र मेहता की मां को गाने का शौक़ था। बचपन में ही उन्होंने मां से गाना सीखना शुरु कर दिया था। लखनऊ में पुरुषोत्तमदास जलोटा के गुरुभाई भूषण मेहता उनके पड़ोसी थे। उनको सुनकर फिर से गाने के शौक़ ने सिर उठाया। बाक्स में रखा हुआ हारमोनियम बाहर निकल आया। राजेंद्र मेहता ने उर्दू की भी पढ़ाई की। शायर मजाज़ लखनवी और गायिका बेग़म अख़्तर की भी सोहबतें मिलीं। 1960 में उनका तबादला मुंबई हो गया।

ग़ालिब से गुलज़ार तक
मुंबई आने से पहले ही राजेंद्र मेहता आकाशवाणी कलाकार बन चुके थे। लखनऊ यूनीवर्सिटी के संगीत मुक़ाबले का ख़िताब जीत चुके थे। कुंदनलाल सहगल की याद में मुम्बई में हुए संगीत मुक़ाबले में राजेंद्र मेहता ने अव्वल मुक़ाम हासिल किया। मरहूम पी.एम.मोरारजी देसाई के हाथों वे ‘मिस्टर गोल्डन वायस ऑफ इंडिया’ अवार्ड से नवाज़े गए। मार्च 1962 में ‘सुर सिंगार संसद’ ने सुगम संगीत को पहली बार अपने प्रोग्राम में शामिल किया। उसमें गाने से पहचान और पुख़्ता हुई। मशहूर संगीत कंपनी एचएमवी ने ‘स्टार्स आफ टुमारो’ के तहत 1963 में राजेंद्र मेहता का पहला रिकार्ड जारी किया। 1965 में जगजीत सिंह से दोस्ती हुई। 1968 में दोनों ने मिलकर करीब बीस शायरों की ग़ज़लें चुनकर ‘ग़ालिब से गुलज़ार तक’ लाजवाब प्रोग्राम पेश किया। इस मौक़े पर उस्ताद अमीर खां, जयदेव, ख़य्याम और सज्जाद हुसैन जैसे कई नामी कलाकर बतौर मेहमान तशरीफ़ लाए थे। इस नए तजुर्बे ने संगीत जगत में धूम मचा दी।

मेंहदी हसन का पब्लिक शो
जब राजेंद्र और नीना मेहता ग़ज़ल की दुनिया में आए, उस समय ग़ज़ल गायिकी में पैसा नहीं था। मगर 1978 में अचानक एक करिश्मा हुआ और सारा मंज़र बदल गया। पाकिस्तानी दूतावास की ओर से 1978 में ‘इक़बाल दिवस’ के सिलसिले में मेंहदी हसन मुंबई आए। उनकी प्रेस कांफ्रेंस में लता मंगेशकर, नौशाद और दिलीप कुमार जैसी हस्तियां मौजूद थीं। बिरला मातुश्री सभागार में मेंहदी हसन का पब्लिक शो हुआ। पांच सौ रुपए के टिकट थे मगर सभागार में एक भी सीट ख़ाली नहीं थी। षड़मुखानंद हाल में भी यही आलम रहा। देश के कुछ और शहरों में भी ग़ज़ल के शो हुए और देखते ही देखते मेंहदी हसन ने टिकट ख़रीदकर ग़ज़ल सुनने वाला एक क्लास खड़ा कर दिया। इस बदलते माहौल में ग़ज़ल गायकों को पैसा मिलने लगा। सिर्फ़ गायिकी से रोज़ी-रोटी चलने की उम्मीद बंध गई। लोगों को लगा कि अगर ‘किशोर कुमार नाइट’ हो सकती है तो ‘जगजीत सिंह नाइट’ भी हो सकती है। संगीत कंपनियों ने भी ग़ज़ल कार्यक्रम आयोजित करने शुरु कर दिए।
जब आंचल रात का लहराए
राजेंद्र मेहता को शोहरत और दौलत की भूक कभी नहीं रही। वे हमेशा मध्यम रफ़्तार से चले। उनके चुनिंदा अलबम आए और मंच पर भी उनके चुनिंदा प्रोग्राम हुए। ग़ज़लों को पेश करने के अपने बेमिसाल अंदाज़ से उन्होंने अपना एक ख़ास तबक़ा तैयार किया। उनकी ग़ज़लों में प्रेम की सतरंगी धनक के साथ ही समाज और सियासत के काले धब्बे भी नज़र आते हैं। मरहूम शायर प्रेमबार बर्टनी के मुहब्बत भरे एक नग़मे ‘जब आंचल रात का लहराए' को दिल को छू लेने वाले अंदाज़ में पेश करके राजेंद्र और नीना मेहता ने हमेशा के लिए ग़ज़लप्रेमियों के दिलों पर अपना नाम लिख दिया। संगीत के मंच पर राजेंद्र और नीना मेहता की जोड़ी को 44 साल हो चुके हैं। अपने अब तक के सफ़र से बेहद ख़ुश है। वे कहते हैं-ऊपरवाले ने हमें इतना कुछ दिया जिसके हम बिलकुल हक़दार नहीं थे। अक्सर राजेंद्र मेहता वे पंक्तियां सुनाते हैं जिसे उस्ताद अमीर खां सुनाया करते थे-

गुंचे ! तेरी क़िस्मत पे दिल हिलता है
सिर्फ़ इक तबस्सुम के लिए खिलता है
गुंचे ने कहा - बाबा ! ये इक तबस्सुम भी किसे मिलता है

देवमणि पांडेय : 98210-82126
devmanipandey@gmail.com