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Thursday, March 25, 2010

उम्मीद-ए-रोशनी कायम है लेकिन भाई गाँधी से

कवि देवमणि पाण्डेय, कथाकार आर.के.पालीवाल, न्यायमूर्ति श्री चन्द्रशेखर धर्माधिकारी, डॉ. सुशीला गुप्ता

गांधी जी की प्रसिद्ध कृति हिन्द स्वराज पर संगोष्ठी का आयोजन
महात्मा गांधी से पूछा गया- क्या आप तमाम यंत्रों के ख़िलाफ़ हैं ? उन्होंने उत्तर दिया- मैं यंत्रों के ख़िलाफ़ नहीं हूँ मगर यंत्रों के उपयोग के पीछे जो प्रेरक कारण है वह श्रम की बचत नहीं है, बल्कि धन का लोभ है। इस लिए यंत्रों को मुझे परखना होगा। सिंगर की सीने की मशीन का मैं स्वागत करूँगा। उसकी खोज के पीछे एक अदभुत इतिहास है। सिंगर ने अपनी पत्नी को सीने और बखिया लगाने का उकताने वाला काम करते देखा। पत्नी के प्रति उसके प्रेम ने, ग़ैर ज़रूरी मेहनत से उसे बचाने के लिए, सिंगर को ऐसी मशीन बनाने की प्रेरणा दी। ऐसी खोज करके सिंगर ने न सिर्फ़ अपनी पत्नी का ही श्रम बचाया, बल्कि जो भी ऐसी सीने की मशीन ख़रीद सकते हैं, उन सबको हाथ से सीने के उबाने वाले श्रम से छुड़ाया। सिंगर मशीन के पीछे प्रेम था, इस लिए मानव सुख का विचार मुख्य था। यंत्र का उद्देश्य है- मानव श्रम की बचत। उसका इस्तेमाल करने के पीछे मकसद धन के लोभ का नहीं होना चाहिए।

यह रोचक प्रसंग महात्मा गांधी की चर्चित पुस्तक ‘हिंद स्वराज’ का है जिसे प्रकाशित हुए सौ वर्ष हो गए हैं और अब पूरी दुनिया में इसके पुनर्मूल्यांकन का दौर चल रहा है। सुभाष पंत के सम्पादन में निकलने वाली दिल्ली की साहित्यिक पत्रिका शब्दयोग और मुम्बई की संस्था हिन्दुस्तानी प्रचार सभा के संयुक्त तत्वावधान मे हिन्द स्वराज की समकालीन प्रासंगिकता पर एक संगोष्ठी हिन्दुस्तानी प्रचार सभा के सभागार में सोमवार २२ मार्च २०१० को आयोजित की गई जिसकी अध्यक्षता न्यायमूर्ति श्री चन्द्रशेखर धर्माधिकारी ने की। एक समर्पित गाँधीवादी होने के साथ-साथ धर्माधिकारीजी ने दस सालों तक महात्मा गांधी के साथ आज़ादी के आंदोलन में सक्रिय भागीदारी भी की थी। महात्मा गांधी के ‘हिन्द स्वराज’ पर केंद्रित समाज सेवी संस्था योगदान की त्रैमासिक पत्रिका शब्दयोग के इस विषेशांक का परिचय कराते हुए संगोष्ठी के संचालक देवमणि पाण्डेय ने महात्मा गांधी के योगदान को अकबर इलाहाबादी के शब्दों में इस तरह रेखांकित किया-

बुझी जाती थी शम्मा मशरिकी, मगरिब की आँधी से
उम्मीद-ए-रोशनी कायम है लेकिन भाई गाँधी

प्रथम पंक्ति में कथाकार डॉ. सूर्यबाला, कवयित्री रेखा मैत्र ( अमेरिका ), हिंदीसेवी डॉ.रत्ना झा, कथाकार कमलेश बख्शी, गाँधीवादी हंसाबेन

शब्दयोग के अतिथि सम्पादक प्रतिष्ठित कथाकार आर.के.पालीवाल ने इस अंक की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए कहा कि महात्मा गांधी के गुरु श्री गोपालकृष्ण गोखले ने ‘हिंद स्वराज’ को ‘पागलपन के किन्हीं क्षणों में लिखी किताब’ कहकर खारिज़ कर दिया था मगर विश्व प्रसिद्ध लेखक टॉलस्टाय को इसमें ‘क्रांतिकारों विचारों का पुंज’ दिखाई पड़ा और उन्होंने इसकी तारीफ़ करते हुए कहा कि यह एक ऐसी किताब है जिसे हर आदमी को पढ़ना चाहिए । पालीवालजी ने बताया कि ‘हिंद स्वराज’ के ज़रिए गाँधीजी ने पुस्तक लेखन में एक नया प्रयोग किया है। प्रश्नोत्तर शैली में लिखी गई इस पुस्तक में उन्होंने अपने विचारों से असहमति जताने वाले सभी लोगों को ‘पाठक’ के प्रश्नों में प्रतिनिधित्व दिया है। इस तरह उन्होंने उन सब संशयों, विरोधों और असहमति के स्वरों को एक साथ अपने उत्तरों से संतुष्ट करने की पुरज़ोर कोशिश की है जो गाँधीजी के समर्थकों, विरोधियों या स्वयं गाँधीजी के मन में उपजे थे । कवि शैलेश सिंह ने हिंद स्वराज के प्रमुख अंशों का पाठ किया । हिंदुस्तानी प्रचार सभा की मानद निदेशक डॉ. सुशीला गुप्ता ने अपने आलेख में हिंद स्वराज के प्रमुख बिंदुओं पर रोशनी डाली ।

न्यायमूर्ति चन्द्रशेखर धर्माधिकारी ने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि दुनिया के कई देशों में हिंद स्वराज की सौवीं जयंती मनाई जा रही है। अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा से लेकर कई देशों के राष्ट्राध्यक्ष हिंद स्वराज में अपनी आस्था व्यक्त कर चुके हैं । मेरे विचार से हर हिंदुस्तानी को महात्मा गांधी की इस किताब को अवश्य पढ़ना चाहिए और इस पर चिंतन करना चाहिए । गांधी जी ने अगर मशीनों, वकीलों और डॉक्टरों के खिलाफ़ लिखा तो उनके पास इसके लिए तर्कसंगत आधार भी था ।

कार्यक्रम की शुरुआत में सुश्री चंद्रिका पटेल ने गांधी जी का प्रिय भजन ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए’ प्रस्तुत किया । हिंदुस्तानी प्रचार सभा के संयुक्त मानद सचिव सुनील कोठारे ने आभार व्यक्त किया । इस आयोजन में मुंबई के साहित्य जगत से कथाकार डॉ. सूर्यबाला, कथाकार कमलेश बख्शी, कवि अनिल मिश्र, कथाकार ओमा शर्मा, कवि तुषार धवल सिंह, कवि ह्रदयेश मयंक, कवि हरि मदुल, कवि रमेश यादव, डॉ. रत्ना झा और महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी के कार्यकारी अध्यक्ष श्री नंदकिशोर नौटियाल मौजूद थे । अमेरिका से पधारी कवयित्री रेखा मैत्र और मुख्य आयकर आयुक्त द्वय श्री बी.पी. गौड़ और श्री एन.सी. जोशी ने भी अपनी उपस्थिति से कार्यक्रम की गरिमा बढ़ाई । कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान से हुआ। अंत में संगोष्ठी के संचालक कवि देवमणि पाण्डेय ने महात्मा गाँधी पर लिखी मुम्बई के वरिष्ठ कवि प्रो.नंदलाल पाठक की कविता की कुछ लाइनें उद्धरित कीं-

महामानव ! तुम्हें जो देवता का रूप देने पर उतारू हैं
कदाचित वे यहाँ कुछ भूल करते हैं
तरसते देवता जिसकी मनुजता को , उसे हम देवता बनने नहीं देंगे

न जब तक सीख लेता विश्व जीने की कला तुमसे
तुम्हें जीना पड़ेगा आदमी बनकर महामानव


एक उल्लेखनीय बात यह भी है कि गांधीजी की दुर्लभ पुस्तक ‘हिंद स्वराज’ को शब्दयोग ने अपने इस विशेषांक में पूरा प्रकाशित कर दिया है। शब्दयोग का संकल्प है कि ‘हिंद स्वराज’ को कम से कम दो हज़ार विद्यार्थियों तक ज़रूर पहुँचाया जाए।
सम्पर्क : आर.के.पालीवाल, बी-2, इंकमटैक्स कॉलोनी, पेडर रोड, मुम्बई – 400 026 , मो. 099309-89569 , ईमेल : rkpaliwal1986@gmail.com

Sunday, March 21, 2010

माँ ने आँखें खोल दीं घर में उजाला हो गया

कवितापाठ करते हुए डॉ.रचना, मंचासीन हैं कवि देवमणि पाण्डेय, सहारा इंडिया के डीएमडी ओ.पी. श्रीवास्तव, शायर मुनव्वर राना

आज यानी 21 मार्च को डॉ.रचना का जन्मदिन है। डॉ.रचना के जीवनसाथी उपेन्द्र राय सहारा समय (दिल्ली) में न्यूज़ डायरेक्टर हैं। मेरे प्रिय मित्र उपेंद्र के जीवन का मूलमंत्र है- ‘बड़े लोग बड़ा काम नहीं करते, वे हर काम को अलग ढंग से करते हैं’। इसी नज़रिए के चलते उपेंद्र ने पिछले साल अपनी जीवन संगिनी डॉ.रचना का जन्मदिन अलग ढंग से मनाया। उन्होंने अपनी शरीक-ए-हयात को एक नायाब तोहफा दिया। ‘शायरी की एक शाम’ डॉ.रचना के नाम कर दी। उनकी तीन वर्षीय बेटी ऊर्जा अक्षरा ने जन्मदिन का केट काटकर ‘माँ’ लफ़्ज़ को सार्थकता प्रदान की । ‘माँ’ पर शायरी लिखकर पूरी दुनिया में मशहूर हो चुके शायर मुनव्वर राना को काव्यपाठ के लिए इस मौक़े पर ख़ास तौर से आमंत्रित किया गया था। मुनव्वर राना की रचनाधर्मिता और सरोकारों पर रोशनी डालने की ज़िम्मेदारी उपेंद्र ने मुझे सौंप दी।

मुनव्वर राना का परिचय कराते हुए मैंने कहा कि उनकी शायरी में रिश्तों की एक ऐसी सुगंध है जो हर उम्र और हर वर्ग के आदमी के दिलो दिमाग़ पर छा जाती है । शायरी का पारम्परिक अर्थ है औरत से बातचीत । अधिकतर शायरों ने ‘औरत’ को सिर्फ़ महबूबा समझा । मगर मुनव्वर राना ने औरत को औरत समझा । औरत जो बहन, बेटी और माँ होने के साथ साथ शरीके-हयात भी है । उनकी शायरी में रिश्तों के ये सभी रंग एक साथ मिलकर ज़िंदगी का इंद्रधनुष बनाते हैं । वे हिंदुस्तान के ऐसे अज़ीम-ओ-शान शायर हैं जिसने ‘माँ’ की शख़्सियत को ऐसी बुलंदी दी है जो पूरी दुनिया में बेमिसाल है। अपने डेढ़ घंटे के काव्यपाठ में मुनव्वर राना ने माँ पर कई शेर सुनाए-

ऐ अँधेरे देख ले मुँह तेरा काला हो गया
माँ ने आँखें खोल दीं घर में उजाला हो गया

ये ऐसा क़र्ज़ है जो मैं अदा कर ही नहीं सकता
मैं जब तक घर न लौटूं मेरी माँ सजदे में रहती है

किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकां आई
मैं घर में सबसे छोटा था मेरे हिस्से में माँ आई

इस तरह मेरे गुनाहों को धो देती है
माँ बहुत गुस्से में हो तो रो देती है

मैंने रोते हुए पोंछे थे किसी दिन आँसू
मुद्दतों माँ ने धोया नहीं दुपट्टा अपना

जब भी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती है
माँ दुआ करती हुई ख़्वाब में आ जाती है

अभी ज़िंदा है माँ मेरी मुझे कुछ भी नहीं होगा
मैं घर से जब निकलता हूँ दुआ भी साथ चलती है


पिछले साल जब 21 मार्च 2009 को मुम्बई के पाँच सितारा होटल सहारा स्टार में जब यह आयोजन हुआ तो उपेंद्र राय उस समय स्टार न्यूज़ में वरिष्ठ सम्पादक थे। मगर वे हर काम को अलग ढंग से करते हैं । यही कारण था उनकी इस ख़ुशी में शरीक होने के लिए लखनऊ से सहारा इंडिया के डिप्टी एम.डी. ओ.पी.श्रीवास्तवजी पधारे तो मुम्बई से सहारा इंडिया के डॉयरेक्टर अभिजीत सरकार भी तशरीफ़ लाए। इस कार्यक्रम में उपस्थित कुछ प्रमुख लोगों में कुछ के नाम है- संजीव श्रीवास्तव (सम्पादक : बीबीबीसी इंडिया), अशोक कक्कड़ (ग्रुपप्रेसीडेंट : इंडिया बुल्स), जगदीश चंद्रा (सीईओ : ईटीवी), उमेश कामदार (निदेशक : माई डॉलर्स स्टोर्स), अभिनेत्री पूनम ढिल्लन, अभिनेत्री उर्वशी ढोलकिया, अभिनेत्री हेज़ल, अभिनेता सुशांत सिह, हास्यसम्राट राजू श्रीवास्तव और सुनीलपाल। इनके साथ ही एक दर्जन से अधिक आई.ए.एस. तथा आई.आर.एस. अधिकारी भी उपस्थित थे ।


इंदौर में उपेंद्र राय को भरोसा युवा पत्रकार सम्मान

दस साल पहले राष्ट्रीय सहारा (लखनऊ) से अपना कैरियर शुरू करने वाले उपेंद्र राय निरंतर प्रगति के सोपान तय करते हुए आज सहारा मीडिया के सम्पादक समाचार निदेशक हैं । ओशो के चिंतन को पसंद करने वले उपेंद्र राय उनके इस विचार से मुतास्सिर हैं कि कुछ नया करने के लिए जगह नहीं मन बदलने की ज़रूरत है । पिछले माह 11 फरवरी 2010 को हम लोग फिर आमने-सामने थे, यानी- डॉ.रचना, बेटी ऊर्जा अक्षरा, उपेंद्र, मैं और भाई मुनव्वर राणा। इंदौर के अभय प्रशाल स्टेडियम में गोपालदास नीरज, बेकल उत्साही और अनवर जलालपुरी जैसे वरिष्ठ शायरों तथा लगभग दस हज़ार लोगों की मौज़ूदगी में उपेंद्र राय को भरोसा युवा पत्रकार सम्मान से नवाज़ा गया । समारोह संचालन की ज़िम्मेदारी मुझे सौंपी गई। मंच पर तीन केंद्रीय मंत्री उपस्थिति थे- बलराम जाखड़, सलमान ख़ुर्शीद और सत्यप्रकाश जायसवाल। मेरा तवारूफ़ कराते हुए शायर मुनव्वर राणा ने पब्लिक के सामने कह दिया- देवमणि पाण्डेय मेरे अज़ीज़ दोस्त होने के साथ ही मेरे रिश्तेदार भी हैं क्योंकि इनके ज़िले सुलतानपुर में मेरा समधियाना है। इसी मंच पर भरोसा सम्मान वरिष्ठ शायर जावेद अख़्तर को और भरोसा युवा शायर सम्मान डॉ.तारिक क़मर (लखनऊ) को प्रदान किया गया। इसकी चर्चा फिर कभी। फिलहाल आईआईटी मुम्बई से बॉयोटेक्नॉलाजी में एमएससी एवं पीएचडी तथा जेआईआईटी (नोएडा) में बॉयोटेक्नॉलाजी की असिस्टेंट प्रोफेसर और संवेदनशील कवयित्री डॉ.रचना को जन्मदिन की बहुत-बहुत बधाई।

Tuesday, March 16, 2010

फ़िराक़ साहब अदबदाकर मिले

आज सुबह ज़फ़र गोरखपुरी से बात हुई तो बड़े ख़ुश थे। कहने लगे कि मुलुक से ख़बर आई है कि गोरखपुर में फ़िराक़ गोरखपुरी के नाम से एयरपोर्ट बन रहा है। यह वाकई उनकी क़लम का सम्मान है। अब वह दिन दूर नहीं जब हम लोग हवाई जहाज़ से अपने गाँव जाया करेंगे।

एक दिन एक ग़ज़ल कहने की कोशिश कर रहा था। एक मिसरा उछलकर सामने आ गया- ‘साबुत है सच अपना अब तक वार बहुत भरपूर हुए’। मन में एक शंका ने सर उठाया कि यहाँ साबुत होना चाहिए या सालिम। शंका के समाधान के लिए मैंने शायर ज़फ़र गोरखपुरी को फ़ोन किया। उन्होंने बताया कि सच के साथ सालिम ठीक रहेगा। सालिम पत्थर की तरह ठोस होता है। साबुत का मतलब है कि जो टूटा-फूटा न हो। बहरहाल शब्द चर्चा चली तो उन्होंने एक संस्मरण सुनाया। एक बार एक मुशायरे में ज़फ़र गोरखपुरी ने जो ग़ज़ल पढ़ी उसमें फ़ारसी का एक लफ़्ज़ था- दरख़्शाँ। रात में एक बजे मुशायरा समाप्त हुआ तो एक उर्दू टीचर उनके पास आया। उसने कहा- दरख़्शाँ लफ़्ज़ ग़लत है। सही लफ़्ज़ है दुरख़्शाँ। ज़फ़र साहब को रात भर नींद नहीं आई। सुबह छ: बजे ही सरदार जाफ़री के यहाँ पहुँच गए। सरदार ने बताया – दरख़्शाँ और दुरख़्शाँ दोनों सही हैं। जैसे किनारा को कुछ लोग कनारा, मुसर्रत को मसर्रत या रिज़ा को रज़ा कहते हैं।

बात आगे बढ़ी तो फ़िराक़ साहब का ज़िक्र आ गया। ज़फ़र साहब ने बताया कि फ़िराक़ साहब जानबूझकर कभी-कभी ऐसे लफ़्जों का इस्तेमाल कर देते थे कि सुनने वाले हैरान-परेशान हो जाते थे। एक बार उन्होंने एक शेर कह दिया जो शायद कुछ इस तरह का था -

नहीं मिले तो नहीं मिले
मिले तो अदबदाकर मिले


कई लोगों ने ऐतराज़ किया मगर फ़िराक़ साहब ‘अदबदाकर’ बदलने को तैयार नहीं हुए। इसी तरह एक बार एक मुशायरे में उन्होंने सुनाया-

ऐ याद-ए-यार तुझसे सर-ए-राह-ए-ज़िंदगी
अक्सर मिला हूँ और बगलिया गया हूँ मैं

‘बगलिया गया’ सुनकर कई लोग जलभुन गए मगर फ़िराक़ साहब इसे भी बदलने को तैयार नहीं हुए। ज़फ़र साहब का कहना है कि फ़िराक़ गोरखपुरी बीसवीं सदी के सबसे बड़े और सबसे पढ़े-लिखे शायर थे। एक बार फ़िराक़ साहब मुम्बई तशरीफ़ लाए तो उन्हें देखने के लिए कई हज़ार लोग इकट्ठे हो गए। उनका स्वागत कर रहे उस समय के सबसे बड़े समालोचक ज़ोय अंसारी ने श्रोताओं को ललकारते हुए कहा- हमअसरो फ़िराक़ साहब को आँख भरकर देख लो ताकि आने वाली नस्लों को ये बता सको कि तुमने फ़िराक़ साहब को देखा है। शायद इसी के बाद फ़िराक़ साहब ने अपना बहुचर्चित शेर कहा-

आने वाली नस्लें तुम पर फ़ख़्र करेंगी हमअसरो
जब ये ध्यान आएगा उनको तुमने फ़िराक़ को देखा

ज़फ़र गोरखपुरी

ज़फ़र गोरखपुरी ने 22 साल की उम्र में फ़िराक़ साहब की सदारत में इलाहाबाद के एक मुशायरे में शिरकत की थी। वहाँ दस हज़ार लोगों के सामने माइक पर फ़िराक़ साहब ने कह दिया था- यह नौजवान आगे चलकर बहुत बड़ा शायर बनेगा। उनकी बात सच हुई। आज उर्दू अदब में ज़फ़र गोरखपुरी का एक अच्छा मुकाम है। ज़फ़र गोरखपुरी की शायरी की पहली किताब ‘तेशा’ 1962 में प्रकाशित हुई। फ़िराक़ साहब ने ख़ुश होकर इस पर एक समीक्षात्मक लेख लिखा। ज़फ़र के लिए यह बहुत बड़ा इनआम था। उस समय इंक़लाबी शेर कहना और फ़ारसी के भारी भरकम लफ़्जों का इस्तेमाल करना एक फैशन था। फ़िराक़ साहब ने उन्हें डाँटा- मियाँ शायरी का मतलब इंक़लाब नहीं, ज़िंदगी से बातचीत होता है। फ़ारसी में नहीं उर्दू में शायरी करो। मेरा शेर देखो, इसमें एक भी लफ़्ज़ फ़ारसी का नहीं है-

बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं
तुझे ऐ ज़िंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं
फ़िराक़ साहब के मशवरे पर अमल किया तो ज़फ़र की शायरी का रंग ऐसे निखर गया-

उठाकर अपनी शम्ओं का उजाला दे दिया मैंने
हवा बरसों की भूखी थी निवाला दे दिया मैंने
मैं बादल था मुझे तो धज्जियाँ होना था वैसे भी
ज़मीं तुझको तो सब्ज़े का दुशाला दे दिया
सन 1996 में गोरखपुर में ज़फ़र को फ़िराक़ गोरखपुरी सम्मान से सम्मानित किया गया। जाने माने नक़्क़ाद शमसुर्रहमान फ़ारुक़ी के हाथों से उन्हें यह सम्मान प्राप्त हुआ। फ़िराक़ साहब की दो किताबें अगर मिल सके तो ज़रूर पढ़िए- उनकी रुबाइयों का संग्रह ‘रूप’ और गद्य पुस्तक ‘उर्दू की इश्क़िया शायरी’।

Wednesday, March 10, 2010

रेखा मैत्र के सम्मान में जीवंती फाउंडेशन की काव्य गोष्ठी

राम गोविंद, अरविंद राही ,बोधिसत्व, अरुण अस्थाना, रेखा मैत्र, माया गोविंद, हैदर नज़्मी, देवमणि पाण्डेय

अमेरिका से रेखा मैत्र ने मेल किया- आपसे मिलने मुम्बई आ रही हूँ। मैंने वरिष्ठ कवयित्री माया गोविंद जी को फोन लगाया। माया जी जोश में आ गईं- अरे मेरे घर पर शनिवार को एक गोष्ठी रख लो। कई दिन से मेरी तबियत ठीक नहीं है। तुम लोगों की कविताएं सुनकर मेरी तबियत सुधर जाएगी। बस कवयित्री रेखा मैत्र के सम्मान में जीवंती फाउंडेशन की ओर से जुहू में माया गोविंद जी के आवास पर एक काव्य संध्या का आयोजन हो गया। बनारस (उ.प्र.) में जन्मीं रेखा मैत्र की उच्च शिक्षा सागर (म.प्र.) में हुई। मुम्बई में कुछ साल अध्यापन करने के बाद मेरीलैण्ड (अमेरिका) में बस गईं। यहाँ भाषा के प्रचार-प्रसार से जुड़ी संस्था ‘उन्मेष’ के साथ सक्रिय हैं। रेखा जी के अब तक दस कविता संकलन प्रकाशित हो चुके हैं।यह हमारी पहली मुलाक़ात थी। रेखाजी उमंग, ऊर्जा और जोश से भरपूर हैं। उन्होंने अपने जीवंत व्यहार और संवेदनशील कविताओं से सबको मंत्रमुग्ध कर दिया।
उनकी एक कविता चिड़िया देखिए-
इस मटियाली इमारत में
चिड़िया भी सहमी सहमी घूम रही है !
गोया इसे भी डर है कि
कहीं इसे भी क़ैद न कर लिया जाए !
अपने पंखों का अहसास भूल ही गई है शायद !



श्रीमती बॉबी, सुमीता केशवा, रेखा मैत्र, माया गोविंद, कविता गुप्ता, उमा अरोड़ा
अस्वस्थ होने के बावजूद माया गोविंद ने तरन्नुम में ग़ज़ल सुनाकर सबको भावविभोर कर दिया-

सूनी आँखों में जली देखीं बत्तियाँ हमने
जैसे घाटी में छुपी देखीं बस्तियाँ हमने
अब भटकते हैं य़ूँ सहरा में प्यास लब पे लिए
हाय क्यूँ बेच दी सावन की बदलियाँ हमने

समकालीन हिंदी कविता के जाने-माने हस्ताक्षर डॉ.बोधिसत्व ने ‘तमाशा’ कविता का पाठ किया।कुछ पंक्तियाँ देखिए-

तमाशा हो रहा है
और हम ताली बजा रहे हैं
मदारी साँप को दूध पिला रहा हैं
हम ताली बजा रहे हैं
अपने जमूरे का गला काट कर
मदारी कह रहा है-'ताली बजाओ जोर से'
और हम ताली बजा रहे हैं
कई बड़ी फ़िल्में और धारावाहिक लिख चुके प्रतिष्ठित फ़िल्म लेखक राम गोविंद शायर भी हैं, इस बात को सिर्फ़ उनके यार-दोस्त ही जानते हैं। लीजिए उनका शायराना अंदाज़ देखिए-

वो समझते थे दिल की जाँ सा है
क्या पता था कि वो जहाँ सा है
आह की हमसे बड़ी भूल हुई
वो समझते थे बेज़ुबाँ सा है

टाइम्स म्यूज़िक द्वारा जारी सूफ़ी अलबम ‘रूबरू’ से लोक प्रिय हुए युवा शायर हैदर नज़्मी ने एक बेहतर नज़्म पेश करने के साथ ही ग़ज़ल सुनाकर समाँ बाँधा-

तुम्हें इस दिल ने जब सोचा बहुत है
हँसा तो है मगर रोया बहुत है
मुझे अब ज़िंदगी भर जागना है
कि मुझपे ख़्वाब का क़र्ज़ा बहुत है
कवि-गीतकार देवमणि पाण्डेय ने भी ग़ज़ल सुनाकर इस ख़ूबसूरत सिलसिले को आगे बढ़ाया-

इस ग़म का क्या करें हम तनहाई किससे बाँटें
जो भी मिली है तुमसे रुसवाई किससे बाँटें
तेरी मेरी ज़मीं तो हिस्सों में बँट गई है
यह दर्द की विरासत मेरे भाई किससे बाँटें

कथाकार अरुण अस्थाना ने सामयिक कविता का पाठ किया। श्रीमती सुमीता केशवा ने औरत के अस्तित्व पर और कविता गुप्ता ने तितलियों के तितलाने पर कविता सुनाई। अनंत श्रीमाली ने व्यंग्य कविता और अरविंद राही ने ब्रजभाषा के छंद सुनाए। जीवंती फाउंडेशन की ओर से श्रीमती बॉबी ने रेखा मैत्र का पुष्पगुच्छ से स्वागत किया। श्रीमती माया गोविंद ने रेखा जी को अपना काव्य संकलन भेंट किया। इस अवसर पर श्रीमती उमा अरोड़ा और श्रीमती कुमकुम मिश्रा अतिथि के रूप में मौजूद थीं।सॉरी ! इस बार भी मैं अपने प्रिय मित्र नीरज गोस्वामी और चंद्रकांत जोशी को आमंत्रित करना भूल गया।आशा है हमेशा की तरह इस बार भी ये लोग मुझे माफ़ कर देंगे।

देवमणि पांडेय : 98210-82126
devmanipandey@gmail.com 


Sunday, March 7, 2010

कुरार गाँव की औरतें



अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस (8 मार्च) का ज़िक्र होते ही मुझे कुरार गाँव की औरतों का ध्यान आता है। मुम्बई के उपनगर मालाड (पूर्व) में ईस्टर्न हायवे से सटी हुई विशाल बस्ती का नाम है ‘कुरार गाँव’। दूर तक इस बस्ती के सिर पर बस सीमेंट की छतें नज़र आती हैं।बीस साल पहले जब मैंने वहाँ एक चाल में अपना रैन बसेरा बनाया था तो यहाँ छ: पार्षद थे यानी लगभग 6 लाख की आबादी थी। बहुत कुछ बदला मगर न तो ‘कुरार गाँव की औरतें’ बदलीं और न ही उनकी ज़िंदगी बदली । उनका सोच-विचार और व्यवहार आज भी वैसा ही है। मुझे उस समय किंचित आश्चर्य हुआ था कि मेरे पड़ोसी टिम्बर मर्चेंट कासिम की बीवी ही नहीं जवान बेटी भी अनपढ़ है। सर पर डिब्बा लादकर इडली बेचने वाले अन्ना की पत्नी अनपढ़ है तो सिक्योरिटी गार्ड तिवारी की पत्नी भी अनपढ़ है। कुल मिलाकर उस गाँव में अनपढ़ औरतों की संख्या काफी थी। जब मैं अपने बीवी-बच्चों के साथ उनकी दुनिया में दाखिल हो गया तो मैंने उन पर एक कविता लिखी-‘कुरार गाँव की औरतें’

उस समय मुम्बई में राहुलदेव के सम्पादन में ‘जनसत्ता’ लोकप्रियता के शिखर पर था। नगर पत्रिका ‘जनसत्ता सबरंग’ के सम्पादन के लिए कथाकार धीरेंद्र अस्थाना दिल्ली से मुम्बई आ चुके थे। लोकल ट्रेन के सफ़र में मैंने यह कविता उन्हें पढ़ने के लिए दी। उन्होंने कहा- मैं इसे छापूंगा। रविवार 20 जनवरी 1991 को जब ‘जनसत्ता सबरंग’ में यह कविता प्रकाशित हुई तो मुम्बई के साहित्य जगत में धूम मच गई।

सबसे पहले मुम्बई में समकालीन कविता के बहुचर्चित कवि विजय कुमार ने फोन पर बधाई दी। ‘धर्मयुग’ और ‘नवभारत टाइम्स’ के मित्रों ने तारीफ़ की। विनोद तिवारी के सम्पादन में हिंदी की सबसे सुरुचिपूर्ण फ़िल्म पत्रिका ‘माधुरी’ हिंदी की ‘फ़िल्मफेयर’ बन गई थी। उसमें कार्यरत पत्रकार मिथिलेश सिन्हा ने कहा- मैंने अपनी अब तक की ज़िंदगी में कभी अतुकांत कविता नहीं पढ़ी। मगर इसका शीर्षक देखकर मैं ख़ुद को पढ़ने से रोक नहीं पाया। मुझे यह कविता बहुत अच्छी लगी। मुम्बई के साहित्य जगत में में टीका-टिप्पणी का भी दौर चला। किसी ने कहा कि यह तो बाबा नागार्जुन की एक कविता की नक़ल है तो किसी ने कहा कि यह तो आलोक धन्वा की ‘ब्रूनों की बेटियों’ से प्रभावित है। कुल मिलाकर यह कविता इतनी लोक प्रिय हुई कि कई लोग मुझे ‘कुरार गाँव का कवि’ कहने लगे।

सबसे दिलचस्प बात यह हुई कि सुबह 10 बजे क़रीब 20 अनपढ़ औरतों का एक समूह मेरे पड़ोस में रहने वाली एक स्कूल शिक्षिका के पास गया। उन्होंने उसके सामने ‘जनसत्ता सबरंग’ रखकर कहा कि बताओ- इसमें हमारे बारे में छपा क्या है ? स्कूल शिक्षिका ने उनके सामने पूरी कविता का पाठ किया। कुरार गाँव की औरतों ने कहा- हमारे बारे में जो भी छपा है वह सच है। एक कवि के लिए इससे बड़ा प्रमाणपत्र क्या हो सकता है ! शाम को कई लोग मिलने आए। उनमें एक बंगाली व्यवसायी थे आनंदजी। उन्होंने मुझे एक चाभी सौंपते हुए कहा- मैंने दो निजी शौचालय बनवाए हैं।उनमें से एक आपका हुआ। अब आप सरकारी शौचालय की लाइन में नहीं खड़े होंगे। एक कविता के लिए इससे बड़ा पुरस्कार और क्या हो सकता है !

6 दिसम्बर 1992 को अयोध्या काण्ड की प्रतिक्रिया में मुम्बई में दंगे शुरू हो गए। सम्पादक राहुलदेव जी ने सुझाव दिया कि साम्प्रदायिक सदभावना का संदेश जनसत्ता के पाठकों तक पहुँचाने के लिए मैं कुछ बुद्धिजीवियों से बात कर लूँ। मैंने सबसे पहले डॉ.धर्मवीर भारती को फोन किया। वे लाइन पर आए तो मैंने कहा - सर मेरा नाम देवमणि पाण्डेय है। वे तपाक से बोले- अरे भाई मैं तुम्हें जानता हूँ। तुम्हारी वो कविता मैंने पढ़ी थी- ‘कुरार गाँव की औरतें’। बहुत अच्छी लगी। मैं चाहता हूँ कि तुम एक दिन मेरे घर आओ और मुझे अपनी कविताएं सुनाओ। मैं एक दिन भारती जी के घर गया। उन्होंने बड़े प्रेम से मेरी कविताएं सुनीं। आज भारती जी हमारे बीच नहीं हैं। लेकिन ‘कुरार गाँव की औरतों’ का असर कुछ ऐसा है कि आज भी मेरे सर पर श्रीमती पुष्पा भारती का वरदहस्त है। आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस (8 मार्च) पर मुझे कुरार गाँव की औरतों की बहुत याद आ रही है। आइए आपको भी इन औरतों से मिलाएं-


कुरार गाँव की औरतें
(1)
कुरार गाँव की औरतें ऑफिस नहीं जातीं
वे ऑफिस गए पतियों और
स्कूल गए बच्चों का करती हैं इंतज़ार
बतियाती हैं अड़ोस पड़ोस की औरतों से
या खोल देती हैं कोई क़िस्सा कहानी

उनके क़िस्सों में ज़्यादातर होती हैं औरतें
कि किस औरत का भारी है पैर
कौन पिटती है पति से
या कौन लड़ती है किससे
वे इस बात में रखती हैं काफ़ी दिलचस्पी
कि कल किसकी बेटी
बाहर से कितनी लेट आई
और किस लड़की ने
अपने माँ बाप की डाँट खाई

खाना - पानी, कपड़े - बच्चे
सिलाई - कढ़ाई - लड़ाई
और न जाने कितने कामों के बावजूद
किसी ख़ालीपन का एहसास
भर जाता है उनमें
बेचैनी, ऊब और झल्लाहट
और वे बुदबुदाती हैं
समय की सुस्त रफ़्तार के खिलाफ़

(2)
कुरार गाँव की औरतें
टीवी पर राम और सीता को देखकर
झुकाती हैं शीश
कृष्ण की लीलाएं देखकर
हो जाती हैं धन्य
और परदे पर झगड़ने वाली औरत को
बड़ी आसानी से समझ लेती हैं बुरी औरत

वे पुस्तकें नहीं पढ़तीं
वे अख़बार नहीं पढ़तीं
लेकिन चाहती हैं जानना
कि उनमें छपा क्या है !
घर से भागी हुई लड़की के लिए
ग़ायब हुए बच्चे के लिए
या स्टोव से जली हुई गृहणी के लिए
वे बराबर जताती हैं अफ़सोस

उनकी गली ही उनकी दुनिया है
जहाँ हँसते-बोलते, लड़ते-झगड़ते
साल दर साल गुज़रते चले जाते हैं
और वक़्त बड़ी जल्दी
घोल देता है उनके बालों में चाँदी

(3)
कुरार गाँव की औरतें
अच्छी तरह जानती हैं कि
किस वर्ष बरसात से
उनकी गली में बाढ़ आई
किसके बेटे-बेटियों ने शादी रचाई
किस औरत को
कब कौन सा बच्चा हुआ
और कब कौन उनकी गली छोड़कर
कहीं और चला गया

लेकिन उन्हें नहीं पता कि तब से
यह शहर कितना बदल गया
कब कौन सा फैशन आया और चला गया
और अब तक समय
उनकी कितनी उम्र निगल गया

अपनी छोटी दुनिया में
छोटी झोंपड़ी और छोटी गली में
कितनी ख़ुश -
कितनी संतुष्ट हैं औरतें
सचमुच महानगर के लिए
चुनौती हैं ये औरतें

(4)
कुरार गाँव की औरतें
तेज़ धूप में अक्सर
पसीने से लथपथ
खड़ी रहती हैं राशन की लाइनों में
देर रात गए उनींदी आँखों से
करती हैं पतियों का इंतज़ार
मनाती हैं मनौतियां
रखती हैं व्रत उपवास
और कितनी ख़ुश हो जाती हैं
एक सस्ती सी साड़ी पाकर
भूल जाती हैं सारी शिकायतें

वे इस क़दर आदतों में हो गईं हैं शुमार
कि लोग भूल गए हैं
वे कुछ कहना चाहती हैं
बांटना चाहती हैं अपना सुख-दुख

देर रात को अक्सर
दरवाज़े पर देते हुए दस्तक
सहम उठते हैं हाथ
किसी दिन अगर
औरतों ने तोड़ दी अपनी चुप्पी
तो कितना मुश्किल हो जाएगा
इस महानगर में जीना