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Wednesday, January 25, 2017

देवमणि पाण्डेय की ग़ज़ल



देवमणि पाण्डेय की ग़ज़ल 

परवाज़ की तलब है अगर आसमान में
ख़्वाबों को साथ लीजिए अपनी उड़ान में

बच्चों के साथ चाहती है धूप खेलना
आने तो दीजिए उसे अपने मकान में

मोबाइलों से खेलते बच्चों को क्या पता
बैठे हैं क्यूँ उदास खिलौने दुकान में

लफ़्ज़ों से आप लीजिए मत पत्थरों का काम
थोड़ी मिठास घोलिए अपनी ज़ुबान में

हम सबके सामने जिसे अपना तो कह सकें
क्या हमको वो मिलेगा कभी इस जहान में

दिल को मेरे वो तोड़कर शर्मिंदा यूँ हुआ
रहने लगा है फिर इसी उजड़े मकान में

उससे बिछड़के ऐसा लगा जान ही गई

वो आया जान आ गई है फिर से जान में