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Monday, May 16, 2016

पानी की अब कमी बहुत है




बादल भूल गए हैं रस्ता

आँख में सबके नमी बहुत है
पानी की अब कमी बहुत है
सूख गई हैं नदियाँ सारी
प्यासी अबके ज़मीं बहुत है

झुलस गई है धूप में मिट्टी
दरक गया धरती का सीना
सूख गए सब पेड़ बेचारे
बहुत कठिन है जल बिन जीना

सोच रही हैं बूढ़ी दादी
दूध से महँगा है अब पानी
प्यासे ही सो गए हैं बच्चे
रूठ गया है दाना-पानी

जल से धरती पर जीवन है
आओ मिलकर इसे बचाएँ
बादल भूल गए हैं रस्ता
दुआ करो ये वापस आएँ


देवमणि पांडेय : 98210-82126
devmanipandey@gmail.com 

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